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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त
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सोमवार, 23 फ़रवरी 2015

शिक्षा-विस्तार के महान स्वप्न-दृष्टा एवं महिला शिक्षा विस्तार व सशक्तीकरण के एक कर्मयोगी..का जन्म शताब्दी वर्ष ... डा श्यामगुप्त......

                                                 ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


शिक्षा-विस्तार के महान स्वप्न-दृष्टा एवं महिला शिक्षा विस्तार व सशक्तीकरण के एक कर्मयोगी..का जन्म शताब्दी वर्ष ....


                            सोनीपत हरियाणा के महिला शिक्षा के स्वप्नदृष्टा एवं देश के प्रतिष्ठित एवं प्रसिद्द हिन्दू गर्ल्स कालेज सोनीपत के संस्थापक बाबू जयकिशन अग्रवाल का जन्म शताब्दी दिवस, हिन्दू विद्या एवं धर्मार्थ समिति, हरियाणा सोनीपत द्वारा साधना-शताब्दी वर्ष के रूप में मनाया गया|
हिन्दू विद्या एवं धर्मार्थ समिति सोनीपत में लगभग विभिन्न शिक्षण विषयों में लगभग १५ शिक्षा संस्थाओं का संचालन कर रही है जिनमें हिन्दू विद्यापीठ, हिन्दू कालेज, हिन्दू गर्ल्स कालेज, फार्मेसी, मनेजेमेंट, टेक्नोलोजी, आर्कीटेक्चर, इंजीनियरिंग, बी एड कालेज, जे के अस्पताल आदि शामिल हैं |
                                   हिन्दू गर्ल्स कालेज सोनीपत देश का प्रतिष्ठित एवं प्रसिद्द महिला कालिज है जो एक लम्बे समय से लड़कियों को प्रत्येक क्षेत्र में सक्षम, समर्थ व प्रतिभावान बनाने एवं महिला-सशक्तीकरण हेतु संकल्प रत है | शिक्षा, स्पोर्ट्स, मार्शल आर्ट्स, सैनिक शिक्षा, कला, साहित्य, धर्म, संस्कृति, अध्यात्म, नैतिक मूल्य, आचरण, मानवता, मानव-सेवा, राष्ट्र-भक्ति आदि सभी में उदात्त गुणों व प्रतिभा के समावेश का लक्ष्य सम्मुख रखा जाता है |
                          वर्तमान में कालेज के प्रधानाचार्य डा राजकुमार गुप्ता एमएससी, पीएचडी (भौतिक शास्त्र) एक  प्रतिभाशाली , सहज व सरल व्यक्तित्व के धनी व विद्वान् व्यक्ति हैं | वे सक्षम भौतिकविज्ञानी एवं समर्थ शिक्षाविद हैं एवं कालेज को नयी नयी ऊचाइयों पर ले जाने में सक्षम एवं कटिबद्ध हैं|

चित्र-१.प्रधानाचार्य डा आर के गुप्ता , पत्नी कस्टम आफिसर श्रीमती मीनाक्षी गुप्ता एवं डा श्याम गुप्त के साथ २. प्रधानाचार्य केम्पस में छात्राओं की समस्या सुनते हुए 3.कालेज केम्पस...4.संस्थापक बाबू जय किशन लाल अग्रवाल ५.. प्रधानाचार्य डा राज कुमार गुप्ता हिन्दी विभाग में ४. छात्राओं द्वारा हिन्दी कविताएं .
'हिन्दू गर्ल्स कालेज के संस्थापक जय किशन अग्रवाल'
'प्राचार्य डा आर के गुप्ता अपने कालेज कार्यालय में'
'छात्राओं की समस्या सुनते हुए डा गुप्ता'
'कालिज केम्पस व प्राचार्य'
'प्राचार्य द्वारा कालेज हिन्दी विभाग में पारितोषिक वितरण'



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शुक्रवार, 4 जून 2010

महामानवों के निर्माण व सामाजिक श्रेष्ठता संवर्धन में नारी का योगदान ---डा श्याम गुप्त का आलेख

महामानवों के निर्माण व सामाजिक श्रेष्ठता संवर्धन में नारी का योगदान
( डा श्याम गुप्त )

यदि मानव प्रकृति की संरचनात्मक कृति की सबसे उत्कृष्ट, समृद्ध व आधुनिकतम रूप है तो नारी प्रकृति की सृजनात्मक शक्ति का सर्वश्रेष्ठ व उच्चतम रूप है। इस संसार रूपी ईश्वरीय उद्यान को सुरम्य , सुन्दर व श्रेष्ठ बनाने में इसी नारी शक्ति का विभिन्न रूपों में योगदान रहा है। समय समय पर तत्कालीन राष्ट्रीय, सामाजिक व व्यक्तिगत आवश्यकताओं के अनुरूप एवं विकृतियों के उन्मूलन हेतु, महामानवों के जन्म व निर्माण की प्रक्रिया भी इसी नारी शक्ति की देन है।
माँ -दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती के रूप में आदिशक्ति, माँ के दूध के रूप में अपनी भावनात्मक संकल्प शक्ति, पत्नी के रूप में पुरुष की सहयोगिनी शक्ति एवं भगिनी, पुत्री, मित्र, सखी के रूप में स्नेह, संवेदनाओं एवं पवित्र भावनाओं को सींचने में युक्त नारी शक्ति, सत्य में ही पुरुष के निर्माण , विकास की एवं समाज के सृजन, अभिवर्धन व श्रेष्ठ व्यक्तित्व निर्माण की धुरी रही है। भारत में पुरा काल से ही नारी समाजका शिखर रूप व राष्ट्र की धुरी रही है।शास्त्रों में कहागया है--"दश पुत्र समां कन्या, यस्या शीलवती : सुता " तथा ---
" सम्राज्ञी श्वसुरे भव , सम्राज्ञी श्वसुरामं भवसम्राज्ञी ननन्दारिं ,सम्राज्ञी अधिदेव्रषु ॥ "
सृष्टि की सारी सुव्यवस्था व सुन्दरता नारी शक्ति की ही अभिव्यक्ति है। विश्व भर की संस्कृति व सभ्यता का वर्त्तमान रूप नारी के अथक त्याग व बलिदान की ही कहानी है।
यह समय का अभिशाप ही है कि आज , मध्य युग की सामयिक परिस्थितियों के प्रभाव व तनाव के कारण
नारी अन्तः करण की ऊर्जा व कोमलता को व्यक्तियों व बस्तुओं में आबद्ध करके उसे उसके सिद्धांतों , आदर्शों से विमुख करदिया गया | जब उसे चूल्हा व चौका तक सीमाबद्ध करदिया गया तो उसके प्रखरता नष्ट होने लगी | पारिवारिक शालीनता --मोह, अति संग्रह व व्यक्तिगत उपभोग में परिवर्तित होगई | पति नामक पुरुष द्वारा मनमानी ,उच्छृंखलता , अनीति एवं नारी उत्प्रीणन का मार्ग प्रशस्त हुआ। बच्चों में भी वही भाव घर करने लगे। प्रतिक्रया स्वरुप नए युग में नारी में भी आज़ादी की चाह, ,उच्छृंखलता, पुरुष उत्प्रीणन आदि भाव घर कर गए। आज नारी- पुरुष टकराव इसी प्रतिक्रया का परिणाम है। और यहीं से सामाजिक जीवन में भ्रष्टाचार का प्रारम्भ होता है; जो समाज व आगे की पीढी के लिए अभिशाप ही सिद्ध होरहा है व होंगे।
आज आवश्यकता है कि नारी व पुरुष दोनों ही विचारों की संकीर्णता से बाहर निकलें। पुरुष नारी को सम्पूर्ण सम्मान, वैचारिक व सामाजिक समानता प्रदान करे | आदि -मातृशक्ति को अपनी भूमिका निभाने योग्य स्तर पर पहुंचाना हम सबका पुनीत कर्तव्य है। नारी ने पुरुष के सामने आत्मसमर्पण का जो आदर्श रखा है इसका यह अर्थ नहीं कि पुरुष उसका मूल्य ही न समझे। स्वामी विवेकानंद ने कहा था--"भारतीयों ! भूलना नहीं , तुम्हारी संस्कृति का आदर्श सुशिक्षित नारी हैतुम्हारा समाज विराट महामाया की छाया मात्र है। "
इस कार्य में पहल नारी को ही करनी होगी। नारी अपने उत्प्रीणन की कथा अपनी सखियों,सम्बन्धियों व पुरुष-मित्रों से कह कर बोझ हलका कर लेती हैं ; परन्तु पुरुष अहं व संकोच के कारण नारी द्वारा अपने उत्प्रीणन की बात वे मित्रों से भी नहीं कह पाते व घुटते रहते हैं , जो नारी के प्रति असम्मान के रूप में व्यक्त होती है।
सुसंस्कृत पत्नी अपने पति को ईमानदार बनाने में पहल कर सकती है। सम्पन्नता कहीं अनैतिक कर्म से तो नहीं आरही , इस पर ध्यान रखना चाहिए। घर का संचालन मितव्ययिता पूर्वक हो कि सिर्फ ईमानदारी की कमाई ही पर्याप्त हो। इस प्रकार वह योग्य, ईमानदार , मितव्ययी व्यक्तियों व संतान का निर्माण करके , राष्ट्र व समाज की श्रेष्ठता संवर्धन में अपना योगदान करके, आदि काल से महामानवों के निर्माण व सामाजिक आदर्श की प्रतिष्ठा में अपने योगदान को पुनः स्थापित कर अपनी खोई हुई गरिमा को पुनः बहाल कर सकती है।
पढी-लिखी नारी अपने वर्ग को सुसंस्कृत तथा सुशिक्षित बनाने व ऊंचा उठाने में संकोच व भय को त्यागकर आगे आये तो पुरुष भी स्वयं भी सहयोग की भावना से आगे आयेंगे । तब कहीं भी द्वंद्व की स्थिति नहीं रहेगी। यही युग की पुकार है।


मंगलवार, 8 सितंबर 2009

कुर्सी का मुख पश्चिम में करदो ----व्यवस्था बदलने का अंधविश्वास

बहुत पुरानी बात है की एक दिन मेरे छोटे भाई ने ,जो कक्षा ६ का विद्यार्थी था, आकर बताया कि मास्टर जी ने कहा है ये कापियां अब नहीं चलेंगी , रजिस्टर लाओ| मैंने कहा अब इन कापियों का क्या होगा, चलो मास्टरजी से पूछें|में स्वयं इंटर -विज्ञान का क्षात्र था. स्कूल में मेरा तर्क था कि मेरे पिता के मेहनत की कमाई की ये कापियां यूँही जायेंगी , आख़िर देश के धन की भी तो बर्बादी है| मास्टर जी न माने तो मैंने पूछा-सर ,क्या रजिस्टर से पढाई अच्छी होगी,क्या बच्चे अच्छी तरह याद करेंगे,क्या आप की गुणवत्ता बढ़ जायगी ?मास्ट र जी का कहना था कि अच्छी-अच्छी कापियां किताब देखकर अच्छा लगता है ; फ़िर अंगरेजी में बोले-तुम विज्ञान के विद्यार्थी होकर ऐसी वेवकूफी की बात करते हो, योरोप आदि के स्कूलों ने कितनी तरक्की की है ,हम हैं कि वहीं हैं। राष्ट्र-भक्ति का बहाना है,भाषण देने को तो -'नेता बन जाओ ' यहां सिर न मारो।( अर्थ निकलता है कि उन दिनों नेताओं कोराष्ट्र-भक्त माना जाता था, अतःसिर्फ़ नेता राजनीति नहीं अपितु शिक्षा जगत में पाश्चात्य -नक़ल देश की दुर्दशा का कारण है ),उन्ही के पढ़े -पढाये हुए क्षात्र आज के नेता व अन्य स्थानों पर हैं। उन दिनों भारतीय नगरों में अंगरेजी तर्ज़ पर पब्लिक स्कूल खुलते ही जारहे थे और हम उनकी नक़ल में व्यस्त थे। आज शिक्षा का मानवीय स्तर तो आप देख ही रहे हैं।
हमारे दफ्तरों में जब कोई बड़ा अफसर नया आता है तोएक अंधविश्वास की तरह , दफ्तर का काया-कल्प कराता है; ये कुर्सी का मुख पश्चिम में करो, दीवारों पर गुलाबी रंग हो तमाम अंधविश्वास व काम न करने के बहाने ।दफ्तर की कार्य-व्यवस्था तो आप जानते ही हैं -वही रफ़्तार बेढंगी' ।
आज हमारे 'सिब्बल सर' भी यही चरितार्थ कररहे हैं। 'कुर्सी का मुख पश्चिम में करदो' सब ठीक होजायागा। शिक्षा व अध्ययन की गुणवत्ता बढ़ाने का फार्मूला ,वही पुराना,-भौतिक बस्तुएं व व्यवस्था बदलने का'। एक बोर्ड ख़त्म करके दूसरी व्यवस्था की कहीं से नक़ल लाकर रखदो । लो .जनता का ध्यान भी बाँट गया,नया काम भी होगया । उधार व नक़ल की व्यवस्था लादने का आसान काम ; कौन सिर खपाए -बच्चों की,शिक्षा की,शिक्षकों की,सांस्कृतिक,राजनेतिक ,भारतीयकरण की गुणवत्ता सुधारने में ,व्यक्ति-मात्र में अच्छा इंसान बनने की शिक्षा देने में,पाठ्यक्रमों में मानवीय -गुणों का समावेश कराने में।
कुर्सी ,कापी ,किताब ,बोर्ड,व्यवस्थाएं --जड़ पदार्थ हैं,उनमें स्वयं की गुणवत्ता नही होती ; वे तो" जेहि वर्तन में राखिये ढले उसी के रंग" ,गुणवत्ता तो जीवित मनुष्य का गुण है । जब तक मनुष्य को स्वयं में सुधार व अन्य के लिए आदर्श प्रस्तुत कराने की दशा व दिशा के ज्ञान की शिक्षा नहीं दीजायगी,शिक्षा व समाज में गुणवत्ता नहीं आसकती। व्यवस्था बदलने का अर्थ है समस्या से मुख फेरना। ६२ साल से यही होरहा है।

शुक्रवार, 3 जुलाई 2009

वेदों की पठशाला--एक आइ.ए.एस. का अभिनव प्रयोग

एक रिटायर्ड आइ.ए.एस. हैं,विधु त्रिवेदी- जिन्होंने अ्पने जीवन के निचोड से जाना कि बच्चों को वेद की शिक्षा आवश्यक है ओर जुट गये पढाने में,आधुनिक विग्यान व व्यवहार से अपने इतिहास, सन्स्कार,शास्त्रों की मर्यादा व ग्यान का क्यों व कैसे सामन्जस्य करना चाहिये ,सीखें।वे औरों को भी समेटने में लगे हैं। पढिये यह आलेख जो उन लोगों के मुंह पर तमाचा है जो वेदिक ग्यान को खन्डहर, कचरा आदि बताने में लगे हैं और अन्य देशों के पिछलग्गू होकर सिर्फ़ उनके गीत
गाने एवम उनकी पीठपर अपनी रोटी सेंकने व भोग-भोगने में लगे हें।
स्वयम ही पढें व समझें,सोचें

सोमवार, 29 जून 2009

धारा ३७७,समलेंगिकता ,सेक्स शिक्षा व माता पिता की शर्त --

सम लेंगिकता के पक्षधर कहरहे हैं कि इसा क़ानून के हटाने से लोग अनावश्यक पुलिश उत्प्रीणन से बचेंगे। क्या मूर्खतापूर्ण ,अदूरदर्शी दलील है ,ऐसे ही लोग यह दलील दे सकते हैं ,मूर्खतापूर्ण बात के समर्थक । पुलिस तो चोरी,डकैती,ह्त्या ,बलात्कार सभी कानूनों में उत्प्रीणन करती है ,तो क्या पुलिस को,आदमी को ,स्वयं को सुधारने की बजाय ये सब क़ानून हटा दिए जायं,सभी अपराधों में पुलिस के डर से सब क़ानून , या फ़िर पुलिस को ही हटा दिया जाय ???????????????????????
इधर सेक्स शिक्षा में माता-पिता की सहमति -शर्त है कि लड़कों को लडके व लड़कियों को महिलायें ही पदायें । यह व्यवस्था क्या समलेंगिकता को और प्रश्रय नहीं देगी।सारे पब्स ,डांसिंग स्कूल,जिम,पार्लर्स ,मसाज़ केन्द्र आदि ही तो यह सब फेलाने के केन्द्र हैं । सेक्स शिक्षा स्कूलों में हो ही क्यों ? क्या वैसे ही स्कूलों पर कोर्स के बोझ कम हैं । माता-पिता ,भाई-भाभी , बहनें ,मित्र आदि आख़िर क्यों है ? क्या युगों से आज तक विना स्कूलों के यह शिक्षा सभी को मिलरही है या नहीं ?आज ऐसी क्या नवीन परिस्थिति उत्पन्न हुई है की यह प्रश्न उठा है ,इस पर राष्ट्र- व्यापी बहस होनी चाहिए। माता पिता क्यों अपना दायित्व नहीं निभाना चाहते ? धन कमाने की भूख में ,समयाभाव के कारण ?
वास्तव में सेक्स शिक्षा की नहीं ,संयम ,सदाचार ,ब्रह्मचर्य ,युक्ति-युक्त सोच व व्यवहार की शिक्षा की आवश्यकता है , स्कूलों में ,घरों में ।

शुक्रवार, 8 मई 2009

घर,विद्यालय व तीरथधाम

समाचार-सी एम् एस शिक्षकों का -घर और विद्यालय से बढ़करकोई न तीरथ धाम -पर जन जागरण मोर्चा ---हि -समाचार---०८-०५-०९ । --
बिना सोचे समझे , अंग्रेजियत लादे ,हिन्दी भाषा के व कथन के निहितार्थ समझे विना प्रचारित किया गया जुमलाहै यह --मुख्यतया अंग्रेजी प्रचारक स्कूल का--
--जुमले का अर्थ निकलता है कि वे कहना चाहते हैं कि--तीरथ धामों की कोई ख़ास महत्ता नहीं है ,क्या यह तीरथ धामों के बहाने हिन्दू धर्म पर प्रहार है? या अशुद्ध हिन्दी लेखन ।
-----बस्तुतःकहना चाहिए --"घर और विद्यालय महत्त्व पूर्ण तीरथ धाम " या "घर और विद्यालय बच्चों के लिए महत्वपूर्ण तीरथ धाम " । बच्चों को संदेश भी जाता है --घर-स्कूल की भी एवं तीर्थों की भी महत्ता का, यह आधुनिक व सांस्कृतिक समन्वय है ,युगानुरूप ---कब समझेंगे हमारे शिक्षा क्षेत्र ।