समाचार-सी एम् एस शिक्षकों का -घर और विद्यालय से बढ़करकोई न तीरथ धाम -पर जन जागरण मोर्चा ---हि -समाचार---०८-०५-०९ । --
बिना सोचे समझे , अंग्रेजियत लादे ,हिन्दी भाषा के व कथन के निहितार्थ समझे विना प्रचारित किया गया जुमलाहै यह --मुख्यतया अंग्रेजी प्रचारक स्कूल का--
--जुमले का अर्थ निकलता है कि वे कहना चाहते हैं कि--तीरथ धामों की कोई ख़ास महत्ता नहीं है ,क्या यह तीरथ धामों के बहाने हिन्दू धर्म पर प्रहार है? या अशुद्ध हिन्दी लेखन ।
-----बस्तुतःकहना चाहिए --"घर और विद्यालय महत्त्व पूर्ण तीरथ धाम " या "घर और विद्यालय बच्चों के लिए महत्वपूर्ण तीरथ धाम " । बच्चों को संदेश भी जाता है --घर-स्कूल की भी एवं तीर्थों की भी महत्ता का, यह आधुनिक व सांस्कृतिक समन्वय है ,युगानुरूप ---कब समझेंगे हमारे शिक्षा क्षेत्र ।
ब्लॉग आर्काइव
- ► 2013 (137)
- ► 2012 (183)
- ► 2011 (176)
- ► 2010 (176)
- ► 2009 (191)
डा श्याम गुप्त का ब्लोग...
- shyam gupta
- Lucknow, UP, India
- एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त
शुक्रवार, 8 मई 2009
गुरुवार, 7 मई 2009
माँ -दिवस पर -वन्दना
(-महा सरस्वती ,महाकाली ,महा लक्ष्मी )
हे माँ !
हे माँ ! तुम जब दिव्य रसों की ,
दिव्य -लोक से वर्षा करतीं ;
निर्मल बुद्दि,विवेक ज्ञान की ,
सभी प्रेरणा मिलती जग को ।
ज्ञान भाव से सकल विश्व को ,
करें पल्लवित मातु शारदे ! --शूर्पनखा से
माँ
जितने भी पद नाम सात्विक ,
उसके पीछे ' माँ ' होती है।
चाहे धर्मात्मा ,महात्मा ,
आत्मा हो अथवा परमात्मा
जो महान सत्कार्य जगत के ,
उनके पीछे माँ होती है।
चाहे हो वह माँ कौशल्या ,
जीजाबाई या यसुमति माँ ।
पूर्ण शब्द माँ ,पूर्ण ग्रन्थ माँ ,
शिशु बाणी का प्रथम शब्द माँ ।
जीवन की हर एक सफलता ,
की पहली सीढी होती माँ ।
माँ असीम है वह अनुपम है,
क्षमा दया श्रृद्धा का सागर ।
कभी नहीं रीती हो पाती ,
माँ की ममता रूपी गागर ।
माँ मानव की प्रथम गुरु है ,
सभी सृजन का मूल तंत्र माँ
विस्मृत ब्रह्मा की स्फुरणा ,
वाणी रूपी मूल मन्त्र माँ ।
सीमित तुच्छ बुद्धि यह कैसे ,
कर पाये माँ का गुण गान ।
श्याम करें पद -वंदन माँ ही ,
करती वाणी ,बुद्धि प्रदान॥
-प्रेम काव्य -डा श्याम गुप्त
त्रि-मातृका--नरीसेमरी ,मथुरा --गोरी,काली,सांवली --महा काली ,महा लक्ष्मी ,महासरस्वती
बुधवार, 6 मई 2009
ज्ञानामृत --
जो ग्रंथों का बाचन करते ,वे अज्ञानी से मानीं हैं।
और ग्रन्थ पाठक से मानी ,नित्य अध्ययन करनेवाला।
अध्यायी से अधिक श्रेष्ठ है ,जो है ज्ञान तत्त्व का ज्ञाता ।
और ज्ञान को कृति में लाकर ,श्रेष्ठ कर्म को करने वाला।
आत्म ज्ञान ही सर्व श्रेष्ठ है ,सब विद्या -धन देने वाला।
जो निज को पहचान गया है ,वह पाये अमृत मतवाला।
जो सब को निज में ही जाने ,सब में अपने को पहचाने ।
आत्म लीं वह निर्विकार है ,उसको मिले मुक्ति का प्याला।
भेदा-भेद ,फला-फल से जो ,मुक्त उसे ही अमृत मिलता ।
कैसे प्राप्त उसे कर सकता,असत कर्म को करने वाला॥ -
-----डॉ श्याम गुप्त (प्रेम काव्य )
और ग्रन्थ पाठक से मानी ,नित्य अध्ययन करनेवाला।
अध्यायी से अधिक श्रेष्ठ है ,जो है ज्ञान तत्त्व का ज्ञाता ।
और ज्ञान को कृति में लाकर ,श्रेष्ठ कर्म को करने वाला।
आत्म ज्ञान ही सर्व श्रेष्ठ है ,सब विद्या -धन देने वाला।
जो निज को पहचान गया है ,वह पाये अमृत मतवाला।
जो सब को निज में ही जाने ,सब में अपने को पहचाने ।
आत्म लीं वह निर्विकार है ,उसको मिले मुक्ति का प्याला।
भेदा-भेद ,फला-फल से जो ,मुक्त उसे ही अमृत मिलता ।
कैसे प्राप्त उसे कर सकता,असत कर्म को करने वाला॥ -
-----डॉ श्याम गुप्त (प्रेम काव्य )
लेबल:
-पाठक,
अध्ययन,
अमृत,
आत्म ज्ञान,
कर्म,
ग्रन्थ,
ज्ञान तत्व,
मुक्ति
मंगलवार, 5 मई 2009
कुछ नज्में व कतए
नज़्म ------
रात के सन्नाटे में ,
नाचते हैं-
जलतीं ,बुझतीं विजलियों की तरह ,
कभी चमकते ,कभी बुझते -
ये जगनू ।
गोया कि इशारा करते हैं ,
उठना-गिरना ,बनना-मिटना ,जीना -मरना -
तो शाश्वत है।
याद आते हैं वे दिन ,
हम न थे कैद ;
दर्द की दीवारों में ।
मस्त उड़ते थे हम ,
हवाओं में ,नजारों में।
कतए --------
ज़िंदगी एक दर्द का समंदर है ,
जाने क्या -क्या इसके अन्दर है।
कभी तूफाँ समेटे डराती है ,
कभी एक पाकीजा मंज़र है।
रात और दिन के बीच उम्र खटती रही ,
उम्र बढ़ती रही ,या कि उम्र घटती रही ।
जिसने कभी भूलकर भी याद न किया 'श्याम ,
उम्र भर उनकी याद में उम्र कटती रही।
रात के सन्नाटे में ,
नाचते हैं-
जलतीं ,बुझतीं विजलियों की तरह ,
कभी चमकते ,कभी बुझते -
ये जगनू ।
गोया कि इशारा करते हैं ,
उठना-गिरना ,बनना-मिटना ,जीना -मरना -
तो शाश्वत है।
याद आते हैं वे दिन ,
हम न थे कैद ;
दर्द की दीवारों में ।
मस्त उड़ते थे हम ,
हवाओं में ,नजारों में।
कतए --------
ज़िंदगी एक दर्द का समंदर है ,
जाने क्या -क्या इसके अन्दर है।
कभी तूफाँ समेटे डराती है ,
कभी एक पाकीजा मंज़र है।
रात और दिन के बीच उम्र खटती रही ,
उम्र बढ़ती रही ,या कि उम्र घटती रही ।
जिसने कभी भूलकर भी याद न किया 'श्याम ,
उम्र भर उनकी याद में उम्र कटती रही।
सोमवार, 4 मई 2009
गरमी ---घनाक्षरी छंद --८ पंक्तियाँ ,वार्णिक छंद
1.श्याम घनाक्षरी --३३ वर्ण ,१८-१५ , अंत -दो गुरु (म गण )
दहन सी दहकै द्वार- देहरी दगर- दगर,
कली कुञ्ज कुञ्ज ,क्यारी क्यारी कुम्हिलाई है।
पावक प्रतीति पवन ,परसि पुष्प,पात -पात ,
जरै तरु गात डाली -डाली मुरझाई है।
जेठ की दुपहरी रही तपाय सखि अंग-अंग,
मलय बयार मन मार अलसाई है।
तपेंनगर -गावं ,छावं ढूढ़ रही शीतल ठावं ,
धरती गगन श्याम आगि सी लगाई है॥
मनहरण -३१ वर्ण ,१६-१५ ----
सुनसान गलियाँ वन बाग़ बाज़ार पड़े ,
जीभ को निकाल श्वान हांफते से जारहे ।
कोई पड़े ऐ -सी कक्ष कोई लेटे तरु छाँह ,
कोई झलें पंखा कोई कूलर चला रहे ।
जब कहीं आवश्यक कार्य से है जाना पड़े ,
पौछते पसीना तेज कदमों से जारहे।
ऐनक लगाए ,श्याम छतरी लिए हैं हाथ ,
नर नारी सबही,पसीने से नहा रहे।।
३--मदनहरण३२ वर्ण ,१६-१६ या ८,८,८,८, अंत -गुरु ,गुरु ---
टप टप टप टप ,अ न्ग बहे स्वेद धार ,
जिमि उतरि गिरि-श्रृंग ,जलधार आई है ।
बहै घाटी मध्य करि,विविध प्रदेश पार ,
बनी धार सरिता जाय सिन्धु मैं समाई है ।
खुले खुले केश श्याम ,ढीले बस्त्र तिय देह,
उमंगें उरोज उर , उमंग उमंगाई है।
ताप से तपे हैं तन ,ताप तपें तन मन ,
निरखि नैन नेह ,नेह निर्झर समाई है।।
चुप चुप चकित न चहकि रहे खग वृन्द ,
सारिका ने शुक से यूँ न चौंच भीलड़ाई है ,
बाज़ और कपोत बैठे एक ही तरु डाल,
मूषक ओ विडाल भूल बैठे शत्रुताई है।
नाग -मोर एक ठांव ,सिंह -मृग एक छाँव ,
धरती मनहुं तपो भूमि जिमि सुहाई है।
श्याम ,गज-ग्राह मिलि बैठे सरिता के कूल ,
जेठ बांटें बातें साधु भाव जग लाई है ।
मनहरण ----
हर गली गाँव हर नगर मग ठांव ,
जन जन जल शीतल पेय हैं पिला रहे ।
कहीं हैं मिष्ठान्न बाटें, कहीं है ठंडाई घुटे ,
मीठे जल की भी कोई प्याऊ लगवा रहे ।
राह रोकि हाथ जोरि ठंडा जल भेंट कर ,
हर तप्त राही को ही ठंडक दिला रहे।
भुवन भास्कर धरि मार्तंड रूप श्याम ,
उंच नीच भाव मनहु मन के मिटा रहे॥
दहन सी दहकै द्वार- देहरी दगर- दगर,
कली कुञ्ज कुञ्ज ,क्यारी क्यारी कुम्हिलाई है।
पावक प्रतीति पवन ,परसि पुष्प,पात -पात ,
जरै तरु गात डाली -डाली मुरझाई है।
जेठ की दुपहरी रही तपाय सखि अंग-अंग,
मलय बयार मन मार अलसाई है।
तपेंनगर -गावं ,छावं ढूढ़ रही शीतल ठावं ,
धरती गगन श्याम आगि सी लगाई है॥
मनहरण -३१ वर्ण ,१६-१५ ----
सुनसान गलियाँ वन बाग़ बाज़ार पड़े ,
जीभ को निकाल श्वान हांफते से जारहे ।
कोई पड़े ऐ -सी कक्ष कोई लेटे तरु छाँह ,
कोई झलें पंखा कोई कूलर चला रहे ।
जब कहीं आवश्यक कार्य से है जाना पड़े ,
पौछते पसीना तेज कदमों से जारहे।
ऐनक लगाए ,श्याम छतरी लिए हैं हाथ ,
नर नारी सबही,पसीने से नहा रहे।।
३--मदनहरण३२ वर्ण ,१६-१६ या ८,८,८,८, अंत -गुरु ,गुरु ---
टप टप टप टप ,अ न्ग बहे स्वेद धार ,
जिमि उतरि गिरि-श्रृंग ,जलधार आई है ।
बहै घाटी मध्य करि,विविध प्रदेश पार ,
बनी धार सरिता जाय सिन्धु मैं समाई है ।
खुले खुले केश श्याम ,ढीले बस्त्र तिय देह,
उमंगें उरोज उर , उमंग उमंगाई है।
ताप से तपे हैं तन ,ताप तपें तन मन ,
निरखि नैन नेह ,नेह निर्झर समाई है।।
चुप चुप चकित न चहकि रहे खग वृन्द ,
सारिका ने शुक से यूँ न चौंच भीलड़ाई है ,
बाज़ और कपोत बैठे एक ही तरु डाल,
मूषक ओ विडाल भूल बैठे शत्रुताई है।
नाग -मोर एक ठांव ,सिंह -मृग एक छाँव ,
धरती मनहुं तपो भूमि जिमि सुहाई है।
श्याम ,गज-ग्राह मिलि बैठे सरिता के कूल ,
जेठ बांटें बातें साधु भाव जग लाई है ।
मनहरण ----
हर गली गाँव हर नगर मग ठांव ,
जन जन जल शीतल पेय हैं पिला रहे ।
कहीं हैं मिष्ठान्न बाटें, कहीं है ठंडाई घुटे ,
मीठे जल की भी कोई प्याऊ लगवा रहे ।
राह रोकि हाथ जोरि ठंडा जल भेंट कर ,
हर तप्त राही को ही ठंडक दिला रहे।
भुवन भास्कर धरि मार्तंड रूप श्याम ,
उंच नीच भाव मनहु मन के मिटा रहे॥
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
