समाचार है किडाकू घनश्याम को वहाँ की लोकल जनता सहायतां कर रही थी । एक तो लोकल जनता को सदा वहीं रहना है,पुलिस तो शहरों में ही नहीं उपलब्ध होती , दूर दराज़ क्षेत्रों में जनता का क्या विश्वास जीतेगी ? दूसरे डाकू लोग एक नीति के तहत जनता को सहायता का लालच देकर अपने पक्ष में किए रहते हैं ताकि समय पर उन्हें सहायता मिले । वैसे उन्हें उस जनता से कोई लगाव नहीं ,अन्यथा वे उन्हें ही क्यों लूटते ।
सहभोज की नीति भी उसी भावना व नीति के तहत है , राजकुमार के जन्म पर ,कभी -कभी एक बार गरीबों के साथ खाना खाने का नाटक ।कौन ४-५,साल के लिए वहाँ रहना है, ताकि समय आने पर सहायता प्राप्त हो , वोट मिलें ।। जैसे महाराजों ( अंग्रेजी जमाने के ) का कभी -कभी जनता दरवार, । क्योंकि सामान्य जनता की याददास्त व आकान्क्ष्हायें बहुत संक्षिप्त होतीं हैं ,। हमारे यहाँ तो राजा ,राजकुमार पूजा अभी भी जन-मानस में समाई हुई है। क्या फर्ख है दोनों धंधों में ?
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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...
- shyam gupta
- Lucknow, UP, India
- एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त
शनिवार, 20 जून 2009
क्रिकेट , फिटनेस ,खेल का धंधा .
खबर है किअधिकतर खिलाड़ी अनफिट थे , भई, खेल ,खेल के लिए होता है न कि धंधे के लिए , जैसे एक दूकानदार अपनी घटिया बस्तु को भी बढिया माल बताता है , वैसे ही ये खिलाड़ी , खेल संस्थान आदि धंधे के चक्कर में अपने शरीर का वैसे ही सौदा करते हैं जैसे थकी-थकाई वैश्या व दलाल कमाई के लिए, पुनः जुट जाते हैं। कमालो अधिक से अधिक ,जब तक शरीर है आगे का क्या पता।
खेल के लिए खेल , वर्ष में एक सीरीज़ से अधिक नहीं होनी चाहिए , बारी बारी से सब देशों में । ये क्या होली हो,दिवाली हो, पराये देश में खेलेजारहे हैं, अपने देश में भी लोगों को चैन से त्यौहार नहीं मनाना दे रहे हैं।
चौबीस घंटे, ३६५ दिन खेलते रहेंगे तो यही हाल होगा , शरीर तो भाई लिमिटेड क्षमता रखता है ।( एक सरकारी कर्मी ज़रा सी चोट लगने पर काम से बैठ जाता है , क्योंकि कोई अतिरिक्त पैसा तो मिलना नहीं है । )
खेल व मनोरन्ज़न को धंधा बनाने का यही हश्र होता है।शास्त्रों में इसे वर्जित माना है ।"" ये सदैव सिर्फ़ यदा कदा मनोरन्ज़न के लिए प्रयुक्त होने चाहिए ।अति तो कभी नहीं --- """अति सर्वत्र वर्ज्य येत ""
खेल के लिए खेल , वर्ष में एक सीरीज़ से अधिक नहीं होनी चाहिए , बारी बारी से सब देशों में । ये क्या होली हो,दिवाली हो, पराये देश में खेलेजारहे हैं, अपने देश में भी लोगों को चैन से त्यौहार नहीं मनाना दे रहे हैं।
चौबीस घंटे, ३६५ दिन खेलते रहेंगे तो यही हाल होगा , शरीर तो भाई लिमिटेड क्षमता रखता है ।( एक सरकारी कर्मी ज़रा सी चोट लगने पर काम से बैठ जाता है , क्योंकि कोई अतिरिक्त पैसा तो मिलना नहीं है । )
खेल व मनोरन्ज़न को धंधा बनाने का यही हश्र होता है।शास्त्रों में इसे वर्जित माना है ।"" ये सदैव सिर्फ़ यदा कदा मनोरन्ज़न के लिए प्रयुक्त होने चाहिए ।अति तो कभी नहीं --- """अति सर्वत्र वर्ज्य येत ""
गुरुवार, 18 जून 2009
ये क्या होरहा है, समाचार पत्रों में--कहनी -कथनी फ़र्क.
कि -सेक्स, रुपया-लाटरी, जुआ,कन्डोम, केन्सर-कारक गुटखा, विशिष्ट भूमिका वाले पिता का चयन जैसे विग्यापनों से यह कार्य सम्भव हो रहा है? यह कथनी -करनी का फ़र्क हमें कहां लेजारहा है? बच्चे, किशोर,युवा व अनगढ लोग तो यह पढ्कर यही समझेंगे, मानेंगे कि यह तो अच्छी बात ही होगी जो खुले आम ,पत्र्कार विद्वान महोदय परोस रहे हैं। क्या यह सब सिर्फ़ पैसे व धन्धे के लिये नहीं है ?अखवार चलाने के लिये? जब धन्धा ही मुख्य बात है तो फ़िर--पैसे के लिये कपडे उतारतीं हीरोइनें, बलात्कार करते हीरो, वैश्याव्रत्ति करतीं औरतेंव दलाल, जुआ खेलते ,जुआघर चलाते लोग , देश के गुप्त दस्तावेज़ बेचते देश द्रोही ,भीख मांगते लोगों का बुरा क्यों मना जाता है ? वह भी तो उनका धन्धा ही है। उनमें--इनमें क्या फ़र्क?


बुधवार, 17 जून 2009
स्त्री -पुरूष अत्याचार ,नैतिकता ,बल और बलवान व समाज.
वस्तुतः बात सिर्फ़ नैतिकता व बल की है। सब कुछ इन दोनों के ही पीछे चलता है।बल चाहे शारीरिक ,सामूहिक,आत्मिक या नैतिक बल हो सदैव अपने से कमजोर पर अत्याचार करता है। स्त्री -परुष दोनों के लिए ही विवाह,मर्यादा आदि नैतिकताएं निर्धारित कीं समाज ने। समाज क्या है ? जब हम सब ने यह देखा कि, सभी व्यक्ति एक समान बलवान नहीं होते एवं बलवान सदा ही अशक्त पर अत्याचार कराने को उद्यत हो जाता है, तो आप ,हम सब स्त्री-पुरुषों ने मिलकर कुछ नियम बनाए ताकि बल, या शक्ति -अन्य पर अत्याचार न करे, अपितु विकास के लिए कार्य करे। वही नियम सामाजिक आचरण , मर्यादा आदि कहलाये।
" सर्वाइवल ऑफ़ फिटेस्ट " मानव से निचले क्रम के प्राणियों के लिए शत प्रतिशत लागू होता है , परन्तु मानव समाज में -समरथ को नहीं दोष गुसाईं - की शिकायत करने वाले भी होते हैं। समाज होता है,प्रबुद्धता होती है,अन्य से प्रतिबद्धता का भाव होता है, अतः सर्वाइवल ऑफ़ फिटेस्ट को कम करने के लिए समाज ने नियम बनाए।
समाज कोई ऊपर से आया हुआ अवांछित तत्व नहीं है--हम ,आप ही तो हैं। नियम नीति निर्धारण में स्त्रियों की भी तो सहमति थीं । अतः सदा स्त्री पर पुरूष अत्याचार की बात उचितव सही नहीं है। जहाँ कहीं भी अनाचरण ,अनैतिकता सिर उठाती है , वहीं बलशाली (शारीरिक बल,जन बल,सामूहिक बल , धन बल ,शास्त्र बल )सदा कमज़ोर उत्प्रीडन करता है। चाहे वे स्त्री-स्त्री हों ,पुरश -पुरूष हों या स्त्री-पुरूष -पुरूष-स्त्री परस्पर।
अतः बात सिर्फ़ नैतिकता की है , जो बल को नियमन में रखती है। बाकी सब स्त्री -पुरूष अत्याचार आदि व्यर्थ की बातें हैं । नीति-नियम अशक्त की रक्षा के लिए हैं नकि अशक्त पर लागू करने के लिए , जो आजकल होरहा है। पर यह सब अनैतिक मानव करता है समाज नहीं ।
जो लोग समाज को कोसते रहते हैं ,वे स्वार्थी हैं ,सिर्फ़ स्वयं के बारे में एकांगी सोच वाले। जब किसी पर अत्याचार होता है तो वह (अत्याचार संस्था,समाज,देश, शासन नहीं अपितु अनैतिक व भ्रष्ट लोग करते हैं। ) अपने दुःख में एकांगी सोचने लगता है, वह समाज को इसलिए कोसता है कि समाज ने उसे संरक्षण नहीं दिया ,अनाचारी ,अत्याचारी लोगों से ,क्योंकि उसमे स्वयं लड़ने की क्षमता नहीं थी। अतः बात वही बल व शक्ति के आचरण की है। समाज --,नैतिकता व आचरण द्वारा निर्बल को बल प्रदान करता है। बलवान का नियमन करता है।
" सर्वाइवल ऑफ़ फिटेस्ट " मानव से निचले क्रम के प्राणियों के लिए शत प्रतिशत लागू होता है , परन्तु मानव समाज में -समरथ को नहीं दोष गुसाईं - की शिकायत करने वाले भी होते हैं। समाज होता है,प्रबुद्धता होती है,अन्य से प्रतिबद्धता का भाव होता है, अतः सर्वाइवल ऑफ़ फिटेस्ट को कम करने के लिए समाज ने नियम बनाए।
समाज कोई ऊपर से आया हुआ अवांछित तत्व नहीं है--हम ,आप ही तो हैं। नियम नीति निर्धारण में स्त्रियों की भी तो सहमति थीं । अतः सदा स्त्री पर पुरूष अत्याचार की बात उचितव सही नहीं है। जहाँ कहीं भी अनाचरण ,अनैतिकता सिर उठाती है , वहीं बलशाली (शारीरिक बल,जन बल,सामूहिक बल , धन बल ,शास्त्र बल )सदा कमज़ोर उत्प्रीडन करता है। चाहे वे स्त्री-स्त्री हों ,पुरश -पुरूष हों या स्त्री-पुरूष -पुरूष-स्त्री परस्पर।
अतः बात सिर्फ़ नैतिकता की है , जो बल को नियमन में रखती है। बाकी सब स्त्री -पुरूष अत्याचार आदि व्यर्थ की बातें हैं । नीति-नियम अशक्त की रक्षा के लिए हैं नकि अशक्त पर लागू करने के लिए , जो आजकल होरहा है। पर यह सब अनैतिक मानव करता है समाज नहीं ।
जो लोग समाज को कोसते रहते हैं ,वे स्वार्थी हैं ,सिर्फ़ स्वयं के बारे में एकांगी सोच वाले। जब किसी पर अत्याचार होता है तो वह (अत्याचार संस्था,समाज,देश, शासन नहीं अपितु अनैतिक व भ्रष्ट लोग करते हैं। ) अपने दुःख में एकांगी सोचने लगता है, वह समाज को इसलिए कोसता है कि समाज ने उसे संरक्षण नहीं दिया ,अनाचारी ,अत्याचारी लोगों से ,क्योंकि उसमे स्वयं लड़ने की क्षमता नहीं थी। अतः बात वही बल व शक्ति के आचरण की है। समाज --,नैतिकता व आचरण द्वारा निर्बल को बल प्रदान करता है। बलवान का नियमन करता है।
मंगलवार, 16 जून 2009
"ह्रदय तराजू तौल के तब मुख बाहर आनि --छोटी-छोटी बातें"
कुछ ऐसी छोटी-छोटी बातें होतीं हैं जो देखने में एक दम साधारण लगतीं हैं , जिन्हें हम अनायास ही कहते, सुनते व हंसकर टाल जाते हैं, परन्तु वे :सतसैया के दोहरे,ज्यों नाविक के तीर" की भांतिजन मानस में ओर फ़लस्वरूप समाज़ में गहन प्रभाव डालतीं है ओर अनियमित व्यवहार की पोषक होकर, अकर्म,अनाचार,भ्रष्टाचार व नैतिक पतन का कारक बनतीं हैं। ये मीठी छुरी की भांति गहरा वार, सुरा की भांति मादक प्रभाव दालतीं है ओर आस्तीन के सांप की भांति अन्तरतम में पैठ कर यथा - प्रभाव छोडतीं हैं।हमें ऐसी बातों को बडी सावधानी के साथ प्रयोग करना चाहिये, अपितु ऐसे सपोले -जुमलों को आदत बनने से पहले ही नष्ट करदेना चाहिये। कुछ बातें निम्नहैं :----
---कौन पूछता है? ,,कौन देखता है?,,,ज्यादा दिल पर मत लो,,,दिल पर मत ले यार,,,अरे छोडो !,,,सब चलता है,,,
हमही गान्धी बनने को हैं क्या?,,,हर बात में राज नीति न करो,,,रिलीजन इज़ फ़ेनेटिस्म,,,उदार वादी बनो,,,साम्प्रदाय वादी हैं,,,व्यवहारिक द्रष्टिकोण रखें,,,चलती का नाम गाडी,,,कौन दूध का धुला है?,,,थोडी सी वेबफ़ाई,,,आटे में नमक के बराबर (भ्रष्टाचार-बेईमानी-बेगैरती) चलता है,,,मैं तो बस यूं ही मज़ाक ...,,,, नेति-नेति .........
----आप इस लिस्ट में और जोड सकते हें।
रविवार, 14 जून 2009
विराट कवि समागम ०९-०८-२००९ को लखनऊ में--निमन्त्रण--
शनिवार, 13 जून 2009
तस्बीर के दो रुख---
तस्बीर एक
भारत उभर रहा है,
विश्व में सुपर पाव र बनकर;
खडा होरहा है,बडे-बडों के सम्मुख,तनकर ।
भारतीय विदेशों में भी,सत्ता शीर्ष पर हैं,
क्या हुआ जो वे, वहीं के नागरिक हैं ।
हम अपनी परम्परा व,
सान्स्क्रितिक निधि का;
करोडों डालरों में निर्यात कर रहे है।
भारतीय कलाकार, विदेशों में-
जम कर आइटम दे रहे हैं।
हां, फ़िल्मों की अधिकांश शूटिन्ग
विदेशों में होती है, और--
भारतीय सन्सक्रिति,
विदेशी सन्स्कारों में घुलकर,
विलीन होती है।
तो क्या हुआ,
एन जी ओ व आत्म विश्वास से लबालव ,
हमारी युवा पीढी के कारण,
हमारा विदेशी मुद्रा भन्डार तो,
अरबों में बढ्ता है ।
कुछ पाने के लिये,
कुछ खोना ही पड्ता है ॥
तस्वीर दो
चमकीले अर्ध सत्य-विकास, के शोर में,
पतन की वास्तविकता कहते,
सच्चे दस्तावेज़,गुम होगये हैं;
हम, चकाचौंध देखकर,
खुश हो रहे हैं।
मित्तल ने आर्सेलर खरीद ली,
टाटा ने कोरस,
सुनीता ने जीता आसमान;
और अम्बानी ने, विश्व के -
सबसे धनी होने का खिताब।
पर क्या हम ये बता पायेंगे,
देश को समझा पायेंगे; कि--
वे करोडों भारतीय, जो आज भी=
गरीबी रेखा के नीचे हैं,
कब ऊपर आयेंगे ?
क्या कारों के अम्बार,
फ़्लाई ओवरों की भर मार;
आर्सेलर या कोरस,
या चढता शेयर बाज़ार;
उन्हें,दो बक्त का भोजन,
( कब)दे पायेंगे??
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