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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

शुक्रवार, 4 जून 2010

महामानवों के निर्माण व सामाजिक श्रेष्ठता संवर्धन में नारी का योगदान ---डा श्याम गुप्त का आलेख

महामानवों के निर्माण व सामाजिक श्रेष्ठता संवर्धन में नारी का योगदान
( डा श्याम गुप्त )

यदि मानव प्रकृति की संरचनात्मक कृति की सबसे उत्कृष्ट, समृद्ध व आधुनिकतम रूप है तो नारी प्रकृति की सृजनात्मक शक्ति का सर्वश्रेष्ठ व उच्चतम रूप है। इस संसार रूपी ईश्वरीय उद्यान को सुरम्य , सुन्दर व श्रेष्ठ बनाने में इसी नारी शक्ति का विभिन्न रूपों में योगदान रहा है। समय समय पर तत्कालीन राष्ट्रीय, सामाजिक व व्यक्तिगत आवश्यकताओं के अनुरूप एवं विकृतियों के उन्मूलन हेतु, महामानवों के जन्म व निर्माण की प्रक्रिया भी इसी नारी शक्ति की देन है।
माँ -दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती के रूप में आदिशक्ति, माँ के दूध के रूप में अपनी भावनात्मक संकल्प शक्ति, पत्नी के रूप में पुरुष की सहयोगिनी शक्ति एवं भगिनी, पुत्री, मित्र, सखी के रूप में स्नेह, संवेदनाओं एवं पवित्र भावनाओं को सींचने में युक्त नारी शक्ति, सत्य में ही पुरुष के निर्माण , विकास की एवं समाज के सृजन, अभिवर्धन व श्रेष्ठ व्यक्तित्व निर्माण की धुरी रही है। भारत में पुरा काल से ही नारी समाजका शिखर रूप व राष्ट्र की धुरी रही है।शास्त्रों में कहागया है--"दश पुत्र समां कन्या, यस्या शीलवती : सुता " तथा ---
" सम्राज्ञी श्वसुरे भव , सम्राज्ञी श्वसुरामं भवसम्राज्ञी ननन्दारिं ,सम्राज्ञी अधिदेव्रषु ॥ "
सृष्टि की सारी सुव्यवस्था व सुन्दरता नारी शक्ति की ही अभिव्यक्ति है। विश्व भर की संस्कृति व सभ्यता का वर्त्तमान रूप नारी के अथक त्याग व बलिदान की ही कहानी है।
यह समय का अभिशाप ही है कि आज , मध्य युग की सामयिक परिस्थितियों के प्रभाव व तनाव के कारण
नारी अन्तः करण की ऊर्जा व कोमलता को व्यक्तियों व बस्तुओं में आबद्ध करके उसे उसके सिद्धांतों , आदर्शों से विमुख करदिया गया | जब उसे चूल्हा व चौका तक सीमाबद्ध करदिया गया तो उसके प्रखरता नष्ट होने लगी | पारिवारिक शालीनता --मोह, अति संग्रह व व्यक्तिगत उपभोग में परिवर्तित होगई | पति नामक पुरुष द्वारा मनमानी ,उच्छृंखलता , अनीति एवं नारी उत्प्रीणन का मार्ग प्रशस्त हुआ। बच्चों में भी वही भाव घर करने लगे। प्रतिक्रया स्वरुप नए युग में नारी में भी आज़ादी की चाह, ,उच्छृंखलता, पुरुष उत्प्रीणन आदि भाव घर कर गए। आज नारी- पुरुष टकराव इसी प्रतिक्रया का परिणाम है। और यहीं से सामाजिक जीवन में भ्रष्टाचार का प्रारम्भ होता है; जो समाज व आगे की पीढी के लिए अभिशाप ही सिद्ध होरहा है व होंगे।
आज आवश्यकता है कि नारी व पुरुष दोनों ही विचारों की संकीर्णता से बाहर निकलें। पुरुष नारी को सम्पूर्ण सम्मान, वैचारिक व सामाजिक समानता प्रदान करे | आदि -मातृशक्ति को अपनी भूमिका निभाने योग्य स्तर पर पहुंचाना हम सबका पुनीत कर्तव्य है। नारी ने पुरुष के सामने आत्मसमर्पण का जो आदर्श रखा है इसका यह अर्थ नहीं कि पुरुष उसका मूल्य ही न समझे। स्वामी विवेकानंद ने कहा था--"भारतीयों ! भूलना नहीं , तुम्हारी संस्कृति का आदर्श सुशिक्षित नारी हैतुम्हारा समाज विराट महामाया की छाया मात्र है। "
इस कार्य में पहल नारी को ही करनी होगी। नारी अपने उत्प्रीणन की कथा अपनी सखियों,सम्बन्धियों व पुरुष-मित्रों से कह कर बोझ हलका कर लेती हैं ; परन्तु पुरुष अहं व संकोच के कारण नारी द्वारा अपने उत्प्रीणन की बात वे मित्रों से भी नहीं कह पाते व घुटते रहते हैं , जो नारी के प्रति असम्मान के रूप में व्यक्त होती है।
सुसंस्कृत पत्नी अपने पति को ईमानदार बनाने में पहल कर सकती है। सम्पन्नता कहीं अनैतिक कर्म से तो नहीं आरही , इस पर ध्यान रखना चाहिए। घर का संचालन मितव्ययिता पूर्वक हो कि सिर्फ ईमानदारी की कमाई ही पर्याप्त हो। इस प्रकार वह योग्य, ईमानदार , मितव्ययी व्यक्तियों व संतान का निर्माण करके , राष्ट्र व समाज की श्रेष्ठता संवर्धन में अपना योगदान करके, आदि काल से महामानवों के निर्माण व सामाजिक आदर्श की प्रतिष्ठा में अपने योगदान को पुनः स्थापित कर अपनी खोई हुई गरिमा को पुनः बहाल कर सकती है।
पढी-लिखी नारी अपने वर्ग को सुसंस्कृत तथा सुशिक्षित बनाने व ऊंचा उठाने में संकोच व भय को त्यागकर आगे आये तो पुरुष भी स्वयं भी सहयोग की भावना से आगे आयेंगे । तब कहीं भी द्वंद्व की स्थिति नहीं रहेगी। यही युग की पुकार है।


शनिवार, 29 मई 2010

गीत--सखि! गुनुगुनाओ आज एसा गीत कोई....


कवि ! गुनुगुनाओ आज.....

सखि ! गुनगुनाओ आज ,
एसा गीत कोई ।

बहने लगे रवि रश्मि से भी,
प्रीति की शीतल हवाएं ।
प्रेम के संगीत सुर को-
लगें कंटक गुनगुनाने |
द्वेष द्वंद्वों के ह्रदय को -
रागिनी के स्वर सुहाएँ.

वैर और विद्वेष को ,
बहाने लगे प्रिय मीत कोई ||

अहं में जो स्वयं को
जकडे हुए |
काष्ठवत और लोष्ठ्वत
अकड़े खड़े |
पिघलकर -
नवनीत बन जाएँ सभी |
देश के दुश्मन , औ आतंकी यथा-
देश द्रोही और द्रोही-
राष्ट्र और समाज के ;
जोश में भर लगें वे भी गुनगुनाने,
राष्ट्र भक्ति के वे -
शुच सुन्दर तराने |

आज अंतस में बसालें ,
सुहृद सी ऋजु नीति कोई ||

वे अकर्मी औ कुकर्मी जन सभी
लिप्त हैं जो
अनय और अनीति में |
अनाचारों का तमस-
चहुँ ओर फैला ;
छागये घन क्षितिज पर अभिचार के |
धुंध फ़ैली , स्वार्थ, कुंठा , भ्रम तथा-
अज्ञान की |
ज्ञान का इक दीप
जल जाए सभी में |
सब अनय के भाव , बन जाएँ -
विनय की रीति कोई ||



-----------हस्त लिखित गीत को पढ़ने के लिए उसके ऊपर क्लिक करें |

डा श्याम गुप्त की कविता--- कवि बन जाओ समय बांसुरी.....

कवि बन जाओ समय बांसुरी

कवि बन जाओ समय बांसुरी ,
एसे राग सुनाओ।
देश राष्ट्र जन विश्व जगे, कवि-
ऐसी तान सजाओ ।

बनो प्रीति की प्रणय पांखुरी
सौंधी गंध लुटाओ।
बनो अभय की सुदृढ़ आंजुरी
सत आचमन कराओ।

तोड़ प्रथाओं की कारा , और-
छोड़ तृषाओं को तुम।
मोड़ समय की धाराओं को ,युग-
क्रंदन बन लहराओ।

ज्ञान-रश्मि बन जन जन सोई
मानवता को जगाओ।
जन जन मन में काव्य-रश्मि की
जगमग ज्योति जलाओ।

नव विहान लाओ अब हे कवि !
नवल रागिनी गाओ ।
बनो समय की सुमधुर स्वर ध्वनि
जीवन राग सुनाओ ॥

गुरुवार, 27 मई 2010

प्राचीन निष्क्रिय तारे कहाँ जाते हैं ...ग्लोबल वार्मिंग !!


चित्र में देखिये नासा के वैज्ञानिकों ने चित्र लिया है कि हमारी आकाशगंगा के एक अत्यंत गर्म ग्रह को( शायद अक्रिय होने पर ? ) उसका स्वयं का सूरज ही ख़त्म कर रहा है। क्या अत्यधिक ग्लोबल वार्मिंग हमारी पृथ्वी की भी यही दशाकरेगी।
इसी सन्दर्भ का एक ऋग्वेदीय श्लोक ( १०/८८/९७७४-१३ ) देखिये.....
"वैश्वानरं कवयो याज्ञियासो sग्नि देवा अजन्यन्नजुर्यम । नक्षत्रं प्रत्नम मिनच्चरिष्णु यक्षस्याध्याक्षम तविषम बृहन्तम""
---क्रान्तिदर्शी यज्ञार्थी देवों ने अजर वैश्वानर को प्रकट किया। जिस समय अग्नि देव विस्तृत व महिमामय होते हैं ,उस समय वे अंतरिक्ष में प्राचीन काल से विहार करने वाले नक्षत्रों को देवताओं के सामने ही निष्प्रभावी बना देते हैं । अर्थात अति प्राचीन व निष्क्रिय नक्षत्र व ग्रह मूल ऊर्जा द्वारा अवशोषित कर लिए जाते हैं ।

बुधवार, 26 मई 2010

"अभी कालित्रा -यहशब्द आप ने कभी सुना था क्या. .हिन्दी में ..

....... ..... .......... .......... ................... ........... चित्र १......... चित्र २.....>






हिन्दी हिन्दुस्तान पत्र हिन्दी का या अंग्रेज़ी का..


.--- क्या आपने इस हिन्दी भाषा को कभी पढ़ा , लिखा या सुना या प्रयोग किया है जो चित्र में दी गयी है। यह हिन्दी अखवार काप्रचार है....
----आज कल आप शहर में बड़े बड़े पोस्टरों पर भी एक नया शब्द "" अभीकालित्रा "" देख रहे होंगे। हिन्दी - हिन्दुस्तान समाचार पत्र में इसका अर्थ कम्प्युटर की हिन्दी कहा जारहा है , क्या आपने कभी सुना किसी को यह शब्द प्रयोग करते ? वस्तुतः यह हिन्दी हिन्दुस्तान की अंग्रेज़ी भाषा को सिखाने के लिए एक मुहिम ( चित्र २। )है, जो हिन्दी भाषा एक कठिन भाषा है जैसी हिन्दी की बुराइयां समझाकर किया जारहा है। अर्थात हिन्दी विरोध व अंग्रेज़ी प्रसार का एक नया तरीका | क्या हम इसे हिन्दी के विरुद्ध एक षडयंत्र कहें | जिस तरह से काफी पहले भी इस तरह की भाषा का प्रचार करके किया गया था।

सोमवार, 24 मई 2010

अखिल भारतीय साहित्य परिषद् , उत्तर प्रदेश की प्रांतीय बैठक सम्पन्न --

------दिनांक २३ जून, २०१० रविवार को (शुद्ध बैसाख शुक्ल १० सं २०६७ ) को अखिल भारतीय साहित्य परिषद् उत्तर प्रदेश की प्रांतीय बैठक ,एवं परिषद् द्वारा आयोजित संत कंवर राम के १२५ वें जयन्ती श्रंखला का समारोह , शिव शक्ति आश्रम , आलमबाग लखनऊ पर आयोजित किया गया । अधिवेशन दो सत्रों में हुआ जिसमें 'समाज सुधार में संतसाहित्य का योगदान' विषय पर चर्चा संगोष्ठी एवं काव्य गोष्टी का भी आयोजन किया गया।
प्रथम उदघाटन सत्र में --श्री ज्वाला प्रसाद कौसिक "साधक' सदस्य राष्ट्रीय कार्यकारिणी , अ भा सा परिषद् की अध्यक्षता में हुआ , मुख्य अतिथि श्री राम नारायण त्रिपाठी, महामंत्री राष्ट्रीय का कारिणी, विशिष्ट अतिथि डा कौशलेन्द्र पांडे, अध्यक्ष लखनऊ नगर कार्यकारिणी एवं श्री किशनलाल जी व्यवस्थापक शिव शक्ति आश्रम थे। संचालन हरदोई के संस्कृत विद्यालय के विद्वान् श्री पुष्पमित्र शास्त्री जी द्वारा किया गया।
दीप प्रज्वलन के बाद प्रांतीय संयोजक श्री विनय दीक्षित जी ने सरस्वती वन्दना की समस्त उत्तर प्रदेश से आये हुए परिषद् के सदस्यों का परिचय कराया गया।
अपने उद्बोधन में पुष्पमित्र शास्त्रीजी जी ने बताया कि साहित्य का उद्देश्य समाज में सत्य की स्थापना करना होता है , समाज का मार्गदर्शन करना होता है जो सत्य, शिव तत्व द्वारा सौन्दर्य के समन्वय से होना चाहिए। पर्यटक जी ने साहित्य परिषद् न्यास के उद्देश्य व संगठन के बारे में बताया कि न्यास का उद्देश्य देश की माटी से जुड़े साहित्य की रचना है , हिन्दी सहित देश की सभी भाषाओं में परिषद् साहित्य रचना के लिए कृत संकल्प है , परिषद् की पत्रका सभी भारतीय भाषाओं में प्रकाशित होती है विभिन्न भाषाओं के हिन्दी भाषी साहित्यकारों के लिए विशेषांक प्रकाशित किये जाते हैं।
अध्यक्ष कौशिक जी ने अपने वक्तव्य में कहा--साहित्यकार अखवार, पत्रिका, पुस्तक या विश्वविद्यालयों में नहीं बनते , साहित्य रचना आपके अंतस में होती है जो पारिवारिक संस्कारों से परिपक्व होती है। अधिभौतिक, अधिदैविक व अध्यात्मिक ज्ञान ही संस्कृति का आधार होता है और उसके बिना सच्चा साहित्यकार नहीं बन सकता । उन्होंने कहा आज साहित्यकार मंच व अर्थ के पीछे भाग रहे हैं अतः सु साहित्य नहीं रचाजारहा,एसे लोगों का मष्तिस्क साफ़ करना पडेगा, सत्साहित्य रचना से। 'हितेन सहितं स "--शिवम् से इतर साहित्य कहाँ हो सकता है। अमंगल तत्वों का नाश, राष्ट्र समाज के मंगल की कामना ही साहित्य का मूल उद्देश्य है उदघाटन सत्र का अंत विनय जी की भारत माँ वन्दना से हुआ।
परिषद् की प्रांतीय बैठक सत्र की अध्यक्षता परिषद् के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डा यतीन्द्र तिवारी जी ने की मुख्य अतिथि सिंधी कवि व सिंधी काव्य परिषद् के प्रदेश अध्यक्ष श्री सच्चिदानंद साधवानी जी थे। श्री विनय दीक्षित ने पिछली प्रांतीय बैठक की कार्यवाही से अवगत कराया । डॉ तिवारी जी ने साहित्य की स्थिति पर बोलते हुए कहा कि देश की आज़ादी से पूर्व एक लक्ष्य था स्वतन्त्रता अतः साहित्य व कविता लेखन ,लक्ष्य पूर्ण, जागृति से परिपूर्ण, सोद्देश्य था । परन्तु स्वाधीनता के उपरांत साहित्य में कुंठा,असंतोष, निराशा, घुटन संत्रास , जिजीविषा क़ा मंडन व वर्णन किया जाने लगा । 'कलम चुक गयी ' ' साहित्य की आवश्यकता नहीं ' आदि वाक्य उछाले गए। भिन्न भिन्न चिंतन विरोधी विचार धाराएं समाज में घर करने लगीं। आज नारी विमर्श, दलित विमर्श , भोगी हुई पीड़ा की ,स्वयं की पीड़ा कथा , अभिव्यक्ति आदि वैशिष्ट्य भावों एवं विचार धाराओं की कविता व साहित्य रचना से कविता समाज की समग्रता व जीवन मूल्यों से कटने लगी एवं जन मानस से दूरी बढ़ने की मुख्य कारण बनी हुई है। अतः समग्र चिंतन , समग्र सामाजिक सरोकार सहित जीवन मूल्यों एवं राष्ट्रीय भावों से सम्पन्न व उचित समाधान पूर्ण साहित्त्य की रचना इस अखिल भारतीय साहित्य परिषद् क़ा उद्देश्य है , और यही साहित्य क़ा वास्तविक उद्देश्य भी है।
द्वितीय संगोष्ठी सत्र में --सरस्वती वन्दना कवयित्री श्रीमती शर्मा के सुमधुर स्वरों में हुई। 'समाज सुधार में संत साहित्य क़ा योगदान व संत कंवर राम' पर विषय प्रवर्तन करते हुए प्रोफ नेत्रपासिंह ने कहा कि संत सदा आत्म श्लाघा से दूर रहते हैं , साहित्य में भी सत्साहित्य्कार इस प्रवृत्ति से दूर रहते हैं , वे मंचों , प्रशंसाओं से दूर ही रहते हैं । वेदों से लेकर , महाभारत, रामायण ,मानस -बाल्मीकि, वेदव्यास, तुलसी से होते हुए संत कंवर राम जी तक सभी कालजयी साहित्य संत परम्परा से ही है , समाज को सदैव ही संत साहित्य ने ही उबारा है । गोष्ठी क़ा समापन करते हुए डॉ यतीन्द्र तिवारी जी ने कहा हमारी संस्कृति की सनातनता संतों संत साहित्य के पुनः पुनः प्रादुर्भाव से ही तो हैमन से बड़ा अपराधी कौन है ! मन क़ा निर्मलीकरण ही तो समाज क़ा निर्मलीकरण है और संत साहित्य व सच्चा साहित्य यही तो करता है।
संत कंवर राम मिशन के राष्ट्रीय सचिव साधक जी ने संत कंवर राम के विश्वबंधुत्व भाव, भाई चारा, उनकी अलौकिक आवाज़ में गायन , लीलाएं आदि क़ा विस्तार में वर्णन किया । उन्होंने बताया कि , संतजी पर डाक टिकिट क़ा प्रकाशन जिसका लोकार्पण महामहिम राष्ट्रपतिजी श्रीमती प्रतिभा पाटिल ने दरवार हाल में किया, जो संतों के सम्मान की अच्छी परम्परा है।

संत आसूदाराम ट्रष्ट व शिव शान्ति आश्रम के पीठाधीश्वर महाराज द्वाराआशीर्वचन के रूप में संत कंवर राम की अध्यात्मक शक्तियों की चर्चा की , एवं सभी उपस्थित जन को प्रसाद वितरण किया गया।

काव्य गोष्ठी सत्र में --राष्ट्र वाद , अध्यात्म एवं संत साहित्य परम्परा पर सरस काव्यमय रचनाएँ पढी गईं । जिसकी अध्यक्षता प्रोफ नेत्र पाल सिंह ने की।

----डा श्याम गुप्त

शनिवार, 22 मई 2010

जीन व कृत्रिम जीवन की रचना...

जीवन की रचना---कृत्रिम जीवन -कोशिका की प्रयोगशाला में उत्पत्ति...

----अमेरिकी जीन वैज्ञानिकों द्वारा प्रयोगशाला में जीवन की उत्पत्ति की सफलता , मानव की सफलताओं की कथा में एक और मील का पत्थर है | इस पर किसी धार्मिक आचार्य का कथन सटीक ही है कि सभी कुछ उस ईश्वर का ही कृतित्व है -मानव भी- अतः मानव द्वारा यह खोज भी ईश्वर की खोज का ही, ईश्वर द्वारा प्रदत्त, एक भाग हैजो मानव जीवन के ध्येयों में एक लक्ष्य है, अपने रचयिता की , विश्व के मूल प्रश्नों की खोज; एवं धर्म से इसका कोई विरोधाभाष नहीं है।
----इसके साथ ही विश्व भर में इस खोज की नैतिकता पर भी प्रश्न उठ खड़े हुए हैं, स्वयं वैज्ञानिक समुदाय द्वारा ही। इसके दुरुपयोग के भयंकर परिणामों, भयंकर अनुशासन हीन दुर्मानवों, अतिकाय मानव व जीवों की उत्पत्ति , मानवता के संकट के रूप में । यद्यपि टी वी समाचारों , समाचार पत्रों आदि में दिखाए गए अतिकाय मानवों के दृश्य , कथन आदि सिर्फ पाश्चात्य कथाएँ , सीरिअल्स , पिक्चर आदि से प्रभावित है जो स्वाभाविक है क्योंकि आज भारतीय प्राच्य ज्ञान की कोई पूछ ही नहीं है। जबकि भारतीय पुरा ज्ञान, वैदिक साहित्य में यह सब पहले से ही वर्णित है |
-----सृष्टा -ब्रह्मा का ही एक सहयोगी था 'त्वष्टा' जिसने यज्ञ द्वारा यह विद्या प्राप्त कर ली थी परन्तु वह उसकादुरुपयोग करने लगा था । वह यज्ञ द्वारा- हाथी का सिर -मानव का धड ; मानव का सर -जानवरों-पक्षियों का धड , विशालकाय मानव व पशु पक्षी उत्पन्न करने लगा था | त्रिशिरा नामक अति बलशाली दैत्य(तीन सिर वाला मानव=देव=दैत्य)
उसी का पुत्र था जिसका अत्याचार लिप्त होने पर इन्द्र ने वध किया था। तत्पश्चात ब्रह्मा द्वारा त्वष्टा ऋषि का ब्रह्मत्व ( ज्ञान ) छीन कर उसे निष्प्रभ कर दिया गया ।
----हमें सदुपयोग दुरुपयोग के मध्य की क्षीण रेखा का ध्यान रखना होगा , इतिहास से सबक लेकर।