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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

शुक्रवार, 29 अप्रैल 2011

बैठे ठाले... आलेख...डा श्याम गुप्त....

                                                          ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

                 भला बताइये शून्य क्या है ? आप छूटते ही कहेंगे कि, अजी ,ये क्या बात हुई ! शून्य एक अंक है जो '०' से प्रकट किया जाता है . जिसका अर्थ है -कुछ नहीं, कोइ नहीं, रिक्त स्थान आदि | पर हुज़ूर ! आप यह न समझें कि शून्य एक निरर्थक राशि है या कोइ राशि ही नहीं है |   साहिबान! यह अंक, शब्द या जो भी है, है अत्यंत महत्वपूर्ण व महान | क्या कहा ? क्यों ?  तो लीजिये आपने किसी को १०००० रु दिए और लिखे -'१०००/- दिए ' | अरे ! आप परेशान क्यों हैं ? क्या कहा ? ९००० रु ही रफूचक्कर होगये ! अब रोइए उस महान  शून्य को सिर पकड़ कर |
              इसे बिंदी भी कहा जाता है | अब बिंदी की सार्थकता पर प्रश्न चिन्ह न लगाइए वरना समझ लीजिये बस श्रीमतीजी .......| और कहीं महिला संगठनों को पता चल गया आपकी इस विचार धारा का तो बस ...बेलन-थाली-चिमटा, धरना -प्रदर्शन ..और आप पर महिला-विरोधी होने का.....| अरे तभी तो अपने बिहारी जी भी बहक गए --
"कहत सबै बेंदी दिए , आंकु दस गुनों होत |
तिय लिलार बेंदी दिये, अगणित बढ़त उदोत ||"
                 और याद है वह हिन्दी की बिंदी का कमाल जब स्कूल में इमला सत्र में  -" इत्र बेचने वाले को गंधी कहते हैं "..से बिंदी गायब कर देने पर ....मास्टर जी के .झापड़ ही झापड़ ..|
                 पर इस शून्य का अर्थ कुछ नहीं और महत्त्व बहुत कुछ है...इस विरोधाभास से न तो हम ही संतुष्ट होंगे , न आप ही | इसका अर्थ कुछ और भी है | यदि न जानते हों तो बताये देते हैं कि हिन्दी के प्रश्न- पत्र  में शून्य का अर्थ सिर्फ कुछ नहीं , कोई  नहीं न लिख दीजिएगा, नहीं तो निश्चिन्त रहिये, शून्य ही नसीब होगा | अब जरा आकाश के पर्ययाबाची तो दोहराइए ...समझ गए न | अरे  तभी तो कबीर जी  भी  रहस्य की बात कह गए---
        " सुन्न भवन  में अनहद बाजे,
          जग का साहिब रहता है ||  "
               प्रिय पाठक ! परन्तु इस '0' चिन्ह वाले शून्य को शून्य ही  क्यों कहते हैं | सोचिये | क्योंकि शून्य को आकाश भी कहते हैं और आकाश  है भी शून्य -निर्वात, सुन्न भवन | वह गोल भी है और अनंत भी , जैसे शून्य भी गोल है और अनंत भी | इसकी परिधि पर चक्कर लगाने वाले को छोर कहाँ मिलता है | जैसे क्षितिज की और दौडने वाले को क्षितिज नहीं मिलता | 
             आखिर अपने पूछ ही  लिया ; शून्य का आविष्कारक कौन है | जितने मुंह उतनी बातें , बात से बात निकालने में क्या जाता है ? परन्तु शून्य का अविष्कार एक भारतीय मनीषा द्वारा ही हुआ | इससे पूर्व विश्व- गणना सिर्फ ९ तक ही सीमित थी | इस असीम शून्य के आविष्कार के पश्चात् ही गणित व भौतिकी अस्तित्व में आये | ससीम मानव की मेधा असीम की और बढ़ी | सभ्यता को आगे चढ़ने का सोपान प्राप्त हुआ | संसार गणित पर आधारित है और गणित शून्य पर | मानव की ज्ञान व प्रकृति नियमन के चरमोत्कर्ष   की युग-गाथा  कम्प्युटर-विज्ञान भी तो शून्य आधारित सिद्धांत की भाषा-भूमि पर टिका है ; जिसके कारण आज मानव स्वयं सोचने वाले रोबोट-यंत्र-मानव बनाकर मानव के सृष्टा होने का सुस्वप्न देखकर ईश्वरत्व के निकट पहुँचने को प्रयास-रत है | और......खैर छोडिये भी....कहाँ आगये " आये थे हर भजन को ओटन लगे कपास " |
          हाँ तो आपने शून्य का अर्थ और महत्त्व समझ लिया | परन्तु श्रीमान ! यदि अप शिक्षार्थी, विद्यार्थी, परीक्षार्थी हैं तो शून्य के महत्त्व को कुछ अधिक ही अधिग्रहण करके परीक्षा में भी शून्य ही लाने  का  यत्न न करें , अन्यथा फिर एक वर्ष तक शून्य का सर पकड़ कर रोइयेगा |

                     चलिए अब तो अप शून्य का अर्थ समझ ही गए | क्या कहा ! अब भी नहीं समझे ? तो शून्य की भाँति शून्य के चक्कर लगाते रहिये , कभी तो समझ ही जायेंगे ---
           "लगा रह दर किनारे पर, कभी तो लहर आयेगी "
                       शायद अब तो आप समझ ही गए की शून्य क्या है |यदि अब भी न समझे तो हम क्या करें , आपका मष्तिष्क ही शून्य है और आपकी अक्ल भी शून्य में घास चराने चली गयी है | आपका वर्तमान व भविष्य भी शून्य का भूत ही है | हम तो उस कहावत को सोच के डर रहे हैं कि..." खाली दिमाग शैतान का घर होता है |"

बुधवार, 27 अप्रैल 2011

भ्रष्टाचार के कारण--४....शासन, प्रशासन, बाबू-अफ़सर....

                                                            ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
            शासन -प्रशासन में भ्रष्टाचार की गाथा तो बहुत पुरानी है  और सर्वाधिक चर्चित है। यद्यपि प्राचीन समय में प्रायः  दुश्मन के भेद लेने के लिए, किला भेदने आदि के रूप में युद्धकाल में  ही  उत्कोच के रूप में इस प्रथा का प्रयोग किया जाता था | वह भी पाश्चात्य प्रभाव से भारत में फैलना प्रारम्भ हुआ | सिकंदर व तत्पश्चात विदेशियों के आक्रमण के फलस्वरूप छल-छद्म द्वारा युद्ध जीतने की प्रथा प्रारम्भ हुई और राज्यकर्मचारियों व अधिकारियों आदि को  उत्कोच की भी ; जो मुगलों के काल में और अधिक प्रभावी हुई | भारत में शासन -प्रशासन में भ्रष्टाचार का अधिक प्रचलन ईस्ट इंडिया कंपनी के समय  अफसरों द्वारा पिटे-पिटाए भारतीय राजे- महाराजे, नबाव आदि को चुप रखने के लिए डालियाँ आदि भेजने से हुई , जो स्वयं उनके अपने अफसरों -मातहतों में ( भारत में पोस्टिंग या वापस जाने की सिफारिस हेतु ) प्रचलित होकर रस्म बन गयी | हिन्दुस्तानी चपरासी /बाबू जो बहुत कम पगार वाले होते थे  (-अफसर सदैव अँगरेज़ होते थे ) अफसरों को खुश करने के लिए , उनकी नक़ल हेतु अपना ज़लवा दिखाने के लिए सामान्य जन से भेंट लेने लगे और रिश्वत --भ्रष्टाचार का तंत्र स्थापित होने लगा | बाद में ब्रिटिश शासन में  बड़े बड़े दफ्तर, पुलिस  , मालगुजारी , चुंगी, लगान, क़ानून , अदालतें  व  भिन्न भिन्न करों आदि का क्रूरतापूर्वक बसूली व देश-संपदा दोहन के क्रम  में भ्रष्टाचार प्रगति पाता गया | शासन-प्रशासन रूपी शेर के मुंह लगा हुआ खून स्वतन्त्रता के पश्चात विज्ञजनों/ राजनेताओं  द्वारा कोई निश्चित भारतीय प्रणाली व उच्च -प्रतीकों की स्थापना की बजाय आजादी के फल बटोरना प्रारम्भ कर  देने से सभी --जन जन इसी कमाने खाने में  में जुट गया और भ्रष्टाचार बढ़ता ही गया , जो अन्य कारणों से ऊपर ..राजनेताओं और नीचे सामान्य जन जन में विषाणु की भांति प्रभावी होता गया, और रही सही कसर तथाकथित प्रगतिशीलता ,  उदारवादीनीति के तहत  विदेशी संस्कृति, अति-सुविधाभोगी जीवन पद्धति  बाज़ारवादी संस्कृति, बहु-देशीय कंपनियों के बाजार पर कब्जे से पूरी होगई ... जैसी आज स्थिति है , कोई काम किसी भी दफ्तर में बिना सुविधा शुल्क चुकाए नहीं होता |
क्या होना चाहिए---- सबसे कठिन कार्य है , क्योंकि सभी ऊपर से नीचे तक एक दूसरे से जुड़े होते हैं अतः कौन किसके विरुद्ध कहे, लिखे, गवाही दे, एक्शन ले ?
   १- भ्रष्टाचार-निरोधी संस्थाओं को कठोर कदम उठाने होंगे --  नियमों, कानूनों का कठोरता से पालन ताकि कोई भ्रष्ट बचने न पाए| 
   २-सरकारी व प्राइवेट सभी दफ्तरों आदि में पारदर्शिता के उपाय करने चाहिए, प्रत्येक कार्य के लिए समय-सीमा निर्धारित होनी चाहिए |
   ३-मानवीय लिप्सा व सुविधाभोगी संस्कृति की रोक थाम------विज्ञान, तकनीक, व आधुनीकरण के अन्धानुकरण में हर जगह वातानुकूलित संयन्त्र, हर हाथ में अनावश्यक मोबाइल, कम्प्यूटर, लेपटोप,आई-पोड आदि व पश्चिम के अन्धानुकरण में धन- शराव, शराव-शबाव का प्रदर्शन व अन्धाधुन्ध प्रयोग। परिवार तो मोलेक्यूलर होगये परन्तु हर परिवार - चार घर, चार कार, चार एसी, चार लेपटोप वाला होगय, यह सब व्यक्ति को रिश्वत खोरी की और आकर्षित करता है |
       अधिक पैसा-कमाई व अधिक मोटी-मोटी पगारशेयर, बचत, विदेशी-कर्ज़, लोन-संस्क्रिति के कारणजितने का भी मिले, जैसे भी मिले, जहां भी मिले- लेलो”  की नीति पनपने से भ्रष्ट-आचरण व भ्रष्टाचार को पैर पसारने की अनुमति मिलती है।
    ४-बहुत से अकर्मों को प्रश्रय न देना हर आदमी का शेयर में लगे रहना, अनावश्यक बचत, अधिकाधिक खेल, संगीत, मनोरंजन, फ़ूहड-हास्य, शास्त्र-धर्म-न्रीति के विरोधी प्रहसन, सीरियल, नाटक । विदेशी नकलपर नाटक, अन्ग्रेज़ी/ व हिन्दुस्तानी अन्ग्रेजों की लिखी, तथाकथित विदेशी पुरस्कार प्राप्त व्यर्थ की बडी-बडी पुस्तकें,---ईश-निन्दा-शास्त्र निन्दा पर अनावश्यक आलेख । प्रायोजित लेखकों, तथाकथित इतिहासकारों, कालम-लेखकों जो सिर्फ़ धन्धे के लिये, पैसे के लिये -–बच्चों, स्त्री, मनोविज्ञान  के नाम पर माता-पिता को सीख आदि द्वारा- आने वाली संतति में अश्रद्धा, अनास्था के बीज डालते हैंऔर सब चलता है-की सीख द्वारा उसे अनाचरण व भ्रष्टाचार के मार्ग पर जाने को जाने-अनजाने बढावा देते हैं ।
    ५ -अनाचरण-दुराचरणउपरोक्त जीवन प्रणाली का प्रभावी परिणाम, मानवीय दुराचरण होता है और भ्रष्टाचार का मूल कारक बनता है। मनुष्य के भ्रष्टाचार के कारण ही भ्रष्टाचार संस्थागत होने लगता है और समाज में पसारने लगता है ,फिर समेटे नहीं सिमटता |
        



        
       

मंगलवार, 26 अप्रैल 2011

एक प्रेरक सूत्र--- आत्म-बल...

                                      ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...  

 -----ऋग्वेद -मंडल ४/सू. १६/ २३२७.... में ऋषि का कथन है कि....
                        "  """""""यानि कृत्सेन सरथम वस्यु स्तोये वातस्य हर्योरीशान: |
               ऋज्रा वाजं न गध्यं युयूषांक विहर्य हन्यामपि भूयात  ||"-------  
                 अर्थात---  जब दूरदर्शी कुत्स योग्य अन्न की भाँति ऋजुता-सरलता को अपनाकर पार होने के लिए तत्पर होता है तब उसके रक्षण की कामना से इन्द्रदेव उसीके रथ पर सवार हो जाते हैं |
                 -----कुंठाग्रस्त साधक( या किसी भी कर्म में  रुकावट से आतंकित होकर रुक जाने वाला मानव ) जब अपनी दूरदर्शिता का प्रयोग करके सहज भाव से अपनी कुंठा के कारणों( मार्ग की रुकावटों को स्वयं दूर करने का प्रयत्न ) को दूर करने के लिए संकल्पित होता है( स्वयं उठा खड़ा  होता है, इच्छा शक्ति का प्रयोग करता है  ) तो इन्द्रदेव--अर्थात उसका स्वयम की शक्ति आत्म-संकल्प=आत्मबल = सेल्फ  भी उसका मनोरथ पूर्ण करने के लिए. उसके साथ होजाते हैं,  उसका साथ देने लगते हैं |

शनिवार, 23 अप्रैल 2011

भ्रष्टाचार के कारण--तीन- --न्याय-व्यवस्था........डा श्याम गुप्त.....

                                                                            ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ... 
                  कहा जाता है कि न्याय की देवी की आंखों पर पट्टी बंधी  होती है , परन्तु न्यायाधीश व न्यायालय के अन्य कर्मचारी तो मनुष्य ही होते हैं और उनकी आँखें खुली होती हैं | उनमें भी मानवीय गुणावगुण होते ही हैं | सामान्य जन में यह निश्चित धारणा है की अदालतों में कोई काम  पैसे दिए बिना नहीं होता, और वह भी खुले आम , सामान्य दफ्तरों की भाँति चोरी चोरी नहीं  | अब यह धारणा क्यों व कैसे बनी ? सभी जानते हैं | 
                न्याय एक पवित्र  व्यापार है  व न्यायालय पवित्र स्थान, वे शासन व राजनीति से स्वतंत्र इकाई मानी जाती है  , परन्तु आज के मानवीय आचरण के  गिरावट के समय में यह व्यवस्था भी कैसे शुद्ध रह सकती है | न्याय के समाज और व्यक्ति पर दूरगामी व सर्वतोमुखी प्रभाव होते हैं | इसी के चलते जन-लोकपाल बिल में न्यायालयों को भी लाने की बात होरही है | मेरे विचार में कुछ मूल बातें एसी हैं जो इनके प्रति जनता में भय  का वातावरण बनाती हैं और भ्रष्टाचार के लिए भाव भूमि...
१-न्यायालय की अवमानना---- न्यायालय के विरुद्ध कुछ भी कथन, टिप्पणी आदि  अवमानना  मान लिया जाता है, जो नागरिक के अधिकार का हरण है ...अवमानना न्याय की होती है.....न्यायालय व न्यायाधीश की नहीं ---अवमानना न्याय की नहीं होनी चाहिए ..यदि कोई न्याय द्वारा पारित आदेशों का पालन नहीं करे तो वह अवमानना हो सकती है परन्तु टिप्पणी व राय प्रस्तुत करना  नहीं , न्यायालय में न्याय-आसन पर उपस्थित न्यायाधीश के न्याय के  विरुद्ध  कथन अवमानना है परन्तु अन्य स्थान पर उनके विरुद्ध कोई कथन या व्यक्तिगत कथन आदि  न्याय के नहीं, सामान्य नागरिक के सन्दर्भ में  माना जाना चाहिये | होता यह है क़ि नागरिक का कुछ भी बोलना अवमानना मान लिया जाता है और जनता में व्याप्त भय ..भ्रष्टाचार का कारण बनता है | 
२- स्वयं संज्ञान लेना--- होता यह है क़ि प्रायः तमाम व्यक्तिगत कारणों से न्यायकर्ता, स्वयं संज्ञान के अधिकार का प्रयोग करके किसी को भी वारंट तक भेज देते हैं जो भ्रष्टाचार का कारक है | अत्यंत आवश्यक समाज व जन-जीवन से सम्बंधित कलापों के अन्यथा यह अधिकार नहीं होना चाहिए .... इस अवस्था में वे  स्वयं न्यायकर्ता न होकर,  सामान्य व्यक्ति की भाँति नियमानुसार अन्य अदालत में अपना वाद पेश करें |
३- कहीं भी न्यायालय -- न्याय सिर्फ न्याय-आसन पर ही होना चाहिये , कहीं भी या  घर पर नहीं , नियमित रूप से पूरे समय चेंबर में न बैठना भी एक बहुत बड़ी असुविधा है न्याय के लिए | और --"न्याय में देरी का अर्थ न्याय न मिलना "..जैसे जुमले इसीलिये बन जाते हैं |
३- विशेष अधिकार -- न्याय कर्ताओं को सुविधा आदि के लिए प्रशासनिक अधिकारियों की भाँति  व्यवहार नहीं करना चाहिए ,  विशेष अधिकार  भी अनाधिकार चेष्टा को प्रश्रय देते हैं |          

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011

वैदिक साहित्य में आधुनिक वैज्ञानिक तथ्य..३.....

                                                                                       ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...    

१- वायु चक्र --  ऋग्वेद -३/२८/२६८८...  के अनुसार ----
  "मातरिश्वा यदमिमीते मातरि | वातस्या मर्गो अभ्वात्सरी माणि ||" ---अर्थात   एक स्थान पर वायुमंडल में उपस्थित अग्नि (  उच्च ताप ) वायु में तरंगें , लहरें उत्पन्न होने का कारण हैं | स्थानीय ताप बढ़ने से निम्न वायु-दाब होने पर वायु की तरंगें उठती हैं और अधिक वायु दाब वाले स्थान से उस स्थान की और वायु चलने लगती है | इस प्रकार वायु चक्र बनाने से हवा बहती रहती है |

२-गीत-संगीत से पोधों में वृद्धिऋग्वेद ३/८/२२२९ -- में ऋषि कहता है ---
 "अन्जन्ति त्वामध्वरे देवयन्तो वनस्पते मधुना देव्येन | 
यदाध्वार्श्तिशठा द्रविणोह धत्तायद्वा क्षयो मातुरस्य उपस्थे |"  ---  अर्थात....हे  वनस्पति देव ! देवत्व के अभिलाषी ऋत्विक गण यज्ञ में आपको दिव्य मधु  व गान ( यज्ञीय प्रयोग... गान.. इन्द्रगान ...साम- गान...संगीत आदि  ) से सिंचित करते हैं | आप चाहे उन्नत अवस्था में हों ( पौधा..वृक्ष रूप ) या पृथ्वी की गोद में ( बीज अवस्था में ) , वृद्धि को प्राप्त हों , हमें एश्वर्य प्रदान करें |

 

मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

भ्रष्टाचार के कारण--दो- राजनीति--....डा श्याम गुप्त.....

.                                                                                                      ...कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
            राजनीति व  सत्ता  का भ्रष्ट होना तो प्रसिद्ध है ही | अंग्रेज़ी कहावत है ..'पावर करप्ट्स" अर्थात सत्ता भ्रष्ट करती है ; जबकि भारतीय कहावत है ..'सत्ता पाहि क़ाहि मद नाहीं '....दोनों में क्या अंतर है...वही अंतर पश्चिम व भारतीय संस्कृति  में है | पावर करप्ट्स का अर्थ है सत्ता सभी को करप्ट कर देती है अर्थात  सत्ता है ही करप्शन का स्थान  और ध्वनि निकलती है..मनुष्य का क्या दोष ?! जबकि भारतीय सन्दर्भ का अर्थ है कि सत्ता पाकर किसे मद  नहीं होता (==सभी को नहीं होता) , अर्थात दोष उस मनुष्य का होता है जो प्रायः सत्ता पाकर भ्रष्ट होजाता है | अतः वही मूल मानवीय कदाचरण ही राजनीति व शासन में भी भ्रष्टाचार का दोषी है |
                 प्राचीन समय में प्रायः राजा ही शासक व न्यायाधीश दोनों हुआ करता था, वही प्रशासन व  सेना  का अध्यक्ष | अतः सुनवाई, न्याय व कार्यपालन त्वरित विना अवरोध के होता था | जो राजा स्वयं को जन-सेवक मान कर चलता था उसकी प्रजा संपन्न व राज्य और जन-जीवन सहज रूप से  चलता था | जब राजा स्वयं अपने स्वार्थ में डूबता था ; जो सभी को दिखाई देता था क्योंकि सत्ता का केंद्र एक ही होता था, अतः ऐसे राजाओं के लिए कहावत बनी "राजा होय चोरी करे न्याय कौन पर जाय "और भ्रष्ट सिर्फ एक राजपरिवार  ; तो प्रायः जन क्रान्ति से उसे हटा दिया जाता था |
         आज प्रजातंत्र में सत्ता , प्रशासन, न्याय , सेना आदि सत्ता के विभिन्न केंद्र हैं ,सब कुछ गड्ड-मड्ड है| और न्याय, कार्य व उसके पालन के केंद्र अलग अलग होने से कार्य-पालन में त्वरितता नहीं आपाती और यदि सभी जन सहज आचरण वाले हैं तो सब ठीक है अन्यथा अनेकों भ्रष्टाचार के केंद्र होने से उसे रोकना एक टेडी-खीर साबित होता है, कौन किसे हटाये , अतः प्रत्येक जन को सदाचारी होना अत्यावश्यक है  | 
         राजनीति के निर्णय दूरगामी व सर्वतोमुखी प्रभाव वाले होते हैं , अतः राजनेताओं के  भ्रष्टाचार का प्रभाव शासन, प्रशासन, न्याय, सेना सभी पर पड़ता है , और जन जन भ्रष्टाचार में लिप्त होजाता है | अतः राजनेताओं को स्वयं व्यक्तिगत रूप से व राजनैतिक पार्टियों को भी समष्टिगत रूप से  स्वच्छ व सदाचरण पूर्ण होना ही होगा |
         आज राजनेताओं,  मंत्रियों आदि में भ्रष्ट राजाओं की भाँति ( अफसरों, यहांतक कि न्यायविदों में भी-जिसका वर्णन वाद में अलग पोस्ट में  किया जायगा ) स्वयं को जन सेवक की बजाय जनता के, देश के मालिक का भाव घर कर गया है , जो बदलना ही होगा | जिसका परिणाम --शासन , प्रशासन में चुपके चुपके ,छिपे तौर पर  भ्रष्टाचार  है तो ---राजनीति में ( विधायकों की खरीद-फरोख्त आदि ) व न्यायालयों में खुले आम | इसके चलते ही आज जन-लोकपाल बिल की आवाज़ उठी है | नेताओं को सुविधा,विशेष अधिकार, मासिक पे, निधि आदि सभी भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाले कृत्य हैं |
क्या होना चाहिए ---    
१- नेताओं व सांसदों , विधायकों को  को पार्टी-हित से पहले देश हित की लिए कार्य करना चाहिए --पार्टी की मूल नीति यदि देश विरोधी  है तो पार्लियामेंट स्वतंत्र वोटिंग करें |
२-सांसदों आदि का वेतन व पेंशन पर कोइ अधिकार नहीं है क्योंकि वे जन सेवक, समाज सेवक हैं  सरकारी सेवक नहीं अतः बंद हो |
३-सांसद आदि के विशेष अधिकार व  संसद-निधि का प्रावधान बंद कर देना चाहिए , नेता सिर्फ सिफारिस करें , स्वयं शासन का भाग न बनें|
४- नेता ,सांसद आदि किसी भी सरकारी , प्राइवेट दफ्तर अदि में अफसरों  से मिलें  नहीं, सरकारी कार्य का भाग न बनें  , लोगों को लेकर काम कराने स्वयं न जायं , सिर्फ पत्र लिखें |
५- नेताओं, सांसदों आदि को अपने क्षेत्र से अन्यथा राजधानी में कोइ फ्लैट/ आवास न दिया जाय, सदा ही उसमें अवांछित गतिविधियों को बढ़ावा मिलता है| सत्र के दौरान सम्मिलित -आवास होना चाहिए | सत्र के अलावा कोई नेता, सांसद आदि राजधानी न आये -जाए रेल व हवाई टिकट भी सिर्फ सत्र के लिए ही दिया जाय ६- वे बार बार कार्यालयों का दौरा न करें --मुख्य कार्यपालकों से ही रिपोर्ट लें , ट्रांसफर, पोस्टिंग , शासकीय आदेश पारित न करें | सिर्फ नीतिगत वक्तव्य ही दें |

 

सोमवार, 18 अप्रैल 2011

हनुमान जयन्ती पर विशेष.....

                                                                                    ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...आवाहन 

            आवाहन         
        ( कुन्डली –छन्द )
            १.
पवन तनय सन्कट- हरण,मारुति सुत अभिराम,
अन्जनि पुत्र सदा रहें, स्थित हर घर –ग्राम
स्थित हर घर- ग्राम, दिया वर सीता मां ने ,
होंय असम्भव काम ,जो नर तुमको सम्माने ।
राम दूत ,बल धाम ,श्याम, जो मन से ध्यावे,
हों प्रसन्न हनुमान, क्रिपा रघुपति की पावे ॥
           २.
निश्चयात्मक बुद्धि, मन प्रेम प्रीति सम्मान,
विनय करें तिनके सकल,कष्ट हरें हनुमान ।
कष्ट हरें हनुमान, पवन सुत अति बलशाली,
जिनके सम्मुख टिकै न कोई दुष्ट कुचाली ।
रामानुज के सखा ,दूत,प्रिय भक्त ,राम के ,
बिगडे काम बनायं,पवन-सुत,सभी श्याम के ॥
             प्रार्थना
(मनहरण कवित्त-३१ वर्ण,१६-१५ ,अन्त गुरु )
              १. 
दुर्गम जगत के हों, कारज सुगम सभी ,
  बस, हनुमत गुण-गान,  नित करिये ।
  सिन्धु पार करि,सिय-सुधि लाये लंक-जारि,
  ऐसे बजरन्ग बली का ही, ध्यान धरिए
  करें परमार्थ, सत कारज, निकाम भाव ,
  ऐसे उपकारी पुरुषोत्तम को,  भजिये
  रोग-दोष,दुख-शोक,सब का ही दूर करें,
  श्याम के, हे राम दूत! अवगुन हरिये ॥
            
                २.
(जल हरण घनाक्षरी-,३२ वर्ण,१६-१६ ,अन्त-दो लघु)

 विना हनुमत कृपा, मिलें नहीं राम जी,
राम भक्त हनुमान चरणों में ध्यान धर ।
रिद्धि–सिद्धि दाता,नव-निधि के प्रदाता प्रभु,
मातु जानकी से मिले ऐसे वरदानी वर ।
राम औ  लखन से मिलाये सुग्रीव तुम ,
दौनों पक्ष के ही दिये सन्कट उबार कर।
सन्कटहरण हरें, सन्कट सकल जग,
श्याम अरदास करें,कर दोऊ जोरि कर ॥
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