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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

सोमवार, 5 मार्च 2012

आयुर्वेद... एक सारभूत वर्णन...भाग एक ---- -डा श्याम गुप्त.....



                              ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
 

          आयुर्वेद एक सारभूत वर्णन--- भाग एक 
         अन्य भारतीय ज्ञान व विद्याओं की भाँति भारतीय चिकित्सा विज्ञान भी अत्यंत विकसित था । गुलामी के काल में अन्य ज्ञान व विध्याओं की भाँति सुनियोजित षडयंत्र व क्रमिक प्रकार से इसका भी प्रसार व विकास भी रोका गया ताकि एलोपेथिक आदि पाश्चात्य चिकित्सा को प्रश्रय दिया जा सके । अतः भारत के इतिहास के अन्धकार काल में आयुर्वेद का कोई उत्थान नहीं हुआ अपितु निरंतर गिरावट होती रही । हर्ष का विषय है की आज भारत के  नए भोर के साथ आयुर्वेद भी नए नए आयाम छू रहा है।  आयुर्वेद के नाम से जाना जाने वाला यह आदि चिकित्सा विज्ञान है, जिसके सारभूत सिद्धांतों से विश्व के सभी चिकित्सा-विज्ञान प्रादुर्भूत हुए हैं । आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के लगभग सभी अंग-उपांग आयुर्वेद में पहले ही निहित हैं। यद्यपि आजकल आयुर्वेद "प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धति' के संकुचित अर्थ में प्रयुक्त होता ।  इस क्रमिक पोस्ट द्वारा हम आयुर्वेद के इस विशद ज्ञान को संक्षिप्त में वर्णन करेंगे ।  
     आयुर्वेद अर्थात आयु का वेद…..जीवन की विद्या…... जीवन एवं स्वास्थ्य का ज्ञान -विज्ञान ... नॉलेज ऑफ़ सायन्स आफ़ लाइफ़... भारत व भारतीय संस्कृति की भान्ति यह भारतीय चिकित्सा विज्ञान  भी मानव इतिहास का सर्वप्रथम एवं प्रचीनतम चिकित्सा-विज्ञान  है जिसका सृष्टि से पहले ही ब्रह्मा द्वारा वेदों में प्रवर्तन किया गया और पृथ्वी पर चरक तक पहुंचा। इसके चिकित्सा सिद्धान्तों से ही विश्व की अन्य विविध चिकित्सा पद्धतियों का जन्म हुआ। इसी के उपलक्ष में बीसवीं शताब्दी में अमेरिका में ’चरक-क्लब ओफ़ मेडीकल स्कोलर्स’ की स्थापना हुई थी,
         इतिहास- आयुर्वेद के इतिहास का अभिप्रायः वस्तुतः चिकित्सा-विज्ञान  के इतिहास से ही लेना चाहिये …… संसार की  प्राचीनतम्  पुस्तक  ऋग्वेद है जो वस्तुतः अपने प्राचीनतम पुस्तक-रूप से भी युगों पूर्व पुरा-काल से मौखिक-ग्रन्थ के रूप में सतत गुरु-शिष्य परम्परा में कथ्य व श्रव्य रूप में प्रवह्मान थी, इसीलिये वेदों को श्रुति भी कहा जाता है । विभिन्न विद्वानों ने इसका निर्माण काल ईसा के ३,००० से ५०,००० वर्ष पूर्व तक का माना है ।  इस संहिता में आयुर्वेद के अतिमहत्त्व के सिद्धान्त यत्र-तत्र विकीर्ण है, तत्पश्चात अथर्ववेद मे आयुर्वेद का विस्तृत एवं क्रमिक विवरण पाया जाता है । आयुर्वेद को पन्चम वेद भी कहा जाता है । चरक, सुश्रुत, काश्यप आदि आयुर्वेद के मान्य ग्रन्थ  व चिकित्सक-ऋषि  आयुर्वेद को अथर्ववेद का उपवेद  मानते हैं।  इससे आयुर्वेद की प्राचीनता सिद्ध होती है । अतः  आयुर्वेद का रचनाकाल – यद्यपि भारतीय दर्शन के अनुसार आयुर्वेद सृष्टि की उत्पत्ति से पहले ही था जो आदि-विष्णु ( व्यक्त ब्रह्म ) द्वारा  त्रिदेवों को दिया गया । आधुनिक विज्ञान के अनुसार ..इसे ईसा पूर्व ३,००० से ५०००० वर्ष पहले यानि … सृष्टि की उत्पत्ति के आस-पास या साथ का  माना जा सकता है।

       आयुर्वेद का अवतरण—मूलतः दो मत हैं---       
       चरक मत के अनुसार-- सर्वप्रथम ब्रह्मा के मुख से पन्चम वेद की भांति ---प्रजापति ने, ---प्रजापति से--- अश्विनी कुमारों ने उनसे-- इन्द्र ने और इन्द्र से- भारद्वाज ने ... तदनन्तर पुनर्वसु आत्रेय ने.... अग्निवेश, भेल, जतू, पाराशर, हारीत और क्षारपाणि नामक छः शिष्यों को आयुर्वेद का उपदेश दिया । इन छः शिष्यों में सबसे अधिक बुद्धिमान अग्निवेश ने सर्वप्रथम एक संहिता का निर्माण  किया- अग्निवेश तंत्र  का, जिसका प्रतिसंस्कार बाद में चरक ने  किया और उसका नाम चरक संहिता पड़ा, जो आयुर्वेद का आधार स्तंभ है । इस प्रकार मृत्युलोक में आयुर्वेद के अवतरण के साथ- अग्निवेश का नामोल्लेख है ।
      सुश्रुत मत  के अनुसार-- काशीराज दिवोदास के रूप में अवतरित भगवान धन्वन्तरि के अनुसार ..सर्वप्रथम स्वयं ब्रह्मा  ने सृष्टि उत्पादन पूर्व ही अथर्ववेद के उपवेद आयुर्वेद को एक सहस्र अध्याय- शत सहस्र श्लोकों में प्रकाशित किया और पुनः मनुष्य को अल्पमेधावी समझकर इसे आठ अंगों में विभक्त कर दिया । --ब्रह्मा से--- दक्ष प्रजापति, --उनसे अश्विनीकुमार द्वय तथा उनसे--- इन्द्र ने आयुर्वेद का अध्ययन किया ।
            इस प्रकार इतिहास एवं आयुर्वेद के अवतरण के क्रम में –मूलत: दो चिकित्सक-ऋषि-कुल --आत्रेय वर्ग तथा धन्वन्तरि वर्ग  मान्य है ।
     
       आयुर्वेद के अवतरण क्रम को सन्क्षिप्त में इस प्रकार रखा जा सकता है…..
     आदि-विष्णु या व्यक्त-ब्रह्म द्वारा सृष्टि से पहले… वेद व अमृत -विद्या अर्थात आयुर्वेद का प्रकटीकरण ----> प्रथम चिकित्सक  त्रिदेवों को ( ब्रह्मा, विष्णु, शिव ) —
१- शिव---चिकित्सकों के चिकित्सक… मृत-संजीवनी विद्या…के प्रवर्तक.. ----> शुक्राचार्य को.....
२- विष्णु--- अमृत-विद्या… के प्रवर्तक --->गरुड को ....
३- ब्रह्मा ..आदि ब्रह्म द्वारा स्मरण कराने पर …श्रुत शब्दों व स्मृत अर्थों से एक लाख श्लोकों  में आयुर्वेद की रचना की…..जिसे पन्चम वेद भी कहते है और अथर्व वेद का उपान्ग….ब्रह्मा द्वारा  ---->
           क---राज्य-यक्ष्मा की उत्पत्ति व उसकी चिकित्सा हेतु ..(श्राप से यक्ष्मा ग्रसित चंद्रमा की चिकित्सा हेतु ….चन्द्रमा को ..
           ख---- यम व बुध को ..
           ग----दक्ष-प्रज़ापति को …दक्ष से ---> अश्वनी कुमार द्वय से---> इन्द्र  से---> भगवान आदि धन्वन्तरि---> भारद्वाज को..(सर्वप्रथम पृथ्वी पर अवतरण..) ….. भारद्वाज द्वारा---->
     (अ)-धन्वपुत्र धन्वन्तरि मानव -काशिराज दिवोदास को -- काय-चिकित्सा—(मेडीसिन) तन्त्र एवं अष्टान्ग वैद्यक--के प्रवर्तक  से ---> जनक, च्यवन, जावालि, करल, अगस्त्य व पैल ( निदान तन्त्र--डायाग्नोसिस-- के प्रवर्तक ) से ---> नकुल-सहदेव ---> आत्रेय, पुनर्वसु, अग्निवेश( अग्निवेश तन्त्र =चरक संहिता) हारीति, जतूकर्ण आदि ---> चरक ( चरक संहिता ग्रन्थ)…..
     (ब)-कश्यप को –कौमार-भृत्य -अर्थात बाल एवं स्त्री रोग-( पेडियाट्रिक्स व ओब्सटेट्रिक्स) तन्त्र के प्रवर्तक …से ---> भृगु, अत्रि, वशिष्ठ ----> पुत्र व शिष्य…..
     (स)-काशिराज-दिवोदास को शल्य-चिकित्सा ..( सर्जरी) के प्रवर्तक से ----> सुश्रुत (शुश्रुत-संहिता), भोज…….  
 
      आयुर्वेद का उद्देश्य---आयुर्वेद चिकित्सा शास्त्र के अनुसार इस शास्त्र के मूलतः--दो उद्देश्य हैं ----
     १.स्वस्थ व्यक्तियों के स्वास्थ्य की रक्षा करना (स्वास्थ्य, प्रतिरक्षा व रोकथाम- प्रीवेन्टिव-चिकित्सा) ---      --शरीर और प्रकृति के अनुकूल ,नियमित आहार-विहार,  गृहस्थ जीवन के लिए उपयोगी शास्त्रोक्त दिनचर्या, रात्रिचर्या एवं ऋतुचर्या का पालन,  संकटमय कार्यों से बचना, प्रत्येक कार्य विवेकपूर्वक करना, मन और इंद्रिय को नियंत्रण,  शरीर आदि की शक्ति और अशक्ति का विचार कर कोई कार्य करना, मल, मूत्र आदि के  वेगों को न रोकना, .....ईर्ष्या, द्वेष, लोभ, अहंकार आदि से बचना, समय-समय पर शरीर में संचित दोषों को निकालने के लिए वमन, विरेचन आदि के प्रयोगों से शरीर की शुद्धि,.... सदाचार का पालन और दूषित वायु, जल, देश और काल के प्रभाव से उत्पन्न महामारियों  (एपिडेमिक डिज़ीज़ेज़) में विज्ञ चिकित्सकों के उपदेशों का समुचित रूप से पालन, स्वच्छ और विशोधित जल, वायु, आहार आदि का सेवन और दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करना, ये स्वास्थ्यरक्षा के साधन हैं।
    २.रोगी व्यक्तियों के विकारों को दूर कर उन्हें स्वस्थ बनाना- ( रोग निवारण –ट्रीट्मेन्ट )-- इसके लिए प्रत्येक रोग के लिये…..तीन शाखायें हैं ----त्रिस्कन्ध…… ये तीनों आयुर्वेद के 'त्रिस्कंध' (तीन प्रधान शाखाएं) कहलाती हैं -----
            अ -हेतु (कारण---इटियोलोजी ) ,---ब -लिंग - रोग परिचायक विषय, जैसे पूर्वरूप, रूप (साइन्स एंड सिंप्टम्स),  संप्राप्ति (पैथोजेनिसिस)  तथा  उपशयानुपशय  (थिराप्युटिक टेस्ट्स)..— स -औषध (मेडीसिन) ----जिनका ज्ञान परमावश्यक है।
                                ----क्रमश: भाग दो.... 

रविवार, 4 मार्च 2012

इन्द्रधनुष.....अंक -तीन का शेष -----स्त्री-पुरुष विमर्श पर..... डा श्याम गुप्त का का उपन्यास ....

                        


                           ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


      
        ’ इन्द्रधनुष’ ------ स्त्री-पुरुष विमर्श पर एक नवीन दृष्टि प्रदायक उपन्यास (शीघ्र प्रकाश्य ....)....पिछले अंक से क्रमश:......

                                    अंक तीन का शेष  
             यह भी तो प्रेम का ही एक भाव है, सुमि !  एक उत्कृष्ट रूप में,  मीरा व राधा का भी तो प्रेम था ।  यह पराकाष्ठा है प्रेम की । प्रेम को भौतिक रूप में पा लेना कोई इतनी बड़ी बात या उपलब्धि नहीं है, न उससे आपको कोई असाधारण सामाजिक,  भावनात्मक या आध्यात्मिक प्राप्ति ही होती है जिसके लिए सारे बंधन, पारवारिक, सामाजिक मर्यादाएं, नैतिकता की सीमाएं तोडी जायं ।  तमाम कष्ट उठाकर कैरियर दांव पर लगाकर  समाज के ताने-बाने को छिन्न-भिन्न किया जाय ।  हाँ, प्राप्ति के अहं की तुष्टि अवश्य होती है ।  यह अशरीरी प्रेम एक उत्कृष्ट भाव है, परकीया होते हुए भी व्यक्ति को जीवन भर प्रफुल्लित रख सकता है, भक्त -भगवान के भाव की तरह ।
             तुम्ही कह सकते हो यह सब, केजी '।  सुमि भावुक होकर कहती गयी।  सच है,  'फ्रेंडशिप सदा रहती है रिलेशनशिप नहीं ।'  मित्रता चिरजीवी होती है ।
                      "  मन से तो मितवा हम होगये हैं तेरे 
                        क्या ये काफी नहीं है तुम्हारे लिए ।
                       दोस्ती ऊंची मन की बहुत प्यार से,
                       मन की दुनिया है सब कुछ हमारे लिए ।"
मेरी कविता कैसी है, महाकवि  केजी ।
              आखिर शिष्या किसकी बनी हो,  अच्छा चलो अब बताओ राधा व मीरा में कौन श्रेष्ठ है। तुम्हारा क्या ख्याल है ?
               बाप रे ! घुमा फिराकर इतना टेड़ा सवाल ? अपनी तरह ।  दोनों ही श्रेष्ठता की सीमाएं हैं ।  तुम्हारी ही बात को आगे बढाती  हूँ ....'.राधा -प्रेम व विरह दोनों का भाव है, मीरा सिर्फ दरद-दिवाणी है, प्रेम दिवानी है । राधा ने सब कुछ पाया फिर त्यागा । वह त्याग की महानता व पराकाष्ठा है । तभी राधा देवी स्वरूपा होपाई । मीरा बगैर पाए ही प्रेम दीवानी है, दर्द-दीवानी है । पाने का सुख जाने बिना विरह एक अन्य भाव है, भक्ति भाव है । परन्तु पाने के बाद छोड़ने का त्याग -विरह एक अनन्य भाव है । मीरा मानवी ही है ।'
               ' क्या विश्व में, सभ्यता के किसी दौर में, काव्य में, समाज व इतिहास में ...राधा जैसा चरित्र देखा-सुना है । कहीं एसा हुआ है कि परकीया नायिका, प्रेमिका को आदर ही नहीं अपितु देवी स्वरुप में प्रतिष्ठित किया गया हो । यहाँ तक कि पत्नी के स्थान पर देवता के साथ प्रेमिका को पूजा गया हो । यह सात्विक प्रेम की ही कहानी है ।'
               'तो तुम राधा बनना चाहती हो !'
               चाहने से क्या होता है, केजी ।  परिस्थितियाँ ही नियति बनकर व्यक्ति को भवितव्य की ओर धकेलती हैं तथा भविष्य तय करती हैं।  हाँ, व्यक्ति की स्वयं की दृड़ता जो आदर्शों, विचारों, कुल व समाज की स्थिति से बनती है इसमें बहुत प्रभाव डालती है ।
              ' मैं समझ रही हूँ , तुम यह बात क्यों छेड़ रहे हो । तुम क्या कहलाना चाहते हो । परिस्थिति व नियति वश ही मैंने रमेश से प्रेम किया है, शादी का भी इरादा है । आज यद्यपि इस बदली हुई परिस्थित में  मैं तुमको भी पसंद करती हूँ, बदल भी सकती हूँ, तुमसे भी विवाह कर सकती हूँ । परन्तु तुम्हारे ही अनुसार प्रेम में प्रिय को प्राप्त कर लेना उतना महत्वपूर्ण नहीं  है कि बहुत सारे अवांछित पापड बेले जायं ।  यदि मैं तुम्हें प्रेम करते हुए भी ..रमेश से प्रेम विवाह करती हूँ तो क्या मेरे प्रेम की, मित्रता की  महत्ता कम होती है ?  मैं तो राधा भी हूँ, मीरा भी ......। संतुष्ट हो ।'
             ' जी ' 
             'और कुछ पूछना है ?'
             'नहीं जी ' 
           ' व्हाट द हेल '....  ये  जी.. जी   क्या लगा रखी है ? ' वह नाराज़गी से देखने लगी ।
            ' अब राधा  और मीरा से तो सम्मान से ही पेश आना पडेगा न ।' 
            ' धत...यू......।'
           ' वैसे सीता के बारे में आपकी राय ....।
           फिर कभी, अब निकलो यहाँ से,  नहीं तो मार खाजाओगे ।  वह मुझे लगभग धकेलती हुई चल दी ।

                                  **                                 **                                   **

                            छात्र संघ के चुनावों में सचिव, सांस्कृतिक प्रकोष्ठ के पद के लिए सुमित्रा को प्रत्याशी बनाया गया ।  सभी छात्र प्रत्याशी, तरह तरह के प्रचार कार्ड बनवाकर छात्रों में बाँटते थे  । अपने अपने नवीन विचारों, भावों को प्रचार कार्ड के पीछे लिखा जाता था । सुमित्रा प्रसन्न मना व प्रसन्ना बदना दौड़ती हुई आयीं । 
            कृष्ण ! कोई नया आइडिया सोचा जाय, एक दम नवीन । ये सारे कार्ड तो पढ़ कर फैंक दिए जाते हैं । मैं चाहती हूँ एसा कार्ड बने जो फैंका न जा सके, प्रिज़र्व करने लायक हो ।
            'क्या अभी से अमर होने का प्रयास है ।'  मैंने कहा तो वह गंभीर होकर मुझे देखती रह गयी ।
            'मैंने कहा, एक  'बुक-मार्क'  के आकार का कार्ड बनाओ  और उसके पृष्ठ पर किसी इसी अच्छे चिकित्सा विषय की संक्षिप्त गाथा लिख दो कि सब पढ़ें । देखना तुम सालों साल पुस्तकों में प्रिज़र्व रहोगी ।' मैंने सुझाव दिया ।
             सुपर्व..'.मुझे पता था, तुम्हारे पास हर प्रश्न का तुरंत रेडीमेड उत्तर अवश्य रहता है ।'  सुमि ने प्रशंसापूर्वक सर हिलाते हुए कहा । 
             दूसरे दिन सुमित्रा ने अपने प्रचार-पत्र का प्रारूप  लाकर दिखाया ।  पुस्तक-चिन्ह के रूप में कार्ड  के पीछे " श्रवण-पथ "  का संक्षिप्त किन्तु पूर्ण व सारगर्भित वर्णन था ......
                                          
                                           हीयरिंग पाथ वे  ( श्रवण-पथ )
               ' स्टीरियोफोनिक' ( सम्मिश्र ) ध्वनियाँ सुनने के लिए मानव को दो कान दिए गए हैं,  इसी कारण दिशा निर्धारण भी सुगम होता है ।  'पिन्ना' (बाहरी कान ) ध्वनि को केन्द्रित करते हैं तथा यूस्टेकीयन ट्यूब (कर्ण नलिका )  की तरफ भेजते है ।  ध्वनि-श्रोत  ( साउंड ) के समीप की वायु में मशीनी ऊर्जा रूपी तरंगें उत्पन्न होती हैं जो कर्ण-नलिका में प्रवेश करके टिम्पेनम या ईयर-ड्रम ( कान का पर्दा ) को कम्पन देती हैं । ये कम्पन मध्य-कर्ण स्थित तीन छोटी-छोटी अस्थियों --इन्कस, मेलियस, स्टेपीज़  ...द्वारा आतंरिक कर्ण स्थित ' काक्लिया' को कम्पित करती हैं । यहाँ पर कम्पनों की मशीनी ऊर्जा...विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित होकर श्रवण तंत्रिका ( आठवीं केन्द्रीय तंत्रिका नाडी ) के तंतुओं को विद्युत्-प्रवाह सन्देश देती हैं जहां से वे विद्युत-धारा के रूप में ' काक्लियर-केन्द्रक ' होते हुए  ' मेड्यूला '   के  'सुपीरियर  ओलिवरी काम्प्लेक्स ' पहुँच कर  दोनों तरफ के कानों की सूचनाओं का आदान-प्रदान करते हैं ताकि ताल-मेल बना रहे ।  वहां से  ' लेटरल लेमिनिस्कस  '  होते हुए सन्देश  'मध्य मस्तिष्क'  के  'इन्फीरियर कौलीकस'  पहुंचते हैं,  जहां  पुनः दोनों ओर के  कानों के स्नायु ( नर्व-तंतु) -क्रास ओवर होते हैं और अंत में   'मीडियल केलीकुलस'  होते हुए ये संवेदन ध्वनि विद्युत् -प्रवाह   'उच्च-मस्तिष्क' ( सेरीब्रम ) के  'टेम्पोरल लोब'  के   'एकोस्टिक एरिया' ( श्रवण-क्षेत्र ) पहुंचते हैं ;  जहां विद्युत्-रासायनिक प्रक्रियाओं द्वारा इन संवेदी सूचनाओं का विश्लेषण करके उचित उत्तर व आदेश प्रेषित होते हैं  और हम सुनते हैं व प्रतिक्रया व्यक्त करते हैं ।"


               'एक्सीलेंट , सुपर्व, सिम्पली मार्वेलस। यू आर जीनियस सुमि ! ।' क्या आइडिया है । यह तुम्हारा प्रचार-पत्र , बुक-मार्क  सालों साल चिकित्सा-विद्यालय के मन-मानस में, डाक्टरों-छात्रों के साथ अमर बन कर रहेगा ।
             यह आशीर्वाद है !  वह मुस्कुराई,  'किन्तु मूल आइडिया तो तुम्हारा ही था ।',  सुमि ने कहा ।  
            'पर क्रिया रूप में परिणत न होने पर शायद व्यर्थ ही रहता ।' मैंने प्रशंसात्मक नज़रों से कहा, 'बधाई'। 


                                    -----  अंक तीन समाप्त......क्रमश :  अंक चार ...अगली पोस्ट में ...
   
        
 

आज का छिद्रान्वेषण----साहित्यकार -पत्रकार ..साहित्य..कविता ------

                       ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

(" छिद्रान्वेषण " को प्रायः एक अवगुण की भांति देखा जाता है, इसे पर दोष खोजना भी कहा जाता है...(fault finding). परन्तु यदि सभी कुछ ,सभी गुणावगुण भी ईश्वर - प्रकृति द्वारा कृत/ प्रदत्त हैं तो अवगुणों का भी कोई तो महत्त्व होता होगा मानवीय जीवन को उचित रूप से परिभाषित करने में ? जैसे-- न कहना भी एक कला है, हम उनसे अधिक सीखते हैं जो हमारी हाँ में हाँ नहीं मिलाते , 'निंदक नियरे राखिये....' नकारात्मक भावों से ..... आदि आदि ... । मेरे विचार से यदि हम वस्तुओं/ विचारों/उद्घोषणाओं आदि का छिद्रान्वेषण के व्याख्यातत्व द्वारा उन के अन्दर निहित उत्तम व हानिकारक मूल तत्वों का उदघाटन नहीं करते तो उत्तरोत्तर, उपरिगामी प्रगति के पथ प्रशस्त नहीं करते । आलोचनाओं / समीक्षाओं के मूल में भी यही भाव होता है जो छिद्रान्वेषण से कुछ कम धार वाली शब्द शक्तियां  हैं।) प्रस्तुत है  आज का छिद्रान्वेषण---

 
 १-   देखिये सामने वाले समाचार में -- हिन्दी के साहित्यकार -पत्रकार भारत की सांस्कृतिक वैविध्य बचाने के लिए काम होरहा है ...अंग्रेज़ी भाषा में ...' द कंटेसटेड ग्राउंड ऑफ़ कल्चर" विषय पर ।

----वस्तुतः आजकल हर एरा-गेरा पत्रकार , पत्रिका -मैगजीन छापने वाला भी साहित्यकार बन गया है अतः साहित्य में  कूड़े को तो आना  ही है .... हम अपना साहित्य , भाषा व संस्कृति ..अंग्रेज़ी में बहस करके बचायेंगे ??????

2--अब  कविता --कवियों  को  लें .....देखिये साथ के समाचार को.....बिना तलवार कोई सिकंदर बोलता है क्या ....जिस्म को उतार दीजिए तब किसी से प्यार कीजिए ....कोइ शायर मुहब्बत में संभालकर बोलता है क्या ..नींद के मारे हम ठहरे बंजारे...अगर मतलब साढ़े कोइ गधे को बाप कहते हैं .....
-----आप ही बताएं यह कौन सी साहित्यक भाषा है व कौन सा साहित्य है, क्या अर्थ हैं इन पंक्तियों के ....???

३- अब एक और उदाहरण देखिये पत्रकार-साहित्यकारों -समाचार पत्रों के सामाजिक दायित्व का .....निम्न चित्र में   
--------------  आपका साइज़ क्या है ...यह कौन सी भाषा है....आप ही सोचिये.....अब आगे क्या रह गया है .... क्या पैसे के लिए अब न्यूड - मैथुन-रत चित्र ..विज्ञापन ..समाचार भी खुले आम प्रकाशित होंगे पत्रों में ...?????????..... कहाँ जारहे हैं हम...हमारा साहित्य...साहित्यकार -पत्रकार ..????????

बुधवार, 29 फ़रवरी 2012

इन्द्रधनुष.....अंक -तीन.-----स्त्री-पुरुष विमर्श पर..... डा श्याम गुप्त का का उपन्यास ....

                           ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


      
        ’ इन्द्रधनुष’ ------ स्त्री-पुरुष विमर्श पर एक नवीन दृष्टि प्रदायक उपन्यास (शीघ्र प्रकाश्य ....)....पिछले अंक से क्रमश:......

                                           अंक -तीन 

       एनाटोमी डिसेक्शन हाल  की सीट पर मैंने पूछा ,' सुमित्रा जी ,सियाटिक नर्व को कहाँ से निकाला जाय , बिलकुल दिमाग से ही उतर गया है ?
       है भी !, जाने क्या क्या भरे रखते हैं,  दिमाग में ?
       उसने हाथ से चाकू लगभग छीन कर चुपचाप चीरा लगाकर फेसिया तक खोल दिया , बोली ' आगे बढूँ या ...'
         'अभी के लिए बहुत है ', मैंने कहा ,' एक दम आगे बढ़ना ठीक नहीं ...
                  " आपने चिलमन ज़रा सरका दिया ,
                     हमने जीने का  सहारा  पालिया ।"
                   वह चुपचाप अपना प्रेक्टिकल करती रही । बाहर आकर बोली ,' कृष्ण जी उधार बराबर ।'
           'और सूद!', मैंने कहा ।
           'सूद' वह आश्चर्य से देखने लगी !
           ' वणिक पुत्र हूँ ना ।'
           ' क्या सूद चाहिए ?' वह सोचती हुई बोली ।
           'हुम   sss.... चलो दोस्ती करलें,  मैंने कहा ।
            ओह ! वह सीने पर हाथ रखकर निश्वांस छोड़ती हुई बोली , ' ठीक है, मेरा तो नाम ही सुमित्रा है, सुखद-सुहाने मित्रों वाली, स्वयं अच्छी मित्र है जो, जो मित्र बनाती है तो बनाती है;  नहीं तो नहीं ।'
            निभाती भी है ?, मैंने कहा ।
           ' इट डिपेंड्स'...जो जिस लायक हो । सात कदम तो चल ही लिए हैं, वह मुस्कुराकर कहने लगी ।
            'चलो काफी होजाय '  मैंने आमंत्रण दे डाला ।
            काफी टेबल पर बैठकर मैंने उसका हाथ छुआ तो प्रश्नवाचक नज़रों से देख कर बोली ,' उंगली पकड़कर हाथ पकड़ना चाहते हैं ? ऐसे  तो आप नहीं लगते मिस्टर .....।
              ' कृष्ण गोपाल ', मैंने कहा ।
              'पता है, किसी भ्रम या उम्मीद में मत रहना । आशाएं विष की पुड़ियाँ होती हैं, कष्टदायी, बचे रहना ।
              सुमित्रा जी, हमारा भी कुछ आत्म- सम्मान है । वैसे भी मैं नारी-सम्मान व पुरुष-सम्मान दोनों को ही समान  महत्व देता हूँ । नारी का हर रूप मेरे लिए सम्मान जनक है ।  मैं  'नारी तुम केवल श्रृद्धा हो ' के साथ साथ आत्मसम्मान, विश्वास से भरपूर मर्यादित नारी की, पुरुष के  कंधे से कन्धा मिला कर चलती हुई नारी की छवि का कायल हूँ ।  जब तक तुम स्वयं नहीं चाहोगी, मैं कुछ नहीं चाहूंगा ।
               वाह ! क्या बात है । हम खुश हुए । वह वरद-हस्त मुद्रा में मुस्कुराई ।
              सच सुमित्रा, यदि शिक्षा व स्त्री-शिक्षा के इतने प्रचार-प्रसार के पश्चात् भी शोषण व उत्प्रीणन जारी रहे तो क्या लाभ ?  मैं बातें नहीं,  कर्म पर विश्वास करता हूँ, परन्तु यथातथ्य विचारोपरांत ।  यह शोषण-उत्प्रीणन चक्र अब रुकना ही चाहिए ।  पर जब तक  नारी स्वयं आगे नहीं आयेगी, क्या होगा ? नारी-शोषण  में कुछ नारियां ही तो भूमिका में होती हैं ।  आखिर हेलन या बैजयंतीमाला को कौन  विवश करता है अर्धनग्न नृत्य के लिए ?  चंद पैसे ।  क्या आगे चलकर कमाई का यह ज़रिया वैश्यावृत्ति का नया अवतार नहीं बन सकता ।'
               आखिर नारी क्या चाहती है ?  नारी स्वातंत्र्य का क्या अर्थ हो ?  मेरे विचार में स्त्री को भी पुरुषों की भाँति सभी कार्यों की छूट होनी चाहिए । हाँ, साथ ही सामाजिक मर्यादाएं, शास्त्र मर्यादाएं व स्वयं स्त्री सुलभ मर्यादाओं की रक्षा करते हुए स्वतंत्र जीवन का उपभोग करें ।  आखिर पुरुष भी तो स्वतंत्र है, परन्तु शास्त्रीय, सामाजिक व पुरुषोचि मर्यादा निभाये बगैर समाज उसे भी कब आदर देता है ।  वही स्त्री के लिए भी है । भारतीय समाज में प्राणी मात्र के लिए सभी स्वतन्त्रता सदा से ही हैं ।  हाँ, गलत लोग, गलत स्त्री तो हर समाज में सदा से होते आये हैं व रहेंगे ।  इससे सामाजिक संरचना थोड़े ही बुरी होजाती है ।अतः उसे कोसा जाय , यह ठीक नहीं । और  'समाज को बदल डालो'  यह नारा ही अनुचित है अपितु  'स्वयं को बदलो ' नारा होना चाहिए । यही एकमात्र उपाय है आपसी समन्वय का एवं स्त्री-पुरुष, समाज-राष्ट्र की भलाई  व उन्नति का ।
               ब्रेवो! ब्रेवो !, वह ताली बजाती हुई बोली । पर यह भाषण तो मुझे देना चाहिए ।' और हाँ ....वह सोचती हुई बोली, ' ये शब्द व भाव तो कहीं पढ़े हुए लगते हैं ।'
                         " फिजाओं में  भी  गूंजेंगे कभी ये स्वर हमारे,
                          आप चाहें इन स्वरों में हम सजालें सुर तुम्हारे ।"   
               ठहरो, वह बोली,  'आपका पूरा नाम क्या है ?'
              इतनी जल्दी भूल गयीं ? श्री कृष्ण गोपाल गर्ग ।
              हूँ, शायरी, नारी विमर्श पर वही तार्किक भाव-उक्तियाँ ,कथोपकथन, कविता भी .....किसी पत्रिका में पढ़ती रही हूँ ।  कृष्ण गोपाल ..क्या तुम.. 'केजी'  के नाम से  ' नई आवाज ' में लिखते हो ?  तुम 'केजी' हो !...मैं समझती थी कोई मिडिल एज का व्यक्ति होगा ।
           मैं उसकी तीब्र बुद्धि का कायल होकर रह गया, और आँखों में आँखें डाल कर मुस्कुराया ।
           वह हंसी, उन्मुक्त हंसी ।  कमीज की कालर ऊंचे करने के अंदाज़ में बोली,  ' ये हम हैं, उड़ती चिडिया के पर गिन लेते हैं । तो तुम यहाँ क्या कर रहे हो ?  तुम्हें किसी यूनिवर्सिटी में  'प्रोफ़ेसर आफ प्रोफेसी' होना चाहिए।'
             ' भई !  बातों से ही तो  काम नहीं चलता न,  कुछ खाने -पीने का भी तो जुगाड़ होना चाहए । फिर मेडीकल से अच्छा और क्या होसकता है,  बातें की बातें , काम धंधा भी, सेवा भी ....और तुमसे जो मिलना था सिर खपाने के लिए, ताकि पूरा प्रोफ़ेसर बना जा सके ।'  मैंने हंसते हुए कहा ।
              ' आई एम् इम्प्रेस्ड ',  मैं तो केजी की फैन हूँ ।  बधाई, अब कोई कविता सुना ही दो ।'...वह गालों को हथेली पर रखकर, कोहनी मेज पर टिका कर श्रोता वाले अंदाज़ में बैठ गयी ।  मैंने सुनाया....
                              " मैंने सपनों में देखी थी ,
                              इक मधुर सलौनी सी काया ।
                                      *                *
                               अधखिले कमल लतिका जैसी , 
                                अधरों की कलियाँ खिली हुईं ।
                                क्या इन्हें चूम लूं यह कहते,
                                वह होजाती है  छुई - मुई ।
                                         *              *
                               तुमको देखा मैंने पाया,
                               यह तो तुम ही थीं मधुर प्रिये ।।"

             मैं आनंदानुभूति से सरावोर हो गयी हूँ केजी ! वह बोली ।
            तो दोस्ती पक्की ।
             हाँ ।
            क्यों ?
            "ज्ञान वैविध्य, बिना लाग लपेट बातें , नारी सम्मान भाव...नारी मन को छूते हैं,  कृष्ण . और तुम्हें ?
            "तुम्हारा आत्मविश्वास, सुलझे विचार और काव्यानुराग "..मुझे पसंद है सुमित्रा ।
            " कहीं यह ' पहली नज़र में प्यार' .. का मामला तो नहीं बन रहा " ,  अचानक उसने सतर्क निगाहों से पूछा ।
            हाँ शायद,  मैंने कहा ...और तुम....?
            पता नहीं,  नहीं कर सकती , मजबूर हूँ  ।  पर मित्रता से पीछे नहीं हटूंगी ।
           क्यों मज़बूर हो भई ?
           दिल के हाथों ..के जी, जी । तुम पहले क्यों नहीं मिले । मैं वाग्दत्ता हूँ,रमेश को बहुत प्यार करती हूं । शादी भी करूंगी ।...वह अरुणिम होते हुए चेहरे से कहती गयी ।   
           ' ये रमेश कौन भाग्यवान है ?'
           ' मेरा पहला प्यार,  हम एक दूसरे को बहुत चाहते हैं । दिल्ली में एमबीबीएस कर रहा है ।',  उसने पर्स में से फोटो निकाल कर दिखाते हुए कहा,  ' बहुत प्यारा  इंसान है'।    
           'और मैं....?
           "तुम...!...तुम...."  वह जैसे ख्यालों से बाहर आती हुई बोली,  'तुम...तुम हो..अप्रतिम...बौद्धिक सखा...राधा के श्याम ...और मैं तुम्हारी काव्यानुरागिनी, समझे..।'  वह सिर से सिर टकराते हुए बोली ।
            अब मैं आनंदानुभूति से सराबोर हूँ, सुमि !
            साथ छोड़कर भागोगे तो नहीं ?
            नहीं.....
                         " हम तुम चाहे मिल पायं नहीं ,
                           जीवन में न तेरा साथ रहे ।
                           मैं यादों का मधुमास बनूँ ,
                          जो प्रतिपल तेरे साथ रहे ।।" 
          तो क्या देवदास बन जाओगे ? वह हंसी ।
           क्या मैं इतना मूर्ख लगता हूँ ?........
                            " छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए ,
                              यह मुनासिव नहीं आदमी के लिए ।"

                                                         -----क्रमश:......  अंक-तीन का शेष  ..अगली पोस्ट में .....