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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

बुधवार, 14 नवंबर 2012

सृष्टि महाकाव्य..पंचम सर्ग..अशांति खंड ..( भाग १ )....डा श्याम गुप्त

                                 ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ..                            


               





 



सृष्टि महाकाव्य-(ईषत- इच्छा या बिगबेंग--एक अनुत्तरित उत्तर )-- -------वस्तुत सृष्टि हर पल, हर कण कण में होती रहती है, एक सतत क्रिया है , जो ब्रह्म संकल्प-(ज्ञान-ब्रह्मा को ब्रह्म द्वारा ज्ञान) ,ब्रह्म इच्छा-एकोहं...( इच्छा) व सृष्टि (क्रिया- ब्रह्मा रचयिता ) की क्रमिक प्रक्रिया है --किसी भी पल प्रत्येक कण कण में चलती रहती है, जिससे स्रिष्टि व प्रत्येक पदार्थ की उत्पत्ति होती है । प्रत्येक पदार्थ नाश(लय-प्रलय- शिव) की और प्रतिपल उन्मुख है।
 

(यह महाकाव्य अगीत विधामें आधुनिक विज्ञान ,दर्शन व वैदिक-विज्ञान के समन्वयात्मक विषय पर सर्वप्रथम रचित महाकाव्य है , इसमें -सृष्टि की उत्पत्ति, ब्रह्माण्ड व जीवन और मानव की उत्पत्ति के गूढ़तम विषयको सरल भाषा में व्याख्यायित कियागया है | इस .महाकाव्य को हिन्दी साहित्य की अतुकांत कविता की 'अगीत-विधा' के छंद - 'लयबद्ध षटपदी अगीत छंद' -में निवद्ध किया गया है जो एकादश सर्गों में वर्णित है).... ...... रचयिता --डा श्याम गुप्त ...

सृष्टि - अगीत महाकाव्य--पन्चम सर्ग--अशान्ति खन्ड..कुल ३७ छंद --.इस सबसे क्लिष्ट व जटिल सर्ग में साम्य अंतरिक्ष में ॐ की प्रतिध्वनिसे जो हलचल हुई उससे व्यक्त मूल तत्व के कणों में गति से किस तरह से मूल ऊर्जा व अन्य ऊर्जाओं की व अन्य कण-प्रतिकण, फिर विभिन्न पदार्थ, भाव तत्व, शक्तियां , समय , अंतरिक्ष के पिंड आदि की उत्पत्ति हुई, इसका भौतिक, रासायनिक, आणुविक जटिल व जटिलतम प्रक्रियाओं का वर्णन का वैदिक व्याख्या व आधुनिक विज्ञान से तादाम्यीकरण किया गया है ।
            ---
यहाँ हम इसके प्रथम भाग- छंद १ से १३ तक....का वर्णन  करेंगे कि किस तरह से मूल आदि ऊर्जा, मूल कण, न्यूक्लियर ऊर्जा, सौर ऊर्जा,, परमाणु संरचना,धनात्मक, ऋणात्मक आवेशित कणों का संयोग, प्रतिकण, जैविक-अजैविक पदार्थ,प्रकाश आदि के विभिन्न पूर्व परमाणु कण आदि बने ....
१-
परम व्योम की इस अशांति१ से ,
द्वंद्व भाव कण कण में उभरा।
हलचल से गति मिली कणों को,
अपः तत्व में साम्य जगत के।
गति से आहतनाद, फिर बने,
शब्द, वायु ,ऊर्जा ,जल और मन॥
२-
जुः रूपी उस महाकाश में,
यतः रूप गतिशील कणों का;
सूक्ष्म भाव जो मूल अदिति२ का
वायु नाम से प्रवाहमान था।
इन तीनों के मध्य परस्पर,
विद्युत् विभव, अग्नि कहलाया॥
३-
वे प्रथम अजायत अग्नि देव,
गतिमान कणों के संघर्षण से;
ऊर्जा रूप में हुए अवतरित,
शक्ति रूप जो रहते हैं, प्रकृति -
देव ,जड़-जंगम के कण-कण में;
नाभि-रूप हैं सृष्टि-यज्ञ३ के॥
४-
क्रियाशील वे सूक्ष्म आदि कण ,
नाम अंगिरा, अग्निपुत्र थे।
इंद्र नाम संगठक शक्ति से,
रासायनिक संयोग रूप का ,
चेतन अग्नि की उपस्थिति में
किया यज्ञ, परमाणु कण बने॥
५-
परमाणु कणों स्थित ऊर्जा४ में,
भाव नहीं था सतत-सृजन का।
नाभानेदिष्ट ऋषि नाम रूप से,
ज्ञान नाभि-ऊर्जा५ का पाया।
सतत सृजन का भाव लिए तब,
मिला अज़स्र स्रोत ऊर्जा का।
६-
सतत संयोजन और विखंडन,
रूप नाभिकीय ऊर्जा का जो ;
अंतरिक्ष में सौर-शक्ति बन,
नाम अदिति से दिति६ का पाया।
प्रकट रूप है जो पदार्थ की,
पूर्ण कार्य-रूपी ऊर्ज़ा का॥
७-
उस चेतन की ऊर्जा ही है,
मूल स्रोत नाभिक ऊर्जा का;
एक इकाई नाभिक ऊर्जा,
सौर-शक्ति७ से सहस गुना है।
नाभानेदिष्ट ऋषि८ एक गाय९ दे ,
सहस चाहते तभी सूर्य से॥
८-
गौशाला रूपी परमाणु कक्ष ,
रिक्त१० कुछ कणों से जब होता।
इन्द्र, संयोजक शक्ति, सदा ही,
नए कणों रूपी गायों को,
लाकर भर देते गौशाला;
बनाते जाते नए सृष्टि-कण॥
९-
यमी रूप ११ अपभाव भरे कण ,
योग चाहते सजातीय से ।
यम है नियामक शक्ति सृष्टि की,
अनुशासक हैं जड़-जंगम के।
कह देते हम घटक एक से,
विजातीय से मिलो यमी तुम॥
१०-
सम रूपी घटकों के योग से,
प्राप्त तत्व भी वही रहेगा;
विजातीय दो घटक मिलें जब,
नूतन तत्व प्राप्त तब होगा।
अनुशासक यम के नियमन से,
नूतन विविध पदार्थ बन गए॥
११-
प्रतिकण१२ जो हैं स्वयं संगठित,
अति कठोर रासायनिक बंधन से;
रूप राक्षस , विघ्न डालते,
सृष्टि-यज्ञ , रूपी क्रिया में ।
इन्द्र, बज्र१३ से नाश सभी का,
करते रहते, यज्ञ -पूर्ति -हित॥
१२-
अग्नि-पुत्र ,अंगिरा रूप जो,
परमाणु-पूर्व के कण-प्रवाह थे।
रच , यज्ञों१४ की नई श्रृंखला,
इन्द्र शक्ति१५ की कृपा दृष्टि से;
किये उपस्थित नए नए नित ,
विविध ऊर्जा और भूत कण१६ ॥
१३-
सतरंगे अर्यमा, प्रकाश कण,
सप्त स्वरों के वाणी स्वर-कण।
अक्रिय अष्ट बंधन के जैविक१७ ,
आठ वसु और सक्रिय अजैविक-
सात कणों युत सप्तहोत्र१८ , यों,
सभी रूपकण१९ बने सृष्टि के॥ .........पंचम सर्ग..अशांति खंड.आगे ...क्रमश: ....

(
कुंजिका....१=हलचल, प्रक्रिया , क्रिया-प्रतिक्रया ... मूल व्यक्त प्रकृति की साम्य अवस्था भंग होने पर हुई हलचल, २=अदिति- अविभक्त,अखंड मूल स्थिर ऊर्जा, आदि ऊर्जा ....३=सृष्टि सृजन की गूढ़ तात्विक क्रियाएं , ४=परमाणु कणों में स्थित मूल स्थितिक ऊर्जा , ५=नाभिक ऊर्जा, न्यूक्लियर इनर्जी , परमाणु के नाभिक में स्थित अनंत ऊर्जा स्रोत ६=दिति, खंडित, विभक्त, व्यक्त मूल कार्यकारी ऊर्जा ( विखंडन-संयोजन से प्राप्त क्रियाशील ऊर्जा) , ७= सूर्य की सोलर ऊर्जा , ८= नाभिकीय ऊर्जा का ज्ञाता ऋषि , ९=ऊर्जा कण की इकाई , १०=गौशाला रूपी परमाणुओं के वलय में नाभिक के चारों और घूमते हुए इलेक्ट्रोंस की कमी जिससे परमाणु ( व द्रव्य) असंत्रप्त, अस्थिर रहता है, अति क्रियाशील ), ११ = यम-यमी आख्यान ( ऋग्वेद)--यम के संतानें( नियम से बने कण) -यम की बहन यमी यम से समागम करना चाहती है परन्तु यम साफ़ इनकार करते हैं कि किसी अन्य जाति (असुर आदि) से संयोग करो हम तो भाई बहन हैं । ---तात्विक ,रासायनिक प्रक्रिया का सूत्र रूप --अर्थ में सम रूप कणों से ( ऋण -ऋण , धन धन कणों के संयोग से वही तत्व मिलेगा और नवीन पदार्थ नहीं बनेंगे , अतः विजातीय ( असमान , असुर ) पदार्थ या ऊर्जा कणों का आपस में रासायनिक संयोग होना चाहिए जिससे नए नए पदार्थ बनने लगें। यम नियामक शक्ति है और सृष्टि के एक निश्चित नियम के अनुसार ही पदार्थ बनाते हैं। ,,१२=प्रतिकण, प्रत्येक कण का एक प्रति कण , एंटी पार्टीकल ,-रासायनिक प्रक्रिया में बाधक तत्व १३=इन्द्र का बज्र, कठोर रासायनिक बंधनों को तोड़ने वाला उत्प्रेरक तत्व , १४= नयी नयी रासायनिक, भौतिक, इलेक्ट्रोनिक प्रक्रियाएं , १५= संगठन व विखंडन शक्ति , १६= पदार्थ कण , १७=आठ इलेक्ट्रोन वाले संतृप्त सतही जैविक(ओरगेनिक ) परमाणु व पदार्थ , १८= अपनी परमाणु कक्षा में सात इलेक्ट्रोन वाले असंत्रप्त क्रियाशील अजैविक (इनोर्गेनिक), १९= व्यक्त द्रश्य पदार्थ के कण ....)
 
                   क्रमशः --पंचम सर्ग--भाग दो...अगली पोस्ट में ....

रविवार, 11 नवंबर 2012

Let the lamps light,......मुस्कुराइए जलाकर दिए ...... डा श्याम गुप्त..

                                    ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


Let the lamps light

Let the lamps light,
Life comes to be bright.
Let the candles of hope,
Happiness &harmony ignite.

Think of me my dear,
When you light a light.
 Think of me my dear,
When you pray in the night.

The darkness of your heart,
The loneliness of dark.
In  the wilderness of thoughts,
Let the hope spark .

Here comes the dawn of hope,
To do away this night.
Let the lamps light,
Life comes to be bright.




 मुस्कुराइए जलाकर दिए....

दीप खुशियों के जलें ऐसे ,
पुष्प दामन में खिलें जैसे |

 मुस्कुराइए जलाकर दिए,
सामने हम हों खड़े जैसे |

खूब रोशनी हो जीवन में ,
सफलताएं सब मिलें जैसे |

आशा व् उत्साह से पूरित,
जीवन राह में चलें जैसे |

उमंगें व् उल्लास के पौधे,
उर्वरा भूमि में फलें जैसे |

खुश हो लेना कि तरन्नुम में,
श्याम की गज़ल सुनलें जैसे ||
                                                             ------चित्र गूगल साभार

                                          ----------


शनिवार, 10 नवंबर 2012

दीप-पर्व एवं पटाखे व आतिशबाजी और प्रदूषण ....डा श्याम गुप्त ..

                                      ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

              आजकल  यह ट्रेंड बन चला है  कि ज़रा सा--- तथाकथित वैज्ञानिक विचार वाला व्यक्ति, समूह , संस्था-- कुछ पाश्चात्य बातें पढ़ता है ..विशेषकर यदि वे हिन्दू व भारतीय संस्कारों , रीति-रिवाजों, पर्वों , विधियों के बारे में  हैं तो--- तुरंत उनमें खामियां निकालने लगते हैं एवं बुराई की भांति  प्रचार करने में जुट जाते हैं | अभारतीय संस्कृति वाले लोग तो इसमें सम्मिलित होते ही हैं ..कुछ तथाकथित आधुनिक, स्व-संस्कृति पलायनवादी लोग भी जोर-शोर से इस में लग जाते हैं |
आतिशबाजी -दीपावली

आतिशबाजी- सिटी हाल , बाल्टीमोर-यूं एस ऐ  ( चित्र -गूगल - साभार )
        यही बात दीप-पर्व पर पटाखों, आतिशबाजी को लेकर देखी जारही है |
                     यह एक गलत धारणा है कि आतिशबाजी से प्रदूषण होता है ....आतिशबाजी युगों से होरही है और प्रदूषण नहीं होता था ..न हुआ ..आतिशबाजी के प्रकाश, धुंए, ऊष्मा व ध्वनि और रसायनों से ( जो वातावरण के लिए एंटी-सेप्टिक का कार्य करते हैं )  वातावरण से कीट-पतंगे ( जो इस मौसम में अधिक होते हैं),  सूक्ष्म-जीव, बेक्टीरिया-आदि नष्ट होते हैं|  मौसम के संधि-स्थल पर मौसम के अनियमित व्यवहार (कभी गरम-कभी नरम) को सम करते हैं | 
                     यही कार्य सरसों के तेल के दीपक जलाने से होता है | तेल का एंटी-सेप्टिक  प्रभाव ( यज्ञ , हवं, आहुतियाँ  व होलिका दहन आदि की भांति )  वायुमंडल में वाष्पित होकर वातावरण को इन सभी प्रकार के प्रदूषण से मुक्त करता है |  जहां मोमबत्तियाँ  व  आधुनिक विद्युत बल्ब सिर्फ प्रकाश व ऊष्मा का ही प्रभाव देते हैं ....तेल का नहीं |
                    अधिकाँश लोग बिना कुछ जाने घिसी-पिटी कहानियों को दोहराते रहते हैं ..क्योंकि यह 
भारतीयों का / हिंदुओं का पावन पर्व है ...???? खतरनाक व अत्यधिक आवाज व शक्ति 
वाले...बड़ी-बड़ी कंपनियों में बने आधुनिक शक्तिशाली पटाखों आदि को सरकार को स्वतः ही 
सख्ती से बंद कर देना चाहिए |
 
                   जहां तक सांस के रोगी की सांस की बात है वह तो सदा ही इस मौसम के संधि-स्थल पर सामान्यतया अधिक सक्रिय हो जाती है |
                    और दुर्घटनाओं की बात-- वह तो खाना खाने से, मिलावट की मिठाइयां खाने से भी होती रहती हैं तो क्या खाना खाना बंद करदेंगे | मिलावट को बंद कीजिये ..मिठाइयों को नहीं |
            क्या दुनिया भर में, दुनिया के हर देश में  प्रतिवर्ष एवं वर्ष भर होने वाले खेलों, उत्सवों व अन्य पर्वों आदि में जो आतिशबाजी होती है ... उससे प्रदूषण नहीं होता ????
                 हमें वस्तुओं व तथ्यों को सावधानी पूर्वक चयन करना चाहिए .....अनावश्यक  अति-आधुनिकता व अंधविश्वासी छद्म-वैज्ञानिकता  से व उसके व्यावहारिक -चलन से सावधान रहना आवश्यक है |

शुक्रवार, 9 नवंबर 2012

The negative aspects of positive things ...dr shyam gupt

                                        ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

 
                           The negative aspects of positive things

                We have been the country who have learnt..not to see bad, not to listen bad, not to do bad . The doing is all well but why one must not see & listen bad…without which he is not able to think  and do right things, since there may be negative sides of so called & known positive things if not analysed with both aspects .

              The CEO of Coca cola India with  two of his coworkers did a remarkable  thing to develop ‘ eko cool boxes’ to provide cold-fizzy cocacola in rural area of india . These boxes have been distributed  in villages free of cost.  The ekoolboxes work like refrigerators to cool cocacola bottals without electricity as the are cooled by using solar energy. Moreover charging of mobiles, igniting lanterns for light in night etc can also be done using these boxes.

             This has enhanced  the sale of their product in rural India as the have succeeded to let the cocacola enter in remote villages of India , for which these employees would have been ‘CELIBS’ in their company and must have been promoted with post & perks.

             To public & general point of view this seems to be a great  advancement  to ease the life that people of villages too will be able to enjoy the fizzing of cocacola as seen in ads by Hero & Heroins etc. to quench  his thirst in hot summer in India .

      So what is the negative side of such a positive looking advancement ……????

1..Since the sale of coca cola etc is hampered by Indian companies like Amool etc by providing alternate drinks in form of cold-milk, lassi, matthaa etc in urban areas of our country, so now coca cola wishes to spread his foot in villages like this.

2...Our own people ( the workers of multinationals)  are promoting Coca cola , a foreign product having no food value which dis-promote & may replace the local cold drinks …Lassi, Maththa, shervat, Thandai, & tarbooz, kharbooz etc effecting the  local & our own deshi indian market in villages too….just due to greed of their own personal benefits, defying the national interest  the long story of economic interests of multinationals companies is well known to all but not to big salaried multinational indian workars …”WHAT’s better than money “.

                              SO WHAT can be done

                We , our Govt.  local bodies … our village shopkeepers  should accept the developmental instruments…and develop  these ’eko cool boxes’ like ..on their own but decline to use the same for coca cola but for local cold drinks etc. if they want to save  their own local markets and Bazar and commodity.


बुधवार, 7 नवंबर 2012

नव गीत पुराने कलशों में--गीत ----डा श्याम गुप्त...

                               ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


 नव गीत पुराने कलशों में ,
मैं भर कर के ले आया हूँ |
ज्यों विविध व्यंजन नवयुग के,
पत्तल-दौनों में लाया हूँ  |

हैं भाव नए गीतों के पर,
हैं शब्द-छंद प्राचीन विविध |
जैसे हो शुद्ध संग्रहित मधु ,
नव बोतल में भर लाया हूँ |

हो क्रान्ति नव विचारों की, हाँ -
सत्-शुचि अनुभव से अभिसिंचित |
कह  सकें कि युग मंथित स्वर के,
शुचि भाव संजो कर लाया हूँ |

नव पीढ़ी अन्वित नवोन्मेष ,
स्फूर्त व नूतन भाव-तथ्य |
भावित पूर्वजों के अनुभव से,
मज्जित, सज्जित कर लाया हूँ |

युगबोध निमज्जित नहीं रहे ,
कैसी कविता, कैसी गाथा  |
संचित  वे भूत-भविष्य भाव,
हित वर्तमान के लाया हूँ |

नवयुग की आशाओं से युत,
निज संस्कृति के संस्कार सहित |
पग रखें प्रगति के पथ पर हम,
आशा भविष्य की लाया हूँ ||

मंगलवार, 6 नवंबर 2012

गडकरी , आईक्यू , विवेकानंद और दाऊद ....डा श्याम गुप्त

                                          ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


                           गडकरी  ने जो कहा कि... विवेकानंद एवं दाऊद का आई क्यू समान  होने पर भी एक विवेकानंद बना दूसरा अपराधी...क्या अनुचित कहा ?
                         सभी जानते हैं कि आईक्यू का, बुद्धिमत्ता का आचरण से कोई सम्बन्ध नहीं  हैं | सभी बड़े बड़े अपराधी प्रायः बुद्धिमान होते हैं अपितु सब जानते हैं कि बड़े-बड़े वैज्ञानिक आदि कैसे अपराधी में परिवर्तित हो जाते हैं ...इसीलिये शास्त्रों में बुद्धि के विभिन्न भेद बताए गए हैं....प्रज्ञा एवं विवेक को बुद्धि से ऊपर माना गया है ... उसी बुद्धि स्तर का व्यक्ति यदि विवेकहीन हो तो वह अनाचारी, अपराधी बनता है और विवेकवान   (अपितु कम बुद्धिमान या कम आईक्यू वाला विवेकवान  ) सदाचारी व आदरणीय बन जाता है |
                           रावण निश्चय ही राम से अधिक अनुभवी, ज्ञानी व बुद्दिमान, चतुर था | वैदिक ज्ञान से पूर्ण विद्वान एवं एक संहिता का रचयिता, कुशल योद्धा, नीतिज्ञ, वैज्ञानिक, उच्च सभ्यता ( परन्तु भौतिकता से ओत -प्रोत)  का साधक   ...परन्तु विवेकहीनता,  अनाचारिता, अति-भौतिकता जनित अहं  के कारण वह राक्षस कहलाया और विवेकशीलता, सदाचार, समन्वयक सभ्यता-संस्कृति  के कारण राम विजेता भी हुए और भगवान भी कहलाये |
                           इससे यही सिद्ध होता है कि हमारे नेता, राजनीतिज्ञ यहाँ तक मीडिया एवं जन सामान्य भी वास्तविकता से परे जाकर लकीर के फ़कीर की भांति तथ्य को राजनैतिक चश्मे से देखकर अनायास ही बात का बतंगड बना देते हैं |

सोमवार, 5 नवंबर 2012

सृष्टि महाकाव्य-चतुर्थ सर्ग-( संकल्प खंड )-- --डा श्याम गुप्त.....

                                 ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...




सृष्टि - अगीत महाकाव्य--

(यह महाकाव्य अगीत विधामें आधुनिक विज्ञान ,दर्शन व वैदिक-विज्ञान के समन्वयात्मक विषय पर सर्वप्रथम रचित महाकाव्य है , इसमें -सृष्टि की उत्पत्ति, ब्रह्माण्ड व जीवन और मानव की उत्पत्ति के गूढ़तम विषयको सरल भाषा में व्याख्यायित कियागया है | इस .महाकाव्य को हिन्दी साहित्य की अतुकांत कविता की 'अगीत-विधा' के छंद - 'लयबद्ध षटपदी छंद' -में
निवद्ध किया गया है जो एकादश सर्गों में वर्णित है).... ...... रचयिता --डा श्याम गुप्त ...

चतुर्थ सर्ग-( संकल्प खंड )--
प्रस्तुत खंड में- वैदिक विज्ञान के अनुसार ईश-तत्व, जिसे विभिन्न नामों से पुकारा जाता है, किस प्रकार व क्यों सृष्टि का संकल्प करता है एवं लय व सृष्टि के क्रम के अनुसार न तो कुछ नया बनता है न नष्ट होता है, मूल पदार्थ अविनाशी है बस रूप बदलता है, इस दर्शन( अब आधुनिक विज्ञान के अनुसार भी) का वर्णन एवं आदि-सृष्टि कणों के उत्पादन की प्रक्रिया का, इससे समस्त सृष्टि हुई, प्रारम्भ दिखाया गया है |...
१-
बाद प्रलय के, सृष्टि से पहले,
वह ईशतत्व १ वह वेन२-विराट;
परमात्वभाव३ , ऋत४ ,ज्येष्ठ ब्रह्म ५ ,
चेतन६ , जिसकी प्रतिमा न कोई।
वह एक अकेला ही स्थित था;
वह कौन,कहाँ था, किसे पता ?
२-
वह होता है सदा उपस्थित ,
व्यक्ता-व्यक्त, बस रूप बदलकर।
प्रलय,सृष्टि या साम्यकाल में,
कुछ नया न बनता,नष्ट न होता।
सदाधार ७, वह मूल इसलिए,
सद भी है, वह नासद भी है॥
३-
वह आच्छादित रहता सब में,
सब अन्तर्निहित उसी में है।
सद-नासद, प्रकृति-पुरुष सभी,
इस कारण-ब्रह्म ८ में निहित रहें।
वह सदा अकर्मा, अविनाशी ,
परे सभी से, केवल दृष्टा॥
४ -
वह था, है, होता है या नहीं,
कब कौन कहाँ यह समझ सका।
वह हिरण्यगर्भ या अपः मूल,
वे देव प्रकृति ऋषि ज्ञान सभी ;
 
 हैं व्याप्त उसी में, फिर कैसे,
वे भला जान पायें उसको॥
५-
उस पार-ब्रह्म को ऋषियों ने,
आत्मानुभूति से पहचाना।
पाया और अन्तर्निहित किया,
ज़ाना समझा गाया व लिखा।
अनुभव से यज्ञ की वेदी पर,
वे गीत उसी के गाते हैं॥
६-
कर्म रूप में, भोग हेतु और,
मुक्ति हेतु उस जीवात्मा के।
आत्मबोध से वह परात्पर,
या अक्रिय असत चेतन सत्ता;
अव्यक्त स्वयंभू ९ या परिभू १० ,
ने किया भाव-संकल्प सृष्टि हित॥
७-
हिरण्यगर्भ, सतब्रह्म, सक्रिय-चेतन ,
या व्यक्त रूप, अव्यक्त असत का।
हुआ उपस्थित, स्वयं भाव से,
सक्रियसत्व११,उस अक्रियतत्व१२ का।
चिदाकाश में , ॐ १३ रूप में,
वह निःसंग ही स्वयं व्यक्त था॥
८-
जीव प्रकृति सद-नासद, चेतन,
मूल अपः, अव्यक्त भाव में।
सत तम रज के साम्यरूप में,
स्थित थे उस हिरण्यगर्भ में।
कार्य रूप, उस कारण का, जो -
कारण रूप,सृष्टि और लय का॥
९-
मनः रेत संकल्प कर्म, जो-
प्रथम काम-संकल्प जगत का।
सृष्टि-प्रवृत्ति की ईषत-इच्छा,
"एकोहं बहुस्याम"१४ रूप में ।
महाकाश में हुई प्रतिध्वनित ,
हिरण्यगर्भ के सगुण भाव से॥
१०-
मूल प्रकृति अव्यक्त भाव में,
अन्तर्निहित जो हिरण्यगर्भ में ।
 हुई अवतरित व्यक्त भाव बन,
रूप-सृष्टि१५ की मूल ऊर्जा, जो-
सत तम रज साम्यावस्था में,
थी स्थित उस शांत प्रकृति१६ में॥
११-
उस अनंत की ईषत इच्छा,
उभरी बन कर ॐ रूप में ।
महाकाश का नाद-अनाहत१७।
 स्पंदन तब हुआ कणों में,
भंग हुई तब साम्यावस्था,
साम्य प्रकृति के,साम्य कणों की॥
१२-
स्पंदन से, साम्य कणों के,
अक्रिय अपः, होगया सक्रिय सत।
हलचल से और द्वंद्व-भाव से ,
सक्रिय कणों के, बनी भूमिका-
सृष्टि-कणों के उत्पादन की ;
महाकाश की उस अशांति१८ में॥ .... .................क्रमश:...


{ कुंजिका---१ से ६ तक=निराकार परब्रह्म , अक्रिय -असद-असत , परमतत्व के विभिन्न नाम ; ७=सबका मूल आधार ; ८=कारणों का कारण पूर्ण ब्रह्म, पर-ब्रह्म ( वही १ से ७ तक); ९= स्वयं उत्पन्न ; १०= सब में छाया हुआ , सब को आच्छादित करता हुआ ; ११= सक्रिय हुआ परम तत्व( हिरण्य गर्भ, व्यक्त ईश्वर ) ; १२=अक्रिय मूल परमात्व तत्व जो हिरण्यगर्भ रूप में सक्रिय हुआ; १३= अंतरक्ष में उद्भूत प्रथम मूल अनाहत नाद ( स्वयम उत्पन्न आदि ध्वनि ..ओउम); १४=अब में एक से बहुत होजाऊँ , ईश्वर का आदि सृष्टि संकल्प); १५= वास्तविक पदार्थ रचना; १६= व्यक्त मूल प्रकृति की शांत, साम्य, अवस्था ,बिना किसी गति ,हलचल के ; १७=बिना टकराव के उत्पन्न ईश्वरीय आदि ध्वनि..ॐ ध्वनि जो समस्त व्यक्त अंतरिक्ष में ध्वनित होती है और साम्य प्रकृति की शांत अवस्था-व्यवस्था को भंग करके सृष्टि-सृजन का प्रक्रिया के प्रारम्भ का कारण बनती है; १८= व्यक्त मूल प्रकृति की शांत व साम्य अवस्था के भंग होने से उत्पन्न हल-चल--क्रिया-प्रक्रिया , जिससे सृष्टि-क्रम प्रारम्भ होता है | }

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                                           क्रमश:  पंचम् सर्ग ...अगली पोस्ट में