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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...
- shyam gupta
- Lucknow, UP, India
- एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त
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रविवार, 25 नवंबर 2012
सोमवार, 5 नवंबर 2012
सृष्टि महाकाव्य-चतुर्थ सर्ग-( संकल्प खंड )-- --डा श्याम गुप्त.....
....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

सृष्टि - अगीत महाकाव्य--
(यह महाकाव्य अगीत विधामें आधुनिक विज्ञान ,दर्शन व वैदिक-विज्ञान के समन्वयात्मक विषय पर सर्वप्रथम रचित महाकाव्य है , इसमें -सृष्टि की उत्पत्ति, ब्रह्माण्ड व जीवन और मानव की उत्पत्ति के गूढ़तम विषयको सरल भाषा में व्याख्यायित कियागया है | इस .महाकाव्य को हिन्दी साहित्य की अतुकांत कविता की 'अगीत-विधा' के छंद - 'लयबद्ध षटपदी छंद' -में निवद्ध किया गया है जो एकादश सर्गों में वर्णित है).... ...... रचयिता --डा श्याम गुप्त ...
चतुर्थ सर्ग-( संकल्प खंड )--प्रस्तुत खंड में- वैदिक विज्ञान के अनुसार ईश-तत्व, जिसे विभिन्न नामों से पुकारा जाता है, किस प्रकार व क्यों सृष्टि का संकल्प करता है एवं लय व सृष्टि के क्रम के अनुसार न तो कुछ नया बनता है न नष्ट होता है, मूल पदार्थ अविनाशी है बस रूप बदलता है, इस दर्शन( अब आधुनिक विज्ञान के अनुसार भी) का वर्णन एवं आदि-सृष्टि कणों के उत्पादन की प्रक्रिया का, इससे समस्त सृष्टि हुई, प्रारम्भ दिखाया गया है |...
१-
बाद प्रलय के, सृष्टि से पहले,
वह ईशतत्व १ वह वेन२-विराट;
परमात्वभाव३ , ऋत४ ,ज्येष्ठ ब्रह्म ५ ,
चेतन६ , जिसकी प्रतिमा न कोई।
वह एक अकेला ही स्थित था;
वह कौन,कहाँ था, किसे पता ?
२-
वह होता है सदा उपस्थित ,
व्यक्ता-व्यक्त, बस रूप बदलकर।
प्रलय,सृष्टि या साम्यकाल में,
कुछ नया न बनता,नष्ट न होता।
सदाधार ७, वह मूल इसलिए,
सद भी है, वह नासद भी है॥
३-
वह आच्छादित रहता सब में,
सब अन्तर्निहित उसी में है।
सद-नासद, प्रकृति-पुरुष सभी,
इस कारण-ब्रह्म ८ में निहित रहें।
वह सदा अकर्मा, अविनाशी ,
परे सभी से, केवल दृष्टा॥
४ -
वह था, है, होता है या नहीं,
कब कौन कहाँ यह समझ सका।
वह हिरण्यगर्भ या अपः मूल,
वे देव प्रकृति ऋषि ज्ञान सभी ;

सृष्टि - अगीत महाकाव्य--
(यह महाकाव्य अगीत विधामें आधुनिक विज्ञान ,दर्शन व वैदिक-विज्ञान के समन्वयात्मक विषय पर सर्वप्रथम रचित महाकाव्य है , इसमें -सृष्टि की उत्पत्ति, ब्रह्माण्ड व जीवन और मानव की उत्पत्ति के गूढ़तम विषयको सरल भाषा में व्याख्यायित कियागया है | इस .महाकाव्य को हिन्दी साहित्य की अतुकांत कविता की 'अगीत-विधा' के छंद - 'लयबद्ध षटपदी छंद' -में निवद्ध किया गया है जो एकादश सर्गों में वर्णित है).... ...... रचयिता --डा श्याम गुप्त ...
चतुर्थ सर्ग-( संकल्प खंड )--प्रस्तुत खंड में- वैदिक विज्ञान के अनुसार ईश-तत्व, जिसे विभिन्न नामों से पुकारा जाता है, किस प्रकार व क्यों सृष्टि का संकल्प करता है एवं लय व सृष्टि के क्रम के अनुसार न तो कुछ नया बनता है न नष्ट होता है, मूल पदार्थ अविनाशी है बस रूप बदलता है, इस दर्शन( अब आधुनिक विज्ञान के अनुसार भी) का वर्णन एवं आदि-सृष्टि कणों के उत्पादन की प्रक्रिया का, इससे समस्त सृष्टि हुई, प्रारम्भ दिखाया गया है |...
१-
बाद प्रलय के, सृष्टि से पहले,
वह ईशतत्व १ वह वेन२-विराट;
परमात्वभाव३ , ऋत४ ,ज्येष्ठ ब्रह्म ५ ,
चेतन६ , जिसकी प्रतिमा न कोई।
वह एक अकेला ही स्थित था;
वह कौन,कहाँ था, किसे पता ?
२-
वह होता है सदा उपस्थित ,
व्यक्ता-व्यक्त, बस रूप बदलकर।
प्रलय,सृष्टि या साम्यकाल में,
कुछ नया न बनता,नष्ट न होता।
सदाधार ७, वह मूल इसलिए,
सद भी है, वह नासद भी है॥
३-
वह आच्छादित रहता सब में,
सब अन्तर्निहित उसी में है।
सद-नासद, प्रकृति-पुरुष सभी,
इस कारण-ब्रह्म ८ में निहित रहें।
वह सदा अकर्मा, अविनाशी ,
परे सभी से, केवल दृष्टा॥
४ -
वह था, है, होता है या नहीं,
कब कौन कहाँ यह समझ सका।
वह हिरण्यगर्भ या अपः मूल,
वे देव प्रकृति ऋषि ज्ञान सभी ;
हैं व्याप्त उसी में, फिर कैसे,
वे भला जान पायें उसको॥
५-
उस पार-ब्रह्म को ऋषियों ने,
आत्मानुभूति से पहचाना।
पाया और अन्तर्निहित किया,
ज़ाना समझा गाया व लिखा।
अनुभव से यज्ञ की वेदी पर,
वे गीत उसी के गाते हैं॥
६-
कर्म रूप में, भोग हेतु और,
मुक्ति हेतु उस जीवात्मा के।
आत्मबोध से वह परात्पर,
या अक्रिय असत चेतन सत्ता;
अव्यक्त स्वयंभू ९ या परिभू १० ,
ने किया भाव-संकल्प सृष्टि हित॥
७-
हिरण्यगर्भ, सतब्रह्म, सक्रिय-चेतन ,
या व्यक्त रूप, अव्यक्त असत का।
हुआ उपस्थित, स्वयं भाव से,
सक्रियसत्व११,उस अक्रियतत्व१२ का।
चिदाकाश में , ॐ १३ रूप में,
वह निःसंग ही स्वयं व्यक्त था॥
८-
जीव प्रकृति सद-नासद, चेतन,
मूल अपः, अव्यक्त भाव में।
सत तम रज के साम्यरूप में,
स्थित थे उस हिरण्यगर्भ में।
कार्य रूप, उस कारण का, जो -
कारण रूप,सृष्टि और लय का॥
९-
मनः रेत संकल्प कर्म, जो-
प्रथम काम-संकल्प जगत का।
सृष्टि-प्रवृत्ति की ईषत-इच्छा,
"एकोहं बहुस्याम"१४ रूप में ।
महाकाश में हुई प्रतिध्वनित ,
हिरण्यगर्भ के सगुण भाव से॥
१०-
मूल प्रकृति अव्यक्त भाव में,
अन्तर्निहित जो हिरण्यगर्भ में ।
वे भला जान पायें उसको॥
५-
उस पार-ब्रह्म को ऋषियों ने,
आत्मानुभूति से पहचाना।
पाया और अन्तर्निहित किया,
ज़ाना समझा गाया व लिखा।
अनुभव से यज्ञ की वेदी पर,
वे गीत उसी के गाते हैं॥
६-
कर्म रूप में, भोग हेतु और,
मुक्ति हेतु उस जीवात्मा के।
आत्मबोध से वह परात्पर,
या अक्रिय असत चेतन सत्ता;
अव्यक्त स्वयंभू ९ या परिभू १० ,
ने किया भाव-संकल्प सृष्टि हित॥
७-
हिरण्यगर्भ, सतब्रह्म, सक्रिय-चेतन ,
या व्यक्त रूप, अव्यक्त असत का।
हुआ उपस्थित, स्वयं भाव से,
सक्रियसत्व११,उस अक्रियतत्व१२ का।
चिदाकाश में , ॐ १३ रूप में,
वह निःसंग ही स्वयं व्यक्त था॥
८-
जीव प्रकृति सद-नासद, चेतन,
मूल अपः, अव्यक्त भाव में।
सत तम रज के साम्यरूप में,
स्थित थे उस हिरण्यगर्भ में।
कार्य रूप, उस कारण का, जो -
कारण रूप,सृष्टि और लय का॥
९-
मनः रेत संकल्प कर्म, जो-
प्रथम काम-संकल्प जगत का।
सृष्टि-प्रवृत्ति की ईषत-इच्छा,
"एकोहं बहुस्याम"१४ रूप में ।
महाकाश में हुई प्रतिध्वनित ,
हिरण्यगर्भ के सगुण भाव से॥
१०-
मूल प्रकृति अव्यक्त भाव में,
अन्तर्निहित जो हिरण्यगर्भ में ।
हुई अवतरित व्यक्त भाव बन,
रूप-सृष्टि१५ की मूल ऊर्जा, जो-
सत तम रज साम्यावस्था में,
थी स्थित उस शांत प्रकृति१६ में॥
११-
उस अनंत की ईषत इच्छा,
उभरी बन कर ॐ रूप में ।
महाकाश का नाद-अनाहत१७।
रूप-सृष्टि१५ की मूल ऊर्जा, जो-
सत तम रज साम्यावस्था में,
थी स्थित उस शांत प्रकृति१६ में॥
११-
उस अनंत की ईषत इच्छा,
उभरी बन कर ॐ रूप में ।
महाकाश का नाद-अनाहत१७।
स्पंदन तब हुआ कणों में,
भंग हुई तब साम्यावस्था,
साम्य प्रकृति के,साम्य कणों की॥
१२-
स्पंदन से, साम्य कणों के,
अक्रिय अपः, होगया सक्रिय सत।
हलचल से और द्वंद्व-भाव से ,
सक्रिय कणों के, बनी भूमिका-
सृष्टि-कणों के उत्पादन की ;
महाकाश की उस अशांति१८ में॥ .... .................क्रमश:...
{ कुंजिका---१ से ६ तक=निराकार परब्रह्म , अक्रिय -असद-असत , परमतत्व के विभिन्न नाम ; ७=सबका मूल आधार ; ८=कारणों का कारण पूर्ण ब्रह्म, पर-ब्रह्म ( वही १ से ७ तक); ९= स्वयं उत्पन्न ; १०= सब में छाया हुआ , सब को आच्छादित करता हुआ ; ११= सक्रिय हुआ परम तत्व( हिरण्य गर्भ, व्यक्त ईश्वर ) ; १२=अक्रिय मूल परमात्व तत्व जो हिरण्यगर्भ रूप में सक्रिय हुआ; १३= अंतरक्ष में उद्भूत प्रथम मूल अनाहत नाद ( स्वयम उत्पन्न आदि ध्वनि ..ओउम); १४=अब में एक से बहुत होजाऊँ , ईश्वर का आदि सृष्टि संकल्प); १५= वास्तविक पदार्थ रचना; १६= व्यक्त मूल प्रकृति की शांत, साम्य, अवस्था ,बिना किसी गति ,हलचल के ; १७=बिना टकराव के उत्पन्न ईश्वरीय आदि ध्वनि..ॐ ध्वनि जो समस्त व्यक्त अंतरिक्ष में ध्वनित होती है और साम्य प्रकृति की शांत अवस्था-व्यवस्था को भंग करके सृष्टि-सृजन का प्रक्रिया के प्रारम्भ का कारण बनती है; १८= व्यक्त मूल प्रकृति की शांत व साम्य अवस्था के भंग होने से उत्पन्न हल-चल--क्रिया-प्रक्रिया , जिससे सृष्टि-क्रम प्रारम्भ होता है | }
,
क्रमश: पंचम् सर्ग ...अगली पोस्ट में
भंग हुई तब साम्यावस्था,
साम्य प्रकृति के,साम्य कणों की॥
१२-
स्पंदन से, साम्य कणों के,
अक्रिय अपः, होगया सक्रिय सत।
हलचल से और द्वंद्व-भाव से ,
सक्रिय कणों के, बनी भूमिका-
सृष्टि-कणों के उत्पादन की ;
महाकाश की उस अशांति१८ में॥ .... .................क्रमश:...
{ कुंजिका---१ से ६ तक=निराकार परब्रह्म , अक्रिय -असद-असत , परमतत्व के विभिन्न नाम ; ७=सबका मूल आधार ; ८=कारणों का कारण पूर्ण ब्रह्म, पर-ब्रह्म ( वही १ से ७ तक); ९= स्वयं उत्पन्न ; १०= सब में छाया हुआ , सब को आच्छादित करता हुआ ; ११= सक्रिय हुआ परम तत्व( हिरण्य गर्भ, व्यक्त ईश्वर ) ; १२=अक्रिय मूल परमात्व तत्व जो हिरण्यगर्भ रूप में सक्रिय हुआ; १३= अंतरक्ष में उद्भूत प्रथम मूल अनाहत नाद ( स्वयम उत्पन्न आदि ध्वनि ..ओउम); १४=अब में एक से बहुत होजाऊँ , ईश्वर का आदि सृष्टि संकल्प); १५= वास्तविक पदार्थ रचना; १६= व्यक्त मूल प्रकृति की शांत, साम्य, अवस्था ,बिना किसी गति ,हलचल के ; १७=बिना टकराव के उत्पन्न ईश्वरीय आदि ध्वनि..ॐ ध्वनि जो समस्त व्यक्त अंतरिक्ष में ध्वनित होती है और साम्य प्रकृति की शांत अवस्था-व्यवस्था को भंग करके सृष्टि-सृजन का प्रक्रिया के प्रारम्भ का कारण बनती है; १८= व्यक्त मूल प्रकृति की शांत व साम्य अवस्था के भंग होने से उत्पन्न हल-चल--क्रिया-प्रक्रिया , जिससे सृष्टि-क्रम प्रारम्भ होता है | }
,
क्रमश: पंचम् सर्ग ...अगली पोस्ट में
मंगलवार, 26 अक्टूबर 2010
करवा चौथ --हमारे पर्व , अर्थशास्त्र और बाज़ार---
उत्सव प्रियः मानवाः --वास्तव में तो सभी भारतीय पर्व, उत्सव , आदि प्राचीन भारतीय समाज के -मनोरंजन केसाथ अर्थशास्त्र - के सैद्दांतिक -व्यवहारिक कृतित्व हैं जो बाज़ार व अर्थशास्त्र की आवश्यकताओं के अनुसार विस्तार भी पाते रहते हैं। । अब करवाचौथ को लीजिये । वास्तव में तो कर्म कांडी व्रतों का वैदिक साहित्य में वर्णन नहीं है , ब्रतों का अर्थ संकल्प होता है और करवा चौथ पर पति-पत्नी दोनों को ही संकल्प लेना होता है कि हम सदा तादाम्य सेरहेंगे, एक दूसरे के प्रति सम्पूर्ण भाव से समर्पित रहेंगे , पाणि ग्रहण के समय लिए हुए बचनों का पालन करेंगे।
------कालान्तर में अर्थशास्त्र व बाज़ार की आवश्यकतानुसार( समय परवर्तन ,युग के अनुसार निष्ठा व ज्ञान ,कर्तव्य व मानवीय विश्वास की कमी से भी ) उसमें करवा, चन्द्रमा, पति की आयु वृद्धि, अर्ध्य , उपवास आदि के भाव जोड़ दिए गए। सामाजिक -पारिवारिक सौहार्द के पहलू हित -सरगी , सास के लिए बायना, बधू से मायके से बधू के घर उपहार आदि भेजना प्रारम्भ किया गया ; जो बाद में कठोर कुप्रथाओं में परिवर्तित होता गया । पहले मिट्टी का करवा अनिवार्य होता था ताकि कुम्भ्कारों का भी काम चलता रहे , और प्रगति होने पर शक्कर - चीनी के, धातु के , चांदी के करवे व अन्य ताम-झाम भी चलने लगे ताकि बाज़ार का अर्थशास्त्र चलता रहे ,हाँ, पीछे दिखावा, अधिक प्राप्ति आदि की मानसिकता भी बढ़ती गयी।
आजकलके वैज्ञानिक युग में भी - समाचार पत्रों, टीवी, आदि में करवा चौथ पर सोना -चांदी के व अन्य सभी के विज्ञापनों , छूट, कैसे करें , क्या पहने, कैसे पूजा करें , किसको किस किस बस्तु से पूजा रानी चाहिए , अपने उन को खुश रखिये आदि की भरमार रहती है क्यों -जबकि वैज्ञानिक युग के नव-युवा,पढेलिखे पुरुष/ महिलाएं इसे आवश्यक/अपरिहार्य नहीं मानते समझते अपितु व्यर्थ की खानापूरी भी मानते हैं |---यह अर्थशास्त्र व बाज़ार के ही लिए तो -चाहे स्त्रियों पर कठोरता होती हो या सामाजिक -मानसिक प्रतारणा व मानवीय शोषण |
-----हाँ इसके साथ साथ चाहे बाज़ार -भाव के कारण ही सही --पुरुषों के लिए भी विज्ञापन आरहे हैं ----
पत्नी करवा चौथ व्रत रख रही है आपकी लम्बी आयु के लिए अब आपकी बारी है --उपहार देने की ---और यह एक अच्छी बात है।
------कालान्तर में अर्थशास्त्र व बाज़ार की आवश्यकतानुसार( समय परवर्तन ,युग के अनुसार निष्ठा व ज्ञान ,कर्तव्य व मानवीय विश्वास की कमी से भी ) उसमें करवा, चन्द्रमा, पति की आयु वृद्धि, अर्ध्य , उपवास आदि के भाव जोड़ दिए गए। सामाजिक -पारिवारिक सौहार्द के पहलू हित -सरगी , सास के लिए बायना, बधू से मायके से बधू के घर उपहार आदि भेजना प्रारम्भ किया गया ; जो बाद में कठोर कुप्रथाओं में परिवर्तित होता गया । पहले मिट्टी का करवा अनिवार्य होता था ताकि कुम्भ्कारों का भी काम चलता रहे , और प्रगति होने पर शक्कर - चीनी के, धातु के , चांदी के करवे व अन्य ताम-झाम भी चलने लगे ताकि बाज़ार का अर्थशास्त्र चलता रहे ,हाँ, पीछे दिखावा, अधिक प्राप्ति आदि की मानसिकता भी बढ़ती गयी।
आजकलके वैज्ञानिक युग में भी - समाचार पत्रों, टीवी, आदि में करवा चौथ पर सोना -चांदी के व अन्य सभी के विज्ञापनों , छूट, कैसे करें , क्या पहने, कैसे पूजा करें , किसको किस किस बस्तु से पूजा रानी चाहिए , अपने उन को खुश रखिये आदि की भरमार रहती है क्यों -जबकि वैज्ञानिक युग के नव-युवा,पढेलिखे पुरुष/ महिलाएं इसे आवश्यक/अपरिहार्य नहीं मानते समझते अपितु व्यर्थ की खानापूरी भी मानते हैं |---यह अर्थशास्त्र व बाज़ार के ही लिए तो -चाहे स्त्रियों पर कठोरता होती हो या सामाजिक -मानसिक प्रतारणा व मानवीय शोषण |
-----हाँ इसके साथ साथ चाहे बाज़ार -भाव के कारण ही सही --पुरुषों के लिए भी विज्ञापन आरहे हैं ----
पत्नी करवा चौथ व्रत रख रही है आपकी लम्बी आयु के लिए अब आपकी बारी है --उपहार देने की ---और यह एक अच्छी बात है।
मंगलवार, 26 जनवरी 2010
गणतंत्र दिवस पर --कार्य, कारण व प्रभाव गीत --कितने दीपक जल उठते हैं
कितने दीपक जल उठते हैं
(कारण ,कार्य व प्रभाव गीत --इस नवल धारा गीत में - एक कारण या कार्य दिया जाता है व उसके प्रभाव वर्णन किये जाते हैं )
जब गणतंत्र दिवस का पावन,
परम पुनीत पर्व आता है।
हर्षित जन जन गण के मन में,
नवल तिरंगा लहरा उठता।
नव उन्नति नव कर्म भाव युत,
कितने दीपक जल उठते हैं।। १.
लहर लहर लहराए तिरंगा ,
मुक्त गगन में इठलाता है।
मिटे अशिक्षा और गरीबी ,
आस पल्लवित होती मन में।
राष्ट्र प्रेम के विविध भाव युत,
कितने दीपक जल उठते हैं ॥ २.
अहं भाव से ग्रस्त शत्रु जब,
देश पै आँख गड़ाने लगता।
वीरों के नयनों में दीपित,
रक्त खौलने लग जाता है।
जन गण मन में शौर्य भाव के,
कितने दीपक जल उठते हैं॥ ३.
अन्धकार पर प्रकाश की जय,
का दीपावल पर्व सुहाता।
धन समृद्धि सौभाग्य वर्धन को,
गणेश लक्ष्मी पूजन होता।
जग जीवन से तमस मिटाने,
कितने दीपक जल उठते हैं॥ ४.
मन में प्रियतम का मधुरिम स्वर,
नव जीवन मुखरित कर देता।
आस और आकांक्षाओं के ,
नित नव भाव पल्लवित होते।
नेह का घृत, इच्छा-बाती युत,
कितने दीपक जल उठते हैं॥ ५.
दीपशिखा सम छवि प्रेयसि की,
जब नयनों में रच-बस जाती।
मधुर मिलन के स्वप्निल पल की ,
रेखा सी मन में खिंच जाती ।
नयनों में सुन्दर सपनों के,
कितने दीपक जल उठते हैं॥ ६.
जब अज्ञान तिमिर छंट जाता,
ज्ञान की ज्योति निखर उठती है।
नए नए विज्ञान-ज्ञान की,
नित नव राहें दीपित होतीं ।
मन में नव संकल्प भाव के ,
कितने दीपक जल उठते हैं ॥ ७.
(कारण ,कार्य व प्रभाव गीत --इस नवल धारा गीत में - एक कारण या कार्य दिया जाता है व उसके प्रभाव वर्णन किये जाते हैं )
जब गणतंत्र दिवस का पावन,
परम पुनीत पर्व आता है।
हर्षित जन जन गण के मन में,
नवल तिरंगा लहरा उठता।
नव उन्नति नव कर्म भाव युत,
कितने दीपक जल उठते हैं।। १.
लहर लहर लहराए तिरंगा ,
मुक्त गगन में इठलाता है।
मिटे अशिक्षा और गरीबी ,
आस पल्लवित होती मन में।
राष्ट्र प्रेम के विविध भाव युत,
कितने दीपक जल उठते हैं ॥ २.
अहं भाव से ग्रस्त शत्रु जब,
देश पै आँख गड़ाने लगता।
वीरों के नयनों में दीपित,
रक्त खौलने लग जाता है।
जन गण मन में शौर्य भाव के,
कितने दीपक जल उठते हैं॥ ३.
अन्धकार पर प्रकाश की जय,
का दीपावल पर्व सुहाता।
धन समृद्धि सौभाग्य वर्धन को,
गणेश लक्ष्मी पूजन होता।
जग जीवन से तमस मिटाने,
कितने दीपक जल उठते हैं॥ ४.
मन में प्रियतम का मधुरिम स्वर,
नव जीवन मुखरित कर देता।
आस और आकांक्षाओं के ,
नित नव भाव पल्लवित होते।
नेह का घृत, इच्छा-बाती युत,
कितने दीपक जल उठते हैं॥ ५.
दीपशिखा सम छवि प्रेयसि की,
जब नयनों में रच-बस जाती।
मधुर मिलन के स्वप्निल पल की ,
रेखा सी मन में खिंच जाती ।
नयनों में सुन्दर सपनों के,
कितने दीपक जल उठते हैं॥ ६.
जब अज्ञान तिमिर छंट जाता,
ज्ञान की ज्योति निखर उठती है।
नए नए विज्ञान-ज्ञान की,
नित नव राहें दीपित होतीं ।
मन में नव संकल्प भाव के ,
कितने दीपक जल उठते हैं ॥ ७.
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