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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

बुधवार, 7 मई 2014

श्रुतियों व पुराण-कथाओं वैज्ञानिक तथ्य--अंक-८.. कावेरी की कथा ...डा श्याम गुप्त ...

                                  

                                 ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


 श्रुतियों व पुराण-कथाओं में भक्ति-पक्ष के साथ व्यवहारिक-वैज्ञानिक तथ्य-अंक-८..

कावेरी की कथा......


       (  श्रुतियों व पुराणों एवं अन्य भारतीय शास्त्रों में जो कथाएं भक्ति भाव से परिपूर्ण व अतिरंजित लगती हैं उनके मूल में वस्तुतः वैज्ञानिक एवं व्यवहारिक पक्ष निहित है परन्तु वे भारतीय जीवन-दर्शन के मूल वैदिक सूत्र ...’ईशावास्यम इदं सर्वं.....’ के आधार पर सब कुछ ईश्वर को याद करते हुए, उसी को समर्पित करते हुए, उसी के आप न्यासी हैं यह समझते हुए ही करना चाहिए .....की भाव-भूमि पर सांकेतिक व उदाहरण रूप में काव्यात्मकता के साथ वर्णित हैं, ताकि विज्ञजन,सर्वजन व सामान्य जन सभी उन्हें जीवन–व्यवस्था का अंग मानकर उन्हें व्यवहार में लायें |...... स्पष्ट करने हेतु..... कुछ उदाहरण एवं उनका वैज्ञानिक पक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है ------ )

कावेरी उद्गम -तलाकावेरी -कुर्ग
कावेरी

कावेरी -मंथर-मंथर




 

 

 

 

 

कावेरी-होनेगोक्कल फाल्स

 

 

 

 

 

 

 कावेरी की कथा .....

     धर्म के तीन स्तर होते हैं----१- तात्विक ज्ञान---(मेटाफिजिक्स )...२-नैतिक ज्ञान--(एथिक्स )...
३-कर्मकांड  (राइचुअल्स)....मूलतः कर्मकांडों का जो जन-व्यवहार के लिए होते हैं, जन सामान्य के लिए.
..... उन्ही में अज्ञान ( तात्विक व नैतिक भाव लोप होने से ) से अतिरेकता आजाने से वे आलोचना के
 आधार बन जाते हैं |पुराण कथाएं मूलतः कर्मकांड विभाग में आती हैं ताकि जन-जन, जनसामान्य
 को संक्षिप्त में व्यवहार की बातें बताई जा सकें |
           
       जब भी कोई व्यवस्था या  सभ्यता अत्यंत उन्नत होजाती है तो उसकी बातें, तथ्य व 
कथ्य स्वतः ही सूत्र व कूट रूप में होने लगते हैं, संक्षिप्तता की आवश्यकतानुसार | आधुनिक उदाहरण
 लें जैसे--भारत के लिए शेर,आस्ट्रेलिया के लिए कंगारू कहना आज आम बात होगई है|                                                          
                    भारतीय  पुराण-कथाएं सदा अन्योक्ति,  कूट व सूत्र रूप में कही गयी हैं , परन्तु उनके 
वास्तविक/तात्विक अर्थ व्यवहारिक, नीति-परक व सामाजिक नीति व्यवस्था के होते है | अर्थ न समझने
 के कारण लोग उन्हें प्रायः कपोल-कल्पित कह कर  उनका उपहास भी करते हैं और हिन्दू सनातन-धर्म 
के उपहास के लिए उदाहरण भी
 कावेरी नदी की कथा का भी यही तथ्य है |

    स्थानीय..कर्मकान्ड  केअनुसार कावेरी के उदगम-स्थान पर हर साल सावन के महीने में बड़ा भारी उत्सव  
मनाया जाताहै। यह है कावेरी की विदाई का उत्सव। कुर्ग के सभी हिन्दू लोग, विशेषकर स्त्रियां, इस उत्सव में 
 बड़ी श्रद्धा के साथ भाग  
लेती हैं।उस दिन कावेरी की मूर्ति की विशेष पूजा होती है। 'तलैकावेरी' कहलानेवाले उदगम-स्थान पर सब स्नान 
 करते हैं। स्नान करनेके बाद प्रत्येक स्त्री कोई न कोई गहना, उपहार के रुप में, उस तालाब में डालती है। यह दृश्य 
 ठीक वैसा ही होता  है, जैसा कि नईविवाहित लड़की की विदाई का दृश्य |
कावेरी की पौराणिक कथा व स्थानीय जनश्रुति यह है----
           सहा-पर्वत ने अपनी लजीली बेटी कावेरी को उसके पति समुद्रराज के पास भेजा। जब बेटी घर से विदा 
 होकर चली गईतब सहा-पर्वत को भय हुआ कि कहीं ससुरालवाले मेरी बेटी को गरीब न समझ लें। इसलिए उसने  
कनका नाम की युवती  को कईउपहारों के साथ दौड़ाया और कहा कि तुम जल्दी जाकर कावेरी के साथ हो लो।
             
कनका चली गई और 'भागमंडलम' नामक स्थान पर कावेरी से मिली। उपहार का शेष भाग यहीं पर  
कावेरी को मिला,इस कारण इस स्थान का नाम 'भागमंडलम' पड़ा। परन्तु पिता सहा-पर्वत का भय अब भी दूर 
 नहीं हुआ। उसे लगा  कि मैंने पुत्रीको उतने उपहार नहीं दिये, जितने कि मैं दे सकता था। उसने  हेमावती  नाम की दूसरी लड़की को बुलाया और बहुत से उपहारदेकर कहा कि तुम किसी ओर रास्ते से तेजी
  से जाओ। हेमावती स्वयं अपनी सहेली के चली जाने पर दुखी थी।  इसलिए सहा-पर्वत की आज्ञा से वह बहुत 
 प्रसन्न हुई और आंख मूंद कर भागी।

             
उधर कावेरी कनका से मिलने के बाद बहुत प्रसन्न हुई ओर विदाई का दु:ख भूल गई। 'भागमंडलम' से 
 'चित्रपुरम ' नामक स्थान  तक दोनों सहेलियां ऊंची-ऊंची चट्रटानों के बीच में हंसती खेलती, किलोलें करती हुई चलीं,  
परन्तु "चित्रपुरम' पहुंचने के बाद उनके कदम आगे नहीं बढ़े,  क्योंकि वे कुर्ग की सीमा पर पहुंच गई थीं।  आगे मैसूर राज्य आ गया था। उसमें प्रवेश करने का मतलब नैहर से सदा के लिए बिछुड़ना था। इस कारण वे  
असमंजस में पड़ गई और ३२ कि.मी. तक कुर्ग और मैसूर की सीमा से साथ-साथ चलीं । चित्रपुरम से 'कण्णेकाल' के आगे कावेरी भारी मन से अपने पिता के घर से सदा के लिए बिछुड़ गई। बिछोहका 
 दु:ख उसे इतना था कि वह मैसूर के हासन जिले में  पहाड़ी चट्रटानों के बीच में मुंह छिपाकर रोती हुई चली। 
 तिप्पूर  नामक स्थान पर  वह  उत्तर  की ओर मुड़ी,  मानो पिता के घर लौट आयगी,  परन्तु देखती क्या है कि  उसकी सहेली हेमावती उत्तर से बड़ेवेग से चली आ रही है। उसी स्थान पर दोनों सहेलियां गले मिलीं।

                   कावेरी नदी का वास्तविक भौगोलिक स्वरुप देखिये... बिलकुल पौराणिक 
अनुश्रुति व कथ्यों से समानता है ..-----


कावेरी के जन्म  - अगस्त्य ऋषि कावेरी को कैलाश पर्वत से लेकर आये थे। एक बार भयंकर सूखा पड़ा जिससे 
दक्षिण भारत में स्थिति बहुत ख़राब हो गयी। यह देखकर अगस्त्य ऋषि बहुत दुखी हुए और मानव जाति को 
बचाने के लिए ब्रह्मा जी के पास पहुंचे। ब्रह्मा जी ने उनसे कहा की अगर वे कैलाश पर्वत से बर्फीला पानी लेकर
 जाएँ तो दक्षिण में नदी का उद्गम कर सकतें हैं। अगस्त्य ऋषि कैलाश पर्वत पर गए, वहां से बर्फीला पानी 
अपने कमंडल में लिया और दक्षिण दिशा की और लौट चले। वें नदी के उद्गम स्थान की खोज करते हुए कुर्ग 
पहुंचे। उचित उद्गम स्थान की  खोज करते-करते ऋषि थक गए और अपना कमंडल भूमि पर रखकर विश्राम 
करने लगे। तभी वहां पर एक कौवा उड़ते हुए आया और कमंडल पर बैठनेलगा। कौवे के बैठते ही कमंडल उलट
 गया और उसका पानी भूमि पर गिर गया। जब ऋषि ने यह देखा तो उन्हें बहुत क्रोध आया। लेकिन तभी वहां 
गणेश जी प्रकट हुए और उन्होंने ऋषि से कहा कि मैं ही कौवे का रूप धारण करके आपकी मदद के लिए आया 
। कावेरी के उद्गम के लिए यही स्थान उचित है। यह सुनकर ऋषि प्रसन्न हुए और भगवान गणेश अंतर्ध्यान 
हो गए। 


         कावेरी कर्नाटक की पूर्व कुर्ग रियासत से निकलती है। यह पूर्व मैसूर राज्य को सींचती हुई दक्षिण 
पूर्व की ओर बहती है और तमिलनाडु के एक विशाल प्रदेश को हरा-भरा बनाकर बंगाल की खाड़ी में गिरती है।
 इस लम्बी यात्रा में कावेरी का रुप सैकड़ो बार बदलता है। कहीं वह पतली धार की तरह दो ऊंची चट्रटानों के  
बीच बहती है, जहां एक छलांग में उसे पार कर सकते है कहीं उसकी चौड़ाई डेढ़ कि.मी. के करीब होती है ओर 
वह सागर सी दिखाई देती है कहीं वह साढ़े तीन सौ फुट की ऊंचाई से जल प्रपात के रुप में गिरती है, जहां 
उसका भीषण रुप देखकर और चीत्कार सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते है,कहीं वह इतनी सरल और प्यारी होती है 
कि उस पर बांस की लकड़ी का पुल बनाकर लोग उसे पार कर जाते हैं।
       पश्चिमी घाट के उत्तरी भाग में एक सुन्दर राज्य है, जिसे कुर्ग कहते हैं। राज्य में एक पहाड़ का नाम ...
 सहापर्वत है। इस पहाड़ को 'ब्रह्माकपाल' भी कहते हैं।
               
इस पहाड़ के एक कोने में एक छोटा सा तालाब बना है। तालाब में पानी केवल ढाई फुट गहरा है। इस  
चौकोर तालाब काघेरा एक सौ बीस फुट का है। तालाब के पश्चिमी तट पर एक छोटा सा मन्दिर है। मन्दिर के  
भीतर एक तरुणी की सुन्दर मूर्तिस्थापित है। मूर्ति के सामने एक दीप लगातार जलता रहता है।
                   
यही तालाब कावेरी नदी का उदगम-स्थान है। पहाड़ के भीतर से फूट निकलनेवाली यह सरिता पहले 
 उस तालाब मेंगिरती है, फिर एक छोटे से झरने के रुप में बाहर निकलती है। देवी कावेरी की मूर्ति की यहां पर 
 नित्य पूजा होती है। कावेरी कास्रोत कभी नहीं सूखता।

                     
कावेरी कुर्ग से निकलती अवश्य है, पर वहां की जनता को कोई लाभ नहीं पहुंचाती। कुर्ग के घने  
जंगलों में पानीकाफी बरसता है, इस कारण वहां कावेरी का कोई काम भी नहीं है, उल्टे कावेरी कुर्ग की दो और 
 नदियों को भी अपने साथ मिलालेती है और पहाड़ी पट्रटानों के बीच में सांप की तरह टेढ़ी-मेढ़ी चाल चलती, 
 रास्ता बनाती, मॅसूर राज्य की ओर बढ़ती है।

                  
कनका से मिलने से पहले कावेरी की धारा इतनी पतली होती है कि उसे नदी के रुप में पहचानना भी 
 कठिन होता है।कनका से मिलने के बाद उसे नदी का रुप और गति प्राप्त होती है। सहा'पर्वत से बहनेवाले सैकड़ों 
 छोटे-छोटे सोते भी यहां परउसमे आकर मिल जाते हैं। इस स्थान को 'भागमंडलम' कहते हैं। हेमावती नदी 
 कर्नाटक राज्य के तिप्पूर नामक स्थान पर कावेरी से आकर मिलती है।


         तमिल भाषा में कावेरी को प्यार से 'पोन्नी' कहते हैं। पोन्नी का अर्थ है सोना उगानेवाली। कहा जाता
 है किकावेरी के जल में सोने की धूल मिली हुई है। इस कारण इसका यह नाम पड़ा। जानने योग्य बात यह है
 कि कावेरी मेंमिलने वाली कई उपनदियों में से दो के नाम कनका और हेमावती हैं। इन दोनों नामों में भी सोने
 का संकेत है।
       
------ कथा का तात्विक अर्थ भौगोलिक वर्णन है तथा नैतिक (एथीकल) अर्थ पिता की पुत्री के 
प्रति   चिंता का व सखियों के प्रेम का सुन्दर समन्वयात्मक वर्णन|-----|
कावेरी बांध
   

रविवार, 27 अप्रैल 2014

श्रुतियों व पुराण-कथाओं वैज्ञानिक तथ्य--अंक-७.. राजा इल, शिखंडी व महर्षि च्यवन ...डा श्याम गुप्त ...

.                            ...कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


                      श्रुतियों व पुराण-कथाओं में भक्ति-पक्ष के साथ व्यवहारिक-वैज्ञानिक तथ्य-

   राजा इल, शिखंडी व महर्षि च्यवन ....लिंग-परिवर्तन एवं पुनर्यौवन-प्राप्ति तथा अन्य 

चिकित्सकीय प्रकरण---


       (  श्रुतियों व पुराणों एवं अन्य भारतीय शास्त्रों में जो कथाएं भक्ति भाव से परिपूर्ण व अतिरंजित लगती हैं उनके मूल में वस्तुतः वैज्ञानिक एवं व्यवहारिक पक्ष निहित है परन्तु वे भारतीय जीवन-दर्शन के मूल वैदिक सूत्र ...’ईशावास्यम इदं सर्वं.....’ के आधार पर सब कुछ ईश्वर को याद करते हुए, उसी को समर्पित करते हुए, उसी के आप न्यासी हैं यह समझते हुए ही करना चाहिए .....की भाव-भूमि पर सांकेतिक व उदाहरण रूप में काव्यात्मकता के साथ वर्णित हैं, ताकि विज्ञजन,सर्वजन व सामान्य जन सभी उन्हें जीवन–व्यवस्था का अंग मानकर उन्हें व्यवहार में लायें |...... स्पष्ट करने हेतु..... कुछ उदाहरण एवं उनका वैज्ञानिक पक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है ------ )



 सेक्स-चेंज अथवा लिंग-परिवर्तन---- -

          आज की वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धति हारमोन और सर्जरी द्वारा लिंग परिवर्तन अर्थात  नर को मादा व मादा को नर में परिवर्तन कर देना सम्भव हो गया है। हिन्दू पुराणों में --- राजा इल का इला (स्त्री) और पुन: इल (पुरुष) बनने की कथा तथा शिखंडी की कथा इसी विषय को प्रस्तुत करती है|
                इल वाह्लीक देश (अरब ईरान क्षेत्र के जो इलावर्त क्षेत्र कहलाता था ) के राजा थे| एक समय शिकार खेलते हुये वे उस निर्जन स्थान पर जा पहुँचे, जहाँ कार्तिकेय का जन्म हुआ था। पार्वती को प्रसंन्न करने के लिए शंकर जीने नारी रुप धारण कर रखा था एवं  वहाँ के सब पशु-पक्षी भी मादा रुप में परिवर्तित होगये थे| इल और उसके साथी भी सुंदरियों में परिवर्तित हो गये। पार्वती ने उन्हें एक मास स्त्री और दूसरे मास पुरुष-रुप में रहने का वर दिया। स्त्री का रूप पाकर वे पुरुष की बातें भूल जाते थे। उन सुदरियों को मार्ग में तपस्यारत चन्द्र पुत्र बुध मिले। बुध इल के स्त्री रूप ‘इला’' पर आसक्त हो गये। बुध ने इला से विवाह कर लिया तथा  सेविकाओ को किंपुरुषी (किन्नरी) हो कर पर्वत के किनारे रहने और निवास करने को कहा कि .. आगे चल कर तुम सभी स्त्रियों को किंपुरुष प्राप्त होगे ...किंपुरुषी नाम से प्रसिद्ध हुयी सेविकाए जो संख्या में बहुत थी पर्वत पर रहने लगी  इस प्रकार किंपुरुष जाति का जन्म हुआ | इला ने कालांतर में बुध के पुत्र पुरुरवा  को जन्म दिया।  
                पिता के कष्ट को देख कर पुरुरवा ने अश्वमेध यज्ञ करवाया जिससे प्रसंन्न होकर शिव जी नेइला को पुन: पुरुष (इल) बना दिया। अपना भूतपूर्व नगर वाह्लीक अपने पुत्र शशबिंदु  को सौपकर राजा इल नेमध्य प्रदेश (गंगा यमुना संगम के निकट ) प्रतिष्ठानपुर '(इलाहाबाद ) बसाया। जो उनके बाद पुरुरवा को प्राप्त हुआ

------ शिव स्वयं सभी चिकित्सा विद्याओं के आदि -चिकित्सक है | वह प्रदेश शायद हिमालय के पार उत्तरी भाग में स्थित सुमेरु प्रदेश  रहा होगा, किम्बदंतियों के अनुसार अभी हाल के इतिहास में इसके किंपुरुष वर्ष नामक क्षेत्र के व्यक्ति वहां व्याप्त वनस्पतियों का सेवन कर इच्छानुसार  कभी स्त्री तो कभी पुरुष रूप धारण करने में सक्षम थे| और अपने जीवनकाल में ही कभी स्त्री होने का तथा कभी  पुरुष होने का अनुभव प्राप्त कर सकते थे| यह शायद प्रजनन-अंगों का एक दूसरे में ट्रांसप्लांट विधि का प्रयोग का उदाहरण है |

         शिखण्डी के जन्म के उपरान्त लिंग-परिवर्तन की बहुचर्चित-महाभारत की कथा मिलती है| काशीराज की पुत्री अम्बा जिसने भीष्म से बदला लेने प्रण किया था राजा द्रुपद के घर शिखंडी नाम से कन्या रूप पैदा हुई परन्तु वह किम्पुरुष थी ...अतः विवाह में यह भेद खुल जाने पर आत्महत्या हेतु वन में चली गयी वहां यक्ष स्थूलाकर्ण ने प्रसन्न होकर उसे अपना पुरुषत्व इस शर्त पर देदिया (क्योंकि वह स्वयं भी स्त्री बन कर देखना चाहता था ) कि अपना प्रतिशोध पूर्ण होने पर वह पुरुषत्व पुनः वापस ले लेगा|  इसी शिखंडी के पुरुष न होने का भेद ज्ञात रहने के कारण ही भीष्म ने उस पर अपना वार नहीं किया था और मृत्यु को प्राप्त हुए | शिखंडी का कार्य समाप्त होजाने पर भी शिवजी का अपने गण स्थूलाकर्ण से अप्रसन्न होजाने के कारण उसे अपना पुरुषत्व पुनः नहीं मिल पाया |

------ सम्भवत: यक्ष स्थूणाकर्ण ने उसका लिंग-परिवर्तन औषाधियों के माध्यम से कर दिया था। अथवा प्रजनन-अंगों का एक दूसरे में ट्रांसप्लांट विधि का प्रयोग किया गया होगा | अप्रसन्न होने पर शिवजी ने उसे पुनः यह क्रिया करने से रोक दिया होगा|


 महर्षि च्यवन को पुनर्यौवन की प्राप्ति ---

    भृगु पुत्र पोलोमी च्यवन महर्षि के तपस्या में रत होने पर दीमकों ने उनके शरीर पर बांबी बनाली थी राजाशर्याति की अप्रतिम सुन्दर कन्या सुकन्या द्वारा कौतूहलवश असावधानी में लकड़ी डालकर उनकी आँख फोड़ देने पर उसे वृद्ध ऋषि से विवाह करना पडा| सुकन्या मनोयोग से उनके सेवा करने लगी| देव वैद्य अश्विनी कुमारों की चिकित्सा से वृद्ध च्यवन-ऋषि का वार्धक्य दूर हुआ एवं स्वस्थ होकर उन्हें यौवन प्राप्त हुआ| अश्विनद्वय द्वारा यौवन-प्राप्ति हेतु जो औषधि दी गई थी, वह आज `च्यवनप्राश´ के नाम से प्रसिद्व है जो स्वास्थ्य, ओज एवं आयुवर्द्धक होने के साथ-साथ शरीर की प्रतिरोधी-क्षमता की भी वृद्धि करता है| 
        पारसागुंबा नामक एक जड़ी हिमालय की ऊंची चोटियों पर आज भी सुलभ है, इस जड़ी में पुनयौंवन उद्दीपन की शक्ति है जो आधुनिक शोध द्वारा सत्यापित की जा चुकी है। हो सकता है वही या समानधर्मा गुण वाली औषधि का प्रयोग अश्विनीकुमारों ने किया हो |
         अश्विनीकुमार  अंग-प्रत्योरोपण एवं संजीवनी विद्या में निपुण थे। वे कुशल पशु चिकित्सक भी थे| इन्द्र के अण्डकोशों को प्रत्यारोपण..... विशाला की टूटी टांग को ठीक करना, ..... अंधे कण्व को नेत्र ज्योति प्रदान करनासर्जरी के उत्तम उदाहरण हैं |
      वघिरमति का वंध्यात्व दूर कर पुत्रवती बनाना व राजा कक्षीवान की कन्या घोषा का कुष्ठ रोग दूर करना आदि प्रसिद्द काय-चिकित्सकीय उदाहरण हैं|

सोमवार, 21 अप्रैल 2014

श्याम स्मृति- समाज, समुदाय व संस्कृति- व्युत्पत्ति व अर्थवत्ता....डा श्याम गुप्त...

                                ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



       

       समाज शब्द ‘अज्’ धातु में सम् उपसर्ग जुड़कर व्युत्पन्न होता है। अज धातु का अर्थ अजन्मा, सदैव गतिशील, क्रियाशील, ( इसीलिये अज ब्रह्मा को भी कहते हैं जो सदैव विश्व निर्माण व गति की प्रक्रिया में संलग्न हैं, बकरे का सिर भी सदैव गति करता रहता है अतः अज बकरे को भी कहते हैं) सम का अर्थ समान रूप से, सम्मिलित रूप से, सम्यक रूप से.. अर्थात् जिसमें रहकर मनुष्य सम्यक रूप से अपनी प्रगति अर्थात् उन्नति करते हैं, उसे समाज कहते हैं।

     ‘समुदाय’  शब्द ‘सम्’ और उदाय शब्दों से व्युत्पन्न होता है| उदाय अर्थात उत धातु ..उदय, उत्थान अतः  समुदाय  शब्द का अर्थ हुआ मनुष्य के सम्यक रूप से ऊपर उठने का साधन |     

          समाज का अर्थ व्यक्तियों या व्यक्तियों के समूह से न होकर व्यक्ति के परस्पर संबंधों से होता है। समाज  रीतियों और कार्य प्रणालियों, प्रभुत्व और पारस्परिक सहायता, विविध समूहों और श्रेणियों, मानव व्यवहार के नियन्त्रणों और स्वतन्त्रताओं की व्यवस्था है।  विविध समाजों या सामाजिक संस्थाओं में सामाजिक व्यवस्थायों, रीतियों, कार्य प्रणालियों, प्रभुत्व और पारस्परिक सहायता, समूहों और श्रेणियों का रूप निरन्तर बदलता रहता है| बृहद रूप में मानव इतिहास में, मानव समाज में मानव व्यवहार के नियन्त्रणों व स्वतन्त्रताओं का रूप निरन्तर बदलता रहा है।
     संस्कृत  शब्द ‘सम्’ उपसर्ग एवं स्कृत’ शब्द के योग से बना है|  जो स्वयं कृ धातु के कृत शब्द में स ( सम्यक, समाशोधन ) उपसर्ग से मिलकर बना है| अतः रूप हुआ - सम + स्कृत। = संस्कृत...संसकारित, परिष्कारित  इसमें ‘ई’ स्त्रीलिंग प्रत्यय लगा कर संस्कृति बना  है।
     संस्कृति ....विद्वान संस्कृति शब्द का प्रयोग मानव विकास के चिन्तन, सुन्दर, शालीन सूक्ष्म तत्वों तथा सामाजिक जीवन की, मानव की एवं मानव की प्रगति की परिष्कृत ..सत्यं, शिवं, सुन्दरं तथा रुचिर परम्परा के अर्थ में करते रहे हैं।
     संस्कृति का संबंध मुख्य रूपेण मानव आचरण से हैं, जिसे वह अपने पूर्वजों, माता-पिता, शिक्षकों तथा दिन-रात सम्पर्क में आने वाले व्यक्तियों से अपनाता है। व्यक्ति के सामान्य दैहिक आचरण जैसे - साँस लेना, रोना-हँसना आदि संस्कृति के अन्तर्गत नहीं आता।  वस्तुतः जन्म के बाद व्यक्ति को सामाजिक रूप से प्राप्त ‘आचरण’ ही संस्कृति है।  सीखे हुए व्यवहार प्रकारों को,  उस समग्रता को,  जो किसी समूह को वैशिष्ट्य प्रदान करती है, संस्कृति की संज्ञा दी जाती है।
     संस्कृति मनुष्य की स्वयं की सृष्टि  है, इसका स्थायित्व, व्यक्तियों द्वारा अतीत की विरासत के प्रतीकात्मक संचार पर निर्भर है। क्योंकि इसका आधार,  जन्मदाता मनुष्य स्वयं परिवर्तनशील है अतः यह भी परिवर्तनशील है | नए विचार, नए व्यवहार,  नए अविष्कार... मनुष्यों के साथ-साथ  उसकी संस्कृति को भी प्रभावित करते हैं | विशेषता यह है कि परिवर्तनशील होते हुए भी संस्कृति सदैव व्यवस्थित होती है क्योंकि इसके एक तत्व में परिवर्तन आने पर,  दूसरा तत्व स्वतः ही परिवर्तित हो जाता है इसप्रकार सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवस्था बनी रहती है|