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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

बुधवार, 9 सितंबर 2009

रा धा --कौन, कहांसे, कब,

राधा ---व्युत्पत्ति व उदभव

राधा-चरित्र का वर्णन श्रीमद भागवत पुराण में स्पष्ट नहीं मिलता; वेद,उपनिषद में भी राधा का उल्लेख नहीं है।राधा राधा क्र्ष्ण का सांगोपांग वर्णनगीत-गोविन्दसे मिलता है। वस्तुतः राधा का क्या अर्थ है ,राधा शब्द कीव्युत्पत्ति कहां से, कैसे हुई ?’
सर्व प्रथम
रिग्वेद के भाग /मंडल१- में-राधस शब्द का प्रयोग हुआ है,जिसकोबैभवके अर्थ में प्रयोग कियागया है। रिग्वेद-/--- में-’ सुराधा’ शब्द श्रेष्ठ धनों से युक्त के अर्थ में प्रयुक्त होता रहा है। सभी देवों से उनकीसंरक्षक शक्ति का उपयोग कर धनों की प्रार्थना , प्राक्रतिक साधनों का उचित उपयोग की प्रार्थना की गई है। रिग्वेद-/५२/४०९४ में राधो’ आराधना’ शब्द शोधकार्यों के लिये भी प्रयोग किये गये हैं,यथा--
"यमुनामयादि श्रुतमुद्राधो गव्यं म्रजे निराधो अश्व्यं म्रजे॥" अर्थात यमुना के किनारे गाय,घोडों आदि धनों कावर्धन(व्रद्धि उत्पादन) आराधना सहित करें।
वस्तुतः रिग्वेदिक यजुर्वेद अथर्व वेदिक साहित्य में
राधा’ शब्द की व्युत्पत्ति, रा =रयि(संसार, ऐश्वर्य,श्री,वैभव) +धा( धारक,धारण करने वालीशक्ति) ,से हुई है; अतः जब उपनिषद व संहिताओं के ग्यान मार्गीकाल में स्रष्टि के कर्ता का ब्रह्म पुरुष,परमात्मा, रूप वर्णन हुआ तो समस्त संसार की धारक चित-शक्ति,ह्लादिनी शक्ति,परमेश्वरी(राधा) का आविर्भाव हुआ ;भविष्य पुराण में--जब वेद को स्वयं साक्षात नारायण कहा तो उनकीमूल क्रतित्व-काल,कर्म,धर्म काम के अधिष्ठाताहुए--काल रूप क्रष्ण उनकी सहोदरी(भगिनी-साथ-साथउदभूत) राधा परमेश्वरी; कर्म रूप ब्रह्मा नियति(सहोदरी); धर्म रूप-महादेव श्रद्धा(सहोदरी) एवम कामरूप-अनिरुद्ध उषा ----इस प्रकार राधा परमात्व तत्व क्रष्ण की चिर सहचरी , चिच्छित-शक्ति(ब्रह्म संहिता) है।
वही
परवर्ती साहित्य में श्री क्रष्ण का लीला-रमण, लोकिक रूप के आविर्भाव के साथ उनकी साथी,प्रेमिका,पत्नीहुई, ब्रज बासिनी रूप में जन-नेत्री।
भागवत पुराण में-एक अराधिता नाम की गोपी का उल्लेख है, किसी एक प्रिय गोपी को भग्वान श्री क्रष्णमहारास के मध्य में लोप होते समय साथ ले गये थे ,जिसेमान होने पर छोडकर अन्तर्ध्यान हुए थे; संभवतः यहवही गोपी रही होगी जिसे गीत-गोविन्द के रचयिता , ्विद्यापति, सूर दास आदि परवर्ती कवियों, भक्तों ने श्रंगारभूति श्री क्रष्ण(पुरुष) की रसेश्वरी (प्रक्रति) रूप में कल्पित प्रतिष्ठित किया।
वस्तुतः गीत गोविन्द भक्ति काल के समय
स्त्रियों के सामाज़िक( से १० वीं शताब्दी) अधिकारों में कटौती होचुकी थी, उनकी स्वतंत्रता ,स्वेच्छा, कामेच्छा अदि पर अंकुश था। अत राधा का चरित्र महिला उत्थान उन्मुक्ति के लिये रचित हुआ। पुरुष-प्रधान समाज में क्रष्ण उनके अपने हैं,जो उनकी उंगली पर नाचते है, स्त्रियों केप्रति जवाब देह हैं,नारी उन्मुक्ति ,उत्थान के देवता हैं। इस प्रकार ब्रन्दावन अधीक्षिका, रसेश्वरी श्री राधाजी का ब्रजमे, जन-जन में, घर-घर में ,मन-मन में, विश्व में, जगत में प्राधान्य हुआ। वे मातु-शक्ति हैं, भगवान श्री क्रष्ण केसाथ सदा-सर्वदा संलग्न,उपस्थित,अभिन्न--परमात्म-अद्यात्म-शक्ति; अतः वे लौकिक-पत्नी नहीं होसकतीं, उन्हेंबिछुडना ही होता है,गोलोक के नियमन के लिये

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मंगलवार, 8 सितंबर 2009

कुर्सी का मुख पश्चिम में करदो ----व्यवस्था बदलने का अंधविश्वास

बहुत पुरानी बात है की एक दिन मेरे छोटे भाई ने ,जो कक्षा ६ का विद्यार्थी था, आकर बताया कि मास्टर जी ने कहा है ये कापियां अब नहीं चलेंगी , रजिस्टर लाओ| मैंने कहा अब इन कापियों का क्या होगा, चलो मास्टरजी से पूछें|में स्वयं इंटर -विज्ञान का क्षात्र था. स्कूल में मेरा तर्क था कि मेरे पिता के मेहनत की कमाई की ये कापियां यूँही जायेंगी , आख़िर देश के धन की भी तो बर्बादी है| मास्टर जी न माने तो मैंने पूछा-सर ,क्या रजिस्टर से पढाई अच्छी होगी,क्या बच्चे अच्छी तरह याद करेंगे,क्या आप की गुणवत्ता बढ़ जायगी ?मास्ट र जी का कहना था कि अच्छी-अच्छी कापियां किताब देखकर अच्छा लगता है ; फ़िर अंगरेजी में बोले-तुम विज्ञान के विद्यार्थी होकर ऐसी वेवकूफी की बात करते हो, योरोप आदि के स्कूलों ने कितनी तरक्की की है ,हम हैं कि वहीं हैं। राष्ट्र-भक्ति का बहाना है,भाषण देने को तो -'नेता बन जाओ ' यहां सिर न मारो।( अर्थ निकलता है कि उन दिनों नेताओं कोराष्ट्र-भक्त माना जाता था, अतःसिर्फ़ नेता राजनीति नहीं अपितु शिक्षा जगत में पाश्चात्य -नक़ल देश की दुर्दशा का कारण है ),उन्ही के पढ़े -पढाये हुए क्षात्र आज के नेता व अन्य स्थानों पर हैं। उन दिनों भारतीय नगरों में अंगरेजी तर्ज़ पर पब्लिक स्कूल खुलते ही जारहे थे और हम उनकी नक़ल में व्यस्त थे। आज शिक्षा का मानवीय स्तर तो आप देख ही रहे हैं।
हमारे दफ्तरों में जब कोई बड़ा अफसर नया आता है तोएक अंधविश्वास की तरह , दफ्तर का काया-कल्प कराता है; ये कुर्सी का मुख पश्चिम में करो, दीवारों पर गुलाबी रंग हो तमाम अंधविश्वास व काम न करने के बहाने ।दफ्तर की कार्य-व्यवस्था तो आप जानते ही हैं -वही रफ़्तार बेढंगी' ।
आज हमारे 'सिब्बल सर' भी यही चरितार्थ कररहे हैं। 'कुर्सी का मुख पश्चिम में करदो' सब ठीक होजायागा। शिक्षा व अध्ययन की गुणवत्ता बढ़ाने का फार्मूला ,वही पुराना,-भौतिक बस्तुएं व व्यवस्था बदलने का'। एक बोर्ड ख़त्म करके दूसरी व्यवस्था की कहीं से नक़ल लाकर रखदो । लो .जनता का ध्यान भी बाँट गया,नया काम भी होगया । उधार व नक़ल की व्यवस्था लादने का आसान काम ; कौन सिर खपाए -बच्चों की,शिक्षा की,शिक्षकों की,सांस्कृतिक,राजनेतिक ,भारतीयकरण की गुणवत्ता सुधारने में ,व्यक्ति-मात्र में अच्छा इंसान बनने की शिक्षा देने में,पाठ्यक्रमों में मानवीय -गुणों का समावेश कराने में।
कुर्सी ,कापी ,किताब ,बोर्ड,व्यवस्थाएं --जड़ पदार्थ हैं,उनमें स्वयं की गुणवत्ता नही होती ; वे तो" जेहि वर्तन में राखिये ढले उसी के रंग" ,गुणवत्ता तो जीवित मनुष्य का गुण है । जब तक मनुष्य को स्वयं में सुधार व अन्य के लिए आदर्श प्रस्तुत कराने की दशा व दिशा के ज्ञान की शिक्षा नहीं दीजायगी,शिक्षा व समाज में गुणवत्ता नहीं आसकती। व्यवस्था बदलने का अर्थ है समस्या से मुख फेरना। ६२ साल से यही होरहा है।

सोमवार, 7 सितंबर 2009

विराट कवि-समागम समारोह सम्पन्न ---

डा. श्याम गुप्त अपनेअगीत काव्य-उपन्यास ’शूर्पणखा" के बारे में व्याख्या करते हुए। साथ में संचालक महोदय एवम डा. रंगनाथ मिश्र ’सत्य’ ,व पार्थो सेन ।
<--(२)


-


(१)
-गत अगस्त २००९ को .भा.वैचारिक क्रान्ति मंच व्
.भा.अगीत परिषद् ,लखनऊ के तत्वावधान में ,स्वामी राम तीर्थ प्रतिष्ठान ,लखनऊ में उक्त समारोह सम्पन्न हुआ पढ़ें एक रिपोर्ट ---------> ---->(३)----------> नीचे--विडिओ देखने के लिये त्रिकोण पर क्लिक करें--

श्री मती सुषमा गुप्त गज़ल पढते हुए ।

शनिवार, 5 सितंबर 2009

विघ्न विनाशक गणेश स्वयं किसे भजते हैं ---

समस्त संसार के प्रथम पूज्य ,विघ्न विनाशक गणेश स्वयं किसको भजते हैं? यों तो लौकिक रूप में वे अपने माता -पिता, शिव-पार्वती की पूजा करते हैं; वे गणनायक,पूजन योग्य उपासकों द्वारा भी पूजित हैं। वे सगुण -ब्रह्म पञ्च देवों में एक हैं, तथा भगवद-शक्त्याविष्ट आधिकारिक देव हैं। परन्तु उनकी सारी महिमा भी आदि-पुरूष ,पर-ब्रह्म की कृपा पर ही आधारित है। ब्रह्म-संहिता में सृष्टि आरम्भ के लिए ब्रह्माजी प्रार्थना करते हैं,--
" यत्पादपल्लवम युगं विनिधाय कुम्भ्द्वान्द्वे प्रणामसमये गणाधिराज |
विघ्नान विहंतुमल्मस्य जगत्त्र्यस्य गोविन्द्मादिपुरुष तमहं भजामि॥ "

-----तीनों लोकों के समस्त विघ्नों का विनाश करने हेतुशक्ति प्राप्त करने के लिए , जिनके चरण कमलों को श्री गणेश अपने मस्तक के दोनों कुम्भों पर धारण करते हैं , उन आदि-पुरूष गोविन्द का में भजन करता हूँ॥

सोमवार, 31 अगस्त 2009

सलाम नौजवान -७३ साल से --हाल वही का वही ?


अब और देखिये ---ये अखवार वाले ७३ साल से बदलाव का सपना नव जवानों
के साथ देखरहे हैं ,अब सलाम भी कर रहे हैं परन्तु देश वहीं का वहीं है।अपितु नीचे और नीचे जा रहा है । ये कहानियां हम ६२ वर्ष से सुन रहे हैं।ये जितने भी युवाओं के चित्र अखवार दे रहे हैं,सब मुंह में चांदी -सोने की चाम्मच लेकर पैदा हुए हैं ,कोई संघर्ष करके नहीं आए है "विक्रम टीले पर चढ़ा ,ग्वालाविक्रम होय"; क्या हुआ जो आज बड़ी-बड़ी मंजिलें हैं,माल्स हैं,मोबाइल,टीवी,ऐ सी हैं,--कीचड,गन्दगी,बदबूदार नालियां,रास्ते ,पानी भरी सड़कें,उफनते सीवर ,मुख्य सडकों पर कूदे के ढेर पर घूमते सूअर तो वही हैं बल्कि पहले से अधिक (मैंने बचपन में शहरों में इतनी गन्दगी नहीं देखी ,सड़कें ,गलियाँ साफ़-सुथरी होतीं थीं। आपको भी याद होगा) ही हैं। वही राजनीति की दशा व दिशा? अतः ये सब कहानियां भ्रामक हैं ।
हमें युवा, प्रोढ़ , वृद्ध --हमें चाहिए संसकारित,संयमी,स्वयं को,आत्म व संसार दोनों को समुचित रूप से जानने वाले अच्छे इंसान वे चाहे युवा हों,प्रोढ़ या वृद्ध ---अच्छे इंसान चाहिए। वस्तुतः होना ये चाहिए----युवा ,कार्य करें ;प्रौढ़ ,निर्देशन करें अनुभवी वृद्ध लोग मंतव्य,मन्त्र, दिशा ज्ञान दें
किसी कार्य के क्रितत्व की प्रक्रिया यह होनी चाहिए---गुरुजन ( माता,पिता, गुरु )-ज्ञान का प्रकाश ,राह दिखाते हैं; मनुष्य को स्वयं दीपक लेकर चलना होता है (अप्प दीपो भव) ;एवं स्वयं के अनुभव,पठन-पाठन व शास्त्रादि के ज्ञान से नियमित (कन्फर्म) करके कर्तव्य निर्धारण करना होता है। कक्षा में भी शिक्षक दिशा देता है ,क्षात्र को स्वयं ही आगे बढ़कर, पुस्तकों से परामर्श से विषय पक्का करना होता है।

धर्म,अर्थ,काम,मोक्ष की अवधारणा ---यूँही थोथा ज्ञान या दर्शन नहीं हैं ,ये पूर्ण वैज्ञानिक-मनोवैज्ञानिक तथ्य हैं । ये मनुष्य के मानस पर गहन वैज्ञानिक प्रभाव छोड़ते हैं ,उन्हें नियमित,संयमित करते हैं। जीवन,राष्ट्र,समाज व व्यक्ति को संयमित व सुचारू रूप से चलने ,उन्नति की और अग्रसर होने ,दशा व दिशा निर्देशन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लोग जीवन की भिन्न-भिन्न परिभाषाएं देते रहते हैं ,परन्तु ये अवधारणा जीवन काविज्ञान है,वास्तविक ज्ञान है जो तमाम अंधविश्वासों ,भ्रांतियों,कुंठाओं आदि की दीवारों को ढहा देता है। मानव को संसार व ज्ञान दोनों में सामंजस्य के साथ जीने की कला सिखाता है। जैसा ईशोपनिषद में कहा है-"विद्यान्चाविद्या यस्तद वेदोभाय्ह सहअविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाम्रितमनुश्ते "अर्थात जो संसार व ज्ञान दोनों को समान रूप से जानता है वह मृत्यु को पार करके अमृतत्व (मोक्ष)प्राप्त करता है।
धर्म,अर्थ,काम,मोक्ष चारों पुरुषार्थों का कितना सरल विवेचन व वैज्ञानिक व्याख्या दी गयी है ललिता सहस्रनाम के संलग्न आलेख में,पढ़ें ।

रविवार, 30 अगस्त 2009

क्या होगया है मीडिया की समझ को --


डाक्टरों ने पकडी हार्ट अटैक की नब्ज़ -शीर्षक से लगता है कि हार्ट अटैक पर काबू पालिया गया ,जबकि आप समाचार पढेंगे तो पता चलता है कि ,शरीर में दवा प्रवेश कराने का नवीन तरीका ईजाद किया गया है ,नसें (खून ले जाने वाली शिराए ) न मिलाने की स्थिति में दवाएं सीधा बोने-मेरो में डाली जा सकती है। अब इस भ्रामक समाचार का क्या किया जाय ?
अन्य समाचार में दूल्हे के साथ बैठने वाले "सह वाला " में श्री योगेश प्रवीण जिन्हें इतिहासविद बताते हैं (अखवार वाले) उन्हें 'सह ' और 'शाह' में अन्तर ही नही पता ,जो सह शब्द की उत्पत्ति बादशाह से कहने लगे। सह का सीधा अर्थ हिन्दी का साथ रहने वाला है । पर दूर की कौडी जो लानी है। हद है भई | आप ही सोचिये।