जिस प्रकार मानव मन विभिन्न मानसिक ग्रंथियों का पुंज है उसी प्रकार समाज भी व्यक्तियों व व्यक्तित्वों का संगठन है। वायवीय तत्व होने के कारण मन बड़ा ही अस्थिर है, इस पर नियमन अत्यावश्यक है । क़ानून मनुष्य ने मनाये हैं उनमें छिद्र होना अधिक संभव है स्वयं मनुष्य के आचरण-पालन के लिए ; परन्तु धर्म शाश्वत है । वही मन को स्थिरता दे सकता है । धर्म हीन समाज , धर्महीन देश स्थिरता तो क्या , एक क्षण खडा भी नहीं रह सकता , अपने पैरों पर। आज विश्व की अस्थिरता का कारण है -धर्महीन समाज।
धर्म का अर्थ सम्प्रदायवाद नहीं है। आज का चर्चित 'रिलीजन' वास्तव में सम्प्रदाय है, धर्म नहीं । धर्म व सम्प्रदाय भिन्न भिन्न हैं। आज चर्चित भिन्न भिन्न मत मतान्तर , भिन्न भिन्न धार्मिक नियम --धर्म नहीं है । धर्म तो एक ही है और शाश्वत है। धर्म का अर्थ है--कर्त्तव्य का पालन। और धर्म का केवल एक ही सिद्धांत है---"कभी दूसरे को दुःख मत दो"...
" सर्वेन सुखिना सन्तु
सर्वे सन्तु निरामया।
सर्वे पश्यन्तु भद्राणि ,
माँ कश्चिद् दुखभाग्भावेत ॥ "
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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...
- shyam gupta
- Lucknow, UP, India
- एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त
गुरुवार, 9 दिसंबर 2010
बुधवार, 8 दिसंबर 2010
निकसो न नन्दलाल ...डा श्याम गुप्त...
निकसो न नंदलाल
मीडि दिए गाल लाल, हाथ में भरे गुलाल।
नैन भरे दोऊ , गुलाल और नंदलाल ।
सखि !किये जतन, गुलाल तौ निकसि गयो।
कज़रारे नैन दुरियो निकसौ न नंदलाल॥
कारे कारे नैन छुपे, कारे कारे नन्द लाल।
लाज शरम हिये भये गोरी के गाल लाल ।
भाव भरे अंसुअन की राह ढरि गयो गुलाल।
एसौ ढीठ जसुमति कौ, निकसौ न नंदलाल ॥
एरी सखि! बंद करूँ, खोलूँ या पलक झपूं ।
निकसै निकासे ते न, आंखि ते गोपाल लाल।
जानै बसौ हिये, जानै चित में समायो जाय।
करि करि जतन हारी,निकसौ न नंदलाल॥
निकसै निकासे ते न,राधे नैन भये लाल।
कारे कारे नैनन में , कैसे छुपै नंदलाल ।
नैन ते निकसि गयो, उर में समायो जाय।
राधे कहैं मुसुकाय , निकसो न, नंदलाल॥
मीडि दिए गाल लाल, हाथ में भरे गुलाल।
नैन भरे दोऊ , गुलाल और नंदलाल ।
सखि !किये जतन, गुलाल तौ निकसि गयो।
कज़रारे नैन दुरियो निकसौ न नंदलाल॥
कारे कारे नैन छुपे, कारे कारे नन्द लाल।
लाज शरम हिये भये गोरी के गाल लाल ।
भाव भरे अंसुअन की राह ढरि गयो गुलाल।
एसौ ढीठ जसुमति कौ, निकसौ न नंदलाल ॥
एरी सखि! बंद करूँ, खोलूँ या पलक झपूं ।
निकसै निकासे ते न, आंखि ते गोपाल लाल।
जानै बसौ हिये, जानै चित में समायो जाय।
करि करि जतन हारी,निकसौ न नंदलाल॥
निकसै निकासे ते न,राधे नैन भये लाल।
कारे कारे नैनन में , कैसे छुपै नंदलाल ।
नैन ते निकसि गयो, उर में समायो जाय।
राधे कहैं मुसुकाय , निकसो न, नंदलाल॥
मंगलवार, 7 दिसंबर 2010
बिंदिया...डा श्याम गुप्त की कविता .....
बिंदिया
तुम जो घबराकर
हुईं रक्ताभ जब ,
तेरा वो चेहरा,
अभी तक याद है।
'धत... यू बदमाश...',
कहकर , दौड़कर,
मुझको तेरा,
भाग ज़ाना याद है ।
प्रति दिवस की तरह,
ही उस रोज़ भी;
उस झरोखे पर
तुम्हीं मौजूद थीं।
और छत पर
उस सुहानी शाम को;
डूब कर पुस्तक में,
मैं तल्लीन था।
छूट करके वो
तुम्हारे हाथ से;
छोड़ दी थी या
तुम्हीं ने आप से;
प्यारी सी डिबिया
जिसे तुमने पुनः ,
सौंप देने को
कहा था नाज़ से।
खोल कर मैंने
तुम्हारे भाल पर;
एक बिंदिया जब
सजा दी प्यार से ।
तब तुनक कर
भाग ज़ाना याद है;
और मुड़ कर
मुस्कुराना याद है ॥
तुम जो घबराकर
हुईं रक्ताभ जब ,
तेरा वो चेहरा,
अभी तक याद है।
'धत... यू बदमाश...',
कहकर , दौड़कर,
मुझको तेरा,
भाग ज़ाना याद है ।
प्रति दिवस की तरह,
ही उस रोज़ भी;
उस झरोखे पर
तुम्हीं मौजूद थीं।
और छत पर
उस सुहानी शाम को;
डूब कर पुस्तक में,
मैं तल्लीन था।
छूट करके वो
तुम्हारे हाथ से;
छोड़ दी थी या
तुम्हीं ने आप से;
प्यारी सी डिबिया
जिसे तुमने पुनः ,
सौंप देने को
कहा था नाज़ से।
खोल कर मैंने
तुम्हारे भाल पर;
एक बिंदिया जब
सजा दी प्यार से ।
तब तुनक कर
भाग ज़ाना याद है;
और मुड़ कर
मुस्कुराना याद है ॥
सोमवार, 6 दिसंबर 2010
विचार ...आहट-युग परिवर्तन की ....डा श्याम गुप्त ...
--------मैं यह साफ़ देख रहा हूँ कि युग परिवर्तन होने वाला है,होकर रहेगा । आज का युवा बुराई से,भ्रष्टाचार से अन्याय एवं असत्याचरण से लड़ने का असफल प्रयत्न कर रहा है, परन्तु कल का युवक , जो आज किशोर ( टीनेजर) है ; निश्चय ही बुराई से घृणा करता है। आज की नारी स्त्री स्वतन्त्रता की पक्षपाती तो है परन्तु उसके अंतर में अभी स्वयं प्रश्न वाचक चिन्ह है । पर कल की नारी को निश्चय ही घर से बाहर नौकरी से, नग्नता से एवं नारी की पुरुष से श्रेष्ठता के गान से घृणा होगी ।.....और स्वयं पुरुष ...अब समाज का भाग्य विधाता होने का अभिनय करते करते थक चुका है तथा कन्धों के भार को बांटना चाहता है। यह होने वाला है, यदि कल नहीं तो परसों । कालचक्र की गति-नियति तो वही जानता है.......
रविवार, 5 दिसंबर 2010
उधार प्रेम की कैंची है...डा श्याम गुप्त का आलेख.....
"उधार प्रेम की कैंची है" पान वाले की दुकान पर पांच रु. का पान लेकर चबाते हुए सामने के शीशे में टेड़े-मेड़े एवं सुन्दर अक्षरों में लगे हुए उपर्युक्त शब्दों के एक साइन बोर्ड पर नज़र पड़ी तो ठिठक कर रह गया मैं; लगा सोचने -- उधार...प्रेम ..व केंची ...तीनों में क्या सम्बन्ध....!!
कैंचियाँ तो बहुत देखीं हैं हमने | एक डाक्टर साहब की कैंची , देखकर ही रोगी भय से चीखने चिल्लाने लगता है मानो कोई साक्षात दैत्य ही सम्मुख आगया हो ; बायोलोजी के स्टूडेंट्स की की 'बोन सीजर्स' का भी ध्यान आया | ये कैंचियाँ भी मेंढक, मछलियाँ यहाँ तक कि अन्य जानवरों की हड्डियां काटने से भी नहीं चूकतीं | परन्तु ...पर ,ये उधार की कैंची.... विष्मय में डूब गया मैं |
जूनियर क्लासेज़ में थोड़ा बहुत 'बुक क्राफ्ट' का भी अध्ययन किया था | यहाँ भी कैंची है, पर 'बोन सीजर्स ' से कम तीक्ष्ण , क्योंकि ये केवल कागजों को काटती हें | मनुष्य भी तो बातावरण के अनुसार स्वयं को बदल लेता है | ध्यान आया ...एक बार जब मैं 'अबरी' काट रहा था तो हाथ कट जाने पर मारे पीड़ा के चिल्ला उठा था मैं | मुझे हंसी आगई अपनी इस नादानी पर, भूल पर .....|
विचार का रुख कुछ मुड़ गया | सोचा...दर्जी की भी तो कैंची होती है ..तीक्ष्ण ..पैनी| गजों लम्बे कपड़ों को काट कर मिनटों में ढेर लगादेती है |
इतनी मेहनत ! इतना परिश्रम ...!! परन्तु फिर भी बेचारी पैरों में पड़ी रहती है| इतना अन्याय...!!! परन्तु..परन्तु ...यह क्या ? विचार आया कि यही ठीक है ; वास्तव में जो किसी में फूट डालते हैं वे इसी योग्य हैं | किसी ने कहा भी है---
"कैंची टुकड़े कर देती है यह चरणों की अधिकारी "
विचार फिर पलटा | एका एक ध्यान चलागया 'पंडित बाल कृष्ण भट्ट ' की ओर | आपने भी तो अपने ' चंद्रोदय ' नामक आलेख में दूज के उगते हुए 'बाल-चन्द्र' को विरहिणीयों के प्राण कतरने की कैंची कहा है | सोचा ...वाहरी अक्ल ! आपने तो कैंचियों की गणना में मुफ्त में ही एक कैंची और शामिल करदी | किन्तु ...यह तो केवल अधूरी उत्प्रेक्षा है , वास्तविकता नहीं , यह कोई कैंची-वैन्ची नहीं है | परन्तु दिमाग ने फिर जोर मारा ..वाह! वास्तविकता नहीं तो क्या ! कल्पना का चमत्कार तो है ही , साहित्यकार की अपनी सृष्टि तो है ही | इसे भी क्यों न कैंचियों की श्रेणियों में गिन लिया जाय |
खैर, अपने मन को किसी तरह समझा-बुझा कर शांत किया | परन्तु विचार ने फिर पलटा खाया ....; रेल में टिकट चेकर साहब की कैंचियाँ भी तो अपनी लंबी चौंच के समान जिह्वा से बेचारे यात्रियों की धक्का-मुक्की सहकर , पैसे देकर ली हुई टिकटों को किट-किट करके बेकार कर देती हैं |
पान वालों की कैंचियाँ भी बड़ी उस्ताद होती हैं ;बड़ी शीघ्रता से पानों के सड़े-गले टुकड़ों को काट - छांट कर , बढ़िया ..महोबा, लंका, बनारसी पान बनाकर पान के शौकीनों को ठगती हैं | पान के शौकीनों का नाम आते ही मैं चौंक पडा | मैंने कहा ,बस..बस ..बस , अब बंद करो, तुम तो अपने आप को ही बदनाम करने लगे | भला यह भी कोई बात है , मैंने तो पान की कैंचियों की बात कही थी इसका अर्थ यह थोड़े ही है कि तुम अपने आप को बदनाम करो, हाँ यह अवश्य है कि वास्तव मैं ये कैंचियाँ लोगों की हजामत अच्छी तरह से बनाती हैं, और बड़े बड़े लोग भी पांच रु. का पान लेकर , चबाते हुए ..पिच-पिच थूकते हुए , बड़े आराम से घर चले जाते हैं | और यदि कोई जरूरत का मारा गरीब, भिखारी अभी इनसे एक रुपये के लिए हाथ पसारे तो कहेंगे--दूर हो बदमाश ...कामचोर ...| देखा.... जमाने की चाल को |
हजामत का नाम आते ही चलागया मेरा ध्यान, नाई की कैंचियों की ओर | ये कैंचियाँ पान वाली कैंचियों से भी अधिक उत्साही व उस्ताद होती हैं | नाई के हाथ के इशारे के साथ खोपड़ी पर ऐसे नृत्य करती हैं, मानो महाराणा प्रताप यवनों की सेना से बीच तलवारों के हाथ दिखा रहे हों|
अथवा खोपड़ी पर नृत्य करती हुई ये, ऐसी मालूम होती हैं मानों ओलम्पिक प्रतियोगिता में एक बहादुर घोड़ा अन्य सभी को कुचल कर अपने लक्ष्य की ओर उन्मुख होरहा हो | और जब ये अपने प्रिय-पात्र कंघे के साथ नृत्य करती हैं तो प्रेम में इतनी आत्म विभोर होजाती हैं कि बालों को काट छांट कर एसा सुन्दर कर देती हैं और हम उनकी तारीफ़ करते हुए , इनाम देकर तारीफ़ को द्विगुणित करते हुए ' ढाई घड़ी के अंधे ' होकर चल देते हैं | यदि कोई उस समय आपसे पूछे -कहाँ से आरहे हैं ? तो कहेंगे , जी हजामत बनवा कर | लो साहब , नाई से हजामत बनवाने पर इतनी खुशी ; परन्तु अभी कोई "सभ्यगण " आपकी "हजामत बनादे " तो आप उसे ...चार सौ बीस, चोर , लफंगा की उपाधि दे डालेंगे और पुरस्कार स्वरुप एक सौ एक गालियाँ भी | करें क्या ज़माना ही एसा है |
विचार मार्ग में एक बार फिर मोड़ आया| सोचने लगा.... माली की कैंचियाँ भी तो पार्कों को ,पौधों को, फेंसिंग को काट-छांट कर एक सा करती हैं | पर ये किसी की हजामत नहीं बनाती अपितु मानव के दृष्टि लाभ हित पार्कों को सुन्दर-सुन्दर आकार-प्रकार देती हैं | अचानक ही एक धाँसू विचार और अवतीर्ण हुआ .....किसी की जुबान भी तो कैंची ............|
क्यों आज कालिज नहीं जाना है क्या ?.... इन शब्दों ने अचानक मेरी विचार श्रंखला को तोड़ दिया | चौंक कर देखा तो वह हमारा लंगोटिया यार श्री कान्त था | और हम अपने विचारों को ताक पर रखकर उसके साथ कालिज चल दिए |
---- लेखक --डा श्याम गुप्त , सुश्यानिदी , के-३४८, आशियाना , लखनऊ -२२६०१२. मो-०९४१५१५६४६४ .
कैंचियाँ तो बहुत देखीं हैं हमने | एक डाक्टर साहब की कैंची , देखकर ही रोगी भय से चीखने चिल्लाने लगता है मानो कोई साक्षात दैत्य ही सम्मुख आगया हो ; बायोलोजी के स्टूडेंट्स की की 'बोन सीजर्स' का भी ध्यान आया | ये कैंचियाँ भी मेंढक, मछलियाँ यहाँ तक कि अन्य जानवरों की हड्डियां काटने से भी नहीं चूकतीं | परन्तु ...पर ,ये उधार की कैंची.... विष्मय में डूब गया मैं |
जूनियर क्लासेज़ में थोड़ा बहुत 'बुक क्राफ्ट' का भी अध्ययन किया था | यहाँ भी कैंची है, पर 'बोन सीजर्स ' से कम तीक्ष्ण , क्योंकि ये केवल कागजों को काटती हें | मनुष्य भी तो बातावरण के अनुसार स्वयं को बदल लेता है | ध्यान आया ...एक बार जब मैं 'अबरी' काट रहा था तो हाथ कट जाने पर मारे पीड़ा के चिल्ला उठा था मैं | मुझे हंसी आगई अपनी इस नादानी पर, भूल पर .....|
विचार का रुख कुछ मुड़ गया | सोचा...दर्जी की भी तो कैंची होती है ..तीक्ष्ण ..पैनी| गजों लम्बे कपड़ों को काट कर मिनटों में ढेर लगादेती है |
इतनी मेहनत ! इतना परिश्रम ...!! परन्तु फिर भी बेचारी पैरों में पड़ी रहती है| इतना अन्याय...!!! परन्तु..परन्तु ...यह क्या ? विचार आया कि यही ठीक है ; वास्तव में जो किसी में फूट डालते हैं वे इसी योग्य हैं | किसी ने कहा भी है---
"कैंची टुकड़े कर देती है यह चरणों की अधिकारी "
विचार फिर पलटा | एका एक ध्यान चलागया 'पंडित बाल कृष्ण भट्ट ' की ओर | आपने भी तो अपने ' चंद्रोदय ' नामक आलेख में दूज के उगते हुए 'बाल-चन्द्र' को विरहिणीयों के प्राण कतरने की कैंची कहा है | सोचा ...वाहरी अक्ल ! आपने तो कैंचियों की गणना में मुफ्त में ही एक कैंची और शामिल करदी | किन्तु ...यह तो केवल अधूरी उत्प्रेक्षा है , वास्तविकता नहीं , यह कोई कैंची-वैन्ची नहीं है | परन्तु दिमाग ने फिर जोर मारा ..वाह! वास्तविकता नहीं तो क्या ! कल्पना का चमत्कार तो है ही , साहित्यकार की अपनी सृष्टि तो है ही | इसे भी क्यों न कैंचियों की श्रेणियों में गिन लिया जाय |
खैर, अपने मन को किसी तरह समझा-बुझा कर शांत किया | परन्तु विचार ने फिर पलटा खाया ....; रेल में टिकट चेकर साहब की कैंचियाँ भी तो अपनी लंबी चौंच के समान जिह्वा से बेचारे यात्रियों की धक्का-मुक्की सहकर , पैसे देकर ली हुई टिकटों को किट-किट करके बेकार कर देती हैं |
पान वालों की कैंचियाँ भी बड़ी उस्ताद होती हैं ;बड़ी शीघ्रता से पानों के सड़े-गले टुकड़ों को काट - छांट कर , बढ़िया ..महोबा, लंका, बनारसी पान बनाकर पान के शौकीनों को ठगती हैं | पान के शौकीनों का नाम आते ही मैं चौंक पडा | मैंने कहा ,बस..बस ..बस , अब बंद करो, तुम तो अपने आप को ही बदनाम करने लगे | भला यह भी कोई बात है , मैंने तो पान की कैंचियों की बात कही थी इसका अर्थ यह थोड़े ही है कि तुम अपने आप को बदनाम करो, हाँ यह अवश्य है कि वास्तव मैं ये कैंचियाँ लोगों की हजामत अच्छी तरह से बनाती हैं, और बड़े बड़े लोग भी पांच रु. का पान लेकर , चबाते हुए ..पिच-पिच थूकते हुए , बड़े आराम से घर चले जाते हैं | और यदि कोई जरूरत का मारा गरीब, भिखारी अभी इनसे एक रुपये के लिए हाथ पसारे तो कहेंगे--दूर हो बदमाश ...कामचोर ...| देखा.... जमाने की चाल को |
हजामत का नाम आते ही चलागया मेरा ध्यान, नाई की कैंचियों की ओर | ये कैंचियाँ पान वाली कैंचियों से भी अधिक उत्साही व उस्ताद होती हैं | नाई के हाथ के इशारे के साथ खोपड़ी पर ऐसे नृत्य करती हैं, मानो महाराणा प्रताप यवनों की सेना से बीच तलवारों के हाथ दिखा रहे हों|
अथवा खोपड़ी पर नृत्य करती हुई ये, ऐसी मालूम होती हैं मानों ओलम्पिक प्रतियोगिता में एक बहादुर घोड़ा अन्य सभी को कुचल कर अपने लक्ष्य की ओर उन्मुख होरहा हो | और जब ये अपने प्रिय-पात्र कंघे के साथ नृत्य करती हैं तो प्रेम में इतनी आत्म विभोर होजाती हैं कि बालों को काट छांट कर एसा सुन्दर कर देती हैं और हम उनकी तारीफ़ करते हुए , इनाम देकर तारीफ़ को द्विगुणित करते हुए ' ढाई घड़ी के अंधे ' होकर चल देते हैं | यदि कोई उस समय आपसे पूछे -कहाँ से आरहे हैं ? तो कहेंगे , जी हजामत बनवा कर | लो साहब , नाई से हजामत बनवाने पर इतनी खुशी ; परन्तु अभी कोई "सभ्यगण " आपकी "हजामत बनादे " तो आप उसे ...चार सौ बीस, चोर , लफंगा की उपाधि दे डालेंगे और पुरस्कार स्वरुप एक सौ एक गालियाँ भी | करें क्या ज़माना ही एसा है |
विचार मार्ग में एक बार फिर मोड़ आया| सोचने लगा.... माली की कैंचियाँ भी तो पार्कों को ,पौधों को, फेंसिंग को काट-छांट कर एक सा करती हैं | पर ये किसी की हजामत नहीं बनाती अपितु मानव के दृष्टि लाभ हित पार्कों को सुन्दर-सुन्दर आकार-प्रकार देती हैं | अचानक ही एक धाँसू विचार और अवतीर्ण हुआ .....किसी की जुबान भी तो कैंची ............|
क्यों आज कालिज नहीं जाना है क्या ?.... इन शब्दों ने अचानक मेरी विचार श्रंखला को तोड़ दिया | चौंक कर देखा तो वह हमारा लंगोटिया यार श्री कान्त था | और हम अपने विचारों को ताक पर रखकर उसके साथ कालिज चल दिए |
शनिवार, 4 दिसंबर 2010
सुअना मन के भरम परे ...डा श्याम गुप्त के पद...
पद ---मूलतः गीत की ही कोटि होती है , यह मूलतः दो प्रकार से रचित होता है...
१.--जिसमें सभी पंक्तियों में सामान तुकांत होती है ..
२- जिसमें पंक्तियों के दो-दो पदों में सम-तुकांत होती है । निम्न उदाहरण देखिये---
१-----
सुअना मन के भरम परे।
जैसा अन्न हो जैसे संगति सोई धर्म धरे।
संतन डेरा बास करै जे राम नाम सुमिरे।
अन्न भखै गणिका के घर ते दुष्ट बचन उचरे।
परि भुजंग मुख बने गरल और मोती सीप परे।
परे केर के पात स्वाति जल बनि कपूर निखरे ।
दीपक गुन बनि करै उजेरा, चरखा सुत बुने।
सोई कपास संग अनल अनिल के घर को भष्म करे।
काम क्रोध मद लोभ मोह अति बैरी राह खड़े।
ये सारे मन के गुन सुअना तिरगुन भरम भरे।
चित चितवन चातुर्य विषय वश कर्म-कुकर्म करे।
माया मन की सहज वृत्ति मन सुगम राह पकरे।
काल उरग साए में सब जग भ्रम वश प्रभु बिसरे ।
एक धर्म रघुनाथ नाम धारे भाव सिन्धु तरे॥
२- वही पद इस तरह से भी ---
सुअना मन के भरम परे।
जैसा अन्न हो जैसे संगति सोई धर्म धरे।
संतन डेरा बास करे जे राम नाम गुन गाये।
अन्न भखे गणिका के घर ते अति-सुन्दर चिल्लाए।
परि भुजंग मुखबने गरल और मोती सीप समाई ।
परे केर के पात स्वाति जल सो कपूर बनि जाई।
दीपक गुन बनि करे उजेरो चरखा सूत बनाय।
सोई कपास संग अनल-अनिल के घर को देय जलाय।
काम क्रोध मद लोभ मोह अति बैरी राह छिपे हैं ।
ये सारे मन के गुन सुअना तिरगुन भरम भरे हैं ।
चित चितवन चातुर्य विषय वश हित अनहित ही भावै।
माया मन की सहज वृत्ति मन सुगम राह ही जावै ।
काल उरग साए में सब जग भ्रम के वश प्रभु विसरे।
एक धर्म घनश्याम नाम नर भव सागर उतरे॥
१.--जिसमें सभी पंक्तियों में सामान तुकांत होती है ..
२- जिसमें पंक्तियों के दो-दो पदों में सम-तुकांत होती है । निम्न उदाहरण देखिये---
१-----
सुअना मन के भरम परे।
जैसा अन्न हो जैसे संगति सोई धर्म धरे।
संतन डेरा बास करै जे राम नाम सुमिरे।
अन्न भखै गणिका के घर ते दुष्ट बचन उचरे।
परि भुजंग मुख बने गरल और मोती सीप परे।
परे केर के पात स्वाति जल बनि कपूर निखरे ।
दीपक गुन बनि करै उजेरा, चरखा सुत बुने।
सोई कपास संग अनल अनिल के घर को भष्म करे।
काम क्रोध मद लोभ मोह अति बैरी राह खड़े।
ये सारे मन के गुन सुअना तिरगुन भरम भरे।
चित चितवन चातुर्य विषय वश कर्म-कुकर्म करे।
माया मन की सहज वृत्ति मन सुगम राह पकरे।
काल उरग साए में सब जग भ्रम वश प्रभु बिसरे ।
एक धर्म रघुनाथ नाम धारे भाव सिन्धु तरे॥
२- वही पद इस तरह से भी ---
सुअना मन के भरम परे।
जैसा अन्न हो जैसे संगति सोई धर्म धरे।
संतन डेरा बास करे जे राम नाम गुन गाये।
अन्न भखे गणिका के घर ते अति-सुन्दर चिल्लाए।
परि भुजंग मुखबने गरल और मोती सीप समाई ।
परे केर के पात स्वाति जल सो कपूर बनि जाई।
दीपक गुन बनि करे उजेरो चरखा सूत बनाय।
सोई कपास संग अनल-अनिल के घर को देय जलाय।
काम क्रोध मद लोभ मोह अति बैरी राह छिपे हैं ।
ये सारे मन के गुन सुअना तिरगुन भरम भरे हैं ।
चित चितवन चातुर्य विषय वश हित अनहित ही भावै।
माया मन की सहज वृत्ति मन सुगम राह ही जावै ।
काल उरग साए में सब जग भ्रम के वश प्रभु विसरे।
एक धर्म घनश्याम नाम नर भव सागर उतरे॥
शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010
श्याम नव-नीति दोहावली....डा श्याम गुप्त.....
नेता वाणी से करें, परहित पर उपकार ।
निजी स्वार्थ में होरहा, जन धन का व्यवहार।
वे तो मेल मिलाप के लम्बरदार कहायं ।
असली पय घृत खाद्य को,नक़ल से मेल करायं।
इस जीवन में वित्त ही ,सब हित साधक होय।
श्याम जो परहित नहीं लगे,सार रहित सो होय।
जब से जग में बढ़ गया,धन और पद का मान।
गरिमा घटी समाज की, बढे माफिया डान।
इक दूजे को लूटते, लूट मची चहुँ ओर।
चोर सभी, समझें सभी , इक दूजे को चोर।
इस कलयुग में श्याम' है,सब कुछ कल आधार।
आज भोगलें कल करें, पार्टी देश सुधार।
पांच लाख की योजना, मिले चार अनुदान।
डेड लाख खर्चा करे, बाकी अपना मान।
व्यवसायी कब कर रहे, सचमुच अध्यवसाय।
छल बल और अनीति से, लूट रहे हैं मचाय।
स्वारथ भ्रष्टाचार रत, बाबू सीताराम ।
नाम डुबोये प्रभु का,भ्रमित राधिका -श्याम ।
काली करी कमाई,अरबों लिए कमाय।
क्यों घबराये चित्त में, मंदिर दे बनवाय।
निजी स्वार्थ में होरहा, जन धन का व्यवहार।
वे तो मेल मिलाप के लम्बरदार कहायं ।
असली पय घृत खाद्य को,नक़ल से मेल करायं।
इस जीवन में वित्त ही ,सब हित साधक होय।
श्याम जो परहित नहीं लगे,सार रहित सो होय।
जब से जग में बढ़ गया,धन और पद का मान।
गरिमा घटी समाज की, बढे माफिया डान।
इक दूजे को लूटते, लूट मची चहुँ ओर।
चोर सभी, समझें सभी , इक दूजे को चोर।
इस कलयुग में श्याम' है,सब कुछ कल आधार।
आज भोगलें कल करें, पार्टी देश सुधार।
पांच लाख की योजना, मिले चार अनुदान।
डेड लाख खर्चा करे, बाकी अपना मान।
व्यवसायी कब कर रहे, सचमुच अध्यवसाय।
छल बल और अनीति से, लूट रहे हैं मचाय।
स्वारथ भ्रष्टाचार रत, बाबू सीताराम ।
नाम डुबोये प्रभु का,भ्रमित राधिका -श्याम ।
काली करी कमाई,अरबों लिए कमाय।
क्यों घबराये चित्त में, मंदिर दे बनवाय।
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