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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

सोमवार, 20 दिसंबर 2010

आई फिर से शीत सुहानी ---डा श्याम गुप्त की घनाक्षरी ....

शीत - ऋतु----
१. (श्याम घनाक्षरी --३० वर्ण , १६-१४, अंत दो गुरु -यगण)
थर थर थर थर , कांपें सब नारी नर,
आई फिर शीत ऋतु , सखि वो सुजानी |
सिहरि सिहरि उड़े ,जियरा पखेरू सखि ,
उर मांहि उमंगाये , पीर वो पुरानी |
बाल वृद्ध नारी नर, धूप बैठे तापि रहे ,
धूप भी है कुछ , खोई सोई अलसानी |
शीत की लहर तीर भांति तन बेधि रही,
मन उठै प्रीति की ,वो लहर अजानी ||


२.( श्याम घनाक्षरी -३० वर्ण ,१६-१४, अंत दो गुरु - मगण)
बहु भांति पुष्प खिलें, कुञ्ज क्यारी उपवन,
रंग- विरंगी ओढे, धरती रजाई है |
केसर अबीर रोली,कुंकुंम ,मेहंदी रंग,
घोल के कटोरों में, भूमि हरषाई है |
फैलि रहीं लता चहुँ और मनमानी किये,
द्रुम चढीं शर्मायं ,मन मुसुकाई हैं |
तिल मूंग बादाम के लड्डू घर घर बनें ,
गज़क मंगोड़ों की बहार सी छाई है ||


३.( मनहरण घनाक्षरी -३१ वर्ण ,१६-१५,अंत लघु-गुरु -रगण )
ठंडी ठंडी भूमि नंगे पाँव लगे हिमशिला ,
जल छुए लगे छुआ बिजली का तार है |
कठिन नहाना नल लगे जैसे सांप कोई,
काँप रहा तन चढ़ा जूडी का बुखार है |
शीत में तुषार से है मंद रवि प्रभा हुई,
पत्तियों पै बहे ओस जैसे अश्रु धार है |
घर बाग़ वन जला आग बैठे लोग जैसे,
ऋषि मुनि करें यज्ञ विविधि प्रकार हैं ||
-----डा श्याम गुप्त , के--३४८, आशियाना , लखनऊ-२२६०१२ .

शनिवार, 18 दिसंबर 2010

हल्दी, कढ़ी, फोटोथीरेपी,..विज्ञान और अंधविश्वास ...डा श्याम गुप्त

<------ नीले प्रकाश से पीलिया का इलाज़...फोटोथीरेपी यूनिट... हल्दी , ,कढी, फोटोथीरेपी --विज्ञान व अंधविश्वास..... इन में आपस में क्या सम्बन्ध हो सकता है ! वस्तुतः यह पोस्ट लिखने का मुझे अचानक ही विचार आया क्योंकि मैंने अनुभव किया कि--
- जब भी कोई जन- समस्या व आन्दोलन की बात चलती है तो हर व्यक्ति समाज का ठेकेदार बन कर उसे भुनाने लगता है बिना उसके दूरगामी निहितार्थ व प्रभाव जाने , चाहे बात नारी आन्दोलन की हो, या एन जी ओ या भारतीय ज्ञान , धर्म , शास्त्रों की बातों की , प्रथाओं की, अंधविश्वासों की हो , चाहे वह उसका ज्ञान व उचित विषय भाव रखता हो या नहीं ।
२- आजकल वैसे भी भारतीयता, शास्त्र , धर्म की बातें तुरंत अंधविश्वास के दायरे में आजाती हैं , खासकर हिन्दू धर्म ,शास्त्र, पुराण , दादी नानी के नुस्खे , पुरा ज्ञान की बातें आदि...(अब राहुल गांधी की हिन्दू-कट्टरता के वक्तव्य पर कुछ नहीं कहूंगा क्योंकि यह राजनैतिक आलेख नहीं है। )
३-पिछले काफी समय से विज्ञान के प्रसार व तथाकथित अंधविश्वास के उन्मूलन हेतु साहित्य, समाचार-पत्र, संस्थाएं, स्वयंभू ब्लोग्स आदि मेरे संज्ञान में आते रहे हैं जो मूलतः हिन्दू आस्थाओं व विश्वासों के अंधविश्वास की बातें होती हैं, पाश्चात्य प्रभाव के अनुकूलन सहित ।
वास्तव में पाश्चात्य विचार धारा --प्रत्येक नवीन वस्तु- विचार -तथ्य को तीब्रता से अपना लेने व उसी शीघ्रता से छोड़ देने की है जो आकर्षण की प्रमुखता व अनुभव की अप्रमुखता के कारण है....जबकि पौर्वात्य भारतीय विचार धारा प्रत्येक नवीन को लम्बे समय तक देख- परखकर , अनुभव सिद्ध करके स्वीकार करने की है
और उसी प्रक्रिया से तुरंत की अपेक्षा लम्बे समय बाद छोड़ने की भी है इस विचार धारा का प्रभाव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र पर दिखाई पड़ता है और इस मूल अंतर में सदियों व युगों में भी ताल-मेल नहीं होता हाँ कुछ पाश्चात्य प्रभावित लोग अवश्य प्रभावित दिखाई पड़ते हैं और सभी भारतीय -बातों को दकियानूसी समझ कर उस पर नाराजी प्रकट करते दिखते हैं | इसीलिये किसी विचारक ने सही कहा है --"ईस्ट इस ईस्ट , वेस्ट इस वेस्ट नेवर ट्विन शेल मीट"...अब हम एक अंधविश्वास के बारे में बात रखेंगे....
-----अब ---हल्दी , कढी, फोटोथीरेपी --विज्ञान अंधविश्वास..... इन में आपस में क्या सम्बन्ध हो सकता है ? यह एक अंधविश्वास माना जाता है कि पीलिया ( जांडिस )के रोगी को पुरातन-पंथी या दादी केनुस्खे के हिसाब से पीली बस्तुएं( हल्दी की, बेसन की व अन्य पीले रंग की खाद्य व कपडे आदि का प्रयोग ) खाने / पहनने को मना किया जाता है । मैं स्वयं आधुनिक प्रभाव वश फिर विज्ञानका क्षात्र , फिर चिकित्सा विग्यान का क्षात्र , फिर चिकित्सक होने तक इसे पीलिया पीली वस्तु के खाने में आपस में कोई सम्बन्ध नहीं
समझता रहा हूँ। यद्यपि इस प्रकार के तथ्य को जो लोग सदियों से मान रहे हैं सदैव मेरी उत्कंठा व मनन का विषय रहे । इसीके साथ विज्ञानं के आधुनिक आविष्कार पीलिया रोग के इलाज़ में सूर्य का प्रकाश फोटोथीरेपी का खूब प्रयोग भी करता रहा व होते हुए जानता रहा हूँ , परन्तु दोनों बातों को कभी एक करके नहीं देख पाया ।
अभी हाल में ही एक नवजात शिशु को फोटोथीरेपी के दौरान नीले प्रकाश को देखकर अचानक ही जब मैंने दोनों बातों को सम्मिलित किया देखा। पीलिया में बिलीरूबिन के पीले रंग के कणों को रक्त में से निकालने में नीले रंग का प्रकाश ही सबसे अधिक प्रभाव कारी क्यों है। ( यह आधुनिक चिकित्सकीय सिद्ध खोज है और फोटोथीरेपी का मूल सिद्धांत )। .....तो स्वतः ही पुरातन बात -पीलिया में पीली वस्तु खाने के परहेज़ का कारण समझ में आने लगा ।
अवश्य ही यह रंग -विज्ञान के गहन गूढ़ वैज्ञानिक तथ्य हैं जो अभी आधुनिक चिकित्सा विज्ञान नहीं जान सका है। पीले रंग का खाद्य-पदार्थ अवश्य ही मोलेक्यूलर चिकित्सा विज्ञान का उन्नत ज्ञान है जो आयुर्वेद केअनुभव ज्ञान द्वारा भारतीय मानस में पैठ कर गया , जिसका कोई कारण आदि उन्हें ज्ञात नहीं । नीला रंग अवश्य ही पीले रंग का विरोधी होने के कारण रक्त से पीले कण हटाता है और पीले खाद्य पदार्थ उसे बढाते होंगे। प्राकृतिक चिकित्सा का एक भाग--रंग चिकित्सा -जिसमें विभिन्न रंग के कांच की बोतलों में सूर्य के जल से चिकित्सा की जाती है उसका भी शायद यही आधार है ।
अतः यह वास्तव में हमें हर पुरातन तथ्य को अंधविश्वास की भांति-अंधविश्वास नहीं कह देना चाहिएअपितु उन्हें जानकार, व्याख्या व अनुभव द्वारा परख कर उसे आधुनिक तथ्यों से तादाम्य द्वारा समझना चाहिए ।

ग़ज़ल...डा श्याम गुप्त..

ग़ज़ल---परम सत्ता ...

बड़े बड़ों के सुर- तेवर ढीले हो जाते हैं।
क्या तिनका, क्या गर्वोन्नत गिरि, नत होजाते है।

कुछ भी तेरे हाथ नहीं है, रे नर! तू क्यों ऐंठा,
उस असीम के आगे, सबके सिर झुक जाते हैं।

हमने बड़े बड़े बलशाली पर्वत-गिरि देखे,
बरसे पानी, कड़के बिजली सब ढह जाते हैं।

आंधी बिजली तूफानों ने तेवर खूब दिखाए,
मन की दृड़ता के आगे वे क्या कर पाते हैं।

चाहे जितना राग द्वेष छल छंद करे कोई,
सत्य राह के आगे सब नत सिर हो जाते हैं।

तूफानों के बीच भंवर में नैया डग मग डोले,
मांझी के मजबूत इरादे , खेकर लेजाते हैं।

सत पौरुष बल मन की दृड़ता अपने निज पै भरोसा,
हो ईश्वर पर श्रृद्धा तब ये गुण मिल पाते हैं।

वही भरोसा, बल है सत है,वही आत्म विश्वास,
उसे भूलते, अहं भाव रत , कष्ट उठाते हैं।

जिसके आगे बड़े बड़ों की अकड़ नहीं चल पाए,
श्याम' परम सत्ता के आगे शीश झुकाते हैं॥

शुक्रवार, 17 दिसंबर 2010

ऋतु श्रृंगार...हेमंत...डा श्याम गुप्त...


हेमंत...
आई फिर प्रिय शीत सुहानी,
घिर
घिर आये प्रीति अजानीतन मन काँपे शीत पवन से,
उभरे
कोई , प्रीति कहानी । ...आई फिर से....॥

अपने
अंतर्मन के तम को -
दूर
करो, प्रिय बचन सुनादोमेरे मन की फुलवारी में,
कुछ
पल बैठो ,हिय हुलसादो

मन
के सारे भेद भुलाकर,
प्रीति प्रेम के बोल सुनादो
याद
करो वह प्रेम कहानी,
याद
करो वह शाम सुहानी । ....आई फिर से.... ॥
शीत पवन तन मन सिहराए,
पीर
पुरानी . मन- लहराएमन में जगे प्रीति की इच्छा ,
ऐसी
गर्म बयार बहा दो

आस
और विश्वास भरे पल,
बीतें
संग संग हिल मिल कर शिशिर घात से जड़ तन मन को ,
प्रेम
अगन से तुम सहला दो

मिल
जुल कोई गीत सजाएं,
इक दूजे में हम खोजायेंमन महकाए प्रीति सुजानी,
नूतन
-नित चिर प्रेम कहानी। ....आई फिर से.... ॥

बुधवार, 15 दिसंबर 2010

डा श्याम गुप्त की कविता...मीरा ..

मीरा

जब जब इन गलियों से गुजरूँ
तब तुम बहुत याद आती हो।
दरवाजे के पार पहुंचकर ,
मुड़कर अक्सर मुस्काती हो।।

जोगन बनकर थाल सजाकर,
जब जब तुम मंदिर जाती हो।
सचमुच की मीरा लगती हो,
वीणा पर तुम जब गाती हो॥

मेरे ख्यालों में आकरके,
अब भी मुझको भरमाती हो।
घर के अन्दर जा कर के तुम,
पीछे मुड़कर मुस्काती हो॥

तेरे गीतों की सरगम से,
हे प्रिय! में कवि बन पाया हूँ।
पर तुम तो बस इतना समझो,
तेरे गीतों का साया हूँ॥

तेरे ही संगीत हे प्रियवर!
मेरे गीत बना जाते हैं।
तेरी यादें, तेरे सपने,
नए नए स्वर दे जाते हैं॥

मेरे मन मंदिर में आकर,
बनी मोहिनी तुम गाती हो।
सचमुच की मीरा लगती हो,
सचमुच मीरा बन जाती हो॥

रविवार, 12 दिसंबर 2010

नीरा यादव और एक आई ए एस को जेल के निहितार्थ...डा श्याम गुप्त ...

नीरा यादव और एक आई ऐ एस को जेल के निहितार्थ.....
एक अच्छा चिन्ह है-- कदाचरण के विरोध में , हम कह सकते हैं कि क़ानून के हाथ बहुत लम्बे होते हैं , हमारे देश में लोकतंत्र पुष्ट होरहा है, अभी न्याय जीवित है, आस्था रखनी चाहिए आदि आदि ---यद्यपि यह अभी सी बी आई की विशेष अदालत का फैसला है । होसकता है कि आगे हाई कोर्ट, उच्चतम न्यायालय तक जाय एवं वे छूट जायं -----परन्तु कदाचरण के प्रसार को रोकने में एक कदम तो हो ही सकता है.....
.क्या केवल नीरा यादव , अर्थात अधिकारी ही इस प्रकरण में दोषी है --- क्या पृष्ठ भूमि में कोई नेता, मंत्री , अन्य उच्च पदस्थ लोग, प्रभाव शाली लोग शामिल नहीं हैं ---क्योंकि इनके सिर्फ मौखिक आदेश व इच्छा होते हैं और कार्य को पालन कराने वाला , हस्ताक्षर करने वाला अधिकारी की जबाव देही होती है....फिर भी यह एक सबक है अधिकारियों के लिए भी कि वे सर्व अधिकार सम्पन्न नहीं है अतः न तो स्वयं अन्य के हाथों की कठपुतली बनें न लाभार्थ शामिल हों, अपितु स्वयम अनुचित कार्यों का विरोध करें ।
.जब महिलायें पुरुषों की स्थितयों ( नौकरी आदि जो पहले सिर्फ पुरुष के कार्य माने जाते थे ) पर होती है वे भी पुरुषों की ही भांति --कदाचार , शोषण, भ्रष्टाचार में सम्मिलित होजाती हैं ; "पावर करप्ट्स"- अतः स्त्री को पुरुषद्वारा शोषण का वहु प्रचारित गुब्बारा भी पिचका हुआ प्रतीत होता है । ---जहां महिलाओं( पत्नी, प्रेमिका, माँ , मित्र आदि की भूमिका में ) को समाज में सदाचरण का, भविष्य की संतति में संस्कार स्थापना का मूल माना जाता है वही स्त्री पुरुषों के कार्य क्षेत्र में आकर , अपनी मर्यादा, आदर्श भूल सकती है, स्वयं ही भौतिकता में लिप्त होकर समाज व संतति को दिशा देने से चूक सकती है... .यह विदेशी नक़ल का परिणाम है जो समाज को पथ भ्रष्टता की और लेजारहा है और आज की संतति को दिशाहीनता की ओर । क्योंकि नौकरी व अधिकारों की दौड़ -होड़ / कार्याधिकता / पालन में- वे संतति की ओर ध्यान नहीं दे पारहीं है...अपितु उदाहरण बन रहीं हैं । उन्हें ( भौतिक लालच , पुरुषों की नक़ल/ बराबरी आदि भ्रामक विचारों से विमुख होकर )अपने मूल कार्य व अधिकारों( स्त्री सुलभ गुणों द्वारा पुरुष व संतति की उन्नायक, नियंता, संस्कार प्रदायक कृतित्व द्वारा समाज की नियंता ) की ओर, शिफ्ट करना चाहिए । स्वयं को पुरुष बनने से रोकना चाहिए...
-महाभ्रष्ट समाज --- प्रायः यह सोचा समझा जाता था कि स्त्रियों के विभिन्न कार्यों पर पदस्थ होने से भ्रष्टाचार पर रोक लगेगी , परन्तु यह विचार भी असफल हुआ है , तथा समाज महा भ्रष्टता की ओर उन्मुख है..
-----इसीलिये महात्मा बुद्ध ने अपने शिष्य आनंद से कहा था , जब उसने यशोधरा को धम्म में लेने को कहा था --" कि आनंद तुम धम्म के द्वार स्त्रियों के लिए खोल तो रहे हो परन्तु आगे धम्म भ्रष्ट होजायगा, अधिक समय चलेगा नहीं ...."

गुरुवार, 9 दिसंबर 2010

मानव, मानव मन, समाज व धर्म ---डा श्याम गुप्त....

जिस प्रकार मानव मन विभिन्न मानसिक ग्रंथियों का पुंज है उसी प्रकार समाज भी व्यक्तियों व व्यक्तित्वों का संगठन है। वायवीय तत्व होने के कारण मन बड़ा ही अस्थिर है, इस पर नियमन अत्यावश्यक है । क़ानून मनुष्य ने मनाये हैं उनमें छिद्र होना अधिक संभव है स्वयं मनुष्य के आचरण-पालन के लिए ; परन्तु धर्म शाश्वत है । वही मन को स्थिरता दे सकता है । धर्म हीन समाज , धर्महीन देश स्थिरता तो क्या , एक क्षण खडा भी नहीं रह सकता , अपने पैरों पर। आज विश्व की अस्थिरता का कारण है -धर्महीन समाज।
धर्म का अर्थ सम्प्रदायवाद नहीं है। आज का चर्चित 'रिलीजन' वास्तव में सम्प्रदाय है, धर्म नहींधर्म व सम्प्रदाय भिन्न भिन्न हैं। आज चर्चित भिन्न भिन्न मत मतान्तर , भिन्न भिन्न धार्मिक नियम --धर्म नहीं है । धर्म तो एक ही है और शाश्वत है। धर्म का अर्थ है--कर्त्तव्य का पालनऔर धर्म का केवल एक ही सिद्धांत है---"कभी दूसरे को दुःख मत दो"...
" सर्वेन सुखिना सन्तु
सर्वे सन्तु निरामया
सर्वे पश्यन्तु भद्राणि ,
माँ कश्चिद् दुखभाग्भावेत ॥ "