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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

शनिवार, 14 अप्रैल 2012

इन्द्रधनुष.....अंक ९ का अन्तिम भाग-----स्त्री-पुरुष विमर्श पर..... डा श्याम गुप्त का उपन्यास.....

                       
 


                      
                                          ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


      
        ’ इन्द्रधनुष’ ------ स्त्री-पुरुष विमर्श पर एक नवीन दृष्टि प्रदायक उपन्यास...पिछले अंक   से क्रमश:......
                                                                 अंक नौ का शेष अन्तिम भाग 
                         

                                   अच्छा केजी, तुम्हें पता है डा. सरला भारद्वाज  इन्डियन मेडीकल कोंसिल  की अध्यक्ष बन गयी हैं ।
             ' डा. सरला ...अपने बैच में तो कोई नहीं थी।'
             नहीं, पर याद करो, देखें कुछ सुधार हुआ है या नहीं । कहाँ तक पहुँच पाते हो।  वे जनरल सर्जन हैं ।
              ' अरे वही न, एम. एस. जनरल सर्जरी में किया था और देश की पहली महिला सर्जन हैं । सीनियर बीच की  डा. भारद्वाज ।'
               हाँ, वही । वाह ! याददास्त सुधर गयी है, क्या बात है । अभी कल की ही तो बात लगती है जब कालिज में गरमा-गर्म खबर फ़ैली थी की कालिज के इतिहास में पहली बार किसी महिला डाक्टर ने एम् एस शल्य चिकित्सा में करने का निश्चय किया है और वह भी ग्रेजुएशन में टापर ने। जो कई पदक प्राप्त हैं ।
               और हम लोग आउट-डोर व वार्ड में विशेष रूप से देखने जाते थे कि वे कैसे काम कर रही हैं , कौन बोल्ड लेडी  हैं ।
                कालिज व अस्पताल में काफी समय तक बहस चलाती रही कि वे सर्जरी में चल पाएंगी कि नहीं । कई बार तो लडके-लड़कियों में काफी तकरार भी  हुई कि ' हम किसी से कम नहीं '- और तुम चमगादड़ की भाँति पाले बदलते रहते थे ।' वह हंसकर कहने लगी , ' फिर मुझे  बचाव करना पड़ता था ।'
                 हाँ, हाँ, मैंने टालते हुए कहा , ' पर आगे अन्य महिला डाक्टरों ने कहाँ अधिक दिलचस्पी दिखाई इस  क्षेत्र  में ।  वही अपने स्त्री -चिकित्सा व बाल-चिकित्सा या पेरा-मेडीकल विषयों में ही जाती  रहीं ।
                 परन्तु  'इक  दिया है बहुत रोशनी के लिए'  उन्होंने तो पीछे मुड़कर नहीं देखा । देश की प्रथम महिला सर्जन बनीं, दिल्ली विश्व-विद्यालय की 'डीन ' और आज सर्वोच्च पद पर ।  देश-विदेश में खूब नाम कमाया । अब तो तमाम महिला चिकित्सक हैं इस फील्ड में ।'
                   ' बड़ी  अच्छी  धमाकेदार खबर है, सुमि !'
                   'मुझे पता था तुम सुनकर खुश होगे ।'  सुमि मुस्कुराकर कहने लगी,' उस दिन भी वो खबर मैंने ही दी थी सबसे पहले तुम्हें ।  याद है जब भी एसी कोई नयी बात होती या सुनते तो तुम गुनगुनाया करते थे....

                               " मोड़ जायेंगे जमाने की कई राहों को,
                                करके नए रंग जमाने की नज़र जायेंगे ।" 
                 ' वाह ! तुम्हें याद है अभी तक ये शेर ।'  मैंने आश्चर्य से कहा ।
                 कैसे और क्यों भूलूँ ?  क्या सबसे पहले मेरे लिए नहीं कहा गया था । पर अब तो वह पूरी ग़ज़ल होगई होगी । सुनाओ न, वह आग्रहपूर्वक बोली । मैंने सुनाया --
                                  " अपने अशआर में हमने  तो संजोया है जहां ,
                                    मुड़के  चल देगा  मेरे साथ  जहां  जायेंगे । 
                              
                                   बात मेरी  न सुने  सारा ज़माना  चाहे ,
                                   चन्द जाहिद तो सुनेंगे औ सुधर जायेंगे ।

                                   बात तेरी हो मेरे प्यार, मेरे देश अगर,
                                   हम तो दीवानगी की हद से गुज़र जायेंगे ।

                                  मेरी यादों में न लग पाएंगे मेले लेकिन,
                                 तेरी गलियों में किये याद मगर जायेंगे ।

                                 केजी' इक रोज़ चले जायेंगे ज़हाँ से लेकिन ,
                                बन के खुशबू तो ज़माने में बिखर जायेंगे ।। " 
            
                  ' बस- बस चुप करो, क्या कह रहे हो ।  क्या पता कब, कहाँ और कौन पहले जाय ।', वह बोल पडी ।
                  'कब जा रही हो  हो ? '  मैंने पूछा तो मुस्कुराती हुई कहने लगी ...
                                  " बात मीठी हो या तीखी हो, तेरी हो अगर,
                                   तेरी हर बात पै चाहोगे तो मर जायेंगे ।" 


                                   आपने पूछा है कि अब आप चले जायेंगे ,
                                   आप कह देंगे कि रुक जाओ तो रुक जायेंगे । "

                        और वह कोहनी रेत पर टिकाकर, हाथों पर चेहरे  को रखकर मुस्कुराने लगी ।  बोली , ' आज शाम को चार बजे की फ्लाईट से जारही हूँ, यहाँ का कार्य जल्दी समाप्त होगया । '
                                   " रास्ते तय हैं, और तय हैं मंजिलें भी केजी,
                                    अपनी अपनी राह यूंही साथ चलते जायेंगे ।"......मैंने कहा तो हंसकर बोली,....वाह ! क्या बात है, अभी भी दम है।  हाथ चूमने को, पैर छूने को दिल चाहता है तुम्हारे तो केजी !  वह दोनों हाथ जोड़कर, सर झुका  कर कह गयी......
                                       " दिल की लगी इस दिल्लगी पर 
                                           क्यों न मर जाये कोई ।"
                   और वह खिलखिलाकर  हंसी  तो  हंसती ही चलेी गयी ।
                   दो बज रहे हैं, मैंने याद  दिलाया ।
                  ओह! वह चुप होते हुए बोली , ' समय कितनी जल्दी बीत गया ?'
                  ’एयरपोर्ट छोड़ने चलूँ’
                  ' हाँ ।'
                               हम  टैक्सी  लेकर सुमि के गेस्ट हाउस होते हुए एयरपोर्ट पहुंचे ।  सुमि ने   पूछा--
                  ' याद करोगे ?'
                   ’नहीं’ , मैंने कहा ---
                                      " दिल में ही सूरत बसी है यार की ,
                                       जब ज़रा  गर्दन  झुकाई   देख  ली।"
                   लाउंज के कोने में खड़े होकर अचानक सुमि ने कहा, " मुझे किस करो कृष्ण ! "
                 ” क्या कह रही हो, क्या पागलपन है सुमि !’  मैंने आश्चर्य से कहा ।
                  'आज मैं ही कह रही हूँ । यही कहा था न तुमने पहली मुलाक़ात में ?'  वह सोचती  हुई बोली ।
                           
                             मैंने होठों से उसके  माथे को छुआ तो वह खिलखिलाकर हंस पडी। 'मैं क़र्ज़ मुक्त हुई केजी। अब चैन से जा सकूंगी, कहीं भी ।'  वह गहराई तक मेरी आँखों में झांकते हुए बोली ।
                 'और अब तक का सूद ।'  मैंने हंसते हुए कहा ।
                ’अगले जन्म में ।’
                ’आशा है अगले जन्म में भी हम पक्के मित्र रहेंगे ।’  मैंने अनायास ही कहा ।
                'नहीं, पति-पत्नी ।'
               ’ व्हाट ?... क्या !’
               'अगले जन्म की प्रतीक्षा करो, केजी ।'   और वह तेजी से बोर्डिंग लाउंज में प्रवेश कर गयी ।

                        ------------ अंक नौ समाप्त , क्रमश अंक दस ....अगली पोस्ट में ।
                    
  
                                   
                
    

गुरुवार, 12 अप्रैल 2012

इन्द्रधनुष.....अंक ९ का शेष-----स्त्री-पुरुष विमर्श पर..... डा श्याम गुप्त का उपन्यास.....

          


 

                      
                                          ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


      
        ’ इन्द्रधनुष’ ------ स्त्री-पुरुष विमर्श पर एक नवीन दृष्टि प्रदायक उपन्यास...पिछले अंक  से क्रमश:......                                                 अन्क नौ  का शेष

                         'पर साहित्यकार भी आज कहाँ अपना दायित्व निभा रहे हैं ।  सुरा सुन्दरी, कार, बंगलों के लिए अंधी दौड़ में शामिल होकर, सोफों पर बैठकर प्रेमगीत,गरीबी, पतन,रोंने-गाने के, सरकार व समाज विरोधी कथानक व गीत सिर्फ लिखकर बिना किसी समाधान प्रस्तुति के...वे क्या कहना चाहते हैं?   व्यर्थ के व्यंग्य, द्विअर्थी हास्य, क्लिष्ट भाषा, पान्डित्य-प्रदर्शक कवितायें, पुराने घिसे-पिटे गुरुडम, अखाड़े बाज़ी, गली गली में खुलती साहित्यिक संस्थाएं, जोड़ तोड़ कर डिक्शनरी रखकर लिखने वाले कवि, टुट पूंजियों से लेकर बड़े बड़े समाचार पत्र-पत्रिकाएं व प्रकाशक सिर्फ कमाई का ज़रिया ढूँढने में लगे हैं। साहित्य --अर्थात समाज व स्वयं साहित्य का व्यापक हित कौन सोच रहा है?  सूर तुलसी कबीर जैसा उपयोगी, व्यवहारिक साहित्य कौन रच रहा है। क्या प्रकाशकों को, बुक सेलरों को, मुद्रकों को अधिकार है कि वे तय करें साहित्य क्या व कैसा हो ।  भाषा व साहित्य कैसा हो।  क्या व कौन छपना चाहिए ?'  मैंने पूछा ।
                         नहीं, सुमि कहने लगी ,' उन्हें बस छापना, प्रकाशन व बेचना चाहिए, उन्हें  सही, शुचि सत्साहित्य के प्रकाशन के उन्नयन पर ध्यान देना चाहिए । साहित्य की दिशा व गुणवत्ता पर विश्व-विद्यालय के सम्वद्ध शिक्षकों, विद्वानों व विज्ञ- साहित्यकारों का मंतव्य ही मान्य होना चाहिये, जहां आर्थिक दृष्टि भाव न हो ।
                           आज समाचार पत्रों के संवाददाता, पत्रकार, सम्पादक, मालिक, प्रकाशक, पुस्तक-विक्रेता आदि साहित्य के दिशावोधक बन गए हैं जो मूलतः शासन-प्रशासन की अज्ञानता, अनुभवहीनता, उदासीनता व अक्षमता से होता है । आर्थिक दृष्टि के साथ गुणवत्ता का भाव रखना दुष्कर है । प्रकाशक क्या छाप रहे हैं, कैसा व क्यों छाप रहे हैं उस पर विज्ञ-समिति का नियंत्रण व समय समय पर विचार विमर्श होना चाहिए ।
                          ' और यदि विज्ञ समिति भ्रष्टाचार में लिप्त होजाय तो ।'
                         ' सही है, यह होता है, हो सकता है ।' सुमि बोली,' परन्तु गुणवत्ता की मात्रा तो अधिक रहेगी। पूर्णता के लिए तो फिर घूमकर हम वहीं पहुंचते हैं। मानव मात्र को ही सच्चरित्र होना पडेगा, तभी सब कुछ ठीक होगा । "सौ बातों की एक बात "  हज़ार प्रश्नों का एक उत्तर ।'
                            और यह कैसे होगा ? मैंने पुनः पूछा ।
                             आत्मानुशासन से, अन्य चाहे कुछ भी करते हों परन्तु हम असत्याचरण नहीं करेंगे.....की भावना से । हाँ, यह दुष्कर कार्य है पर असंभव नहीं । हम प्रारम्भ तो करें ....कहीं से भी....सभी अपने -अपने क्षेत्र में ....घर से...सत्साहित्य से.....जैसे तुम....वह हंसते -हंसते कहती गयी ।'
                 ” क्या सोच रहे हो?
                   ’आँ.....s  s.. मुझे तुम्हारा कालिज का पहला दिन व भाषण अचानक याद आ गया ।
                   ’अब छोडो भी मत याद  दिलाओ ।’
                  ”चलो कुछ और बात की जाय”
                   हाँ, तुम्ही छेड़ो, सुमि बोली ।’
                   ’अच्छा बताओ, आज बहु प्रचारित मनुवादी व्यवस्था पर तुम्हारे क्या विचार हैं”
                                          'आधारभूत रूप में सवर्ण और अवर्ण का अर्थ मैं यह लगाती हूँ कि वर्ण का अर्थ होता है 'रंग' . अर्थात विविधता । अतः जिसके व्यवहार में , बोलचाल-कार्य में रंग अर्थात वैविध्य  है , गत्यात्मकता है, प्रगति है, युक्ति-युक्तता है..वह समाज 'सवर्ण' तथा जिसमें रंग नहीं हैं अर्थात व्यवहार-विविधता, यथायोग्य निर्णायकता नहीं, गति नहीं वरन एकरूपता , जड़ता, जड़ पशुओं जैसी समूह-प्रकृति व सोच है, व्यक्तिगत स्वतंत्रता व वैविध्य चिंतन नहीं वह 'अवर्ण' है ।  अज समस्या यह नहीं कि मनुवादी सवर्ण एनी पर राज कर रहे हैं अपितु आज राजनैतिक दल व शासन मनुवादी सवर्ण व्यवस्था भूल चले है और सभी समूहवादी, जड़वादी अवर्ण व्यवस्था के पोषक हैं । यहाँ जाति व धर्म का अधिक अर्थ व महत्त्व नहीं है।
                      मैं उसे एकटक देखता रहा तो सुमित्रा बोली ,' इसे क्या देख रहे हो, क्या ये विचित्र व्याख्या है?'
                     ' हाँ, सो तो है ही, नवीन व्याख्या है ।'
                      'पर मुझे विश्वास है कि तुम इसपर पहले ही सोच चुके हो । '
                       'सच '
                       'क्या मैं गलत हूँ ?'
                        नहीं, मैं तुमसे सहमत हूँ । अच्छा मैडम! ये किटी- पार्टी  के बारे में भी स्पष्ट करें ।' मैंने बात को आगे बढाया ।
                       किटी-पार्टी विदेशी.......अरे! कहीं तुम अपने कथा-उपन्यास आदि की सामग्री तो एकत्र नहीं कर रहे हो ।' उसने अचानक आँखों में झाँक कर पूछा । मैं मुस्कुराया तो कहने लगी , चलो बताये देती हूँ, क्या याद करोगे । क्या पता मेरी ये बातें ही तुम्हारे उपन्यास, काव्य आदि साहित्य में आकर अमर होजायं और मैं भी । फिर कल मिलें न मिलें ।क्या पता ।'
                         किटी पार्टी भी तमाम अन्य रीतियों की भाँती विदेशी नक़ल है। भी पहले भी अपने यहाँ स्त्रियाँ खाली समय में आपस में उठती बैठती थीं ।  एक दूसरे के घर जाना व गीत, संगीत, नृत्य, नाटिका, वादन, चित्रकला, कढाई-सिलाई-बुनाई , कला-कौशल, हंसने-बोलने में समय व्यतीत करती थीं।आपस में सहयोग भी समाज सेवा भी ।इन कला-कौशलों का व्यवसायीकरण होजाने के बाद यही सादी-गहनों की चर्चा में परिवर्तित होगया\ परन्तु लें-दें से कोइ अभिप्राय: नहीं था। क्योंकि आजकल हर कार्य पैसों से एवं धन एकत्र करके किया जाने लगा है वही 'किटी ' है । जो धन के दिखावा व नंबर दो के कला पैसा के खर्च का जरिया बन गया है और मनोरंजन सिर्फ नाम को उसका सह-जरिया ।'

                                             -----अंक नौ क्रमश:  ...अगली पोस्ट में....        

                        

                                    

                           

रस-निष्पत्ति, श्रृंगार , बोल्ड विषय , साहित्य व श्रृंगार पर मर्यादित साहित्य कैसे लिखें....डा श्याम गुप्त

                               ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
                  ( अभी हाल में ही ब्लॉग पर एक ब्लोगर द्वारा बोल्ड विषय पर बोल्ड कविता पोस्ट करने एवं उसको और अधिक बोल्ड शीर्षक देकर एक अन्य ब्लोगर द्वारा उसे हवा देने के कारण आयी हुई टिप्पणियों -प्रति-टिप्पणियों के कारण  काफी हलचल रही।  तमाम ब्लोगरों द्वारा विभिन्न पोस्ट, अंग्रेज़ी साहित्य पर शोध  व पुरुष मानसिकता पर व्याख्यान प्रस्तुत किये गए। प् रस्तुत हैं  श्रृंगार, बोल्डनेस व साहित्य पर कुछ विचार । )
                     मानव मन में रस-निष्पत्ति आलंबन -उद्दीपन द्वारा संचारी भावों द्वारा रस संचार से होती है जो अनुभव-विभाव द्वारा प्रदीप्त व प्रकट होती है ।  अन्य सभी रस -- यथा शांत, हास्य, वैराग्य, बीर ,रौद्र, आदि मूलतः एकाधिकारी हैं जिनमें उनकी अप्राप्ति व अत्यधिकता से अन्य रसों- भावों  की उत्पत्ति नहीं होती। श्रृंगार -रस  एक एसा रस है जिसकी अप्राप्ति ( क्रोध, रौद्र ..) प्राप्ति (शान्ति -मुमुक्षा ) व अत्यधिक प्राप्ति ( वितृष्णा,वैराग्य ) होते हैं । इसीलिये इसे रस-राज कहा गया है। स्थायीभाव प्रेम  का उत्कृष्टतम फल- रूप दर्शन अर्थात फिलोसोफी  है। श्रृंगार रस का प्रसारी, कार्यकारी व फलरूप काम है.. सेक्स है ....व संतानोत्पत्ति है  ...  जो जीवन व मानवीय सभ्यता  का उत्कृष्टतम व आवश्यकतम तत्व है। मानव का मूलतः खोजी मन अप्राप्य, आवृत, ढकी हुई , अज्ञात  के प्रति आश्चर्य, आकर्षण,व प्राप्ति-हेतु प्रयत्न व प्रगति को स्वीकारता है एवं प्राप्ति उपरांत अनाकर्षण की उत्पत्ति करता है।  प्राप्ति  व अत्यधिक प्राप्ति के बाद विकर्षण व अनाकर्षण  की उत्पत्ति होती अतः सुलभ ,सरलता से प्राप्त, अनावृत्त, खुली हुई, निरावरण के प्रति स्वाभाविक अनाकर्षण रहता है।
                       भारतीय संस्कृति में  पत्नी/ नायिका  का घूंघट,..पति/ प्रियतम के सम्मुख लज्जावरण, अंगों का आवरण मूलतः प्रेम रस के उद्दीपन व प्रदीप्तन का हेतु बनते हैं । नारी का प्रतिपल, दिवस, मॉस, वर्ष,  व वय के साथ साथ गोपनीयता,रहस्यमयता , नित-नवीनता उत्पत्ति इसी विकर्षण की... न-उत्पत्ति... का हेतु है।  इसीलिये नारी को ब्रहमा भी नहीं समझ पाता। पुरुष की नित-नवीनता युत विभिन्न रति-क्रियाओं की नवीनता भी इसी हेतु हैं ।  यह भाव सृष्टिक्रम में व्यतिक्रम उत्पत्ति हेतु प्रेम, श्रृंगार, काम  में विकर्षण व विराग का कारण नहीं बन पाता ।  यदि मानव -स्त्री-पुरुष -के समस्त अंग व भाव, विचार क्रिया -बोल्डनेस द्वारा -अनावृत व अपने सम्पूर्ण रूप-भाव में  सामने आजायं तो ..खोज समाप्ति पर यह स्थिति निश्चय ही - विकर्षण, वितृष्णा  द्वारा वैराग्य की उत्पत्ति से  सृष्टि-क्रम के लिए घातक सिद्ध हो सकती है।
              साहित्य भी जीवन तत्व है इसीलिये उसमें भी उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, व्यंजना आदि द्वारा आवरित , मर्यादित, सार्थक काव्य रचना का प्रचलन है । ताकि मानव मन कल्पना के मनो-सागर में उतराता रहे ...नित-नवीन श्रृंगार रस-निष्पत्ति होती रहे ।  खुले व अनावृत बोल्ड  विषय-शब्दों- भावों द्वारा विकर्षण -अनाकर्षण  न उत्पन्न हो । सार्थक मर्यादित परन्तु रस-श्रृंगार से भरपूर अर्थ-पूर्ण साहित्य ...संस्कृत भाषा -साहित्य में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है..कालिदास के  कुमार संभव में सम्पूर्णता से रचित है।
                           मेरे  महाकाव्य " प्रेम काव्य"  की एक रस श्रृंगार से सिक्त सम्पूर्ण वर्णन सहित परन्तु मर्यादित भाषा  पूर्ण एक रचना प्रस्तुत है....देखिये ---




        सखि कैसे !


सखि री ! तेरी कटि छीन,
पयोधर भार भला धरती हो कैसे ?
बोली सखी मुसुकाइ, हिये, 
उर भार तिहारो धरतीं हैं जैसे |


भोंहें बनाई कमान भला,
 हैं तीर कहाँ पै,निशाना हो कैसे ?
नैनन  के  तूरीण में बाण,  
धरे उर,पैनी कटार   के जैसे   |


कौन यहाँ मृग-बाघ धरे, 
कहो बाणन वार शिकार हो कैसे ?
तुम्हरो हियो मृग भांति  पिया,
जब मारै कुलांच,शिकार हो जैसे |


प्रीति तेरी  मनमीत प्रिया, 
उलझाए ये मन उलझी लट,जैसे |
लट सुलझाय तौ तुम ही गए,
प्रिय मन उलझाय गए कहो कैसे ?


ओठ तेरे विम्बाफल भांति, 
किये रचि लाल, अंगार के जैसे ?
नैन तेरे प्रिय प्रेमी चकोर,
 रखें मन जोरि अंगार से जैसे |



प्रीति भरे रस-बैन तेरे, कहो ,
 कोकिल कंठ भरे रस कैसे ?
प्रीति की बंसी तेरे उर की, 
पिय देती सुनाई मेरे उर में से |


 अनहद नाद को गीत बजै,
संगीत प्रिया अंगडाई लिए  से   |
कंचन काया के ताल-मृदंग पै, 
थाप तिहारी कलाई दिए ते |


पंकज नाल सी बाहें प्रिया, 
उर बीच धरे  क्यों, अँखियाँ मीचे ?
मत्त-मतंग  की नाल सी बाहें, 
भरें उर बीच रखें मन सींचे ||




मंगलवार, 10 अप्रैल 2012

योग गुरु रामदेव जी के सन्स्थान का खुदरा बाज़ार में उतरना..... डा श्याम गुप्त...

                                        ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...          
                           दादी -माँ के नुस्खों के बीच पलते हुए...वैद्यजी-हकीम जी की पुड़ियों के मध्य गुजरते हुए बचपन ..तत्पश्चात एलोपेथिक मॉडर्न हस्पतालों व डाक्टरों की राह बढ़ते हुए मैं प्रायः दोनों -तीनों पद्धतियों की चमत्कारिक चिकित्सा क्षमता, चिकित्सा सेवा व दवा के मूल्य के अंतर  पर सदा ही विचार किया करता था कि यदि आयुर्वेदिक प्रणाली देश में चलती रहे तो कितने लाभ में रहे गरीब देश की गरीब जनता....। फिर आगे जब आयुर्वेदिक -डाक्टरों-वैद्यों को भी एलोपेथिक दवाएं-प्रयोग करते देखा तो दुःख हुआ व यह एक दुस्वप्न सा ही प्रतीत हुआ।  
                     अपने मेडीकल स्कूल के दिनों में फिर पी जी, रेज़ीडेंट सर्जन  और आगे चिकित्सा प्रेक्टिस के दिनों में जब एलोपेथी  के साथ अन्य.. पेथी...आयुर्वेदिक, होम्योपेथिक  आदि के प्रारम्भिक ज्ञान प्राप्त करने पर मैं प्रायः ..अंग्रेज़ी चिकित्सा पद्धति की ..अधिक मूल्य -प्रभाव, विदेशी पद्धति होने के कारण हमारी अनिवार्यतः परालम्बता एवं स्वयम  अपने देशीय भाव को आगे न बढ़ा पाने की मजबूरी और देश की अधिकाँश सामान्य जनता की मज़बूरी के  चलते यही सोचा करता था कि यदि देश में तथाकथित आधुनिक पद्धति एलोपेथी के साथ साथ--अपनी प्राचीन आयुर्वेदिक पद्धति का बोलबाला हो, आगे बढकर यह पद्धति व उसकी औषध-संस्थान  आगे प्रश्रय पाए तो हम विदेशी दवाओं पर आधारित न होकर ..कितना अधिक देशी-विदेशी मुद्रा को बचाने में सफल हो सकते हैं एवं परालंबन से छुटकारे में भी, जिससे देश को और अधिक तेजी से विकास की राह मिल सकती है।
                 आज  जब योग गुरु रामदेव जी अपने संस्थान की  औषधियों को खुदरा बाज़ार में उचित मूल्य पर लाना चाहते हैं तो कुछ आशा की किरण ही दिखाई देती है, न की कोई बुराई  ।  इसका स्वागत किया जाना चाहिए । निश्चय ही यदि आयुर्वेदिक औषधियां बाज़ार के - प्रभाव से मुक्त होकर सस्ती दरों पर मिलती हैं तो अच्छा ही है। इससे हमें आजकल एलोपेथी व विदेशी तौर तरीकों पर चलने वाली कुछ तथाकथित आयुर्वेदिक
 दवा कंपनियों के जाल से मुक्ति मिलेगी एवं यदि आयुर्वेदिक सस्ती दवाएं प्रचलन में आती हैं तो यह देशी दवाएं ही नहीं  अपितु   आयुर्वेदिक - चिकित्सा पद्धति के भी आगे बढ़ने में एक कदम सिद्ध होगा और अरबों रुपये की विदेशी मुद्रा के बचने का ज़रिया ।       
                    रामदेव जी की सिर्फ इसीलिये विरोध नहीं होनी चाहिए की वे योगी हैं उन्हें योग -शिक्षा से मतलब रखना चाहिए व्यवसाय में नहीं आना चाहिए।    यह अनुचित सोच है । एक तरफ तो हम विश्वविद्यालयों, शिक्षा संस्थानों को अपनी स्वतन्त्र आर्थिक-दृष्टि विकसित करने  हेतु योजनायें बनाने   की बातें करते हैं दूसरी और आयुर्वेद संस्थानों के प्रति भेद- भाव।  राम देव योगी हैं कोई सन्यासी नहीं .... योग का अर्थ ही हर वस्तु, विचार व क्षेत्र में समन्वय करना होता है ..   सामाजिक समन्वय... अतः उनका बाज़ार में उतरना  कोई योग से पथ-भृष्ट होना नहीं है अपितु योग को वास्तविकता देना, सामाजिकता से जोड़ना ही है।  हाँ इसमें उन्हें स्वार्थ से परे रहना होगा । 

शुक्रवार, 6 अप्रैल 2012

. गट्टू पहलवान ...डा श्याम गुप्त की लघु कथा ...

                           ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...




                             खाने की  छुट्टी में किशोर जब अपना खाना खाकर स्कूल के पीछे वाले खुले स्थान में पहुंचा, जिसे बच्चे खेलने के लिए प्रयोग करते थे, तो सारे बच्चे चुपचाप थे । कोई भी न लट्टू चला रहा था न कंचे खेले जारहे थे ।
          सब चुपचाप क्यों हैं, खेल क्यों नहीं रहे। क्या हुआ ? किशोर पूछने लगा ।
           गट्टू राकेश का लट्टू व कंचे छीन ले गया है ।
           ये कौन है, उसने राकेश के कंचे क्यों छीन लिए और तुम लोगों ने रोका  नहीं ? किशोर बोला । क्या वो अपने स्कूल में पढ़ता है ।
            अबे ! वो  पहलवान  है, गट्टू दादा । अपने स्कूल का तो नहीं है | वह पीछे की गली में रहता है और पहलवान है, ताकतबर भी ।  मंदिर के  पंडित परिवार का है । कोई कुछ नहीं कह सकता । परसों राकेश ने अपना लट्टू देने से मना किया था तो  पिटाई कर दी । रोशन बोला, जो स्वयं  इसी गली में रहता था ।
              पर बाहर वाले का यहाँ क्या काम, और पहलवान का बच्चों से क्या मतलब। किशोर ने कहा।
             क्या करें वह दादा जो है ।
             क्यों सब लोग पकड़कर पीटें, तो उसे भागना पडेगा ।
             अच्छा  तुम करके देखना, पता चल जाएगा। यह किताब पढ़ना थोड़े ही है  जो रटकर होशियार बन जाओ,  मास्टर जी क्लास का मानीटर बना देंगे।
            लोहार गली में  जैन श्वेताम्बर मंदिर का प्राइमरी स्कूल था।  किशोर का अभी अभी दाखिला हुआ था। खाने की छुट्टी में बच्चे स्कूल के पीछे वाली गली में एक खाली स्थान पर खेलने में व्यस्त होजाते थे । कभी कभी सुबह स्कूल खुलने से पहले आकर एवं पूरी छुट्टी के बाद भी खेला करते थे । गट्टू पहलवान पीछे वाली गली में स्थित शहर के बड़े वाले शिव-मंदिर के पंडित परिवार का छोटा बेटा था । पंडित परिवार शहर के धाकड़ खानदानों में था । यद्यपि पंडित खानदान ने शहर को बड़े बड़े डाक्टर , अफसर अदि भी दिए थे परन्तु वह दादागीरी के लिए भी मशहूर था ।  इस शहर में धाकड़, अकड़बाज़ व पहलवान टाइप के  लोगों को को दादा कहा जाता था । हर गली मोहल्ले का एक दादा हुआ करता था । उनके  बच्चे व परिवारी जन भी दादा होते थे ।
            अगले दिन  जब   किशोर खेल के मैदान में पहुंचा तो देखा कि सभी बच्चे एक  गठीले बदन  व गट्टे शरीर के एक लडके को घेर कर खड़े थे, उसका शरीर अन्य सामान्य बच्चों से कुछ अधिक बड़ा था । किशोर को देखते ही रोशन बोला, चलो इन्हें प्रणाम करो हाथ जोड़कर ।
              कौन है ये । किशोर बोला, अपने स्कूल का तो नहीं लगता।
              ये  दादा हैं, गट्टू पहलवान । रोशन बोला, प्रणाम करो ।
              क्यों ?
               सब प्रणाम करते हैं दादा को ।
              'अबे कौन है तू ?' गट्टू ने किशोर को घूरकर  देखते हुए कहा। नया नया आया है क्या ।
               हाँ, उस्ताद, ये किशोर है , नया नया आया है, क्लास का मानीटर भी है । कल पूछ रहा था, कौन है ये। किशोर चुपचाप खडा रहा तो गट्टू बोला ,       
             ' चल चुपचाप अपना लट्टू दे ।'
             नहीं देता, क्या कर लोगे ? पहलवान हैं तो अखाड़े में जाएँ, बच्चों को क्या धमकाते हो। किशोर बोला।
             अबे उल्लू के........। गट्टू तेजी से आगे बढ़ा तो किशोर ने उसे जोर से धक्का दिया। फिर वे एक दूसरे से भिड़ गए, गुत्थम -गुत्था होगये । कभी किशोर ऊपर तो कभी गट्टू । बच्चे डर के कारण गट्टू की वाह वाह किये जारहे थे । तभी खाने की  छुट्टी  समाप्त होने की घंटी बजी । दोनों खड़े होकर एक दूसरे को देखने लगे। बच्चे किशोर से कहने लगे, खूब पिटे...खूब पिटे ।
               पीटा भी तो पहलवान को, दादा को, किशोर बोला ।
                गट्टू धमकाता हुआ, फिर देखूंगा कहता हुआ चला गया । बच्चे खुश भी थे कि आज उनके लट्टू-कंचे छीने जाने से बच गए।
                 अगले दिन खाने की छुट्टी पर बच्चे कहने लगे,  'रोशन, आज तुम्हारे गट्टू दादा नहीं आये !'
     


गुरुवार, 5 अप्रैल 2012

इन्द्रधनुष.....अंक ९-----स्त्री-पुरुष विमर्श पर..... डा श्याम गुप्त का उपन्यास.....

           

 


                      
                                          ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


      
        ’ इन्द्रधनुष’ ------ स्त्री-पुरुष विमर्श पर एक नवीन दृष्टि प्रदायक उपन्यास...पिछले अंक आठ   से क्रमश:......
                                                                 अंक नौ  

                                 सोचते सोचते न जाने कब नींद लग गयी । सुबह किसी के झिंझोड़ने पर मैं जागा ।
             '  क्या है सुभद्रे ! सोने दो न ।'
               ' उठो, मैं सुमि हूँ, केजी ! तुम ट्रेन मैं हो घर में नहीं ।'
               'ओह, मैं हडबडाकर उठा । सुमि फ्रेश होकर दोनों हाथों में कप पकडे खड़ी हुई थी ।'
             ' गुड मार्निंग '   मैंने कहा ।
               वेरी वेरी गुड है ये मार्निंग, तुम्हारे साथ कृष्ण, चलो काफी होजाय ।  
               हम दोनों ही हंस पड़े ।
               'तुम तो एक दम घोड़े बेचकर सोरहीं थी, बेफिक्र । मैडम, ये ट्रेन है बैडरूम नहीं । सुना नहीं है--
  "तेरी गठरी में लागा चोर , मुसाफिर जाग ज़रा ।"
                'प्रथम क्लास  ऐसी है, कौन चोर आता है । और गठरी में तो चोर जाने कब से लगा हुआ है ।' , वह मुस्कुराई ।
               ' फिर भी यात्रा में इतना बेफिक्र नहीं सोना चाहिए ।' मैंने सहज भाव में ही कहा ।
                'तुम थे न तभी तो......।'
                'इतना विश्वास है मुझ पर ?'
                ' क्या हुआ है तुम्हें ? पता भी है क्या कह रहे हो । चलो काफी ख़त्म करो ।'
                 ' अच्छा, स्त्री-पुरुष मित्रता पर अब तुम्हारे क्या विचार हैं ?'
                ' आगये न अपनी पर ।' उसने बाल संवारते हुए कहा ,' वही, स्वस्थं मित्रता होनी चाहिए। जब तक एक दूसरे के बारे में पूर्ण ज्ञान न हो, नहीं होनी चाहिए । एक दम ख़ास विश्वासी मित्र के अलावा किसी के साथ एकांत में न जाना चाहिए न घूमना । एकांत में तो ख़ास मित्र के साथ भी नहीं । टाइम-टैस्टेड मित्र के साथ अकेले जा सकते हैं, तुम्हारे जैसे ।' उसने मुस्कुराते हुए कहा ।
                ' और मेरे जैसा विश्वादी मित्र धोका दे तो ?'
                ' हरि इच्छा ! मेरा दुर्भाग्य,ईश्वरेच्छा पर किसका वश । हमें तो अपना व्यवहार उचित प्रकार से करते रहना चाहिए, न कि "आ बैल मुझे मार । "   दुनिया के कार्य तो चलते ही रहेंगे । वैसे तुम्हारे अपने मस्तिष्क  में तो यह बात कभी आई ही नहीं होगी ।', वह खुलकर हंसी ।
                  ' आं....ss  आई नहीं होती तो  बात निकलती ही कैसे ? और  तुम्हारे अपने मस्तिष्क  में .....क्या मस्तिष्क  भी दो तरह के होते हैं मनुष्य के पास...एक अपना एक पराया ?'
                  ' हाँ, आई होगी पर दूसरों के लिए, अन्य के सन्दर्भ में । जब हम अपने लिए सोचें तो अपना स्वयं का मस्तिष्क  और अन्य लोगों के सन्दर्भ में सोचें तो सामाजिक मस्तिष्क  कार्य कर रहा होता है ।  तुम्हारे पास तो अवश्य ही दो हैं ।'  वह हास्य स्मित अधरों से बोलती गयी ।
                   ' वाह ! क्या नयी रिसर्च की है ।' मैंने हंसते हुए सर हिलाकर कहा ।'
                  'कब तक दूसरों के लिए ही सोचते रहोगे, जीते रहोगे ?'   
                   ' हम सदा अपने लिए ही तो जीते हैं। मैं सदा ही तो यह कहता हूँ । अच्छे बनने के लिए ही तो, कि लोग हमें अच्छा कहें, प्रशंसा करें, हम दूसरों के कार्य करते हैं । ' 
                   'वस्तुतः व्यक्ति की स्वयं अकेले की क्या स्थिति होती है ?  हम वह होते हैं जो अन्य हमें कहते हैं, समझते हैं । हम चाहे लाख तीसमार खां हों, यदि अन्य नहीं  समझते तो हम कुछ भी नहीं हैं । यह व्यवहारगत मूल संसारी तथ्य है । वीतरागी की बात पृथक है । परन्तु वीतरागी भी तो वही बन सकता है जिसने पहले राग को जाना हो तब त्यागा हो ।'
                   ' इसी प्रकार जैसे नारी की पिता, पुत्र, भाई, पति या मित्र के बिना कोई पहचान नहीं होती।  उसका नारीत्व कैसे सफल होगा ? उसी प्रकार पुरुष की भी स्थिति है। नारी, पत्नी, भगिनी, मां, पुत्री, मित्र के बिना कौन उसके पुरुषत्व को सराहेगा और क्यों । अतः स्वयं को अच्छा साबित करने के लिए ही हम दूसरों पर कृपा व उनके कार्य करते हैं ।'
                   ' मैं तुमसे ही तो नहीं जीत पायी, कृष्ण ।'
                    ' तो वैसे  तुमने विश्व-विजय कर लिया है, क्या !'
                  ' वह हंसकर रह गयी।  फिर बोली, ' अपने आस पास का संसार तो मैंने विजय किया ही है ।' 
                   ' बड़े संसारी होगई हो । तो सांसारिक समता समानता पर अब क्या विचार बने हैं तुम्हारे ?'
                   वह हँसने लगी, फिर बोली, ' सभी एक समान कैसे हो सकते हैं ? मैं प्रथम श्रेणी में यात्रा कर रही हूँ, मेरे पास किराया देने को धन है । क्योंकि मैंने परिश्रम व साधना की है ।वह सड़क पर खड़ी भिखारिन मेरे बराबर कैसे हो सकती है । वह अपने कर्मों के कारण वहां है , मेरे कारण नहीं । मनुष्य के कर्म ही यह फैसला करते हैं कि उसे कहाँ होना चाहिए । बस उसे परमार्थ-हित, स्वार्थ रहित कर्म करते जाना चाहिए ।'
                   ' क्या यह गर्व नहीं है ?'
                   ' यह आत्मविश्वास है, गर्व नहीं, कृष्ण ! मुझे पता है तुम जानते हो । और गर्व करूंगी, वो भी केजी के सामने ?' वह जोर से हंसी, ' इसका यह अर्थ भी नहीं कि हम उस भिखारिन से घृणा करें या प्रताड़ित करें । यह ईश्वर का काम है, हमारा नहीं । हम चाहें तो उसकी सहायता कर सकते हैं ।'
                  ' और जो लोग अपनी साधना-सिद्धि का दुरुपयोग करके, या  अवैध और अनधिकृत ढंग से कमाई करते हैं उनका क्या इस स्थिति से कोई सम्बन्ध है ?'
                  ' हाँ, अवश्य ही वे उसकी व देश समाज की इस स्थिति के लिए दोषी हैं । तभी तो भिखारी को एक पैसा दे देना या गरीब की सहायता कर देने वाला भारतीय स्वभाव यह दर्शाता है कि एसे व्यक्तियों के पाप-पूर्ण कार्यों का हम कुछ निराकरण करके अपने दायित्व की कुछ पूर्ति कर  रहे हैं । और यदि जाने अनजाने उस स्थिति के लिए कहीं हम भी थोड़ा सा जिम्मेदार हों तो उसका प्रायश्चित ।'
                 ' और यदि स्वयं तुमको भी ऐसी परिस्थिति से दो-चार होना पड़े तो ?'
                 'वह भी मेरे कर्मफल के कारण होगा, कोई गिला-शिकवा नहीं। झेलना चाहिए ।'
                ' कहना बहुत आसान है', मैंने कहा । 
                ' हाँ, सचमुच, पर कठिन कार्य आने पर ही तो इंसान निखरता है ।  वैसे कौन सा अच्छा कार्य सरल होता है ?'
               ओह, सुमि !  'यू आर स्टिल जीनियस ।'
               ' स्टिल !...'तो क्या मुझे उम्र के साथ कम अक्ल होते जाना चाहिए ? या तुम्हारा मतलब है तुमसे दूर रहकर ..'
                              " वह दूर भी  है पास भी है,
                                दिल के करीब रहता है ।
                                जोशो जुनूँ को मेरे ,
                               कोई तो हवा देता है ।।"    
                                            मैंने उसे ध्यान से देखा । पच्चीस वर्ष बाद  की  सुमि;  वही तेज तर्रार आत्मविश्वास से युक्त गहरी आँखें, मर्यादित पहनावा, गरिमामय सौन्दर्य । कनपटी पर झांकते समय की कहानी कहने को आतुर रुपहले बाल । 
                    ' क्या देख रहे हो ?'
                    " दिल ढूँढता है फिर वही सुमि वो रात दिन ।
                     बैठे है तसब्बुर में जवाँ यादें लिए हुए ।।" 
                    ' तुम तो वैसे के वैसे हो, योगीराज !'
                                 
                             **                              **                           **
                                         
                               निर्धारित कार्यक्रमानुसार हम लोग चौपाटी, मैरीन ड्राइव आदि घूमते रहे । भेलपूरी चाट आदि के वर्किंग-लंच के बीच पुरानी यादें ताजा करते रहे ।  केरियर,  परिवार सभी के बारे में बातें होती रहीं । काव्य-संग्रह के अंश सुनकर पुरानी सुमि लौट आई थी । जम कर प्रशंसा व समीक्षा करती रही । बोली -
                    'कुछ मुझे भी समर्पण करो ।'
                     ' सब तुम्हीं को अर्पण है , अब समर्पण की बात कहाँ ?'
                    हूँ, सुमि कहने लगी,  'सच कृष्ण, जब भी मैं उदास या डिप्रेस्सेड  होती हूँ  तो चुपचाप झूले पर बैठकर कालिज व तुमसे जुडी यादों में खो जाती हूँ, जो  मुझमें पुनः जीवन व नवीनता का संचार करती हैं ।  सच है, सुखद, सुहानी यादें बड़े सशक्त टानिक होती हैं ।  क्या मैं विभक्त व्यक्तित्व हूँ । तुम तो अपने बारे में कहते ही नहीं ।'
                      ' नहीं, सुमि ! तुम अभक्त, अनंत, परमसुखी व्यक्तित्व हो , और मैं भी ।' 
                    ' हर बात का उत्तर है तुम्हारे पास और तुरंत ?' चलो अब कुछ सुना दो ।
                     हूँ, मैंने कहा, सुनो ----
                                             
                                                 " प्रियतम प्रिय का मिलना जीवन ,
                                                  साँसों का चलना है जीवन ।
                                                  मिलना और बिछुड़ना जीवन ,
                                                  जीवन हार भी जीत भी जीवन ।।"       
                       सुमि सुनाने लगी ---
                                                   "प्यार है शाश्वत कब मरता है,                                            
                                                    रोम  रोम में  रहता  है ।
                                                    अज़र अमर है वह अविनाशी,
                                                    मन में रच बस रहता है ।।"   
                        ' ये कहाँ से याद किया ?', मैंने पूछा ।
                        ' मैंने तुम्हारी हर पुस्तक खरीदी है ।'
                        ' ओह ! शायद एक अकेली तुम ही खरीदती हो मेरेी पुस्तकें ?’ हम दोनों हंसने लगे ।
                        ’ ये क्या होगया है हमें केजी ?  वह सेीरियस होकर बोली, ’  साहित्य में हमें कोई रूचि ही नहीं रह गयी है । न संस्कृति में न अध्यात्म में  । सत्साहित्य आज कल पढ़ा ही नहीं जाता । स्कूल व कालिज के बच्चे जादू की, चोर-उचक्कों की, फंतासी वाले अंग्रेज़ी  उपन्यास व पुस्तकें पढ़ने में व्यस्त है । सामान्य जनता कामर्शियल पेपर, चटपटे नाविल पढ़कर फैंक देने में लगी है ।  अंग्रेज़ी नावेल हम लोग भी  पढ़ते थे, फ़िल्में भी देखते थे । पर साहित्यिक रचनाएँ -शरत, प्रसाद, टेगोर, प्रेमचंद, गोर्की, निराला, महादेवी, पन्त, वर्ड्स वर्थ, शेली, कीट्स आदि को भी कितना पढ़ते थे । सिर्फ एकेडेमिक क्लासेज़ में ही नहीं, मेडीकल के कठिन अध्ययन के साथ भी ।'
                        ' आज चारों और सभी वर्गों में अंतर्द्वंद्व व असंतुष्टि का यही तो कारण है कि उत्तम साहित्य के पठन -पाठन का मार्ग अवरुद्ध होगया है ।  साहित्य ही तो इतिहास, धर्म व संस्कृति का प्रतिपादन करता है । साहित्य क्या है ?  यों ही नहीं होता काव्य में कोई कथा, कथ्य व तथ्य ।  मानव जीवन की कथाओं, ज्ञान-विज्ञान के समन्वित अनुभवों का निचोड़ होता है साहित्य , उनका इतिहास होता है साहित्य ।  इतिहास जाने बिना हमें अनुभवजन्य ज्ञान कैसे प्राप्त हो सकता है ?  इसी ज्ञान के न होने से आज का युवा व प्रौढ़ वर्ग सामाजिक व मानवीय ज्ञान से अछूता रहता है और केवल कार्यात्मक, प्रोफेशनल व दैनिक व्यवहारिक ज्ञान को ही ज्ञान मानकर   सब कुछ ज्ञाता   होने का भ्रम   पाले   रहता है ।  जीवन का मूल उद्देश्य व दिशा न पाकर अंतर्द्वंद्वों में घिरा रहता है या पलायनवादी, अति-भौतिकवादी बन जाता है ।'  मैंने विस्तार से कहा ।  'परन्तु त्रुटि व भूल कहाँ हुई ?'  क्या  सारा दोष  आज की पीढी का ही है ?'  मैंने शायद स्वयं से ही प्रश्न किया ।
                          'भूल हमारी ही है केजी, शायद ।  उन्नति, विकास, भौतिकता की चकाचौंध व शीघ्रातिशीघ्र फल प्राप्ति की दौड़ में एवं अंधाधुंध पाश्चात्य नक़ल करके बराबरी की होड़ में, सदियों की दासता के फलस्वरूप अपना गौरव, अपनी संस्कृति व इतिहास भूले हुए हम लोग - अपनी स्वयं की अस्मिता, भारतीय भाव , भाषा व संस्कारों को संभाल कर नहीं  रख पाए तथा आगे आने वाली पीढी के अनुकरण व अनुसरण के लिए  एक उदाहरण प्रस्तुत करने में असफल रहे । जो राष्ट्र व देश एक लम्बी राजनैतिक  गुलामी में भी सिद्धांततः अपनी संस्कृति व धर्म बचाए हुए था ;  राजनैतिक स्वतन्त्रता मिलने पर  पाश्चात्य रंग-ढंग व विश्व-राजनीति का शिकार होकर सांस्कृतिक रूप से गुलाम होगया ।  सरकार, समाज व बौद्धिक संसार में सभी में वही भारतवासी हैं तो वही स्थिति है ।', सुमि ने अपना विचार व्याख्यायित किया ।' 
                              ' और यदि साहित्य समाज का दर्पण है तो दर्पण में झांके बिना समाज कैसे दिखाई देगा । उत्तरोत्तर विकास की से सीढी कैसे बनेगी ?  बिना इतिहास व शास्त्र, सत्साहित्य के कोई भी  समाज व राष्ट्र कब उन्नत हुआ है ?’ सुमि ने पुनःकहा ।
                              -----क्रमशः अन्क नौ का शेष....अगलेी पोस्ट में.....
       

   

जो बोले सो कुंडी खोले ...एक नाटिका ...डा श्याम गुप्त

                         ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

                       जो बोले सो कुंडी खोले  ...एक नाटिका ...डा श्याम गुप्त

                (  नगर की एक सामाजिक संस्था की शाखा सभा की एक साधारण बैठक ....)
                
                                                    दृश्य -एक
सत्येन्द्र जी ( फोन पर)--हेलो रमेश जी ! आज शाखा सभा की बैठक है,  इन्ज. रवि जी के यहाँ, चलेंगे ?
रमेश जी -- हाँ ..हाँ ..चलेंगे, रमेश जी ने तो डिनर भी रखा है । जायेंगे...जायेंगे ..।
                                           
                                                   दृश्य दो
      (  समय--सायं चार बजे....दिन ..रविवार...स्थान -इंजी. रवि जी का निवास ... इंजी. रवि गेट पर सब का अभिवादन -स्वागत कररहे हैं ।)
           आइये  आइये डाक्टर साहब..पधारें ।
           आइये वकील साहब...ओहो, नगेन्द्र जी आइये...भाभीजी नमस्कार ....नमस्कार सुधीर जी ..अरे अनिल जी ....आइये अन्दर चलें ।  आइये जज साहब ..नमस्कार ।
           सब लोग अन्दर चलकर सोफों  व कुर्सियों पर बैठते हैं। महिलायें  एक तरफ बैठी महिलाओं के ग्रुप में चली जाती हैं और बातें करने लगती हैं । अध्यक्ष जी व मंत्री अपना स्थान  ग्रहण करते हैं ।
बिमल जी ---समय तो काफी होगया । अभी कम लोग ही आये हैं ।
प्रकाश जी ---अरे यहाँ तो फिर भी काफी लोग आगये । चूड़ी वाले किशोर जी के यहाँ तो लगभग कोई पहुंचा ही नहीं । मुश्किल से किया हुआ इंतज़ाम भी काफी बेकार  गया ।
कुछ लोग एक साथ---- अरे जिनको आना था आ चुके...कार्यवाही आरम्भ की जाय ।
मंत्री जी---पहले ईश-प्रार्थना ....
                               सब गाते हैं .....वह शक्ति .......।
              प्रार्थना समाप्त होने पर मंत्री पूर्व बैठक की कार्यवाही पढ़ते हैं । सदस्य गण  बातें करते रहते हैं ।
मंत्री जी---किसी को इसमें कोई कमी,  शंका, समाधान हो तो बताएं ।  अन्यथा यह पारित समझा जाय ।
सब-- हाँ ...पारित है...पारित है...।
अनिल जी --- ( नए सदस्य हैं  दो माह पहले ही यहाँ ट्रांसफर होकर आये हैं ) एक विशेष विचार बिंदु रखना चाहता हूँ ।
सब--हाँ हाँ ...।
अनिल जी---अब तक की बैठकों में मैंने अनुभव किया है कि यहाँ के स्थानीय निवासी, व्यापारी वर्ग व  अन्य वर्ग आदि कभी बैठक में नहीं आता । इसका क्या कारण है ? क्या उपस्थिति बढाने के लिए कोई ठोस उपाय नहीं किया जा सकता, जिससे सभी वर्ग का सहयोग प्राप्त हो ?
मंत्री---यह प्रश्न कई बार उठ चुका है तथा बहुत बहस भी होचुकी है । हम किसी को जबरदस्ती तो ला नहीं सकते ।
अनिल--- पर कोई कारण तो होगा ।
कुछ सदस्य ---कोई कारण नहीं, जिन्हें  नहीं आना वे आयेंगे ही नहीं ।   
 श्रीनाथ जी---कारण क्यों नहीं है....मुख्य कारण तो यह है कि--एक तो बैठक के लिए एक निर्धारित निश्चित स्थान नहीं है ।  हर बार आधा समय तो बैठक के नए स्थान को ढूँढने में लग जाता है,  इतने बढे शहर में और बैठक में आने का प्रयोजन ही समाप्त होजाता है । हमारा आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग सकुचाता है कि अपने घर बैठक कराएं तो अन्य लोगों जैसा नाश्ता-पानी कैसे कराया जाय । सभी तो इस योग्य नहीं  हैं कि सभी को डिनर करा सकें ।
                    ( आपका क्या विचार है ...अनिल जी की तरफ देखते हैं ।)
इंज.रवि---- ये तो कोई बात नहीं है । किसी ने एसा नहीं कहा।जिस पर जैसा है वैसा खिलाये ।
श्री नाथ जी व कुछ अन्य --- कोई कहता थोड़े ही है ..बस आना और भाग लेना बंद कर देते हैं । जब हम खिला नहीं सकते तो खाने क्यों जाँय।
अनिल जी-- अन्य कई शहरों की भाँति एक नियम बन जाय कि सभी के यहाँ सिर्फ एक नग बिस्कुट आदि व एक चाय के अलावा कुछ नहीं करना है । तो शायद सभी लोग अपने यहाँ बैठक कराने  में संकोच नहीं करेंगे एवं भागीदारी भी निभायेंगे ।
प्रकाश जी---  और यदि एक जगह निश्चित होजाय एवं चाय आदि शाखा सभा के तरफ से ही हो तो शायद और अच्छा हो ।
मंत्री----  इतना अधिक धन कहाँ है शाखा के पास ।
कुछ सदस्य गण--- मासिक या वार्षिक चन्दा लिया जाय ।
मंत्री--चन्दा लेने कौन जाता है ?
अनिल-- पदाधिकारी किस लिए हैं ।
मंत्री, अध्यक्ष व इंजी. रवि---- भई अपने घर किसी को बुलाएं तो तो' एक चाय' क्या अच्छा लगेगा ।
अनिल-- भई बैठक का उद्देश्य समाज के काम और उन्नति पर विचार करना है । खाने थोड़े ही आते हैं ।
श्री नाथ जी --- कुछ लोग तो सदैव अंतिम समय पर ही आते हैं जैसे खाना ही उद्देश्य हो । अन्य बैठक आदि से कोई लेना-देना नहीं ।
                ( तभी वीरेन्द्र जी प्रवेश करते हैं, कुछ लोग अर्थपूर्ण हंसी हंसते हैं । )
श्रीनाथ -- ये देखिये सदैव की भाँति आख़िरी वक्त पर....।
विमल जी-- आखिर जन संपर्क करके कारण पता करने और उसके निवारण में क्या हर्ज़ है ।
 मंत्री अध्यक्ष इंजी. रवि व रमेश जी ---बहुत बार कोशिश कर के देख चुके हैं । सब होचुका है, बार बार  वही   प्रश्न व बहस का कोई अर्थ नहीं है ।
विमल जी-- क्यों, बार बार कोशिश करने में क्या हर्ज़ है ? बार बार प्रयत्न से ही तो सफलता मिलती है ।
श्री नाथ जी-- मैं तो दस साल से देख रहा हूँ , कभी कुछ नया व जन संपर्क करने की कोशिश ही नहीं  हुई । न हमारा महिला वर्ग ही कुछ नया कार्य या किसी बहस, विचार विमर्श में भाग लेता है । बस वही लोग सदा आते हैं और खा पीकर चल देते हैं ।
मंत्री--- सलाह देना आसान है। जो आगे आये, करके दिखाए ।
श्री नाथ जी --भई, तो फिर ये मासिक सभाएं, सामान्य सभाएं क्यों होती हैं । परामर्श कमेटी, विशिष्ट परामर्श कमेटी आदि क्यों बना रखे हैं। मंत्री अध्यक्ष को ही अपनी मर्जी चलानी है तो  वे ही जो करते हैं करें..अन्य लोग क्यों आयें ।
विमल जी -- मंत्री अध्यक्ष तो सिर्फ कार्य करते हैं,  फैसले तो सामान्य बैठक द्वारा लिए जाने चाहिए।  विशेष सलाहकार व कार्यकारी समिति मिल कर कार्यक्रम तैयार करे।
अनिल जी -- महिला वर्ग से भी तो कोई परामर्श व विचार बिंदु या उदाहरण आना चाहिए ।
                         ( महिलाओं की और उन्मुख होकर )
                       आप सब क्या सिर्फ बातें करने आते हैं । या बस सिर्फ वर्ष में एकाध बार २६ जन. आदि को खेल-कूद करने । आपके भी हर बिंदु पर विचार प्रस्तुत होने चाहिए। आप भी तो आगे आइये।  महिला शक्ति का भी तो उचित उपयोग होना चाहिए।
                         ( महिलायें चुपचाप मुस्कुराती रहती हैं )
मंत्री -- तो भैया, आप ये संभालो और करो । हम तो जैसा कर रहे हैं वैसा ठीक -ठाक ही चल रहा है ।
विमल जी -- अरे यह तो वही बात हुई , " जो बोले सो कुंडा खोले " इसलिए तो सब चुपचाप अपनी अपनी रजाइयों में सिकुड़कर बैठे हैं । जब न कोइ नया विचार, नई बात पर बहस करने, सुनने- मानने को तैयार ही नहीं है तो कौन समाज -बैठक आदि के पचड़े में पड़े ।  ये भी कम उपस्थिति होने का एक कारण है ।
इंजी. रवि -- चलिए ..चलिए  ... डिनर तैयार है, कृपया चलें ।
                             ( सब बातें करते हुए जाते हैं )