ब्लॉग आर्काइव

डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

मेरी फ़ोटो
Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

गुरुवार, 9 अगस्त 2012

कृष्ण जन्माष्टमी ...डा श्याम गुप्त के पद .....

                            ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

ब्रज  की भूमि भई है निहाल |
आनंद  कंद  प्रकट भये ब्रज में विरज भये ब्रज ग्वाल |
सुर  गन्धर्व  अप्सरा गावहिं,  नाचहिं   दै- दै  ताल |
आशिस देंय विष्णु शिव ब्रह्मा, मुसुकावैं  गोपाल |
जसुमति द्वारे बजे बधायो, ढफ ढफली खडताल  |
पुरजन परिजन हर्ष मनावें, जनमु लियो नंदलाल |
बाजहिं  ढोल  मृदंग  मंजीरा, नाचहिं ब्रज के बाल |
गोप गोपिका करें आरती,  झूमि  बजावैं   थाल |
सुर दुर्लभ छवि निरखि निरखि छकि श्याम' हू होय निहाल ||


कैसो बानक धरयो  गुपाल |
पीताम्बर कटि, पग पैजनियाँ, मोर मुकुट लिए भाल |
मनहर मुद्रा  धरी  त्रिभंगी,  उर  वैजयंती-माल |
छवि सांवरी, नैन रतनारे , सुन्दर भाल विशाल |
ओठ मुरलिया शोभित छेड़े, पंचम राग धमाल |
सुर दुर्लभ छवि निरखि कन्हाई श्याम भये हैं निहाल ||






               ----चित्र--गूगल व ....निर्विकार ..साभार ...





शनिवार, 4 अगस्त 2012

व्यवस्था में सुधार तो तब हो जब ..व्यर्थ की बातों से हटा जाये .... डा श्याम गुप्त ..

                                  ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

                      हम सभी चिल्लाते तो हैं ..व्यवस्था ..व्यवस्था ... व्यवस्था सड़-गल गयी है.. परन्तु क्या करें यह नहीं सोच पाते अपितु प्रतिदिन उन्हीं कार्यों में स्वयं को व्यस्त रखते हैं जो  कुछ बातें देश, समाज, संस्कृति, राजनीति व जन सामान्य के कृतित्व  में घुन की भांति लगी हुई हैं ... जो नेताओं, कर्मचारियों, शासकों एवं सभी जन सामान्य  को  इन व्यर्थ के अलाभकारी कार्यों में  लगाए रखती हैं ...इन से ध्यान हटे तो व्यवस्था की  ओर  ध्यान जाये .....
१. जिस्म...पूजा भट्ट .. फिल्म जैसे लोग व फ़िल्में जो कामुकता--अश्लीलता की नई-नई परिभाषायें गढ़ कर समाज में विकृति फैलाने का कार्य करके लोगों का ध्यान व्यर्थ की बातोंमें लगाए रखते हैं और स्त्रियों को चरित्र हीन करने में कोइ कसर नहीं छोडना चाहते ....जिनका परिणाम पोर्न-फिल्मों की बढोतरी में होता है |
२.फिल्मों व टीवी मैं व्यर्थ की वस्तुओं एवं नग्नता परक के विज्ञापनों की भरमार  जिनका परिणाम -- इनके हीरो-हीरोइनों को सेलीब्रिटी मानना और किशोर -किशोरियों द्वारा उन्हीं का अनुगमन करना होने लगता है ...
.मनोरंजन.... स्मार्ट फोन... ईमेल सर्च ...गूगल सर्फिंग ..दफ्तरों में कम्यूटर..टीवी आदि की सुविधाएँ ..आदि में अधिकाँश कर्मियों, छात्रों आदि का समय बर्वाद होता है . .....जो एक अलाभकारी कर्म है और कंपनियों...दफ्तरों ..जन-सुविधा की सेवाओं के कर्मचारियों की कार्य-क्षमता को बाधित करता है...एवं लडके-लडकियों, महिलाओं-पुरुषों को बेमतलब साथ-साथ रहने , मिलने जुलने एवं अधिक रात तक महिलाओं को बाहर रहने  की मज़बूरी व  अवसर प्रदान करता है|
४.स्कूली--कालिज छात्रों-बच्चों का सम्मान .... आजकल अपने व्यवसायी ध्येय हेतु जगह जगह मेधावी बच्चों का विविध मंचों -संस्थाओं द्वारा सम्मान का नाटक किया जाना एक प्रथा सी होगई है....सप्ताहों तक अखबारों में उनका नाम छापता रहता है .... पढना , अच्छे नंबर लाना व मेधावी होना बच्चों-छात्रों का सामान्य कर्तव्य है ..विशेष गुण नहीं ...अतः इस प्रकार सम्मान आदि उनको अहं की ओर लेजाते हैं और छात्र -असंतोष  व द्वंद्वों का कारण बनते हैं...
.खेल..... करोड़ों खर्च करके ..एक  तमगा हासिल कर लाना कहाँ की बुद्दिमानी है....तीरंदाजी, शूटिंग, गोलाफेंक, भारोत्तोलन आदि का वह भी महिलाओं द्वारा ..क्या अर्थ है ये सब पुरातन चीज़ें है आज के जमाने में किस काम आयेंगे .....इसे व्यर्थ के खेलों में समय ..धन बर्बाद करना निहायत मूर्खता है | महिलाओं-पुरुषों - नागरिकों को  अपने सामान्य कर्तव्यों से च्युत करने का साधन और ... भ्रष्टाचार ..अनाचार..अनैतिकता के मूल उत्पन्न करना है | हर बढे खेल के समय उस देश--नगर--स्थान में वैश्यावृत्ति व अन्य अनाचारों की बढोतरी होने लगती है |
               खेल बच्चे खेलते हैं ...बूढों का क्या खेलना, धंधा बन जाता है और फिर धंधे की अनाचारिता लागू होने लगती है |  कौन सा देश ऊपर उठाने में इनकी भूमिका होती है| खेल सिर्फ स्कूल-कालिज स्तर तक ही रहने चाहिए  ...बढे स्तर...ओलम्पिक..एशियन-गेम  आदि की कोइ आवश्यकता नहीं है...|
६. स्कूलों में अंग्रेज़ी माध्यम तथा विदेशी शिक्षा-पद्दतियों की नक़ल ...बच्चों को विदेश भेजना आदि से उनमें प्रारम्भ से ही देश के प्रति हीन भावना विक्सित होती है....
७.नेताओं..विधायकों ..सांसदों  को पारिश्रमिक व सुविधाएँ .......एक दम अनुचित हैं ...बंद होनी चाहिए ... यह देश- समाज सेवा है कोइ नौकरी नहीं .....यदि ये न हों तो देखते है कितने लोग नेता- मंत्री  बनने आते हैं और सरकारें गिराने बनाने का खेल कितना होता है...
८.धर्म की दुकानें .... हर एरा-गैरा ...जिसने  किसी भी ज्ञान का एक टुकड़ा सीख लिया वही सिखाने ..उपदेश देने बैठ जाता है ... एक संस्था खोल कर बैठ जाता है ...ये बंद होना चाहिए ....सरकार को एसी  संस्थाओं को कोइ लाभ..या छूट का प्रश्रय नहीं देना चाहिए ...अपितु टैक्स  लगा देना चाहिए ...सिर्फ व्यक्तिगत एवं विना मेम्बरशिप फीस के व्याख्यानों..प्रबचनों को ही होने देना चाहिए....सार्वजनिक पूजा स्थलों आदि का भी प्रतिवर्ष आकलन व वित्तीय जांच होनी चाहिए |  ईश्वर व धर्म व्यक्तिगत भावना है संस्थागत नहीं |
९-  स्त्रियों का हर पुरुषोचित कार्यों  में आगे बढ़ना... खेल....व्यबसाय...नौकरी...  पुरुषों के साथ दिन-रात  मेल-जोल.. देर रात तक घर से बाहर अकेले आना-जाना आदि   को प्रश्रय देता है और  अनाचार की  नयी-नयी  राहों को उत्पन्न करता है  समाज को  अनैतिकता की व व्यर्थ के कर्मों की राह पर धकेलता है | स्त्रियाँ सिर्फ स्त्रियोचित कार्यों एवं अपने स्वयं के कार्यों..व्यबसायों आदि को अपनाएं जहाँ वे स्वयं ही अपनी मालिक व बॉस हों |

बुधवार, 1 अगस्त 2012

संघात्मक समीक्षा पद्दति द्वारा पुस्तक समीक्षा ....पार्थो सेन...

                                        ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


संघात्मक समीक्षा पद्दति द्वारा पुस्तक समीक्षा ....पार्थो सेन...

                             (प्रचलित समीक्षा -पद्दति में  किसी पुस्तक या कहानी आदि की समीक्षा करने में केवल उस पुस्तक के विषय  वस्तु  की ही समीक्षा की जाती है परन्तु संघात्मक समीक्षा पद्दति द्वारा पुस्तक समीक्षा ....में पुस्तक की सम्पूर्ण समीक्षा की जाती है अर्थात विषय-वस्तु के साथ-साथ उसके लेखक/ कवि के बारे में, लेखक द्वारा आत्म-कथ्य , समर्पण व आभार , पुस्तक की छपाई, आवरण-पृष्ठ, उसपर चित्र , मूल्य, अन्य विद्वानों द्वारा लिखी गयीं भूमिकाओं के तथ्यांकन एवं प्रकाशक आदि  द्वारा दिए गए विवरण व कथ्य इत्यादि की भी सम्पूर्ण समीक्षा की जाती है | यह विधा  हिन्दी कविता में अगीत -विधा के संस्थापक  डा रंगनाथ मिश्र 'सत्य' द्वारा प्१९९५ से प्रचलित की गयी ...देखिये एक समीक्षा...)

समीक्ष्य कृति --- इन्द्रधनुष ( उपन्यास)....लेखक -डा श्याम गुप्त ....मूल्य ....७५/- रु.....पृष्ठ--१०४.
संपर्क-- सुश्यानिदी, के-३४८, आशियाना, लखनऊ -२२६०१२ .
प्रकाशन वर्ष-- २०११. ई.... प्रकाशक.... सुषमा प्रकाशन , आशियाना, लखनऊ |
समीक्षक-- पार्थो सेन ..

                       डा श्याम गुप्त जी चिकित्सा जगत से सेवा-निवृत्त होने के पश्चात हिन्दी साहित्य जगत में पूर्णतया समर्पित हैं | मूलतः आप एक प्रसिद्ध कवि हैं एवं  अगीत विधा के  रचयिता हैं | उपन्यास क्रम में 'इन्द्रधनुष' आपका प्रथम प्रयास है | इसके पूर्व आप गीत व अगीत दोनों ही विधाओं में शूर्पणखा, सृष्टि, प्रेमकाव्य आदि  छ: काव्यों का सृजन कर चुके हैं | जो साहित्य जगत में सराहे गए | इस उपन्यास में इन्द्रधनुष के सात रंगों की तरह ही सात मुख्य बिंदु --स्त्री, पुरुष, अलौकिक-प्रेम, कविता, वेद-वेदान्त, चिकित्सा जगत व सामाजिक परिदृश्य हैं | अतः शीर्षक सार्थक है |
                        लेखक स्वयं एक शल्य-चिकित्सक भी है |अतः उपन्यास का प्रारम्भ मैडीकल कालेज के वातावरण से होता है | वे स्वयं एक कवि भी हैं तो यत्र-तत्र संवादों में कविता का का समावेश है | संवादों में चिकित्सा संबंधी चर्चाओं  के अतिरिक्त कई मूल्यवान परिचर्चाएं हैं | जैसे एक स्थान पर पात्र जयंत कृष्णा कहता है...
                  "...सदियों से भारत में दो प्रतिकूल विचार धाराएं चली आ रही हैं | 
                  एक ब्राह्मण वादी व  दूसरी   ब्राह्मण विरोधी , जो अम्बेडकरवादी  विचार धारा  है  |"
इसी चर्चा में भाग लेती हुई एक अन्य पात्र सुमि  कहती है....
                  " वास्तव में वे धाराएं देव-संस्कृति व असुर संस्कृतियाँ हैं | क्योंकि न तो राम ब्राह्मण                                     थे   न कृष्ण   ही जबकि रावण ब्राहमण था परन्तु ब्राह्मण-विरोधी |"

                          पूरा उपन्यास मैडीकल कालेज के छात्र कृष्ण गोपाल ...केजी  तथा  सुमित्रा ...सुमि ..के मध्य संवादों  पर आधारित है जिसका कुछ अंश अतीत है | दोनों सहपाठी हैं | एक आकर्षण दोनों के मध्य उत्पन्न होता है यद्यपि नायिका पहले से ही वाग्दत्ता है | दोनों का  पृथक-पृथक विवाह होता है और सफल भी  है | यद्यपि वे अलग अलग होजाते हैं व रहते हैं परन्तु एक आत्मिक  जुड़ाव व बौद्धिक-आत्मिक प्रेम सम्बन्ध जो सुमि  व केजी के मध्य था, सदा बना रहता है जो एक चर्चा में कवितामय संवाद  से परिलक्षित होता है... केजी का कहना है...
            "प्रियतम प्रिय का मिलना जीवन,
             साँसों का चलना है जीवन|
             मिलना और बिछुडना जीवन,
             जीवन हार भी जीत भी जीवन |"               
                                         सुमि  का कथन देखिये..... 
             प्यार है शाश्वत कब मारता है,
             रोम रोम में रहता है |
            अजर अमर है वह अविनाशी,
            मन में रच बस रहता है |"
                             उपन्यास का अंत दुखांत है | सुमि  की मौत एक हवाई दुर्घटना में हो जाती है , पाठक यहीं मर्माहत हो जाता है |  उपन्यास में शिक्षित वर्ग का परिवेश है, पात्र, संवाद तथा वातावरण उसी के अनुरूप है | यौन सम्बन्ध रहित अलौकिक प्रेम की महत्ता इस उपन्यास का सन्देश है |
                            भाषा मूलतः परिमार्जित हिन्दी है | आवश्यकतानुसार अन्य भाषाओं के शब्दों का समावेश है | शैली प्रभावशाली व संवाद सारगर्भित हैं |
                            कृति मनुष्य के आचार-विचार व समाज को शिक्षा देने वाली नारियों को समर्पित है |प्रोफ. बी . बै. ललिताम्बा ( बेंगलूरू ) , भू.पू अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, इंदौर वि.वि (म.प्र.)  व  कवि श्री मधुकर अष्ठाना ने अपना आशीर्वाद  इस पुस्तक को प्रदान किया है | लेखक ने अशरीरी प्रेम को महत्त्व देते हुए उपन्यास का सृजन किया है जैसा कि उपन्यास में उल्लेख है|
                           आवरण पर एक सुन्दर लेखक द्वारा ही स्वनिर्मित हस्त-चित्र है |  मूल्य सर्वथा उचित है | एक डाक्टर मनुष्य जीवन को बहुत करीब से देखता है अतः उसका अलग ही अनुभव है |इस कृति को एक प्रेरणादायी प्रसंग मानना अधिक उचित प्रतीत होता है | डा श्याम गुप्त जी की सारी कृतियाँ शालीनता लिए होती हैं | आज के शारीरिक संबंध पर आधारित प्रेम के युग में इस उपन्यास का स्वागत अवश्य होना चाहिए | हार्दिक बधाई , मैं अपने एक अगीत से यह समीक्षा पूरी करता हूँ--
           "निहारूंगा मैं तुझे अपलक
            जैसे एक अबोध तकता है
            इन्द्रधनुष  एक टक |"                          
                                                         ----- .समीक्षक .... पार्थोसेन ...




          

मंगलवार, 31 जुलाई 2012

राखी व रक्षाबंधन पर्व के निहितार्थ ... डा श्याम गुप्त..

                              ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

                'बहना ने भाई की कलाई पर प्यार बांधा है '... रक्षाबंधन भाई-बहन के शाश्वत प्रेम का प्रतीक है | क्या यह  सिर्फ अपने भाई, अपनी बहन के प्रेम का प्रतीक  है ?  क्या भाई द्वारा अपनी बहन की रक्षा हेतु राखी का बंधन अनिवार्य है, क्या राखी बांधे बिना भाई बहन की समय पर सहायता करना भूल जायगा ?  कैसे हो सकता है ?  राखे बंधे या न बंधे भाई तो अपनी बहन की रक्षा करेगा ही | फिर रक्षाबंधन का क्या महत्त्व ?
                  क्या भाई को केवल बहन की ही रक्षा करना चाहिए ...पुत्र को माँ की या पिता की नहीं, या पिता को पुत्री की, पति को पत्नी की नहीं |    वास्तव में यह सिर्फ भाई द्वारा बहन की रक्षा का ही नहीं अपितु प्रत्येक पुरुष द्वारा प्रत्येक स्त्री की ...प्रत्येक बहन..बहनों की रक्षा हेतु स्वयं बंधन- संकल्प  का पर्व है |  परिवार, पडौस, समाज की, नगर की, ग्राम की, विश्व की प्रत्येक महिला, स्त्री, बच्ची को बहन की  निगाहों से देखने के संकल्प का पर्व है | प्रत्येक पुरुष को सभी स्त्रियों को माँ-बहन की भांति देखना  चाहिए | यद्यपि छोटी बच्ची को माँ न कहा जासके ( यद्यपि पुरा काल में सभी स्त्रियों को माँ कहकर ही पुकारा जाता था चाहे छोटी हो या बड़ी --आज भी भारत के दक्षिण के राज्यों में हर उम्र की स्त्री को माँ  या अम्मा कह कर पुकारा जाता है...चाहे अपनी स्वयं की माँ को आई कहा जाता हो ..)  परन्तु बहन के लिए कोइ उम्र सीमा नहीं होती ...एक वर्ष की बच्ची भी बहन हो सकती है ७० वर्ष की वृद्धा भी | इसीलिये आज का दिन यह संकल्प का है कि प्रत्येक पुरुष प्रत्येक स्त्री को बहन के समान समझे एवं उसी प्रकार व्यवहार करे ..उसके मान-सम्मान की रक्षा हेतु न सिर्फ  स्वयं तत्पर रहे अपितु अन्य भी करें  एवं उसका सामाजिक, मानसिक व शारीरिक उत्प्रीणन  न हो यह सुनिश्चित करे | इसीलिये रक्षाबंधन को भाई-बहन का त्यौहार कहा जाता है |
                         यदि हम आज के दिन इस पर्व का वास्तविक निहितार्थ समझें, यथा भाव संकल्प करें तो निश्चय ही हम  न किसी बच्ची, युवती,  महिला का उत्प्रीणन  करेंगे न होने देंगे तभी  समाज में उच्च मानव आचरण , व्यावहारिक आदर्शों  व संस्कारों की स्थापना होगी और हमारे समाज से स्त्रियों पर आये दिन होने वाले अनाचार,अत्याचार, उत्प्रीणन , हिंसा, बलात्कार , यौन उत्प्रीरणन ... आदि का कलंक मिट सकता है | यही एक मात्र उपाय है तभी हम इस पर्व को  मनाने के सच्चे अधिकारी होंगे |

बुधवार, 25 जुलाई 2012

आखिर क्यों ???....डा श्याम गुप्त...

                         ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

आखिर  क्यों......................

 ----  पढने जा रहे हैं, पढकर बिजनेस सीखना है .... या अर्ध-जीन को भी ऊपर मोड कर स्पोर्ट शू ,बनियान टाइप  शोर्ट-टॉप-चप्पल पहन कर सुबह की सैर का,  घूमने का प्रोग्राम है...--  आखिर क्यों...?
---- डांस के लिए , पैरों-हाथों के मूवमेंट हेतु  टाईट -जीन उपयुक्त है या ढीले-ढाले कपडे ....... आखिर क्यों ..?
आखिर  क्यों ...कालेज में हैं या किसी पार्टी में ...पढने कालिज जारहे हैं या फैशन शो में....या लड़कों को प्रभावित करने...

सोमवार, 23 जुलाई 2012

नागपंचमी के निहितार्थ..... डा श्याम गुप्त

                                  ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
                        सावन का महीना शिव का महीना ..मंगल-उल्लास का माह ...जीवन्तता का माह है | शिव के साथ सर्प..नागों का सदैव विशेष सम्बन्ध रहा है जो  सामाजिक विष के नियमन का प्रतीक हैं |  इसीलिये शिव  पशुपति भी हैं,  कल्याण के प्रतीक भी |  इसीलिये नागपंचमी सावन के महीने में ही मनाई जाती  है |
                       नाग,  शेर, मोर, कौवा , गिद्ध , बाराह, कच्छप, बकरा, कुत्ता , घोड़ा, गाय ...तुलसी, पीपल, नीम ..बृक्ष..आदि सभी जीवों -प्राणियों, जीवों की पूजा करने वाली भारतीय संस्कृति ..बिचित्र व विशिष्ट  है | सब को अपने समान समझने के भाव वाली संस्कृति प्रत्येक जीव मात्र में देवता का बास मानती है | यह भाई चारा, विश्व-बन्धुत्व ..अहिंसा की  संस्कृति है ...विश्व में अनोखी |
                वह इसलिए कि भारतीय पुरा-ज्ञान के मूल  ..वैदिक साहित्य के अनुसार समस्त प्राणी-जगत कश्यप मुनि  की संतानें हैं |  सभी भाई- भाई हैं | जिसे विज्ञान के अनुसार कहा जाय तो--जल में मछली के उपरांत ..स्थल  पर आने वाले प्रथम जीव ---कच्छप से ही समस्त  जीव-जगत का.. मानव तक  उद्भव हुआ है |
               एसी अनोखी विशिष्ट संस्कृत के इस देश में आज ये हिंसा, द्वंद्व, द्वेष, अनाचार की स्थिति क्यों ? शायद इसलिए कि हम अपनी इस विश्व-वारा संस्कृति को भूल गए हैं ...उसकी जड़ों को भूल गए हैं ... पाश्चात्य जगत के संस्कृति व ज्ञान रूपी.. अति-भौतिक ज्ञान....अज्ञान ...को प्रश्रय देने के कारण |
                 अतः आज के दिन हम इस पर सोचें व समझें ...यही सच्ची नाग-पूजा...शिव-पूजा होगी | 

रविवार, 22 जुलाई 2012

सुपर-स्टार का पतन....डा श्याम गुप्त


                                               कर्म की बाती,ज्ञान का घृत    हो,प्रीति के दीप जलाओ...




                       किसने  मारा राजेश खन्ना को ? शायद स्वयं ने ....| वास्तव में व्यावसायिक सफलता व अच्छा इंसान होने में बहुत अंतर होता है | चाहे एक सामान्य दैनिक वेतन कर्मी हो या सुपर स्टार या राज्याध्यक्ष .....उसे पहले  एक अच्छा व्यक्ति, सहृदय..सुहृदय , मानवीय व्यवहार , संवेदना व आचरण से संपन्न होना चाहिए |  महत्वाकांक्षाएं व  सफलताएं ऋद्धियाँ-सिद्धियाँ है जो सर चढ़कर बोलती हैं | यहीं व्यक्ति को पुरुषार्थ चतुष्टय --धर्म, अर्थ, काम , मोक्ष को प्रतिपल ध्यान रखना चाहिए  व प्रत्येक क्षण व कर्म में उसके धर्म रूप का सामंजस्य  होना चाहिए |
                        राजेश खन्ना जैसे सुपर स्टार का अंतिम समय  इतना ह्रदय-विदारक क्यों ?  निश्चय ही वे एक सफल अभिनेता के साथ एक अच्छा, व्यवहार कुशल इंसान नहीं बन पाए | वे अपने स्टारडम के अहं में अपने समाज--इंडस्ट्री के लोगों से भी जुड़ाव नहीं रख पाए  न सामान्य समाज से तो कोइ उन्हें क्यों पूछे ? दूसरे अर्थ में वे व्यवहार कुशल भी  नहीं थे --अहं वश किसी एक वर्ग, गुट या खेमे से भी जुडकर भी  नहीं रहे , न किसी सामाजिक कार्य व कर्तव्य से |  न वास्तविक जीवन में सामान्य जन से |अर्थात उन्होंने फिल्म व अपने स्टारडम से पृथक कोइ भूमि तैयार नहीं की |  वे अपनी विलासमय पार्टियों, महिला-मित्रों , शराव व सिगरेट में मस्त रहे | अच्छे व अमीर परिवार से होने के वावजूद शायद उन्होंने अपने परिवार, घर, समाज, क्षेत्र से भी नाता नहीं रखा और सिर्फ कुछ करोड के लिए उनका सपनों का आशियाना सील कर दिया गया |  उनके बचपन के मित्र जितेन्द्र के साथ भी उनकी कोई फिल्म नहीं आयी |
                         हमें सिर्फ लेने की अपेक्षा देना भी आना चाहिए | जो देना नहीं जानते उन्हें उनके महिमा-मंडल ( जो प्रायः आभासी होता है )  के उतरने पर कोई  नहीं पूछता | इसीलिये वे स्वयं किसी एक के न होपाये कोइ उनका न होपाया  तथा अंतिम समय में उनके साथ न पत्नी थी न बच्चे न नाते-रिश्तेदार | शिक्षा व ज्ञान की कमी भी इन सबके आड़े आती है |  मैयत पर तो सभी आ ही जाते हैं | जैसा कि उनके अंतिम डाइरेक्टर  बार-बार टीवी पर कह रहे थे कि ...कहाँ थे वे सब जो अब आरहे हैं...तब  क्यों नहीं आये जब उनको जरूरत थी | तब आये होते तो वह नहीं मरते | ......... मुद्दतों बाद मुझे मेरे मित्र  डा जगदीश छाबडा  का  सुनाया  हुआ पंजाबी गीत का टुकड़ा याद आता है...
           " जदों  मेरी अर्थी उठाके चलणगे |
             मेरे यार सब हुमहुमा के चलणगे|
            चलणगे मेरे साथ दुश्मन भी मेरे,
            ए बखरी ए गल मुस्कुराते चलणगे ||"