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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

सोमवार, 25 नवंबर 2013

नीति, राजनीति व कूटनीति ....डा श्याम गुप्त ....

                                   ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

                                              




                                               नीति, राजनीति व कूटनीति .....
        देश की जनता के लिए, व्यवहार के लिए अपनी आतंरिक व दैनिक समस्याओं, प्रगति के लिए ...नीति आवश्यक है या राजनीति अथवा कूटनीति |
           एक समाचार पत्र आलेख में एक सम्पादकीय देखिये जिसमें कुछ बिंदु इस प्रकार हैं....
१    1.      भ्रष्टाचार का सही हल शासन में सुधार करना और आम लोगों व सरकार के बीच दूरी कम करना .....तो आम आदमी पार्टी और क्या करना चाह रही है, अन्ना का और क्या अर्थ था...जब मौजूदा शासन स्वयं में सुधार करने को तैयार न हो तो क्या करना चाहिए......यही तो आज की परिस्थिति है |
२    2..      लोकतंत्र में लोकप्रिय आन्दोलनों का ईंधन विचारधारा है आदर्शवाद नहीं ..... क्या लेखक आदर्शवादी होना एक अनुचित तथ्य मानते हैं, क्या लोकतंत्र आदर्श को आदर्श नहीं मानता ? जो आदर्श नहीं उसे किसी भी तंत्र में होने की क्या आवश्यकता है?  विचारधारा ही तो आदर्शवादी होनी चाहिए....सारे भ्रष्टाचार अपने आप मिट जायेंगे |
३   3.      आपको बड़े लोकतांत्रिक और राजनैतिक तम्बू में आना होगा और परम्परागत राजनेताओं को विचारधारा के आधारपर पराजित करना होगा .......राजनीति समावेशी, समझौतापरक, समायोजन करने वाली निर्दयी व निर्मम होती है .....यही तो आम आदमी पार्टी कर रही है चुनाव में भाग लेकर .....  क्या निर्मम व निर्दयी नीति को राजनीति कहा जायगा वह कूटनीति, खलनीति होती है देश के शत्रु से अपनाने वाली बाह्य-नीति, स्वदेश वासियों के लिए नहीं.....
४   4.      अपनी राजनीति का खंडन न करें, मेले में शामिल होजाएं और गलत लोगों को बाहर करें ... अर्थात भ्रष्टाचार के दल में शामिल होना होगा, यह तो न जाने अब तक कितने पार्टियां कर चुकीं हैं.... फिर यही तो आम आदमी पार्टी कर रही है, राजनैतिक दल बनाकर ......अपनी और पराई राजनीति क्या होती है ...नीति..नीति होती है ..यदि गलत हैं तो खंडन अवश्य होना चाहिए चाहे अपना करे या पराया |  अन्यथा यह तो ढाक के वही तीन पातरहेंगे जो पिछले ६० वर्षों से होता आया है यथास्थिति ....
      .....
५    5.      उन्हें तेजी से राजनीति सीखनी होगी ...... अर्थात वही खलनीति सीखने की सलाह देरहे हैं  पत्रकार महोदय ....अपने देशवासियों के हित के लिए राजनीति क्या व क्यों सीधी सीधी नीति आदर्शनीति क्यों नहीं ....
६   6. अन्ना का जोर था .... सिस्टम को बदलने की आवश्यकता है, गैर राजनैतिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को लाइए फिर फैसला वाली प्रक्रिया जनता के हाथों सौंप दीजिये .... लोकतंत्र का ताना-बाना इससे उलटा है | बहुमत सरकार चुनता है सरकार हर मुद्दे पर फैसला लेती है यह सोचकर कि हर पांच वर्ष बाद उसके फैसलों का हिसाब होगा .....
----- यही तो नहीं होरहा ...नेता सिर्फ अपने लाभ के फैसले ले रहे हैं, कौन पांच वर्ष बाद याद रखता है, सामान्यजन की स्मृति बहुत अल्प होती है ...उसे अपने स्वयं के खाने-पीने की कठिनाइयों से फुर्सत मिले इसे व्यवस्था राजनीति को करनी चाहिए और यह आदर्शनीति से ही हो सकता है...कथित राजनीति से नहीं ....
7.आम आ पार्टी एक रोचक विचार....परन्तु जैसे ही राजनीति के सन्दर्भ में अपने खास दृष्टिकोण अपनाती प्रतीत होती है गलत दिशा में मुड जाती है..... 
   ----- विचार से ही तो दृष्टिकोण बनता है यदि विचार रोचक है तो दृष्टिकोण भी वही होगा.. नए विचार तो आने व परखने ही चाहिए खासकर जब पुराने विचार साथ नहीं दे रहे हों तो..... 
---राजनीति वर्षों की कड़ी मेहनत होती है, आप पुराने धुरंधर नेता से सीख सकते हैं और वह है राजनीति...  
  .... फिर तो वंशवाद वाली या राजतंत्र वाली प्रणाली  ही उपयुक्त है शासन के लिए....  चलने दीजिये पुराने घिसे-पिटे नेता जो कर रहे हैं करने दीजिये  इस सारी कहानी की क्या आवश्यकता है |
         तथाकथित स्वनामधन्य पत्रकार, सम्पादक महोदय वास्तव में राजनीति व कूटनीति का अंतर भूल गए हैं वे यह जो सब बता रहे हैं वह कूटनीति है एवं शत्रु-देशों से बाह्य संबंधों के लिए होनी चाहिए न कि स्वयं अपने देश की जनता के लिए .....वोट के लिए ...उसके लिए आदर्श नीति ही अपनाई जानी चाहिए न कि राजनीति व वोटनीति ......



 

शुक्रवार, 22 नवंबर 2013

तर गए प्रोफ सी एन राव .....डा श्याम गुप्त.......

                                       ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



               तर गए प्रोफ सी एन राव 



       







         भगवान ( चाहे क्रिकेट जैसे व्यर्थ के एवं विदेशी और धन्धेबाज़ व पैसे के लिए, पैसे से सराबोर खेल का ही क्यों न हो ) के साथ उन्हें भी भारत-रत्न मिलने पर एक अनजाने वैज्ञानिक, सामान्य वीवीआईपी विश्व-विख्यात वैज्ञानिक प्रोफ. चिंतामणि नागेश रामचंद्र राव को  (जिन्हें भारत की अधिकाँश जनता नहीं जानती है, जबकि भगवान सचिन रमेश तेंदुलकर को दुनिया का बच्चा बच्चा, युवा, बड़े-बूढ़े, गली के कूड़े सभी जानते हैं )  तो वास्तव में ही स्वयं को भाग्यशाली मान लेना ही चाहिए | यही प्रदर्शित कर रहे हैं हमारे दृश्य-श्रृव्य-प्रिंट -मीडिया देखिये ये टिप्पणियाँ .....
      “ मास्टर ब्लास्टर सचिन जहां क्रिकेट के मैदान पर शतकों के शतक  (चाहे जिस के लिए उन्हें अनावश्यक काफी समय तक जबरदस्ती टीम में खेलना-झेलना पडा हो ) बना चुके है वहीं प्रख्यात वैज्ञानिक प्रोफ राव ( भी ? ) शोध जगत के शतकवीर हैं|”......... “जिस तरह सचिन क्रिकेट के मास्टर हैं उसी तरह प्रोफ राव भी वैज्ञानिक शोध क्षेत्र के मास्टर माने जाते हैं |”
     अर्थात सचिन की ही तरह हैं प्रोफ.राव..... सचिन की प्रतिच्छाया की भाँति... उन्हीं के पद-चिन्हों पर |
       मीडिया को भी प्रोफ राव के बारे में शायद ही अधिक ज्ञान हो, यदि सचिन को भारत-रत्न नहीं मिलता तो न वे प्रोफ राव के बारे में जानते न भारत-रत्न के | न भारत-रत्न पुरस्कार के बारे में हर टीवी चेनल, समाचार-पत्र में समाचार, कालम, आलेख, फेस-बुक, ट्विटर  पर दुनिया भर के कमेंट्स |
          शायद मैं स्वयं भी यह आलेख नहीं लिख रहा होता ? इसे कहते हैं भगवान की महिमा.....
 “ को न होइ वाचाल, मूर्ख ज्ञानधारी विकट”
 जासु कृपा सौं श्याम, हों अजान विख्यात अतिं |”
 
       जब रोम जल रहा था तो नीरो वंशी बजा रहा था और रोम की जनता बड़े-बड़े स्टेडियमों में खेलों में व्यस्त थी |
         हम कब समझेंगे ?
 


बुधवार, 13 नवंबर 2013

पुस्तक-समीक्षा.... वर्ण सन्देश, ....डा श्याम गुप्त ....

                             




                          पुस्तक-समीक्षा



समीक्ष्य पुस्तक ... वर्ण सन्देश,  लेखक....श्री धुरेन्द्र स्वरुप विसारिया ‘प्रभंजन’....     


  प्रकाशक—  बिसरिया शिक्षा एवं सेवा समिति, राजाजीपुरम, लखनऊ...   मूल्य ---१००/-रु.   

 समीक्षक...... डा श्याम गुप्त....




             श्री धुरेन्द्र स्वरुप बिसारिया जी आर्य समाज से जुड़े हैं, वे विद्वान् हैं, कर्मठ हैं एवं लम्बे समय से साहित्य सेवा में रत हैं | प्रसन्नता का विषय है कि वे सिर्फ आर्यसमाज के कर्मकांड में ही संलग्न न रह कर साहित्य-रचना जैसे धर्म-यज्ञ में भी सामान रूप से रत हैं | परम-आदरणीय स्वामी दयानंद जी ने देश व समाज में वैदिक-ज्ञान एवं भारतीय शास्त्र-ज्ञान के पुनुरुत्थान व जन-जन में प्रसार का जो यज्ञ प्रारम्भ किया, बिसरिया जी उसकी लौ को जलाए हुए हैं | आपकी कई पुस्तकें प्रकाशित हैं यथा ‘सीता के पत्र राम के नाम’, ‘दिव्य-अगीत’ आदि.... जो दिव्यता एवं मानव आचरण संवर्धन से युक्त हैं | उसी क्रम में प्रस्तुत रचना ‘वर्ण सन्देश’ भी है | जिसके सन्देश प्रत्येक अक्षर से प्रारम्भ होते हैं जो एक अभिनव प्रयोग है | वर्ण-सन्देश को पढ़कर मुझे अतीव आनंदानुभूति हुई क्योंकि पुस्तक ने मुझे अपने विद्यार्थी जीवन में स्कूल की पत्रिका हेतु लिखी गयी एक भूली-बिसरी कविता ‘स्वरों की शिक्षा’ का स्मरण करा दिया| जो कुछ इस प्रकार से थी ...

            “अ से का करो तुम अच्छे, और दुनिया में नाम कमाओ |
             बुरा न सोचो कभी किसीका, और सदा अच्छे फल पाओ ||”

          आज के सामाजिक, व्यक्तिगत व साहित्यिक नैतिक आचरण के ह्रास के युग में साहित्य व कविता के नाम पर समाचार लिखे, कहे, पढ़े जारहे हैं | एक घटना होती है...उसे छत्तीस बार टीवी पर दिखाया जाता है, कई बार समाचार-पत्रों में प्रकाशित होता है, फिर सभी के द्वारा उसे ट्विटर, फेसबुक, ब्लोगों पर लिखा जाता है ...फिर उसी को अखबारों के ब्लॉग-कालम में पुनः छापा जाता है | सभी लेखक घटना पर अपनी-अपनी वर्णन क्षमता द्वारा टिप्पणी देकर निकल लेते हैं| उसके कारणों...उसके समाधान की दिशा पर गंभीर व निश्चित समाधानपरक चर्चाएँ नहीं होतीं | ऐसे मूल्यहीनता के वातावरण में  मूल्यों, नैतिकता व आचरण संवर्धन पर कृति की रचना करना एक दुष्कर, धैर्य का एवं अति-हिम्मत का कार्य है | जो बिसरिया जी ने कर दिखाया है |

          कोइ भी देश, राष्ट्र व समाज.. अपने विद्वान्, कर्मठ, सच्चरित्र व देशभक्त नागरिकों से ही उन्नत व संपन्न होता है | ऐसे नागरिक ही देश व समाज के गौरव व गर्व होते हैं और विद्वता, कर्मठता, चरित्र व देशभक्ति हेतु नैतिकता, संयमित जीवनचर्या व शाश्वत मूल्यों को अपनाना व उनपर चलना महत्वपूर्ण व आवश्यक होता है | यही प्रस्तुत रचना’ वर्ण-सन्देश’ का मूल उद्देश्य है जो उसकी सामयिक व सार्वकालीन आवश्यकता व महत्ता का परिचायक है | कृति में हिन्दी वर्णमाला के प्रत्येक वर्ण – स्वर व व्यंजन, को वाक्य का प्रारम्भिक अक्षर लेकर विविध नैतिकता एवं आचरणगत सन्देश प्रस्तुत किये गए हैं जो सन्देश-प्रेषण का एक अभिनव प्रयोग है |  उदाहरणार्थ....
           इ .से...    --इच्छा-मृत्यु पाने की साधना करें,
                    --इच्छाओं पर अंकुश लगाएं, इन्द्रिय निग्रह करें,
                    --इंसान बनाने का पुरुषार्थ करें,
                    --इष्ट केवल एक ईश्वर है |   

        अक्षर, वाणी के बैखरी रूप का प्रतिनिधि है| ध्वनि या वाणी के रूप –परा, पश्यन्ति, मध्यमा व बैखरी....में बैखरी वाणी का फलित रूप है| आदि-ऋषिकुल ..अंगिराओं ने जब सात स्वरों को संगठित करके वाणी के बैखरी रूप की उत्पत्ति की वह वाणी या बोली हुई, वही कृतित्व रूप में भाषा एवं लिपि रूप में अक्षर | हिन्दी वर्णमाला का प्रत्येक अक्षर यूं तो सदा ही सन्देश रूप है परन्तु उसका जन-उपयोगी व व्याख्यायित रूप इस कृति में प्रस्तुत किया गया है जो एक नवीन सोच का परिचायक है | इस अभिनव प्रयोग हेतु बिसरिया जी साधुवाक के पात्र हैं|

        ऋग्वेद( १०/५२/९५६५ ) में ऋषि यज्ञ के ब्रह्मा का स्तवन करते हुए कहता है कि..
               “ऋचां त्वा पोषमस्ति पुपुष्वां गायत्रं त्वो गायति शक्वरीषु |”  .... मूल भाव है कि छंद एवं  साहित्य....अर्थात अक्षर ...ही आपको यह बताता है कि आपको क्या, कैसे व क्यों करना चाहिए | अक्षर छंद का मूल स्वरुप है | उसी तत्त्व-भाव का परिपोषण इस कृति ‘वर्ण-सन्देश’ में किया गया है |

       विदुषी प्रोफ. श्रीमती उषा सिन्हा एवं महाकवि श्री विनोद चन्द्र पाण्डेय द्वारा कृति की विद्वतापूर्ण शुभाशंसा एवं सम्मति पुस्तक के महत्त्व में और वृद्धि करते हैं|  स्वयं लेखक के आत्मकथ्य के किये गए कथन...”सुधार करने का कार्य कभी अवरुद्ध नहीं होता..” अत्यंत महत्वपूर्ण है | अच्छाई व बुराई का संघर्ष सतत चलता रहता है परन्तु सुधार की आवश्यकता सदैव रहती है ...जिसका उद्घोष वेदों में नेति..नेति द्वारा किया गया है|  

       कथ्य शैली के माध्यम से प्रत्येक अक्षर से विविध विषय-भाव स्पष्ट किये गए हैं...जिनमें... अष्टांग-योग द्वारा तन-मन का स्वास्थ्य,चार पुरुषार्थ, सुख-आनंद, दैनिक नियमित दिनचर्या, बचत की भूमिका, घर से बाहर व विदेश जाकर नौकरी हेतु प्रवास के प्रचालन व उसकी कठिनाइयों का सामयिक प्रश्न, शिक्षा व ज्ञान में अंतर, शिक्षाओं व कर्म का उचित दिशा ज्ञान,  विद्वानों, गुरुजनों व अनुभवी एवं वृद्ध जनों का एवं उनकी की शिक्षाओं का आदर-समादर, शास्त्रों का गया व उनकी शिक्षाओं एवं शास्त्रों का आदर, स्वयं को जानो, ईश्वर , सत्य, भ्रष्टाचार, अनैतिकता, कदाचरण, कौमार्य-रक्षण आदि नैतिकता एवं मानव आचारंगत विषयों को विविधताओं से व्याख्यायित किया गया है | श्लोको व मन्त्रों आदि के उदाहरण द्वारा उनकी प्रामाणिकता को भी स्पष्ट किया गया है|  एक उदाहरण प्रस्तुत है....
       आ ..से..  आचार-विचार सही रखें ....यहाँ पर दो शब्द हैं  आचार तथा  विचार – आचार से अभिप्राय:  है मनुष्य के आचरण तथा व्यवहार से | विचार मन के भाव की चिंतन परख कल्पना का स्थायी निष्कर्ष है |”

        कृति के भाषा सरल व अभिधात्मक है एवं रोचक कथ्य शैली में है  अतः सहज संप्रेष्य व  बोधगम्य है एवं कहीं कहीं विषय कठिन, उबाऊ व दार्शनिक होने पर भी समझने में सरल होजाता है| इन्हें हिन्दी के औपनिषदीय मन्त्र कहा जाय तो अति शयोक्ति नहीं होगी | ऐसी सुन्दर, सुष्ठु, पठनीय व संग्रहणीय रचना हेतु मैं श्री धुरेन्द्र स्वरुप बिसारिया जी का अभिवादन करता हूँ|
                                                                                                      ----   डा श्याम गुप्त
                                                                                                           ,                                                                            
 सुश्यानिदी 
के-३४८, आशियाना, लखनऊ -२२६०१२
मो-९४१५१५६४६४