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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

शनिवार, 4 जुलाई 2020

किस्से राज काज के ---१. नर्सों की हड़ताल---डा श्याम गुप्त

                             ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


किस्से राज काज के ---
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राजा का दरवारी या सरकारी अधिकारी का कार्य काँटों की बगिया में चलना होता है | उस पर पंचमुखी दबाव होते हैं -ऊपर के –अधिकारियों व शासन के ,उपभोक्ता या कर्मचारियों की अपेक्षाओं के, कर्मचारी यूनियनों के, सहयोगियों की चालों के एवं स्थानीय अराजक तत्वों के |
--------इसमें यदि पारदर्शिता, स्पष्ट-दृष्टि, ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर, लाभ-हानि की सोच व कुछ प्राप्ति की आशा के बिना कार्य, नियमों व अपने विषय का स्पष्ट ज्ञान, संभाषण-योग्यता, न कहने की कला एवं कागज़ कार्य, लिखा-पढी में कहीं भी न फंसने की योग्यता है तो आप ‘परम स्वतंत्र न सिर पर कोऊ ‘..की भांति कार्य सम्पादन कर सकते है |
१.
नर्सों की हड़ताल---
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उस समय मैं मेडीकल कालिज के इमरजेंसी विभाग में रेजीडेंट सर्जन अधिकारी था | एक बार पोस्टेड मेट्रन कुछ अधिक ही तेज व सिर फिरी जैसी थी, नर्सों को, कड़े अनुशासन व देख रेख में रखती थी हाउस डॉक्टरों से भी बात नहीं करने देती थी, नर्सें भी उनसे परेशान रहती थीं |
------हमारे एक काफी वरिष्ठ पूर्व चिकित्सा छात्र जो कहीं अन्य चिकित्सा अधिकारी थे उनके कोइ रिश्तेदार भर्ती हुए, सामान्यतः प्रोटोकोल के अनुसार उनका ख्याल रखा जाता था | किसी बात पर मेट्रन से उनकी खटपट होगई | मेट्रन ने मरीज़ की केस फ़ाइल अपने कब्जे में ले ली जो सदैव डॉक्टर्स के चेंबर में रखी जाती थीं |
हाउस डॉक्टरों ने शिकायत की | मैंने उन्हें बुलाकर समझाया कि यह आफीशियल सरकारी डोक्यूमेंट हैं आप अपने पर्सनल कब्जे में नहीं रख सकतीं, यह अपराध की श्रेणी में आता है, उसी समय एक अन्य मेरे जूनियर पीजी छात्र कैलाश घूमते हुए आगये और कहने लगे --
---हाँ सर थाने में रिपोर्ट करा दीजिये |
---अब तो वे अड़ गयीं कि अब तो मैं थाने ही जाऊंगी, तभी फ़ाइल दूंगीं | किसी तरह से होस्पीटल सुपरिंटेंडेंट से फोन पर बात करके मामला शांत कराया |
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दूसरे दिन जब मैं होस्टल से निकल कर जारहा था तो देखा कि सारी नर्सें होस्पीटल सुपरिन्टेन्डेन्ट के आफिस के बाहर खडी हैं |
---- मैंने पूछा की क्या बात है तो ज्ञात हुआ की कल मेट्रन से डा. कैलाश से झगड़ा होगया है और हम सब हड़ताल करने जारही हैं|
----मैंने कुछ को अलग से बुलाकर कहा झगड़ा मेरे से हुआ था और इस बात पर | कुछ ही समय में उन्होंने एक- दूसरे को बताया और सारी नर्सें गायब |
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मुझे सुपरिन्टेन्डेन्ट का बुलावा आया | सुपरिन्टेन्डेन्ट पीएमएस सेवा से होते थे उनका कालिज प्रशासन व चिकित्सकों पर कोइ आधिकार ही नहीं होता था|
-----चेंबर में एक वार्ड मास्टर व वे मेट्रन मौजूद थीं | मेट्रन ने अपनी व्यथा सुनाई और वार्ड मास्टर कहने लगे ये माफी मांगें नहीं तो नर्सें हड़ताल करेंगीं
-----| मैंने कहा माफी की कोइ बात ही नहीं है, गलत व्यवहार व जिद पर अडने के लिए ये माफी मांगें | बाहर झाँक तो लो कोइ नहीं है वहां हड़ताल करने वाला |
-----सुपरिन्टेन्डेन्ट बोले अरे भई आप लोग भाई बहन की तरह हैं,
----मैंने कहा हाँ यदि इनकी पर्सनल शान में कोइ बात हुई जो इन्हें बुरी लगी तो मुझे अफसोस है |
----वार्ड मास्टर ( जिनका मैंने मरीजों से वसूली रुकवा दी थी-- न खाऊंगा न खाने दूंगा के तहत ) कहने लगे इनकी तो और भी बहुत शिकायतें हैं |
मैंने कहा हाँ शिकायतें तो इंदिरा गांधी की ( तत्कालीन प्रधान मंत्री ) भी बहुत हैं तो क्या ......?
----सुपरिन्टेन्डेन्ट मुस्कुराने लगे, बोले डा. गुप्ता आप जाइए, हम देख लेंगे |
पण्डित अजय बाजपेई

 

'काव्यनिर्झरिणी की रचनाएँ ---रचना २०-उठो कवि ---डा श्याम गुप्त

                                         ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ... 



---मेरा द्वितीय काव्य संग्रह 'काव्यनिर्झरिणी' 1960 से 2005 तक रचित तुकांत काव्य-रचनाओं का संग्रह है |---सुषमा प्रकाशन , आशियाना द्वारा प्रकाशित , प्रकाशन वर्ष -२००५ ..


 नराकास, (नगर राजभाषा क्रियान्वन समिति, लखनऊ )  राजभाषा विभागगृहमंत्रालयउप्र से "राजभाषा सम्मान व पुरस्कार -२००५," प्राप्त---

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चना २०--उठो कवि----
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काव्य निर्झरिणी की रचनाएँ ----रचना 18 व१ १९----डा श्याम गुप्त

                          ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

काव्य निर्झरिणी की रचनाएँ ----रचना 18 व१ १९----


 

मंगलवार, 23 जून 2020

काव्यनिर्झरिणी' की रचनाएँ ---रचना १७ - जब दिनकर छुपने लगता है ----व 18 --रात है ---डा श्याम गुप्त

                                  ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

मेरा द्वितीय काव्य संग्रह 'काव्यनिर्झरिणी' 1960 से 2005 तक रचित तुकांत काव्य-रचनाओं का संग्रह है |---सुषमा प्रकाशन , आशियाना द्वारा प्रकाशित , प्रकाशन वर्ष -२००५ ..
—नराकास , राजभाषा विभाग, गृहमंत्रालय, उप्र से "राजभाषा सम्मान व पुरस्कार -२००५," प्राप्त---रचना १७ व१ 18 --


रचना १७ - जब दिनकर छुपने लगता है ----व 18 --रात है ---



 

सोमवार, 15 जून 2020

वरिष्ठ नागरिक समिति , प्रेस्टीज शान्तिनिकेतन , बेगलोर --प्रतिदिन प्रातः सम्मिलन ---डा श्याम गुप्त

                                                ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ... 


वरिष्ठ नागरिक समिति , प्रेस्टीज शान्तिनिकेतन , बेगलोर --प्रतिदिन प्रातः सम्मिलन




 

शनिवार, 13 जून 2020

काव्यनिर्झरिणी की रचनाएँ ---रचना १६--हरियाली रहे ---डा श्याम गुप्त

             ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ... 


मेरा द्वितीय काव्य संग्रह 'काव्यनिर्झरिणी' 1960 से 2005 तक रचित तुकांत काव्य-रचनाओं का संग्रह है |---सुषमा प्रकाशन , आशियाना द्वारा प्रकाशित , प्रकाशन वर्ष -२००५ ..
—नराकास , राजभाषा विभाग, गृहमंत्रालय, उप्र से "राजभाषा सम्मान व पुरस्कार -२००५," प्राप्त---रचना

16.हरियाली रहे –

जबसे कदम पड़े हैं
मानव के चन्द्रमा पर |
कैसे बनी मानस में
 छवि वो निराली रहे |
ऊंची नीची सुनसान
मानव विहीन धरा |
कैसे छवि चरखा,
चलाती नानी, वाली रहे |

धुंआ धूल गर्द से,
बुझा बुझा क्लांत चाँद |
कैसे धवल चांदनी से,
धरा उजियाली रहे |

चहुँ ओर मची है ,
आपा धापी सत्ता की |
कैसे फिर घर और
देश में खुशहाली रहे |

बिल्डिंग और सडकों से
पट गयी सारी धरा |
कैसे बनी शस्य श्यामल,
धरती निराली रहे |

कहें श्याम, जहर-
उगलता है सारा शहर |
क्यों न हो प्रदूषण घोर,
कैसे हरियाली रहे ||

क्रमश रचना १७---

 

बुधवार, 10 जून 2020

काव्यनिर्झरिणी की रचनाएँ-----१५.कुदरत की नियामतें --डा श्याम गुप्त

                   ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...










काव्यनिर्झरिणी की रचनाएँ-----१५.कुदरत की नियामतें –
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तरबूज की फांक सा,
खिड़की से झांकता |
नीले आकाश में
सारी रात जगता |

वो यात्री सा चाँद,
दिला जाता है याद |
खोल देता है मन में,
स्मृति के कपाट |

होता था कभी चाँद,
एक चांदनी की रात |
वो नानी की कहानी,
वो चांदी सी रात |

वो ऊपर की छत पर,
शीतल मंद समीर |
वो रात की परात में,
यूं बिखरी सी खीर |

खरबूज आम फालसे,
ककडी वो लज्ज़तदार |
तरबूज की तरावट,
खिरनी की वो बहार |

इक चाँद ही नहीं हम,
सूरज भी खोचुके |
उस नीम की बयार,
 से भी हाथ धो चुके |

पंखा है कूलर है ,
एसी का ही  राज है |
सिर दर्द को बढाने का ,
ये सारा ही साज है |

कुदरत की सब नियामतें ,
हम भूल चले हैं |
अपनी बनाई कैद में,
ही फूल चले हैं ||