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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

शुक्रवार, 5 जून 2009

श्रृष्टि व जीवन की उत्पत्ति --एक अनुत्तरित उत्तर --भाग-१ -२, ३ व ४...

सृष्टि व ब्रह्मांड: उत्पत्ति ----            

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          भारतीय सभ्यता विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं‌ मे से एक है। अन्य सभ्यताओं की तरह इस सभ्यता से भी ज्ञान, विज्ञान का एक निर्बाध प्रवाह प्रारंभ हुआ था। विदेशी आक्रान्ताओं तथा औपनिवेश शासन काल मे इस सभ्यता के चिन्ह धूमिल हो गये। औपनिवेश शासकों के 'सरकारी' काम को चलाने के लिये भारतीय शिक्षा पद्दति मे भारी परिवर्तन किये गये जिससे उनके लिये बाबू वर्ग तैयार हो सके। पाश्चात्य संस्कारों‌ की तुलना मे भारतीय मूल्य व ज्ञान विज्ञान पिछडापन के रूप मे चित्रित किया गया। एक ज्ञान-विशिष्ठ सभ्यता, एक पिछ्डी, अंधविश्वासी समाज बन गयी। प्राचीन भारतीय विज्ञान के चिन्ह धूमिल होते जा रहे है। आवश्यक्ता है आम समाज को उस विज्ञान से परिचित कराने की। इससे न केवल भारत के विज्ञान का विश्व से परिचय होगा बल्कि मिथ्या धारणाये, तथा अंधविश्वास भी‌ खंडित होगा। कल्किआन हिंदी के पर हम "वैदिक विज्ञान" पर डा श्याम गुप्ता की एक अत्यंत ही महत्वपूर्ण श्रंखला "सृष्टि व ब्रह्माण्ड" प्रारंभ कर रहे है, इस कार्य हेतु दीपावली से श्रेष्ठ सुभावसर और क्या हो सकता था। -- प्रधान सम्पादक
भूमिका: सृष्टि व ब्रह्माण्ड
ज्ञान चक्षु  खुलने पर जब मानव ने प्रकृति के विभिन्न रूपों को रोमांच, आर्श्चय, भय व कौतूहल से देखा और सोचा की इन सब का क्या रहस्य है, क्या इन सब का कोइ संचालन - कर्ता  है?
उसी क्षण मानव मन मे ईश्वर का आविर्भाव हुआ, और उसी ईश्वर की खोज के परिप्रेक्ष्य में सृष्टि, जीवन, मानवता, समाज, देश, राष्ट्र, आचरण, सत्य - असत्य, दर्शन, विज्ञान आदि के क्रमिक उन्नति व विकास की यात्राएं हैं। सृष्टि व ईश्वर के बारे में विभिन्न दर्शन, धर्म व आधुनिक विज्ञान के अपने-अपने मत हैं; परन्तु मानव आचरण व सदाचार जो समस्त विश्व; शान्ति हो या उन्नति या विकास सभी का मूल है, उस पर किसी में कोइ मत भेद नहीं  है।
प्रश्न यह है कि आखिर इस विषय को हम क्यों जानें? आज के सन्दर्भ में इस, ईश्वर या सृष्टि कैसे बनी जानने का जीवन में क्या लाभ? वस्तुतः इसकी महत्ता नहीं है कि सृष्टि ईश्वर ने बनाई या विज्ञान के अनुसार स्वयं बनी; परन्तु यदि आधुनिक भौतिक वादी सोच के अनुसार यदि, यह सब एक संयोग है, ईश्वर कुछ नहीं, मानव सब कुछ कर सकता है, इस सोच का पोषण हो तो मानव में अहं- भाव जाग्रत होता है, और यही अहं- भाव सारे द्वंद्व, द्वेष व पतन का मूल होता है, सदियाँ गवाह हैं।
परन्तु सर्व-नियामक कोई ईश्वर है, हमारे कर्म ही कोई देखता है; इस सोच का पोषण हो तो, अहं भाव तिरोहित रहता है और मानव परार्थ, परमार्थ,समष्टि-हित भावों से युत सत्त्व गुणों  को अपनाता है और उसका कृतित्व सत्यम, शिवम, सुन्दरम होकर समस्त विश्व को उसी राह पर ले जाकर उसे उन्नति व विकास के ऋजु मार्ग पर लेजाता है। यही उद्देश्य इस ज्ञान को जानने का है और यही उद्देश्य प्रस्तुत क्रमिक आलेख का।
संक्षिप्त में विषय भाव कुछ इस प्रकार है:
(अ) सृष्टि व ब्रह्माण्ड 
भाग १: आधुनिक विज्ञान का मत - सृष्टि पूर्व, आरम्भ, बिग-बेंग, ऊर्जा व कणों की उत्पत्ति, कोस्मिक-सूप, परमाणु - निर्माण, हाइड्रोज़न-हीलियम, पदार्थ, लय व पुनः सृष्टि।
भाग २: वैदिक विज्ञान के अनुसार सृष्टि -  सृष्टि पूर्व, एकोअहम बहुस्याम, ऊर्जा, कण, त्रिआयामी कण, पदार्थ, चेतन तत्व, कण-कण में भगवान, पंचौदन अज।
भाग ३: समय, जड़ व जीव सृष्टि की भाव संरचना,महातत्व, व्यक्त पुरुष ,व्यक्त माया,त्रिदेव,त्रि-आदि शक्ति ,हेमांड-ब्रह्माण्ड |                                                                                      2.
भाग ४: सृष्टि संगठन प्रक्रिया, नियामक शक्तियां, विभिन्न रूप सृष्टि, लय व पुनर्सृष्टि।
सभी का आधुनिक वैज्ञानिक मत से तुलनात्मक संदर्भित व्याख्या।
(ब) जीव व जीवन: संक्षिप्त में, आरम्भ कब, कैसे, किसने, कहाँ से, वृद्धि, गति, संतति वर्धन, लिंग चयन, स्वतः संतति-उत्पादन प्रक्रिया, प्राणी व मानव विकास क्रम आदि।
भाग १: आधुनिक विज्ञान सम्मत - योरोपीय, रोमन, ग्रीक आदि मत, डार्विन -सिद्धांत।
भाग २: वैदिक विज्ञान सम्मत  -  भारतीय दर्शन मत- ब्रह्मा का मूल सृष्टि -क्रम, भाव-पदार्थ निर्माण, रूप सृष्टि, प्राणी निर्माण, मानव, मानस-संकल्प व मैथुनी सृष्टि, मानव विकास क्रम।
  (अ)----श्रिष्टि व ब्रह्मांड---
भाग १: 

जिस दिन मानव ने ज्ञान का फ़ल चखा,उसने मायावश होकर प्रकृति के विभिन्न रूपों को भय, रोमांच, आश्चर्य व कौतूहल से देखा और उसी क्षण मानव के मन में ईश्वर, गाड, रचयिता, खुदा, कर्ता का आविर्भाव हुआ। उसकी खोज के परिप्रेक्ष्य में ब्रह्मांड, सृष्टि व जीवन की उत्पत्ति का रहस्य जानना प्रत्येक मस्तिष्क का लक्ष्य बन गया। इसी उद्देश्य यात्रा में मानव की क्रमिक भौतिक उन्नति, वैज्ञानिक व दार्शनिक उन्नति के आविर्भाव की गाथा है। आधुनिक --विज्ञान हो या दर्शन या पुरा-वैदिक - विज्ञान इसी यक्ष प्रश्न का उत्तर खोजना ही सबका का चरम लक्ष्य है।

आधुनिक विज्ञान की मान्यता के अनुसार उत्पत्ति का मूल "बिग बेन्ग" सिद्दान्त है। प्रारम्भ में ब्रह्मांड एकात्मकता की स्थिति में (सिन्ग्यूलेरिटी) में शून्य आकार व अनन्त ताप रूप (इन्फ़ाइनाइट होट) था। फ़िर:

१. अचानक उसमें एक विस्फ़ोट हुआ -- "बिग बेन्ग", और १/१००० सेकन्ड में तापक्रम १०० बिलिअन सेंटीग्रेड हो गया, घनीभूत ऊर्ज़ा व विकिरण के मुक्त होने से आदि-ऊर्ज़ा उपकण उत्पन्न होकर अनन्त ताप के कारण विखन्डित होकर एक दूसरे से तीव्रता से दूर होने लगे। ये हल्के, भार-रहित, विद्युतमय व उदासीन आदि ऊर्ज़ा उपकण थे जो मूलतः- इलेक्ट्रोन्स, पोज़िट्रोन, न्युट्रीनोज़ व फ़ोटोन्स थे। सभी कण बराबर संख्या में थे एवम् उपस्थित स्वतन्त्र ऊर्ज़ा से लगातार बनते जा रहे थे। इस प्रकार एक "कोस्मिक-सूप" बन कर तैयार हुआ।

२. एनीहिलेशन (सान्द्रीकरण) स्थिति- कणों के लगातार आपस में दूर-दूर जाने से तापक्रम कम होने लगा एवम हल्के कण एक दूसरे से जुड कर भारी कण बनाने लगे, जो १००० मिलियन: १ के अनुपात में बने। वे मुख्यतया, प्रोटोन, न्यूट्रोन व फ़ोटोन्स थे। (जो -१००० मिलियन एलेक्ट्रोन्स या फ़ोटोन्स या पोज़िट्रोन्स या न्यूट्रीनोस=१ प्रोटोन या न्यूट्रोन के अनुपात में बने।) 

ये एटम-पूर्व कण थे जो लगातार बन रहे थे एवम उपस्थित ऊर्ज़ा से नये उप-कण उत्पन्न भी हो रहे थे, तापमान लगातार गिरने से बनने की प्रक्रिया धीमी थी।

३. स्वतन्त्र केन्द्रक (न्यूक्लियस) १४वें सेकन्ड में तीव्र एनीहिलेशन से जटिल केन्द्रक बनने लगे, १ प्रोटोन + १ न्यूट्रोन = भारी हाइड्रोज़न(ड्यूटीरियम) के अस्थायी केन्द्रक व पुनः २ प्रोटोन + २ न्यूट्रोन से स्थायी हीलियम के केन्द्रक ,जो परमाणु पूर्व कण थे बने।

४. बिग बेन्ग के तीन मिनट के अन्त में- शेष हल्के कण,न्यूट्रोन्स-प्रतिन्यूट्रोन्स, लघु केन्द्रक कणों के साथ ही ७३% हाइड्रोजन व २७% हीलियम मौज़ूद थे। एलेक्ट्रोन्स नहीं बचे थे ।

इस समय आदि-कण बनने की प्रक्रिया धीमी होने पर स्वतन्त्र ऊर्ज़ा के व एलेक्ट्रोन्स आदि के न होने से आगे की विकास प्रक्रिया लाखों वर्षों तक रूकी रही। यद्यपि कणों के तेजी से एक दूसरे से दूर जाने पर यह पदार्थ- कोस्ममिक-सूप-कम घना होता जारहा था, अतः उपस्थित गेसों की एकत्रीकरण (क्लम्पिन्ग) क्रिया प्रारम्भ होचली थी, जिससे बाद में गैलेक्सी व तारे आदि बनने लगे।

५. ऊर्ज़ा का पुनः निस्रण -- लाखों वर्षों बाद जब ताप बहुत अधिक कम होने पर, पुनः ऊर्ज़ा व एलेक्ट्रोन्स निस्रत हुए; ये एलेक्ट्रोन, प्रोटोन्स व न्यूट्रोन्स से बने केन्द्रक के चारों ओर एकत्र होकर घूमने लगे, इस प्रकार प्रथम एटम का निर्माण हुआ जो हाइड्र्प्ज़न व हीलियम गैस के थे। इसी प्रकार अन्य परमाणु, अणु, व हल्के-भारी कण, गैसें ऊर्ज़ा आदि मिलकर विभिन्न पदार्थ बनने के प्रक्रिया प्रारम्भ हुई।

--  न्युट्रिन + अन्टीनुट्रिनो + भारी एलेक्ट्रोन्स + केन्द्रक = ठोस पदार्थ, तारे, ग्रह पिन्ड आदि बने।
-- शेष एलेक्ट्रोन्स + पोज़िट्रोन्स  + ऊर्ज़ा = तरल पदार्थ, जल आदि।
-- फ़ोटोन्स (प्रकाश कण) + शेष ऊर्ज़ा + हल्के कण पदार्थ = नेब्यूला, गैलेक्सी आदि। इस प्रकार सारा ब्रह्मान्ड बनता चला गया ।

सम स्थिति सिद्धांत -- विज्ञान के इस एक अन्य सिद्दान्त के अनुसार, ब्रह्मांड सदैव वही रहता है, जैसे -जैसे कण एक दूसरे से दूर होते हैं नया पदार्थ उन के बीच के स्थान को भरता जाता है, तारों, गैलेक्सियों आदि के बीच भी, यही प्रक्रिया चलती रहती है।

पुनः एकात्मकता -- ( या लय-प्रलय) -- प्रत्येक कण लगातार एक दूसरे से दूर होते जाने से ब्रह्मान्ड अत्यधिक ठन्डा होने पर, कणों के मध्य आपसी आकर्षण समाप्त होने पर, पदार्थ कण पुनः विश्रन्खलित होकर अपने स्वयम के आदि-कण रूप में आने लगते हैं, पदार्थ विलय होकर पुनः ऊर्ज़ा व आदि कणों में संघनित्र होकर ब्रह्मांड एकात्मककता को प्राप्त होता है,पुनः नये बिगबेन्ग व पुनर्स्रष्टि के लिये।

 
(अ)श्रिष्टि व ब्रह्मान्ड-- भाग -दो---
क्रमश आगे ----वैदिक -विज्ञान के अनुसार (ऋग्वेद ,अथर्व वेद ,विष्णुपुराण ,भविष्य पुराण,ब्रह्म संहिता ,मनु स्मृति


आदि)--- श्रृष्टि व जीवन का रचयिता "परब्रह्म " ईश्वर है। 111121
1. श्रृष्टि पूर्व - ऋग्वेद के नासदीय सूत्र के अनुसार--न सदासीन्नो ,सदासीत्त दानी । न सीद्र्जो नो व्योमा परोयत॥ एवं -आनंदी सूत स्वधया तदेकं।तस्माद्वायान्न परःकिन्चनासि ॥ (१०/१२९/१ व २ )
---अर्थात प्रारंभ में न सत था न असत,न परम व्योम व व्योम से परे लोकादिवह सिर्फ़ एक अकेला ही स्वयं की शक्ति से गति शून्य होकर स्थित था । इसके अतिरिक्त कुछ नहीं था। तथा--
----"अशब्दम स्पर्शमरूपमव्ययम, तथारसं नित्यं गन्धवच्च यात । -( कठोपनिषद -१/३/१५ )--
अर्थात वह ईश्वर अशब्द,अस्पर्श,अरूप,अव्यय ,नित्य व अनादि है। भार रहित व गति रहित ,स्वयम्भू है,कारणों का कारण ,कारण ब्रह्म है।। उसे ऋषियों ने आत्मानुभूति से जाना व वेदों में गाया।
२.पर ब्रह्म का भाव संकल्प --उस परब्रह्म ने अहेतुकी ,श्रृष्टि प्रवृत्ति के लिए भाव संकल्प किया। जो मूल अनाहत नाद स्वर " "के रूप में,साम्य व शांत ,भाव संकल्प से व्यक्त-अर्णव(महाकाश ,मनो आकाश,गगन या ईथरया परम व्योम ) में गुंजायमान हुआ तथा अक्रिय,असत ,निर्गुण व अव्यक्त परब्रह्म ; सक्रिय ,सत,सगुण व व्यक्त ब्रह्म -"हिरण्यगर्भ " (जिसके गर्भ में सब कुछ है )
के रूप में प्रकट हुआ,जो स्वयम्भू ( जिसमें सबकुछ -जीव,प्रकृति,चेतन,सत-असत ,सद-असद, सत तम् रज, कार्य-कारण ,मूल आदि ऊर्जा अन्तर्निहित था ) व परिभू ( जो स्वयं सब में निहित था ) ।
३.एकोअहम बहुस्यामः --व्यक्त ब्रह्म -हिरण्यगर्भ की सृष्टि -हित , ईषत -इच्छा -" एकोअहम बहुस्यामि "-अब में एक से बहुत होजाऊँ(जो श्रृष्टि का प्रथम काम संकल्प -मनो रेत संकल्प था ) -साम्य अर्णव में "ॐ " के अनाहत नाद में स्पंदित हुई। प्रतिध्वनित स्पंदन से महाकाश की साम्यावस्था भंग होने से अक्रिय अ़प(अर्णवमें उपस्थित मूलइच्छा तत्व ) ,व्यक्तसक्रिय
अ़प में परिवर्तित हुआ , मूल अक्रिय ऊर्जा ( आदि ऊर्जा )में स्पंदन से मूल ऊर्जा सक्रिय व्यक्त ऊर्जा में प्रकट हुई तथा स्पंदन से उसके कणों में तीव्र हलचल होने लगी । कणों के इस द्वंद्व भाव से सारे महाकाश (अर्णव या अन्तरिक्ष या ईथर या परम व्योम )में एक अशांति एवं असाम्यावस्था की उत्पत्ति होगई ।
४,अशांत अर्णव (परम व्योम ,अन्तरिक्ष ,ईथर )--अशांत आकाश में मूल अपः तत्त्व के कणों की टक्कर व द्वंद्व के आहत नाद से अग्नि,( ऊर्जा -सौर ऊर्जा ) की अधिकायत मात्रा में उत्पत्ति होने लगी तथा साथ ही साथ ऊर्जा व आदि अपः कणों के संयोग से परमाणु पूर्व कण व परमाणु तो बनने लगे परन्तु कोई निश्चित सततः प्रक्रिया न थी।
५.नाभिकीय ऊर्जा ( न्यूक्लीयर इनर्जी )--ऊर्जा व कणों के और अधिक मात्रा में उपलब्धता से प्रति १०००इकाई मूल ऊर्जा से एक इकाई नाभिकीय ऊर्जा की उत्पत्ति होने लगी (नाभानेदिष्ट ऋषि एक गाय दे सहस चाहते तभी इन्द्र से --ऋग्वेद व सृष्टि महाकाव्य ),जिससे ऋणात्मक ,धनात्मक , अनावेषित व अति सूक्ष्म केन्द्रक आदि विभिन्न परमाणु पूर्व कण बनने लगे। पुनः विभिन्न प्रक्रियाओं द्वारा विभिन्न असमान धर्मा कणों से नए नए कण व समान धर्मा कण स्वतंत्र रूप से (,क्योंकि समान धर्मा तत्व आपस में संयोग नहीं करते ,--यम-यमी आख्यान -ऋग्वेद ) महाकाश में उत्पन्न होरहे थे।
६,रूप श्रृष्टि कण --पुनः उपस्थित ऊर्जा व परमाणु पूर्व कणों के संयोग से विभिन्न प्रकार के परमाणु --जो अदृश्य ,अश्रव्य रूप कण ( या भूत कण )थे ,जिनमें -सप्तवर्ण -प्रकाश व ध्वनि कण(अर्यमा ) व सप्त होत्र (सात इलेक्ट्रोन वाले असंत्रप्त अजैविक (इनोर्गेनिक ) व अष्ट बंधन बसु (८ इलेक्ट्रोन वाले संत्रप्त ) जैविक (ओरगेनिक ) कण थे।
७.त्रिआयामी रूप सृष्टि कण -ये विभिन्न अद्रश्य रूप कण एवं ऊर्जा के पुनः संयोग से विभिन्न प्रकार के त्रि आयामी कणों का प्रादुर्भाव हुआ जो वस्तुतः दृश्य रूप कण ,अणु -परमाणु थे ,जिनसे विभिन्न रासायनिक -भौतुक ,नाभिकीय,आदि क्रियाओं द्वारा समस्त प्रकार के भूत कण ,ऊर्जा व पदार्थ बने।
८.चेतन तत्व का प्रवेश --वैदिक विज्ञान के अनुसार ,वह चेतन ब्रह्म ,सचेतन भाव व प्रत्येक कण का क्रियात्मक भाव-तत्व (जिसे दर्शन मेंप्रत्येक तत्व या वस्तु का मूल स्वाभिमानी देव कहा जाता है)बनकर उनमें प्रवेश करता है ( वह ब्रह्म ही चेतन -प्राण तत्व है जो सदैव उपस्थित रहता है कणों आदि से उत्पन्न नहीं होता ),ताकि आगे जीव-श्रृष्टि का विस्तार होपाये। इसीलिये "कण-कण में भगवान् " कहा जाता है।
इसप्रकार ये सभी कण महाकाश या ईथर में प्रवाहित होरहे थे ,इसी कण-प्रवाह को वायु नाम से सर्व प्रथम उत्पन्न तत्व माना गया , कणों के मध्य स्थित विद्युत- विभब अग्नि (या क्रियात्मक ऊर्जा )हुआ । उपस्थित भारी कणों से जल तत्व की उत्पत्ति हुई। जिनसे आगे--
--- जल से सब जड पदार्थ--ठोस ,तरल व गेसीय बने ।
-----अग्नि से सब ऊर्जाये ।
-----वायु से मन पुनः - ,भाव , बुद्धि , अहम् ,शब्द आदि

.9. विश्वौदन अजः--( या पन्चोदन अजः)ये समस्त तत्व-,ऊर्जायें,सभी में सत,तम,रज रूपी गुण, माया व चेतन देव ---सन्युक्त ,श्रिष्टि निर्माण का मूल पदार्थ (--ब्रह्मा कीगूंथी हुई मिट्टी--माटी)सारे अन्तरिक्ष में तैयार था, सन्सार की रचना के लिये।

१०.मूल आत्म या चेतन ( ३३ देव )--चेतन जो प्रत्येक कण का मूल क्रिया भाव बन कर उनमें बसा , वे ३३ प्रकार के भाव रूप थे जो ३३ देव हुए--
---११ रुद्र -विभिन्न प्रक्रियाओं का नियमन : १२ आदित्य -प्रक्रति चलाने वाले नीति निर्देशक ; ८ बसु -मूल सेद्धान्तिक नियामक,नीति रूप बल वर्ण देने वाले ; इन्द्र -सन्योजक, विघटकतत्व ; प्रजापति -संयोजक व समायोजक भाव तत्व -- ये सभी भाव पदार्थ, सिन्धु _ (महाकाश,ईथर, अन्तरिक्ष) मेंविश्वोदन अजः के साथ प्रत्येक कण में समाहित पडे थे।
-----क्रमश-,आगे भाव तत्व ,समय व जीवन --






सृष्टि व ब्रह्माण्ड (भाग -३)                                                         4.



 (सृष्टि व ब्रह्माण्ड भाग २ में हमने वैदिक विज्ञान के अनुसार सृष्टि रचना प्रारम्भ क्रम, से विश्वौदन अज (कोस्मिक सूप) बनने व उसमें भाव तत्व का प्रवेश तक व्याख्यायित किया था, आगे इस भाग में हम समय की उत्पत्ति, जड़ व जीव सृष्टि की मूल भाव संरचना, मूल तत्व-महत्तत्व, व्यक्त पुरुष, व्यक्त मूल ऊर्जा -आदिशक्ति, त्रिदेव, अनंत ब्रह्माण्ड की रचना एवं निर्माण कार्य में व्यवधान का वर्णन करेंगे)
१. सृष्टि की भाव संरचना ---वह चेतन ब्रह्म, परात्पर ब्रह्म, पर ब्रह्म (जैसा कि भाग २ में कहा ही कि चेतन प्रत्येक कण में प्रवेश करता है) ; जड़ व जीव दोनों में ही निवास करता है। उस ब्रह्म का भू : रूप (सावित्री रूप), जड़ सृष्टि का निर्माण करता है एवं भुव: (गायत्री रूप) जीव सृष्टि की रचना करता है। इस प्रकार --
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परात्पर अव्यक्त से --->परा शक्ति (आदि शम्भू -अव्यक्त) एवं अपरा शक्ति (आदि माया -अव्यक्त) - दोनों के संयोग से ==आदि व्यक्त तत्व --महत्त्तत्व प्राप्त होता है। 
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महत्तत्व के विभाजन से ---> व्यक्त पुरुष (आदि विष्णु) व आदि-माया (व्यक्त आदि शक्ति अपरा) 
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आदि विष्णु (आदि-पुरुष) से --->महा विष्णु, महा शिव, महा ब्रह्मा ---क्रमश: पालक, संहारक, धारक तत्व बने (विज्ञान के इलेक्ट्रोन, प्रोटोन व न्यूत्रों कण कहा जा सकता है) 
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आदि माया (आदि शक्ति) से --> रमा, उमा व सावित्री --सर्जक,संहारक व स्फुरण प्रति तत्व बने। (विज्ञान के एंटी-इलेक्ट्रोन-प्रोटोन-न्यूत्रों कहा जासकता है) ---आधुनिक विज्ञान में पुरुष तत्व की कल्पना नहीं है, ऊर्जा ही सब कुछ है, कण व प्रति कण सभी ऊर्जा हे हैं, जो देवी भागवत के विचार, देवी -आदि-शक्ति ही समस्त सृष्टि की रचयिता है -के समकक्ष है) 
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महाविष्णु व रमा के संयोग (सक्रिय तत्व व सृजक ऊर्जा) से अनंत चिद-बीज या हेमांड (जिसमें स्वर्ण अर्थात सब कुछ निहित है) या ब्रह्माण्ड (जिसमें ब्रह्म अर्थात सब कुछ निहित है) या अंडाणु, ग्रीक दर्शन का प्रईमोरडियल - एग, की उत्पत्ति हुई जो असंख्य व अनंत संख्या में थे व महाविष्णु (अनंत अंतरिक्ष) के रोम-रोम में (सब ओर बिखरे हुए) व्याप्त थे। प्रत्येक हेमांड की स्वतंत्र सत्ता थी। 
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महा विष्णु से उत्पन्न ---> विष्णु चतुर्भुज (स्वयं भाव से), लिंग महेश्वर शिव व ब्रह्मा (विभिन्नांश से) ---इन तीनों देवों ने (त्रि-आयामी जीव सत्ता) प्रत्येक हेमांड में प्रवेश किया। 
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इस प्रकार इन हेमांडों में में --त्रिदेव,माया, परा-अपरा ऊर्जा, दृव्य, प्रकृति,व उपस्थित विश्वौदन अज उपस्थित थे, सृष्टि रूप में उद्भूत होने हेतु। (अब आधुनिक विज्ञान भी यह मानने लगा है कि अनंत अंतरिक्ष (चिदाकाश) में अनंत-अनंत आकाश गंगाएं हैं अपने-अपने अनंत सौरी मंडलों व सूर्यों के साथ, जिनकी प्रत्येक की अपनी स्वतंत्र सत्ताएं हैं।)
२. निर्माण में रुकावट --निर्माण ज्ञान भूला हुआ ब्रह्मा --लगभग एक वर्ष तक(ब्रह्मा का एक वर्ष == मानव के करोड़ों वर्ष) ब्रह्मा, जिसे सृष्टि निर्माण
करना था,उस हेमांड में घूमता रहा,वह निर्माण प्रक्रिया समझ नहीं पा रहा था, भूला हुआ था। (आधुनिक विज्ञान के अनुसार हाइड्रोजन, हीलियम पूरी निर्माण में कंज्यूम होजाने के कारण निर्माण क्रम युगों तक रुका रहा, फिर अत्यधिक शीत होने पर पुन: ऊर्जा बनने पर सृष्टि क्रम प्रारम्भ हुआ)
----जब ब्रह्मा नेआदि -विष्णु की प्रार्थना की, क्षीर सागर (अंतरिक्ष,महाकाश, ईथर) में उपस्थित, शेष-शय्या (बची हुई मूल संरक्षित ऊर्जा) पर लेटे हुए नारायण (नार=जल,अंतरिक्ष ;;अयन=निवास, स्थित विष्णु) की नाभि (नाभिक ऊर्जा) से स्वर्ण कमल (सत्, तप,श्रृद्धा रूपी आसन) पर वह ब्रह्मा,-चतुर्मुख रूप (कार्य रूप) में अवतरित हुआ। आदि माया सरस्वती (ऊर्जा का सरस -भाव रूप) का रूप धर कर वीणा बजाती हुई (ज्ञान के आख्यानों सहित) प्रकट हुई एवं ब्रह्मा के ह्रदय में प्रविष्ट हुईं। इस प्रकार उसे सृष्टि निर्माण प्रक्रिया कापुन; ज्ञान हुआ, और वे सृष्टि रचना में रत हुए।
                                                                                                            5.
३. समय (काल)---अंतरिक्ष में बहुत से भारी कणों ने, मूल स्थितिक ऊर्जा,नाभीय व विकिरित ऊर्जा, प्रकाश कणों आदि को अत्यधिक मात्रा में मिला कर कठोर रासायनिक बंधनों वाले कण-प्रति कण बनालिए थे (जिन्हें राक्षस कहागया है) वे ऊर्जा का उपयोग रोक कर सृष्टि की आगे प्रगति रोके हुए थे,पर्याप्त समय बाद (ब्रह्मा को ज्ञान के उपरांत) उदित, इंद्र (रासायनिक प्रक्रिया-यग्य) द्वारा बज्र (विभिन्न उत्प्रेरकों) के प्रयोग से उन को तोड़ा। वे बिखरे हुए कण --काल-कांज या समय के अणु कहलाये। इन सभी कणों से--
अ. - विभिन्न ऊर्जाएं, हलके कण व प्रकाश कण मिलकर--विरल पिंड (अंतरिक्ष के शुन) कहलाये, जिनमें नाभिकीय ऊर्जा के कारण संयोजन व विखंडन (फिसन व फ्यूज़न) के गुण थे, उनसे सारे नक्षत्र,( सूर्य, तारे आदि),आकाश गंगाएं (गेलेक्सी) व नीहारिकाएं (नेब्यूला) आदि बने।
ब. - मूल स्थितिक ऊर्जा,भारी व कठोर कण मिलाकर जिनमें उच्च ताप भी था, अंतरिक्ष के कठोर पिंड ---गृह,उप गृह, पृथ्वी आदि बने।

----क्योंकि ये सर्व प्रथम दृश्य ज्ञान के रचना पिंड थे, एक दूसरे के सापेक्ष घूम रहे थे, इसके बाद ही एनी दृश्य रचनाएँ हुईं, तथा ब्रह्मा को ज्ञान का भी यहीं से प्रारम्भ हुआ ; अत; ब्रह्मा का दिन व समय की नियमन गणना यहीं से प्रारम्भ मानी गयी। 

सृष्टि व ब्रह्माण्ड भाग ४


भाग ३ में हमने सृष्टि संरचना (वैदिक विज्ञान सम्मत) की भाव संरचना व असंख्य ब्रह्मांडों की रचना तथा सृष्टि रचना में व्यवधान व ब्रह्मा को भूली सृष्टि -कर्म के सरस्वती की कृपा से पुनर्ज्ञान तक वर्णन किया था। इस अंतिम भाग में हम ब्रह्मा द्वारा सृष्टि की रचना, उसकी नियमन शक्तियों की रचना, प्रलय व लय-सृष्टि चक्र का वर्णन करेंगे। पाठकों की रुचिपूर्ण जिज्ञासा के अनुरूप वैदिक उद्धरण व सन्दर्भ भी दिए गए हैं
(१.) विश्व संगठन प्रक्रिया -- प्रत्येक हेमांड (या ब्रह्माण्ड ,-- प्राचीन पाश्चात्य दर्शन का प्राईमोर्दिअल एग), समस्त प्रादुर्भूत मूल तत्वों सहित स्वतंत्र सत्ता की भांति महाकाश (ईथर) में उपस्थित था। सृष्टि निर्माण प्रक्रिया ज्ञान होने पर ब्रह्मा ने समस्त तत्वों को एकत्रित कर सृष्टि रूप देना प्रारम्भ किया। ऋग्वेद (४/५८) में कहा है -- "उप ब्रह्मा श्रिणव त्ध्स्यमानं  चतु: श्रिन्गोअबसादिगौर एतत।।
अर्थात हमारे द्वारा गाये गए स्तवन ब्रह्मा जी श्रवण करें, जिन चार वेद रूपी श्रृंग वाले देव ने इस जगत को बनाया। ब्रह्मा ने हेमांड को दो भागों में विभाजित किया - ऊपरी भाग में हलके तत्त्व एकत्र हुए जो आकाश भाव कहलाया; जिससे - समय ,गति,शब्द, गुण, वायु, महतत्व, मन, तन्मात्राएँ, अहं, वेद (ज्ञान) आदि रचित हुए। मध्य भाग दोनों का मिश्रण - जल भाव हुआ जिससे जलीय, रसीय,तरल तत्त्व, रस भाव ,इन्द्रियाँ, वाणी ,कर्म-अकर्म, सुख-दुःख इच्छा, संकल्प ,द्वंद्व भाव व प्राण आदि का संगठन हुआ। तथा नीचे का भारी तत्त्व भाव, पृथ्वी भाव हुआ जिससे, समस्त भूत पदार्थ,जड़ जीव, , गृह, पृथ्वी,प्रकृति,दिशाएं ,लोक निश्चित रूप भाव बाले रचित हुए। प्रकाश, ऊर्जा,अग्नि ,वाणी,त्रिआयामी पदार्थ कण से नभ, भू, जल के प्राणी हुए। (यह विस्तृत वर्णन अथर्व वेद के ८,,व १० काण्ड में व्याख्यायित है)
(२.) नियमन व्यवस्था -- ये सारे संगठित तत्त्व बिखरें नहीं इस हेतु नियामक शक्तियों का निर्माण किया गया। ( विज्ञान के भौतिक व रासायनिक नियम के अनुरूप जो पदार्थ प्रक्रियाओं का नियमन करते हैं) यजुर्वेद (७/१९) का मन्त्र है--" ये देवासो दिव्य्कादश स्थ प्रथिव्या मध्येकादश स्थ । अप्सु:क्षितौ महितोकादश स्थ ते देवासो यग्यमिहं जुसध्वम ॥"-- पृथ्वी, अन्तरिक्ष, द्यूलोक में व्याप्त ११-११ दिव्य शक्तियां जो सृष्टि का संचालन कर रहीं हैं, वे ३३ देव इस यग्य को सम्पन्न कराएं । ये
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नियामक शक्तियां थीं--संगठक शक्ति का भार इन्द्र को,पालक का इन्द्र, सरस्वती,भारती, अग्नि,सूर्य आदि देवों को, पोषण के लिये वतोष्पति,रूप गठन को त्वष्टा, कार्य नियमन को अश्विनी द्वय( वैद्य व पंचम वेद आयुर्वेद, महा ग्यान, ब्रह्मा के पन्चम मुख से), कर्म नियमन को चार वेद( ब्रह्मा के चार मुखों से),स्म्रिति, पुराण, ग्यान,यम, नियम विधि विधान, कार्य आगे बढे अत: अनुभव व छंद विधान।
(३.) सृष्टि रचना का मूल सन्क्षिप्त क्रम--भू: एवं भुव: से समस्त प्रिथ्वी कीरचना हुई। ऋग्वेद १०/७४/४ कहता है -- "भूर्जग्यो उत्तन्पदो भुवजाशा अजायन्त :अदितेर्दक्षा अजायातं व दक्षादिती परि:।" भू (आदि प्रवाह) से ऊर्ध्व गतिशील (मूल आदि कणों) की रचना हुई। भुव: (होने की आशा - संकल्प शक्ति -चेतन) का विकास हुआ। अदिति (अखंड आदि शक्ति) से दक्ष (सृजन की कुशलता युक्त प्रवाह) उत्पन्न हुए ,दक्ष से पुन: अदिति (अखंड प्रकृति -पृथ्वी) का जन्म हुआ। इस प्रकार दो चरणों में यह रचना हुई -- अ .सावित्री परिकर --मूल जड़ सृष्टि की रचना -- जो निर्धारित निश्चित अनुशासन (कठोर भौतिक व रासायनिक नियमों)पर चलें, सतत: गतिशील व परिवर्तनशील रहें।
ब . गायत्री परिकर -- जीव सत्ता जो -- १, देव -- सदा देते रहने वाले, परमार्थ युक्त -- पृथ्वी, अग्नि, वरुण ,पवन,आदि देव एवं ब्रक्ष (वनस्पति जगत), २.-- मानव -- आत्म बोध से युक्त ज्ञान कर्म मय, पुरुषार्थ युक्त - सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ तत्त्व। , ३.-- प्राणि जगत- पशु पक्षी आदि जो प्रकृति के अनुसार सुविधा भाव से जीने वाले व मानव एवं वनस्पति व भौतिक जगत के मध्य संतुलन रखें।
(४) प्रलय -- आधुनिक विज्ञान के अनुसार जब ब्रह्माण्ड के पिंड व कण अत्यधिक दूर होजाते हैं (बिग-बेंग से छिटक कर प्रत्येक कण एक दूसरे से दूर जारहा है--विज्ञान मत -बिग बेंग सिद्धांत)तो उनके मध्य अत्यधिक शीतलता से ऊर्जा की कमी से विकर्षण शक्ति की कमी होने से वे घनीभूत होने लगते हैं और समस्त सृष्टि कण व ऊर्जा एक दूसरे में लय होकर पुनः एकात्मकता को प्राप्त करके ऊर्जा व ताप का सघन पिंड बनजाते हैं; पुनः नवीन सृष्टि हेतु तत्पर। वैदिक विज्ञान के अनुसार --मानव की अति सुखाभिलाषा से नए-नए तत्वों का निर्माण (अप तत्त्व -यथा प्लास्टिक आदि जो प्राकृतिक चक्र रूप से नष्ट नहीं होपाते), अति भौतिकता (सिर्फ पंचभूत रत व्यक्ति समाज देश)पूर्ण जीवन पद्धति, विलासिता,प्रदूषण, असत-अकर्म, अनाचार से (तत्त्व ,भावना, अहं व ऊर्जा सभी के) व सदाचार को भूलने से -- देव, प्रकृति,धरती, अंतरिक्ष, आकाश सब प्रदूषित व त्रस्त हो जाते हैं तब उस कालरात्रि के आने पर ब्रह्म स्वयं संकल्प करता है कि अब में पुनः" एक होजाऊँ" और इस इच्छा के निमिष मात्र में ही लय क्रम आरम्भ होजाता है सारे कण ,पदार्थ, ऊर्जा के हर रूप, काल व गति --> मूल द्रव्य में --> महाविष्णु की नाभि केंद्र --> सघन पिंड में--> अग्निदेव की दाढ़ों में -->( क्रियाशील ऊर्जा)--> अपः तत्त्व में --> मूल ऊर्जा में( आदि माया-स्थिर ऊर्जा ) -->महाकाश में -->हिरन्यगर्भ  में (व्यक्त ब्रह्म)--> अव्यक्त ब्रह्म में लीन होकर पुनः वही एक ब्रह्म रह जाता है पुनः " एकोहं बहुस्याम " द्वारा सृष्टि की पुनः रचना हेत तत्पर। ऋग्वेद (२/१३/) में प्रलय का वर्णन करते ऋषि कहता है--" प्रजां च पुष्टिं विभजंत आसते रयिमिव पृष्ठं प्रभवंत मायते। असिन्वंदेष्ट्रै पितुरस्ति भोजनम यस्ता कृनो प्रथमं तस्युक्थ :। "जो प्रजा को प्रकट व पुष्ट करते हैं, पालन व पोषण देते हैं, वे ही इंद्र-अग्नि (इनर्जी - ऊर्जा - विनाशक शक्ति रूप में) प्रलय काल में समस्त जगत को भोजन की भांति दांतों से खाजाते हैं। वे सर्वप्रशंसनीय देव इन्द्र देव हैं। -- "पूर्णात पूर्णं उद्च्यति, पूर्ण पूर्णेन सिच्यते। उतो तदथ विद्याम यतस्तव परिसिच्यति।" ( अथर्व वेद १०/८) पूर्ण ब्रह्म से पूर्ण जगत उत्पन्न होता है, उसी पूर्ण से पूर्ण जगत को सींचा जाता है। बोध (ज्ञान) होने पर ही हम जान पाते हैं कि वह कहाँ से सींचा जाता है।
[अगले प्रलेख में  "जीव व जीवन" के बारे मेंआधुनिक वैज्ञानिक आधार व वैदिक सम्मतियों की विवेचना।]



1 टिप्पणी:

Babli ने कहा…

आपकी टिपण्णी के लिए बहुत बहुत शुक्रिया!
बहुत बढ़िया! इसी तरह लिखते रहिये!