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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी दस पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह) my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी

बुधवार, 18 मई 2011

वो हसीं पल....गज़ल...डा श्याम गुप्त....

                                           ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

वो एक पल का हसीं पल भी था क्या पल आखिर |
वो हसीं पल था,  तेरे प्यार के पल की खातिर |

दर्द की एक  चुभन सी है,   सुलगती दिल में ,
प्यास कैसी कि चले सहरा को जल की खातिर |

हमने चाही थी दवा,  दर्द-ए-दिल  के लिए ,
दर्द  के दरिया में,  डूबे  हैं दिल की खातिर |

आप आयें या  न आयें  हमारे  साथ मगर,
जब पुकारोगे, चले आयेंगे  दिल की खातिर |

याद आयें तो वही  लम्हे वफ़ा जी लेना,
गम न करना,उस प्यार के कल  की खातिर |

साथ तुम हो या न हो,सामने आयें जब श्याम,
मुस्कुरादेना उसी प्यार के पल की खातिर ||




6 टिप्‍पणियां:

Surendrashukla" Bhramar" ने कहा…

सुन्दर रचना

साथ तुम हो या न हो,सामने आयें जब श्याम,
मुस्कुरादेना उसी प्यार के पल की खातिर ||

जिंदगी के कई मोड पर ये दृश्य आ ही जाते हैं श्याम भ्राता श्री

शुक्ल भ्रमर ५
http://surendrashuklabhramar.blogspot.com

Patali-The-Village ने कहा…

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति | धन्यवाद|

Patali-The-Village ने कहा…

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति | धन्यवाद|

आशुतोष की कलम ने कहा…

जवाजे इश्क की कतरन को ले के अब भी बैठा हूँ
ये कैसी हर्फे ग़ुरबत है में तेरा नाम लिखता हूँ....

मजा आ गया..बड़ी गहरी बात है..

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

अहा, बेहतरीन।

Dr. shyam gupta ने कहा…

धन्यवाद--भ्रमर जी..सही कहा उफ़ ये कठिन लम्हे..
धन्यवाद--पाताली जी.व पान्डे जी....
---वाह!!!! क्या बात है आशुतोष...सुन्दर