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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त
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मंगलवार, 25 अगस्त 2015

शरीर में आत्मा का निवास कहाँ होता है ...ड़ा श्याम गुप्त ..

                      ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



                   आत्मा का निवास कहाँ होता है


          ब्रह्मा से बालखिल्य मुनियों ने पूछा कि आत्मा कहां स्थित है तो वे बोले- यह आत्मा तेज, संकल्प, प्रज्ञान, अहंकार व प्रजापति आदि पांच रूपों में ह्रदय गुहा में स्थित  रहता है | सत्य संकल्पित मन, प्राण भी यही आत्मा है |

          वृहदारण्यक उपनिषद् में आत्मा को चावल या यव (जौ) के दाने के सामान सूक्ष्म , हृदय में स्थित बताया है |



     कठोपनिषद १/२० कहता है --- 
“अणो अणीयान, महतो महीयानात्मास्य जन्तोर्निहितो गुहायाम “ ------यह लघुतम से भी लघुतम व महान से भी महान आत्मा प्राणियों के गुहा ( ह्रदय ) में स्थित रहता है |

     कठोपनिषद १/१२ में कथन है – 

“ते ददर्श गूढ्मनुप्रविष्ठं, 
गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणे |”
---.--अर्थात पुराणों के गूढ़ ज्ञान रूपी गहन गुहा में प्रविष्ट करके उसे ( आत्मा को ) देखा/ जाना जा सकता है|

     यहाँ ब्रह्म व आत्मा का एकत्व प्रतिपादित करते हुए कठोपनिषद का कथन है----

कठ. २/१३ में कहा है-- तस्मात्म स्थं ये अनुपश्यन्ति धीरा ...
-----धीर लोग उसे ( ब्रह्म को )आत्म में स्थित देखते हैं |

कठोपनिषद २/१७ में कथन है---

अंगुष्ठ मात्र पुरुषोsन्तरात्मा:, 
सदा जनानां हृदये संनिविष्ठ:....
------यह अंगुष्ठ आकार का पुरुष या आत्मा सदा मनुष्य के ह्रदय में स्थित रहता है |

गुरुवार, 2 मई 2013

ईशोपनिषद एवं उसके आधुनिक सन्दर्भ ......अंक ४ ( अंतिम भाग ) ....डा श्याम गुप्त ...

                              

                                       ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

                                            ईशोपनिषद एवं उसके आधुनिक सन्दर्भ-क्रमशः   - भाग चार ....

               पिछले अंक भाग तीन में उपनिषदकार .....ने विद्या-अविद्या, ज्ञान व कर्म, भौतिकसंसार एवं आत्मिक जगत के समन्वय से उत्तम, उचित सत्कर्म करने  व अकर्मों से दूर रहने पर प्रकाश डाला था कि वह क्यों व कैसे इस ब्रह्म विद्या को  प्राप्त करे ताकि उचित व सही दिशा में किये गए अपने कर्मों से समाज व मानवता को प्रगति की ओर दिशा प्रदान करे |
             प्रस्तुत अंतिम भाग में मन्त्र १५ से 18 तक , बताया गया है कि उचित कर्मों व कर्तव्य पालन व कार्यों में सत्यता व  वास्तविकता होनी चाहिए अन्यथा उस कर्म की उपयोगिता नहीं रहेगी | और इस जगत में सत्य को छिपाने के लाखों साधन व बहाने हैं  | मनुष्य को उनसे सावधान रहना चाहिए |

हिरण्यमयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखं |
तत्वं पूषन्न पावृणु सत्यधर्माय दृष्टये  ||...१५ ..
                                 सत्य का मुख सुवर्णमय पात्र से ढंका हुआ है , हे पूषन! उस सत्य धर्म के दिखाई देने के हेतु तू उस आवरण को हटा दे | अर्थात चमक धमक वाली वस्तुएं , धन, सुख-सुविधाएं आदि प्रलोभन मनुष्य को सत्य से अवगत होने नहीं देते एवं उसे  सत्य के कर्तव्य पथ से विमुख कर देते हैं और विविधि अकर्मों व दुष्कर्मों में धकेल देते हैं | अतः हे ईश्वर ! इस प्रलोभन का आवरण सत्यता के ऊपर से हट जाय ताकि हम सत्य पर चल सकें |
                           सत्य क्या है व सत्य की इतनी महत्ता क्यों दी जारही है | क्योंकि सत्य का ही दूसरा  नाम धर्म है  मूल कर्त्तव्य है ...... स: ति य: ..... अर्थात जिसमें  स: अर्थात अनश्वर जीव्  एवं ति अर्थात तिरोहितकारी विनाशशील संसार ...य:...दोनों का समन्वय है जिसमें ..वह सत्य |.......ब्रह्म का नाम 'सत्यम' कहा  गया है ...स+ति+यम ...अर्थात  स: = जीव ...ति = तिरोहित ..विनाशयोग्य संसार ...यम = अनुशासन ....अर्थात जो  जीव व ब्रह्माण्ड दोनों को अनुशासन में रखने वाला है....धर्म है., कर्त्तव्य है ..ईश्वर है...ब्रह्म है वही  सत्य है | ऐसी महत्वपूर्ण वस्तु आवरण रहित ही रहनी चाहिए अतः मानव सत्य के ऊपर से प्रलोभनों का आवरण हटाकर कर्तव्यपथ पर चले | तभी सारे कार्य उद्देश्यपूर्ण व सफल होते हैं |

पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन समूह
तेजो यत्ते  रूपंकल्याणतम तत्ते पश्यामि,
योs सावसौ  पुरुष:  सो sहमस्मि ||....१६ ...
                               हे सब के पालक, अद्वितीय ,अनुशासक -न्यायकारी , प्रकाश स्वरुप ( ज्ञान दायक ) प्रजापति ( ईश्वर ) ...दुखप्रद ताप  किरणों  ( रश्मीन) को दूर करें एवं सुखप्रद तेज समूह( तेज ) को प्राप्त करा | आपका जो कल्याणकारी , मंगलमय रूप है मैं उसे  देख रहा हूँ अतः जो वह पुरुष (ईश्वर ) है वही मैं हूँ |

                   वास्तव में जब मनुष्य ईश्वर के उन गुणों------ पूषन ......सबका पोषक बिना भेद-भाव के कर्तव्य कारक, ---एकर्षि.....अपने विशेष गुणों के कारण अद्वितीय  सब में समानरूप से प्रसिद्ध व सब को उपलब्ध , --- यम.... अटल न्यायकारी ,---सूर्य .. अन्तःकरण से अज्ञान का अन्धकार हटाकर  हृदय में  ज्ञान का प्रकाश  देनेवाला,---- प्रजापति ....अपने प्रजा, परिवार, देश, समाज ,राष्ट्र व मानवता का रक्षक आदि .....को आत्मसात कर लेता है तो उसका सरल-सहज ,भक्त-प्रेमी हृदय अपने प्रभु का दर्शन कर लेता है एवं स्वयं ईश्वर रूपमय होजाता है| इसप्रकार  सत्य से आवरण हटने पर जब सत्य सम्मुख होता है तो ज्ञात होता है कि जो ब्रह्म सर्वत्र व्याप्त है वही मैं हूँ |
                            "  मैं वही हूँ ,
                               तू वही है | ".....

वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्त शरीरम् |
ओम क्रतो स्मर क्लिवे स्मर कृतं स्मर  ||...१७.....
                           वायु: अर्थात शरीर में आने जाने वाला जीव ( अनिलं.=.जीव. शक्ति, प्राण, तेज, आत्मा  )  अमर है  परन्तु यह शरीर स्वयं केवल भस्म पर्यंत है अर्थात मर्त्य है , नाशवान है अतः अंत समय में हे जीव ओम का अर्थात उस ईश्वर का स्मरण कर , मन की निर्बलता , मृत्यु का भय आदि दूर करने के लिए ईश्वर का स्मरण कर एवं अपने किये हुए कर्मो का स्मरण कर |
                             उपनिषदकार का कथन है कि मनुष्य को अपना जीवन इस प्रकार व्यतीत करना चाहिए कि जब अमर आत्मा व नश्वर शरीर के वियोग  अर्थात अपने अंतिम  समय में, वह ओम का उच्चारण अर्थात ईश्वर का ध्यान कर सके | अंतिम समय में मन में कोई  तृष्णा-- व एषणा ---लोकेषणा, पुत्रेषणा, वित्तेषणा  आदि   न रहे अन्यथा उसे ईश्वर के ध्यान की बजाय पुत्रादि, धन, अधूरे कर्म आदि का ध्यान रहेगा एवं अंतिम समय कष्ट प्रदायक होगा |

 अग्ने नय सुपथा राये आस्मान विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् |
  युयोध्य स्मज्जुहुराणमेन भूयिष्ठान्तेनाम उक्तिं विधेम ||..१८...
                      हे अग्ने ..प्रकाशमय सर्वशक्तिमान, तेजस्वी ईश्वर आप हमारे सम्पूर्ण कर्मों को जानने वाले हैं अतः हमें एश्वर्य अर्थात उचित ज्ञान व कर्म की प्राप्ति के अच्छे मार्ग ...सुकर्मों, सत्कर्मों पर चलाइये | हमें उलटे, टेड़े- मेडे, विकृत मार्ग पर चलने  रूपी  पाप से बचाइये | हम आपको बारम्बार प्रणाम करते हैं |

                   वेदों के मन्त्रों -ऋचाओं का भाव  मूलतः दो रूपों  में प्राप्त होता है ...१. उपदेश रूप में --जहाँ मानव को अनेक शिक्षाएं दी गयी हैं ताकि वह अपने आचरण व कर्म से जीवन को उच्चकोटि का बनाए; परन्तु वह अपने कर्म में स्वतंत्र है वह उपदेश उस रूप में ग्रहण करे न करे...२. नियम रूप में -- जो प्राकृतिक नियम रूप हैं एवं अनुल्लंघनीय हैं |   अंत में ईश्वर की दया का सहारा ही उचित है| पुण्य के पथ पर चलने में ईश्वर का सहारा ही आवश्यक है | मन्त्र १७ में ..'ओम क्रतोस्मर' .  उपदेश रूप में हैं  परन्तु ...'कृतं स्मर '....नियम रूप में है जीवन के अंतिम समय उसे अपने कृत्यों का स्मरण आयेगा ही एवं उन्हीं के अनुसार उसे अंत समय में दुःख या सुख का अनुभव होगा |.... उपनिषदकार ने इस अंतिम नमस्कार मन्त्र में पाप का मूल रूप उलटे मार्ग पर चलना ही कहा है | यही  संब अकर्मों, विकर्मों व दुष्कर्मों की जड़ है |
                             आज हम सभी उलटे मार्ग पर अग्रसर हैं | स्वयं के भौतिक लाभ, अति-सुखाभिलाषा , अनावश्यक  मनोरंजन , धनागम के अनावश्यक व अन्याय से प्राप्त श्रोत, अनावश्यक  धन-संचय , धन-आधारित व्यवथाएं ..स्कूल, कालेज, अस्पताल , संस्थाएं, खेल, मनोरंजन ....गली गली में गुरुओं , साधू-संतों के मठ रूपी आलीशान  महल , चेलों की फौज , वोट की राजनीति .....आदि सभी उलटे मार्ग अंतत दुष्कर्मों को प्रश्रय देते हैं जिनके कारण आज समाज में भ्रष्टाचार, लूट-खसोट , अनाचार, अत्याचार , बलात्कार आदि फैले हुए हैं |
                                    " अब तो हर ओर घना छाया धुंआ लगता है
                                      आदमी आजकल खुद  से भी खफा लगता है ||"

             निश्चय ही वेदों के अतिरिक्त विश्व के किसी भी धर्म, संस्कृति, समाज, इतिहास, दर्शन, साहित्य ,ज्ञान में इतनी अधुना वैज्ञानिक  तार्किकता के साथ मानवीय कर्म व स्वयं में निष्ठा..... श्रृद्धा, भक्ति, दर्शन, आस्था, ईश्वर पर धार्मिक विश्वास के समन्वय के साथ मानव आचरण व कर्तव्यों के प्रति शिक्षाएं व ज्ञान का भण्डार देखने को नहीं मिलता |
                             अत: वैदिक शिक्षा ....ईशोपनिषद के मन्त्र.. आज भी व्यक्ति समाज, राष्ट्र व मानवता को कर्म की वास्तविक राह दिखने में सक्षम  हैं , सजग हैं , तत्पर हैं समीचीन व सन्दर्भित हैं ...आवश्यकता है इन पर चलने की |
                                "  जब से उड़ने लगे हम श्याम प्रगति के पथ पर ,
                                   अपनी संस्कृति से ही मानव नट  गया यारो | "

                                   'खोलकर देखिये फलसफे की किताबों को,
                                    अब भी हर वर्क पे उलफत ही लिखा लगता है |'


                                 ' चल दिये जब से  हम गैर की  राहों पर श्याम,
                                   दर्द भी अपनों का हमको तो खता लगता है |'

                                                          - इति -


              -----  सन्दर्भ ...महात्मा नारायण स्वामी का उपनिषद रहस्य ......


सोमवार, 19 मार्च 2012

आयुर्वेद एक सारभूत वर्णन--- भाग- दो ...

                                    

                          ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
               

        ( अन्य भारतीय ज्ञान व विद्याओं की भाँति भारतीय चिकित्सा विज्ञान भी अत्यंत विकसित था । गुलामी के काल में अन्य ज्ञान व विध्याओं की भाँति सुनियोजित षडयंत्र व क्रमिक प्रकार से इसका भी प्रसार व विकास भी रोका गया ताकि एलोपेथिक आदि पाश्चात्य चिकित्सा को प्रश्रय दिया जा सके । अतः भारत के इतिहास के अन्धकार काल में आयुर्वेद का कोई उत्थान नहीं हुआ अपितु निरंतर गिरावट होती रही । हर्ष का विषय है की आज भारत के  नए भोर के साथ आयुर्वेद भी नए नए आयाम छू रहा है।  आयुर्वेद के नाम से जाना जाने वाला यह आदि चिकित्सा विज्ञान है, जिसके सारभूत सिद्धांतों से विश्व के सभी चिकित्सा-विज्ञान प्रादुर्भूत हुए हैं । आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के लगभग सभी अंग-उपांग आयुर्वेद में पहले ही निहित हैं। यद्यपि आजकल आयुर्वेद "प्राचीन भारतीय चिकित्सा पद्धति' के संकुचित अर्थ में प्रयुक्त होता ।  इस क्रमिक पोस्ट द्वारा हम आयुर्वेद के इस विशद ज्ञान को संक्षिप्त में वर्णन करेंगे । ) 
                           
                                                  भाग -दो          

आयुर्वेद का अर्थ, मूल दर्शन-सिद्धान्त एवं प्राणी-मानव व उसके प्रत्येक संघटक का संक्षिप्त परिचय ----
        आयुर्वेद का अर्थ प्राचीन आचार्यों की व्याख्या और इसमें आए हुए 'आयु' और 'वेद' इन दो शब्दों के अर्थों के अनुसार बहुत व्यापक है। आयुर्वेद के आचार्यों ने 'शरीर, इंद्रिय, मन तथा आत्मा के संयोग' को आयु कहा है।  अत आयुर्वेद के सिद्धान्तों को जानने के लिये इन सभी को जानना आवश्यक है । इन चारों के संपत्ति (सद्गुण ) या विपत्ति (दुर्गुण ) के अनुसार आयु के अनेक भेद होते हैं, किंतु संक्षेप में  इसे चार प्रकार का माना गया है :
    आयु….
() सुखायु : किसी प्रकार के शीरीरिक या मानसिक विकास से रहित होते हुए, ज्ञान, विज्ञान, बल, पौरुष, धन-धान्य, यश, परिजन आदि साधनों से समृद्ध व्यक्ति को "सुखायु' कहते हैं।
() दुखायु : इसके विपरीत समस्त साधनों से युक्त होते हुए भी, शरीरिक या मानसिक रोग से पीड़ित अथवा निरोग होते हुए भी साधनहीन या स्वास्थ्य और साधन दोनों से हीन व्यक्ति को "दु:खायु' कहते हैं।
() हितायु : स्वास्थ्य और साधनों से संपन्न होते हुए या उनमें कुछ कमी होने पर भी जो व्यक्ति विवेक, सदाचार, सुशीलता, उदारता, सत्य, अहिंसा, शांति, परोपकार आदि आदि गुणों से युक्त होते हैं और समाज तथा लोक के कल्याण में निरत रहते हैं उन्हें हितायु कहते हैं।
() अहितायु : इसके विपरीत जो व्यक्ति अविवेक, दुराचार, क्रूरता, स्वार्थ, दंभ, अत्याचार आदि दुर्गुणों से युक्त और समाज तथा लोक के लिए अभिशाप होते हैं उन्हें अहितायु कहते हैं।
   \
      वेद …..शब्द का मूल अर्थ है ..ज्ञान…. सत्ता, लाभ, गति, विचार, प्राप्ति, ज्ञान  और ज्ञान के साधन आदि भी इसके अर्थ होते हैं,….।

  शरीर…
   १-रचना---(एनाटोमी)  समस्त  प्रक्रियाओं व चेष्टाओं, इंद्रियों, मन ओर आत्मा के आधारभूत पन्च भौतिक पिंड को शरीर कहते हैं मानव शरीर के स्थूल रूप में छह अंग हैं; दो हाथ, दो पैर, शिर और ग्रीवा, तथा अंतराधि (मध्यशरीर) इन अंगों के अवयवों को -प्रत्यंग कहते हैं,यथा---मूर्धा (हेड), ललाट, भ्रू, नासिका, अक्षिकूट (ऑर्बिट),) कर्ण (कान),गंड (गाल), जिह्वा (जीभ), स्तन आदि ।     
       इनके अतिरिक्त आन्तरिक अन्गों --हृदय, फुफ्फुस (लंग्स), यकृत (लिवर), प्लीहा (स्प्लीन), आमाशय (स्टमक), पित्ताशय (गाल ब्लैडर), वृक्क (गुर्दा, किडनी), वस्ति (यूरिनरी ब्लैडर), क्षुद्रांत (स्मॉल इंटेस्टिन), स्थूलांत्र (लार्ज इंटेस्टिन), गुदा (रेक्टम) आदि को ..कोष्ठांग कहते हैं
       सिर में सभी इंद्रियों और प्राणों के केंद्रों का स्थान मस्तिष्क (ब्रेन)है।
           आयुर्वेद ( एवं गर्भोपनिषद ) के अनुसार सारे शरीर में ३००८ अस्थियां हैंतथा संधियाँ (ज्वाइंट्स) २००, स्नायु (लिंगामेंट्स) ९००, शिराएं (ब्लड वेसेल्स, लिफ़ैटिक्स ऐंड नर्ब्ज़) ७००, धमनियां (क्रेनियल नर्ब्ज़) २४ और उनकी शाखाएं २००, पेशियां (मसल्स) ५०० (स्त्रियों में २० अधिक) तथा सूक्ष्म स्त्रोत ३०,९५६  व साडे चार करोड रोम और १०७ मर्म स्थान  हैं।
    २-धातुयें व क्रिया-शास्त्र-( फ़िज़िओलोजी) --- आयुर्वेद के अनुसार शरीर में रस (बाइल ऐंड प्लाज्मा), रक्त, मांस, मेद (फ़ैट), अस्थि, मज्जा (बोन मैरो) और शुक्र (सीमेन), ये  सात धातुएं  हैं। -----
-----आहाररूप में लिया हुआ पदार्थ पाचकाग्नि,( आमाशय व आन्त्रों में पाचन क्रिया digestion )- भूताग्नि ( शरीर के आन्तरिक तन्त्र में रासायनिक प्रक्रियायें---एसीमिलेशन ) और विभिन्न धात्व अग्नियो ( धातुओं के स्वयं के आन्तरिक रासायनिक प्रक्रिया –internal mileu ) द्वारा परिपक्व  होकर अनेक परिवर्तनों (chemical changes) के बाद पूर्वोक्त धातुओं के रूप में परिणत होकर इन धातुओं का पोषण करता है। ……..इस पाचनक्रिया में आहार का जो सार भाग होता है उससे रस धातु का पोषण होता है और जो व्यर्थ-भाग बचता है उससे मल (विष्ठा) और मूत्र बनता है। ……यह रस हृदय से होता हुआ शिराओं( circulation system) द्वारा सारे शरीर में पहुँचकर प्रत्येक धातु और अंग को पोषण प्रदान करता है। ………धात्वग्नियों से पाचन होने पर… रस आदि धातु के सार भाग से रक्त आदि धातुओं एवं शरीर का भी पोषण होता है तथा धातुओं के स्वयं के व्यर्थ भाग  से मलों (शरीर द्वारा त्याज्य भाग) की उत्पत्ति होती है…. जैसे रस से कफ; रक्त पित्त; मांस से नाक, कान और नेत्र आदि के द्वारा बाहर आनेवाले मल;  मेद से स्वेद (पसीना); अस्थि से केश तथा लोम (सिर के और दाढ़ी, मूंछ आदि के बाल) और मज्जा से आंख का कीचड़ मलरूप में बनते हैं शुक्र में कोई मल नहीं होता, उसके सारे भाग से ओज (बल) की उत्पत्ति होती है।
       इन्हीं रस आदि  धातुओं से अनेक उपधातुओं की भी उत्पत्ति होती है, यथा रस से दूध, रक्त से कंडराएं (टेंडंस) और शिराएँ, मांस से वसा (फ़ैट), त्वचा ,मेद से स्नायु (लिंगामेंट्स), अस्थि से दांत, मज्जा से केश और शुक्र से ओज नामक उपधातु की उत्पत्ति होती है।
        ये धातुएं और उपधातुएं विभिन्न अवयवों में विभिन्न रूपों में स्थित होकर शरीर की विभिन्न क्रियाओं में उपयोगी होती हैं। जब तक ये उचित परिमाण और स्वरूप में रहती हैं और इनकी क्रिया स्वाभाविक रहती है तब तक शरीर स्वस्थ रहता है और जब ये न्यून या अधिक मात्रा में तथा विकृत स्वरूप में होती हैं तो शरीर में रोग की उत्पत्ति होती है।
         शरीर की उत्पत्ति---उचित परिस्थिति में शुद्ध रज और शुद्ध वीर्य का संयोग होने और उसमें आत्मा का संचार होने से माता के गर्भाशय में शरीर का आरंभ होता है। इसे ही गर्भ कहते हैं। माता के आहारजनित रक्त से अपरा (प्लैसेंटा) और गर्भनाड़ी के द्वारा, जो नाभि से लगी रहती है, गर्भ पोषण प्राप्त करता है। यह गर्भोदक( प्लेसेन्तल सैक) में निमग्न रहकर उपस्नेहन द्वारा भी पोषण प्राप्त करता है तथा प्रथम मास में कलल (जेली) और द्वितीय में घन होता है? तीसरे मास में अंग प्रत्यंग का विकास आरंभ होता है। चौथे मास में उसमें अधिक स्थिरता जाती है तथा गर्भ के लक्षण माता में स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ने लगते हैं। इस प्रकार यह माता की कुक्षि में उत्तरोत्तर विकसित होता हुआ जब संपूर्ण अंग, प्रत्यंग और अवयवों से युक्त हो जाता है, तब प्राय: नवें मास में कुक्षि से बाहर आकर नवीन प्राणी के रूप में जन्म ग्रहण करता है।
----गर्भोपनिषद के अनुसार………रितुकाले सम्प्रयोगादक रात्रौषितं कललं भवति , सप्त रात्रौषितं बुद्बुद भवति, अर्ध मासान्तरे पिण्डो भवति..। सप्त मासान्तरे जीवेन संयुक्तो भवति…अष्ठं मासे सर्व लक्षणो सम्पूर्ण भवति ।
   इंद्रिय--- मानव शरीर कुछ अवयवों से सिर्फ़ कार्य-विशेष ही सम्पन्न  होता है उनमें उस कार्य के लिए शक्तिसंपन्न एक विशिष्ट सूक्ष्म रचना  होती है।  शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध इन बाह्य विषयों का ज्ञान प्राप्त करने के लिए क्रमानुसार कान, त्वचा, नेत्र, जिह्वा और नासिका ये अवयव इंद्रियाश्रय अवयव (विशेष इंद्रियों के अंग) कहलाते हैं और इनमें स्थित विशिष्ट शक्तिसंपन्न सूक्ष्म वस्तु को इंद्रिय कहते हैं। ये क्रमश: पाँच हैं-श्रोत्र, त्वक्‌, चक्षु, रसना और घ्राण इन पांचों इंद्रियों को ज्ञानेंद्रिय कहते हैं। इनके अतिरिक्त विशिष्ट कार्यसंपादन के लिए पांच कमेंद्रियां भी होती हैं, जैसे- पैर, हाथ, जिह्वा, गुदा और शिश्न (स्त्रियों में भग)  इन इंद्रियों की अपने कार्यों में मन की प्रेरणा से ही प्रवृत्ति होती है। मन से संपर्क होने पर ये निष्क्रिय रहती है।
    मन------ जिसे ११वीं इन्द्रिय भी कहाजाता है। मन अत्यंत सूक्ष्म होता है, अत्यंत द्रुतगति वाला और प्रत्येक इंद्रिय का नियंत्रक होता है। किंतु यह स्वयं भी आत्मा के संपर्क के बिना अचेतन होने से निष्क्रिय रहता है।
------प्रत्येक व्यक्ति के मन में सत्व, रज और तम, ये तीनों प्राकृतिक गुण होते हुए भी इनमें से किसी एक की सामान्यत: प्रबलता रहती है और उसी के अनुसार व्यक्ति  -सात्विक, राजस या तामस  होता है, किंतु समय-समय पर आहार, आचार एवं परिस्थितियों के प्रभाव से अन्य गुणों का भी प्राबल्य हो जाता है। इसका ज्ञान प्रवृत्तियों के लक्षणों द्वारा होता है, यथा राग-द्वेष-शून्य यथार्थद्रष्टा मन सात्विक, रागयुक्त, सचेष्ट और चंचल मन राजस और आलस्य, दीर्घसूत्रता एवं निष्क्रियता आदि युक्त मन तामस होता है। इसीलिए सात्विक मन को शुद्ध, सत्व या प्राकृतिक माना जाता है और रज तथा तम उसके दोष कहे गए हैं।
------आत्मा से चेतनता प्राप्त कर प्राकृतिक या सदोष मन अपने गुणों के अनुसार इंद्रियों को अपने-अपने विषयों में प्रवृत्त करता है और उसी के अनुरूप शारीरिक कार्य होते हैं। आत्मा -मन के द्वारा ही इंद्रियों और शरीर के अन्गों को प्रवृत्त करता है, क्योंकि मन ही उसका करण (इंस्ट्रुमेंट) है।  केनोपनिषद  में प्रश्न है…”केनेषितं पतति प्रेषितं मन:-“---मन किस के द्वारा प्रेरित होकर कार्य करता है…..उत्तर है –“श्रोतस्य श्रोत मनसो मनो..”  जो मन का भी मन है ..अर्थात आत्मा ।
आत्मा
       आत्मा पंचमहाभूत और मन से भिन्न, चेतनावान्‌, निर्विकार और नित्य है तथा साक्षी स्वरूप है, क्योंकि स्वयं निर्विकार तथा निष्क्रिय है। इसके संपर्क से सक्रिय किंतु अचेतन मन, इंद्रियों और शरीर में चेतना का संचार होता है और वे सचेष्ट होते हैं आत्मा में रूप, रंग, आकृति आदि कोई चिह्न नहीं है, किंतु उसके बिना शरीर  अचेतन होने के कारण निश्चेष्ट पड़ा रहता है और मृत कहलता है तथा उसके संपर्क से ही  उसमें चेतना आती है तब उसे जीवित कहा जाता है और उसमें अनेक स्वाभाविक क्रियाएं  होने लगती हैं; जीवन के लक्षण, जैसे श्वासोच्छ्वास, कटे हुए घाव भरना आदि… मन की गति, एक इंद्रिय से हुए ज्ञान का दूसरी इंद्रिय पर प्रभाव होना (जैसे आँख से किसी सुंदर, मधुर फल को देखकर मुँह में पानी आना),  विषयों का ग्रहण -इच्छा, द्वेष, सुख, दु:, प्रयत्न, धैर्य, बुद्धि, स्मरण शक्ति, अहंकार आदि शरीर में आत्मा के होने पर ही होते हैं; आत्मारहित मृत शरीर में नहीं होते। अत: ये आत्मा के लक्षण कहे जाते हैं, आत्मा का इन लक्षणों से अनुमान मात्र किया जा सकता है मानसिक कल्पना के अतिरिक्त किसी दूसरी इंद्रिय से आत्मा का प्रत्यक्षीकरण संभव नहीं  है।
       यह आत्मा नित्य, निर्विकार और व्यापक होते हुए भी पूर्वकृत( या पूर्वजन्मकृत)  शुभ या अशुभ कर्म के परिणामस्वरूप जैसी योनि में या शरीर में, जिस प्रकार के मन और इंद्रियों तथा विषयों के संपर्क में आती है वैसे ही कार्य होते हैं। उत्तरोत्तर अशुभ कार्यों के करने से उत्तरोत्तर अधोगति होती है तथा शुभ कर्मों के द्वारा उत्तरोत्तर उन्नति होने से, मन के राग-द्वेष-हीन होने पर, मोक्ष की प्राप्ति होती है।
     पन्चमहाभूत और आयुर्वेद का दर्शन------ भारतीय  दार्शनिक सिंद्धांत के अनुसार संसार के सभी  भौतिक –अभौतिक पदार्थपृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश  इन पांच महाभूतों  के संयुक्त होने से बनते हैं इनके अनुपात में भेद होने से ही उनके भिन्न-भिन्न रूप होते हैं। इसी प्रकार शरीर के समस्त धातु, उपधातु और मल  भी यही भौतिक पदार्थ हैं। शरीर के समस्त अवयव और सारा शरीर पंच-भौतिक ही  है। ये सभी अचेतन हैं।  जब इनमें आत्मा का संयोग होता है तब उसकी चेतनता में इनमें भी चेतना आती है।

    आयुर्वेद और नैतिष्ठकी चिकित्साएक विशिष्टता--
---- आत्मा निर्विकार है, किंतु मन, इंद्रिय और शरीर में विकृति हो सकती है और इन तीनों के परस्पर सापेक्ष्य होने के कारण एक का विकार दूसरे को प्रभावित करता है। इन्हें प्रकृतिस्थ रखना या विकृत होने पर प्रकृति में लाना या स्वस्थ करना परमावश्यक है। तभी दीर्घ सुख और हितायु की प्राप्ति होती है, जिससे क्रमश: आत्मा को भी जन्म मृत्यु और भवबंधनरूप रोग से मुक्ति पाने में सहायता मिलती है, जो आयुर्वेद में नैतिष्ठकी चिकित्सा कही गई है। । विचारों, रहन–सहन, सन्स्क्रिति, समाज के नीति नियमन द्वारा स्वास्थ्य व चिकित्सा आयुर्वेद का एक विशिष्ट चिकित्सा भाव है। गर्भिणी माँ को अच्छे विचार, कथायें , सुन्दर चित्र दिखाना , प्रसन्न रखने में यही भाव है ।
 
             ------क्रमश: भाग तीन ...अगले अन्क में...