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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त
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बुधवार, 22 जनवरी 2014

Two follies...दो गलत वक्तव्य ..... डा श्याम गुप्त....

                                             ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

                                वास्तविक ज्ञान की कमी, जीवन-दर्शन, अध्यात्म, मानवीय तत्व व व्यवहार  एवं  जीवन व्यवहार के ज्ञान व अनुभव की कमी   (व्यवसायिक एवं किसी भी विशिष्ट ज्ञान को जानकारी कहा जाता है ज्ञान नहीं ..अध्यात्म में इसको अज्ञान कहा जाता है )  इस प्रकार की  भ्रामक सोच ..विचार एवं  वक्तव्यों (follies)  की जननी व परिचायक होती है और लोग बड़े शान से दे देते हैं ..बिना विचारे......दो उदाहरण देखिये ...

1.--- never feel that you are different from men ....निश्चय ही अनुचित, भ्रामक एवं  गलत सोच है....यदि यह सत्य होता तो ईश्वर..प्रकृति...या विकास-प्रक्रिया...जिसे भी आप मानते हों....क्या इतनी मूर्ख होती जो दोनों को पृथक-पृथक बनाती ...प्रजनन के तो अन्य तमाम तरीके हो सकते हैं...होते भी हैं | प्रजनन  से अन्यथा अन्य भी पृथक-पृथक कार्य हैं स्त्री -पुरुष के  ...मिलकर साथ-साथ एवं स्वतंत्र रूप में भी ...| अतः अंतर (different) तो है ही क्या हम इससे आँख मूँद सकते हैं ...नहीं ... being in charge ....does not mean superior or being not different from men ...


हाँ यह कहना सही होगा कि.......स्वयं को पुरुष से कम न समझें ....एक ही रथ के दो पहिये समझें एक दूसरे को.....  देखिये रचनाकार ने कितना सटीक कहा है----

"नारि पुरुष में अंतर तो है 
सदा रहा है सदा रहेगा |
भेद बना  है भेद  रहेगा ,
भेद भाव व्यवहार नहीं हो |""     ---- शूर्पणखा काव्य-उपन्यास से...


 2.The main thing is to be a good citizen wherever you operate ....  it should have been .....

-----.The main thing is to be a good... citizen..human wherever you operate....जब तक आप अच्छे मानव नहीं  हैं ...आप कुछ भी अच्छे नहीं बन सकते .....अच्छे  नागरिक तो सिर्फ  क़ानून के पालन के लिए भी बन सकते हैं .....जो अधिकाँश लोग करते हैं .....|


रविवार, 9 जून 2013

कहानी मानव की ...डा श्याम गुप्त ...

                                   ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



                                      कहानी मानव की
            जब मानव एकाकी था, सिर्फ़ एक अकेला मानव शायद मनु या आदम ( मनुष्य, आदमी, मैन) हाथ में एक हथौडानुमा हथियार लिए घूमता रहता था, एक अकेला । एक दिन अचानक घूमते-घूमते उसने एक अपने जैसे ही अन्य आकृति के जानवर ( व्यक्ति) को जाते हुए देखा। उसने छिप कर उसका पीछा किया। चलते-चलते वह आकृति एक गुफा के अन्दर चली गयी। उस मानव ने चुपके से गुफा के अन्दर प्रवेश किया तो देखा की एक उसके जैसा ही मानव बैठा फल आदि खा रहा है। उसकी आहट जानकर अचानक वह आकृति उठी और अपने हाथ के हथौडेनुमा हथियार को उठालिया। अपने जैसे ही आकृति को वह आश्चर्य से देख कर बोली-तुम कौन ? अचानक क्यों घुसे यहाँ, अगर में हथौडा चलादेता तो ! पहला मानव चारों और देख कर बोला, अच्छा तुम यहाँ रहते हो। मैं तुमसे अधिक बलशाली हूँ। मैं भी तुम्हें मार सकता था। यह स्थान भी अधिक सुरक्षित नहीं है। तुम्हारे पास फल भी कम हें, इसीलिये तुम कम जोर हो, अच्छा अब हम मित्र हैं मैं तुम्हें अपनी गुफा दिखाता हूँ।
 
      दूसरा मानव उसकी गुफा देख कर प्रभावित हुआ। उसने उसे प्रशंसापूर्ण निगाहों से देखा| पहले मानंव ने कहा तुम यहाँ ही क्यों नही  आजाते, मिलकर फल एकत्रित करेंगे और भोजन करेगे | उसने उसे ध्यान से देखा, उसका हथौडा भी बहुत बड़ा है, उसकी गुफा भी अधिक बड़ी है, उसके पास फल आदि भी अधिक मात्रा में एकत्रित हैं| उसने उसकी बाहों की पेशियाँ छू कर देखी वो अधिक मांसल व कठोर थीं| उसका शरीर भी उससे अधिक बड़ा था। दूसरे मानव ने कुछ सोचा और वह अपने फल आदि उठाकर पहले मानव की गुफा में आगया।
 
              और यह वही प्रथम दिन था जव नारी ( शायद -शतरूपा या कामायिनी की श्रद्धा ) ने स्वेक्षा से पुरूष के साथ सहजीवन स्वीकार किया। यह प्रथम परिवार था। यह सहजीवन था। कोई किसी के आधीन नहीं। नर-नारी स्वयं में स्वच्छंद थे जीने, रहने, किसी के भी साथ रहने आदि के लिए। अन्य जीवों,पशु-पक्षियों की तरह । यद्यपि सिंहों, हंसों आदि उच्च जातियों की भांति प्रायः जीवन पर्यंत एक साथी के साथ ही रहने की मूल प्रवृत्ति तब भी थी अब की तरह (निम्न जातियाँ कुत्ते,बिल्ली आदि की भांति कभी भी किसी के भी साथ नहीं) और यह युगों तक चलता रहा।
 
              जब संतानोत्पत्ति हुई, यह देखा गया की दोनों साथियों के भोजन इकट्ठा करने जाने पर अन्य जानवरों आदि की भांति उनके बच्चे भी असुरक्षित रह जाते हें। तो किसी एक को घर रहने की आवश्यकता हुई। फल इकट्ठा करने वाली जीवन पद्धति की सभ्यता में शारीरिक बल अधिक महत्वपूर्ण होने से अपेक्षाकृत अधिक बलशाली पुरूष ने बाहर का कार्य सम्भाला। क्योंकि नारी स्वभावतः अधिक तीक्ष्ण बुद्धि, सामयिक बुद्धि व त्वरित निर्णय क्षमता में कुशल थी अतः वह घर का, परिवार का प्रबंधन करने लगी। यह नारी-सत्तात्मक समाज की स्थापना थी। पुरूष का कार्य सिर्फ़ भोजन एकत्रित करना, सुरक्षा व श्रम का कार्य था। यह भी सहजीवन की ही परिपाटी थी। स्त्री-पुरूष कोई किसी के बंधन में नहीं था, सब अपना जीवन जीने के लिए स्वतंत्र थे। युगों तक यह प्रबंधन चलता रहा, आज भी कहीं कहीं दिखता है।
 
                 जब मानव कृषि आदि कार्यों से उन्नत हुआ । घुमक्कड़घुमंतू समाज स्थिर हुआ, भौतिक उन्नति, मकान, घर, कपडे, मुद्रा आदि का प्रचलन हुआ तो तो पुरूष व्यवसायिक कर्मों में अधिक समर्थ होने लगा, स्त्री का दायरा घर रहा, पुरूष के अधिकार बढ़ने लगे, राजनीति, धर्म, शास्त्र आदि पर पुरुषों ने आवश्यक खोजें कीं| अबंधित शारीरिक व यौन संबंधों के रोगों द्वंदों आदि रूप में विकार सम्मुख आने लगे तो नैतिक आचरण, शुचिता, मर्यादाओं का बिकास हुआ। नारी-मर्यादा व बंधन प्रारंभ हुए। और समाज पुरूष-सत्तात्मक होगया। परन्तु सहजीवन अभी भी था। नारी मंत्री,सलाहकार,सहकार,विदुषी के रूप में घर में रहते हुए भी स्वतंत्र व्यक्तित्व थी। यस्तु नार्यस्तु पूज्यन्ते ..का भाव रहा। महाकाव्य-काल तक यह व्यवस्था चलती रही।
 
                पश्च-पौराणिक काल में अत्यधिक भौतिक उन्नति, मानवों के नैतिकता से गिरने के कारण, धन की महत्ता के कारण सामाजिक-चारित्रिक पतन हुआ| पुरूष-अहं द्वारा महिलाओं से उनका अधिकार छीना गया ( मुख्यतया, घर, ज़मीन, जायदाद ही कारण थे ) और पुरूष नारी का मालिक बन बैठा। आगे की व्यवस्था सब देख ही रहे हैं। इस सब के साथ साथ प्रत्येक युग में-अनाचारी होते ही रहते हैं। हर युग में अच्छाई-बुराई का युद्ध चलता रहता है। तभी राम व कृष्ण जन्म लेते हैं। और ---यदा यदा धर्मस्य --का क्रम होता है। नैतिक लोग नारी का सदैव आदर  करते हैं, बुरे नहीं --अतः बात वही है कि समाज व सिस्टम नहीं व्यक्ति ही खराव होकर समाज को ख़राब व बदनाम करते हैं |

मंगलवार, 5 जून 2012

..देव मानव दानव ....पर्यावरण दिवस पर....

                             ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

    ..देव मानव दानव ....

मूर्ति देव है जन जीवन का,
और द्विजों का देव अग्नि है |
मनीषियों का देव ह्रदय है,
समदर्शी हित सभी देव हैं ||
 
 देव वही जो सबको देते,
देव वही जो सब कुछ देते ।
जो सबको बस दे्ता  जाये
वह जग में देवता कहाये ॥
 
सूरज जो गर्मी देता है,
और उजाला देता रहता |
चन्दा भी शीतलता देता,
बादल वर्षा करता रहता ||

सागर से मिलते हैं मोती,
नदिया जल देती रहती है |
धरती जाने क्या क्या देती,
सब कुछ वह देती रहती है ||

बृक्ष भला कब फल खाते हैं,
पुष्प कहाँ निज खुशबू लेते |
कांटे  भी तो  देते  ही  हैं ,
दुःख के साथ सीख देदेते ||

शास्त्र तभी तो यह कहता है,
देव-तत्व सबमें रहता है |
जग में जो कुछ भी बसता है,
कुछ न कुछ देता रहता है ||

सारी दुनिया देती रहती ,
मानव लेता ही रहता है |
यदि लेकर के हो कृतज्ञ, फिर-
प्रभु इच्छाएं भर देता है ||

जो कृतज्ञ होकर लेता है,
सिर्फ जरूरत भर लेता है |
निज सुख खातिर कष्ट नहीं, 
जो , देने वाले को देता है ||

'जग हरियाली युक्त बनाएं-
और प्रदूषण मुक्त बनाएं |'-
जो यह सब भी चिंता करते,
उऋण रहें देवों के ऋण से ||

जो प्रसन्न देवों को रखते,
उनको ही कहते हैं  मानव |
अति-सुख अभिलाषा के कारण,
उन्हें सताएं , वे हैं दानव ||

लालच और लोभ के कारण ,
प्रकृति का दोहन जो करते |
वे जो अति भोगी मानव हैं,
कष्ट  सभी  देवों  को  देते  ||

करें प्रदूषण युक्त धरा को,
अज्ञानी लोभी जो मानव |
मानव पद से वे गिर जाते,
वे सब कहलाते हैं दानव  ||


                                                                                     ----चित्र गूगल व सुषमा गुप्ता साभार