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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

शुक्रवार, 21 मई 2010

वाल कविता ---क्या है?..

---- ९ वर्ष की एक बच्ची ने कविता लिखी ---"भोला किसान, बनिया शेतान " और वह कविता बाल कविता मान कर कोर्स की पुस्तकों में लगा भी दी गयी, यद्यपि अब सरकार ने उसे हटाने का निर्णय लेलिया है परन्तु प्रश्न उठाता है कि यह सब क्यों हुआ?---अज्ञान, भ्रमित ज्ञान , भ्रष्टाचार .
---हम पहले ही कह चुके हैं , कहरहे हैं कि "बाल कविता" का अर्थ --बालकों द्वारा लिखी कविता नहीं होता (वह "बालकों की कविता" है उसे प्रोत्साहन देना चाहिए लिखने के लिए उचित सीख द्वारा पर वह 'बाल-कविता'नहीं ) अपितु बड़ों द्वारा बालकों के लिए लिखी कविता होता है जिसमें बच्चों को खेल खेल में, या अन्य कथाओं , वर्णनों आदि से कोइ सीख दी जाय ।
---आज कल कुछ ब्लॉग लेखक , स्वयंभू बाल कविताकार , निरर्थक कवितायें व बच्चों द्वारा लिखी कविताओं को बाल कविता रूप में छाप कर बड़ा आनंद मना रहे हैं उन्हें सीख लेनी चाहिए इस घटना से ।

हम गुलामी नहीं भूलेंगे ----अंगरेजी पढ़िए -आगे बढिए ..वाह!!! क्या बात है हिन्दुस्तान ...

एक नयी मुहीम छेड़ी गयी है---अंग्रेज़ी को बढाने की हिन्दी को मिटाने की----तर्क यह है कि , रोज़गार पाना , अंग्रेज़ी का ग्लोब में एक खिड़की समझना , अंग्रेज़ी ज्ञान की बदौलत पूरी दुनिया में अपनी क्षमताओं का झंडा बुलंद करना--- ---अंग्रेज़ी चश्मे वाले लोग यदि हिन्दी अखवारों के , पत्रिकाओं के, संस्थानों के अन्दर प्रवेश कर लेंगे ( जोड़-तोड़ से) तो यही तो होगा , यही वे लोग हैं जो मैकाले के अनुसार -शक्ल से हिन्दुस्तानी व विचार, अक्ल, तर्क व ज्ञान से अँगरेज़ होंगे--एसे लोगों के कारण ही आज तक हिन्दी ( जो आज़ादी से पहले ही सम्पूर्ण राष्ट्र की भाषा बन चुकी थी कहीं कोइ विरोध नहीं था , बाद में आगे नहीं बढ़ पाई और आज तक अंग्रेज़ी से पिछड़ती रही है ) राष्ट्र -भाषा नहीं बन पाई है। यह एक सुनियोजित षडयंत्र है हिन्दी के विरुद्ध ----
.---हिन्दी में प्रयोग होने वाले शब्दों का अखबार में खुले आम प्रदर्शन-जनता में भ्रम उत्पन्न करने का प्रयत्न है हिन्दी के विरोध में -( लोह पथ गामिनी =रेल ; दूरभाष यंत्र =फोन ;कंठ लंगोट =टाई ; अभी कालित्रा =कम्प्युटर ) क्या दिखाता है कि हिन्दी कठिन भाषा है ---कौन आज हिन्दी में इन शब्दों को प्रयोग करता है -- क्या हमने सीधे सीधे इन शब्दों को लेकर हिन्दी का मान व उसकी शब्दावली नहीं बढ़ाई है |
रोज़गार ---जिन्हें उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद विदेश जाना हो , विदेशियों की सेवा करने हो वे अंग्रेज़ी का ज्ञान प्राप्त करें --कितने लोग एसे हैं और क्यों हों, क्यों सब अंग्रेज़ी पढ़ें , क्यों घर में भी बातचीत अंग्रेज़ी में करें ? --भारत की सोफ्ट वेयर कम्पनियां क्या अमेरिका की टाइपिंग , मनेजिंग गुलामी ही नहीं कर रहीं | गुलामी की खीर अच्छी या अपनी रोटी |
।- ग्लोबल खिड़की ---समझना अंग्रेज़ी को--आज हिन्दी में दुनिया भ्रर का साहित्य , विज्ञान , ज्ञान मौजूद है ;हमारी अपनी भाषा संस्कृत उच्चतम खिड़की मौजूद है क्यों न हम उस खिड़की को अपना बनाकर देखें ; फिर हम क्यों दुसरे की खिड़की से झांकें अपनी खिड़की क्यों न बनाएं , पकी पकाई खीर क्यों खाए । दूसरे की खिड़की से झांकने के साथ दूसरे की सभ्यता, संस्कृति, बुराइयां आती हैं जिसका कुफल आज भारत भारतीय समाज भोग हा है | क्यों नहीं हम --बुद्ध के, भारतीय मनीषा के घोष नाद को अपनाते --" अप्प दीपो भव "
.-अपनी क्षमता का डंका या अच्छी तरह गुलामी करने की क्षमता ---आज सारा देश, बहुराष्ट्रीय कंपनियों की नौकरी कर रहा है , सारा देश , आई टी क्षेत्र , अमेरिका अन्य देशों की क्लर्की कर रहा है , प्रोजेक्ट उनके पूरा हम करें , काम उनका -कम्प्युटर पर टाइप हम करें , कौन सी क्षमता की बात की जारही है --जी तोड़ कर , रात रात जाग कर गुलामी करके पैसा कमाने की क्षमता , जो वे इसलिए हमें देते हैं कि उनके यहाँ मजदूरी बहुत अधिक है, वे अपने लोगों को अन्य उच्च क्षमता वाले कार्य में लगा सकें एवं हम सदा मज़दूरी ही करतें रहें |आज कौन सा सोफ्टवेयर इंजीनियर हैएक कम्प्युटर क्लर्क का काम नहीं कर रहा और इतरा रहा है कि हम इंजीनियर हैं ,अमेरिका रिटर्न हैं |
---वस्तुतः यह एक नवीन षडयंत्र है अंग्रेज़ी का हिन्दी के विरुद्ध --हमें सावधान होजाना चाहिए | इस पोस्ट का अगला भाग ---कविता" - हिन्दी यह रेल जाने चलते चलते क्यों रुक जाती " लखनऊ ब्लोगर्स अस्सोसिएशन । के ब्लॉग पर देखें |

बुधवार, 19 मई 2010

डा श्याम गुप्त की कविता ---भरम....

भरम

जहां पर शब्द रुक जाए , अशब्द स्वर भाष होता है।
मूक जब वाच्य होजाए,जन्म अभिनय का होता है।
नहीं होती जहां भाषा, मुखर तब मौन होजाता,
जहां आलेख चुक जाए, वहां संकेत होता है ॥

प्रेम में भाव धारण हो, भक्ति आकार लेती है।
भक्ति से, प्रेम तप से , साधना साकार होती है
नहीं होती कोइ भाषा, ईश के कार्य कारण की ,
भक्त तन्मय हो तन-मन से,कामना पूर्ण होती है


गर्व जब प्रेम-भक्ति का, ज्ञान- अध्यात्म का होता।
वहां सब कुछ सभी हो पर, वहां ईश्वर नहीं होता।
एक तिनका बनाने की , तुझे हिम्मत नहीं रे नर !
बता किस बात का तुझको, तू सब कुछ है भरम होता ॥

मंगलवार, 18 मई 2010

जेीन, उम्र व सन्स्कार ....


आज विग्यान ने जीन की खोज की है कि -जिसका जैसा जीन उसकी उतनी उम्र- वाह क्या खोज है? दुनिया जाने कब से जानती है कि जिन खानदानों में पुरखे जैसी (लम्बी या कम ) उम्र के होते हैं वैसे ही उनके पीढी के बच्चे |
----बचपन में हमारे ननिहाल मे कलुआ धोबी चचा कहा करता था कि ( हम शहर के बच्चों को अक्सर वहुत सी बातों का गुरु ज्ञान देता रहता था ) बबुआ, जैसा बाप वैसा पूत , ये तो बाप-दादों के गुन बच्चों में आते ही हैं संस्कार, मन व काया में समाये रहते हैं और बोलते हैं |
---युगों पहले अथर्व वेद का ऋषि कह गया है--" त्रिते देवा अमृजतै तदैवस्त्रित एत्न्मनुश्येषु ममृजे |" मनसा, वाचा, कर्मणा से किये गए कार्यों को देव ( इन्द्रियाँ ) त्रित ( मन ,बुद्धि, अहंकार ) में रखतीं हैं | ये त्रित इन्हें मनुष्य की काया में आरोपित करते हैं । तथा----"द्वादशधा निहितं त्रितस्य पापभ्रष्टं मनुष्येन सहि |" अर्थात त्रित -मन, बुद्धि, अहंकार -का कृतित्व बारह स्थानों में --- दश इन्द्रियाँ , (मन के) चिंतन व स्वभाव---संस्कार ( जेनेटिक करेक्टर ) में आरोपित होता है; वही मनुष्य की काया में आरोपितहोता है व प्रभावी होता है |

शुक्रवार, 14 मई 2010

डा श्याम गुप्त की कविता ---मैं आत्म हूँ.....

मैं आत्म हूँ ,
सर्व भूतेषु आत्मा ;
जड़ जंगम जीव में अवस्थित
उनका स्वयं , उनका अंतर ।

प्रत्येक भूत का लघुतम अंश या कण
विज्ञानियों का एटम या परमाणु ,
मैं ही हूँ ;
मैं एटम का भी आत्म हूँ ,
उसकी क्रियाशीलता, क्षमता, आत्मा
मैं आत्म हूँ ।

सब मुझमें है, मैं सब में हूँ ,
परिभू, स्वयं भू ;
सृष्टि से पहले भी ,सृष्टि के अंतर में,सृष्टि के बाद भी,
मैं आत्म हूँ।

अक्रिय,अकर्मा, अव्यक्त, अविनाशी ,असद चेतन सत्ता,
कारणों का कारण , कारण ब्रह्म, परब्रह्म ;
दृष्टियों की दृष्टि,दृष्टा, परात्पर,
'वेदानामपि गायन्ति'
मैं आत्म हूँ।

सृष्टि हितार्थ भाव संकल्प मैं ही हूँ,
आदि नाद से व्यक्त सगुण ब्रह्म -
ईश्वर, परमात्मा , हिरण्यगर्भ मैं ही हूँ ;
मैं आत्म हूँ।

'एकोहम बहुस्याम ' जनित -ओउम ,
व्यक्ति आदि शक्ति,अपरा , माया -
प्रकृति व जगत की प्रसविनी शक्ति -
मैं ही हूँ , और-
परा रूप में -
प्रत्येक जड़, जीव, जंगम में प्रविष्ट ,
उनका स्वयं , उनका अहं म चेतन तत्व , आत्म तत्व मैं ही हूँ ;
मैं आत्म हूँ ।

जीवधारी, प्राणधारी रूप में-
जीवात्मा, प्राण, आत्मा ,
कर्मों का कर्ता ,
सुख-दुःख लिप्त फलों का भोक्ता
संसार चक्र उपभोक्ता मैं ही हूँ ,
मैं आत्म हूँ।

सत्कर्म संचित -
ज्ञान, बुद्धि, मन ,संस्कार प्राप्त -
मानव, मैन ,आदम, मनुष्य मैं ही हूँ;
मुक्ति,मोक्ष,कैवल्य आकांक्षी ,
मुक्ति प्राप्त, आत्मलीन,हिरण्यगर्भ लीन
परमात्व तत्व मैं ही हूँ ।
लय में -'अनेक से एक' इच्छा कर्ता-
प्रकृति , संसार, माया को स्वयं में लीन कर,
पुनः -अक्रिय, असत,अव्यक्त,सनातन,
परब्रह्म मैं ही हूँ।

ईश्वर, जीव , माया,ब्रह्म ,
सार,असार, संसार
शिव विष्णु ब्रह्मा
सरस्वती लक्ष्मी काली
शिव और शक्ति
पुरुष और प्रकृति
जड़ जीव जंगम --मैं ही हूँ
मैं आत्म हूँ,
मैं आत्म हूँ ॥

सोमवार, 10 मई 2010

वाह..भई वाह... माँ..

--क्या मां ने इन्हें एसे कपडे पहनने को कहा था ------->
तो फिर क्या याद करना क्या भूलना।







----माँ के बहाने पूरी दुनिया को जीतने का अहं -प्रचार , मौत से हारने जैसी सुनुश्चित बात का क्या कहना क्या प्रचार, बस कुछ कहना है चाहे कोइ अर्थ निकले या न निकले ?------->

शनिवार, 8 मई 2010

सामाजिक सरोकार-नारी शक्ति --डा सरोज चूडामणि --कुलपति चिकित्सा महा विद्यालय .....

--आज जहां अधिकाँश चिकित्सक , चिकित्सा अफसर , चिकित्सा -अध्यापक - इस प्रकार के गैर चिकित्सकीय , स्वयं के लिए नॉन-प्रोडक्टिव कार्यों से बच कर अपनी प्राइवेट -प्रेक्टिस में अधिक रूचि रखने में रूचि रखते हैं ; वहीं चिकित्सा महाविद्यालय की वर्त्तमान कुलपति की प्रशंसा करनी होगी कि वे लगातार आकस्मिक निरीक्षण करके कुछ उचित दिशा दे रही है। टाइल्स उखाड़ने वाले जैसे कार्य की जांच का कार्य उनकी सामाजिक प्रतिबद्धता व अन्य चिकित्सकों के लिए दिशा देने जैसा कार्य है, वे बधाई की पात्र हैं।
अंतर्राष्ट्रीय क्षितिज पर ख्याति प्राप्त जनरल सर्जन व बाल रोग सर्जन कुलपति डा सरोज चूडामणि - भारत की प्रथम महिला जनरल सर्जन व प्रथम महिला बाल-रोग सर्जन है। वे कुलपति के गुरु-गंभीर दायित्व के साथ साथ अपना चिकित्सक व अधिकारी का दायित्व कुशलता से निभाना जानती हैं , जो उनके समय समय पर किये गए कार्यों से परिलक्षित होता रहता है। मैंने उन्हें अपने चिकित्सा -विद्यालय - एस.एन. मेडीकल कालेज आगरा के सीनियर के रूप में ,कालेज दिनों से ही देखा है कि वे सदैव ही धुन की पक्की , कठोर परिश्रमी प्रतिभाशाली क्षात्र, सहृदय व्यक्तित्व , कुशल व सक्षम चिकित्सक एवं अनुशासक अधिकारी रही है। ऐसी नारी शक्ति को सलाम।