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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

मंगलवार, 24 जनवरी 2012

हिन्दू्-धर्म का मूल…..ब्रह्म और ईश्वर…की अवधारणा.........डा श्याम गुप्त

                               ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

        हिन्दू धर्म का वस्तुतः इतिहास करोड़ों वर्ष का है।  भारत ( पाकिस्तानी क्षेत्र सहित बृहद हिन्दुस्थान ) की सिन्धु घाटी सभ्यता में आधुनिक हिन्दू धर्म के विभिन्न चिह्न मिलते हैं।  इनमें  मातृदेवी की मूर्तियाँ, शिव-पशुपति जैसे देवता की मुद्राएँ, लिंग, पीपल की पूजा, इत्यादि प्रमुख हैं।  भारत की प्राचीनता के बारे में  इतिहासकार व समाज शास्त्री एक मत नहीं हैं ।
        आधुनिक पाश्चात्य इतिहासकारों के  एक दृष्टिकोण के अनुसार इस सभ्यता( सिन्धु घाटी सभ्यता) के अन्त के दौरान मध्य एशिया से एक अन्य जाति का आगमन हुआ, जो स्वयं को आर्य कहते थे, और संस्कृत नाम की एक हिन्द यूरोपीय भाषा बोलते थे। यद्यपि वे स्पष्टतः कहाँ से आये, किस क्षेत्र, देश के निवासी थे यह किसी को स्पष्ट नहीं है । कुछ विद्वान् आर्यों का मूलस्थान उत्तरी ध्रुव-प्रदेश भी मानते हैं । जो वेदों में वर्णित विभिन्न घटनाओं, तथ्यों से प्रतीत होता है ।
         एक अन्य दृष्टिकोण के अनुसार ( जो मूलतः भारतीय विद्वानों, इतिहासकारों, समाज शास्त्रियों व वैदिक-पौराणिक ज्ञानियों के मत हैं ) सिन्धु घाटी सभ्यता के लोग स्वयं ही आर्य थे और उनका (एवं शायद आदि-मानव का भी) मूलस्थान भारत ही था।  पुरायुग में पृथ्वी के महा-भूखन्ड गोन्डवाना लेन्ड पर जीवन के लिये सबसे उपयुक्त, सुरक्षित स्थान भारतीय उपभूमि  (इसीलिये आज भी मध्य-भारत के केन्द्रीय-भाग को गोंडवाना प्रदेश कहा जाता है) पर मानव का सर्वप्रथम अवतरण हुआ। जब से मानव ने दो पैरों पर चलना सीखा, सामाजिकता को पहचाना, मानव-संकुल बना, प्रारम्भिक ज्ञान -विज्ञानं को जाना तभी से सिन्धु घाटी सभ्यता की नींव रखी गयी और वेदों की रचना के पश्चात इसे वैदिक-सभ्यता कहा गया । ज्ञान, दर्शन, अध्यात्म के व्यवहारिक-तत्व- धर्म के अवतरण पर इसे सनातन व हिन्दू धर्म कहा गया व देश को हिन्दुस्थान
       समय समय पर भारत से ही पूर्वोत्तर की ओर चलते हुए आदि-मानव ने एशिया में फ़ैलते हुए बेरिन्ग-स्ट्रेट ( रूस व कनाडा के मध्य संकरी भूमि भाग ) होते हुए अमेरिका में प्रवेश किया । एक अन्य शाखा पश्चिमोत्तर की ओर चलते हुए योरोप व अफ़्रीका में फ़ैली। जहां उसने दिक, काल, परिस्थिति व आवश्यकता के अनुसार अपनी-अपनी सभ्यताओं, दर्शन व धर्मों की नींव रखी।
          
        
           आर्यों की सभ्यता को वैदिक सभ्यता कहते हैं। पहले दृष्टिकोण के अनुसार लगभग १७०० ईसा पूर्व में आर्य ( परन्तु मूल देश व क्षेत्र के बारे में स्थिति किसी को स्पष्ट नहीं है ) अफ़्ग़ानिस्तान, कश्मीर, पंजाब और हरियाणा में बस गये। तभी से वो लोग (उनके विद्वान ऋषि) अपने देवताओं को प्रसन्न करने के लिये वैदिक संस्कृत में मन्त्र रचने लगे। पहले चार वेद रचे गये, जिनमें ऋग्वेद प्रथम था। उसके बाद उपनिषद जैसे ग्रन्थ आये।  वेद, उपनिषद आदि ग्रन्थ अनादि, नित्य  हैं, ईश्वर की कृपा से अलग-अलग मन्त्रद्रष्टा ऋषियों को अलग-अलग ग्रन्थों का ज्ञान प्राप्त हुआ जिन्होंने फिर उन्हें लिपिबद्ध किया। बौद्ध  व अन्य धर्मोंके प्रादुर्भाव से   वैदिक धर्म में परिवर्तन आये ।  नये देवता और नये दर्शन उभरे। इस तरह आधुनिक हिन्दू धर्म का जन्म हुआ।
             दूसरे दृष्टिकोण के अनुसार हिन्दू धर्म का मूल  सिन्धु सरस्वती परम्परा (जिसका स्रोत मेहरगढ़ की ६५०० ईपू संस्कृति में मिलता हैसे भी बहुत पहले की भारतीय परम्परा में है। जिसे १९६०८५३११० साल पुरानी बताया जाता है ।
               वैदिक या हिन्दू धर्म ने विश्व को- ब्रह्म व ईश्वर की अवधारणा की एक विशिष्ट विचार-पद्धति प्रदान की है जो मानव इतिहास में एक अनूठी विचार पद्धति है जिसने अध्यात्म व दर्शन के ज्ञान को नयी-नयी ऊचाइयों तक पहुंचाया  एवं मानव के स्वयं के आचरण को अत्यधिक महत्ता प्रदान की जो मानव जाति की प्रगति का मूल मन्त्र है । सामान्यतया ब्रह्म व ईश्वर को हम एक ही समझते हैं परन्तु वे एक होते हुए भी भिन्न हैं ......
           उपनिषदों के अनुसार ब्रह्म ही परम तत्व है (  त्रिमूर्ति के देवता ब्रह्मा  नहीं  ) वो ही जगत का सार है, जगत की आत्मा है। वो विश्व का आधार है। उसी से विश्व की उत्पत्ति होती है और विश्व नष्ट होने पर उसी में विलीन हो जाता है। यह ब्रह्म एक, और सिर्फ़ एक ही है। वो विश्वातीत भी है और विश्व के परे भी। वही परम सत्य, सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ है। वो कालातीत, नित्य और शाश्वत है। वही परम ज्ञान है। ब्रह्म के दो रूप हैं : परब्रह्म और अपरब्रह्म  
                 परब्रह्म...  -शुद्ध अव्यक्त ब्रह्म  असीम, अनन्त और रूप-शरीर विहीन है। वो सभी गुणों से भी परे है (निर्गुण ब्रह्म, ऋत , सन्नासद ), वह शाश्वत सत्य व ऋत ( सदा सत्य, आदि-मूल  ) है  उसमें अनन्त सत्य, अनत चित् और अनन्त आनन्द है। ब्रह्म की पूजा नही की जाती है, क्योंकि वो पूजा से परे और अनिर्वचनीय है। उसका ध्यान किया जाता है। प्रणव... (ओम्) ब्रह्मवाक्य है, जिसे परम पवित्र शब्द माना जाता है    ओम की ही  ध्वनि पूरे ब्रह्मांड मे गून्ज रही है। ध्यान मे गहरे उतरने पर यह सुनाई देता है। इसे आदि-नाद, अनहद-नाद, ब्रह्म नाद, ईश्वरीय नाद  कहा जाता है।  ब्रह्म की परिकल्पना वेदान्त दर्शन का केन्द्रीय स्तम्भ है, और हिन्दू धर्म की विश्व को अनुपम देन है।
             ईश्वर( या अपरब्रह्म.. हिरण्यगर्भ, सदब्रह्म, व्यक्तब्रह्म, सगुण ब्रह्म )
ब्रह्म और ईश्वर  के सम्बन्ध पर विविध  हिन्दू दर्शनों के अलग अलग मत हैं
         अद्वैत वेदान्त ( मीमान्सा व वेदान्त दर्शन )  के अनुसार जब मानव ब्रह्म को अपने मन से जानने की कोशिश करता है, तब ब्रह्म ईश्वर हो जाता है, क्योंकि मानव माया  ( जो ब्रह्म की ही अपरा-शक्ति है वश में रहता है। अर्थात जब माया के आइने में ब्रह्म की छाया पड़ती है, तो ब्रह्म का प्रतिबिम्ब हमें ईश्वर के रूप में दिखायी पड़ता है ईश्वर अपनी इसी आदि शक्ति "माया" से विश्व की सृष्टि करता है और उसपर शासन करता है।  माया स्वयं ईश्वर पर अपना प्रभाव नहीं डाल पाती है, जैसे एक ज्ञानी अपने ही ज्ञान से अचंम्भित नहीं होता है। माया ईश्वर की दासी है, परन्तु हम जीवों की स्वामिनी है  वैसे तो ईश्वर रूपहीन है, पर माया की वजह से वो हमें कई देवताओं के रूप में  या कण कण में प्रतीत हो सकता है। अर्थात अव्यक्त रूप में वही ब्रह्म होता है व्यक्त रूप में मायापोहित( युक्त) होकर वह ईश्वर कहलाता है । यह  ईश्वर  तीन रूपों में व्यक्त होता है --१.ब्रह्म के व्यक्त रूप -सगुण ब्रह्म ( ईश्वर )  २.माया द्वारा  सूक्ष्म पदार्थों का सृजन -काल में ...हिरण्यगर्भ  व ३. माया द्वारा स्थूल पदार्थों के सृजन काल में--वैश्वानर
            वैष्णव मतों और दर्शनों में माना जाता है कि ईश्वर और ब्रह्म में कोई फ़र्क नहीं है--और विष्णु (या कृष्ण) ही ईश्वर हैं। वे ही जब अपने कृष्ण-लोक, गोलोक में स्थित रहते हैं ब्रह्म रूप हैं  एवं समय समय पर पृथ्वी पर ईश्वर रूप अवतार लेते हैं ।
        न्याय, वैषेशिक और योग दर्शनों के अनुसार ईश्वर एक परम और सर्वोच्च आत्मा है, जो चैतन्य से युक्त है और विश्व का सृष्टा और शासक है। सांख्य-दर्शन में ईश्वर व ब्रह्म की कल्पना नहीं अपितु सिर्फ़ पुरुष-प्रकृति से ही सन्सार रचित है ।
         मुंडकोपनिषद के अनुसार ...  जगत की योनि ब्रह्म ही है, ईश्वर जगत का उपादान कारण है किन्तु ब्रह्म उसका नैमित्तिक कारण । ब्रह्म की इच्छा से ही मायारोपित ईश्वर का प्रादुर्भाव होता है और वह सृष्टि-चक्र का सृजन करता है । 
         मूल-तत्व है कि... ईश्वर एक, और केवल एक है वो विश्वव्यापी और विश्वातीत दोनो है। ईश्वर सगुण है। वो स्वयंभू और विश्व का आदि-कारण (सृष्टा) है। वो पूजा और उपासना का विषय है। वो पूर्ण, अनन्त, सनातन, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापी है। वो राग-द्वेष से परे है, पर अपने भक्तों से प्रेम करता है और उनपर कृपा करता है। उसकी इच्छा के बिना इस दुनिया में एक पत्ता भी नहीं हिल सकता। वो विश्व की नैतिक व्यवस्था को कायम रखता है और जीवों को उनके कर्मों के अनुसार सुख-दुख प्रदान करता है।     श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार विश्व में नैतिक पतन होने पर वो समय-समय पर धरती पर अवतार (जैसे कृष्ण) रूप ले कर आता है। ईश्वर ही परमेश्वर, परमात्मा, विधाता, भगवान नाम से प्रचलित है  
               भारतीय विचार तत्व के अनुसार  इसी ईश्वर को मुसल्मान (अरबी में) अल्लाह, (फ़ारसी में) ख़ुदा, ईसाई (अंग्रेज़ी में) गॉड, व अन्य सभी अपनी अपनी भाषा में विभिन्न नामों से स्मरण करते हैं।यथा -- "एको सद विप्राः बहुधा वदन्ति "


शनिवार, 21 जनवरी 2012

नीति दोहा-एकादश --डा श्याम गुप्त..

                         ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

बूँद बूँद करि संचि लेउ, धन औ धरम व ज्ञान । 
बूंदन बूंदन घट भरे, संचय  मरम  महान ।

छंद लिखौ जो आपनौ, माला निज गुंथि  पाय ।
चन्दन जो निज कर घिसौ, सो अति सोभा पाय ।

राह देखि कें पगु धरें, जल लें छानि- सुधार ।
सास्त्र बचन बोलें, करें, कारजु सोचि विचारि ।

भूमि, त्रिया, कटु बोलिबौ, जाति द्वेष अपराध ।
श्याम सदा इन पांच ते , बाढहि बैर अपार ।

चित ही तौ संसार है, रखि चित सुघर सजाय ।
जाकौ  जैसो चित रहै,  तैसी ही गति पाय ।

जैसें मथि कें दूध कौं, माखन मिलै अपार ।
मन के मथिवे ते जथा,परगट सुघर विचार ।

जावै मन कौ मैल धुलि, श्याम सोइ असनान । 
इन्द्रिय सब बस में रहें , सोई सुचिता जान ।

माया बस जो जीव है, पडौ अंध के कूप ।
ज्ञानी करम न जो करै, गयौ कूप में डूब ।

दोहे  राम-रहीम के, याद किये का होय ।
सीख मानिहै यदि नहीं, बनै चतुर नहिं कोय ।

श्याम कपट कौ तेल भरि, भव-सुख दीप बराय ।
माया -गुन  बाती  जरै,  काजर  ही  तौ  पाय ।

दुरमति सुमति सुनै नहीं, विनय न मानहि नीचु । 
केरा  काटे  ही फरै, चाहे  जेतौ   सींचु ।


बुधवार, 18 जनवरी 2012

कविता (ब्रज भाषा ) कवि, कविता ,अखबार ......डा श्याम गुप्त

                               ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

पहुन्चौ एक दिना मैं ,
एक कवि सम्मलेन में |
घोषणा हती-' कछु पल माहिं-
कविजी कौ आगमन होत रहै|'                

गरीब जी हते वे , अरु -
कहलावें थे जा युग के 'निराला'-
कांख में लटकौ  झोला खाली,
गले में अटकी हाला |

बातनि बातनि बीच ही वे ,
कही लेत थे उक्तियाँ ,
भारी भरकम विनकी काया ,
कहि रहे थे पंक्तियाँ ;-
" हाय कैसी करुन गाथा ,
बाल मिट्टी छांटते |
और अवलाएं बिचारी ,
कूटती भईं गिट्टियां |
भूख ते बेहाल तन मन ,
जुवा माटी ढोय  रहे,
वृद्ध बालक उन घरन में ,
भूखी ते हैं रोय  रहे |"

दई गयीं  नेतान कौं, अरु-
सासन कौं हूँ कछु गालियाँ |
झूमि उठे लोग सब,
सुनिकैं बजाईं तालियाँ |

एक श्रोता नैं जो उठि कें, पूछौ-
कै ये तौ बताइये |
कौन, का कारण है जाकौ ,
किरपा करि समुझाइये |
और सबके सार में -
 समाधान तौ कहि जाइए |
कविता सुनिवे कौ हमें ,
कछु लाभ तौ दिलवाइये |

कविजी बोले, भैया-
हम तौ कवि हैं ,
यथारथवादी हैं ,
दरपन दिखावत हैं ,
भौगौ साँचु बतावत हैं ;
समाज में का है रहौ है ,
ये समुझावत हैं |
समाधान तौ -
सासन व जनता कौं खोजिवै  चाहियें -
हम तौ कवि हैं ,
लिखत हैं और गावत हैं |

श्रोता बोलौ--फिरि-                                      
कविता कवि और साहित्य की ,              
का  आवश्यकता है, महाराज ;
समाचार जानिवे कें लियें तौ -
अखबार ही सबते सस्तौ  है आज ||

सोमवार, 16 जनवरी 2012

भारतीय तत्व-ज्ञान का सार व महत्ता .. डा श्याम गुप्त

                          ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

            भारतीय तत्व ज्ञान जिन्हें  सनातन धर्म या वैदिक धर्म के मूल सिद्धांत कहा जाता है वस्तुतः सिर्फ एक धर्म ही नहीं अपितु एक जीवन शैली है, संसार-जगत में मानव कैसे व्यवहार करे , इसकी एक सुस्पष्ट अवधारणा है   | यह विश्व में एवं मानव इतिहास में एक अनूठी, अप्रतिम , अप्रमेय  अवधारणा है जो  ब्रह्म, जीव, माया की त्रिगुण भाव धारणा के साथ  संसार-सागर  में कैसे उतरें व पार करें का स्पष्ट ज्ञान देती है |  मानव के प्रत्येक प्रश्न, तर्क, शंका, भ्रम का समाधान व निवारण करके सदैव प्रश्नातुर मानव-मन को परम शान्ति प्रदान करके अपने स्व-कर्म में स्थित होने का सन्देश देती है |  यद्यपि इस  आदि-ज्ञान  पर प्रायः द्विधा-पूर्ण, भ्रमात्मक, दोहरी बातें कहने के आरोप लगाए जाते हैं | परन्तु यही तो विशिष्टता है इस अध्यात्मिक-धार्मिक -व्यवहारिक दर्शन की जो अनूठी है |
           उदाहरण के लिए हम एक घटना को लें |  आदि- शंकराचार्य जब एक चांडाल के अपने रास्ते में आजाने पर  'दूर हटो ' कहने लगे तो चांडाल का कथन था की आप ही तो कहते हैं की ब्रह्म एक है सभी तत्वों में वही ब्रह्म है तो फिर मुझे दूर हटाने को क्यों कह रहे हैं ....शंकराचार्य ने अपनी भूल मानी और चांडाल को ज्ञानी मानकर उसे अपना गुरु माना|  कहा तो यह जाता है कि वह चांडाल स्वयं महादेव थे |
             शंकराचार्य अपने स्तर पर सही थे, ब्रह्म एक ही है तो फिर यह सब क्या, परन्तु वे कृष्ण नहीं थे ..स्वयम ब्रह्म-रूप नहीं थे  |   यदि कृष्ण होते तो वे क्या कहते ?  वे कहते कि..महात्मन सत्य ही ब्रह्म एक है आप में भी वही ब्रह्म है परन्तु इस बेश-भूषा, इस कर्म-भाव में वह ब्रह्म जो जीव रूप में आपमें है वह माया से ढका हुआ है |  वह ब्रह्म इस समय  ज्ञान व भक्ति से परे सिर्फ कर्म  का धर्म धारण किये हुए है अतः  निश्चय ही  वह शुद्ध ब्रह्म नहीं है और मुझे ( प्रत्येक व्यक्ति को ) आपसे सचेत रहना चाहिए | जब वह माया लिपटा हुआ जीव रूपी  ब्रह्म, ज्ञान भक्ति सहित कर्म से शुद्ध ब्रह्म रूप में आयेगा तभी वह ब्रह्म - ब्रह्म समझा जाएगा | इस रूप में तो आप अपने निकृष्ट कर्म के कारण अस्पर्श्य हैं |
             जब आदि-शंकर कहते हैं कि ..'ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या ..'  यदि जगत मिथ्या है तो क्या कर्म न किया जाय | क्या शंकर असत्य कहते हैं ? नहीं....  जगत वास्तव में ही मिथ्या है ब्रह्म ही सत्य है ..जगत तो- ब्रह्म के ( संसार-चक्र हेतु ), जीव रूप में  माया से लिप्त हो  जाने के कारण  रूप सृष्टि का भाव बनता है .अतः ...इसे मिथ्या मान कर ही समस्त कर्म करना चाहिए..परन्तु ज्ञान व भक्ति के साथ .... | उपनिषद् कहती है..'कुर्वन्नेह कर्मणि जिजीविषेच्छतं समा ..' अर्थात कर्म तो अवश्य ही  करना है ....फिर कौन असत्य है ?  यही तो विशिष्टता है---द्वैत  में एकत्व  व ..स्पष्टता..|   गीता कहती है कि ...ज्ञान व भक्ति के योग के साथ यदि कर्म किया जाय वही योग है ,...' मा फलेषु कदाचन ' तभी  उपनिषदकार के अनुसार ...,.न कर्म लिप्यते नर ..' | इसे सम्पूर्ण करती हुई ईशोपनिषद कहती है....कि     जो अविद्या ( अर्थात ..भौतिकता, सांसारिक, व्यवसायिक ज्ञान ) में ही लिप्त रहता है वह अनेकों अन्धकार में अर्थात कष्टों में घिर जाता है--जो आज के भौतिकता में लिप्त मानव के कष्टों  की दशा स्पष्ट करता है ;  परन्तु जो सिर्फ विद्या ( ब्रह्म ज्ञान, ज्ञान  )में ही लिप्त रहता है वह तो और भी अधिक रौरव अन्धकार अर्थात महानतम कष्टों में घिर जाता है,जो आज के कर्महीन लोग सिर्फ वाचालता, धार्मिक पाखण्ड , अंधविश्वास में रत मानव, एवं सिर्फ ज्ञानान्डम्बर व ज्ञान अहं में रत विज्ञ जन की दशा कहता है ; अतः मनुष्य को .....
"विद्या  सह अविद्या यस्तत वेदोभय सह |
अविध्यायां मृत्युं तीर्त्वा , विद्यया अमृतमनुश्ते  ||"  
            मनुष्य को ज्ञान व भौतिकता, ईश्वर व संसार, अध्यात्म, भक्ति व सांसारिकता के ज्ञान को साथ-साथ लेकर चलना चाहिए, व्यवहार करना चाहिए  |  सांसारिक,व्यवसायिक  भौतिक ज्ञान से मृत्यु अर्थात इस सांसारिकता को जीत कर( सफल जीवन यापन करके )- ज्ञान,  अध्यात्म,  व भक्ति से --अमृत, अमृतत्व , अमरता अर्थात   मुक्ति-ज्ञान( परम शान्ति, आत्मिक सुख-शान्ति  प्राप्त करना चाहिए |  यही व्यवहारिक मानव कर्तव्य व ज्ञान है |  यही धर्म है, यही अध्यात्म है, यही मोक्ष है |
              

शनिवार, 14 जनवरी 2012

हिन्दी-ब्लोगिन्ग… एक विहंगम द्रष्टि….डा श्याम गुप्त

                               ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ..

                 ब्लोगिन्ग या चिट्ठाकशी..चिट्ठाकारी …चिट्ठालेखन अर्थात इन्टर्नेट पर लेखन -- एतिहासिक पृष्ठभूमि के द्रष्टिकोण से १९९७ के आस-पास प्रारम्भ हुआ । भारत में हिन्दी-ब्लोगिन्ग का २००८ से त्वरित गति से आरम्भ हुआ, साथ ही साथ स्थानीय भाषाओं में भी इसका प्रसार होने लगा। भारत जैसे विशाल देश एवं हिन्दी व स्थानीय भाषाओं में ब्लोग्गिन्ग प्रारम्भ होने के कारण यह विधा तेजी से फ़ैली। और आज हिन्दी ब्लोगिन्ग विश्व के पटल पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर चुकी है ।

        ब्लोगिन्ग का मूल उद्देश्य लेखक द्वारा अपने मूल व स्वतन्त्र विचारों को बिना सम्पादन व सन्शोधन के समाज व विश्व के सम्मुख प्रस्तुत करना था । यह ठीक उसी प्रकार था जैसे साहित्य में सामयिक ठेकेदारी, गुटबाज़ी, विशिष्ट वर्ग व समूह-संस्कृति को ठुकराकर ..निराला, महादेवी, प्रसाद जैसे महान स्वतन्त्र लेखक-विचारक-विद्वान साहित्यकारों ने साहित्यिक ठेकेदारों को ठेंगा दिखाकर अपनी कृतियों में बिना किसी से भी भूमिका आदि लिखाये, भूमिका के स्थान पर स्वयं ही बडे-बडे विचारपूर्ण तथ्यात्मक आत्मकथन लिखने की परम्परा डाली। ये साहित्य-जगत व हिन्दी-जगत के प्रथम ब्लोग थे जो प्रिन्ट-मीडिया में लिखे गये।
       परन्तु ब्लोगिन्ग में भी विभिन्न भटकाव आरहे हैं, विज्ञापन, ज्योतिषी लोग व अन्य सन्स्थाएं, विभिन्न साइट्स, पोर्न-विज्ञापन व साइट्स आदि धन्धेबाज़ों के कारनामे इस विधा को भी बद्नाम करने में कोई कसर नहीं छोड रहे।  जिससे साहित्य का स्तर भी निम्न होरहा है । कुछ लोगों ने यह भी कहना प्रारम्भ कर दिया है कि यह निठल्ले व अन्य स्थानों पर असफ़ल लोगों काम है । फ़िर भी हिन्दी- ब्लोगिन्ग एक विश्वव्यापी सक्षम, सशक्त व महत्वपूर्ण साहित्यिक व सामाजिक विधा बन कर आगे आई है ।
       महत्वपूर्ण विषयों व बिन्दुओं पर स्वतन्त्र चिन्तनपरक साहि्त्य, काव्य व आलेखों को बढावा, हिन्दी भाषा व साहित्य का उत्थान, देश-विदेश व सुदूर प्रदेशों में भी हिन्दी लेखन का प्रसार, संस्कृति, देशभक्ति, देश-प्रेम, राष्ट्रीयता का उत्थान व प्रसार, ज्ञान के भन्डार की अभिवृद्धि, विश्वभर से सम्बन्धों में अभिवृद्धि एवं ज्ञान का आदान-प्रदान आदि ब्लोगिन्ग के गुणात्मक पहलू हैं ।
        पहेलियां, प्रश्नोत्तरी जैसे निम्नस्तरीय साहित्य का पदार्पण,निशुल्क प्रकाशन सुविधा के होते अचानक बहुत से कवि व साहित्यकार, लेखक उत्पन्न होगये हैं |  उच्च स्तरीय साहित्य एवं गुणवत्ता वाले विषयों की कमी, ब्लोगरों द्वारा भाई बहन बाप गुरु आदि आपसी रिश्ते व वर्ग-समूह बनाना, गूगल व अन्य साइट्स आदि पर उपस्थित अधकचरे ज्ञान के आधार पर लिखे गये घिसे-पिटे आलेख, एवं पोस्टों की पुस्तकें छपबाने का धन्धा, मौलिक उच्चकोटि के आलेखों का अभाव…जो कि ब्लोगिन्ग का मूल उद्देश्य था..आदि ब्लोगिन्ग के मूल ऋणात्मक पहलू हैं। जो संस्कृत की  एक  प्रसिद्द कहावत को सिद्ध करते हैं ---
      "उष्ट्राणाम लग्नवेलायाम,गर्दभा स्तुति पाठका |
      परस्पर प्रशंसन्ति,  अहो रूपमहो ध्वनि ||"
            यदयपि इसका मूल कारण यह है कि मध्यवय के, प्रौढ-वृद्ध -अनुभवी व विद्वान लोग अभी पुरानी पीढी के हैं एवं कम्प्यूटर की लगभग सभी आपरेशन-भाषा, कोड, आदि अन्ग्रेज़ी के हैं तथा उस पीढी के लोगों को कम्प्यूटर के सन्चालन का ज्ञान भी अधिकान्श नहीं है..वे नेटीज़न नहीं बन पाये हैं..। अतः मूलत: जो युवा व प्रौढ पीढी के हैं व दोनों भाषाओं के ज्ञाता हैं तथा कम्प्यूटर- नेट आदि से अच्छी तरह वाकिफ़ हैं वे ही ब्लोगिन्ग में हैं और वे स्वयं कम अनुभवी हैं और ज्ञान की कमी भी है।

         निशुल्क ब्लोगिन्ग एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का अनुचित लाभ उठाना भी ब्लोगिन्ग का एक नकारात्मक पहलू है। इसका लाभ उठाकर विभिन्न कम्यूनल साइट्स, व्यवसायिक साइट्स, असांस्कृतिक सन्स्थायें व व्यक्ति  अपने गुणगान व प्रसार-प्रचार  में रत हैं, क्योंकि भारत की जनसन्ख्या देखते हुए यदि ०.१ प्रतिशत लोग भी ब्लोगिन्ग करते या पढते हैं तो भारत अन्य विषय-वस्तुओं की भान्ति इसका भी बहुत बडा बाज़ार है।
         फ़िर भी हिन्दी-ब्लोगिन्ग ने एक महत्वपूर्ण बात तो सिद्ध की ही है कि आज भी मानव अपने मूल सन्स्कारी भाव …धर्म, अध्यात्म में रुचि से डिगा नहीं है जो दशावतार, हनुमान लीला, राम-सीता प्रकरण आदि पोस्टों पर सर्वाधिक—३००-५०० तक टिप्पणियां से प्रदर्शित होता है। जो समाज के लिए एक अच्छा व प्रेरक चिन्ह है | 
         यह भी देखा गया है  महिलाओं की प्रशन्सा में रुचि से भी कवि मानव-मन डिगा नहीं है जो किसी महिला कवयित्री या लेखिका के चार सामान्य पन्क्तियां भी लिख देने पर, युवा, प्रौढ़  व बूढ़े सभी ब्लोगरों का टिप्पणी हेतु लाइन लगा देना और ४०-८० तक टिप्पणियों  के  तुरत-फुरत आजाने से प्रदर्शित होता है।
         परन्तु यह सब तो हर विधा के साथ होता है। अभी तो हिन्दी ब्लोगिन्ग शीघ्रता से बढता हुआ एक होनहार बालक है, टोडलर है । जब वर्तमान पीढी अधिक अनुभवी, युवा व प्रौढ होगी तो यह विधा भी अधिक युवा व प्रौढ होगी। बालक युवा होकर सुपुत्र होगा या नहीं यह तो भविष्य के गर्भ में है; परन्तु आशा करनी चाहिये कि वह होनहार व सुपात्र होकर प्रगति-पथ पर बढे।
           ".. स जातो येन जातेन याति वंश समुन्नितम ||"