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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

शुक्रवार, 8 जून 2012

आधुनिक- लिंग पुराण...व....कन्या-भ्रूण ह्त्या... डा श्याम गुप्त...

                            ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


     


        विश्व की सबसे श्रेष्ठ व उन्नत भारतीय शास्त्र-परम्परा  ---पुराण साहित्य में मूलतः अवतारवाद की प्रतिष्ठा हैं निर्गुण निराकार की सत्ता को मानते हुए सगुण साकार की उपासना का प्रतिपादन  इन ग्रंथों का मूल विषय हैउनसे एक ही निष्कर्ष निकलता है कि आखिर मनुष्य और इस सृष्टि का आधार-सौंदर्य तथा इसकी मानवीय अर्थवत्ता में कही- -कहीं सद्गुणों की प्रतिष्ठा होना ही चाहिए उसका मूल उद्देश्य सद्भावना का विकास और सत्य की प्रतिष्ठा ही है।
पौराणिक लिंग पुराण---भारत में लिंग पूजा की परंपरा आदिकाल से ही है। पर लिंग-पूजा की परंपरा सिर्फ भारत में ही नहीं है, बल्कि दुनिया के ज्यादातर हिस्सों में आरंभ से ही इसका चलनयूनान में इस देवता को 'फल्लुस' ( जिससे अन्ग्रेज़ी में फ़ैलस = शिश्न बना )तथा रोम में 'प्रियेपस' कहा जाता था'फल्लुस' शब्द (टाड का राजस्थान, खंड प्रथम, पृष्ठ 603) संस्कृत के 'फलेश' शब्द का ही अपभ्रंश है, जिसका प्रयोग शीघ्र फल देने वाले 'शिव' के लिए किया जाता है। मिस्र में 'ओसिरिस' , चीन में 'हुवेड् हिफुह' था। सीरिया तथा बेबीलोन में भी शिवलिंगों के होने का उल्लेख मिलता  है। उत्तरी अमेरिका में १९८० में एक मॉडर्न चर्च ,सेंट प्रियापस चर्च -फेलस वर्शिप का केन्द्र थी |
ओसिरिस -मिस्र

शिवलिंग -चंबल घाटी -भारत
ग्रीक कथा में प्रियापस
मुखाकृति शिव-लिंग कम्बोडिया



लिंग -मूर्ति...रोम
जर्मनी में प्राप्त लिंग
वियतनाम में प्राप्त लिंग-योनि







लिंग मेला -कावासाकी जापान










      'लिंग' का सामान्य अर्थ 'चिन्ह' होता है। इस अर्थ में लिंग पूजन, शिव के चिन्ह या प्रतीक के रूप में होता है। सवाल उठता है कि लिंग पूजन केवल शिव का ही क्यों होता है, अन्य देवताओं का क्यों नहीं? कारण यह है कि शिव को आदि शक्ति के रूप में स्वीकार किया गया है, जिसकी कोई आकृति नहीं। इस रूप में शिव निराकार है। लिंग का अर्थ ओंकार () बताया गया है.... "प्रणव तस्य लिंग ” उस ब्रह्म का चिन्ह प्रणव , ओंकार है ...अतः  'लिंग' का अर्थ शिव की जननेन्द्रिय से नहीं अपितु उनके 'पहचान चिह्न' से है, जो अज्ञात तत्त्व का परिचय देता है। यह पुराण प्रधान प्रकृति को ही लिंग रूप मानता है |  
         प्रधानं प्रकृतिश्चैति यदाहुर्लिंगयुत्तमम्।
          गन्धवर्णरसैर्हीनं शब्द स्पर्शादिवर्जितम् ॥ (लिंग पुराण 1/2/2)
       अर्थात् प्रधान प्रकृति उत्तम लिंग कही गई है जो गन्ध, वर्ण, रस, शब्द और स्पर्श से तटस्थ या वर्जित है।


अर्धनारीश्वर

        शिवलिंग की आकृति ----भारतीय धर्मग्रंथों के अनुसार यह संपूर्ण ब्रह्मांड मूल रूप में  एक अंडाकार ज्योतिपुंज ( बिगबेन्ग का महापिन्ड-नीहारिका के स्वरुप की भांति - विज्ञान ) के रूप में था। इसी ज्योतिपुंज को आदिशक्ति (या शिव) भी कहा जा सकता है, जो बाद में बिखरकर 
 अनेक ग्रहों और उपग्रहों में बदल गई।( विज्ञान के अनुसार --समस्त सौरमंडल महा-नेब्यूला के 
बिगबैंग द्वारा बिखरने से बना है |) वैदिक विज्ञान--'एकोहम् बहुस्यामि' का भी यही साकार रूप और प्रमाण है। इस स्थिति में मूल अंडाकार ज्योतिपुंज ( दीपक की लौ या अग्निशिखा भी अंडाकार रूप होती है अतः ज्योतिर्लिंग कहा गया ) का प्रतीक सहज रूप में वही आकृति बनती है, जिसकी हम लिंग रूप में पूजा करते हैं। संपूर्ण ब्रह्मांड की आकृति निश्चित ही शिवलिंग की आकृति से मिलती-जुलती है इस तरह शिवलिंग का पूजन, वस्तुत: आदिशक्ति का और वर्तमान ब्रह्मांड का पूजन है  



         शिव के 'अर्द्धनारीश्वर' स्वरूप से जिस मैथुनी-सृष्टि का जन्म हुआ, जो तत्व-विज्ञान के अर्थ में विश्व संतुलन व्यवस्था में ( जो हमें सर्वत्र दिखाई देती है ) -शिव तत्व के भी संतुलन हेतु योनि-तत्व की कल्पना की गयी जो बाद में भौतिक जगत में लिंग-योनि पूजा का आधार बनी | उसे ही जनसाधारण को समझाने के लिए लिंग और योनि के इस प्रतीक चिह्न को सृष्टि के प्रारम्भ में प्रचारित किया गया | इस प्रकार हम देखते हैं कि जहां भारत में लिंग-पूजा को सूक्ष्म अध्यात्मिक, धार्मिक, व तात्विक रूप दिया गया वहीं अन्य भागों में उसे सिर्फ स्थूल- भौतिक रूप में जाना गया, यही भारतीय व अन्य संस्कृतियों में अंतर है |   

              परन्तु इस आलेख में हम पौराणिक लिंग या लिंग 

पुराण नहीं अपितु लिंग की आधुनिक व्याख्या पर विस्तृत प्रकाश 

डालेंगे | जिसमें लिंग का तात्विक अर्थ --आत्मतत्व,आध्यात्मिक, 

जैविक, भौतिक व साहित्यक  व भाषायी  आधार पर व्याख्यायित 

किया जाएगा |

            लिंग का मूल अर्थ किसी भी वस्तु..जीव ,जड़, जंगम ...भाव आदि का चिन्ह या पहचान होता है | जो लिन्ग-पूजन का कारण-मूल है...

  १- आध्यात्मिक-वैदिक आधार में - 
  -- ब्रह्म अलिंगी है| 
  ----उससे व्यक्त ईश्वर व माया भी अलिंगी हैं |
  ---जो ब्रह्मा , विष्णु, महेश व ...रमा, उमा, सावित्री ..के आविर्भाव के पश्चात ----विष्णु व रमा के संयोग से ....व विखंडन से असंख्य चिद्बीज  अर्थात “एकोहं बहुस्याम” के अनुसार विश्वकण बने जो समस्त सृष्टि के मूल कण थे | यह सब संकल्प सृष्टि ( या अलिंगी-अमैथुनीASEXUAL—विज्ञान ) सृष्टि थी | लिंग का कोइ अर्थ नहीं था |  

  --प्रथमबार लिंग-भिन्नता ...रूद्र-महेश्वर के अर्ध नारीश्वर रूप की आविर्भाव से  हुई,   
  ----जो स्त्री व पुरुष के भागों में भाव-रूप से विभाजित होकर प्रत्येक जड़, जंगम व जीव के  चिद्बीज या विश्वकण में प्रविष्ट हुए | 
  ----मानव-सृष्टि में ब्रह्मा ने स्वयं को पुरुष व स्त्री रूप ----मनु-शतरूपा में विभाजित किया और लिंग –अर्थात पहचान की व्यवस्था स्थापित हुई | क्योंकि शम्भु -महेश्वर लिंगीय प्रथा के जनक हैं अतः –इसे माहेश्वरी प्रजा व लिंग के चिन्ह को शिव का प्रतीक लिंग माना गया |

  २- जैविक-विज्ञान ( बायोलोजिकल ) आधार पर----सर्वप्रथम व्यक्त जीवन एक कोशीय बेक्टीरिया के रूप में आया जो अलिंगी ( एसेक्सुअल.. ) था ..समस्त जीवन का मूल आधार ----> जो एक कोशीय प्राणी प्रोटोजोआ ( व बनस्पति—प्रोटो-फाइट्स--यूरोगायरा आदि ) बना| ये सब विखंडन (फिजन) से प्रजनन  करते थे |

द्विलिंगी पुष्प
----- बहुकोशीय जीव  ...हाईड्रा आदि हुए जो विखंडन –संयोग ,बडिंग, स्पोरुलेशन से प्रजनन करते थे |---. वाल्वाक्स आदि पहले कन्जूगेशन( युग्मन ) फिर विखंडन से असंख्य प्राणी उत्पन्न करते थे |  इस समय सेक्स –भिन्नता अर्थात लिंग –पहचान नहीं थी |

----- पुनः द्विलिंगीय जीव( अर्धनारीश्वर –भाव ) ...केंचुआ, जोंक..या द्विलिंगी पुष्प वाले पौधे .. अदि के साथ लिंग-पहचान प्रारम्भ हुई | एक ही जीव में दोनों स्त्री-पुरुष लिंग होते थे |

------;तत्पश्चात एकलिंगी जीव ...उन्नत प्राणी ..व वनस्पति आये जो ..स्त्री-पुरुष अलग अलग होते हैं ... मानव तक जिसमें अति उन्नत भाव—प्रेम स्नेह, संवेदना आदि उत्पन्न हुए| तथा विशिष्ट लिंग पहचान आरम्भ हुई---यथा....

                        ..स्त्री में            पुरुष में          

१-बाह्य पहचान----        -- योनि, भग               -- लिंग (शिश्न)    
२-आतंरिक लिंग...         --अंडाशय, यूटरस           --वृषण (टेस्टिज)
३-बाह्य-उपांग ....         --स्तन                     --दाड़ी, मूंछ
४-आकारिकी(मोर्फोलोजी) ... --नरम व चिकनी त्वचा       --पंख, रंग , कलँगी ,सींग
५-भाव-लिंग ...           --धैर्य, माधुर्य, सौम्यता,       --कठोरता, प्रभुत्व ज़माना,  
                        नम्रता, मातृत्व की इच्छा       आक्रमण-क्षमता

    --वनस्पति में –लिंग-पहचान---- पुष्पों का  सुगंध, रंग, भडकीलापन...एकलिंगी-द्विलिंगी पुष्प ..पुरुषांग –स्टेमेन ..स्त्री अंग ...जायांग ...पराग-कण आदि|

-तत्व-भौतिकी  आधार पर लिंग... मूल कणों को विविध लिंग रूप में -----ऋणात्मक (नारी रूप) इलेक्ट्रोन ...धनात्मक ( पुरुष रूप ) पोजीत्रोन..  के आपस में क्रिया करने पर ही सृष्टि ...न्यूट्रोन..का निर्माण होता है| शक्ति रूप ऋणात्मक –इलेक्ट्रोन....मूल कण –प्रोटोन के चारों और चक्कर लगाता रहता है| रासायनिकी में ...लिंगानुसार ...ऋणात्मक आयन व धनात्मक आयन समस्त क्रियाओं के आधार होते हैं |
  
 -आयुर्वेद में भी .... लिंग -- निदान ...अर्थात रोग की पहचान, डायग्नोसिस को..... (अर्थात पहचान )...  कहते हैं |

 -साहित्य व भाषाई जगत में....लिंग.... कर्ता व क्रियाओं की पहचान को कहते हैं | प्रत्येक कर्ता या क्रिया ...स्त्रीलिंग, पुल्लिंग या नपुंसक लिंग होता है । 


६ -आत्म-तत्व की लिंग-व्यवस्था ....
         आत्मा न नर है न नारी । वह एक दिव्य सत्ता भर है, समयानुसार, आवश्यकतानुसार वह तरह-तरह के रंग बिरंगे परिधान पहनती बदलती रहती है । यही लिंग व्यवस्था है संस्कृत में 'आत्मा' शब्द नपुंसक लिंग है, इसका कारण यही है-आत्मा वस्तुतः लिंगातीत है । वह न स्त्री है, और न पुरुष ।
     

         अब  प्रश्न उठता है कि आत्मा जब न स्त्री है,और न पुरुष तो फिर स्त्री या पुरुष के रूप में जन्म लेने का आधार क्या है?
 

         इस अन्तर का आधार जीव की स्वयं की अपने प्रति मान्यताएँ हैं जीव चेतना भीतर से जैसी मान्यता दृड होजाती है वही अन्तःकरण में स्थिर होजाती है | । अन्तःकरण के मुख्य अंग -मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार में अहंकार  वह अस्मिता-भाव है जिसके सहारे व्यक्ति सत्ता का समष्टि सत्ता से पार्थ्क्य टिका है ।  इसी अहं-भाव में जो मान्यताएँ अंकित-संचित हो जाती हैं वे ही व्यक्ति की विशेषताओं का आधार बनती हैं ।आधुनिक मनोवैज्ञानिक शब्दावली में अहंकार को अचेतन की अति गहन पर्त कह सकते हैं । इन विशेषताओं में लिंग-निर्धारण भी सम्मिलित है । जीवात्मा में जैसी इच्छा उमड़ेगी जैसी मान्यताएँ जड़ जमा लेंगी, वैसा  जीवात्मा का वही लिंग बन जाता है|  
         पुराणों में इस प्रकार के अगणित उदाहरण भरे पड़े हैं जिनमें व्यक्तियों ने अपने संकल्प बल एवं साधना उपक्रम के द्वारा लिंग परिवर्तन में सफलता प्राप्त की है--यथा ..अम्बा की शिखंडी वेश ...देव-गुरु बृहस्पति का स्त्री-वेश आदि .. 

        
     निम्न प्राणी ऊस्टर.. जन्तुओं में अग्रणी हैं जो मादा की तरह अण्ड़े देने के बाद एक मास बाद ही नर बन जाते हैं और उभयपक्षीय लिंग में रहने वाली विभिन्नताओं का आनन्द लूटते हैं ।


            अतः  लिंग के आधार पर नर-नारी, कन्या-पुत्र का विभेद  
क्यों ?-- यह सर्वथा अर्थहीन है...      

    ----प्रत्येक मनुष्य के भीतर उभयलिंगों का अस्तित्व विद्यमान रहता है । नारी के भीतर एक नर सत्ता भी होती हैं, जिसे ऐनिमस कहते हैं । इसी प्रकार हर नर के भीतर नारी की सूक्ष्म सत्ता विद्यमान होती है, जिसे ऐनिमेसिस  कहते हैं । प्रजनन अगों के गह्वर में विपरीत लिंग का अस्तित्व भी होता है । नारी के स्तन विकसित रहते हैं, परन्तु नर में भी उनका अस्तित्व होता है ।

    अतः यह आवरण सामयिक है  आत्मा का कोई लिंग नहीं होता । एक ही जीवात्मा अपने संस्कारों और इच्छा के अनुसार पुरुष या नारी, किसी भी रूप में वैसी ही कुशलता के जीवन जी सकता है । नर नारी के भेद, प्रवृत्तियों की प्रधानता के परिणामस्वरूप शरीर मन में हुए परिवर्तनों में भेंद हैं । उनमें से कोई भी रूप श्रेष्ठ या निष्कृष्ट नहीं, अपने व्यक्तित्व यानी गुण क्षमताओं और विशेषताओं के आधार पर ही कोई व्यक्ति उत्कृष्ट या निष्कृष्ट कहा जा सकता है,लिंग के आधार पर नहीं । 

 ------अतः कन्या-भ्रूण ह्त्या पूर्णतः अतात्विक, अतार्किक, 

अवैज्ञानिक, अधार्मिक व  असामाजिक, अमानवीय कर्म है एवं 

राष्ट्रीय अपराध  |



                  ---- चित्र गूगल साभार 



मंगलवार, 5 जून 2012

..देव मानव दानव ....पर्यावरण दिवस पर....

                             ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

    ..देव मानव दानव ....

मूर्ति देव है जन जीवन का,
और द्विजों का देव अग्नि है |
मनीषियों का देव ह्रदय है,
समदर्शी हित सभी देव हैं ||
 
 देव वही जो सबको देते,
देव वही जो सब कुछ देते ।
जो सबको बस दे्ता  जाये
वह जग में देवता कहाये ॥
 
सूरज जो गर्मी देता है,
और उजाला देता रहता |
चन्दा भी शीतलता देता,
बादल वर्षा करता रहता ||

सागर से मिलते हैं मोती,
नदिया जल देती रहती है |
धरती जाने क्या क्या देती,
सब कुछ वह देती रहती है ||

बृक्ष भला कब फल खाते हैं,
पुष्प कहाँ निज खुशबू लेते |
कांटे  भी तो  देते  ही  हैं ,
दुःख के साथ सीख देदेते ||

शास्त्र तभी तो यह कहता है,
देव-तत्व सबमें रहता है |
जग में जो कुछ भी बसता है,
कुछ न कुछ देता रहता है ||

सारी दुनिया देती रहती ,
मानव लेता ही रहता है |
यदि लेकर के हो कृतज्ञ, फिर-
प्रभु इच्छाएं भर देता है ||

जो कृतज्ञ होकर लेता है,
सिर्फ जरूरत भर लेता है |
निज सुख खातिर कष्ट नहीं, 
जो , देने वाले को देता है ||

'जग हरियाली युक्त बनाएं-
और प्रदूषण मुक्त बनाएं |'-
जो यह सब भी चिंता करते,
उऋण रहें देवों के ऋण से ||

जो प्रसन्न देवों को रखते,
उनको ही कहते हैं  मानव |
अति-सुख अभिलाषा के कारण,
उन्हें सताएं , वे हैं दानव ||

लालच और लोभ के कारण ,
प्रकृति का दोहन जो करते |
वे जो अति भोगी मानव हैं,
कष्ट  सभी  देवों  को  देते  ||

करें प्रदूषण युक्त धरा को,
अज्ञानी लोभी जो मानव |
मानव पद से वे गिर जाते,
वे सब कहलाते हैं दानव  ||


                                                                                     ----चित्र गूगल व सुषमा गुप्ता साभार


रविवार, 3 जून 2012

पृथ्वी का संरचनात्मक विकास..श्रृंखला ..भाग दो--जीवन की उत्पत्ति..

                                  ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ... 
          यह आदि-सृष्टि  कैसे हुई, ब्रह्मांड कैसे बना एवं हमारी अपनी पृथ्वी  कैसे बनी व यहां तक का सफ़र कैसे हुआ, ये आदि-प्रश्न सदैव से मानव मन व बुद्धि को निरन्तर मन्थित करते रहे हैं । इस मन्थन के फ़लस्वरूप ही मानव  धर्म, अध्यात्म व विग्यान रूप से सामाजिक उन्नति में सतत प्रगति के मार्ग पर कदम बढाता रहा आधुनिक विग्यान के अनुसार हमारे पृथ्वी ग्रह की विकास-यात्रा क्या रही इस आलेख का मूल विषय है । इस आलेख के द्वारा हम आपको  पृथ्वी की उत्पत्ति, बचपन  से आज तक की क्रमिक एतिहासिक यात्रा पर ले चलते हैं।...प्रस्तुत है  इस श्रृंखला का प्रथम भाग ....


      ( सृष्टि व ब्रह्मान्ड रचना पर वैदिक, भारतीय दर्शन, अन्य दर्शनों व आधुनिक विज्ञान  के समन्वित मतों के प्रकाश में इस यात्रा हेतु -- मेरा आलेख ..मेरे ब्लोग …श्याम-स्मृति  the world of my thoughts..., विजानाति-विजानाति-विज्ञान ,  All India bloggers association के ब्लोग ….  एवं  e- magazine…kalkion Hindi तथा  पुस्तकीय रूप में मेरे महाकाव्य  "सृष्टि -ईशत इच्छा या बिगबैंग - एक अनुत्तरित उत्तर" पर पढा जा सकता है| ) -----

 
                            भाग दो --जीवन की उत्पत्ति
        जीवन की उत्पत्ति को लेकर दो विचारधारायें प्रचलित हैं —   एक जैविक घटक अंतरिक्ष से पृथ्वी पर आये जबकि दूसरी  कि उनकी उत्पत्ति पृथ्वी पर ही हुई|  यह माना जाता है कि यदि जीवन की उत्पत्ति पृथ्वी पर हुई थी, तो संभव है कि इस अवधि के दौरान उच्च ऊर्जा वाले क्षुद्रग्रहों की बमबारी के द्वारा महासागरों के लगातार होते निर्माण और विनाश के कारण जीवन एक से अधिक बार उत्पन्न व नष्ट हुआ हो |
१. अणु द्वारा प्रतिलिपिकरण ---प्रारंभिक पृथ्वी( लगभग ४ अरब वर्ष पूर्व ) के ऊर्जाशील रसायनिक –क्रियाशीलता में, किसी प्रकार एक अणु ने स्वयं की प्रतिलिपियां बनाने की क्षमता प्राप्त कर ली | वास्तव में इसने उन रासायनिक प्रतिक्रियाओं को प्रोत्साहित किया, जो स्वयं की प्रतिलिपि उत्पन्न करतीं थीं| कुछ प्रतिलिपियां अपने अभिभावकों से थोड़ी-सी भिन्न हुआ करतीं थीं| यह अजैव पदार्थ पर  उत्पत्ति  का एक प्रारंभिक उदाहरण है. जिसने प्राकृतिक चयन की एक प्रारंभिक विधि की अनुमति दी| जब कच्चे पदार्थों "भोजन" का विकल्प समाप्त हो जाता था, तो नस्लें विभिन्न पदार्थों का प्रयोग कर सकतीं थीं, अन्य नस्लों के विकास को रोक कर भी  | आरएनए (RNA) शुरुआती प्रतिलिपिकार था | किसी बिंदु पर आरएनए (RNA) से आनुवांशिक संचय की भूमिका डीएनए (DNA) ने ले ली और एन्ज़ाइम नामक प्रोटीन ने उत्प्रेरक की भूमिका ग्रहण कर ली|    

      ज्वालामुखी, आकाशीय बिजली द्वारा उत्पन्न ताप तथा पराबैंगनी विकिरण- रासायनिक प्रतिक्रियाओं को संचालित करने में सहायक हुए जिनसे मीथेन  अमोनिया जैसे सरल यौगिकों से अधिक जटिल अणु उत्पन्न हुए | इनमें से अनेक सरलतर  "जैविकयौगिक थे, जिनमें न्यूक्लियोबेस व अमीनो अम्ल भी शामिल हैं, जो कि जीवन के आधार-खण्ड हैं. जैसे-जैसे इस "जैविक सूप" की मात्रा व सघनता बढ़ती गई,  विभिन्न अणुओं के बीच पारस्परिक क्रिया होने लगी. कभी-कभी इसके परिणामस्वरूप अधिक जटिल अणु प्राप्त होते थे---शायद मिट्टी ने जैविक पदार्थ को एकत्रित व घनीभूत करने के लिये एक ढांचा प्रदान किया.| यह सब एक लंबे समय तक जारी रहा, जब तक कि संयोग से एक प्रतिलिपिकार अणु उत्पन्न नहीं हो गया |
     २ प्रारंभिक कोशिकाएं -समुद्र के नीचे  स्थित ज्वालामुखीय छिद्रों, जिन्हें ब्लैक स्मोकर्स  कहा जाता है में या यहां तक कि शायद गहराई में स्थिति गर्म चट्टानों के साथ उत्पन्न हुईं, जहां उपरोक्त समस्त स्थितियां उपस्थित थीं |
प्रारंभिक कोशिकाओं की एक श्रेणी ही शेष बची रह सकी | यह "लुका (Luca)" कोशिका आज पृथ्वी पर पाये जाने वाले समस्त जीवों का पूर्वज है. यह शायद एक प्रोकेरियोट था, जिसमें कोशिकीय झिल्ली तथा कुछ राइबोजोम थे, लेकिन उसमें कोई  जैव-भाग- जैसे माइटोकोंड्रिया या क्लोरोप्लास्ट मौजूद नहीं थे |
     ३ बहुकोशीय रूपों में जीवन का विकास --प्रोटेरोज़ोइक युग---में (३-५ अरब वर्ष पूर्व)  --ऑक्सीजन से परिपूर्ण एक वातावरण की ओर परिवर्तन एक निर्णायक विकास था. जो जीवाणु से प्रोकेरियोट  से यूकेरियोट  ( सूक्ष् कोशिका से बड़ी कोशिका) की ओर हुआ | इस दौरान दो भीषण हिम-युग देखें गये, अंतिम हिमयुग की समाप्ति के बाद, पृथ्वी पर जीवन की गति तीव्र हुई.
    ४ ऑक्सीजन क्रांति--शुरुआती कोशिकाएं विषम-पोषणज ( अन्य विषम जातीय अणुओं/कोशिकाओं को खाने वाली ) अपने पोषण के लिए कच्चे पदार्थ तथा ऊर्जा के एक स्रोत के रूप में चारों ओर के जैविक अणुओं (जिनमें अन्य कोशिकाओं के अणु भी शामिल थे) का प्रयोग करती थी.  जैसे-जैसे भोजन की आपूर्ति कम होती गई, कुछ कोशिकाओं में एक नई रणनीति विकसित हुई. मुक्त रूप से उपलब्ध जैविक अणुओं की समाप्त होती मात्राओं पर निर्भर रहने के बजाय, इन कोशिकाओं ने ऊर्जा के स्रोत के रूप में सूर्य-प्रकाश को अपना लिया—वर्तमान ऑक्सीजन-युक्त संश्लेषण  विकसित हो गया था, जिसने सूर्य की ऊर्जा न केवल स्वपोषणजों  के लिये, बल्कि उन्हें खाने वाले विषमपोषणजों के लिये भी उपलब्ध करवाई | ये मौजूद  कार्बन डाइआक्साइड और पानी का उपयोग करता था  और सूर्य के प्रकाश की ऊर्जा के साथ, ऊर्जा की प्रचुरता वाले जैविक अणु (कार्बोहाइड्रेट) उत्पन्न करता था,..इसके अलावा, इस संश्लेषण के एक अपशिष्ट उत्पाद के रूप में ऑक्सीजन उत्सर्जित किया जाता था.  ऑक्सीजन के साथ खनिजों की प्रतिक्रिया के कारण महासागरों का रंग हरा हो गया | अंततः ऑक्सीजन वातावरण में एकत्र होने लगी यह पृथ्वी का तीसरा वातावरण था.
     ५.प्रकाश संश्लेषण  व ऑक्सीजन प्रलय----प्रचुर ऑक्सीजन वाले वातावरण के कारण जीवन के लिये दो मुख्य लाभ थे. अपने चयापचय के लिये ऑक्सीजन का प्रयोग न करने वाले जीव, जैसे अवायुजीवीय जीवाणु, किण्वन को अपने चयापचय का आधार बनाते थे, ऑक्सीजन की प्रचुरता श्वसन को संभव बनाती है, तथा ऑक्सीजन उच्चतर वातावरण में ओज़ोन का निर्माण करती है, जिससे पृथ्वी की ओज़ोन परत का आविर्भाव होता है | प्रकाश संश्लेषण का एक अन्य, मुख्य तथा विश्व को बदल देने वाला प्रभाव था. ऑक्सीजन विषाक्तता; "ऑक्सीजन प्रलय" के नाम से जानी जाने वाली घटना में इसका स्तर बढ़ जाने पर संभवतः पृथ्वी पर मौजूद अधिकांश जीव समाप्त हो गए. प्रतिरोधी जीव बच गए और पनपने लगे, और इनमें से कुछ ने चयापचय में वृद्धि करने के लिये ऑक्सीजन का प्रयोग करने व उसी भोजन से अधिक ऊर्जा प्राप्त करने की क्षमता विकसित कर ली.
     ६.ओजोन परत की उत्पत्ति --अंतर्गामी पराबैंगनी विकिरण के प्रोत्साहन से कुछ ऑक्सीजन -ओज़ोन में परिवर्तित हुआ, जो कि वातावरण के ऊपरी भाग में एक परत में एकत्र हो गई. ओज़ोन परत ने पराबैंगनी विकिरण की एक बड़ी मात्रा, जो कि किसी समय वातावरण को भेद लेती थी को अवशोषित कर लिया और यह आज भी ऐसा करती है. इससे कोशिकाओं को महासागरों की सतह पर और  अंततः भूमि पर कालोनियां बनाने का मौका मिला | ओज़ोन परत पृथ्वी की सतह को जीवन के लिये हानिकारक पराबैंगनी विकिरण से बचाती है. ओज़ोन की इस परत के बिना, कोशिकाओं में उत्परिवर्तन ( म्यूटेशन )के कारण बाद में अधिक जटिल जीवन का विकास शायद असंभव होता क्योंकि  सूर्य के स्वाभाविक विकास के कारण  सूर्य की चमक एक करोड़ वर्षों में 6% बढ़ जाती है | इसी ऑक्सीजन की अधिक मात्रा के कारण  पृथ्वी पर पहला हिम-युग आया, ( लगभग २.३ अरब वर्ष पूर्व ) वातावरण में मीथेन  की मात्रा घट गई. और सूर्य के ऊष्मा प्रवाह को रोकने में समर्थ होने से पृथ्वी ठंडी हुई और ऑक्सीजन-प्रलय का कारण बनी| 

           ----- क्रमश: ..भाग---तीन- जीवन का विकास  ...अगली पोस्ट में...             

                                      






शनिवार, 2 जून 2012

सतसंगति ... डा श्याम गुप्त

                       ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



          सतसंगति

                 सत-संगति संतन कर संगा ,
                         सत-संगति वैतरिणी गंगा ||

सांची  भक्ति वहीं, प्रभु सोई
जहां संत रहता हो कोई |
बलिहारी संतन पद गाऊँ ,
सत-संगति संतन पद ध्याऊँ |

            वहीं अयोध्या काशी सोई,
            जहां संत रहता हो कोई |

मथुरा वृन्दावन रामेश्वर,
वहीं तीर्थ हैं जहां संत स्वर |
जिस गृह सत्-संगति, श्रुति-संता ,
सो गृह तीरथ   बसें अनंता |

                    सत् संगति  संतन कर संगा ,
                             सत संगति  वैतरिणी गंगा ||


ज्ञानदेव    रैदासा     मीरा,
रामकृष्ण   चैतन्य  कबीरा |
तुलसी नानक के पद गाऊँ ,
सूरदास रस भक्ति सजाऊँ |


            शिरडी संत-शिरोमणि सोई ,                                                                        
            जहां संत रहता हो कोई |


जिस मन संतन प्रेम समाना ,
उससे  दूर नहीं भगवाना |
संतन पद सेवा कर जोई,
रोकी  न सकें कोटि यम सोई |


                       जो सतसंगति रंगहि रंगा ,
                              पार करे वैतरिणी गंगा ||




           सांची भक्ति वहीं प्रभु सोई,
           जहां संत रहता हो कोई |
                                सतसंगति संतन कर संगा ,
                                        सत् संगति वैतरिणी गंगा ||











        

सोमवार, 28 मई 2012

सिर्फ युवाओं को ही दोष क्यों ....सन्दर्भ आईपीएल ... डा श्याम गुप्त...

                                   ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
ऑफ द फील्ड ---अभय खुरासिया का आलेख -राजस्थान पत्रिका ....संदर्भ -आईपीएल ..
                श्री अभय खुरासिया का उपरोक्त आलेख निश्चय ही आखें खोलने वाला है , हमें निश्चय ही गहनता से सोचना होगा, जैसा वे कहते हैं .." जिम्मेदारी युवा पर ही क्यों डालदी जाती है | सांस्कृतिक शून्यता का जिम्मेदार कौन? हमारे वरिष्ठ व जिम्मेदार तब कहाँ थे जब एम् टीवी, एफ टीवी,व तमाम दूषित तस्वीरों, विचारों का आगाज़ हो रहा  था | हमारे बच्चे हिंसा, मादकता , सनसनी  को देख कर बड़े होरहे हैं| जैसे बीज बो रहे हैं वैसे ही अंकुर फूटेंगे |"  ......
               महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि ..जहां तक मुझे अभय का चित्र व युवाओं की वकालत करने से  लगता है कि वे एक युवा हैं ... अर्थात यह युवाओं का वक्तव्य है .... अपनी वरिष्ठ पीढ़ी पर उचित मार्गदर्शन न् करने हेतु ..... और यह एक कटु-सत्य भी है | .तो बात यहाँ  और भी गंभीर होजाती है, तथा  समाज व मानवता  के लिए एक चेतावनी...खतरे की घंटी ....
                 इस प्रकार वे अपनी युवा -आकांक्षा व पहले वाली पीढ़ी पर आक्षेप के साथ मूलतः आई पी एल को बंद करने के विचारों पर असहमत प्रकट करते हैं |
           
                 परन्तु साथ ही साथ यद्यपि शायद अनुभव-ज्ञान की कमी के कारण उनके विभिन्न कथ्य स्वयं ही विपरीतार्थक हैं, कंट्रोवर्शियल ........यथा-----

       -वे एक तरफ कहते हैं ..."समस्या का समाधान ताला लगाने में नहीं है वरन  ताला खोल सूक्ष्म शल्य क्रिया में है|"
        ---- परन्तु फिर ताले का आविष्कार ही क्यों हुआ ?
 इसके विपरीत भाव में वे कहते हैं कि .." जब सामाजिक मापदंड ही भौतिकता है तो युवा भटकेगा ही "
.........अर्थात सामाजिक तालों की, मापदंडों की  आवश्यकता है "|

       - वे एक तरफ कहते हैं .." खिलाड़ी धन के तट पर बना रहे, पर साथ ही मूल्यों के सेतु को भी मज़बूत करता चले "......वहीं दूसरी ओर कहते हैं कि..."मोह-माया से परे  सोचना एक अवस्था के बाद ही आता है |"
            ----निश्चय ही वह अवस्था आते आते सब नष्ट होजायागा | सब कुछ गलत-सलत करलेने के बाद यदि कुछ  सोचा तो क्या लाभ |

                       वस्तुतः यदि अनुभव व ज्ञान से सोचा जाय तो युवा लेखक भूल जाते हैं कि --मानव मन एक वायवीय तत्त्व है एवं विषयों में शीघ्र गिरता है ...जैसा कि वे स्वयं स्वीकार करते हैं ..."हमारा नैसर्गिक स्वभाव है कि हमें नकारात्मक बातें ज्यादा आकर्षित करती हैं".....अतः सर्जरी की नौबत ही क्यों आये , पहले से ही रोकथाम के उपाय होने चाहिए | "प्रीवेंशन इज बैटर देन क्योर "... जैसा कि वे पहली पीढ़ी पर दोषारोपण के साथ स्वयं ही स्वीकार करते हैं ......" .....हमारे वरिष्ठ व जिम्मेदार तब कहाँ थे जब एम् टीवी, एफ टीवी,व तमाम दूषित तस्वीरों, विचारों का आगाज़ हो रहा  था | हमारे बच्चे हिंसा, मादकता , सनसनी को देख कर बड़े होरहे हैं| जैसे बीज बो रहे हैं वैसे ही अंकुर फूटेंगे |"  ....... अतः निश्चय ही मानव मन को दूषित करने वाले साधनों को ही बंद कर देना चाहिए ...मूलतः वे जो किसी भी प्रकार से सामाजिक लाभ में सहायक नहीं हैं ...और अतिरिक्त आर्थिक लाभ सदैव असामाजिक होता है | अति-भौतिकता, मोह-माया उत्पन्न करता है, उसकी और खींचता है  |
             अतः  आई पी एल  जैसे ( व अन्य उल-जुलूल  डांस, गायन, देह-प्रदर्शन , अदि कला  व प्रगतिशीलता के नाम पर होने वाले व्यर्थ के ) आयोजनों को निश्चय ही बंद कर देना  चाहिए | साथ ही साथ आज की प्रौढ़ व अनुभवी पीढ़ी को अपनी गलतियों , गलत योजनाओं , गलत आचरणों पर सोचना चाहिये  व उचित समाधानार्थक उपाय करने चाहिए | अन्यथा भविष्य की पीढ़ी अपनी बर्वादी हेतु उन्हें कभी माफ नहीं करेगी |