ब्लॉग आर्काइव

डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

मेरी फ़ोटो
Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

बुधवार, 16 मार्च 2016

ये आज पूछता है बसंत ....डा श्याम गुप्त....

           
                                         

                               ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...     

                                  

ये आज पूछता है बसंत

ये आज पूछता है बसंत
क्यों धरा नहीं हुलसाई है |
इस वर्ष नहीं क्या मेरी वह
बासंती पाती आई है |

क्यों रूठे रूठे वन-उपवन,
क्यों सहमी सहमी हैं कलियाँ |
भंवरे क्यों गाते करूण गीत,
क्यों फाग नहीं रचती धनिया |

ये रंग वसंती फीके से ,
है होली का भी हुलास नहीं |
क्यों गलियाँ सूनी-सूनी हैं,
क्यों जन-मन में उल्लास नहीं |

मैं बोला ऐ सुनलो बसंत !
हम खेल चुके बम से होली |
हम झेल चुके हैं सीने पर,
आतंकी संगीनें गोली |

कुछ मांगें खून से भरी हुईं,
कुछ दूध की बोतल खून रंगीं |
कुछ दीप-थाल, कुछ पुष्प-गुच्छ,
भी धूल से लथपथ खून सने |

कुछ लोग हैं खूनी प्यास लिए,
घर में आतंक फैलाते हैं|
गैरों के बहकावे में आ,
अपनों का रक्त बहाते हैं |

कुछ तन मन घायल रक्त सने,
आंसू निर्दोष बहाते हैं|
अब कैसे चढ़े बसन्ती रंग,
अब कौन भला खेले होली ?

यह सुन वसंत भी शरमाया,
वासंती चेहरा लाल हुआ |
नयनों से अश्रु-बिंदु छलके,
आँखों में खून उतर आया |

हुंकार भरी और गरज उठा,
यह रक्त बहाया है किसने!
मानवता के शुचि चेहरे को,
कालिख से पुतवाया किसने |

ऐ उठो सपूतो भारत के,
बासंती रंग पुकार रहा |
मानवता की रक्षा के हित,
तुम भी करलो अभिसार नया |

जो मानवता के दुश्मन हैं,
हो नाता, रिश्ता या साथी |
जो नफ़रत की खेती करते,
वे देश-धर्म के हैं घाती |

यद्यपि अपनों से ही लड़ना,
यह सबसे कठिन परीक्षा है |
सड़ जाए अंग अगर कोई,
उसका कटना ही अच्छा है |

ऐ देश के वीर जवान उठो,
तुम कलमवीर विद्वान् उठो |
ऐ नौनिहाल तुम जाग उठो,
नेता मज़दूर किसान उठो |

होली का एसा उड़े रंग,
मन में इक एसी हो उमंग |
मिलजुलकर देश की रक्षा हित,
देदेंगे तन मन,  अंग-अंग |


                                                                 

मंगलवार, 15 मार्च 2016

कैलाश पर शिव-शक्ति युगल के दर्शन------- डा श्याम गुप्त

                          ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...  


                                          


  
----- क्या आपको कैलाश स्थित आदि-देव शिव के दर्शन होते हैं---ध्यान से देखिये, चित्र को बड़ा करें ..... और क्या क्या दृश्यमान होता है ---

-----शिव का भोले  रूप
-----शिव का रौद्र , कापालिक रूप
------ अर्धनारीश्वर रूप ---शिव-शक्ति का समन्वित रूप ......











                                                                                         

रविवार, 13 मार्च 2016

मुस्कराहट --गीत----डा श्याम गुप्त

                      ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ..

        मुस्कराहट
 ( शीघ्र प्रकाश्य गीत संग्रह--जीवन दृष्टि -से )

मुस्कराहट से मीठा तो कुछ भी नहीं,
मन का दर्पण है ये मुस्कुराते रहो |

तन भी सुन्दर है, मन भी है भावों भरा,
भव्य चहरे पर यदि मुस्कराहट नहीं |
ज्ञान है, इच्छा भी, कर्म अनुपम सभी ,
कैसे झलके, न यदि मुस्कुराए कोई |
मन के भावों को कैसे मुखरता मिले,
सौम्य आनन् पर जो मुस्कराहट नहीं |

मुस्कराहट से मीठा तो कुछ भी नहीं,
मन का दर्पण है ये मुस्कुराते रहो |

ये प्रसाधन ये श्रृंगार साधन सभी,
चाँद लम्हों की सुन्दरता दे पायंगे |
मुस्कराहट खजाना है कुदरत का वह,
चाँद तारों से चहरे दमक जायंगे |
मुस्कराहट तो है अंतर्मन की खुशी,
झिलमिलाती है चहरे को रोशन किये |

मुस्कराहट से मीठा तो कुछ भी नहीं,
मन का दर्पण है ये मुस्कुराते रहो |

मुस्कराहट तो जीवन की हरियाली है,
ज़िंदगी में चमत्कार कर जायगी |
मन मधुर कल्पनाओं के संसार में,
साद-विचारों से भर मुस्कुराया करे |
सौम्य सुन्दर सहज भाव आभामयी,
रूप सौन्दर्य चहरे पै ले आयगी |

मुस्कराहट से मीठा तो कुछ भी नहीं,
मन का दर्पण है ये मुस्कुराते रहो |

एक गरिमा है आत्मीयता से भरी,
शिष्ट आचार की है ये पहली झलक |
चाहे कांटे हों राहों में बिखरे हुए,
मुस्कुराओ सभी विघ्न कट जायंगे |
इन गुलावों की शोखी पर डालें नज़र,
रह के काँटों में भी मुस्कुराते हैं वो |

मुस्कराहट से मीठा तो कुछ भी नहीं,
मन का दर्पण है ये मुस्कुराते रहो |


















Drshyam Gupta's photo..

मंगलवार, 8 मार्च 2016

श्याम स्मृति -- पुरुषवादी मानसिकता .... डा श्याम गुप्त

                                          ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



श्याम स्मृति -२२. पुरुषवादी मानसिकता ....
          आजकल एक शब्द-समूह अधिकाँश सुना, कहा लिखा जा रहा है वह है 'पुरुषवादी मानसिकता', प्राय: नारीवादी लेखिकाएं, सामाजिक कार्यकर्त्री, प्रगतिशील तेज तर्रार नारियां समन्वयक पुरुष सभी, स्त्री सम्बंधित घटनाओं, दुर्घटनाओं, अनाचार, अत्याचार, यौन उत्प्रीणन आदि सभी के सन्दर्भ में पुरुषवादी सोच मानसिकता का रोना रोया जाता है | यदि पुरुष में पुरुषवादी सोच मानसिकता नहीं होगी तो और क्या होगी, तभी तो वह पुरुष है | क्या स्त्री अपनी स्त्रियोचित सोच मानसिकता को बदल सकती है, त्याग सकती है, नहीं, यह तो प्रकृति-प्रदत्त है, .अपरिवर्तनशील | 
         यह असंगत है, समस्या के मूल से भटकना | किसी दुश्चरित्र पुरुष के कार्यकलापों का ठीकरा समस्त आधी दुनिया, सारे पुरुष वर्ग पर फोड़ना क्या उचित है !
            वस्तुतः यह सोचहीनता का परिणाम है, कृत्य-दुष्कृत्य करते समय व्यक्ति यह नहीं सोच पाता कि वह स्त्री किसी की बहन, पुत्री, माँ, पत्नी है..ठीक अपनी स्वयं की माँ, बहन, पुत्री, पत्नी की भांति | निकृष्ट आपराधिक आचरणहीनता की विकृत मानसिकता युक्त व्यक्ति ऐसी सोचहीनता से ग्रस्त होता है एवं स्त्रियों को सिर्फ कामनापूर्ति, वासनापूर्ति, वासना की पुतली, सिर्फ यौन तुष्टि का हेतु समझता है| नारी का मान, सम्मान, स्वत्व का उसके लिए कोई मूल्य नहीं होता | यह चरित्रगत कमी अक्षमता का विषय है जो विविध परिस्थितियों, आलंबन उद्दीपन-निकटता, आसंगता, स्पर्शमयता, आसान उपलब्धता से उद्दीप्तता की ओर गमनीय होजाते हैं|
           आज स्त्रियों में पुरुष-समान कार्यों में रत होने के कारण उनमें स्त्रेंण-भाव कम होरहा है पुरुष-भाव की अधिकता है अतः उनमें पुरुष के पुरुष-भाव की शमनकारी स्वयं के स्त्रेंण-भाव के उत्कर्ष का भाव नहीं रहा, फलतः पुरुष में प्रतिद्वंद्विता भाव युत आक्रामकता बढ़ती जा रही है जिसे पुरुष मानसिकता से संबोधित किया जा रहा है |


सोमवार, 7 मार्च 2016

सृष्टि व मानव जाति के महान समन्वयक—देवाधिदेव शिव ...डा श्याम गुप्त

                                             ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

महाशिवरात्रि के अवसर पर विशेष -------
 सृष्टि व मानव जाति के महान समन्वयक—देवाधिदेव शिव 
 
                  प्राणी व मानव कुल एवं मानवता के मूल समन्वयक त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु, महेश ने समस्त प्राणी जगत ( देव, दनुज ,मानव, गंधर्व आदि सभी का आपस में सामाजिक संयोजन करके एक विश्व मानव कुल की नींव रखी | शिव जो वस्तुतः निरपेक्ष, सबको साथ लेकर चलने वाले महान समन्वयवादी थे, ने ब्रह्मा, विष्णु के सहयोग से इंद्र आदि देव एवं अन्य असुर आदि सभी कुलों को आपस में समन्वित किया और एक महान मानव समूह को जन्म दिया जो तत्पश्चात ‘आर्य’ कहलाये |
                        यह उस समय की बात है जब भारतीय भूखंड एक द्वीप के रूप में अफ्रीका ( गोंडवाना लेंड) से टूट कर उत्तर में एशिया की ओर बढ़ रहा था | मूल गोंडवानालेंड में विक्सित जीव व आदि-मानव पृथक हुए भारतीय भूखंड के नर्मदा नदी क्षेत्र गोंडवाना प्रदेश में डेनीसोवंस( अर्धविकसित) एवं नियंडर्थल्स (अविकसित) मानव में विक्सित होरहे थे एवं सभ्यता व संकृति का विकास होरहा था| ये मानव यहाँ विक्सित हुए एवं समूहों व दलों में भारत में उत्तर की ओर बढ़ते हुए, भारतीय प्रायद्वीप के एशियन छोर से मिल जाने पर बने मार्ग से उत्तर भारत होते हुए सुदूर उत्तर-मध्य एशिया क्षेत्र - सुमेरु क्षेत्र व मानसरोवर-कैलाश क्षेत्र पहुंचे एवं पश्चिमी एशिया-योरोप से आये अन्य अविकसित/ अर्धबिकसित मानवों से मिलकर विक्सित मानव, होमो सेपियंस में विक्सित हुए| इसीलिये सुमेरु क्षेत्र को भारतीय पौराणिक साहित्य में ब्रह्म-लोक कहा जाता है, जहां ब्रह्मा ने मानव की व सृष्टि की रचना की| सुमेरु के आस-पास के क्षेत्र ही देवलोक, इन्द्रलोक, विष्णु लोक, स्वर्ग आदि कहलाये जहाँ विभिन्न उन्नत प्राणियों मानवों ने सर्वप्रथम बसेरा किया |
                           शेष अफ्रीकी भूखंड से उत्तर-पश्चिम की ओर चलते हुए आदिमानव अन्य समूहों में योरोप-एशिया पहुंचता रहा, नियंडरथल्स में विक्सित होता रहा परन्तु उत्तर-पश्चिम की अनिश्चित शीतल जलवायु व मौसम से बार बार विनष्ट होता रहा, बचे-खुचे मानव पूर्व-मध्य एशिया के सुमेरु–कैलाश क्षेत्र में उपस्थित विक्सित मानवों से मिल गए|
                            जनसंख्या बढ़ने पर, ब्रह्मा द्वारा मानव के पृथ्वी पर निवास की आज्ञा से, मानव सर्वत्र चहुँ ओर फ़ैलने लगे | पूर्वोत्तर की ओर चलकर बेयरिंग स्ट्रेट पार करके ये पैलिओ-इंडियन अमेरिका पहुंचे व सर्वत्र फ़ैल गए| पूर्व की ओर चाइना, जापान, पूर्वी द्वीप समूह आस्ट्रेलिया तक| दक्षिण में समस्त भारतीय भूमि पर फैलते हुए ये मानव सरस्वती घाटी ( मानसरोवर से पंजाब तक) में; जहां दक्षिणी भारत की नर्मदा घाटी में पूर्व में रह गए मानव समूह उन्नति करते हुए पहुंचे मानवों (जिन्होंने हरप्पा, सिंध सभ्यता का विकास किया|) से इनकी भेंट हुई और दोनों सभ्यताओं ने मिलकर अति-उन्नत सरस्वती घाटी सभ्यता की नींव रखी|
                           यह वह समय था जब सुर-असुर द्वंद्व हुआ करते थे | शिव जो एक निरपेक्ष देव थे सुर, असुर, मानव व अन्य सभी प्राणियों, वनस्पतियों आदि के लिए समान द्रष्टिभाव रखते थे, सभी की सहायता करते थे | उन्हें पशुपतिनाथ व भोलेनाथ भी कहा जाने लगा |
१.शिव ने ही समुद्र मंथन से निकला कालकूट विष पान करके समस्त सृष्टि को बचाया|
२.शिव ने ही देवताओं को अमृत प्राप्ति पर दोनों ओर बल-संतुलन हेतु असुरों को संजीवनी विद्या प्रदान की |
३. शिव ने ही मानसरोवर से सरस्वती किनारे आये हुए इंद्र-विष्णु पूजक मानवों एवं दक्षिण से हरप्पा आदि में विक्सित स्वयं संभु सेक शिव के समर्थकों मानवों के दोनों समूहों, के मध्य मानव इतिहास का प्रथम समन्वय कराया, जिसके हेतु वे स्वयं दक्षिण छोड़कर कैलाश पर बस गए पहले दक्ष पुत्री सती से प्रेम विवाह पुनः हिमवान की पुत्री उत्तर-भारतीय पार्वती से विवाह किया तथा अनेकों असुरों का भी संहार किया, और महादेव, देवाधिदेव कहलाये |
                             हरप्पा, सिंध सभ्यता का विकास करने वाले भारतीय मानव( गोंडवाना प्रदेश के मूल मानव जो अपने देवता शम्भू-सेक के पूजक थे अपनी संस्कृति विकसित करते हुए उत्तर तक पहुंचे थे | हरप्पा में प्राप्त शिवलिंग, पशुपति की मोहर आदि इसके प्रमाण हैं| अर्थात शिव मूल रूप से भारत के दक्षिण क्षेत्र के देवता थे |
यही दोनों समूह मिलकर एक अति-उन्नत सभ्यता के वाहक हुए जो सरस्वती सभ्यता, या वैदिक सभ्यता कहलायी एवं यही लोग ‘आर्य’ कहलाये अर्थात सृष्टि के सर्वश्रेष्ठ मानव | जो विकासमान हिमालय की नीची श्रेणियों को पार करके देवालोकों व समस्त विश्व में आया जाया करते थे| जनसंख्या व अन्य विकास की विभिन्न सीढ़ियों के कारण पुनः यही मानव समस्त विश्व में फैले और समस्त यूरेशिया, जम्बू द्वीप या वृहद् भारत कहलाया | आज समस्त विश्व में यही भारतीय मानव एवं उनकी पीढियां निवास करती हैं|
विश्व के प्रत्येक कोने में प्राप्त शिवलिंग एवं शिव मंदिर उनके सर्वेश्वर एवं देवाधिदेव, महादेव होने के प्रमाण हैं|

१. देवाधिदेव -शिव ....२.शिवलिंग -अफ्रीका ...३.शिव चीनी ड्रेगन एवं बोनों के साथ ..४.. पशुपति नाथ ( हरप्पा)...५.शिवलिंग--कम्बोडिया ...
Comments
Drshyam Gupta
Write a comment...