ब्लॉग आर्काइव

डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

मेरी फ़ोटो
Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

शनिवार, 7 मई 2016

वर्ण और जाति---डा श्याम गुप्त

                              ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
 


                      वर्ण और जाति---
       प्राचीन हिंदू वर्ण व्यवस्था में लोगों को उनके द्वारा किये जाने वाले कार्य के अनुसार अलग-अलग वर्गों में रखा गया था। पूजा-पाठ व अध्ययन-अध्यापन आदि कार्यो को करने वाले ब्राह्मण | शासन-व्यवस्था तथा युद्ध कार्यों में संलग्न वर्ग क्षत्रिय | व्यापार आदि कार्यों को करने वाले वैश्य एवं श्रमकार्य व अन्य वर्गों के लिए सेवा करने वाले 'शूद्र कहे जाते थे।
       भारतीय ज्ञान व सामाजिक सिद्धांतों के प्राचीनतम ग्रन्थ वेदों तथा गीता में वर्ण शब्द का उल्लेख मिलता है लेकिन जाति का नहीं। वर्ण शब्द का अर्थ, वर्ण के प्रचलित अर्थों में रंग का प्रतीक है। वर्ण  शब्द का प्राचीनतम उल्लेख यजुर्वेद के ३१वें अध्याय में मिलता है |
     इन ग्रंथों में वर्णित समाज के ये चार वर्ण मनुष्यों की प्रकृति (स्वभाव या विवेक) के तीन गुणों के मिश्रण से बना था - सत, रज और तम आज वर्ण  और जाति  को एक ही व्यवस्था स्वभाव समझ लिया जाता है, लेकिन जाति  अपेक्षाकृत नया विचार है। आधुनिक काल में इसी वर्ण व्यवस्था को जाति, वंश,कुल  या जादि, कुलम आदि  कहते हैं। सिर्फ जन्म के आधार पर निर्धारित हो जाने के कारण इसे कालान्तर में जाति कहा जाने लगा|
     जाति (या तमिल जादि, तेलगु के कुलम) शब्द से जन्म का अर्थ ग्रहण होता है। इसी मूल से जात, नवजात (नया जन्मा हुआ), जनन (जन्म लेना या देना) जननी (जन्म देने वाली, माता), जाई, जाया इत्यादि शब्द बने हैं। इससे स्पष्ट होता है कि ये जन्म आधारित प्रथा नहीं रही होगी। जाति  शब्द का प्रयोग अपेक्षाकृत नया है।
         भारतीय दर्शन के अनुसार सत यथा-संभव उचित जानने और करने वाला गुण है, रज उचित जानना लेकिन तात्कालिक लाभ के लिए समय समय पर कर्तव्य से डिगने वाला गुण है और अज्ञान के अंधकार में रहने के गुण को तम कहते हैं। ये चार वर्ण मनुष्य जाति का मूलभूत स्वभाव है, ज्योतिष, मनोविज्ञान, अध्यात्म में भी मनुष्य-मात्र के ये लक्षण बताये गए हैं  गीता  में भी। वे इस प्रकार है-
ब्राम्हण - ब्रम्हज्ञानी - ज्ञान प्रसार करने वाले, उचित (धर्म शब्द का वास्तविक अर्थ) और अनुचित को समझने वाला और दूसरों का बताने वाला।
क्षत्रिय - रज गुण प्रधान वाला - वीर एवं योद्धा - युद्ध में कभी पीछे न हटने वाला। लेकिन रज गुण के कारण राज्य, धन और अन्य कारणों से इनका धर्म (यानि स्थिति के अनुसार उचित कर्तव्य) में विश्वास अटल नहीं रहता और इनके मोह में गलतियाँ कर बैठते हैं।
वैश्य - व्यवसाय में निपुण, रज और तम गुणों के मिश्रण वाले लोग - बनिया या वैश्य। विश धातु का अर्थ है सभी स्थानों पर जाने वाले यानि (कर्मानुसार) धन अर्जित करने वाले। विश धातु से ही प्रवेश और विष्णु जैसे शब्द बने हैं।
शूद्र - तमोगुणी, दुःख-सुख के कारणों के न जानना और न जानने की इच्छा रखना। दुनिया को समझने की बजायउससे  से बेपरवाह,  मस्तमौला जीव- कल की फिक्र नहीं,  मेहनत करो और खाओ-पियो मौज करो।
       गीता में सत (सात्विक), रज (राजसी) और तम (तामसी) गुणों को एकाधिक परिप्रेक्ष्य में बताया गया है। प्रत्येक मनुष्य एक समय में इन्हीं तीनों गुणों से मिलकर बना होता है।
        ये स्वभाव (गुण या प्रकृति) सभी मनुष्यों में है और उनके शारीरिक रंग से परे है। एक अफ़्रीका का वासी भी इन्ही गुणों से मिलकर बना है और यूरोप वासी भी। वर्ण शब्द एक सिद्धांत व दर्शन को बताता है, न कि रूप-रंग को।
       पौराणिक कथा के अनुसार सृष्टि के बनने के समय मानवों को उत्पन्न करते समय ब्रह्मा जी के विभिन्न अंगों से उत्पन्न होने के कारण कई वर्ण बन गये।---मुख से ब्राह्मण ....भुजाओं से क्षत्रिय ...जंघा से वैश्य  व पैर से शूद्र उत्पन्न हुए। है। वर्ण व्यवस्था के सम्बन्ध में ऋग्वेद के पुरुषसूक्तमें निम्नलिखित श्लोक मिलता है -
ब्राह्मणों अस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यः कृतः।
ऊरु  तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत।।1

        वास्तव में ये विभाग पुरुष अर्थात वृहद् स्वरुप में विश्वात्मा, वैश्वानर, विश्वरूप प्राणी समाज( शरीर) के अंगों के रूप में वर्णित हैं| सत भाव युक्त मानव या मानव समूह, समाज का विचार, विचारक अर्थात सिर, शीर्ष, शिखर या मुख है.... रज भाव युक्त शक्ति पूर्ण मानव या समुदाय समाज का रक्षक, बाहु है.... सत व रज मिश्रित भाव वाला मनुष्य या समुदाय, समाज का क्रियात्मक गतियुक्त, धनार्जन करने वाला, अन्न उपजाने वाला, व्यवहार कुशल जंघा, व उरु भाग है ...  तम भाव युक्त मानव या समुदाय- न जानने की इच्छा रखने वाला,  दुनिया से बेपरवाह,  मस्तमौला जीव-कल की फिक्र नहीं, श्रमकार्य व अन्य वर्गों के लिए सेवा करने वाले, मानव या समुदाय समाज का मूलाधार पद है |

मनुस्मृति के अनुसार ----वर्ण व्यवस्था का आधार कर्म है’ - मनुष्य का वर्ण निर्धारण कर्म और गुणों के आधार पर ही होता है --
शूद्रो बा्रह्मणतामेति ब्राह्मणश्चेति शूद्रताम्।
क्षत्रियाज्जात्मेवन्तु  विद्याद्  वैश्यात्तथैव च।।3
आपस्तम्ब सूत्रोंमें भी यही बात कही गई है कि वर्ण जन्मनान होकर वास्तव में कर्मणा है -
धर्मचर्ययाजधन्योवर्णः पूर्वपूर्ववर्णमापद्यतेजातिपरिवृत्तौ।
अधर्मचर्यया पूर्वो वर्णो जधन्यं जधन्यं वर्णमापद्यते जाति परिवृत्तौ।।4
       अर्थात् धर्माचरण से निकृष्ट वर्ण अपने से उत्तम वर्ण को प्राप्त होता है और वह उसी वर्ण में गिना जाता है - जिस-जिस के वह योग्य होता है , वैसे ही अधर्म आचरण से पूर्व अर्थात् उत्तम वर्ण वाला मनुष्य अपने से नीचे-नीचे वाले वर्ण को प्राप्त होता है और उसी वर्ण में गिना जा ता है।
      शूद्र कुल में उत्पन्न होकर ब्राह्मण, क्षत्रिय के समान गुण, कर्म स्वभाव वाला हो, तो वह शूद्र, ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य हो जाता है। वैसे ही जो ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य कुल में उत्पन्न हुआ हो, उसके गुण व कर्म शूद्र के समान हो, तो वह शूद्र हो जाता है, वैसे ही क्षत्रिय या वैश्य कुल में उत्पन्न होकर ब्राह्मण व शूद्र के समान होने पर, ब्राह्मण व शूद्र हो जाता है।

बृहदारण्यकोपनिषदमें मानव जाति के चारों वर्णों की उत्पत्ति का आधार ब्रह्मा द्वारा रचित देवताओं के चार वर्ण बताए गए हैं---१.इन्द्र, वरुण, सोम, यम आदि क्षत्रिय देवताओं, ...२.रुद्र, वसु, आदित्य, मरुत आदि वैश्य देवताओं, ...३.पुशान आदि शूद्र वर्ण के देवताओं की सृष्टि ईश्वर द्वारा की गई |..... इन सबसे पूर्व ब्राह्मणों की सृष्टि हो ही चुकी थी। इस वर्ण व्यवस्था के आधार पर ही मानव जाति में भी क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्णों की सृष्टि की गई।

भृगु संहितामें भी चारों वर्णों की उत्पत्ति का उल्लेख इस प्रकार है --- सर्वप्रथम ब्राह्मण वर्ण था, उसके बाद कर्मों और गुणों के अनुसार ब्राह्मण ही क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्ण वाले बने तथा इन वर्णों के रंग भी क्रमशः श्वेत, रक्तिम, पीत और कृष्ण थे। बाद कें तीनों वर्ण ब्राह्मण वर्ण से ही विकसित हुए।
       यह मानव के सामाजिक विकास की भारतीय गाथा है जो ब्राह्मण कठोर, शक्तिशाली, क्रोधी स्वभाव के थे, वे रजोगुण की प्रधानता के कारण क्षत्रिय बन गए। जिनमें तमोगुण की प्रधानता हुई, वे शूद्र बने। जिनमें पीत गुण अर्थात् तमो मिश्रित रजो गुण की प्रधानता रही, वे वैश्य कहलाये तथा जो अपने धर्म पर दृढ़ रहे तथा सतोगुण की जिनमें प्रधानता रही वे ब्राह्मण ही रहे। इस प्रकार ब्राह्मणों से ही चार वर्णो का गुण और कर्म के आधार पर विकास हुआ।

 गीता में श्रीकृष्ण ने भी कहा है---“चातुर्वर्ण मया सृष्टा, गुण कर्म विभागस:” ---चारों वर्णो का विभाजन गुण और कर्मो के आधार पर ही है।

भगवान बुद्ध के अनुसार --(दिघ निकाय के आगण सुत्त के अनुसार)  पृथ्वी की उत्पत्ति के बाद जब जीवो का क्रमिक विकास हुआ और उनमे तृष्णा लोभ अभिमान जेसे भावो का जन्म हुआ तो उन प्रारंभिक सत्वों में विभिन्न प्रकार की विकृतियाँ हुईं और आयु में क्रमश: कमी होने लगी | लोग चोरी जेसे कर्मो में प्रवृत्त होने लगे | लगातार चोर कर्म करने के कारण सभी जन समुदाय परेशान होकर एक सम्म्ननीय व्यक्ति के पास गए और बोले तुम यहाँ अनुशासन की स्थापना करो, उचित और अनुचित का निर्णय करो हम तुम्हे अपने अन्न में से हिस्सा देंगे उस व्यक्ति ने यह मान लिया | चूँकि वह सर्व जन द्वारा सम्मत था इसलिए महासम्मत नाम से प्रसिंद्ध हुआ, लोगो के क्षेत्रो (खेतों) का रक्षक था इसलिए क्षत्रिय हुआ और जनता का रंजन करने के कारण राजा कहलाया | उन सर्व प्रथम व्यक्ति को आज मनु कहा जाता हे जिसके आचार विचार पर चलने वाले मनुष्य कहलाये |
        इस प्रकार क्षत्रिय वर्ण की उत्पत्ति प्रजातांत्रिक तरीके से जनता द्वारा राजा चुनने के कारण हुई | यह वर्ण का निर्णय धर्म (निति) के आधार पर हुआ न की किसी देवीय सत्ताके कारण | इसी प्रकार ब्राहमण, वैश्य और शुद्र वर्ग की उत्पत्ति भी अपने उस समय के कर्मो के अनुसार हुई

 वर्णाश्रम व्यवस्था के विषय में गाँधी जी के विचार -मेरी सम्मति में वर्णाश्रम मानवीय स्वभाव में अन्तर्ग्रथित है। हिन्दू धर्म ने केवल इसे एक वैज्ञानिक रूप दे दिया है। ये चार वर्ण तो मनुष्य के पेशों की परिभाषा करते हैं। वे सामाजिक  पारस्परिक  सम्बन्धों को निर्बाधित या नियमित नहीं करते।” 
    
         वस्तुतः वैदिक काल की प्राचीन व्यवस्था में जाति वंशानुगत नहीं थी परन्तु  गुप्तकाल के आते-आते जन्म व आनुवंशिक आधार पर लोगों के वर्ण तय होने लगे। परस्पर श्रेष्ठता के भाव के चलते नई-नई जातियों की रचना होने लगी। यहाँ तक कि श्रेष्ठ समझे जाने वाले ब्राह्मणों ने भी अपने अंदर दर्जनों वर्गीकरण कर डाला। अन्य वर्ण के लोगों ने इसका अनुसरण किया और जातियों की संख्या हजारों में पहुँच गयी।








गुरुवार, 5 मई 2016

कहाँ जाती हैं गंगा में विसर्जित अस्थियाँ ?----डा श्याम गुप्त

             ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ... 

 

                     कहाँ जाती हैं गंगा में विसर्जित अस्थियाँ ?


              एक दिन देवी गंगा श्री हरि से मिलने बैकुण्ठ धाम गई और उन्हें जाकर बोली," प्रभु ! मेरे जल में स्नान करने से सभी के पाप नष्ट हो जाते हैं लेकिन मैं इतने पापों का बोझ कैसे उठाऊंगी? मेरे में जो पाप समाएंगे उन्हें कैसे समाप्त करूंगी?"
             इस पर श्री हरि बोले, "गंगा! जब साधु, संत, वैष्णव आकर आप में स्नान करेंगे तो आप के सभी पाप घुल जाएंगे।"

                        सदानीरा व परमपावन गंगा नदी को प्राणियों के समस्त पापों को दूर करने वाली कहा जाता है | परन्तु वह स्वयं अपवित्र नहीं होती| प्रत्येक हिंदू व उसके परिवार की इच्छा होती है उसकी अस्थियों का विसर्जन गंगा में ही किया जाए | युगों से ये प्रथा चली आ रही है | अस्थियाँ गंगा में विसर्जित होती आरही हैं फिर भी गंगाजल पवित्र एवं पावन है। अब प्रश्न यह उठता है कि यह अस्थियां जाती कहां हैं?

                  गौमुख से गंगासागर तक खोज करने के बाद भी वैज्ञानिक भी आज तक इस प्रश्न का उत्तर इसका उत्तर नहीं खोज पाए | क्योंकि असंख्य मात्रा में अस्थियों का विसर्जन करने के बाद भी गंगाजल पवित्र एवं पावन है।

  सनातन धर्म की मान्यता के अनुसार-------
 
-----मृत्यु के बाद आत्मा की शांति के लिए मृत व्यक्ति की अस्थि को गंगा में विसर्जन करना उत्तम माना गया है। ”पारद“ शब्द में -पा = विष्णु...र = रूद्र शिव और ‘द’ = ब्रह्मा के प्रतीक है। यह अस्थियां सीधे श्रीहरि के चरणों में बैकुण्ठ चली जाती हैं। जिस व्यक्ति का अंत समय गंगा के समीप आता है उसे मरणोपरांत मुक्ति मिलती है।
धार्मिक दृष्टि से----- 

-----पारद शिव का प्रतीक है और गंधक शक्ति का प्रतीक है। सभी जीव अंततः शिव और शक्ति में ही विलीन हो जाते है। पारद को भगवान् शिव का स्वरूप माना गया है और ब्रह्माण्ड को जन्म देने वाले उनके वीर्य का प्रतीक भी इसे माना जाता है। धातुओं में अगर पारद को शिव का स्वरूप माना गया है तो ताम्र को माँ पार्वती का स्वरूप। इसलिए गंगा में ताम्र के सिक्के फैकने की प्रथा है | इन दोनों के समन्वय से शिव और शक्ति का सशक्त रूप उभर कर सामने आ जाता है। ठोस पारद के साथ ताम्र को जब उच्च तापमान पर गर्म करते हैं तो ताम्र का रंग स्वर्णमय हो जाता है।

  वैज्ञानिकों के अनुसार-----

--- गंगाजल में पारा (मर्करी) विद्यमान होता है जिससे हड्डियों में उपस्थित कैल्शियम और फोस्फोरस पानी में घुल जाता है। जो जलजन्तुओं के लिए एक पौष्टिक तत्व है। हड्डियों में गंधक (सल्फर) होता है जो पारे के साथ मिलकर पारद का निर्माण करता है जो जल में उपस्थित विभिन्न रासायनिक तत्वों, मूलतः क्लोराइड व ब्रोमाइड, आयोडाइड,कार्बन, मेग्नीशियम, पोटेशियम द्वारा औषधीय गुण उत्पन्न करते हैं। मूलतः यह मरकरी सल्फाइड साल्ट (HgS) का निर्माण करते हैं। जल में उपस्थित वायु द्वारा ऑक्सीकृत होने पर पारद पुनः मुक्त हो जाता है। और अस्थियों के रासायनिक विसर्जन यह क्रम चलता रहता है | हड्डियों में बचा शेष कैल्शियम पानी को स्वच्छ रखने का काम करता है।

---- पारा एक तरल पदार्थ होता है और इसे ठोस रूप में लाने के लिए विभिन्न अन्य धातुओं जैसे कि स्वर्ण, रजत, ताम्र सहित विभिन्न जड़ी-बूटियों का प्रयोग किया जाता है। इसे बहुत उच्च तापमान पर पिघला कर स्वर्ण, रज़त और ताम्र के साथ मिला कर, फिर उन्हें पिघला कर आकार दिया जाता है। जो पारद-शिव लिंग बनाने के काम लाया जाता है | ठोस पारद के साथ ताम्र को जब उच्च तापमान पर गर्म करते हैं तो ताम्र का रंग स्वर्णमय हो जाता है। इससे शिवलिंग को "सुवर्ण रसलिंग" भी कहते हैं|

---- पारा अपनी चमत्कारिक और हीलिंग प्रॉपर्टीज के लिए वैज्ञानिक तौर पर भी मशहूर है। मर्क्यूरोक्रोम हीलिंग के लिए प्रयुक्त एक मुख्य रसायन है |

------ पारद को पाश्चात्य पद्धति में उसके गुणों की वजह से फिलोस्फर्स स्टोन भी कहा जाता है। आयुर्वेद में भी इसके कई उपयोग हैं| उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, अस्थमा, डायबिटीज में पारद से बना मणिबंध (ब्रेसलेट ) पहनाया जाता है |



मंगलवार, 3 मई 2016

मैं तुम हम---कुण्डली छंद ....डा श्याम गुप्त ...

                    ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


मैं तुम हम---कुण्डली छंद ..


मैं’ औ ‘तुम’ हैं एक ही, उसके ही दो भाव ,
जो मिलकर बन जाँय ’हम’, हो मन सहज सुभाव |
हो मन सहज सुभाव, सत्य शिव सुन्दर हो जग,
सरल सुखद, शुचि, शांत सौम्य हो यह जीवन मग |
रहें ‘श्याम’ नहिं द्वंद्व, द्वेष, छल-छंद जगत में,
भूल स्वार्थ ‘हम’ बनें एक होकर ‘तुम’ औ ‘में’ ||




तुम मैं प्रभु! हैं एक ही, लोकनाथ हम आप |
बहुब्रीहि हूँ नाथ मैं, आप तत्पुरुष भाव |
आप तत्पुरुष भाव, लोक के नाथ सुहाए ,
लोक हमारा नाथ, नाथ मेरे मन भाये |
खोकर निज अस्तित्व, मुक्ति पाजाऊँ जग में,
मेरा ‘मैं’ हो नष्ट, लीन होजाए तुम में ||



हम तुम मैं वह आप सब उस ईश्वर के अंश,
फिर कैसा क्यों द्वंद्व दें, इक दूजे को दंश |
इक दूजे को दंश, स्वार्थ अपने-अपने रत ,
परमार्थ को त्याग, स्वयं को ही छलते सब |
अपने को पहचान दूर होजायं सभी भ्रम,
उसी ईश के अंश, श्याम’ सब मैं वह तुम हम ||




शुक्रवार, 15 अप्रैल 2016

देवी के नौ रूप अर्थात – नारी के नौ रूप-भाव --डा श्याम गुप्त ....

                                      ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ... 

                                                           


              देवी के नौ रूप अर्थात – नारी के नौ रूप-भाव 

                            नारी को सदा ही आदि-शक्ति का रूप माना जाता है | संसार की उत्पत्ति, स्थिति, संसार चक्र की व्यवस्था, व लय .... सभी आदि-शक्ति का ही कृतित्व होता है | इसी प्रकार समस्त संसार व जीवन-जगत एवं पुरुष जीवन –नारी के ही चारों ओर परिक्रमित होता है | आदि-शक्ति या देवी के ये नौ रूप एवं नौ -दिवस ---वस्तुतः नारी के विभिन्न रूपों व कृतित्वों के प्रतीक ही हैं |

१- शैलपुत्री --- वृषभ वाहिनी –अर्थात ..
---------.नारी बल का प्रतीक है...समस्त प्राणि-जगत व मानव की शक्ति प्रदायक ....पत्नी, माँ, पुत्री, भगिनी, मित्र ...प्रत्येक रूप में नारी- संसार व पुरुष के लिए शारीरिक, मानसिक व आत्मिक बल प्रदायक होती है |

२-ब्रह्मचारिणी --–अष्टकमल आरूढा, श्वेत वस्त्र धारिणी -----
--------- अर्थात नारी विद्या रूप है ---विद्या ही शालीनता, तप, त्याग, सदाचार, संयम समयोचित वैराज्ञ प्रदान करती है, ये सभी नारी-शक्ति के मूल गुण हैं | यह ब्रह्म-ज्ञान है | नारी ही अपने विविध रूपों में मानव को, पुरुष को अष्ट-कमल रूपी विविध ज्ञान से युक्त करके उसे संसार में प्रवृत्त भी करती है-----विरत भी कर सकती है |

३-चंद्रघंटा --- मष्तिस्क पर चन्द्र का घंटा रूप –तीन नेत्र व दस भुजाएं, बाघ के सवारी --- स्वर्ण शरीर ---अर्थात तीनों लोकों दशों दिशाओं में स्थित अपनी त्रिगुणमयी माया –सत्, तम, रज से नियमित संसार चक्र द्वारा-- बलशाली होते हुए भी शान्ति का उद्घोष ----

--------नारी ही समस्त संसार में, पुरुष के मन में, जीवन में शारीरिक, मानसिक व आत्मिक शांति स्थापना द्वारा –ज्ञान का तेज, आयुष्य, आरोग्य, सुख, सम्पन्नता व कल्याण का मार्ग प्रशस्त करती है |


४-कुष्मांडा ---बाघ पर सवार व अष्ट-भुजी --- दुर्गा ..

---------अर्थात ब्रह्माण्ड, ब्रह्म-अंड की सृष्टि --- नारी ही तो सृष्टि की सृष्टा है, जनक, जननी है | मानव व संसार की रक्षा-सुरक्षा हेतु विविध प्रकार के दुर्ग बनाने में सक्षम, समस्त रोग, शोक आदि निवारक होती है |

५-स्कन्द माता--- सवारी कमल एवं सिंह दोनों ....पद्मा व सिंह वाहिनी – समस्त प्रकार का कल्याण | है | ब्रह्म रूप सनत्कुमार को गोद में लिए एवं सूक्ष् रूप में छह सिर वाली देवी भी गोद में |

---------अर्थात नारी पुरुष व संसार के कल्याण हेतु कल्याण हेतु भयानक व दुर्दम्य निर्णय व रूप भी ले सकती है | नारी समस्त जगत व पुरुष की पालक धारक माता भी है | जीवन, जगत व शरीर के षट्चक्रों-विविध क्रियाओं( षटरसों या खटरस—दुनिया के प्रपंच , व्यावहारिक कला, ज्ञान, कर्म ) की नियामक भी है |
६-कात्यायिनी ---पापियों की नाशक –ऋषियों-मुनियों की सहायक, चार भुजा, सिंह सवारी –
---------नारी का सज्जनों व ज्ञानियों के प्रति सदा ही सम्मान, प्रेम-भाव रहता है व उन्हें दुष्ट जनों, पापियों से सदा ही सहायता व संरक्षण उनकी प्राथमिकता होती है |


७-कालरात्रि --- या शुभंकरी –काला शरीर, केश फैले हुए, विकट-स्वरुप, आँखों से अग्नि, अर्धनारीश्वर शिव की तांडव-मुद्रा ... काली रूप ... सदैव शत्रु व दुष्टों की संहारक ...संसार व मानव हेतु कल्याण कारक|

-------नारी का रूप सदैव ही पुरुष व संसार हेतु कल्याणकारी, शुभ कारी ही होता है परन्तु आवश्यकता पडने पर पुरुष, पिता, पुत्र, पति, भ्राता पर आपत्ति आने पर वही – दुष्ट जनों के लिए दुर्गा रूप, काली रूप रख सकती है.. | यही शक्ति का नारी का काली रूप है |

८-महागौरी –तपस्या से गौर वर्ण प्राप्ति, श्वेत बृषभ आरूढा , श्वेत वस्त्र,डमरू-त्रिशूल धारी, अन्नपूर्णा ---
----------अर्थात नारी पुरुष के लिए त्याग, तपस्या, तप सब कर सकती है...पुरुष की, समस्त संसार की पालक-पोषक शक्ति है जिसके लिए वह मान करतीहै , मनाती है , डमरू भी बजाती है और त्रिशूल का भय भी दिखाती है | पुरुष व मानव के हर वय के, जीवन के हर स्तर पर वही तो अन्नपूर्णा है जो हर प्रकार का धन, वैभव सुख, शान्ति प्राप्ति में सहायक है |

९-सिद्धिदात्री --- कमलासन पर,सुदर्शनचक्र, गदा, कमाल,शंख धारी , सरस्वती रूप श्वेत-वर्ण, महाज्ञान सहित सौम्य भाव , मधुर स्वर | विष्णु के ही अनुरूप संसार के समस्त चक्रीय-व्यवस्थाओं की नियामक.... |
---------अर्थात नारी ही तो पुरुष के, जगत के, संसार के समस्त व्यवस्थाओं की नियामक होती है ...वही तो पुरुष को ज्ञान, कर्म व भक्ति रूपी समस्त सिद्धि-प्रसिद्धियों को प्राप्त करने में सहायक होती है, सम्पूर्ण जीवन तत्व व सम्पूर्ण सिद्धि...मोक्ष में सहायक होती है|


---------यदि हम इन नवरात्र में नारी के हर वय-रूप की उपेक्षा, उस पर अन्याय, अनाचार, अत्याचार के विरुद्ध अपने सोच, विचार, समर्थन व यथासंभव कदम उठाने हेतु व प्रयत्न करने का निश्चय करें, यही देवी की सच्ची आराधना होगी |
चित्र---१.-महालक्ष्मी --एवं त्रिदेव -आदियुग  .......२.दुर्गा-नवरूप



बुधवार, 6 अप्रैल 2016

माँ चन्द्रिका देवी धाम-लखनऊ ---डा श्याम गुप्त

           
                                        
                     ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



    माँ चन्द्रिका देवी धाम-लखनऊ 


                    लखनऊ-नई दिल्ली नेशनल हाईवे-24-सीतापुर रोड  स्थित बख्शी का तालाब कस्बे से 11 किमी आगे सड़क पर चन्द्रिका देवी तीर्थधाम है। गोमती नदी के समीप स्थित महीसागर संगम तीर्थ के तट पर एक पुरातन नीम के वृक्ष के कोटर में माँ दुर्गा के नौ रूपों के साथ उनकी वेदियाँ चिरकाल से सुरक्षित रखी हुई हैं। जो पत्थर की  पिंडियों के रूप में स्थित हैं|

               अठारहवीं सदी के पूर्वार्द्ध से यहाँ माँ चन्द्रिका देवी का भव्य मंदिर बना हुआ है। अमीर हो अथवा गरीब, अगड़ा हो अथवा पिछड़ा, माँ चन्द्रिका देवी के दरबार में सभी को समान अधिकार है। मेले आदि के व्यवस्थापक कठवारा गाँव के प्रधान होते हैं। महीसागर संगम तीर्थ के पुरोहित और यज्ञशाला के आचार्य ब्राह्मण। माँ के मंदिर में पूजा-अर्चना पिछड़ा वर्ग के मालियों द्वारा तथा पछुआ देव के स्थान (भैरवनाथ) पर आराधना अनुसूचित जाति के पासियों द्वारा कराई जाती है। यह समभाव का एक समेकित उदाहरण है।
चन्द्रिका देवी धाम की तीन दिशाओं उत्तर, पश्चिम और दक्षिण में गोमती नदी की जलधारा प्रवाहित होती है तथा पूर्व दिशा में महीसागर संगम तीर्थ स्थित है। जनश्रुति है कि महीसागर संगम तीर्थ में कभी भी जल का अभाव नहीं होता और इसका सीधा संबंध पाताल से है।

    मान्यताओं के अनुसार – मूलतः कूर्म पुराण  एवं स्कन्द पुराण में इनका वर्णन है |
-----सतयुग में दक्ष प्रजापति के श्राप से प्रभावित चन्द्रमा को श्राप मुक्ति हेतु इसी महीसागर संगम तीर्थ के जल में स्नान करने के लिए चन्द्रिका देवी धाम में आना पड़ा था।
-------त्रेता युग में लक्ष्मणपुरी (लखनऊ) के अधिपति लक्ष्मण-उर्मिला पुत्र चन्द्रकेतु को चन्द्रिका देवी धाम के तत्कालीन इस वन क्षेत्र में अश्वमेध यज्ञ के घोड़े के साथ गोमती पार करते हुए अमावस्या की अर्धरात्रि में जब भय व्याप्त होने लगा तो उन्होंने अपनी माता द्वारा बताई गई नवदुर्गाओं का स्मरण किया और उनकी आराधना की। तब चन्द्रिका देवी की चन्द्रिका ( उजली चांदनी रात ) के आभास से उनका सारा भय दूर हो गया था।
------उन्होंने एक भव्य मंदिर की स्थापना की जो १२वी सदी में विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा नष्ट कर दिया गया था |
द्वापर में महाभारतकाल में पाँचों पाण्डु पुत्र द्रोपदी के साथ अपने वनवास के समय इस तीर्थ पर आए थे। महाराजा युधिष्ठिर ने अश्वमेध यज्ञ कराया जिसका घोड़ा चन्द्रिका देवी धाम के निकट राज्य के तत्कालीन राजा हंसध्वज द्वारा रोके जाने पर युधिष्ठिर की सेना से उन्हें युद्ध करना पड़ा, जिसमें उनका पुत्र सुरथ सम्मिलित हुआ था| महाराजा युधिष्ठिर की सेना अर्थात कटक ने यहाँ वास किया तो यह गाँव कटकवासा कहलाया। आज इसी को कठवारा कहा जाता है।
------स्कन्द पुराण के अनुसार द्वापर युग में श्री कृष्ण के परामर्श पर घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक ने अपार शक्ति प्राप्त हेतु माँ चन्द्रिका देवी धाम स्थित महीसागर संगम में तप किया था।
-------आज से लगभग २५० वर्ष पहले यह एक घना वन था | यहाँ के कठवारा गाँव के जमींदार को स्वप्न में चंद्रिका देवी के दर्शन हुए | उन्होंने वर्त्तमान मंदिर की स्थापना की एवं अमावस्या के दिन मेले की व्यवस्था प्रारम्भ की जो आज तक चली आरही है |

इस सिद्धपीठ धाम में बर्बरीक द्वार, सुधन्वा कुण्ड, महीसागर संगम तीर्थ के घाट आदि आज भी दर्शनीय हैं।
-------- वस्तुतः यह प्रागैतिहासिक युग की सप्तमातृकाओं का मंदिर –चंडिका देवी मंदिर है | बृक्ष के कोटर में ध्यान से देखने पर सात पिंडियाँ दिखाई देती हैं, शेष रूप नव-निर्मित हैं | ये चंडी या चंडिका ( नारसिंही ) के नाम से प्रसिद्ध आदिशक्ति अम्बिका दुर्गा ने --रक्तबीज के विरुद्ध सप्त-मातृकाओं के रूप के साथ युद्ध किया था जो वैष्णवी, कुमारी, महेश्वरी, ब्रह्माणी, वाराही, एन्द्री (महेंद्री या शची, वज्री ), चामुन्डा ( चर्चिका या काली ) हैं|
------मही सागर तीर्थ --एक पाताल तोड़ कुआँ -- आर्टीजीयन कुआं है ..जिसका आतंरिक जुड़ाव गौमती से हो सकता है ...
---------गौमती नदी स्वयं भारत की एकमात्र नदी है जो हिमालय की बजाय स्वयं एक पातालतोड कुए से उद्भूत होती है --आदि-गंगा है |
चित्र-१.चंद्रिका देवी मुख्य दर्शन ...२.बाहरी द्वार --मुख्य सीतापुर हाईवे , बक्शी का तालाब पर ...मही सागर तीर्थ में भगवान शिव ...४. मही सागर तीर्थ ...५. मंदिर का द्वार
 
 
 Drshyam Gupta's photo.



Drshyam Gupta's photo.

बुधवार, 23 मार्च 2016

आशियाना परिवार होली २३-३-१६ ...आशियाना, लखनऊ -- डा श्याम गुप्त...


                      ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ..

.
                                                 
आशियाना परिवार होली २३-३-१६ ...आशियाना, लखनऊ --


१. राधा कृष्ण पर फूलों से होली वर्षा करती हुई सुषमा गुप्ता ...२.राधा -कृष्ण के साथ सुषमा व नीलम का नृत्य ....३.डा श्याम गुप्त .....४.राधा-कृष्ण के साथ सुषमा व अन्य का होली नृत्य ....५. राधा-कृष्ण का माल्यार्पण ---सुषमा गुप्ता

 Drshyam Gupta's photo.

मंगलवार, 22 मार्च 2016

कैसे रंगे बनवारी---डा श्याम गुप्त ...

.                                 

                                                

                          



कैसे रंगे बनवारी


सोचि सोचि राधे हारी, कैसे रंगे बनवारी
कोऊ तौ न रंग चढ़े, नीले अंग वारे हैं |
बैजनी बैजन्तीमाल, पीत पट कटि डारि,
ओठ लाल लाल, श्याम, नैन रतनारे हैं |
हरे बांस वंशी हाथ, हाथन भरे गुलाल,
प्रेम रंग सनौ कान्ह, केस कजरारे हैं |
केसर अबीर रोली, रच्यो है विशाल भाल,
रंग रंगीलो तापै मोर-मुकुट धारे हैं ||

चाहे कोऊ रंग डारौ, चढिहै न लालजू पै,
क्यों न चढ़े रंग, लाल, राधा रंग हारौ है |
राधे कहो नील-तनु, चाहें श्यामघन सखि,
तन कौ है कारौ पर, मन कौ न कारौ है |
जन कौ दुलारौ कहौ, सखियन प्यारौ कहौ ,
तन कौ रंगीलौ कहौ, मन उजियारौ है |
एरी सखि! जियरा के प्रीति रंग ढारि देउ,
श्याम रंग न्यारो चढ़े, सांवरो नियारो है ||