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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

सोमवार, 6 जून 2011

सरकार, कान्ग्रेस , बावा रामदेव पर लाठी चार्ज व भ्रष्टाचार....

                                                          ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...                                            
                                    सरकार के मन्त्री गण लगातार कह रहे हैं कि बाबा के पीछे आर एस एस, भा ज पा हैं , बाबा तो मुखौटा है इसके पीछे साम्प्रदायिक पार्टियों का एजेन्डा है----
 -----किसने कन्ग्रेसियों को यह अधिकार दिया कि देश की एक राष्ट्रीय पार्टी को साम्प्रदायिक कहा जाय.....क्या हिन्दुत्व व भगवा रन्ग ही साम्प्रदायिकता का प्रतीक है...तो सारा भारत साम्प्रदायिक है.....सभी मन्दिर-मठ- धार्मिक स्थलों पर यही झन्डा होता है.....यह सारे हिन्दुस्तान का ही नहीं......दर्शन, धर्म, शान्ति, आनन्द का रंग है.....विश्व की शान्ति का रंग है...
----यदि एक अच्छे कार्य के लिये देश की राष्ट्रीय पार्टी किसी के समर्थन में है तथा  विभिन्न धर्म के लोग भी साथ हैं ...( ईसाई नही थे, कोई पादरी नहीं था -जो दुर्भाग्य की बात है )  तो इसे देश व समाज का सौभाग्य कहा जायगा........क्या इससे कन्ग्रेस व मौजूदा सरकार को कोई परेशानी है...
----- तो क्या सिर्फ़ इसीलिये बच्चों स्त्रियों को मारा-पीटा गया कि वे भगवा रंगधारी के समर्थन में क्यों दिल्ली आये...
                            कौन देगा इसका उत्तर....?????

रविवार, 5 जून 2011

श्याम लीला -६... होली..... डा श्याम गुप्त...

                                                                            ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
होली सब क्यों खेलते, अपने अपने धाम ,
साथ साथ खेलें अगर,  होली सारा गाँव  |
होली सारा गाँव,ख़त्म हो तना-तनी सब,
गली डगर चौपाल, हर जगह होली हो अब |
निकले राधा -श्याम, ग्वाल, गोपी मिल टोली ,
गली गली और गाँव गाँव में खेलें  होली ||

होली की इस धूम में मचें विविधि हुड़दंग ,
केसर और अबीर संग,उडें चहुँ तरफ रंग |
उड़ें चहुँ तरफ रंग, मगन सब ही नर नारी ,
बढे  एकता-भाव,  वर्ग समरसता  भारी |
बिनु खेले नहिं रहें, बनें  सब ही हमजोली ,
जन जन प्रीति बढ़ाय, सभी मिलि खेलें होली ||


शुक्रवार, 3 जून 2011

एक नियम है इस जीवन का.....कविता..डा श्याम गुप्त ....

....                                                                            .. कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

एक नियम है इस जीवन का,
जीवन का कुछ नियम नहीं है ।
एक नियम जो सदा-सर्वदा,
स्थिर  है,  परिवर्तन  ही  है ॥

पल पल, प्रतिपल  परिवर्तन का,
नर्तन  होता  है  जीवन  में  |
जीवन की  हर डोर  बंधी है,
प्रतिपल नियमित परिवर्तन में ||

जो कुछ  कारण-कार्य  भाव है,
सृष्टि, सृजन ,लय, स्थिति जग में |
नियम व अनुशासन,शासन सब,
प्रकृति-नटी  का  नर्तन  ही है ||

विविधि भाँति की रचनाएँ सब,
पात-पात  औ  प्राणी-प्राणी  |
जल थल वायु उभयचर रचना ,
प्रकृति-नटी का ही कर्तन है ||

परिवर्धन,अभिवर्धन हो या ,
संवर्धन हो या फिर वर्धन |
सब में गति है, चेतनता है,
मूल भाव परिवर्तन ही है |

चेतन ब्रह्म, अचेतन अग-जग ,
काल हो अथवा ज्ञान महान |
जड़-जंगम या जीव सनातन,
जल द्यौ वायु सूर्य गतिमान ||

जीवन  मृत्यु  भाव  अंतर्मन,
हास्य, लास्य के विविधि विधान |
विधिना के विविधान विविधि-विधि,
सब परिवर्तन की मुस्कान  ||

जो कुछ होता, होना होता ,
होना  था  या  हुआ नहीं है |
सबका नियमन,नियति,नियामक .
एक नियम परिवर्तन ही है ||

बुधवार, 1 जून 2011

भ्रष्टाचार का महाकारण -- डा श्याम गुप्त

                                                                         ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

                         शूद्र ( सामान्य जन,प्रजा ) व वैश्य ( व्यापारी वर्ग आदि ) मूलतः कर्म करने वाले वर्ग होते हैं , क्षत्रिय ( राजा व शासक गण) उन पर नियमन के लिए होते हैं , ब्राह्मण  ( विद्वत्जन, विज्ञजन , साहित्यकार , विद्वान, पंडित , विशेषज्ञ वर्ग ) अपने साहित्य, उपदेश, ज्ञान, ग्रंथों , शास्त्रज्ञान आदि द्वारा परामर्श के रूप में राजा व अन्य दोनों पर नियमन के लिए होते हैं |   यद्यपि आधारभूत आदर्श व्यवस्था में किसी भी व्यक्ति को अनाचरण, भ्रष्ट आचरण का अधिकार नहीं है परन्तु व्यवहारिक रूप में मूलत:सामान्य  जन-मानस में स्वलाभ हित भ्रष्ट-आचरण में लिप्त होने की प्रवृत्ति होती है  जो व्यापारी वर्ग व तदाधारित राज्य व शासन कर्मियों में  भ्रष्टाचार लिप्त होने की प्रवृत्ति उत्पन्न करती है | परन्तु विज्ञजनों का ही यह कर्तव्य होता है कि वे अपने शुद्ध आचरण , निडर रूप परामर्श से समाज को भटकाव से बचाएं | परन्तु जब यही वर्ग स्वयं  भय, लालच या अज्ञान वश  असत्याचरण , असत्य संभाषण , उदासीनता, अचिन्त्य-भाव  को ग्रहण कर लेते हैं तो भ्रष्टाचार , भ्रष्ट आचरण व अनैतिक आचरण अनियंत्रित होकर  अपने चरम पर पहुँच जाता है |
              अतःआज  भ्रष्टाचार,व् भ्रष्ट आचरण का एक महा कारण है विद्वत जनों का अपने कर्तव्य के प्रति अचिन्त्यनीय व  उदासीन होजाना | आज समाज के प्रत्येक क्षेत्र में विद्वान् लोग, शीर्षस्थ लोग, साहित्यकार, अनुभवी विज्ञजन सभी अपने स्वलाभ हित असत्याचरण व असत्य-भाषण में संलग्न हैं |  सभी स्वार्थ रत, स्वार्थ-हित हांजी..हांजी वाली स्थिति अपनाए हुए हैं | कोइ भी स्वहानि भय के सामान्य जन, शासन-प्रशासनिक अधिकारियों, राजनेताओं, मंत्रियों से , उनके कार्य- क्रिया-कलाप, गुणावगुण , अपराध, भ्रष्टाचार के बारे में सत्य नहीं कहना चाहता| कोइ बुरा नहीं बनाना चाहता ------सब मीठा-मीठा बोलकर अपना हित साधन करना चाहते है, सामान्य जन व राज्य में यह प्रवृत्ति व्यवहारिक रूप से होती है.... परन्तु ब्राह्मण वर्ग में नहीं -----
 " सचिव,वैद्य, गुरु तीन जब प्रिय बोलहिं भय आस ,
    राज्य , धर्म  और  देह कर,  होइ  शीघ्र  ही नाश |"    ----यही स्थित बनती जारही है | समाज  के प्रत्येक विद्वत-वर्ग में यही उदासीनता है ..हमें क्या , हम क्यों करें, कोइ मानता ही नहीं , व्यवस्था ही ऐसी है--जबकि व्यवस्था स्वयं मनुष्य बनाता है नकि मनुष्य को व्यबस्था बनाती है....हाँ यह एक चक्रीय व्यवस्था हो सकती है परन्तु उसका कारण भी मनुष्य स्वयं ही होता है  ....शिक्षा , चिकित्सा, विज्ञान, राजनीति,न्याय, पत्रकारिता ,अभियांत्रिकी, सांस्कृतिक-क्षेत्र ...सभी में विद्वत्जन सत्य बोलकर बुरा नहीं बनना चाहते अतः जनता को राज्य को शासन को उचित व् सत्य परामर्श प्राप्त न होने से सब उसी ढर्रे पर चलने को मज़बूरपर हैं |  प्रेक्टिस कम होने के डर से चिकित्सक, वकील, कमाई न होने के भय से इंजीनियर व  स्थानान्तरण - कनिष्ठ पद मिलने के भय से सचिव स्तर के लोग , काम व नाम न मिलने के भय से कला क्षेत्र के गुरु ...गलत लोगों का , गलत तथ्यों का, गलत नियमों का , भोंडे-अतार्किक, अश्लील कृतियों व भ्रष्ट लोगों का साथ देते देखे जा सकते हैं | सिनेमा व दूरदर्शन के कृत्यों  को तो सभी जानते हैं
               साहित्य , जो अनुभव व ज्ञान का , इतिहास होता है | विद्व्वत्जनों में शीर्ष स्थान पर  होता है, समाज के प्रत्येक क्षेत्र का नियामक होता है ...वहां भी यही स्थिति है |  मूर्खतापूर्ण, भ्रमात्मक साहित्य, एकांगी व  समाज-साहित्य   को  विषयों के टुकड़ों में बांटता  साहित्य, भोंडे हास्य साहित्य, प्रतिदिन के समाचार दर्शाती काव्य-कृतियाँ जिनमें किसी  समाधान का ज़िक्र नहीं , पैसे चुकाकर खरीदे जाते सम्मान, बड़े बड़े पुरस्कार,  पीत-पत्रकारिता,  सुरा-सुन्दरी के हित साहित्यिक भ्रष्टाचार |  ब्लॉग पर मुफ्त लेखन की सुविधा से तो तमाम चिट्ठों की बाढ़ आगई है , हर एरा-गेरा ..पत्रकार.. लेखक बन गया है...हर कोइ अपने दर्शन -अदर्शन को  विना किसी शास्त्रीय उदाहरण , साहित्यिक उदाहरण झाडं रहा है और अन्य लेखक गण , विज्ञ जन...विना सोचे समझे वाह वाह की .. असत्य .. टिप्पणियाँ झाड रहे हैं |  कोइ कमल को रात में खिलाने लगता है तो कोइ दुःख को ही दुःख का कारण बताने लगता है...और विज्ञ जन ऐसे आलेखों ..कविताओं पर  आलोचना की बजाय बिना सोचे समझे वाह  वाह की टिप्पणियाँ भेजते रहते हैं ...कौन बुरा बने...कौन पचड़े में पड़े....सबसे मीठा -मीठा बोलो , कटु सत्य क्यों बोलो .....,   सिर्फ घटनाओं व् समाचार पत्रों के समाचार ही  आप कई कई ब्लोगों पर देख-पढ़ सकते हैं जो अनावश्यक हैं |  कोइ एक महिला ब्लोगर  कोइ घिसा-पिटा  विषय पर चार पंक्तियाँ लिख देती है तो १०१ कमेंट्स ...यह .....असत्याचरण है--विज्ञ जनों का भ्रष्ट-आचरण है ---जबकि सब को जानना चाहिए क़ि---
सत्यं ब्रूयात , प्रियं ब्रूयात , मा ब्रूयात सत्यमप्रियं |
असत्यं च नान्रतं ब्रूयात , एत  धर्म   सनातनम  ||-----  यह चरम पतन की स्थिति है  और आचरण के भ्रष्ट होने का सबसे बड़ा कारण............


मंगलवार, 31 मई 2011

इन्द्रधनुष -----कहानी---- डा श्याम गुप्त ...

                                                                                     ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ.
( 'न्द्नुष'--- विभिन्न स्थितियों व भावों में आपके सामने रहता है सदा .....आसमान पर वर्षा की बूंदों में, फुब्बारों में, सुन्दरी की नथ के- कानों के लटकन के हीरों में,  देवालयों के झूमरों के शीशों में,  सपनों में, यादों में ---मन को तरंगित प्रफुल्लित करता हुआ ....पर आप उसे  छू नहीं सकते .....ऐसा ही एक इन्द्रधनुष यहाँ प्रस्तुत है---स्त्री-पुरुष मित्रता का  ...)
  

सुमि, तुम ! 

के.जी. ! अहो भाग्य ,क्या तुमने आवाज़ दी ?

नहीं |
मैंने भी नहीं | फिर ?
हरि इच्छा , मैंने कहा |
वही खिलखिलाती हुई उन्मुक्त हंसी |
चलो , वक्त मेहरवान तो क्या करे इंसान | कहाँ जाना है, सुमि ने पूछा |
मुम्बई, 'राशी' की कोंफ्रेंस है | और तुम ?
मुम्बई,पी जी परीक्षा लेने | मेडिकल कालेज के गेस्ट हाउस में ठहरूंगी , और तुम |
मेरीन -ड्राइव पर |

सागर तीरे !... पुरानी आदत  गयी नहीं !
नहीं भई, रेस्ट हाउस है, चर्च गेट पर | चलो तुम्हारे साथ मेरीन-ड्राइव पर घूमने का आनंद लेंगे, पुरानी यादें ताजा करेंगे | रमेश कहाँ है ?
दिल्ली, बड़ा सा नर्सिंग होम है, अच्छा चलता है |
और फेमिली ?
बेटा एम् बी बी एस कर रहा है, बेटी एम् सी ऐ ; बस |
सुखी हो |
बहुत, अब तुम बताओ |
एक प्यारी सी हाउस मेनेजर पत्नी है, सुभी.... सुभद्रा |  बेटा बी टेक कर रहा है और बेटी एम् बी ऐ |
और कविता ?
वो कौन थी !  तीसरी तो कोई नहीं ?
तुम्हें याद है अभी तक वो पागलपन |
एक संग्रह छपा है, ...'तेरे नाम '....
मेरे नाम !
 नहीं,  ’तेरे नाम '....
ओह !, मेरे नाम क्या है उसमें ?
सुबह देखलेना |
            चलो सोजाओ, सुबह बातें होंगीं, फ्री-टाइम में मेरीन-ड्राइव घूमना है, बहुत सी बातें करनीं हैं तुम्हारे साथ |
राजधानी एक्सप्रेस तेजी से भागी जारही थी|  सामने बर्थ पर, सुमित्रा कम्बल लपेट कर सोने के उपक्रम में थी और मेरी कल्पना यादों के पंख लगाकर बीस वर्ष पहले के काल में काल में गोते लगाने लगी |
                                 **                                            **
                  सुमित्रा कुलकर्णी, कर्नल कुलकर्णी की बेटी, चिकित्सा विश्वविद्यालय में मेरी सहपाठी, बैच-पार्टनर, सीट-पार्टनर ;  सौम्य, सुन्दर ,साहसी, निडर, तेज-तर्रार, स्मार्ट, वाक्-पटु, सभी विषयों में पारंगत, खुले व सुलझे विचारों वाली, वर्तमान में जीने वाली, मेरी परम मित्र |  हमारी प्रथम मुलाक़ात कुछ यूं हुई ......
                   रात के लगभग ९ बजे, लाइब्रेरी से बाहर आया तो सुमित्रा आगे आगे चली जारही थी, अकेली |  मैंने तेजी से उसके साथ आकर चलते चलते पूछा, अरे इतनी रात कहाँ से ? रास्ता सुनसान है, तुम्हें डर नहीं लगेगा,  क्या होस्टल छोड़ दूं ?
  वेरी फनी !, डर की क्या बात है !

 ओ के,  वाय, गुड नाईट, मैंने कहा  और चलदिया |
 थैंक्स गाड, जल्दी पीछा छूटा, वह बड़ बडाई |
सात कदम तो साथ चल ही लिए हैं, मैंने मुस्कुराते हुए कहा |
क्या मतलब, वह झेंप कर देखने लगी,  तो मैंने पुनः  'बाय' कहा और चल दिया |
                अगले दिन   फिजियो लेब में सुमित्रा झिझकते हुए बोली, कृष्ण जी, ये मेंढ़क ज़रा 'पिथ' कर देंगे ?
क्यों , मैंने पूछा ?
ज़िंदा है अभी |
तो क्या मरे को मारोगी, हाँ ये बात और है कि, "सुन्दर सुन्दर को क्यों मारे , सुन सुन्दर मेंढक बेचारे |",  बगल की सीट पर बैठा सोम सुन्दरम हंसने लगा | मैंने मेंढक हाथ में लेते हुए कहा, 'ब्यूटीफुल ' |
कौन, क्या ?
ऑफकोर्स, मेंढक, मैंने कहा ; सुन्दर है न ?
 'लाइक यू' | वह चिढ कर बोली |
मैं तुम्हें सुन्दर लगता हूँ |
नो , मेढक, वह मुस्कुराई

इसकी टांगें कितनी सुन्दर हैं, मैं टालते हुए बोला, चीन में बड़ी लज़ीज़ समझकर से खाईं जातीं हैं |
ओके, पैक करके रख दूंगी, घर लेजाना डिनर के लिए |
तुम्हारी टांगें भी सुन्दर हैं, लज़ीज़ होंगी, क्या उन्हें भी .....|
व्हाट द हेल.. ?  (क्या बकवास है)
जो दिख रहा है वही कह रहा हूँ | 
हूँ... , वह पैरों की तरफ सलवार व जूते देखने लगी |
एक्स रे निगाहें हैं... आर पार देख लेतीं हैं, मैंने कहा |
क्या, वह हडबड़ा कर दुपट्टा सीने पर संभालते हुए, एप्रन के बटन बंद करने लगी | मैं हंसने लगा तो, सिर पकड़ कर स्टूल पर बैठ गयी बोली, चुप करो, मेंढक लाओ, मुझे फेल नहीं होना है |
लो क़र्ज़ रहा,मैंने मेंढक लौटाते हुए कहा | वह चुपचाप अपना प्रक्टिकल करने लगी |
                                         **                         **                        ** 
                    डिसेक्सन हाल में मैंने उससे पूछा , सुमित्रा जी, सियाटिक नर्व को कहाँ से निकाला जाय, दिमाग से ही उतर गया है |  'है भी ..' उसने हाथ से चाकू लगभग छीन कर चुपचाप चीरा लगा कर फेसिया तक खोल दिया | बोली आगे बढूँ या....|   अभी के लिए बहुत है मैंने कहा --

              ""आपने चिलमन ज़रा सरका दिया | हमने जीने का सहारा पालिया । ""
सुमित्रा चुपचाप अपने प्रेक्टिकल में लगी रही | बाहर आ कर बोली --
कृष्ण जी, उधार बराबर |
' और व्याज ' मैंने कहा |
सूद !, वह आश्चर्य से देखने लगी |
वणिक पुत्र जो ठहरा |
क्या सूद चाहिए !
             चलो, दोस्ती करलें | काफी पीते हैं, मैंने कहा तो वह सीने पर हाथ रख कर बोली, ओह !, ठीक है, मेरा तो नाम ही सुमित्रा है, दोस्ती करती है तो करती है, नहीं तो नहीं |   

निभाती भी है, मैने पूछा तो बोली, ’इट डिपेन्ड्स’ । 
             केबिन में बैठकर मैंने उसका हाथ छुआ तो कहने लगी, उंगली पकड़ कर हाथ पकड़ना चाहते हैं, एसे तो तुम नहीं लगते|  आशाएं विष की पुड़ियाँ होतीं हैं, बचे रहना |
             सुमित्रा जी, मैंने कहा, 'मैं नारी तुम केवल श्रृद्धा हो'  के साथ पुरुष सम्मान,व नारी समानता दोनों का समान पक्षधर हूँ |  वादा- जब तक तुम स्वयं कुछ नहीं कहोगी, कुछ नहीं चाहूंगा |  स्मार्ट, आत्म विश्वास से भरपूर, मर्यादित नारी की छवि का में कायल हूँ |
            ब्रेवो ,ब्रेवो ! वाह ! क्या बात है, पर ये भाषण तो मुझे देना चाहिए और... ये विचित्र से विचार तो कहीं सुने -पढ़े से लगते हैं,  कृष्ण गोपाल !   हूं, वही तर्क,वही उक्तियाँ, नारी -पुरुष समन्वय, शायरी |  क्या तुम के. जी. के नाम से  'नई आवाज़'  में लिखते हो ?  तुम के जी हो !  उसकी तीब्र बुद्धि का कायल होकर मैं हतप्रभ रह गया और आँखों में आँखें डाल कर मुस्कुराया |
           वह हंसी, एक उन्मुक्त हंसी | कमीज़ की कालर ऊपर उठाने वाले अंदाज़ में बोली, ये हम हैं, उड़ती चिड़िया के पर गिन लेते हैं |  "आई एम् इम्प्रेस्सेड "...  मैं तो केजी की फ़ैन हूँ | कोई कविता हो जाय | वह गालों पर हथेली रखकर श्रोता वाले अंदाज़ में कोहनी मेज पर टिका कर बैठ गयी |   मैंने सुनाया----
" मैंने सपनों में देखी थी , इक मधुर सलोनी सी काया |" ......

" तुमको देखा मैंने पाया यह तो तुम ही थीं मधुर प्रिये |" -----वाह , वह बोली , मैं सुखानुभूति से भरी जारही हूँ, कृष्ण | वह मेरा हाथ पकडे बैठी रही |
      तो दोस्ती पक्की , मैंने पूछा , तो कहने लगी, हूँ ..,अद्भुत तर्क,ज्ञान वैविध्य, विना लाग लपेट बातें, मनको छूतीं हैं कृष्ण; और तुम्हें ...|
     हाँ ,तुम्हारा आत्म विश्वास, सुलझे विचार,वेबाक बातें, काव्यानुराग मुझे पसंद हैं सुमित्रा | वह अचानक सतर्क निगाहों से बोली, कहीं पहली नज़र में प्यार का मामला तो नहीं !   शायद ... और तुम....मैंने पूछा ; तो बोली पता नहीं,  नहीं कर सकती, दोस्त ही रहूँगी, मज़बूर हूँ |
   क्यों मज़बूर हो भई |
   दिल के हाथों, के जी जी | तुम पहले क्यों नहीं मिल, मैं वाग्दत्ता हूँ | रमेश को बहुत प्यार करती हूँ | शादी भी करूंगी |
   ये रमेश कौन भाग्यवान है, मैंने पूछा तो बोली, मेरा पहला प्यार, हम एक दूसरे को बहुत चाहते हैं |  दिल्ली में एम बी बी एस कर रहा है, बहुत प्यारा इंसान है ...... और मैं ...., जब मैंने पूछा तो ख्यालों से बाहर आती हुई बोली, तुम ..तुम हो, अप्रतिम, समझलो राधा के श्याम, और मैं.... तुम्हारी काव्यानुरागिनी | समझे, वह माथे से माथा टकराते हुए बोली |
अब मैं सुखानुभूति से पागल ह़ा जारहा हूँ ,सुमि |
साथ छोड़कर भागोगे तो नहीं |
  नहीं, मैंने कहा, " मैं यादों का मधुमास बनूँ , जो प्रतिपल तेरे साथ रहे ",  तो हंसने लगी.... क्या देवदास बन जाओगे ?  अरे नहीं, मैंने कहा,  क्या मैं इतना बेवकूफ लगता हूँ ?  

  उसने कहा---" मन से तो मितवा हम हो गए हैं तेरे, क्या ये काफी नहीं है तुम्हारे लिए"  और पूछने लगी --- मेरी कविता कैसी है महाकवि के जी ?   मैंने कहा,' आखिर शिष्या किसकी बनी हो |',  हम दोनों ही हंस पड़े, फिर अचानक चुप होगये |
                              **
                                    **                        **      
                      कालेज डे मनाया जाना था|   सुमित्रा तेज तेज चलते हुए आई, बोली - कृष्ण! एक गीत बनाना है और तुम्हीं को गाना है |  मैं नृत्य में अपना नाम दे रही हूँ..... पर मुझे गाना कहाँ आता है, मैंने बताया |   किसी अच्छे गायक को लो न |   नहीं नहीं, वह बोली ज्यादा लोगों को मुंह क्या लगाना, सब तुम्हारे जैसे सुलझे थोड़े ही होते हैं,  वह सर हिलाकर बोली |
            रिहर्शल पर मैंने अपना पार्ट सुनाया -

"तुम स्यामल घन , तुम चंचल मन ,तुम जीवन हो तुमसे जीवन |
तेरी प्रीति की रीति पै मितवा, मैं गाऊँ मैं बलि बलि जाऊं ||"
         सुमित्रा ने सुनाया ----

"तेरे गीतों की सरगम पै, मस्त मगन मैं नाचूं गाऊँ |
तेरी प्रीति की रीति पै मितवा, बनी मोहिनी मैं लहराऊँ || "
             सुमि ने कई बार गा-गा कर बताया, डांस पहले स्लो रिदम पर फिर मध्यम पर अंत में द्रुत पर करूंगी, अंतरा  इस तरह  आदि आदि |   प्रोग्राम बहुत अच्छा रहा।  सुमि नाराज़ होते हुए बोली, बड़े खराब हो के जी, मनही मन मज़ाक बना रहे होगे |  तुम तो बहुत अच्छा गा लेते हो, लगता था जैसे पंख लग गए हों, आज मैं बहुत बहुत बहुत खुश हूँ |  पर ये  "श्यामल घन ".......!  मेरा मजाक तो नहीं उड़ा रहे, वह खुल कर हंसने लगी |
     नहीं जी, श्याम सखी, द्रौपदी, अप्रतिम सुन्दरी, भी कोई बहुत गौर वर्णा नहीं थी |
    मुझे द्रौपदी कह रहे हो ?  मैंने कहा, नहीं भई,  पर क्या द्रौपदी पर कोई शंका है तुम्हें ? तो हंसने लगी, -बोली, नहीं के जी जी, तुम्हारी बात तो बैसे ही सटीक बैठती है,  मैं भी खुद को द्रौपदी कहती हूँ |   मेरे भी पांच पति हैं |  मैंने उसे आश्चर्य से देखा तो बोली -पति क्या है ?  जो पत रखे, पतन से बचाए | शास्त्र बचन है --" यो  सख्यते  रक्ष्यते पतनात इति सः पति ".......
   किस शास्त्र का है, मैंने पूछा | मेरे शास्त्र का, वह हंसकर बोली, मैंने भी हंसकर कहा, तब ठीक है, और पांच पति ?
   जो पतन से बचाए, शास्त्र व माता पिता के बचन, मेरी अपनी शिक्षा- दीक्षा, मेरा चरित्र व आचरण, रमेश, और .ररर ......तुम |  मैं चुप अवाक ... तो बोली, चकरा गए न ज्ञानी ध्यानी, फिर खिलखिलाकर भाग खडी हुई |
                     **                              **                             **  
               धीरे धीरे जब चर्चाएँ गुनगुनाने लगीं तो एक दिन सुमि बोली, डोंट वरी (कोई चिंता नहीं).. के जी | कोई सफाई नहीं, भ्रम में जीने दो सभी को | लगभग सभी बड़ी बड़ी डिग्रियां लेकर अर्थ पुजारी बनने वाले हैं | प्रेम, मित्रता, दर्शन, जीवन-मूल्य, परमार्थ; सब व्यर्थ हैं इनके लिए |  शायद मैं कुछ मतलवी होरही हूँ,  तुम्हें यूज़ कर रही हूँ |  तुम्हारे साथ रहते कोई और तो लाइन मारकर बोर नहीं करेगा |  मैंने प्रश्न वाचक निगाहों से देखा तो पूछ बैठी --
    'कोई भ्रम या अविश्वास तो नहीं लिए बैठे हो मन ही मन | ', 

     कभी एसा लगा, मैंने पूछा | उसके नहीं कहने पर मैंने कहा, तो सुनो ---
" ये चहचहाते परिंदे, ये लहलहाते फूल, अपनी मुख़्तसर ज़िंदगी मैं इतने ग़मगीन तो नहीं होते कि खुदकुशी कर लें "
       वाउ ! मीना कुमारी पढ़ रहे हो आज कल ...... नहीं अभी तो सुमित्रा कुमारी पढ़ रहा हूँ, मैंने हंसकर कहा तो बोली ........ तो सुनो सुमि का लालची आत्म निवेदन ---
" मैं हूँ लालच की मारी,ये पल प्यार के,
चुन के सारे के सारे ही संसार के ;

रखलूं आँचल में सारे ही संभाल के|

प्यार का जो खिला है ये इन्द्रधनुष,
जो है कायनात पै सारी छाया हुआ ;
प्यार के गहरे सागर मैं दो छोर पर
डूब कर मेरे मन है समाया हुआ | "

चाहती हूं कोई लम्हा रूठे नहीं ,
ज़िन्दगी का कोई रंग छूटे नहीं ॥
                       **                          **                            **           
                 सोचते सोचते जाने कब नींद आगई | सुबह किसी के झिंझोड़ने पर मैं जागा |
   क्या है सुभी सोने दो न |
   मैं सुमि हूँ, केजी ! उठो |  क्या सपना देख रहे हो |
   मैं हडबड़ा कर उठा, ओह ! गुड मोर्निंग |
   वेरी वेरी गुड है ये मोर्निंग, तुम्हारे साथ, कृष्ण !  चलो आज मैं काफी लाई हूँ |  सुमि खुले हुए बालों में फ्रेश होकर दोनों हाथों में कप पकडे हुई थी |  हम दोनों ही हंस पड़े |  मैंने उसे ध्यान से देखा |  बीस वर्ष बाद की सुमि |  वही तेज तर्रार, आत्म विश्वास से भरी गहरी आँखें, मर्यादित पहनावा, गरिमा पूर्ण सौन्दर्य |  कनपटी पर कहीं कहीं झांकते, समय की कहानी कहने को आतुर रुपहले बाल |
     क्या देख रहे हो, सुमि आँखों में झांकते हुए मुस्कुराई |    मै भी मुस्कुराया---

" दिल ढूढता है फिर वही, वो सुमि वो प्यारे दिन, बैठे हैं तसब्बुर में, जवाँ यादें लिए हुए |"
  तुम तो वैसे ही हो योगीराज ! वह हंसने लगी |
                      **
                      **                    **            
               कार्यक्रमानुसार, हम लोग चौपाटी, मेरीन ड्राइव आदि घूमते रहे |  चाट, भेल पूरी आदि के वर्किंग लंच के बीच पुरानी यादें ताजा करते रहे |  सुमि कहने लगी, सच कृष्ण,  जब भी मैं उदास या थकी हुई परेशान होती हूँ तो चुपचाप झूले पर बैठ कर एकांत में कालिज व तुमसे जुडी हुई यादों में खोजाती हूँ, जो मुझमें पुनः नवीनता का संचार करतीं हैं |  सच है प्यारी यादें सशक्त टानिक होतीं हैं |   क्या में विभक्त व्यक्तित्व हूँ ?  और तुम तो अपने बारे मैं कभी कहते ही नहीं कुछ |
         नहीं सुमि, तुम अभक्त, अनंत, परम सुखी व्यक्तित्व हो, मैंने कहा,  और मैं भी |
         हर बात का उत्तर है तुम्हारे पास और तुरंत | उसने बांह पकड़कर, सर कंधे से लगाते हुए कहा, चलो अब कुछ सुनादो | मैंने सुनाया --
" प्रियतम प्रिय का मिलना जीवन, साँसों का चलना है जीवन |
मिलना और बिछुडना जीवन, जीवन हार भी जीत भी जीवन ||"
      सुमि ने जोड़ दिया ---

"प्यार है शाश्वत,कब मरता है, रोम रोम में बसता है |
अजर अमर है वह अविनाशी ,मन मैं रच बस रहता है । " 



        ये तुमने कहाँ से याद किया, मैंने आश्चर्य से पूछा |  मैंने तुम्हारी सब किताबें पढीं हैं, वह बोली |  कुछ देर हम दोनों ही चुप रहे, फिर मैंने पूछा- कब जारही हो ?
      आज चार बजे की फ्लाईट से, यहाँ का काम जल्दी ख़त्म होगया |   दो बज रहे हैं, मैंने घड़ी देखते हुए कहा--     एयर पोर्ट छोड़ने चलूँ |

 हाँ |
            हम टैक्सी लेकर सुमि के गेस्ट हाउस होकर एयर पोर्ट पहुंचे | लाउंज के एक कोने में खड़े होकर अचानक सुमि बोली,  मुझे किस करो कृष्ण |
  क्या कह रही हो, मैंने आश्चर्य से उसे देखा |
  अब मैं ही कह रही हूँ, यही कहा था न तुमने |   मैंने ओठों से उसके माथे को छुआ तो वह खिलखिला कर हंसी और हंसती चली गयी .... फिर बोली -
    मैं क़र्ज़ मुक्त हुई कृष्ण, चैन से जा सकूंगी, कहीं भी |  वह गहराई से आँखों में झांकती हुई बोली|
   और सूद, मैंने कहा |
    अगले जन्म मैं |
   हम अगले जन्म में भी पक्के दोस्त रहेंगे,  मैंने अनायास ही हंसते हुए कहा |
   नहीं, पति-पत्नी |
  ' व्हाट !'
   "अगले जन्म की प्रतीक्षा करो केजी "....... और वह तेजी से बोर्डिंग लाउंज में प्रवेश कर गयी |
                                   

                                                 --- इति ---                                         


सोमवार, 30 मई 2011

नारद पुराण ..पत्रकारिता दिवस पर ..कविता ...डा श्याम गुप्त

                                                       ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...   
आदि संवाद दाता नारद जी ने ,
पृथ्वी भ्रमण का मन बनाया |
देखें कहाँ तक उन्नत हुई है-
मेरी संवाद-प्रसार की विद्या-माया |
मेरे शिष्य कार्य को कैसे आगे बढ़ा रहे हैं ;
और कैसे मेरे नाम का-
पृथ्वी पर भी डंका बजा रहे हैं ||

कवि भेष  में वे ,
एक अखवार के दफ्तर में पधारे, बोले-
नारद-पुराण लिखा है,
समीक्षा छपवानी है |
सम्पादकजी बोले-
ये तो बड़ी पुरानी कहानी है ,
आज की हिट हीरोइन तो रानी है |
लोग कहेंगे, हम पुराण पंथी हैं ,
धर्म के नाम पर लोगों को भटकाते हैं ;
कवि जी हम तो-
धर्म निरपेक्ष कहलाते हैं |
कोई  धाँसू-- मारधाड़, लूट-बलात्कार -
ह्त्या चोरी पर्दाफास या साक्षात्कार -
की खबर हो तो लाओ ;
अरे, किसी हीरो से हीरोइन का रोमांस लड़वाओ,
अभिताभ पुराण या माधुरी उवाच,
लिखा हो तो लाओ ||

नारद जी सकपकाए,
तभी मुख्य सम्पादकजी -
गुस्से से भुनभुनाते हुए आये ;
सम्पादक पर झल्लाए, चिल्लाए -
मूर्ख ! मेरा अखबार बंद कराना चाहता है ?
जिस पार्टी के चंदे से चलता है,
उसी की आलोचना छापता है ||

विचित्रपुरी में एक -
काव्य-लोकार्पण समारोह होरहा था,
एक रिपोर्टर सीट पर बैठा सोरहा था |
नारद जी ने पूछा -
पत्रकार जी ये क्या कर रहे हैं ?
वे बोले- रिपोर्टर जी तो, हजारा श्री के -
मच्छर-मार अगरबत्ती के लांचिंग पर आयोजित-
पंचतारा होटल में ,
काकटेल डिनर पर गए हैं |
मैं तो दैनिक वेतन-भोगी फोटोग्राफर हूँ ,
मुझसे कहगये हैं कि-
एक -दो फोटो खींच लाना,
समाचार तो बन ही गए हैं ||

रामायण पाठ में -
टी वी रिपोर्टर जी पधारे,
 बोले- जल्दी से लिखकर देदें,
क्या पढ़ना-गाना है ;
हमें तो मुख्यमंत्री का-
चुनाव-भाषण कवर करने जाना है ||

नारद जी मायूस होकर-
नारायण- नारायण बड़  बडाये  ;
जिज्ञासा-पूर्ति हेतु , शीघ्र ही-
विष्णु धाम सिधाए ||


रविवार, 29 मई 2011

पोलीगेमी या बहुविवाह प्रथा---- डा श्याम गुप्त.....

....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
 

        (कल ब्लोगर आशुतोष नाथ तिवारी जी का ई-मेल मिला, जिसमें एक लिंक दिया था एवं उस पर वे मेरे विचार जानना चाहते थे| लिंक ( यूं-ट्यूब ) में इस्लाम के कोई विद्वान डा जाकिर नाइक पोलीगेमी -अर्थात बहुविवाह-प्रथा पर किसी महिला द्वारा कुरआन में चार शादियों की स्वीकृति पर उत्तर देरहे थे| डा नाइक सीधे-सीधे कृष्ण की १६१०८ रानियों , दशरथ की तीन रानियों के उदाहरण से कुरआन में चार शादियों की वैधता को समर्थित कर रहे थे | चूंकि उत्तर काफी लंबा व गहन विषय से जुड़ा हुआ है अतः मैंने एक पोस्ट द्वारा लिखना उचित समझा |)
                                      
            बहुपत्नी-प्रथा विश्व की लगभग सभी प्राचीन व्यवस्थाओं में थी..चाहे वह योरोप हो या एशिया, अफ़्रीका ...... वास्तव में यह समाज व महिलाओं में असुरक्षा की भावना का प्रतिकार थी और तब प्रारम्भ हुई जब सभ्यता स्त्री-सत्तात्मक से पुरुष सत्तात्मकता में परिवर्तित हुई ।
          वस्तुत: प्रागैतिहासिक काल में कहीं भी ईश्वर नहीं था अपितु स्त्री-शक्ति--मातृका, सप्त-मातृकाओं का वर्चस्व था उन्ही की पूजा होती थी, जैसा कि उस काल की प्राप्त मृण्मूर्तियों से पता चलता है। जब कालक्रमानुसार विकास-क्रम में मानव घुमन्तू से स्थिर हुआ और स्त्री ने स्वत: परिस्थिति व आवश्यकतानुसार घर पर रहना व घरेलू व्यवस्था को स्वीकार किया—पत्नी भाव स्वीकार किया तो धीरे-धीरे पुरुष का वर्चस्व स्थापित होने पर... ...मुखिया व राजा के रूप में एक सुरक्षा व पालन-पोषण तन्त्र का प्रतीक बना, फ़िर किसी सर्वशक्तिमान सत्ता...ईश्वर की सत्ता पुरुष रूप में स्थापित हुई जो मुखिया व राजा में भी आरोपित हुई.....और स्त्रियों द्वारा अपने व सन्तति के सुरक्षा व लालन-पालन हेतु शक्ति के केन्द्र की ओर आकर्षित होने से ..बहु-पत्नी प्रथा का आविर्भाव हुआ। तत्पश्चात राजनैतिक व अन्य कारणों से यह प्रथा सामान्य-व्यवहार भाव से समाज में अभिहित होती गयी।
      परन्तु यह प्रथा समाज का एक व्यवहारिक रूप रहा , आदर्श रूप नहीं  मूल भारतीय त्रिदेव एक-पत्नी वाले हैं- (ब्रह्मा की गायत्री व सावित्री दो पत्नियां-भाव रूप ही हैं), मनु भी एक पत्नी शतरूपा है,( यद्यपि कामायनी में प्रसाद जी ने श्रृद्धा व इडा कहा है पर वह भी भाव रूप ही है ) जबकि प्रज़ा-उत्पत्ति के प्रतीक... दक्ष—की आकूति व प्रसूति दो पत्नियां थीं।...गणेश की दो पत्नियां-रिद्धि व सिद्धि हैं। चन्द्रमा की २७...यद्यपि ये सभी प्रतीकात्मक हैं..पर हैं तो...भाव रूप में ही सही.....।
       राजा दशरथ की तीन रानियां थीं परन्तु राम ( जो आदर्श के प्रतीक हैं) तो दृढ़ता से एक पत्नी- व्रता हैं। श्री कृष्ण की कथित १६१०८ पत्नियां वस्तुत: वे निरीह, परित्यकता स्त्रियां थीं जो आतंक के प्रतीक जरासन्ध-समूह के यहां कैद, शोषिता-पीडिता नारियां थीं जिनको श्रीकृष्ण ने जरासंध को मारकर बन्धन से मुक्त किया पर उनके परिवार ने स्वीकारा नहीं तो उनके पालन-पोषण का दायित्व स्वयं लिया। उनकी ८ रानियां विभिन्न राजपरिवारों से सन्धि हेतु राजनैतिक कारणों से थीं.....हां थीं ।
       राजा मानसिन्ह की ९ रानियां थीं । सामान्य जनता पर भी कोई एसा बन्धन नहीं था..” देवी के लिये गाये जाने वाले लान्गुरिया गीतों में एक गीत है---“दो दो जोगिनी के बीच अकैलो लान्गुरिया “यह जहां सामान्य जन में भी यह प्रथा की सामाजिक स्वीकृति को दर्शाती है वहीं सामान्यजन को सामाजिक रूप से चेताने के उपक्रम भी हैं, की भले ही कानूनन या सामाजिक बन्धन न हों परन्तु यह आदर्श एक स्थिति नहीं है।
       कहने का तात्पर्य है कि .डा नाइक.......एक ज़हीन इन्सान हैं, ग्यानी हैं...अपने धर्म-प्रसार हेतु नेताओं की भांति तर्कयुक्त वक्तृता में भी माहिर हैं। यद्यपि हिन्दू धर्म के बारे में उनका ज्ञान तात्विक नहीं है परन्तु फिर भी वे अपने कथन में सही हैं कि यदि ईस्लाम में चार शादियां कबूल हैं तो चिल्लाहट क्यों...सच ही है....पर सिर्फ़ चार ही क्यों? यदि बहुविवाह स्वीकार है तो फ़िर चाहे जितनी हों, क्या फ़र्क पडता है...यहीं पर अन्तर है हिन्दुत्व के तार्किक व सर्वसुलभ व शास्त्रों के व्यवहारिक रूप से प्रयोग के सिद्धान्त में व इस्लाम के ..जो हम कहें वही करो, जो किताब में लिखा है वही पत्थर की लकीर है  के कट्टरता के सिद्धान्त में । बहुत नया है इस्लाम धर्म हिन्दू धर्म की तुलना में अत: कुछ नवीन नियम--चार शादियाँ तक-- हो ही सकते हैं। हिन्दू धर्म जो सनातन है, इसमें यदि बहुपत्नी प्रथा है तो सन्यांस अर्थात बिना विवाह जीवन की भी प्रथा है| बहुत खुला हुआ, संतुलित व व्यवहारिक एवं समतामूलक समाज, धर्म व सभ्यता है यह।
     जहां तक पश्चिम के एक पत्नी कानून की बात है वह सच ही कहा. डा नाइक....ने कि आचरण में तो वहां सभी स्त्रियां सभी की पत्नियां हैं...सब कुछ जायज़ है, उपलब्ध है व मान्य भी है। उस संस्कृति  की तो कोई बात ही नही, वह तो कोई संस्कृति ही नहीं है । वह  अभी जुम्मा-जुम्मा चार रोज़ की संस्कृति है....जन्गलों से सीधे महानगरों व बहुमन्जिला नगरों में पहुंचे हुए लोग....धन-सम्पत्ति की चकाचौन्ध से .आश्चर्यचकित...दिशाहीन....बौराये लोग। जहां तक स्त्री-पुरुष अनाचरण-दुराचरण-शोषण-अत्याचार  की बात है वह कोई संस्कृति-धर्म की बात नही मानवीय आचरण-स्वभाव की बात है । जो अन्य संस्कृतियों ...हिन्दू—मुस्लिम भी...में चोरी-छुपे होता है वह पाश्चात्य में खुले आम, जो अधिक घातक है क्योंकि बुराई आकर्षक होती है व तेजी से फैलती है।
         मुझे तो यह लगता है कि भारत सरकार को जिसने अन्ग्रेज़ों व अमेरिकी प्रभाववश एक पत्नी कानून पास किया.....उसे समाप्त कर देना चाहिये। जो जितनी पत्नियों का पालन कर सके उसकी इच्छा।