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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

रविवार, 7 अगस्त 2016

नागपंचमी पर विशेष -----क्या जन्मेजय का नाग-यज्ञ भारत राष्ट्र के दुर्बल होने का कारण था--डा श्याम गुप्त

                   ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

                                   -----नागपंचमी पर विशेष -----
                       -         --जीवों के प्रति दया भाव का पर्व है नागपंचमी ----

     ******क्या जन्मेजय का नाग-यज्ञ भारत राष्ट्र के दुर्बल होने का कारण था***** ....



Drshyam Gupta's photo.





---------- प्रायः पाश्चात्य विद्वानों एवं कुछ देशी विद्वान् जो पाश्चात्य चश्मे से ही सब कुछ देखने के आदी हैं द्वारा यह कहा जाता है कि महाभारत युद्ध के कारण भारत राष्ट्र कमजोर हुआ एवं विदेशी आक्रान्ताओं को देश पर आक्रमण करने का मौक़ा मिला | यह एक प्रकार से महाभारत के महानायक श्रीकृष्ण पर लांक्षन के रूप में भी दोहराया जाता है | जो लोहिया जैसे समाजवादियों के कथन से प्रकट होता है ....
“----लेकिन त्रिकालदर्शी क्यों न देख पाया कि इन विदेशी आक्रमणों के पहले ही देशी मगध–धुरी बदला चुकाएगी और सैंकड़ों वर्ष तक भारत पर अपना प्रभुत्व कायम करेगी और आक्रमण के समय तक कृष्ण की भूमि के नजदीक यानि कन्नौज और उज्जैन तक खिसक चुकी होगी, किन्तु अशक्त अवस्था में ।“

--------वस्तुतः यह सत्य नहीं है | श्रीकृष्ण के काल में देश अस्थिरता से जूझ रहा था| विदेशी शासक ..यवन, म्लेक्ष, शक, हूण आदि ..सुदूर पश्चिमी सीमावर्ती क्षेत्रों पर आधिपत्य जमाये हुए थे एवं भारत आतंरिक भागों में भी दखल रखते थे ....
------यथा कालयवन जिसे श्रीकृष्ण ने चतुराई से परास्त किया | समस्त भारत विभिन्न जनपदों में बंटा हुआ था जो अपनी अपनी शक्ति, मद व अहंकार में चूर थे व एक दूसरे से युद्धरत रहते थे| स्त्रियों, दासों, गरीबों व सामान्य जनों की दशा अत्यंत शोचनीय थी, जो युधिष्ठिर के द्यूत-क्रीडा एवं द्रौपदी प्रकरण से दृष्टिगत होती है, अधर्म का बोलबाला था |
------श्रीकृष्ण इस आसन्न खतरे को भांप गए थे | उन्होंने देख लिया कि उत्तर – पश्चिम में आगे चल कर यवनों, म्लेक्षों, यूनानियों, हूणों, पठानों, मुगलों आदि के आक्रमण होंगे इसलिए भारतीय एकता की धुरी का केन्द्र कहीं वहीं रचना चाहिए जो इन आक्रमणों का सशक्त मुकाबला कर कर सके । और उन्होंने किया भी भारत के केंद्र में पश्चिमी सीमान्त के समीप सशक्त कुरु धुरी का निर्माण करके |
---------उस समय देश में शक्ति की दो धुरियाँ थीं ...
------एक मगध धुरी जो मगध से मथुरा तक फ़ैली हुई थी| भारतीय जागरण का बाहुल्य उस समय उत्तर और पश्चिम में था एवं खतरा भी उत्तर-पश्चिम सीमान्त से था जो राजगिरि और पटना की सशक्त मगध धुरी से बहुत दूर पड़ जाता था, मगध– धुरी कुछ पुरानी पड़ चुकी थी, शक्तिशाली थी किन्तु उसका फैलाव संकुचित था । बीच में शिशुपाल आदि मगध के आश्रित – मित्र थे ।
---------दूसरी विरोधी इन्द्रप्रस्थ-हस्तिनापुर की कुरु धुरी थी ...कुरु – धुरी नयी व सशक्त थी साथ में शक्ति संपन्न यादवों की मित्र एवं उत्तर-पश्चिमी सीमान्त के समीप थी | अतः श्रीकृष्ण ने पूर्व में मणिपुर से ले कर पश्चिम में द्वारका तक को इस कुरु – धुरी में समावेश किया और उसकी आधार शिला थी कुरु – पांचाल संधि | उन्हें सारे देश को बाँधना जो था । महाभारत युद्ध में अधर्मी पीढी का विनाश हुआ परन्तु उन सभी की दूसरी पीढी के योद्धा शासक बने | युधिष्ठिर का धर्म का एकक्षत्र सुशासन लगभग २६ पीढ़ियों तक चला निरापद रूप से |
-------------वस्तुतः जन्मेजय का नागयज्ञ एक एतिहासिक, राजनैतिक व कूटनैतिक भूल थी जिसके कारण भारत राष्ट्र कमजोर हुआ | इसीलिये इस काल से कलयुग का आगमन कहा जाता है |
------कश्यप ऋषि की संतान नाग जाति हिमालय पार की एक भीषण योद्धा, दुर्धर्ष व लड़ाकू जाति थी जो महाजलप्लावन एवं हिमालय उत्पत्ति के साथ मूलतः हिमालय श्रेणी के पर्वतीय क्षेत्रों में बस गयी एवं धीरे धीरे जल उतरने के साथ समस्त भारत में |
------सूर्य व चन्द्र वंशियों की भाँति नागवंश भी भारत का मूल शासक वंश बना जिसने भारत व श्रीलंका एवं सुदूर देशों में भी में अपने साम्राज्य स्थापित किये| मानवों एवं नागों में आपसी सम्बन्ध अच्छे रहते थे जो शेषनाग-विष्णु, शिव-वासुकी , मेघनाद की पत्नी शेष-पुत्री सुलोचना, अर्जुन की पत्नी नागकन्या उलूपी, विष प्रकरण में भीम को बचाने व पालने वाले तथा शक्तिवान बनाने वाले यमुना किनारे के क्षेत्र वाले आर्यक नाग आदि तमाम दृष्टांतों से ज्ञात होता है |
------मथुरा में यमुना से कालिय नाग को ....इन्द्रप्रस्थ की स्थापना के समय खांडव वन से तक्षक नाग कुल को विस्थापित होना पडा, अर्जुन या पांडवों या श्रीकृष्ण ने कभी उनका तिरस्कार या विरोध नहीं किया |
------परन्तु तक्षक नाग द्वारा दुर्योधन की कुटिल नीतिमें आकर अर्जुन का वध करने की चाल को कृष्ण ने असफल कर दिया परन्तु उसे कोइ दंड नहीं दिया | अर्थात कृष्ण, पांडव व युधिष्ठिर काल में उन्होंने नागों के साथ वनांचल की अन्य जातियों व मनुष्यों में सहभाव बनाए रखा क्योंकि वे जानते थे कि देश की रक्षा हेतु उनकी शक्ति व सम्मिलित शक्ति की कितनी महत्ता है |
----------परन्तु राम के अनुज भरत जी के पुत्र तक्ष द्वारा स्थापित तक्षशिला में स्थित तक्षक नाग द्वारा पुराने द्वेष वश अभिमन्यु पुत्र कुरु सम्राट परीक्षत को डंसने पर (=युद्ध में छल से ह्त्या करने ) क्रोधवश उसके पुत्र जन्मेजय ने समस्त भारत से नागों का सफाया कर दिया और एक सशक्त, भीषण योद्धा एवं मानव की सहचर जाति का विनाश हुआ जिनके साथ ही वनांचल की अन्य योद्धा बर्बर जातियों का भी विनाश हुआ | देश में वनांचल निवासी, नागों व कुरु वंशियों एवं अन्य वंशों में सत्ता के लिए युद्ध प्रारम्भ होगये| | सता केंद्र तक्षशिला से मगध के बीच बार बार बदलता रहा | देश कमजोर होता चला गया |
----------इसी काल में ( लगभग २००० ईपू ) सरस्वती नदी के लुप्त होने एवं जल-प्लावन से क्षेत्र का अधिकाँश भाग विनाश को प्राप्त हुआ,( शायद द्वारिका आदि इसी काल में समुद्र में समा गयीं, कच्छ आदि मरूभूमि का निर्माण हुआ ) तमाम ऋषियों –मुनियों के हिमालय पर चले जाने के कारण वैदिक सभ्यता व संस्कृति के विनाश होने पर ब्राह्मण भी भ्रष्ट होने लगे, विद्या लुप्त होने लगी, चहुँ ओर अज्ञान का अन्धकार छाने लगा |
---------यही सिकंदर के आक्रमण का काल है ( १००० ईपू – जिसे योरोपीय विद्वान् ४०० ईपू मानते हैं) | उस समय सीमान्त के नाग शासक वेसीलियस या टेक्सीलियस ने सिकंदर का स्वागत किया था जिसका पुत्र आम्भी सिकंदर का मित्र बना जिसने पोरस पर चढ़ाई के लिए सिकंदर को उकसाया था |
-------यद्यपि भारतीय शक्ति एवं विभिन्न परिस्थितियों वश सिकंदर को पंजाब से ही लौट जाना पडा परन्तु इस आक्रमण के साथ ही भारत के उत्तर-पश्चिमी सीमान्त के विदेशी शासकों, यवन, हूण, म्लेक्ष, आदि को भारत की आतंरिक दशा व अशक्त-स्थिति का ज्ञान होगया एवं आक्रमणों का सिलसिला प्रारम्भ होगया,जो मौर्य व गुप्त वंश के सशक्त शासकों के प्रतिरोध के कारण कुछ सदियों तक पुनः रुका रहा परन्तु गुप्त वंश के पतन के पश्चात विभिन्न विदेशी आक्रमणकारियों के आने व उनके शासन का सिलसिला चलने लगा |


चित्र---१. जन्मेजय का नाग यज्ञ...२.नाग पंचमी पर नाग दर्शन...३.नाग देवी--मनसा देवी ...४. -नाग देवता --श्री गोगाजी चौहान (जाहरवीर)जी जिन्होंने सोमनाथ मंदिर को लूटकर आ रहे गजनी के मुस्लिम लुटेरों से भयंकर युद्ध किया था । ...५. बादामी, कर्नाटक स्थित ग्राम देवता ( नाग देवता ) अभी भी पूजे जाते हैं
कर्नाटक -बादामी ..में ग्राम देवता नागराज की पूजा
'जन्मेजय  का नाग यज्ञ'
जन्मेजय का नाग यज्ञ


 

शुक्रवार, 5 अगस्त 2016

गुरुवासरीय गोष्ठी दि.४-८-१६ वृहस्पतिवार को संपन्न ----- डा श्याम गुप्त

                              ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ... 

                            ******गुरुवासरीय गोष्ठी दि.४-८-१६ वृहस्पतिवार*****

------प्रत्येक माह के प्रथम गुरूवार को होने वाली गुरुवासरीय गोष्ठी दि.४-८-१६ वृहस्पतिवार को डा श्याम गुप्त के आवास के-३४८, आशियाना, लखनऊ पर संपन्न हुई | गोष्ठी में साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य, डा श्याम गुप्त, श्री बसंत राम दीक्षित, कौशल किशोर, श्रीमती विजय लक्ष्मी महक, मंजू सिंह, अनिल किशोर शुक्ल निडर, अशोक विश्वकर्मा, गुंजन, श्रीमती सुषमा गुप्ता एवं श्री विनोद कुमार सिन्हा ने काव्यपाठ में भाग लिया |
---काव्य-गोष्ठी के प्रारम्भ से पहले अनौपचारिक वार्ता में श्री विनोद कुमार सिन्हा के उठाये विषय ‘कविता बनती है या बनाई जाती है‘ पर विवेचना की गयी, सभी उपस्थित साहित्यकारों ने अपने विचार व्यक्त किये |
------ गोष्ठी का प्रारम्भ करते हुए डा श्यामगुप्त ने सरस्वती वन्दना में कहा ..
" माँ लिखती तो सब कुछ तुम हो. नाम मुझे ही देदेती हो |
आप लिखातीं सारे जग से,लिखा श्याम ने कहा देती हो |..."
श्रीमती विजय लक्ष्मी महक एवं अनिल किशोर शुक्ल द्वारा भी माँ की वन्दना की गयी |
------श्री अशोक विश्वकर्मा ‘गुंजन’ के अपनी रचना प्रस्तुत करते हुए कहा-
"आयेंगे याद हम तुम्हें एक बार फिरसे,
जब तेरे अपने फैसले तुझे सताने लगेंगे |"
-------अनिल किशोर शुक्ल निडर ने भारत के सपूतों को ललकारा—
‘"भारत माँ के अमर सपूतो,
आगे बढाकर आना होगा |"
------- कवयित्री श्रीमती विजय लक्ष्मी ने ज़िंदगी से शिकवा करते हुए कहा...
"काश ए ज़िंदगी ! हम भी तेरी निगाहों में चढ़े होते |
नामचीनों की कतार में हम भी खड़े होते |"
-------श्रीमती मंजू सिंह ने भोले शंकर की अभ्यर्थना करते हुए इच्छा प्रकट की----
"मेरे भोले भाले शंकर को , किसी की नज़र न लगे |’
-------- श्रीमती सुषमा गुप्ता जी ने एक सुन्दर जीवन गीत प्रस्तुत किया ---
“तुम ही मेरे अंग संग हो,तुम ही तो रस रीति रंग हो |
उपमा रूपक उत्प्रेक्षाएं भी तुझको कब पा सकती हैं |
तुम श्लेष माधुर्य ओज हो, भाव व्यंजनायें तुम ही हो |"
एवं सावन के ऋतु के अनुरंजन में ब्रजभाषा में एक मल्हार भी गीत प्रस्तुत किया...
"आई सावन की बहार,
बदरिया घिर घिर आवै | "
------- श्री कौशल किशोर ने शिवकी अर्चना करते हुए कहा-
"दुनिया में देव हज़ारों हैं महादेव की महिमा क्या कहने |
सबको प्यारे, तनुधारी भूत पिशाच भी हैं इनके |"
-------श्री विनोद कुमार सिन्हा ने सावन में प्रिय से वार्तालाप करते हुए सुन्दर गीत प्रस्तुत किया –
‘सावन को प्रिय आजाने दो ,
मधुमय नभ रस बरसेंगे |"
------- कविवर बसंत राम दीक्षित ने श्रृगार गीत प्रस्तुत करते हुए कहा—
"रूपसी बोली नयन से, देखलो भरपूर मुझको ,
और अपनी प्यास को चहक कर बुझालो |"
------ डा श्याम गुप्त ने एक कवित्त द्वारा इसे घनाक्षरी क्यों कहते हैं इस छंद की परिभाषा प्रस्तुत की....
" घनन घनन घन घन के समान करें,
श्रोता को भावें करें घन जैसी गर्जना |" .... तथा
---कुछ देव घनाक्षरी छंद प्रस्तुत किये ---
“मन बाढ़े प्रीती ऐसी तन में अगन श्याम,
साजन बजावै द्वार-खिड़की खनन खनन |’
------विवेचित विषय ‘कविता बनती है या बनाई जाती है’ को संदर्भित करते हुए डा श्याम गुप्त ने गीत प्रस्तुत किया –
“बीज कविता का सदा मन में बसा होता है,
कोइ सींचे तो ये अंकुर हरा होता है |’
---------समापन व्याख्या व विवेचना करते हुए साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य ने आतंकवाद पर चोट करते हुए एक प्रस्तुत किया –
सीमा पार से आते हैं आतंकी सदा,
इसलिए मित्र की मिताई में न रहिये |
तथा यादों के घन से संदर्भित करते हुए सुन्दर गीत सुनाया –
मचल रहे गरज गरज यादों के घन.....
.यादों के घन |
---- इस अवसर पर श्रीमती सुषमा गुप्ता व विजय लक्ष्मी जी को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के सन्दर्भ में प्रभावी व उल्लेखनीय सेवा का प्रमाणपत्र देकर सम्मानित किया गया ...
------अंत में जलपान के पश्चात डा श्यामगुप्त व श्रीमती सुषमा गुप्ता ने सभी उपस्थित विद्वानों का आभार व्यक्त किया |
Drshyam Gupta's photo.
 अनिल किशोर शुक्ल निडर का काव्यपाठ
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सुषमा गुप्ता द्वारा प्रस्तुत एक गीत 
चित्र में ---१.श्री अनिल किशोर शुक्ल निडर का काव्यपाठ...२.सुषमा गुप्ता द्वारा प्रस्तुत एक गीत ...३.वयोवृद्ध कवि कौशल किशोर की भोले वन्दना...४.विनोद कुमार सिन्हा काव्यापाठ करते हुए ...५.बसंत राम दीक्षित का गीत....६.डा श्याम गुप्त का काव्य पाठ....७.श्रीमती विजय लक्ष्मी डा रंगनाथ मिश्र को अपनी पुस्तकें भेंट करती हुईं ....८.सुषमाजी व विजय लक्ष्मी जी का सम्मान ९. डा सत्य का काव्य पाठ ....

डा श्याम गुप्त का काव्य पाठ

श्रीमती विजय लक्ष्मी डा रंगनाथ मिश्र को अपनी पुस्तकें भेंट करती हुईंसाथ में कवि अशोक विश्वकर्मा गुंजन एवं सुषमा गुप्ता व् मंजू सिंह

.सुषमाजी व विजय लक्ष्मी जी का सम्मान

डा सत्य का काव्य पाठ ...
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कवि कौशल किशोर की भोले वन्दना
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विनोद कुमार सिन्हा काव्यापाठ करते हुए
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बसंत राम दीक्षित का गीत.

मंगलवार, 26 जुलाई 2016

अखिल भारतीय साहित्य परिषद, लखनऊ की गोष्ठी..... डा श्याम गुप्त...




        अखिल भारतीय साहित्य परिषद, लखनऊ की गोष्ठी.....
                २४-७-१६ रविवार शाम को अखिल भारतीय साहित्य परिषद, लखनऊ,महानगर के तत्वावधान में काव्य संध्या का आयोजन डाॅ. सुभाष गुरुदेव के आवास- के. 01,बंसल हलवासिया एन्क्लेव, एच.ए.एल. के सामने इंदिरा नगर में किया गया।   
  
            सुनील बाजपेयी के संचालन में सम्पन्न हुए कार्यक्रम के अध्यक्ष श्री घनानंद पाण्डेय 'मेघ 'व मुख्य अतिथि डाॅ. श्याम गुप्त एवं वि. अतिथि श्री कुमार तरल जी रहे।  

           देर रात तक चले कार्यक्रम में कवियों ने खूब वाहवाही व तालियाँ बटोरीं। काव्य संध्या में सर्वश्री आदित्य चतुर्वेदी,शिव मंगल सिंह मंगल,गौबर गणेश,अनिल अनाड़ी,सुभाष गुरुदेव,श्याम नारायण पाण्डेय, मानस मुकुल त्रिपाठी, विजय त्रिपाठी, डा. सुनीलकुमार, केवल प्रसाद सत्यम, विश्वंभर नाथ अवस्थी और रवीन्द्र नाथ मिश्र आदि वरिष्ठ कवियों की एक से बढ़कर एक रचनाओं ने भाव विभोर किया । 

             
      अंत में मेजबान डाॅ.सुभाष गुरुदेव ने सबका आभार व्यक्त करते हुए धन्यवाद ज्ञापित किया।           






 

        


       

सोमवार, 25 जुलाई 2016

सृष्टि, व्याप्ति एवं विनाश के देव शिव, सृष्टि का मूल तत्व-शिवतत्व, शिवलिंग एवं आधुनिक लिंग-पुराण -डा श्याम गुप्त

                                      ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


सृष्टि, व्याप्ति एवं विनाश के देव शिव, सृष्टि का मूल तत्व-शिवतत्व, शिवलिंग एवं आधुनिक लिंग-पुराण






     श्रावण मास शिव का महीना कहा जाता है | वस्तुतः शिवतत्व ही जग-जीवन का मूल है|शिवत्व अर्थात कल्याणकारी तत्व- विचार रूप, ज्ञानरूप व कृतित्व रूप| यह सर्वकल्याणकारी भाव  ही प्रत्येक सृजन का मूल है, अतः शिव सृजन के देव हैं| कल्याणभाव से विरत होजाना ही विनाश है, अतः शिव विनाश के देव हैं | सृष्टि व विनाश साथ साथ चलते हैं| नवीन व सुहृद भावतत्वों का सृजन एवं अकल्याणकारी अनावश्यक तत्वों का विनाश साथ साथ | अतः शिव स्थिति अर्थात व्याप्ति के भी देव हैं अतः वे महादेव हैं, देवाधिदेव हैं |   
       आधुनिक ज्ञान के नाम पर विदेशी चिंतन का प्रभाव हमारे ऊपर बहुत अधिक हावी हो रहा है इसलिए एक संघर्ष हमें अपनी मानसिकता से ही करना होगा कि अपनी परंपरा में जो ग्रहणीय है,  मूल्यपरक है उस पर फिर से लौटना होगा। साथ में तार्किक विदेशी ज्ञान भंडार से भी अपरिचित नहीं रहना होगा क्योंकि विकल्प में जो कुछ भी हमें दिया है, वह आरोहण और नकल के अतिरिक्त कुछ नहीं। निरन्तर द्वंद्व और निरंतर द्वंद से मुक्ति का प्रयास, मनुष्य की संस्कृति के विकास का यही मूल आधार है। हमारे पुराण आदि हमें आधार देते हैं |
         विश्व की सबसे श्रेष्ठ व उन्नत भारतीय शास्त्र-परम्परा में ---पुराण साहित्य में मूलतः अवतारवाद की प्रतिष्ठा हैं **निर्गुण निराकार की सत्ता को मानते हुए सगुण साकार की उपासना का प्रतिपादन** इन ग्रंथों का मूल विषय है। उनसे एक ही निष्कर्ष निकलता है कि आखिर मनुष्य और इस सृष्टि का आधार-सौंदर्य तथा इसकी मानवीय अर्थवत्ता में कही- न-कहीं सद्गुणों की प्रतिष्ठा होना ही चाहिए, जो आश्चर्यजनक रूप से सभी पुराणों में मिलती है |  सत्कर्म की प्रतिष्ठा की प्रक्रिया में अपकर्म और दुष्कर्म का व्यापक चित्रण करने में पुराणकार कभी पीछे नहीं हटते और उसके देवताओं की कुप्रवृत्तियों को भी व्यापक रूप में चित्रित किया है, उसका मूल उद्देश्य शिवत्व, कल्याण अर्थात सद्भावना का विकास और सत्य की प्रतिष्ठा ही है।
           सृष्टि के प्रारंभ में जब ब्रह्माजी द्वारा रची गई मानसिक सृष्टि विस्तार न पा सकी, उसी समय आकाशवाणी हुई ब्रह्मन्! अब मैथुनी सृष्टि करो। आकाशवाणी सुनकर ब्रह्माजी ने मैथुनी सृष्टि रचने का निश्चय तो कर लिया, किंतु उस समय तक नारियों की उत्पत्ति न होने के कारण वे अपने निश्चय में सफल नहीं हो सके। परमेश्वर शिव की कृपा के बिना मैथुनी सृष्टि नहीं हो सकती अतः ब्रह्मा उन्हें प्रसन्न करने के लिए कठोर तप करने लगे। उनके तीव्र तप से प्रसन्न होकर भगवान उमा-महेश्वर ने उन्हें अर्द्धनारीश्वर रूप में दर्शन दिया। महेश्वर शिव ने कहा-पुत्र ब्रह्मा ! मैं परम प्रसन्न हूं। ऐसा कहकर शिवजी ने अपने शरीर के आधे भाग से उमा देवी को अलग कर दिया। ब्रह्मा ने कहा.-एक उचित सृष्टि निर्मित करने में अब तक मैं असफल रहा हूं। मैं अब स्त्री-पुरुष के समागम से मैं प्रजाओं को उत्पन्न कर सृष्टि का विस्तार करना चाहता हूं। परमेश्वरी शिवा ने अपनी भौंहों के मध्य भाग से अपने ही समान कांतिमती एक शक्ति प्रकट की। सृष्टि निर्माण के लिए शिव की वह शक्ति ब्रह्माजी की प्रार्थना के अनुसार दक्षकी पुत्री हो गई। देवी शिवा महादेव जी के शरीर में प्रविष्ट हो गईं, यही अर्द्धनारीश्वर शिव का रहस्य है और इसी से आगे सृष्टि का संचालन हो पाया, जिसके नियामक शिवशक्ति ही हैं।
       भारतीय वेदों, उपनिषदों तथा दर्शनों में सृष्टि का प्रारम्भ 'शब्द ब्रह्म' से माना जाता रहा है। उस ब्रह्म का न कोई आकार है और न कोई रूप। उसी 'शब्द ब्रह्म' का प्रतीक चिह्न साकार रूप में 'शिवलिंग' है। यह शिव अव्यक्त भी है और अनेक रूपों में प्रकट भी होता है।
       भारतीय मनीषियों ने भगवान के तीन रूपों- 'व्यक्त', 'अव्यक्त' और 'व्यक्ताव्यक्त' का जगह-जगह उल्लेख किया है। 'लिंग पुराण' में शिव के तीन स्वरूपों में व्यक्त किया है-
        एकेनैव हृतं विश्वं व्याप्त त्वेवं शिवेन तु।
        अलिंग चैव लिंगं च लिंगालिंगानि मूर्तय:॥ (लिंग पुराण 1/2/7) .....  अर्थात् शिव के तीन रूपों में से एक के द्वारा सृष्टि (विश्व) का संहार हुआ और उस शिव के द्वारा ही यह व्याप्त है। उस शिव की अलिंग, लिंग और लिगांलिंग तीन मूर्तियां हैं।
       भारत में शिवलिंग पूजा की परंपरा आदिकाल से ही है। पर लिंग पूजा की परंपरा सिर्फ भारत में ही नहीं है, बल्कि दुनिया के ज्यादातर हिस्सों में आरंभ से ही इसका चलन । यूनान में इस देवता को 'फल्लुस' ( जिससे अन्ग्रेज़ी में फ़ैलस = शिश्न बना )तथा रोम में 'प्रियेपस' कहा जाता था। (प्रियेपस = अंग्रेज़ी प्रिप्यूस, शिश्न का अग्र भाग ) 'फल्लुस' शब्द (टाड का राजस्थान, खंड प्रथम, पृष्ठ 603) संस्कृत के 'फलेश' शब्द का ही अपभ्रंश है, जिसका प्रयोग शीघ्र फल देने वाले 'शिव' के लिए किया जाता है। मिस्र में 'ओसिरिस' , चीन में 'हुवेड् हिफुह' था। सीरिया तथा बेबीलोन में भी शिवलिंगों के होने का उल्लेख मिलता  है।
         'लिंग' का सामान्य अर्थ 'चिन्ह' होता है। इस अर्थ में लिंग पूजन, शिव के चिन्ह या प्रतीक के रूप में होता है। सवाल उठता है कि लिंग पूजन केवल शिव का ही क्यों होता है, अन्य देवताओं का क्यों नहीं? कारण यह है कि शिव को आदि शक्ति के रूप में स्वीकार किया गया है, जिसकी कोई आकृति नहीं। इस रूप में शिव निराकार है। लिंग का अर्थ ओंकार (ॐ) बताया गया है....” तस्य लिंग प्रणव” ...अतः " 'लिंग' का अर्थ शिव की जननेन्द्रिय से नहीं अपितु उनके 'पहचान चिह्न' से है, जो अज्ञात तत्त्व का परिचय देता है। शिवपुराण प्रधान प्रकृति को ही लिंग रूप मानता है |  
प्रधानं प्रकृतिश्चैति यदाहुर्लिंगयुत्तमम्।
गन्धवर्णरसैर्हीनं शब्द स्पर्शादिवर्जितम् ॥ (लिंग पुराण 1/2/2)
       अर्थात् प्रधान प्रकृति उत्तम लिंग कही गई है जो गन्ध, वर्ण, रस, शब्द और स्पर्श से तटस्थ या वर्जित है। 'लिंग पुराण' में लिंग का अर्थ ओंकार (ॐ) बताया गया है।

   शिवलिंग की आकृति ----भारतीय धर्मग्रंथों के अनुसार यह संपूर्ण ब्रह्मांड मूल रूप में केवल अंडाकार ज्योतिपुंज ( आधुनिक विज्ञान के बिगबेंग का महापिन्ड-नीहारिका के स्वरुप की भांति ) के रूप में था। इसी ज्योतिपुंज को आदिशक्ति (या शिव) भी कहा जा सकता है, जो बाद में बिखरकर अनेक ग्रहों और उपग्रहों में बदल गई। (  
       आधुनिक विज्ञान के अनुसार --समस्त सौरमंडल एक महा नेब्यूला के बिखरने से बना है |
    वैदिक विज्ञान--'एकोहम् बहुस्यामि' का भी यही साकार रूप और प्रमाण है। इस स्थिति में मूल अंडाकार ज्योतिपुंज, दीपक की लौ या अग्निशिखा भी प्रतीक रूप में वही आकृति बनती है, जिसकी हम लिंग रूप में पूजा करते हैं। संपूर्ण ब्रह्मांड की आकृति निश्चित ही शिवलिंग की आकृति से मिलती-जुलती है इस तरह शिवलिंग का पूजन, वस्तुत: आदिशक्ति का और वर्तमान ब्रह्मांड का पूजन है।
          शिव के 'अर्द्धनारीश्वर' स्वरूप से जिस मैथुनी-सृष्टि का जन्म हुआ, जो तत्व-विज्ञान के अर्थ में विश्व संतुलन व्यवस्था में ( जो हमें सर्वत्र दिखाई देती है ) शिव तत्व के भी संतुलन हेतु योनि-तत्व की कल्पना की गयी जो बाद में भौतिक जगत में लिंग-योनि पूजा का आधार बनी|  उसे ही जनसाधारण को समझाने के लिए लिंग और योनि के इस प्रतीक चिह्न को सृष्टि के प्रारम्भ में प्रचारित किया गया |
      भाव यही है कि शिव अव्यक्त लिंग (बीज) के रूप में इस सृष्टि के पूर्व में स्थित हैं। वही अव्यक्त लिंग पुन: व्यक्त लिंग के रूप में प्रकट होता है। जिस प्रकार ब्रह्म को पूरी तरह न समझ पाने के कारण 'नेति-नेति' कहा जाता है, उसी प्रकार यह शिव व्यक्त भी है और अव्यक्त भी। वस्तुत: अज्ञानी और अशिक्षित व्यक्ति को अव्यक्त ब्रह्म (निर्गुण) की शिक्षा देना जब दुष्कर जान पड़ता है, तब व्यक्त मूर्ति की कल्पना की जाती है। शिवलिंग वही व्यक्त मूर्ति है। यह शिव का परिचय चिह्न है।
            अब हम लिंग की आधुनिक व्याख्या पर विस्तृत प्रकाश डालेंगे | जिसमें लिंग का अर्थ --आध्यात्मिक, जैविक, भौतिक व साहित्यक  एवं  भाषायी  आधार पर व्याख्यायित किया जाएगा | लिंग का मूल अर्थ किसी भी वस्तु..जीव ,जड़, जंगम ...भाव आदि का चिन्ह या पहचान होता है |
              आध्यात्मिक वैदिक आधार में --- ब्रह्म अलिंगी है| ----उससे व्यक्त ईश्वर व माया भी अलिंगी हैं |---जो ब्रह्मा , विष्णु, महेश व ...रमा, उमा, सावित्री ..के आविर्भाव के पश्चात ----विष्णु व रमा के संयोग से ....व विखंडन से असंख्य चिद्बीज  अर्थात “एकोहं बहुस्याम” के अनुसार विश्वकण बने जो समस्त सृष्टि के मूल कण थे | यह सब संकल्प सृष्टि ( या अलिंगी-अमैथुनी—ASEXUAL—विज्ञान ) सृष्टि थी | लिंग का कोइ अर्थ नहीं था |---à प्रथम बार लिंग-भिन्नता ...रूद्र-महेश्वर के अर्ध नारीश्वर रूप के  आविर्भाव से हुई à जो स्त्री व पुरुष के भागों में भाव-रूप से विभाजित होकर प्रत्येक जड़, जंगम व जीव के  चिद्बीज या विश्वकण में प्रविष्ट हुए | मानव-सृष्टि में ब्रह्मा ने स्वयं को पुरुष व स्त्री रूप ----मनु-शतरूपा में विभाजित किया और लिंग –अर्थात पहचान की व्यवस्था स्थापित हुई | क्योंकि शम्भु -महेश्वर लिंगीय प्रथा के जनक हैं अतः –इसे माहेश्वरी प्रजा व लिंग के चिन्ह को शिव का प्रतीक लिंग माना गया |
         जैविक-विज्ञान ( बायोलोजिकल ) आधार पर----सर्वप्रथम व्यक्त जीवन एक कोशीय बेक्टीरिया के रूप में आया जो अलिंगी ( एसेक्सुअल.. ) था ..समस्त जीवन का मूल आधार -à जो एक कोशीय प्राणी प्रोटोजोआ ( व बनस्पति—प्रोटो-फाइट्स--यूरोगायरा आदि ) बना| ये सब विखंडन (फिजन) से प्रजनन  करते थे |---à बहुकोशीय जीव  ...हाईड्रा आदि हुए जो विखंडन –संयोग ,बडिंग, स्पोरुलेशन से प्रजनन करते थे |---. वाल्वाक्स आदि पहले कन्जूगेशन( युग्मन ) फिर विखंडन से असंख्य प्राणी उत्पन्न करते थे |  इस समय सेक्स –भिन्नता अर्थात लिंग –पहचान नहीं थी |---à पुनः द्विलिंगीय जीव( अर्धनारीश्वर –भाव ) ...केंचुआ, जोंक..या द्विलिंगी पुष्प वाले पौधे .. आदि के साथ लिंग-पहचान प्रारम्भ हुई | एक ही जीव में दोनों स्त्री-पुरुष लिंग होते थे |-à तत्पश्चात एकलिंगी जीव ...उन्नत प्राणी ..व वनस्पति आये जो ..स्त्री-पुरुष अलग अलग होते हैं ... मानव तक जिसमें अति उन्नत भाव—प्रेम स्नेह, संवेदना आदि उत्पन्न हुए| तथा विशिष्ट लिंग पहचान आरम्भ हुई---यथा....
                         ..स्त्री में                ..............पुरुष में          
१-बाह्य पहचान----         योनि, भग                     लिंग (शिश्न)    
२-आतंरिक लिंग...          अंडाशय, यूटरस               वृषण (टेस्टिज)
३-बाह्य-उपांग ....          स्तन                        दाड़ी, मूंछ
४-आकारिकी(मोर्फोलोजी) ...  नरम व चिकनी त्वचा           पंख, रंग , कलँगी ,सींग
५-भाव-लिंग ...             धैर्य, माधुर्य, सौम्यता,          कठोरता, प्रभुत्व ज़माना ,आक्रमण क्षमता 
                        नम्रता, मातृत्व की इच्छा
----वनस्पति में –लिंग-पहचान---- पुष्पों का  सुगंध, रंग, भडकीलापन...एकलिंगी-द्विलिंगी पुष्प ..पुरुषांग –स्टेमेन ..स्त्री अंग ...जायांग ...पराग-कण आदि|
           तत्व-भौतिकी  आधार पर लिंग... मूल कणों को विविध लिंग रूप में -----ऋणात्मक ( नारी रूप ) इलेक्ट्रोन ...धनात्मक ( पुरुष रूप ) पोजीत्रोन..  के आपस में क्रिया करने पर ही सृष्टि ...न्यूट्रोन..का निर्माण होता है| शक्ति रूप ऋणात्मक –इलेक्ट्रोन....मूल कण –प्रोटोन के चारों और चक्कर लगाता रहता है| रासायनिकी में ...लिंगानुसार ...ऋणात्मक आयन व धनात्मक आयन समस्त क्रियाओं के आधार होते हैं |
          आयुर्वेद में भी .... लिंग -- निदान ...अर्थात रोग की पहचान , डायग्नोसिस को..... (अर्थात पहचान )...  कहते हैं |
         साहित्य व भाषाई जगत में.... लिंग.... कर्ता व क्रियाओं की पहचान को कहते हैं | प्रत्येक कर्ता या क्रिया ...स्त्रीलिंग, पुल्लिंग या नपुंसक लिंग होती है.... |
        आत्म-तत्व की लिंग-व्यवस्था ....
        आत्मा न नर है न नारी । वह एक दिव्य सत्ता भर है, समयानुसार, आवश्यकतानुसार वह तरह-तरह के रंग बिरंगे परिधान पहनती बदलती रहती है । यही लिंग व्यवस्था है । संस्कृत में 'आत्मा' शब्द नपुंसक लिंग है, इसका कारण यही है-आत्मा वस्तुतः लिंगातीत है । वह न स्त्री है, और न पुरुष ।
              अब  प्रश्न उठता है कि आत्मा जब न स्त्री है,और न पुरुष तो फिर स्त्री या पुरुष के रूप में जन्म लेने का आधार क्या है?
 

         इस अन्तर का आधार जीव की स्वयं की अपने प्रति मान्यताएँ हैं । जीव चेतना भीतर से जैसी मान्यता दृड होजाती है वही अन्तःकरण में स्थिर होजाती है | । अन्तःकरण के मुख्य अंग -मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार में अहंकार  वह अस्मिता-भाव है जिसके सहारे व्यक्ति सत्ता का समष्टि सत्ता से पार्थक्य टिका है ।  इसी अहं-भाव में जो मान्यताएँ अंकित-संचित हो जाती हैं वे ही व्यक्ति की विशेषताओं का आधार बनती हैं ।आधुनिक मनोवैज्ञानिक शब्दावली में अहंकार को अचेतन की अति गहन पर्त कह सकते हैं । इन विशेषताओं में लिंग-निर्धारण भी सम्मिलित है । जीवात्मा में जैसी इच्छा उमड़ेगी जैसी मान्यताएँ जड़ जमा लेंगी, वैसा  जीवात्मा का वही लिंग बन जाता है|  
         पुराणों में इस प्रकार के अगणित उदाहरण भरे पड़े हैं जिनमें व्यक्तियों ने अपने संकल्प बल एवं साधना उपक्रम के द्वारा लिंग परिवर्तन में सफलता प्राप्त की है--यथा ..शिखंडी.. विख्यात राजा इल व इला...        
      निम्न प्राणी ऊस्टर जन्तुओं में अग्रणी हैं । वे मादा की तरह अण्ड़े देने के बाद एक मास बाद ही नर बन जाते हैं और उभयपक्षीय लिंग में रहने वाली विभिन्नताओं का आनन्द लूटते हैं ।
                ----प्रत्येक मनुष्य के भीतर उभयलिंगों का अस्तित्व विद्यमान रहता है । नारी के भीतर एक नर सत्ता भी होती हैं, जिसे ऐनिमस कहते हैं । इसी प्रकार हर नर के भीतर नारी की सूक्ष्म सत्ता विद्यमान होती है, जिसे ऐनिमेसिस  कहते हैं । प्रजनन अगों के गह्वर में विपरीत लिंग का अस्तित्व भी होता है । नारी के स्तन विकसित रहते हैं, परन्तु नर में भी उनका अस्तित्व होता है ।
           अतः यह आवरण सामयिक है  आत्मा का कोई लिंग नहीं होता । एक ही जीवात्मा अपने संस्कारों और इच्छा के अनुसार पुरुष या नारी, किसी भी रूप में वैसी ही कुशलता के जीवन जी सकता है । नर नारी के भेद, प्रवृत्तियों की प्रधानता के परिणामस्वरूप शरीर मन में हुए परिवर्तनों में भेंद हैं । उनमें से कोई भी रूप श्रेष्ठ या निष्कृष्ट नहीं, अपने व्यक्तित्व यानी गुण क्षमताओं और विशेषताओं के आधार पर ही कोई व्यक्ति उत्कृष्ट या निष्कृष्ट कहा जा सकता है,लिंग के आधार पर नहीं । 
यही शिव तत्व का मूल अर्थ है, शिव लिंग की मूल व्याख्या , शिव एवं लिंग पूजा का रहस्य |
       यहाँ प्रसंगवश यह भी कहा जा सकता है कि फिर लिंग के आधार पर नर-नारी, कन्या-पुत्र का विभेद  क्यों ?-- यह सर्वथा अर्थहीन है, कन्या-भ्रूण ह्त्या पूर्णतः अतात्विक, अतार्किक, अवैज्ञानिक, अधार्मिक व  असामाजिक, अमानवीय कर्म है एवं  राष्ट्रीय अपराध  |