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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

रविवार, 16 अप्रैल 2017

अगीत - त्रयी...---- भाग छः ------------श्री जगत नारायण पांडे---डा श्याम गुप्त ..

....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


अगीत - त्रयी...---- भाग छः ------------श्री जगत नारायण पांडे----
|
--------अगीत कविता विधा के तीन स्तम्भ कवियों के परिचय साहित्यिक परिचय एवं रचनाओं का परिचय ---
अगीत कवि कुलगुरु साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य
महाकवि श्री जगत नारायण पांडे
महाकवि डा श्याम गुप्त-
\
श्री जगत नारायण पांडे के कुछ अगीत -----
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----- अगीत छंद----
१.
लिखता हूँ कविता
आखिर मैं किसलिए,
उत्तर दिया मन ने
अपने ही मन के लिए |
सत्य ने कहा रंग को
बिखरने दो जगत में
सार्थक होजायगी
तभी तेरी कविता |
२.
भूल गया अपना नाम
धुंए और शोर से
प्रदूषण के दूषण से
उड़ नहीं पाता हीरामन
घायल हैं पंख
रुंधा है कंठ
कैसे बोले राम राम |
३.
झुरमुट के कोने में
कमर का दर्द लपेटे
दाने बीनती परछाईं |
जमाना ढूंढ रहा है
खुद को किसी ढेर में |
४.
साधन और संकल्प
अन्योन्याश्रित हैं |
छूट गया अगर साथ
मलते रहेंगे हाथ,
धरे रह जायेंगे फिर
अंधेर में अरमान सब
सुलगने के लिए बस |

५.
काल की लहरों पर
मिलते बिछुड़ते रहे
प्रश्नों ने मांगे जब
उत्तर हम देते रहे
उत्तर न पा सके
अपने ही प्रश्न मगर |
६.
गिरेबां चमन के
होगये चाक
खिजाँ से आशना हुए
रहगुजर का निजाम है
दस्तो-पा खून आलूद हैं
मायूस है दिल गम से
कातिल का नाम पर हम न लेंगे |
७.
मात्र एक अहंकार
देता है जन्म विवेकहीनता को,
शून्य हो जाती है
अपनी पहचान, और-
विलीन होजाता है
सत्य का आकार |
८.
अक्षर और शब्द
गूंगे नहीं होते हैं !
कला आती नहीं
सामर्थ्य भी है नहीं
शब्दकोश केवल
पलटते रह जायेंगे !
अनुभव की कसौटी
रचती है नया कोश
रहता नहीं निरर्थक कोई शब्द |

९.
प्रथम रश्मि का आँचल
मृदुल पवन की लहर
तुहिन के मुक्ताकण
पल्लवों पर ठिठककर
गतिमान कर देते हैं
कवि की कल्पना के
प्राणों को अविरल |
१०.
कर रहे हो हत्या तुम
कन्या के भ्रूण की !
कर रहे हो पाप, छीन कर जीवन
भविष्य की मां का तुम |
जन्म देगा कौन फिर
अवतारों पैगम्बरों को
अवरुद्ध कर रहे क्यों
भविष्य की गति को तुम |
११.
उंच और नीच, दलित और पीड़ित
सबका है योगदान
राष्ट्र की प्रगति में
भूलें ये कभी न हम |
समरसता बंधुत्व से
सिंचित कर राष्ट्र को
उगाते रहें सदा
प्रगति के बीज |
१२.
आदिम युग में जाने क्यों
जी रहा है आज भी
सभी समाज यह
करके पैने नाखून
धंसा रहा है सीने में
इंसानियत के
क्यों आखिर ?
१३.
एक क्षितिज पर
उगता है सूरज
और डूब जाता है
दूसरे क्षितिज पर |
देखा नहीं कभी उसे चलते हुए
अपनी राह भटक कर |
१४.
क्या होगा आखिर
फूलों का, बहारों का
चांदनी का, हवाओं का
खुशनुमा नजारों का
मोती भी शबनमी,
सूख सब जायंगे
जलती रही धरती अगर
सूनी होजायगी
कलम की माँग फिर|
१५.
लूट में बंदी युवक से मैंने कहा,
’शक्ति यह-लगाओ देश की रक्षा में ‘
नेताओं की कृपा से-
लूटमार करके मैं
करता हूँ ऐश, फिर-
फ़ायदा क्या है भला
सीमा पर खून बहाने से ,
बोला वह धीमे से |
\
----गतिमय सप्तपदी अगीत छंद ---
. ..(महाकाव्य सौमित्र गुणाकर से)
१६.
चला जारहा मानव ऊपर
चिंता नहीं धरा की किंचित
भाग रहा है अपने से ही
संग निराशा की गठरी ले |
पंथ प्रकाशित हो संयम का
दे वरदान ज्योति का हे मां !
करून वन्दना रामानुज की | ..
१७.
गणनायक की कृपादृष्टि से
मां वाणी ने दिया सहारा
खुले कपट बुद्धि के जब, तब,
हुए शब्द-अक्षर संयोजितफ
पाई शक्ति लेखनी ने, फिर |
रामानुज की विमल कथा का
प्रणयन है अगीत शैली में |
१८.
स्रोत सृष्टि के लगे सूखने
सुख के सब आधार मिट गए |
लोभ मोह मद काम क्रोध की
महिमा का विस्तार होगया
ह्रास होगया सत्संगति का
क्षीण हुए सामाजिक बंधन
असंतुलन होगया सृष्टि का |....
१९.
सुनकर धनुष यज्ञ की चर्चा
विश्वामित्र होगये पुलकित |
राम लक्ष्मण को प्रेरित कर
जागृत की उत्कंठा मन में ,
धनुष यज्ञ दर्शन करने की |
अनुज सहित प्रभु की सहमति पा
चले साथ मुनिवर मिथिला को |
२०.
किया सुदृड़ भूतल लक्ष्मण ने
लेपन करके मृदा भित्ति पर |
भिन्न भिन्न पुष्पों के रंग से
रचना की सुन्दर चित्रों की |
प्रभु की पर्णकुटी से हटकर
था विशाल वटबृक्ष अवस्थित
स्वयं व्यवस्थित हुए वहां पर |
\
. .. खंड काव्य – मोह और पश्चाताप से -----
२१.
छुब्ध होरहा है हर मानव
पनप रहा है वैर निरंतर |
राम और शिव के अभाव में
विकल होरहीं मर्यादाएं ,
व्याप्त होरहा विष चन्दन में |
पीडाएं हर सकूं जगत की
ज्ञान मुझे दो प्रभु प्रणयन का |
२२.
काम क्रोध मद लोभ मोह सब
भाव बंधन के करक है बस,
ऋषि मुनि देव असुर औ मानव
माया से बच सका न कोइ
पश्चाताप शरण प्रभु की, है
मार्ग मुक्ति का हर कल्मष से
हो जाता अंतर्मन निर्मल |
२३.
नारद विष्णु भक्त थे ज्ञानी
काम विजय से उपज मोह ने
काम-क्रोध ने अहंकार ने
निरत लोक-कल्याण भक्त को
विचलित किया पंथ से, लेकिन
शाप भोग कर श्री हरि ने फिर
किया निवारण उनके भ्रम को |
२४.
सीता के प्रति चिंता को फिर
व्यक्त किया शबरी से प्रभु ने
बोली,’ अधमाधम नारी को
दर्शन देकर धन्य किया है
आगे ऋष्यमूक पर्वत पर
प्रभु ! हनुमान ,सुकंठ मिलेंगे
देंगे वह सहयोग आपको |
२५.
अहंकार का नाश होगया
नष्ट हुआ असुरों का संकुल
स्थिर हुआ शान्ति का शासन
हुए प्रसन्न संतगण, मुनिजन
होने लगे यज्ञ निष्कंटक
राम राज्य के शुभारम्भ की
शंखध्वनि गूंजी लंका में |
\
-----नवअगीत छंद ( अगीतिका से )-----
२६.
अँधेरे में छिपा लेते हैं पाप
दिन में पर रखते हैं
चेहरा ,
हर दम साफ़ |
२७.
सब के सब टूट गए
निष्ठा के प्रतिमान
जीवित संबंधों के
तटबंध डूब गए
स्रोत संकल्पों के रीत गए |
२८.
सिद्धांत का अभाव
डराता है सत्य को
यही है –
सत्ता का स्वभाव |

२९.
संकल्प ले चुके हम
पोलियो मुक्त जीवन का |
धर्म और आतंक के
विष से मुक्ति का
संकल्प भी तो लें हम |
३०.
बैठा था पनघट पर
अधूरी प्यास लिए
अतृप्त मन का
कर दिया तर्पण
नयनों ने छलककर |
--------क्रमश भाग सात---- महाकवि डा श्याम गुप्त .....

शनिवार, 15 अप्रैल 2017

पुनर्मूषकोभव --आलेख --स्त्री-पुरुष विमर्श ---- डा श्याम गुप्त

                             ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


------पुनर्मूषकोभव --आलेख --स्त्री-पुरुष विमर्श ----

------मैं अपने मित्रों से जब कभी भी अपना यह विचित्र सा लगने वाला मत या तर्क प्रस्तुत करता हूँ कि--
\
-- ‘आज की विभिन्न सामाजिक व नारी-पुरुष समस्याओं का कारण स्त्रियों का घर से बाहर निकल कर सेवा कार्य में लिप्त होजाना है ‘..---
\
-----.तो तुरंत मुझे तीब्र प्रतिक्रियाओं का सामना करना पड़ता है ...’आपके विचार पुरानपंथी हैं’...एसा भी कहीं होता है....अपने विचार बदलिए....आधुनिक विचार रखिये....अब स्त्रियाँ स्वतंत्र होचुकी हैं....वे क्यों न नौकरी अदि कार्य करें ?..पुराने शास्त्रों का ज़माना गया, आजके युग में उनका कोइ अर्थ नहीं ...और विभिन्न रटे हुए तर्क- क्या पुराने समय में ये सब नहीं होता था राम को दशरथ/ माँ में निकाल दिया, भाई-भाई में युद्द्ध नहीं हुआ था क्या आदि आदि ..|
---------क्योंकि सभी की बहू-बेटियाँ सेवाकार्यों अर्थात कमाने में ..आफिस कार्यों में संलग्न हैं, अत: वे सामान्यतः... सभी यही कर रहे हैं...आजकल ये आधुनिक समय का चलन है...हम आगे बढ़ रहे हैं ...आदि प्रारम्भिक विचारों से आगे सोच ही नही पाते |
------इस विषय को कुछ और स्पष्ट करने हेतु कुछ तथ्यों को हम निम्न क्रम में प्रस्तुत करेंगे----
\
१. जब मानव –आदि रूप में जंगल में रहता था, नर-नारी दोनों ही स्वतंत्र थे, अपने अपने लिए शिकार करते या फल एकत्र करते थे | कुछ आदि मानव झुंडों, समूहों में भी रहते थे , परन्तु सभी नर-नारी स्वतंत्र थे उन्मुक्त सेक्स था अन्य प्राणियों की भांति| न कोइ द्वंद्व न शिकवा-शिकायत |युगों तक यह चलता रहा |
\
२.
-----जब मानव पर्वतों की गुफाओं, पेड़ों, से उतर कर झौपडियों / घरों में रहने लगा, कृषि व अन्य आर्थिक तत्वों का विकास हुआ, समाज, संस्कृति, ग्रामों-नगरों आदि का विकास होने लगा तो परिवार व्यवस्था प्रारम्भ हुई, तो संतति सुरक्षा हेतु नारी ने सायं ही गृहकार्य को प्राथमिकता दी और पुरुष ने घर चलाने, पालन पोषण का भार स्वीकार किया|
-------अब केवल पुरुष कमाता था , बाहर जाकर कार्य, सेवा, नौकरी आदि करता था | स्त्रियाँ गृहकार्य, संतति पालन-पोषण, पुरुष की आवश्यकताओं का ध्यान रखना , पढ़ने पढ़ाने , कला, साहित्य आदि कर्म में निरत थीं | कुछ स्त्रियाँ किसी मजबूरी वश सेवा कर्म करती थीं परन्तु दासी कर्म आदि जिसे अधिक सम्मान से नहीं देखा जाता था |
-------गृहकार्य आदि से निवृत्त पुरुष ने बड़े बड़े विचार, ज्ञान, सामाजिक नियम आदि पर सोचा एवं वेद-पुराण –शास्त्र आदि का प्रणयन किया| नीति नियम , व्यवहार के ,आचरण के तत्व स्थापित किये, विवाह संस्था का उदय हुआ, स्त्री-पुरुष दोनों के लियी आचार संहिता बनी | समाज में स्थायित्व, समता व आदर्श व्यवस्था थी, स्त्री-पुरुष, पति-पत्नी बनकर अपने अपने कार्यों में संतुष्ट रहकर जीवन व्यतीत करते थे |
\
३. आज के युग में पुनः स्त्री स्त्री-स्वतंत्रता के नाम पर, घर से बाहर निकालकर, सेवाकार्य में रत रहकर , स्वतंत्र नौकरी व आय के साधन प्राप्त करके, पुरुषों की बराबरी के नाम पर अपने स्त्रियोचित गुण व कर्तव्यों का बलिदान , पुरुषों के कार्यों को अपने कन्धों पर ले रही है, एवं पुरुष पालन-पोषण हेतु नौकरी के साथ साथ गृह कार्य में भी बराबरी के रूप में हिस्सा बंटा रहा है |
--------अर्थात दोनों स्वतंत्र हैं—दोनों अपने अपने लिए कमाते हैं, दोनों ही घर का कार्य, संतति पालन पोषण का कार्य करते हैं| स्त्री अपने घर के कार्य की अपेक्षा पर-दास्य कर्म को अदिक महत्ता दे रही है| अर्थात प्रारम्भिक --डिविज़न ऑफ़ लेवर—जो संतान के हित में बनाया गया था समाप्त है| दोनों पति-पत्नी केवल सेक्स / बच्चे के लिए मिलते हैं| इससे आगे बढकर वह भी आवश्यक नहीं है व सब कहीं से भी प्राप्त किया जा सकता है |
------अर्थात नारी नारी न रहकर, पुरुष पुरुष न रहकर दोनों – पुरुष + नारी बनते जारहे हैं| पुरुष का पौरुष, नारी की स्वाभाविक स्त्रीत्व सौम्यता समाप्त होकर पुनः जंगल-युग के आदि मानव की भांति केवल प्राणी-मानव रह गया है | पुनर्मूषकोभव |
------ हम पुनः वहीं आगये हैं जहां से चले थे | जिसका परिणाम है कि जिस प्रकार पश्चिमी सभ्यता में स्त्री-पुरुषों में समन्वय न होने के कारण पुरुषों के भी सामान्य भौतिक कर्मों में लिप्त होने से कभी, कोइ कहीं वेद, शास्त्र, पुराण नहीं लिखे गए |
-------आज यहाँ भी पुरुषों के घरेलू कार्यों में लिप्त होने से कोइ उच्च विचार, अपने स्वयं के विचारों , सामाजिक, सांस्कृतिक, मानवीय आचरण के सद-विचारों का उदय नहीं होपारहा है | हाँ पश्चिम की सभ्यता की नक़ल से काम चलाया जा रहा है| यूं तो लोग खुश भी हैं, अज्ञानजनित प्रसन्नता से |

 

शुक्रवार, 14 अप्रैल 2017

अगीत - त्रयी...---- भाग पांच ------------श्री जगत नारायण पांडे---- डा श्याम गुप्त

                              ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



अगीत - त्रयी...---- भाग पांच ------------श्री जगत नारायण पांडे----
|
--------अगीत कविता विधा के तीन स्तम्भ कवियों के परिचय साहित्यिक परिचय एवं रचनाओं का परिचय ---
अगीत कवि कुलगुरु डा रंगनाथ मिश्र सत्य
महाकवि श्री जगत नारायण पांडे
महाकवि डा श्याम गुप्त-


महाकवि श्री जगत नारायण पांडे
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वक्तव्य ..
“अहंकार की संतुष्टि न होने से संशय, भ्रम, लोभ मोहादि का जन्म होता है जिनकी पूर्ति न होने से क्रोध होता है जो अंततः विनाश का कारण बनता है | अहंकारजन्य विकार अनुशासन, सामाजिक-समरसता और लोक मंगल को नष्ट करते हैं और सृष्टि का संतुलन बिगड़ जाता है |”
“संस्कृत छंद अतुकांत होते हुए भी लय एवं गेयता से पूर्ण होते हैं | अगीत, अतुकांत, तुकांत एवं अगेय अथवा लयबद्ध एवं गेय होते हैं|”
"अगीत पांच से दस पंक्तियों के बीच अपने आकार को ग्रहण करके भावगत-तथ्य को सम्पूर्णता से प्रेषित करता है|”
|
जीवन परिचय....
साहित्य की प्रत्येक विधा ...गद्य-पद्य, गीत-अगीत, छंद-ग़ज़ल सभी में समान रूप से सिद्धहस्त एवं रचनारत तथा कविता की अगीत-विधा के गति-प्रदायक महाकवि श्री जगत नारायण पांडे का जन्म लखनऊ के कान्यकुब्ज परवार में सं. १९३३ में हुआ| कुछ अपरिहार्य कारणों से आपकी शिक्षा-दीक्षा बिलम्ब से प्रारम्भ हुई| आलमबाग, लखनऊ के अमरूदही बाग़ मोहल्ले में घर के समीप ही प्राइमरी स्कूल से आपने चहर्रुम तक शिक्षा पाई परन्तु उर्दू में भी ज्ञान प्राप्त कर लिया | स्कूल के हेडमास्टर श्री वृन्दाबख्स ने उनकी लगन देख कर उन्हें अंग्रेज़ी की शिक्षा देकर ‘कान्यकुब्ज कालेज में दाखिले योग्य बनादिया| जहां से आपने हाईस्कूल व इंटर की परीक्षा पास की | वे अपने पिता के साथ रामायण की मंडली में रामायण पाठ, भजन-कीर्तन भी किया करते थे, जिसने उन्हें देवी-देवताओं के प्रति भक्ति भावना प्रधान बना दिया| इसी परिवेश के चलते उन्होंने बी ऐ, एल एल बी तक शिक्षा प्राप्त की | कालिज की हिंदी गतिविधियों में वे बराबर भाग लेते रहे|
.
आपका विवाह सीतापुर निवासी स्व. शिवनारायण मिश्र की की पुत्री मालती से हुआ | आपके चार संताने हैं बड़े पुत्र विजय का व्यवसाय है, छोटे पुत्र केशव पांडे एम् ऐ एल एल बी,एडवोकेट है व तीसरे पुत्र राजीव जेसी आईएसएफ़ में इन्स्पेक्टर हैं| सबसे बड़ी पुत्री हैं जो बीऐ हैं एवं उनका विवाह डा रमेश चन्द्र शर्मा से हुआ है|
अधिवक्ता के रूप में आप दीवानी व फौजदारी के मुकदमों में निष्णात थे एवं अन्य अधिवक्ता भी उनसे परामर्श लेते थे| न्यायालय में होने वाले सांस्कृतिक कार्यों में उनका योगदान रहता था| आप विधिक सेवा प्राधिकरण के मानद सदस्य भी रहे| ऐसी महान विधिक व साहित्यिक विभूति महाकवि पं .जगत नारायण पांडे १६ फरवरी २००७ ई. को भगवदधाम प्रयाण कर गए |
|
साहित्यिक परिचय—
आपकी साहित्यिक यात्रा का सूत्रपात कालिज के दिनों से ही होचुका था| तत्पश्चात वकालत के व्यवसाय के साथ साथ ही वे काव्यसाधना में भी रत रहे| हिन्दी, अंग्रीजी, उर्दू पर उनका अच्छा अधिकार था एवं संस्कृत भाषा का भी अच्छा ज्ञान था| काव्य की हर विधा-- गद्य-पद्य, गीत अगीत, छंद , हाइकू ,ग़ज़ल, मुक्तक, संतुलित कहानियां, व्यंग्य आलेख आदि पर उनका समानाधिकार था| देश की विभिन्न पात्र-पत्रिकाओं में उनकी रचनाएँ प्रकाशन के अतिरिक्त ,आकाशवाणी से काव्यपाठ के अतिरिक्त दूरदर्शन पर पत्रोत्तर कार्यक्रम को भी स्थान दिया गया | लगभग २० काव्य-कृतियों की भूमिकाएं भी उन्होंने लिखी है जिनमें श्री वीरेन्द्र अंशुमाली की ‘तात्याटोपे’ मधुकर अस्थाना की ‘वक्त आदमखोर’, डा योगेश गुप्ता की कृति’ अंतर-क्षितिज’ एवं महाकवि डा श्याम गुप्त के अगीत महाकाव्य ‘सृष्टि’ व अतुकांत काव्यसंग्रह ‘काव्य-मुक्तामृत‘ उल्लेखनीय हैं |
अगीत काव्य विधा को उन्होंने पूरे मनोयोग से अपनाया एवं निखारने व गति प्रदान करने में अतुलनीय सहयोग दिया| अगीत विधा में अगीत के नवीन छंद गतिमय सप्तपदी अगीत की रचना की जिसमें आपने प्रथम खंडकाव्य ‘मोह व पश्चाताप’ एवं प्रथम महाकाव्य ‘सौमित्र गुणाकर‘ की रचना करके आपने अगीत-विधा को निखारने एवं अग्रगामी होने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई| आपके ३३१ अगीतों का संग्रह ‘अगीतिका’ भी प्रकाशित है| शिव-पार्वती विवाह के विषय पर सवैया व बरवै छंदों में आपने ‘इदम शिवाय’ कृति की भी रचना की है|
पता--५६५/१०, अम्ररूदही बाग़,
आलमबाग ,लखनऊ
              .क्रमश ---भाग छः ---श्री जगत नारायण पांडे के कुछ अगीत ...
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गुरुवार, 13 अप्रैल 2017

अगीत - त्रयी...---- भाग चार -------डा रंगनाथ मिश्र सत्य के अगीत कुछ अगीत -----डा श्याम गुप्त..

                           ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...  




अगीत - त्रयी...---- भाग चार -------डा रंगनाथ मिश्र सत्य के अगीत कुछ अगीत -----
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--------अगीत कविता विधा के तीन स्तम्भ कवियों के परिचय साहित्यिक परिचय एवं रचनाओं का परिचय ---
अगीत कवि कुलगुरु साहित्यभूषण
डा रंगनाथ मिश्र सत्य
महाकवि श्री जगत नारायण पांडे
महाकवि डा श्याम गुप्त-


भाग चार--- डा सत्य के अगीत यहाँ प्रस्तुत हैं ..

१.
" मां वाणी !
मुझको ज्ञान दो
कभी न आये मुझमें स्वार्थ ,
करता रहूँ सदा परमार्थ ;
पीडाओं को हर दे मां !
कभी न सत्पथ से-
मैं भटकूं
करता रहूँ तुम्हारा ध्यान | "

" घर घर में खुशहाली लाएं ,
जीवन साकार करें ;
नवयुग निर्माण करें ,
सबको निज गले लगाएं | "
३.
" दलितों के प्रति मत करो अन्याय
उन्हें भी दो समानता से-
जीने का अधिकार , अन्यथा-
भावी पीढ़ी धिक्कारेगी, और-
लेगी प्रतिकार ;अतः --
ओ समाज के ठेकेदारो !
उंच-नीच की खाई पाटो ,
दो शोषितों को ही न्याय | "
४.
" बूँद बूँद बीज ये कपास के,
खिल-खिल कर पड रही दरार;
सडी-गली मछली के संग,
ढूँढ रहा विस्मय विस्तार,
डूब गए कपटी विश्वास के | "
५.
दिशाहीन नहीं हूँ अभी-
पाई है केवल बदनामी,
खोज रहे हैं मुझको,
मेरे प्रेरक सपने
मिलनातुर हैं मुझसे
मेरे सारे अपने,
क्रियाहीन नहीं हूँ अभी
यह तो है जग की नादानी |
६.
" असफलता आज थक गयी है ,
गुजरे हैं हद से कुछ लोग ,
उनकी पहचान क्या करें ?
अमृत पीना बेकार,
प्राणों की चाह है अधूरी ,
विह्वलता और बढ़ गयी है |"

७.
"" श्रम से जमीन का नाता जोड़ें ,
श्रम जीवन का मूलाधार ,
श्रम से कभे न मानो हार ;
श्रम ही श्रमिकों की मर्यादा,
श्रम के रथ को फिर से मोड़ें
८.
" सपने में मिलने तुम आये,
धीरे से तन छुआ,
आँखें भर आईं , दी दुआ;
मौन स्तब्ध साक्षात हुआ ,
सहसा विश्वास जमा -
मन को तुम आज बहुत भाये | "
९.
" नवयुग का मिलकर
निर्माण करें ,
मानव का मानव से प्रेम हो ,
जीवन में नव बहार आये |
सारा संसार एक हो,
शान्ति औए सुख में-
यह राष्ट्र लहलहाए "

१०.
" तुमे मिलने आऊँगा,
बार बार आऊँगा |
चाहो तो ठुकरादो,
चाहो तो प्यार करो |
भाव बहुत गहरे हैं,
इनको दुलरालो | "
११.
" आओ हम अंधकार दूर करें ,
रात और दिन खुशी-खुशी बीते;
सारा संसार शान्ति पाए ,
अपना यह राष्ट्र प्रगतिगामी हो ;
वैज्ञानिक उन्नति से ,
इसको भरपूर बनाएँ | "
१२.
"टूट रहा मन का विश्वास ,
संकोची हैं सारी
मन की रेखाएं|
रोक रहीं मुझको
गहरी बाधाएं |
अंधकार और बढ़ रहा ,
उलट रहा सारा इतिहास | "
१३.
"कवि चिथड़े पहने
चखता संकेतों का रस,
रचता -रस, छंद, अलंकार
ऐसे कवि के क्या कहने |"
१४.
" स्तम्भन एक और ....
संबंधी भीड़-भाड
ध्वंस की कतारों में ;
मक्षिका नहा रही-
दूध के पिटारों में |
ढला ढला लगता सब ओर...
अपने में स्नेह-सिक्त,
तिरछा भूगोल |"
१५.
"देव नागरी को अपनाएं
हिन्दी है जन जन की भाषा ,
भारत माता की अभिलाषा |
बने राष्ट्रभाषा अब हिन्दी,
सब बहनों की बड़ी बहन है
हिन्दी सबका मान बढाती ,
हिन्दी का अभियान चलायें|"
१६.
"आओ ! हम राष्ट्र को जगाएं
आजादी का जश्न मनाना,
हमारी मजबूरी नहीं-
अपितु कर्तव्य है |
आओ हम सब मिलकर
विश्व-बंधुत्व अपनाएं,
स्वराष्ट्र को प्रगति पथ पर -
आगे बढाएं |"
१७.
"इधर उधर जाने से
क्या होगा ;
मोड़ मोड़ पर जमी हुईं हैं ,
परेशानियां |
शब्द -शब्द अर्थ सहित
कह रहीं कहानियां
मन को बहलाने से
क्या होगा |"
१८.
सबका सम्मान करो
सब भारत मां की हैं संतानें
उनमें मतभेद मत करो |
उंच-नीच का जो
भ्रमजाल आज फैला है,
मिलजुलकर उसको भी दूर करो |
१९.
आशाएं साथ हैं हमारे
कभी कभी द्वार पर टेरती उदासी
तनहाई में मुझको
घेरती उदासी ,
बिछुडन भी होरही उदास
बाधाएं साथ हैं हमारे |
२०.
जीवन तो तुझको है अर्पण
ध्यान मग्न बैठा हूँ मैं
देख रहा तेरा श्रृंगार,
साहस को फिर बटोरकर
आया हूँ फिर तेरे द्वार
शेष सभी तुझको समर्पण |
२१.
नवल प्रात: आया है आज यहाँ
धीरे धीरे रात चली गयी,
ऊषा ने जब प्रभात फैलाया |
सूरज भी चलने को आतुर है,
लाजवंती शाम ढल गयी,
अन्धकार गहराया आज यहाँ |
२२.
आँखों को चित्र भागया
कैसे मैं छोडूं यह महानगर
बाधाएं दो नहीं हज़ारों,
आशाएं कर रहीं श्रृंगार
पार्कों में बैठे कुछ लोग
जीवन का दर्द रहे बाँट
अपने में डूब गया सत्य
देख रहा गोमती डगर |
२३.
धीरज को बाँध नहीं पाता...|
जीवन में छागई उदासी,
मन को समझाता हूँ बार बार,
वह भी तो साथ नहें देता |
कैसे मैं व्यक्त करूँ
अंतर-पीडाओं को
इसका भी ध्यान नहीं आता|

२४.
कैसे तुम्हें भूल जाऊं
सारा विश्वास तुम्हीं हो,
मेरा आकाश तुम्हीं हो,
सारे संसार में अकेले,
मेरा मधुमास तुम्हीं हो
तुमको तज और कहाँ जाऊं |
१३.
आतप ने सांकल खटकाई जब
बिरहन की पीड़ा दोगुनी हुई |
जोर जोर चलती हैं, विष भरी हवाएं
तन मन में आग लगी
कौन आ बुझाए|
भेजी जब प्रियतम ने पाती परदेश से
सीने पर रखने से
पीड़ा कुछ कम हुई |
२६.
चलना ही नियति हमारी है
घूम घूम कर करता रहता आभास
धरती के साथ साथ
सोया आकाश ,
लक्ष्यों तक जाने को
निश्चित स्वर पाने को
संसृति को होता विश्वास,
चलना ही प्रगति हमारी है |
२७.
संघर्षों से कभी न ऊबें |
जो भी हम आज जीरहे
उसका तो अंत सत्य है,
कर्मों को करते जाएँ हम
अपने कर्तब्यों में बार बार डूबें |

२८.
"ओ बसंत ! फिर आना
सिहरन के साथ |
तेरे आने की आहट मिल जाती है;
पाहुन से मिलने की,
इच्छा तडपाती है ;
ओ बसंत ! फिर आना ,
मनसिज के साथ | "
२९.
आओ हम सृजन को जियें |
सत्य और संयम, मन में उत्साह भरें
जीवन आशान्वित हो
शान्ति के सहारे |
हिंसा का त्याग करें
सबको सुख दे करके
हम गरल पियें|
३०.
जिन्दगी में सुख-दुःख दोनों ही मिलते रहते |
जिन्दगी का सत्य क्या रहा
जीवन का तथ्य क्या रहा,
जिन्दगी में शूल यदि मिले
तो फूल भी कभी कभी खिले ,
जिन्दगी में हृदयों के दीप जलते रहते...|
.......क्रमश---भाग पांच----




















          

बुधवार, 12 अप्रैल 2017

मेरा एक कथाचित्र--- डा श्याम गुप्त

....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ..

 मेरा एक कथाचित्र--- जल रंग ...


 

अगीत - त्रयी...---- भाग तीन -------डा रंगनाथ मिश्र सत्य का वक्तव्य व परिचय .------डा श्याम गुप्त

                                 ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



अगीत - त्रयी...---- भाग तीन -------डा रंगनाथ मिश्र सत्य का वक्तव्य व परिचय .------


--------अगीत कविता विधा के तीन स्तम्भ कवियों के परिचय साहित्यिक परिचय एवं रचनाओं का परिचय ---
अगीत कवि कुलगुरु डा रंगनाथ मिश्र सत्य
महाकवि श्री जगत नारायण पांडे
महाकवि डा श्याम गुप्त-
---------भाग-तीन------डा रंगनाथ मिश्र सत्य का वक्तव्य व परिचय Image may contain: 1 person, sunglasses and closeup
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----वक्तव्य—
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.." अगीत का सम्बन्ध मनुष्य की आस्था से है, भारतीयता से है, उसकी संस्कृति से है | अगीत, हिन्दी भाषा व हिन्दी साहित्य को गति व दिशा देने में सहायक, सक्षम व सफल है ; इसीलिये यह आज विश्वभर में फ़ैल रहा है और मैं भविष्य के प्रति आशान्वित हूँ |"..
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“गीत में 'अ' प्रत्यय लगा कर मैंने अगीत को संज्ञा के रूप में स्वीकार किया | अगीत, गीत नहीं के रूप में न लिया जाय | यह एक वैज्ञानिक पद्धति है जिसने संक्षिप्तता को ग्रहण किया है, सतसैया के दोहरे की भांति |" "अगीत विधा में भाव को प्रधानता दी जाती है | यदि गीत नियमों की बंदिश से मुक्त कोई तुकांत या अतुकांत रचना, चार से दस पंक्तियों में अपने भाव, लय, गति व्यक्त करने में सक्षम है तो वह अगीत है |”
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----जीवन परिचय.----...
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साठोत्तरी कविता जगत में कविता की नवीन विधा अगीत के संस्थापक साहित्यकार डा रंगनाथ मिश्र सत्य का जन्म १ मार्च १९४२ को जनपद रायबरेली ( उ.प्र.) के ग्राम कुर्री सुदौली के एक संभ्रांत कान्यकुब्ज परिवार में हुआ | आपके पिता का नाम श्री रघुनन्दन प्रसाद एवं माता श्रीमती शिवानाथा देवी मिश्रा था| धार्मिक वातावरण में जन्मे डा सत्य जी अपने भाइयों में सबसे छोटे थे | अल्पायु में ही पिता का निधन होने पर प्रारम्भिक शिक्षा-दीक्षा गाँव में ही बड़े भाइयों के संरक्षण में हुई|
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आपने कानपुर श्रमिक शिक्षा केंद्र से श्रमिक-शिक्षक का प्रशिक्षण भी प्राप्त किया आगे की उच्च शिक्षा शिक्षा लखनऊ के विद्यांत डिग्री कालेज से प्राप्त की | इन्टरमीडिएट की परीक्षा के उपरांत उ.प्र. राज्य परिवहन निगम कैसरबाग में अपनी सेवायें अर्पित कीं एवं साथ-साथ ही उच्च शिक्षा भी प्राप्त करते रहे | हिन्दी-साहित्य में परास्नातक की उपाधि लखनऊ विश्वविद्यालय से करने के उपरांत डा उषा गुप्ता के निर्देशनमें ‘नए हिन्दी काव्य में कतिपय प्रमुख वाद‘ विषय पर पीएचडी की उपाधि प्राप्त की | आप सन 2000 ई में उ.प्र. राज्य परिवहन निगम कैसरबाग में केंद्र प्रभारी पद से सेवानिवृत्त हुए| वे हिन्दी साहित्य परिषद् के महामंत्री तथा लखनऊ वि वि के हिन्दी विद्यार्थी परिषद् के अध्यक्ष भी रहे |
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आपका विवाह कालूखेडा उन्नाव के स्व. गंगाचरण शुक्ल की पुत्री श्रीमती कल्याणी देवी से हुआ| आपके दो पुत्र अनुराग मिश्र व आशुतोष मिश्र एवं दो पुत्रियाँ मधु व सीमा हैं|
-------साहित्यिक परिचय .------
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क्रान्तियुगोत्तर साहित्यकार, अगीत काव्य के प्रणेता, ‘संतुलित कहानी विधा’ के जनक एवं ‘संघीय समीक्षा पद्धति’ के अगुआ तथा आधुनिक हिन्दी कविता और वर्तमान भारत की भाषायी व सांस्कृतिक गौरव को पहचान दिलाने में समकालीन नव-साहित्यकारों व युवाओं के प्रेरणास्रोत साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र ‘सत्य’ का नाम हिन्दी साहित्य जगत के लिए नया नहीं है| वाल्याकाल से ही आप कविता से जुड़े रहे | आपने तरुण साहित्यकार सम्मलेन एवं कवि-कोविद क्लब के मंत्री पद से साहित्य सेवा में अमूल्य योगदान दिया | आपने सं १९६६ई. में साठोत्तरी कविता जगत में अतुकांत काव्य की एक नयी विधा ‘अगीत कविता’ को जन्म दिया|, १९७५ में ‘संतुलित कहानी; तथा १९९८ में ‘संघीय समीक्षा पद्धति’ का प्रचलन किया | आपका प्रथम स्वरचित काव्य संग्रह ‘बिछुड़े मीत’ १९६० में प्रकाशित हुआ| ‘कवि सोहनलाल सुबुद्ध एक परिचय’ तथा ‘ महाकवि जगत नारायण पांडे; एक परिचय ‘ आपकी अन्य लोकप्रिय कृतियाँ हैं| आपने ‘अगीत काव्य के चौदह रत्न’, ‘अगीत के इक्कीस स्तम्भ’, ‘अगीत काव्य के अष्टादश पथी’ एवं ‘अगीत के सोलह महारथी’ आदि पुस्तकों का सम्पादन किया| ‘अगीतोत्सव -89’, ‘कश्मीर हमारा है’, ‘जवानो आगे बढ़ो’ ‘पनघट’ आदि काव्य संग्रहों तथा ‘समीक्षा पद्धति की पुस्तक गुणदोष (पार्थोसेन), लघु उपन्यास ‘सुमि’ निबंध संग्रह ‘स्वयंगंधा’, का भी संपादन किया | १९६६ से आपने लगभग १५ वर्षों तक अगीत-त्रैमासिक पत्रिका का सम्पादन किया तत्पश्चात उनके संरक्षण में ‘अगीतायन साप्ताहिक पत्र’ का लगातार संपादन किया जा रहा है| आपने दर्ज़नों पुस्तकों की भूमिका लिखी जिनमें महाकाव्य, खंडकाव्य, काव्य संग्रह भी शामिल हैं|
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नियमित रूप से आपके कार्यक्रम आकाशवाणी एवं दूरदर्शन पर प्रसारित होते रहते हैं| आप लगभग साढ़े चार हज़ार से अधिक साहत्यिक व सांस्कृतिक समारोहों का आयोजन संचालन व अध्यक्षता कुशल पूर्वक कर चुके हैं| प्रथम विश्व हिन्दी सम्मलेन नागपुर एवं हिन्दी सम्मलेन दिल्ली में वे अ.भा. अगीत परिषद् का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं| आपके ऊपर एक लखनऊ विशाविद्यालय द्वारा शोध-प्रबंध ‘ अगीत परिषद् साहित्यिक संस्था, एक अनुशीलन ‘ किया जा चुका है| आपको देश भर के अनेक सम्मानों व पुरस्कारों से समानित किया जा चुका है|
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संपर्क- अगीतायन, ई-३८८५,राजाजीपुरम,लखनऊ-१७.,दू.भा. ०५२२-२४१४८१७ ..मो.९३३५९९०४३५ ..


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रविवार, 9 अप्रैल 2017

अगीत - त्रयी-----भाग दो ..अगीत त्रयी का कथ्य......डा श्याम गुप्त ..

....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


अगीत - त्रयी-----भाग दो ...डा श्याम गुप्त ..

---अगीत - त्रयी...---
--------अगीत कविता विधा के तीन स्तम्भ कवियों के परिचय साहित्यिक परिचय एवं रचनाओं का परिचय ---
अगीत कवि कुलगुरु डा रंगनाथ मिश्र सत्य
महाकवि श्री जगत नारायण पांडे
महाकवि डा श्याम गुप्त---..



-------भाग दो ----



***अगीत त्रयी का कथ्य*** 

आज कविता की अगीत-विधा का संसार व्यापक हो चुका है तथा विश्व भर में फैले कवियों, अगीत रचनाओं, अगीत-काव्य व साहित्य के प्रति आलेखों, समीक्षाओं, काव्य-कृतियों, खंड-काव्यों, महाकाव्यों, पत्र-पत्रिकाओं एवं विविध आयोजनों के माध्यम से केवल भारत में ही नहीं अपितु अंतर्राष्ट्रीय क्षितिज पर स्थापित होकर दैदीप्यमान हो रहा है | 

-------बेंगलोर के तमिल-अंग्रेज़ी कवि डा नेव्युला बी राजन का अंग्रेज़ी ब्लेंक-वर्स में एक त्रिपदा-अगीत देखें ....

The world as it stands today
Is because of the dreamers
Their dreams never die. -----Dreams never die. 

…..जिसका हिन्दी अनुवाद इस प्रकार है---- 

आज जो यह दुनिया जैसी दिखती है,
सपने देखने वालों के कारण है;
जिनके सपने कभी नहीं मरते |....( अनुवाद –डा श्याम गुप्त )

--------अगीत-विधा की इस व्यापकता की उद्देश्य यात्रा में उसके स्तम्भ रूप तीन साहित्यकार, रचनाकार व कृतिकार हैं जो इस विधा के संस्थापक, गति प्रदायक एवं उन्नायक रहे हैं | १९६६ई में अगीत-विधा के संस्थापक डा रंगनाथ मिश्र ‘सत्य’, अगीत-विधा में सर्वप्रथम खंडकाव्य एवं महाकाव्य रचकर उसे गति देने वाले स्व.श्री जगत नारायण पाण्डे एवं अगीत-विधा में प्रथमबार सृष्टि-रचना जैसे गूढ़तम दार्शनिक, वैज्ञानिक विषय पर हिन्दी में प्रथम महाकाव्य ‘सृष्टि-ईषत इच्छा या बिगबेंग-एक अनुत्तरित उत्तर‘ के रचयिता, अगीत-विधा के विविध छंदों के सृजक एवं अगीत-काव्य का सर्वप्रथम छंद-विधान ‘अगीत साहित्य दर्पण’ जैसी कृति रचकर विधा के उन्नायक डा श्याम गुप्त |
-------अगीत-त्रयी के ये कवि समाज के भिन्न भिन्न क्षेत्रों व व्यवसाय एवं विचार-धारा से हैं एवं मूल में साहित्य के बाहर के क्षेत्र होते हुए भी साहित्य की शास्त्रीय छंदीय-विधा, तुकांत काव्य-विधा, गीति-विधा एवं कथा-समीक्षा-लेख आदि गद्य-काव्य में भी सफलतापूर्वक रचनारत हैं | वे पर्याप्त अनुभवी हैं, समाज में गहन रूचि रखते हुए प्रतीत होते हैं जिसके कारण वे साहित्यिक क्षेत्र में अवतरित हुए | वे अगीत के क्षेत्र में उस विधा की काव्य-जिजीविषा, काव्य-विकास एवं समकालीन काव्य की प्रगति की संभावना दृष्टिगत होने के कारण पदार्पित हुए |
----------अगीत-त्रयी- ‘अगीत साहित्य दर्पण’ की भांति एक ऐतिहासिक दस्तावेज तो है ही, साठोत्तरी दशक की काव्य-प्रगति को समझने के लिए भी यह अनिवार्य है। इस सदी के साठोत्तरी काल का कवि अपने समय से अग्रगामी काव्य-तत्व लिए हुए नवीन काव्य विधा ..अगीत...से किस ढंग से प्रभावित हुआ और आज वह विधा व कवि का कविता तत्व से सम्बन्ध किस प्रकार विभिन्न रूप भंगिमाएँ ग्रहण करता कहाँ पहुँचा है, यह इसके यथार्थबोध की कृति है | कहना असंगत न होगा कि बीसवीं सदी के साठोत्तरी दशक एवं समकालीन काव्य-इतिहास में ‘अगीत काव्य-विधा’ ने जो स्थान पाया और जिस अर्थ और भाव में उसका प्रभाव परवर्ती काव्य-विकास में व्याप्त है एवं व्याप्त होता जा रहा है उसके व्यक्त-अव्यक्त प्रभाव को प्रस्तुत प्रकाशन रेखांकित करता है |
-------- कम ही होती हैं काव्य-कृतियाँ जो स्वयं इतिहास का एक अंग बन जाएँ और आगे के लिए दिशा-दृष्टि दे सकें| कहा जा सकता है कि प्रस्तुत काव्य-संकलन, हिन्दी काव्य का दिशाबोधक है और आज के सन्दर्भ में आधुनिक हिन्दी काव्य के इतिहास में अगीत कविता विधा के छंद-विधान “अगीत साहित्य दर्पण” की भांति एक और मील का पत्थर है, एक और प्रगतिशील आलोक शिखा समान है |
-------प्रस्तुत कृति “अगीत-त्रयी” अगीत के इन तीन स्तंभों के परिचय, साहित्य सेवा एवं उनके ३०-३० श्रेष्ठ अगीतों के संकलन के साथ हिन्दी काव्य जगत में प्रस्तुत की जा रही है, इस दृष्टि व आत्मविश्वास के साथ कि यह कृति अगीत-विधा को नए नए आयाम प्रदान करने के साथ नए नए कवियों, साहित्यकारों को अगीतों की रचना हेतु प्रोत्साहित करेगी एवं अगीत कविता विधा और समृद्धि शिखर की और अग्रसर होती रहेगी |
-- डा श्याम गुप्त


-------मंगलाचरण -----


माँ वाग्देवी !
आपकी कृपा-वीणा की झंकार से उद्भूत
गगनांगन में ध्वनित-तरंगायित होती हुई
नए भोर की उषा सरीखे स्वर्णिम रंगों को बिखराती
काव्य-निशान्धकार को भेद, वक्त के सांचे को बदलने
यह काव्य विधा ‘अगीत’-
नीलगगन से उतरी -धीरे धीरे धीरे |
माँ वरदायिनी! आशिष मिले- श्याम को,
यह नव-स्वर, नवलय, नवल-भाव, नवोल्लास युत काव्यधारा,
विहरित रहे धरा पर |