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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

बुधवार, 19 अप्रैल 2017

अगीत - त्रयी...---- भाग सात---डा श्याम गुप्त का वक्तव्य व परिचय----डा श्याम गुप्त

                    ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

 अगीत - त्रयी...---- भाग सात---डा श्याम गुप्त---------



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--------अगीत कविता विधा के तीन स्तम्भ कवियों के परिचय साहित्यिक परिचय एवं रचनाओं का परिचय ---

अगीत कवि कुलगुरु साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य
महाकवि श्री जगत नारायण पांडे
महाकवि डा श्याम गुप्त-



                     भाग सात------ डा श्याम गुप्त का वक्तव्य व परिचय ----




---वक्तव्य --
------- “काव्य सौन्दर्य प्रधान हो या सत्य प्रधान, इस पर पूर्व व पश्चिम के विद्वानों में मतभेद हो सकता है, आचार्यों के अपने अपने तर्क व मत हैं | सृष्टि के प्रत्येक वस्तु-भाव की भाँति कविता भी ‘सत्यं शिवं सुन्दरं‘ होनी चाहिए | साहित्य का कार्य सिर्फ मनोरंजन व जनरंजन न होकर समाज को एक उचित दिशा देना भी होता है, और सत्य के बिना कोइ दिशा, दिशा नहीं हो सकती | केवल कलापक्ष को सजाने हेतु एतिहासिक, भौगोलिक व तथ्यात्मक सत्य को अनदेखा नहीं करना चाहिए | ---काव्य निर्झरिणी से
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-------- “साहित्य व काव्य किसी विशेष समाज, शाखा व समूह या विषय के लिए न होकर समग्र समाज के लिए, सबके लिए होता है| अतः उसे किसी भाषा, गुट या शाखा विशेष की संकीर्णता की रचनाधर्मिता न होकर भाषा व काव्य की समस्त शक्तियों, भावों, तथ्यों, शब्द-भावों व सम्भावनाओं का उपयोग करना होता है | प्रवाह व लय काव्य की विशेषताएं हैं जो काव्य-विषय व भावसम्प्रेषण क्षमता की आवश्यकतानुसार छंदोबद्ध काव्य में भी हो सकती है एवं छंद-मुक्त काव्य में भी| अतः गीत-अगीत कोई विवाद का विषय नहीं है |”
--शूर्पणखा अगीत काव्य उपन्यास से
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-------- “ समाज में जब कभी भी विश्रृंखलता उत्पन्न होती है तो उसका मूल कारण मानव मन में नैतिक बल की कमी होता है भौतिकता के अतिप्रवाह में शौर्य, नैतिकता, सामाजिकता, धर्म, अध्यात्म, व्यवहारगत शुचिता, धैर्य, संतोष, समता, अनुशासन आदि उदात्त भावों की कमी से असंयमता पनपती है | अपने इतिहास, शास्त्र, पुराण, गाथाएँ, भाषा व ज्ञान को जाने बिना भागम-भाम में नवीन अनजाने मार्ग पर चल देना अंधकूप की और चलना ही है | आज की विश्रृंखलता का यही कारण है |” ------- शूर्पणखा से
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--------- ‘ मेरे विचार से समस्या-प्रधान व तार्किक विषयों को मुक्त-छंद रचनाओं में सुगमता से कहा जा सकता है, जो जनसामान्य के लिए सुबोध होती हैं|’ --काव्य मुक्तामृत से

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----जीवन परिचय
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------------- चिकित्सा व साहित्य जगत में जाना पहचाना नाम, चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक डा एस बी गुप्ता व साहित्यकार डा श्याम गुप्त का जन्म पश्चिमी उत्तरप्रदेश के ग्राम मिढाकुर, जिला आगरा में १० नवंबर १९४४ ई में हुआ | आपके पिता का नाम स्व.जगन्नाथ प्रसाद गुप्त व माता स्व.श्रीमती रामभेजी देवी हैं; पत्नी का नाम श्रीमती सुषमा गुप्ता है जो हिन्दी में स्तानाकोत्तर हैं एवं स्वयं भी एक कवियत्री व गायिका हैं | आपके एक पुत्र व एक पुत्री हैं | पुत्र श्री निर्विकार बेंगलोर में फिलिप्स कंपनी में वरिष्ठ प्रोजेक्ट प्रवन्धक व पुत्रवधू श्रीमती रीना गुप्ता क्रीडेन्शियल कंपनी की फाइनेंशियल सलाहकार व प्रवन्धक हैं | पुत्री दीपिका गुप्ता प्रवंधन में स्नातकोत्तर व दामाद श्री शैलेश अग्रहरि फिलिप्स पूना में महाप्रवन्धक पद पर हैं |
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------- डा श्याम गुप्त की समस्त शिक्षा-दीक्षा आगरा नगर में ही हुई | सेंट जांस स्कूल आगरा, राजकीय इंटर कालिज आगरा व सेंट जांस डिग्री कालिज आगरा से अकादमिक शिक्षा के उपरांत उन्होंने सरोजिनी नायडू चिकित्सा महाविद्यालय आगरा ( आगरा विश्वविद्यालय ) से चिकित्सा शास्त्र में स्नातक की उपाधि एम् बी बी एस व शल्य-क्रिया विशेषज्ञता में स्नातकोत्तर ‘मास्टर आफ सर्जरी’ की उपाधि प्राप्त की | इस दौरान देश- विदेश की चिकित्सा पत्रिकाओं व शोध पत्रिकाओं में उनके चिकित्सा आलेख व शोध आलेख छपते रहे | चिकित्सा महाविद्यालय में दो वर्ष तक रेज़ीडेंट-सर्जन के पद पर कार्य के उपरान्त आप भारतीय रेलवे के चिकित्सा विभाग में देश के विभिन्न पदों व नगरों में कार्यरत रहे एवं उत्तर रेलवे मंडल चिकित्सालय, लखनऊ से वरिष्ठ चिकित्सा-अधीक्षक के पद से सेवानिवृत्त हुए | सम्प्रति उनका स्थायी निवास लखनऊ है |
--- संपर्क— सुश्यानिदी, के-३४८, आशियाना, लखनऊ-२२६०१२ (उ प्र), भारत, मो-०९४१५१५६४६४, ईमेल- drgupta04@gmail.com 

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-----साहित्यिक परिचय ---
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--------धर्म, अध्यात्म के वातावरण -- रामायण के सस्वर पाठ से दिनचर्या प्रारम्भ करने वाली व चाकी-चूल्हे से लेकर देवी-देवता, मंदिर की पूजा-अर्चना करने वाली माँ व झंडा-गीत एवं देशभक्ति के गीतों के गायकों की टोली के नायक, देश-भक्ति व सर्व-धर्म, सम-भाव भावना प्रधान पिता के सान्निध्य में वाल्यावस्था में ही कविता-प्रेम प्रस्फुटित हो चुका था |
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--------शिक्षाकाल से ही आगरा नगर की पत्र-पत्रिकाओं में कवितायें व आलेख प्रकाशित होते रहे | आगरा से प्रकाशित " युवांतर" साप्ताहिक के वे वैज्ञानिक-सम्पादक रहे एवं बाद में लखनऊ नगर से प्रकाशित -“निरोगी संसार " मासिक के नियमित लेखक व सम्पादकीय सलाहकार |
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---------- आप हिन्दी भाषा में खड़ी-बोली व ब्रज-भाषा एवं अंग्रेज़ी भाषाओं के साहित्य में रचनारत हैं | ब्रज क्षेत्र के होने के कारण वे कृष्ण के अनन्य भक्त भी हैं उनके पद एवं अन्य तमाम रचनाएँ कृष्ण व राधा पर आधारित हैं एवं ब्रजभाषा में काव्य-रचना भी करते हैं |
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---------हिन्दी-साहित्य की गद्य व पद्य दोनों विधाओं की गीत, अगीत, नवगीत .छंदोवद्ध-काव्य, ग़ज़ल, कथा-कहानी, आलेख, निवंध, समीक्षा, उपन्यास, नाटिकाएं सभी में वे समान रूप से रचनारत हैं |
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-------आप कविता की अगीत विधा के सशक्त अगीतकार कवि, सन्घीय समीक्षा पद्धति के समीक्षक व सन्तुलित कहानी के कहानी कार के रूप में भी प्रतिष्ठित हैं | वे लखनऊ की विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं से सम्वद्ध हैं, एवं अगीत परिषद, प्रतिष्ठा व चेतना परिषद के आजीवन सदस्य हैं| आप अनेक काव्य रचनाओं के सहयोगी रचनाकार हैं व कई रचनाओं की भूमिका के लेखक भी हैं|
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--------अंतरजाल ( इंटरनेट ) पर विभिन्न ई-पत्रिकाओं हिन्दी साहित्य मंच, रचनाकार, हिन्दी-कुन्ज, हिन्द-युग्म, कल्किओन-हिन्दी व कल्किओन-अन्ग्रेज़ी आदि के लेखक एवं सहयोगी रचनाकार हैं | श्याम स्मृति The world of my thoughts .., साहित्य श्याम, हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व विजानाति-विजानाति-विज्ञान उनके स्वतंत्र चिट्ठे (ब्लॉग) हैं एवं कई सामुदायिक चिठ्ठों के सहयोगी रचनाकार व सलाहकार |
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-----उनके अपने स्वयं के विशिष्ट विचार-मंथन के क्रमिक विचार-बिंदु ‘श्याम स्मृति’ के नाम से अंतरजाल पर प्रकाशित होते हैं| अब तक उनके द्वारा लगभग १५० गीत, १५० ग़ज़ल, १५० गीत-अगीत छंद, ६० कथाएं व अनेक आलेख, वैज्ञानिक-दार्शनिक, वैदिक-पौराणिक विज्ञान व धर्म-दर्शन एवं भारतीय पुरा इतिहास तथा विविध विषयों पर आलेख और निवंध तथा कई पुस्तकों की समीक्षाएं आदि लिखी जा चुकी हैं |
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-------उनकी शैली मूलतः उद्बोधन, देशप्रेम, उपदेशात्मक व दार्शनिक है जो यथा-विषयानुसार होती है| श्रृंगार की एवं ललित रचनाओं में रीतिकालीन अलंकार युक्त शैली में शास्त्रीय छंद घनाक्षरी, दोहे, पद, सवैये आदि उन्होंने लिखे हैं| भावात्मक एवं व्यंगात्मक शैली का भी उन्होंने प्रयोग किया है स्पष्ट भाव-सम्प्रेषण हेतु| मूलतः वे अभिधात्मक कथ्य-शैली का प्रयोग करते हैं| आपको व आपकी विभिन्न कृतियों को विभिन्न संस्थाओं व संस्थानों द्वारा अनेक सम्मान व पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं|
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-------------डा गुप्त ने कई नवीन छंदों की सृष्टि भी की है ..उदाहरणार्थ...अगीत-विधा के ..लयबद्ध-अगीत, षटपदी अगीत, त्रिपदा अगीत , नव-अगीत छंद व त्रिपदा अगीत ग़ज़ल...तथा गीति विधा के " श्याम सवैया छंद " व पंचक श्याम सवैया छंद |
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----------आपकी प्रकाशित कृतियां---काव्य-दूत, काव्य निर्झरिणी, काव्यमुक्तामृत (सभी काव्य-संग्रह), सृष्टि-अगीत विधा महाकाव्य, प्रेम काव्य—गीति-विधा महाकाव्य, शूर्पणखा-अगीत-विधा काव्य-उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास --नारी विमर्श पर एवं अगीत विधा कविता के विधि-विधान पर शास्त्रीय-ग्रन्थ "अगीत साहित्य दर्पण तथा ब्रजभाषा में विभिन्न काव्य-विधाओं का संग्रह ‘ब्रज बांसुरी’ एवं शायरी काव्य विधा में ‘कुछ शायरी की बात होजाए’ हैं | अन्य शीघ्र प्रकाश्य कृतियाँ में ---गीत संग्रह, ग़ज़ल संग्रह, अगीत संग्रह, कथा-संग्रह, श्याम दोहा संग्रह, काव्य-कंकरियाँ व श्याम-स्मृति एवं ईशोपनिषद का काव्य-भावानुवाद आदि हैं |




                                                       -----क्रमश भाग आठ----डा श्याम गुप्त के कुछ अगीत----


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सोमवार, 17 अप्रैल 2017

पुरुषत्व,स्त्रीत्व ... प्राकृतिक-संतुलन तथा आज की स्थिति--डा श्याम गुप्त ...

                            ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ... ]


 *पुरुषत्व,स्त्रीत्व ... प्राकृतिक-संतुलन तथा आज की स्थिति *****..


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-----सृष्टि का ज्ञात कारण है ईषत-इच्छा…..’एकोहं बहुस्याम”….. यही जीवन का उद्देश्य भी है । जीवन के लिये युगल-रूप की आवश्यकता होती है । अकेला तो ब्रह्म भी रमण नहीं कर सका….
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---"”स: एकाकी, नैव रेमे । स द्वितीयमैच्छत ।“
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--------तत्व दर्शन में ..ब्रह्म-माया, पुरुष-प्रकृति …वैदिक साहित्य में ..योषा-वृषा …संसार में……नर-नारी…। ब्रह्म स्वयं माया को उत्पन्न करता है…अर्थात माया स्वयं ब्रह्म में अवस्थित है……जो रूप-सृष्टि का सृजन करती है, अत: जीव-शरीर में-- माया-ब्रह्म अर्थात पुरुष व स्त्री दोनों भाव होते हैं।
-------शरीर - माया, प्रकृति अर्थात स्त्री-भाव होता है । अत: प्रत्येक शरीर में स्त्री-भाव व पुरुष-भाव अभिन्न हैं। आधुनिक विज्ञान भी मानता है कि जीव में ( अर्थात स्त्री-पुरुष दोनों में ही) दोनों तत्व-भाव होते हैं। गुणाधिकता (सेक्स हार्मोन्स या माया-ब्रह्म भाव की) के कारण….स्त्री, स्त्री बनती है…पुरुष, पुरुष ।
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---------तत्वज्ञान एवं परमाणु-विज्ञान के अनुसार इलेक्ट्रोन- ऋणात्मक-भाव है …स्त्री रूप है । उसमें गति है, ग्रहण-भाव है। प्रोटोन..पुरुष है….अपने केन्द्र में स्थित, स्थिर, सबसे अनजान, अज्ञानी-भाव रूप, अपने अहं में युक्त, आक्रामक, अशान्त …धनात्मक भाव ।
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------स्त्री- पुरुष के चारों ओर घूमती हुई उसे खींचती है,यद्यपि खिंचती हुई लगती है, खिंचती भी है,आकर्षित करती है,आकर्षित होती हुई प्रतीत भी होती है| इसप्रकार वह पुरुष की आक्रामकता, अशान्ति को शमित करती है, धनात्मकता को….नयूट्रल, सहज़, शान्ति भाव करती है….यह परमाणु का, प्रकृति का सहज़ सन्तुलन है।
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---------वेदों व गीता के अनुसार शुद्ध-ब्रह्म या पुरुष अकर्मा है, मायालिप्त जीव रूप में पुरुष कर्म करता है |
-------माया व प्रकृति की भांति ही स्त्री- स्वयं कार्य नहीं करती अपितु पुरुष को अपनी ओर खींचकर, सहज़ व शान्त करके कार्य कराती है परन्तु स्वय़ं कार्य करती हुई भाषती है, प्रतीत होती है।
-----नारी –पुरुष के चारों ओर घूमते हुए भी कभी स्वयं आगे बढकर पहल नहीं करती, पुरुष की ओर खिंचने का अभिनय करते हुए उसे अपनी ओर खींचती है। वह सहनशीला है। पुरुष आक्रामक है, उसी का शमन स्त्री करती है, जीवन के लिये, उसे पुरुषार्थ प्राप्ति हेतु, मोक्ष हेतु ।
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-----------भारतीय दर्शन के अनुसार जीवन के चार पुरुषार्थ हैं - धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष…. स्त्री –धर्म (गुणात्मकता) व काम (ऋणात्मकता) रूप है, पुरुष….अर्थ (धनात्मकता) व काम (ऋणात्मकता ) रूप है….
-------स्त्री-- पुरुष की धनात्मकता को सहज़-भाव करके मुक्ति की प्राप्ति कराती है। यह स्त्री का स्त्रीत्व है। कबीर गाते हैं….“हरि मोरे पीउ मैं हरि की बहुरिया…”…अर्थात मूल-ब्रह्म पुरुष-रूप है अकर्मा, परन्तु जीव रूप में ब्रह्म ( मैं ) मूलत:…स्त्री-भाव है ताकि संतुलन रहे। अत: यदि पुरुष अर्थात नर…भी यदि स्वयं नारी की ओर खिंचकर स्त्रीत्व-भाव धारण करे, ग्रहण करे तो उसके अहम, धनात्मकता, आक्रामकता का शमन सरल हो तथा जीवन, पुरुषार्थ व मोक्ष-प्राप्ति सहज़ होजाय ।
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-------प्रश्न यह उठता है कि यदि नारी स्वयं ही पुरुष-भाव ग्रहण करने लगे, अपनाने लगे तो ? यही आज होरहा है ।
-----पुरुष तो जो युगों पहले था वही अब भी है । ब्रह्म नहीं बदलता, वह अकर्मा है, अकेला कुछ नहीं है। ब्रह्म का मायायुक्त रूप, पुरुष जीवरूप तो नारीरूपी पूर्ण स्त्रीत्व-भाव से ही बदलता है, धनात्मकता, पुरुषत्व शमित होता है, उसका अह्म-क्षीण होता है, शान्त-शीतल होता है, क्योंकि उसमें भी स्त्रीत्व-भाव सम्मिलित है।
--------परन्तु स्त्री आज अपने स्त्रीत्व को छोडकर पुरुषत्व की ओर बढ रही है। आचार्य रज़नीश (ओशो)- का कथन है कि-
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" ’यदि स्त्री, पुरुष जैसा होने की चेष्टा करेगी तो जगत में जो भी मूल्यवान तत्व है वह खोजायगा ।"
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----------हम बडे प्रसन्न हो रहे हैं कि लडकियां, लडकों की भांति आगे बढ रही है। माता-पिता बडे गर्व से कह रहे हैं कि हम लडके–लडकियों में कोई भेद नही करते खाने, पहनने, घूमने, शिक्षा सभी मैं बराबरी कर रही हैं, जो क्षेत्र अब तक लडकों के, पुरुषों के माने जाते थे उनमें लडकियां नाम कमा रही है।
----------परन्तु क्या लडकियां स्त्री-सुलभ कार्य, आचरण-व्यवहार कर रही हैं? मूल भेद तो है ही...सृष्टि महाकाव्य में कहा गया है ....
' भेद बना है, बना रहेगा,
भेद-भाव व्यवहार नहीं हो | '

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-------------क्या आज की शिक्षा उन्हें नारीत्व की शिक्षा दे रही है? आज सारी शिक्षा-व्यवस्था तथा समाज भी भौतिकता के अज्ञान में फ़ंसकर लडकियों को लड़का बनने दे रहा है।
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-------यदि स्त्री स्वयं ही पुरुषत्व व पुरुष-भाव की आक्रमकता, अहं-भाव, धनात्मक्ता ग्रहण करलेगी तो उसका सहज़ ऋणात्मक-भाव, उसका कृतित्व, उसका आकर्षण समाप्त हो जायगा। वह पुरुष की अह्मन्यता, धनात्मकता को कैसे शमन करेगी?
-----पुरुष-पुरुष अहं का टकराव विसन्गतियों को जन्म देगा। नारी के स्त्रीत्व की हानि से उसके आकर्षणहीन होने से वह सिर्फ़ भोग-उपभोग की बस्तु बनकर रह् जायगी ।
-------पुरुषों के साथ-साथ चलना, उनके कन्धे से कन्धा मिला कर चलना एक पृथक बात है आवश्यक भी है परन्तु लडकों जैसा बनना, व्यवहार, जीवनचर्या एक पृथक बात। ---------आज नारी को आवश्यकता शिक्षा की है, साक्षरता की है, उचित ज्ञान की है। आवश्यकता स्त्री-पुरुष समता की है, समानता की नहीं, स्त्रियोचित ज्ञान, व्यवहार जीवनचर्या त्यागकर पुरुषोचित कर्म व व्यवहार की नहीं…..।



 

रविवार, 16 अप्रैल 2017

अगीत - त्रयी...---- भाग छः ------------श्री जगत नारायण पांडे---डा श्याम गुप्त ..

....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


अगीत - त्रयी...---- भाग छः ------------श्री जगत नारायण पांडे----
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--------अगीत कविता विधा के तीन स्तम्भ कवियों के परिचय साहित्यिक परिचय एवं रचनाओं का परिचय ---
अगीत कवि कुलगुरु साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य
महाकवि श्री जगत नारायण पांडे
महाकवि डा श्याम गुप्त-
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श्री जगत नारायण पांडे के कुछ अगीत -----
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----- अगीत छंद----
१.
लिखता हूँ कविता
आखिर मैं किसलिए,
उत्तर दिया मन ने
अपने ही मन के लिए |
सत्य ने कहा रंग को
बिखरने दो जगत में
सार्थक होजायगी
तभी तेरी कविता |
२.
भूल गया अपना नाम
धुंए और शोर से
प्रदूषण के दूषण से
उड़ नहीं पाता हीरामन
घायल हैं पंख
रुंधा है कंठ
कैसे बोले राम राम |
३.
झुरमुट के कोने में
कमर का दर्द लपेटे
दाने बीनती परछाईं |
जमाना ढूंढ रहा है
खुद को किसी ढेर में |
४.
साधन और संकल्प
अन्योन्याश्रित हैं |
छूट गया अगर साथ
मलते रहेंगे हाथ,
धरे रह जायेंगे फिर
अंधेर में अरमान सब
सुलगने के लिए बस |

५.
काल की लहरों पर
मिलते बिछुड़ते रहे
प्रश्नों ने मांगे जब
उत्तर हम देते रहे
उत्तर न पा सके
अपने ही प्रश्न मगर |
६.
गिरेबां चमन के
होगये चाक
खिजाँ से आशना हुए
रहगुजर का निजाम है
दस्तो-पा खून आलूद हैं
मायूस है दिल गम से
कातिल का नाम पर हम न लेंगे |
७.
मात्र एक अहंकार
देता है जन्म विवेकहीनता को,
शून्य हो जाती है
अपनी पहचान, और-
विलीन होजाता है
सत्य का आकार |
८.
अक्षर और शब्द
गूंगे नहीं होते हैं !
कला आती नहीं
सामर्थ्य भी है नहीं
शब्दकोश केवल
पलटते रह जायेंगे !
अनुभव की कसौटी
रचती है नया कोश
रहता नहीं निरर्थक कोई शब्द |

९.
प्रथम रश्मि का आँचल
मृदुल पवन की लहर
तुहिन के मुक्ताकण
पल्लवों पर ठिठककर
गतिमान कर देते हैं
कवि की कल्पना के
प्राणों को अविरल |
१०.
कर रहे हो हत्या तुम
कन्या के भ्रूण की !
कर रहे हो पाप, छीन कर जीवन
भविष्य की मां का तुम |
जन्म देगा कौन फिर
अवतारों पैगम्बरों को
अवरुद्ध कर रहे क्यों
भविष्य की गति को तुम |
११.
उंच और नीच, दलित और पीड़ित
सबका है योगदान
राष्ट्र की प्रगति में
भूलें ये कभी न हम |
समरसता बंधुत्व से
सिंचित कर राष्ट्र को
उगाते रहें सदा
प्रगति के बीज |
१२.
आदिम युग में जाने क्यों
जी रहा है आज भी
सभी समाज यह
करके पैने नाखून
धंसा रहा है सीने में
इंसानियत के
क्यों आखिर ?
१३.
एक क्षितिज पर
उगता है सूरज
और डूब जाता है
दूसरे क्षितिज पर |
देखा नहीं कभी उसे चलते हुए
अपनी राह भटक कर |
१४.
क्या होगा आखिर
फूलों का, बहारों का
चांदनी का, हवाओं का
खुशनुमा नजारों का
मोती भी शबनमी,
सूख सब जायंगे
जलती रही धरती अगर
सूनी होजायगी
कलम की माँग फिर|
१५.
लूट में बंदी युवक से मैंने कहा,
’शक्ति यह-लगाओ देश की रक्षा में ‘
नेताओं की कृपा से-
लूटमार करके मैं
करता हूँ ऐश, फिर-
फ़ायदा क्या है भला
सीमा पर खून बहाने से ,
बोला वह धीमे से |
\
----गतिमय सप्तपदी अगीत छंद ---
. ..(महाकाव्य सौमित्र गुणाकर से)
१६.
चला जारहा मानव ऊपर
चिंता नहीं धरा की किंचित
भाग रहा है अपने से ही
संग निराशा की गठरी ले |
पंथ प्रकाशित हो संयम का
दे वरदान ज्योति का हे मां !
करून वन्दना रामानुज की | ..
१७.
गणनायक की कृपादृष्टि से
मां वाणी ने दिया सहारा
खुले कपट बुद्धि के जब, तब,
हुए शब्द-अक्षर संयोजितफ
पाई शक्ति लेखनी ने, फिर |
रामानुज की विमल कथा का
प्रणयन है अगीत शैली में |
१८.
स्रोत सृष्टि के लगे सूखने
सुख के सब आधार मिट गए |
लोभ मोह मद काम क्रोध की
महिमा का विस्तार होगया
ह्रास होगया सत्संगति का
क्षीण हुए सामाजिक बंधन
असंतुलन होगया सृष्टि का |....
१९.
सुनकर धनुष यज्ञ की चर्चा
विश्वामित्र होगये पुलकित |
राम लक्ष्मण को प्रेरित कर
जागृत की उत्कंठा मन में ,
धनुष यज्ञ दर्शन करने की |
अनुज सहित प्रभु की सहमति पा
चले साथ मुनिवर मिथिला को |
२०.
किया सुदृड़ भूतल लक्ष्मण ने
लेपन करके मृदा भित्ति पर |
भिन्न भिन्न पुष्पों के रंग से
रचना की सुन्दर चित्रों की |
प्रभु की पर्णकुटी से हटकर
था विशाल वटबृक्ष अवस्थित
स्वयं व्यवस्थित हुए वहां पर |
\
. .. खंड काव्य – मोह और पश्चाताप से -----
२१.
छुब्ध होरहा है हर मानव
पनप रहा है वैर निरंतर |
राम और शिव के अभाव में
विकल होरहीं मर्यादाएं ,
व्याप्त होरहा विष चन्दन में |
पीडाएं हर सकूं जगत की
ज्ञान मुझे दो प्रभु प्रणयन का |
२२.
काम क्रोध मद लोभ मोह सब
भाव बंधन के करक है बस,
ऋषि मुनि देव असुर औ मानव
माया से बच सका न कोइ
पश्चाताप शरण प्रभु की, है
मार्ग मुक्ति का हर कल्मष से
हो जाता अंतर्मन निर्मल |
२३.
नारद विष्णु भक्त थे ज्ञानी
काम विजय से उपज मोह ने
काम-क्रोध ने अहंकार ने
निरत लोक-कल्याण भक्त को
विचलित किया पंथ से, लेकिन
शाप भोग कर श्री हरि ने फिर
किया निवारण उनके भ्रम को |
२४.
सीता के प्रति चिंता को फिर
व्यक्त किया शबरी से प्रभु ने
बोली,’ अधमाधम नारी को
दर्शन देकर धन्य किया है
आगे ऋष्यमूक पर्वत पर
प्रभु ! हनुमान ,सुकंठ मिलेंगे
देंगे वह सहयोग आपको |
२५.
अहंकार का नाश होगया
नष्ट हुआ असुरों का संकुल
स्थिर हुआ शान्ति का शासन
हुए प्रसन्न संतगण, मुनिजन
होने लगे यज्ञ निष्कंटक
राम राज्य के शुभारम्भ की
शंखध्वनि गूंजी लंका में |
\
-----नवअगीत छंद ( अगीतिका से )-----
२६.
अँधेरे में छिपा लेते हैं पाप
दिन में पर रखते हैं
चेहरा ,
हर दम साफ़ |
२७.
सब के सब टूट गए
निष्ठा के प्रतिमान
जीवित संबंधों के
तटबंध डूब गए
स्रोत संकल्पों के रीत गए |
२८.
सिद्धांत का अभाव
डराता है सत्य को
यही है –
सत्ता का स्वभाव |

२९.
संकल्प ले चुके हम
पोलियो मुक्त जीवन का |
धर्म और आतंक के
विष से मुक्ति का
संकल्प भी तो लें हम |
३०.
बैठा था पनघट पर
अधूरी प्यास लिए
अतृप्त मन का
कर दिया तर्पण
नयनों ने छलककर |
--------क्रमश भाग सात---- महाकवि डा श्याम गुप्त .....

शनिवार, 15 अप्रैल 2017

पुनर्मूषकोभव --आलेख --स्त्री-पुरुष विमर्श ---- डा श्याम गुप्त

                             ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


------पुनर्मूषकोभव --आलेख --स्त्री-पुरुष विमर्श ----

------मैं अपने मित्रों से जब कभी भी अपना यह विचित्र सा लगने वाला मत या तर्क प्रस्तुत करता हूँ कि--
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-- ‘आज की विभिन्न सामाजिक व नारी-पुरुष समस्याओं का कारण स्त्रियों का घर से बाहर निकल कर सेवा कार्य में लिप्त होजाना है ‘..---
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-----.तो तुरंत मुझे तीब्र प्रतिक्रियाओं का सामना करना पड़ता है ...’आपके विचार पुरानपंथी हैं’...एसा भी कहीं होता है....अपने विचार बदलिए....आधुनिक विचार रखिये....अब स्त्रियाँ स्वतंत्र होचुकी हैं....वे क्यों न नौकरी अदि कार्य करें ?..पुराने शास्त्रों का ज़माना गया, आजके युग में उनका कोइ अर्थ नहीं ...और विभिन्न रटे हुए तर्क- क्या पुराने समय में ये सब नहीं होता था राम को दशरथ/ माँ में निकाल दिया, भाई-भाई में युद्द्ध नहीं हुआ था क्या आदि आदि ..|
---------क्योंकि सभी की बहू-बेटियाँ सेवाकार्यों अर्थात कमाने में ..आफिस कार्यों में संलग्न हैं, अत: वे सामान्यतः... सभी यही कर रहे हैं...आजकल ये आधुनिक समय का चलन है...हम आगे बढ़ रहे हैं ...आदि प्रारम्भिक विचारों से आगे सोच ही नही पाते |
------इस विषय को कुछ और स्पष्ट करने हेतु कुछ तथ्यों को हम निम्न क्रम में प्रस्तुत करेंगे----
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१. जब मानव –आदि रूप में जंगल में रहता था, नर-नारी दोनों ही स्वतंत्र थे, अपने अपने लिए शिकार करते या फल एकत्र करते थे | कुछ आदि मानव झुंडों, समूहों में भी रहते थे , परन्तु सभी नर-नारी स्वतंत्र थे उन्मुक्त सेक्स था अन्य प्राणियों की भांति| न कोइ द्वंद्व न शिकवा-शिकायत |युगों तक यह चलता रहा |
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२.
-----जब मानव पर्वतों की गुफाओं, पेड़ों, से उतर कर झौपडियों / घरों में रहने लगा, कृषि व अन्य आर्थिक तत्वों का विकास हुआ, समाज, संस्कृति, ग्रामों-नगरों आदि का विकास होने लगा तो परिवार व्यवस्था प्रारम्भ हुई, तो संतति सुरक्षा हेतु नारी ने सायं ही गृहकार्य को प्राथमिकता दी और पुरुष ने घर चलाने, पालन पोषण का भार स्वीकार किया|
-------अब केवल पुरुष कमाता था , बाहर जाकर कार्य, सेवा, नौकरी आदि करता था | स्त्रियाँ गृहकार्य, संतति पालन-पोषण, पुरुष की आवश्यकताओं का ध्यान रखना , पढ़ने पढ़ाने , कला, साहित्य आदि कर्म में निरत थीं | कुछ स्त्रियाँ किसी मजबूरी वश सेवा कर्म करती थीं परन्तु दासी कर्म आदि जिसे अधिक सम्मान से नहीं देखा जाता था |
-------गृहकार्य आदि से निवृत्त पुरुष ने बड़े बड़े विचार, ज्ञान, सामाजिक नियम आदि पर सोचा एवं वेद-पुराण –शास्त्र आदि का प्रणयन किया| नीति नियम , व्यवहार के ,आचरण के तत्व स्थापित किये, विवाह संस्था का उदय हुआ, स्त्री-पुरुष दोनों के लियी आचार संहिता बनी | समाज में स्थायित्व, समता व आदर्श व्यवस्था थी, स्त्री-पुरुष, पति-पत्नी बनकर अपने अपने कार्यों में संतुष्ट रहकर जीवन व्यतीत करते थे |
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३. आज के युग में पुनः स्त्री स्त्री-स्वतंत्रता के नाम पर, घर से बाहर निकालकर, सेवाकार्य में रत रहकर , स्वतंत्र नौकरी व आय के साधन प्राप्त करके, पुरुषों की बराबरी के नाम पर अपने स्त्रियोचित गुण व कर्तव्यों का बलिदान , पुरुषों के कार्यों को अपने कन्धों पर ले रही है, एवं पुरुष पालन-पोषण हेतु नौकरी के साथ साथ गृह कार्य में भी बराबरी के रूप में हिस्सा बंटा रहा है |
--------अर्थात दोनों स्वतंत्र हैं—दोनों अपने अपने लिए कमाते हैं, दोनों ही घर का कार्य, संतति पालन पोषण का कार्य करते हैं| स्त्री अपने घर के कार्य की अपेक्षा पर-दास्य कर्म को अदिक महत्ता दे रही है| अर्थात प्रारम्भिक --डिविज़न ऑफ़ लेवर—जो संतान के हित में बनाया गया था समाप्त है| दोनों पति-पत्नी केवल सेक्स / बच्चे के लिए मिलते हैं| इससे आगे बढकर वह भी आवश्यक नहीं है व सब कहीं से भी प्राप्त किया जा सकता है |
------अर्थात नारी नारी न रहकर, पुरुष पुरुष न रहकर दोनों – पुरुष + नारी बनते जारहे हैं| पुरुष का पौरुष, नारी की स्वाभाविक स्त्रीत्व सौम्यता समाप्त होकर पुनः जंगल-युग के आदि मानव की भांति केवल प्राणी-मानव रह गया है | पुनर्मूषकोभव |
------ हम पुनः वहीं आगये हैं जहां से चले थे | जिसका परिणाम है कि जिस प्रकार पश्चिमी सभ्यता में स्त्री-पुरुषों में समन्वय न होने के कारण पुरुषों के भी सामान्य भौतिक कर्मों में लिप्त होने से कभी, कोइ कहीं वेद, शास्त्र, पुराण नहीं लिखे गए |
-------आज यहाँ भी पुरुषों के घरेलू कार्यों में लिप्त होने से कोइ उच्च विचार, अपने स्वयं के विचारों , सामाजिक, सांस्कृतिक, मानवीय आचरण के सद-विचारों का उदय नहीं होपारहा है | हाँ पश्चिम की सभ्यता की नक़ल से काम चलाया जा रहा है| यूं तो लोग खुश भी हैं, अज्ञानजनित प्रसन्नता से |

 

शुक्रवार, 14 अप्रैल 2017

अगीत - त्रयी...---- भाग पांच ------------श्री जगत नारायण पांडे---- डा श्याम गुप्त

                              ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



अगीत - त्रयी...---- भाग पांच ------------श्री जगत नारायण पांडे----
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--------अगीत कविता विधा के तीन स्तम्भ कवियों के परिचय साहित्यिक परिचय एवं रचनाओं का परिचय ---
अगीत कवि कुलगुरु डा रंगनाथ मिश्र सत्य
महाकवि श्री जगत नारायण पांडे
महाकवि डा श्याम गुप्त-


महाकवि श्री जगत नारायण पांडे
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वक्तव्य ..
“अहंकार की संतुष्टि न होने से संशय, भ्रम, लोभ मोहादि का जन्म होता है जिनकी पूर्ति न होने से क्रोध होता है जो अंततः विनाश का कारण बनता है | अहंकारजन्य विकार अनुशासन, सामाजिक-समरसता और लोक मंगल को नष्ट करते हैं और सृष्टि का संतुलन बिगड़ जाता है |”
“संस्कृत छंद अतुकांत होते हुए भी लय एवं गेयता से पूर्ण होते हैं | अगीत, अतुकांत, तुकांत एवं अगेय अथवा लयबद्ध एवं गेय होते हैं|”
"अगीत पांच से दस पंक्तियों के बीच अपने आकार को ग्रहण करके भावगत-तथ्य को सम्पूर्णता से प्रेषित करता है|”
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जीवन परिचय....
साहित्य की प्रत्येक विधा ...गद्य-पद्य, गीत-अगीत, छंद-ग़ज़ल सभी में समान रूप से सिद्धहस्त एवं रचनारत तथा कविता की अगीत-विधा के गति-प्रदायक महाकवि श्री जगत नारायण पांडे का जन्म लखनऊ के कान्यकुब्ज परवार में सं. १९३३ में हुआ| कुछ अपरिहार्य कारणों से आपकी शिक्षा-दीक्षा बिलम्ब से प्रारम्भ हुई| आलमबाग, लखनऊ के अमरूदही बाग़ मोहल्ले में घर के समीप ही प्राइमरी स्कूल से आपने चहर्रुम तक शिक्षा पाई परन्तु उर्दू में भी ज्ञान प्राप्त कर लिया | स्कूल के हेडमास्टर श्री वृन्दाबख्स ने उनकी लगन देख कर उन्हें अंग्रेज़ी की शिक्षा देकर ‘कान्यकुब्ज कालेज में दाखिले योग्य बनादिया| जहां से आपने हाईस्कूल व इंटर की परीक्षा पास की | वे अपने पिता के साथ रामायण की मंडली में रामायण पाठ, भजन-कीर्तन भी किया करते थे, जिसने उन्हें देवी-देवताओं के प्रति भक्ति भावना प्रधान बना दिया| इसी परिवेश के चलते उन्होंने बी ऐ, एल एल बी तक शिक्षा प्राप्त की | कालिज की हिंदी गतिविधियों में वे बराबर भाग लेते रहे|
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आपका विवाह सीतापुर निवासी स्व. शिवनारायण मिश्र की की पुत्री मालती से हुआ | आपके चार संताने हैं बड़े पुत्र विजय का व्यवसाय है, छोटे पुत्र केशव पांडे एम् ऐ एल एल बी,एडवोकेट है व तीसरे पुत्र राजीव जेसी आईएसएफ़ में इन्स्पेक्टर हैं| सबसे बड़ी पुत्री हैं जो बीऐ हैं एवं उनका विवाह डा रमेश चन्द्र शर्मा से हुआ है|
अधिवक्ता के रूप में आप दीवानी व फौजदारी के मुकदमों में निष्णात थे एवं अन्य अधिवक्ता भी उनसे परामर्श लेते थे| न्यायालय में होने वाले सांस्कृतिक कार्यों में उनका योगदान रहता था| आप विधिक सेवा प्राधिकरण के मानद सदस्य भी रहे| ऐसी महान विधिक व साहित्यिक विभूति महाकवि पं .जगत नारायण पांडे १६ फरवरी २००७ ई. को भगवदधाम प्रयाण कर गए |
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साहित्यिक परिचय—
आपकी साहित्यिक यात्रा का सूत्रपात कालिज के दिनों से ही होचुका था| तत्पश्चात वकालत के व्यवसाय के साथ साथ ही वे काव्यसाधना में भी रत रहे| हिन्दी, अंग्रीजी, उर्दू पर उनका अच्छा अधिकार था एवं संस्कृत भाषा का भी अच्छा ज्ञान था| काव्य की हर विधा-- गद्य-पद्य, गीत अगीत, छंद , हाइकू ,ग़ज़ल, मुक्तक, संतुलित कहानियां, व्यंग्य आलेख आदि पर उनका समानाधिकार था| देश की विभिन्न पात्र-पत्रिकाओं में उनकी रचनाएँ प्रकाशन के अतिरिक्त ,आकाशवाणी से काव्यपाठ के अतिरिक्त दूरदर्शन पर पत्रोत्तर कार्यक्रम को भी स्थान दिया गया | लगभग २० काव्य-कृतियों की भूमिकाएं भी उन्होंने लिखी है जिनमें श्री वीरेन्द्र अंशुमाली की ‘तात्याटोपे’ मधुकर अस्थाना की ‘वक्त आदमखोर’, डा योगेश गुप्ता की कृति’ अंतर-क्षितिज’ एवं महाकवि डा श्याम गुप्त के अगीत महाकाव्य ‘सृष्टि’ व अतुकांत काव्यसंग्रह ‘काव्य-मुक्तामृत‘ उल्लेखनीय हैं |
अगीत काव्य विधा को उन्होंने पूरे मनोयोग से अपनाया एवं निखारने व गति प्रदान करने में अतुलनीय सहयोग दिया| अगीत विधा में अगीत के नवीन छंद गतिमय सप्तपदी अगीत की रचना की जिसमें आपने प्रथम खंडकाव्य ‘मोह व पश्चाताप’ एवं प्रथम महाकाव्य ‘सौमित्र गुणाकर‘ की रचना करके आपने अगीत-विधा को निखारने एवं अग्रगामी होने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई| आपके ३३१ अगीतों का संग्रह ‘अगीतिका’ भी प्रकाशित है| शिव-पार्वती विवाह के विषय पर सवैया व बरवै छंदों में आपने ‘इदम शिवाय’ कृति की भी रचना की है|
पता--५६५/१०, अम्ररूदही बाग़,
आलमबाग ,लखनऊ
              .क्रमश ---भाग छः ---श्री जगत नारायण पांडे के कुछ अगीत ...
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गुरुवार, 13 अप्रैल 2017

अगीत - त्रयी...---- भाग चार -------डा रंगनाथ मिश्र सत्य के अगीत कुछ अगीत -----डा श्याम गुप्त..

                           ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...  




अगीत - त्रयी...---- भाग चार -------डा रंगनाथ मिश्र सत्य के अगीत कुछ अगीत -----
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--------अगीत कविता विधा के तीन स्तम्भ कवियों के परिचय साहित्यिक परिचय एवं रचनाओं का परिचय ---
अगीत कवि कुलगुरु साहित्यभूषण
डा रंगनाथ मिश्र सत्य
महाकवि श्री जगत नारायण पांडे
महाकवि डा श्याम गुप्त-


भाग चार--- डा सत्य के अगीत यहाँ प्रस्तुत हैं ..

१.
" मां वाणी !
मुझको ज्ञान दो
कभी न आये मुझमें स्वार्थ ,
करता रहूँ सदा परमार्थ ;
पीडाओं को हर दे मां !
कभी न सत्पथ से-
मैं भटकूं
करता रहूँ तुम्हारा ध्यान | "

" घर घर में खुशहाली लाएं ,
जीवन साकार करें ;
नवयुग निर्माण करें ,
सबको निज गले लगाएं | "
३.
" दलितों के प्रति मत करो अन्याय
उन्हें भी दो समानता से-
जीने का अधिकार , अन्यथा-
भावी पीढ़ी धिक्कारेगी, और-
लेगी प्रतिकार ;अतः --
ओ समाज के ठेकेदारो !
उंच-नीच की खाई पाटो ,
दो शोषितों को ही न्याय | "
४.
" बूँद बूँद बीज ये कपास के,
खिल-खिल कर पड रही दरार;
सडी-गली मछली के संग,
ढूँढ रहा विस्मय विस्तार,
डूब गए कपटी विश्वास के | "
५.
दिशाहीन नहीं हूँ अभी-
पाई है केवल बदनामी,
खोज रहे हैं मुझको,
मेरे प्रेरक सपने
मिलनातुर हैं मुझसे
मेरे सारे अपने,
क्रियाहीन नहीं हूँ अभी
यह तो है जग की नादानी |
६.
" असफलता आज थक गयी है ,
गुजरे हैं हद से कुछ लोग ,
उनकी पहचान क्या करें ?
अमृत पीना बेकार,
प्राणों की चाह है अधूरी ,
विह्वलता और बढ़ गयी है |"

७.
"" श्रम से जमीन का नाता जोड़ें ,
श्रम जीवन का मूलाधार ,
श्रम से कभे न मानो हार ;
श्रम ही श्रमिकों की मर्यादा,
श्रम के रथ को फिर से मोड़ें
८.
" सपने में मिलने तुम आये,
धीरे से तन छुआ,
आँखें भर आईं , दी दुआ;
मौन स्तब्ध साक्षात हुआ ,
सहसा विश्वास जमा -
मन को तुम आज बहुत भाये | "
९.
" नवयुग का मिलकर
निर्माण करें ,
मानव का मानव से प्रेम हो ,
जीवन में नव बहार आये |
सारा संसार एक हो,
शान्ति औए सुख में-
यह राष्ट्र लहलहाए "

१०.
" तुमे मिलने आऊँगा,
बार बार आऊँगा |
चाहो तो ठुकरादो,
चाहो तो प्यार करो |
भाव बहुत गहरे हैं,
इनको दुलरालो | "
११.
" आओ हम अंधकार दूर करें ,
रात और दिन खुशी-खुशी बीते;
सारा संसार शान्ति पाए ,
अपना यह राष्ट्र प्रगतिगामी हो ;
वैज्ञानिक उन्नति से ,
इसको भरपूर बनाएँ | "
१२.
"टूट रहा मन का विश्वास ,
संकोची हैं सारी
मन की रेखाएं|
रोक रहीं मुझको
गहरी बाधाएं |
अंधकार और बढ़ रहा ,
उलट रहा सारा इतिहास | "
१३.
"कवि चिथड़े पहने
चखता संकेतों का रस,
रचता -रस, छंद, अलंकार
ऐसे कवि के क्या कहने |"
१४.
" स्तम्भन एक और ....
संबंधी भीड़-भाड
ध्वंस की कतारों में ;
मक्षिका नहा रही-
दूध के पिटारों में |
ढला ढला लगता सब ओर...
अपने में स्नेह-सिक्त,
तिरछा भूगोल |"
१५.
"देव नागरी को अपनाएं
हिन्दी है जन जन की भाषा ,
भारत माता की अभिलाषा |
बने राष्ट्रभाषा अब हिन्दी,
सब बहनों की बड़ी बहन है
हिन्दी सबका मान बढाती ,
हिन्दी का अभियान चलायें|"
१६.
"आओ ! हम राष्ट्र को जगाएं
आजादी का जश्न मनाना,
हमारी मजबूरी नहीं-
अपितु कर्तव्य है |
आओ हम सब मिलकर
विश्व-बंधुत्व अपनाएं,
स्वराष्ट्र को प्रगति पथ पर -
आगे बढाएं |"
१७.
"इधर उधर जाने से
क्या होगा ;
मोड़ मोड़ पर जमी हुईं हैं ,
परेशानियां |
शब्द -शब्द अर्थ सहित
कह रहीं कहानियां
मन को बहलाने से
क्या होगा |"
१८.
सबका सम्मान करो
सब भारत मां की हैं संतानें
उनमें मतभेद मत करो |
उंच-नीच का जो
भ्रमजाल आज फैला है,
मिलजुलकर उसको भी दूर करो |
१९.
आशाएं साथ हैं हमारे
कभी कभी द्वार पर टेरती उदासी
तनहाई में मुझको
घेरती उदासी ,
बिछुडन भी होरही उदास
बाधाएं साथ हैं हमारे |
२०.
जीवन तो तुझको है अर्पण
ध्यान मग्न बैठा हूँ मैं
देख रहा तेरा श्रृंगार,
साहस को फिर बटोरकर
आया हूँ फिर तेरे द्वार
शेष सभी तुझको समर्पण |
२१.
नवल प्रात: आया है आज यहाँ
धीरे धीरे रात चली गयी,
ऊषा ने जब प्रभात फैलाया |
सूरज भी चलने को आतुर है,
लाजवंती शाम ढल गयी,
अन्धकार गहराया आज यहाँ |
२२.
आँखों को चित्र भागया
कैसे मैं छोडूं यह महानगर
बाधाएं दो नहीं हज़ारों,
आशाएं कर रहीं श्रृंगार
पार्कों में बैठे कुछ लोग
जीवन का दर्द रहे बाँट
अपने में डूब गया सत्य
देख रहा गोमती डगर |
२३.
धीरज को बाँध नहीं पाता...|
जीवन में छागई उदासी,
मन को समझाता हूँ बार बार,
वह भी तो साथ नहें देता |
कैसे मैं व्यक्त करूँ
अंतर-पीडाओं को
इसका भी ध्यान नहीं आता|

२४.
कैसे तुम्हें भूल जाऊं
सारा विश्वास तुम्हीं हो,
मेरा आकाश तुम्हीं हो,
सारे संसार में अकेले,
मेरा मधुमास तुम्हीं हो
तुमको तज और कहाँ जाऊं |
१३.
आतप ने सांकल खटकाई जब
बिरहन की पीड़ा दोगुनी हुई |
जोर जोर चलती हैं, विष भरी हवाएं
तन मन में आग लगी
कौन आ बुझाए|
भेजी जब प्रियतम ने पाती परदेश से
सीने पर रखने से
पीड़ा कुछ कम हुई |
२६.
चलना ही नियति हमारी है
घूम घूम कर करता रहता आभास
धरती के साथ साथ
सोया आकाश ,
लक्ष्यों तक जाने को
निश्चित स्वर पाने को
संसृति को होता विश्वास,
चलना ही प्रगति हमारी है |
२७.
संघर्षों से कभी न ऊबें |
जो भी हम आज जीरहे
उसका तो अंत सत्य है,
कर्मों को करते जाएँ हम
अपने कर्तब्यों में बार बार डूबें |

२८.
"ओ बसंत ! फिर आना
सिहरन के साथ |
तेरे आने की आहट मिल जाती है;
पाहुन से मिलने की,
इच्छा तडपाती है ;
ओ बसंत ! फिर आना ,
मनसिज के साथ | "
२९.
आओ हम सृजन को जियें |
सत्य और संयम, मन में उत्साह भरें
जीवन आशान्वित हो
शान्ति के सहारे |
हिंसा का त्याग करें
सबको सुख दे करके
हम गरल पियें|
३०.
जिन्दगी में सुख-दुःख दोनों ही मिलते रहते |
जिन्दगी का सत्य क्या रहा
जीवन का तथ्य क्या रहा,
जिन्दगी में शूल यदि मिले
तो फूल भी कभी कभी खिले ,
जिन्दगी में हृदयों के दीप जलते रहते...|
.......क्रमश---भाग पांच----




















          

बुधवार, 12 अप्रैल 2017

मेरा एक कथाचित्र--- डा श्याम गुप्त

....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ..

 मेरा एक कथाचित्र--- जल रंग ...