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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

शुक्रवार, 6 अप्रैल 2018

एक चिकित्सा महाविद्यालय (मेडीकल कालिज ) का अस्पताल ऐसा भी --- डा श्याम गुप्त

                        ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

 एक चिकित्सा महाविद्यालय (मेडीकल कालिज ) का अस्पताल ऐसा भी ---

---जहाँ रविवार के दिन वार्डों में कोइ स्टाफ---नर्सिंग, वार्ड बॉय, सफाईकर्मी, इंटर्न, हॉउस स्टाफ नहीं रहता सारे काम –रोगी से, चिकित्सा उपकरण से, चिकित्सा से संबंधित सभी कार्य स्वयं रोगी के तीमारदार करें----अन्य दिवस भी सभी रोगियों के लिए उचित स्टाफ की व्यवस्था नहीं है ---
----जहाँ समस्त वार्ड कमरों, फर्श, जन सुविधाओं में गन्दगी का भरी रहती है, फर्श आदि टूटे फूटे हैं|
-----रूफ सीलिंग वातानुकूलित होने के वावजूद कभी इसी नहीं चलते , रोगी अपने पंखों आदि का स्वयं इंतजाम करते हैं |---
----अनुपयोगी पुरानी बिल्डिंग ऐसा लगता है कभी भी गिर कर खतरनाक मंज़र उपस्थित कर सकती हैं | उनमें बंदरों ने डेरा जमाकर सारे अस्पताल में खौफ फैलाया हुआ है | वार्डों में चूहे व काक्रोच घुमते हुए देखे जा सकते हैं |
----जो देश में इतिहास- प्रसिद्द चिकित्सा विद्यालयों एवं थोम्प्सन मिलिट्री मेडीकल स्कूल के नाम से भारत के सर्व-प्रथम चिकित्सा विद्यालयों में से एक है |
---जो चिकित्सा शिक्षा एवं अपने  क्लिनिकल इलाज़ की गुणवत्ता का अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सुप्रसिद्ध चिकित्सा महाविद्यालय है, जहां के उतीर्ण छात्र सारे विश्व में फैले हुए हैं |
-----चिकित्सकों का कथन है कि अब यह वह चिकित्सा विद्यालय कहाँ रहा, जिला अस्पतालों से भी बदतर है| स्टाफ है ही नही सब कुछ हमें स्वयं ही करना पड़ता है | चिकित्सा प्रशासन लाचार है क्योंकि वास्तविक प्रशासन, प्रशासनिक अधिकारियों आई ऐ एस आफीसर्स, सचिवों, नेताओं के हाथ में है |

====== जी हाँ, मैं सरोजिनी नायडू चिकित्सा महाविद्यालय, आगरा की बात कर रहा हूँ | प्रस्तुत कुछ झलकियाँ हैं---


बाथरूम बिना दरवाजे


कोइ स्टाफ नहीं

गन्दगी और टूटफूट अस्पताल परिसर
जन सुविधा में खुला मेनहोल

रेस्ट रूम

नेयूरोलोजी वार्ड का बाथरूम

बाथरूम


सारे पलंग डोनेशन में मिले हुए हैं

टूटी फूटी पुराणी जर्जर इमारत जो कभी भी हादसे का कारण बन सकती है जहाँ बंदरों ने डेरा जमाया हुआ है

परिसर में बंदरों का आतंक

एसी काम नहीं कर रहा, पंखे का रोगी के परिजनों द्वारा जुगाड़


गन्दगी का साम्राज्य





 

बुधवार, 4 अप्रैल 2018

गुरुवासरीय साहित्यिक-गोष्ठी –इतिहास के आईने से ....डा श्याम गुप्त

                               ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ... 

गुरुवासरीय साहित्यिक-गोष्ठी –इतिहास के आईने से ....
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                          काफी समय पश्चात वयोवृद्ध कविवर श्री प्रेमचन्द्र सैनी जी से मैंने उनके घर पर मुलाक़ात की | मैं भी पर्याप्त समय से नगर के बाहर था एवं विभिन्न कार्यक्रमों में व्यस्त था, वे भी अमेरिका गए हुए थे | सैनी जी वहां के संस्मरण सुनाते रहे| वहां रचित एक कविता भी उन्होंने सुनाई | एक अन्य कविता जो सैनी जी ने डा रामाश्रय सविता के लिए लिखी थी वह भी सुनाई, मेरी प्रतिक्रया एवं साहित्यिक समीक्षात्मक सम्मति भी पूछी | मैंने भी उन्हें अपनी पुस्तक ‘कुछ शायरी की बात होजाए’ भेंट की एवं उनके अनुरोध पर दो गज़लें भी सुनाईं |
--------यह एक संक्षिप्त द्विपक्षीय गोष्ठी थी | सैनी जी यद्यपि अपने अन्तरंग मित्रों प्रतिष्ठा संस्था के अध्यक्ष श्री स्व. रामाश्रय सविता, वीरेन्द्र अंशुमाली एवं जगत नारायण पांडे के स्वर्गारोहण के पश्चात गोष्ठियों में कम ही आते जाते हैं परन्तु उम्र के इस मुकाम पर भी वे साहित्य सृजन में व्यस्त हैं| पत्रिकाओं में उनकी रचनाएँ प्रकाशित होती रहती हैं|
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श्री प्रेमचन्द्र सैनी जी आशियाना व आलमबाग क्षेत्र में प्रत्येक गुरूवार को होने वाली साहित्यिक गोष्ठी के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं|
-------वर्ष सन २००५ में प्रतिष्ठा संस्था, आलमबाग के महामंत्री (स्व)  श्री वीरेन्द्र प्रकाश गुप्ता’अंशुमाली’ एवं महाकवि( स्व.)प. जगतनारायण पांडे ने विचार-विमर्श के उपरांत एक एसी गोष्ठी-वर्ग बनाने का निश्चय किया जो अनौपचारिक हो एवं संस्थाओं के विविध प्रोटोकोल अध्यक्ष, नियम–कायदे आदि से स्वतंत्र केवल सृजनात्मकता को बढ़ावा देने का हेतु हो, जिसमें अधिक कवि भी न हों |
--------यह एक अन्तरंग गोष्ठी की परिकल्पना थी जिसमें एक दूसरे की रचनाओं पर पारस्परिक विमर्श एवं कमियों व विशेषताओं पर विचार हो, जिसका मूल उद्देश्य केवल कविता पढ़कर चल देने की अपेक्षा साहित्यक-सामाजिक श्रेष्ठता पर भी ध्यान दिया जाना था|
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दोनों मनीषियों ने श्री प्रेमचन्द्र सैनी को साथ लिया एवं जगत नारायण पांडे जी के घर पर प्रथम गोष्ठी का आयोजन किया एवं मुझे भी सम्मिलित होने का आमंत्रण दिया गया |
------इस प्रकार यह चार कवियों द्वारा प्रारंभ यह गोष्ठी अपने विशिष्ट साहित्यिक कार्यक्रम के साथ प्रारंभ हुई| तत्पश्चात श्री मधुकर अष्ठाना, रामदेवलाल विभोर को भी शामिल किया गया | --------बारी बारी से सदस्यों के आवास पर आयोजित होने वाली गोष्ठी में बसंत राम दीक्षित, स्व.पंकज श्रीवास्तव, स्व. निर्मला साधना व अन्य कवि भी शामिल होते गए और अपना वर्तमान संस्थागत रूप लेती गयी |
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इस प्रकार लखनऊ के साहित्यिक क्षेत्र में यह एक विशिष्ट गोष्ठी के रूप में स्थापित हुई जिसमें न कोइ अध्यक्ष, न अतिथि न संचालक है | न कोइ चन्दा, न मासिक अंशदान इत्यादि | सभी के घर पर बारी बारी से अनवरत रूप से होती रहती है | सभी एक क्रम से अपनी अपनी रचनाओं को प्रस्तुत करते हैं, उन पर सामाजिक-साहित्यिक रूप से विचार विमर्श भी होता है |
----लखनऊ में प्रायः गोष्ठियां रविवार को ही होती हैं एक या दो को छोड़कर जो शनिवार को या फिर अनियातिकालीन , जो कभी भी होजाती हैं |
-------अतः इस गोष्ठी को प्रत्येक गुरूवार को होना सुनिश्चित किया गया एवं कोइ विशिष्ट औपचारिक नाम न रखकर इसे ***गुरुवासरीय गोष्ठी*** का नाम दिया गया |
----अनौपचारिकता, उच्च कोटि की साहित्यिक प्रगति एवं साहित्य के सामाजिक सरोकार जिसका मुख्य उद्देश्य है |
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चित्र में---गुरुवासरीय गोष्ठियों के दृश्य ------
श्री अंशुमाली व जगत नारायण पांडे .....डा रामाश्रय सविता व प्रेम चन्द्र सैनी मेरे आवास पर गोष्ठी में .......प्रेम चन्द्र सैनी --कुछ शायरी की बात होजाए --पढ़ते हुए ........गुरुवासरीय गोष्ठी के विविध दृश्य ..
Image may contain: 5 people, including Kamlesh Narain Srivastava and Ramdeo Lal Vibhor, people sitting, table and indoor











 

शुक्रवार, 30 मार्च 2018

भारतीय धर्म, दर्शन राष्ट्र -संस्कृति के विरुद्ध उठती नवीन आवाजें व उनका यथातथ्य निराकरण ---पोस्ट--आठ --डा श्याम गुप्त

                                   ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

 भारतीय धर्म, दर्शन राष्ट्र -संस्कृति के विरुद्ध उठती नवीन आवाजें व उनका यथातथ्य निराकरण ---पोस्ट--आठ  --डा श्याम गुप्त
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----पूर्वा पर ----
आजकल हमारे देश में गोंड आदिवासी दर्शन और बहुजन संस्कृति व महिषासुर के नाम पर एक नवीन विरोधी विचारधारा प्रश्रय पा रही है जिसे महिषासुर विमर्श का नाम दिया जारहा है | जिसमें जहां सारे भारत में समन्वित समाज की स्थापना के साथ धर्मों व प्राचीन जातियों आदि का अस्तित्व नहीं के बरावर रह गया था, अब असुर, नाग, गोंड आदि विभिन्न जातियों वर्णों को उठाया जा रहा है |
भ्रामक विदेशी ग्रंथों आलेखों में आर्यों को भारत से बाहर से आने वाला विदेशी बताये जाने के भारत में फूट डालने वाले षडयन्त्र से भावित-प्रभावित वर्ग द्वारा इंद्र, आदि देवों को आर्य एवं शिव व अन्य तथाकथित असुर व नाग, गोंड आदि जातियों भारत की मूल आदिवासी बताया जा रहा है | वे स्वयं को हिन्दू धर्म में मानने से भी इनकार करने लगे हैं |
-----------------विभन्न आलेखों, कथनों, प्रकाशित पुस्तकों में उठाये गए भ्रामक प्रश्नों व विचारों, कथनों का हम एक एक करके उचित समाधान प्रस्तुत करेंगे जो ४० कथनों-समाधानों एवं उपसंहार के रूप में प्रस्तुत किया जाएगा, विभिन्न क्रमिक  आलेख-पोस्टों द्वारा |
-------पोस्ट आठ ---- कथन/समाधान  ३१से ३४ तक---


कथन ३१--
--------असुर, गोंड और मूलनिवासी धर्म :---लोकायत धर्म को मानने वाले असुर असल में इस देश के प्राचीन मूल निवासी थे। उनकी संस्कृति को छलपूर्वक आर्यों ने नष्ट किया और उन्हें समाज मनोवैज्ञानिक तरीकों से कालान्तर में हीन स्थान देकर समाज की निचली पायदानों पर धकेल दिया गया। यह बात डॉ. अंबेडकर की सबसे प्रमुख स्थापनाओं में से एक है। 
--------इसी तरह गोंडी संस्कृति और धर्म के विशेषज्ञ डॉ. मोतीरावण कंगाली (1949-2015) ने भी अपनी जमीनी शोध से यह स्थापित किया है कि मूलनिवासी संस्कृति की अधिकाँश ऊँची उपलब्धियां आर्यों या ब्राह्मण धर्म के द्वारा स्वयं में समाहित कर ली गयी हैं और अब उन्हें पहचानना ही कठिन हो गया है। 
------- उनकी खोज गोंडी धर्म और गोंडी लोक कहावतों और गीतों की वाचिक परम्परा पर आधारित है और इस वाचिक परम्परा में बिखरे हजारों सूत्रों को एकसाथ रखने पर वे भी स्वामी अछूतानंद, भदंत बोधानंद या अंबेडकर व ज्योतिबा फूले सहित देबीप्रसाद चट्टोपाध्याय की ही तरह समान निष्कर्षों पर आ रहे हैं। 
--------उनका निष्कर्ष ये है कि आज के गोंड सहित अन्य अनेक जनजातीय समाज जो कि घोटुल नाम की संस्था से आपस में जुड़े रहे हैं वे सब के सब किसी अन्य लुप्त हो चुकी महान संस्कृति के वारिस हैं जिनकी संस्कृति को छलपूर्वक नष्ट किया गया है और चुराया गया है। 
--------चुराए गए इन प्रतीकों और चरित्रों की लिस्ट लंबी है। उदाहरण के लिए हिन्दुओ की बम्लेश्वरी देवी के बारे में उनका दावा है कि असल में यह गोंडों की बम्लाई दाईहैं जिसे कि आर्य ब्राह्मण पंडितों ने बमलेश्वरी देवी बना दिया है, इसी तरह गोंडी समुदाय के आदिपुरुषसंभूशेकबाद में हिन्दुओं के महादेवबन जाते हैं, इसी तरह गोंडी जनों का पवित्र भूभाग पेंकमेढ़ीबाद में पचमढ़ीबना दिया जाता है, और इसी तरह बीसियों नाम और प्रतीक व व्यवहार हैं जो थोड़े बदलाव के साथ सीधे सीधे  ब्राह्मणी धर्म के अनुयायियों ने चुरा लिए हैं (Kangali, 2011)।---

समाधान ३१--
------यह सब व्यर्थ की कसरत है इतिहास को पीछे लेजाकर उलटा देखने की प्रथा ---- विजेता जाति अपनी संस्कृति फैलाती है न की हारने वाले की संस्कृति को अपनाती है यह सौहार्दमय समन्वय एवं प्रगतोन्मुखी संस्कृति में होता है |
     सत्य ही है कि ये सब वनांचल निवासियों के देव देवी थे जो समन्वित सभ्यता में समस्त देश के देव देवी होगये एवं स्थानीय प्रकारांतर से नए नामों से जाने जाने लगे, इसमें नयी बात क्या है, यह सामान्य मानवीय, सामाजिक व राष्ट्रीय विकास की प्रक्रिया है | 
------शिव तो अंतर्राष्ट्रीय वैश्विक देव हैं तो क्या यह नहीं माना जायगा कि वैदिक सभ्यता, आर्यों व हिन्दुओं ने बनांचल के पशुपति, शम्भूसेक या जुन्नारदेव अर्थात शिव को समस्त विश्व में आदरणीय रूप में फैलाया | आज इन कथित मूलनिवासियों को उनका आभारी होना चाहिए |

 कथन ३२-  
------- डॉ. मोतीरावण कंगाली प्राचीन हरप्पन सभ्यता की सैन्धव लिपि को गोंडी व्याकरण के आधार पर सफलता से पढ़ सकने वाले पहले विद्वान हैं। भाषाशास्त्रीय आधारों पर वे स्थापित करते हैं कि सैन्धव सभ्यता के सामाजिक धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्य आज के गोंडों के मूल्यों से गहराई से एकरूप रहे हैं (Kangali, 2002)। भाषा की समानता के आधार पर भी उनकी शोध के आधार पर यह मान्यता स्थापित होती है कि गोंडों की आज की भाषा असल में द्रविड पूर्व भाषा थी इसीलिये गोंडी भाषा को द्रविड़ परिवार की सभी भाषाओं की जननी माना जा सकता है। उनके इस दावे में बहुत सच्चाई मालूम होती है। क्योंकि आज भी अधिकाँश द्रविड़ भाषाओं में और गोंडी भाषा में समानता पायी जाती है
        प्रोफ़ेसर दासगुप्ता (1925) का अध्ययन भी यह बतलाता है कि असुर लोगों में शव को दफनाने की प्रथा रही है जिसके उल्लेख छान्दोग्य उपनिषद में भी मिलते हैं। आज भी यह प्रथा कई आदिवासी समुदायों में है। गोंड जनजाति में इसे आज भी माना जाता है।

समाधान ३२--
------इसमें कोइ नयी बात नहीं है अवश्य ही गोंडी भाषा भारतीय आदिवासी वनांचल की भाषा होगी द्रविड भाषाओं की जननी |
     शव दफनाने की प्रथा आदिकाल से चली आरही है | ऋग्वेद में दोनों प्रथाओं का वर्णन है दफनाने एवं जलाने का | आज भी प्राचीन स्थलों पर तमाम पुरानी पौराणिक कब्रें पाई जाती हैं | मिश्र आदि अन्य प्राचीन देशों में तो केवल दफनाने की ही प्रथा थी | दाह संस्कार प्रगतिशील वैज्ञानिक प्रथा है जिसमें पृथ्वी को अत्यधिक घेरने की आवश्यकता नहीं होती |

कथन ३३
------------उल्लेख करना जरुरी है कि मध्यप्रदेश के बालाघाट में लांजी नामक स्थान पर नेताम वंश के गोंड शासकों के प्राचीन दुर्ग की खुदाई में जो मूर्तियाँ प्राप्त हुयी हैं उनमे बुद्ध महावीर गणपति और संभोगरत युगल की मूर्ती भी पायी गयी है।
      गणपति के बारे में स्वयं चट्टोपाध्याय का अध्ययन बतलाता है कि यह किसी अन्य प्राचीन मूलनिवासी समुदाय का टोटम या नायक या देवता था जिसे ब्राह्मण धर्म में बाद में शामिल कर लिया गया। इसलिए यहाँ गणपति का होना असल में लोकायतिक या असुर परम्परा के ही किसी नायक का संकेत देता है।
    डॉ. कंगाली की अन्य स्थापनाओं पर गौर करें तो हम पाते हैं कि ब्राह्मणी धर्म के महादेव व पार्वती सहित सती और काली भी असल में गोंडों के मिथकीय चरित्र हैं जिन्हें बाद में उनके दर्शन और उन दर्शनों से जुड़े प्रतीक व कर्मकांडों सहित आर्य ब्राह्मणों ने चुरा लिया है। इसीलिये यह मानना चाहिए कि प्राचीन असुर, आज के गोंड, बौद्ध, रविदासी और कबीरपंथी एक ही श्रेणी में हैं और उनके सनातन शत्रु देव या सुर या आर्य या ब्राह्मण एक ही हैं।

समाधान ३३—
---------एक तरफ तो यहाँ महादेव, पार्वती, गणेश, सती काली को गोंडों के मिथकीय चरित्र बतलाया जाता है, दूसरी ओर पार्वती को आर्यों द्वारा भेज कर शम्भूसेक को पटाने की बात कही जाती है | वास्तव में सब कोरी कल्पना गढ़ी जारही है, भुस में लट्ठ मारने जैसी | वही बात है जीतने वाली जाति अपनी सभ्यता फैलाएगी या हारने वाले की सभ्यता चुरायेगी |
      माना जा सकता है की गणेश जो कि गणपति हैं आदिवासी सभ्यता में ग्राम के गणपति के रूप में पूजे जाते होंगे जैसे हर ग्राम में एक पथवारी देवी, एक ग्रामणी देवी, तालाब की देवी, आदि हुआ करती थीं | वनदेवी, पथदेवी का वर्णन तो वैदिक साहित्य में भी है |

  कथन ३४---  
------  आज प्रचलित ब्राह्मणी धर्म में सर्वाधिक महत्वपूर्ण माने जाने वाले महादेव या शिव जिनका एक नाम शंभू भी है और उनकी संगिनी पार्वती सहित गौरी और सती से मिलते जुलते उल्लेख गोंडी संस्कृति की प्राचीन कथाओं में पाए जाते हैं।
         कोई यह तर्क दे सकता है कि ये प्रतीक और चरित्र गोंडों ने हिन्दू या ब्राह्मणी धर्म से लिये हैं। लेकिन इस आरोप का परीक्षण करें तो यह आरोप अपनी मौत खुद ही मर जाता है। ज्ञात इतिहास में कोयवंशी गोंड या आदिवासी समुदाय एक वनवासी समुदाय रहा है उनका स्थान आर्यों की वर्ण व्यवस्था में कहीं भी नहीं है, वे वर्णाश्रम धर्म की किसी भी व्यवस्था में किसी भी सामाजिक राजनीतिक स्थिति या भूमिका में नहीं रहे हैं। उन्हें किसी भी तरह न तो ब्राह्मणी धर्म की पवित्र भाषा संस्कृत सिखाई जा सकती थी ना ही वे ब्राह्मणी मंदिरों में प्रवेश करके दीक्षित हो सकते थे। बल्कि इसके विपरीत उनसे आर्यों के युद्ध और संघर्ष के अनेक उल्लेख मिलते हैं। इसीलिये उनके सम्बन्ध में यदि यह माना जाए कि वे आर्यों के साथ सामाजिक या धार्मिक प्रक्रियाओं के माध्यम से शिक्षित हुए और फिर उन्होंने ब्राह्मणी प्रतीकों के आधार पर दक्षिण में सुदूर मदुरै, कोणार्क से लेकर मध्य के अजन्ता-एलोरा, गढ़-चिचोली, अमरकंटक सहित सुदूर पश्चिम के कांधार और हड़प्पा मोहन जोदारो तक अपने प्रतीक व भाषा सहित मिथक भी रच लिए तो यह कल्पना, सुझाव या आरोप हास्यास्पद ही सिद्ध होगा।---
                 यह लेख यह दावा करना चाहता है कि असुरों से भी पहले आर्यों का सामना कोयवंशी गोंडों और संभुशेक द्वारा निर्मित संस्कृति से हुआ था। कालान्तर में आर्यों ने इस संस्कृति को सिलेक्टिव ढंग से आत्मसात करके उसी के आधार पर अपने विशवास और कर्मकांड रचे। यह घटना समय के सुदीर्घ विस्तार में हुई होगी और इसके बाद यहाँ स्थापित हो जाने के बाद उन्होंने देव और असुर जैसे दो स्पष्ट श्रेणियों का निर्माण करके उसके आधार पर मिथक और मिथकीय इतिहास रचा।
                  इस तरह के दावे करने का एक बहुत बड़ा कारण है वह ये है कि गोंडों की वाचिक परम्परा में संभुशेक का उल्लेख है जो बाद में हिन्दुओं के महादेव बन जाते हैं इसी तरह वैदिक और पौराणिक साहित्य में भी प्रमाण हैं कि शिव या महादेव कोई अचानक से प्रगट हो गए देवता नहीं हैं कहीं कहीं तो गणेश और शिव एक ही समान प्रतीत होते हैं। इस प्रकार हिन्दू परम्परा में महादेव और गणेश दोनों की उत्पत्ति और अस्तित्व बहुत जटिल है।
 ------------आर्य गोंड संग्राम को देवासुर संग्राम से प्राचीन मानने का दूसरा कारण है कि आर्यों का देव असुर संग्राम असल में ब्राह्मण आर्यों द्वारा गोंडी संस्कृति और गोंडी देवताओं को विशेषकर संभुशेक आत्मसात कर महादेव बना देने के बहुत बाद में आकार ले रहा है। इसीलिये देव असुर संग्राम के ब्राह्मणवादी संस्करण में अक्सर ही महादेव या शंभू का जिक्र आता है जो देवताओं को बचाने के लिए स्वयं युद्ध में उतरते हैं या ब्रह्मा या विष्णु या अन्य किसी देवी देवता के जरिये आर्यों या देवों की मदद करते हैं। इस प्रकार गण, शंभू, पार्वती, महादेव, त्रिशूल, त्रिमूर्ति, नर्मदा, पंचमढ़ी इत्यादि अनेकों अनेक शब्द और उनसे जुडी दार्शनिक या धार्मिक मान्यताएं असल में गोंडी धर्म भाषा और संस्कृति से सीधे सीधे चुराए गए हैं।

समाधान ३४--- 
---------दक्षिण में सुदूर मदुरै, कोणार्क से लेकर मध्य के अजन्ता-एलोरा, गढ़-चिचोली, अमरकंटक सहित सुदूर पश्चिम के कांधार आदि बहुत नवीन काल के हैं अतः इन्हें आदि संस्कृति गोंडी से जोड़ना हास्यास्पद ही है |
-------- हड़प्पा मोहनजोदारो इन उपरोक्त से बहुत पुरा काल के हैं जिन्हें गोंडी काल के कहा जा सकता है | वास्तव में तो असुर काल में आर्य थे ही नहीं आर्यों व असुरों के काल में युगों युगों का अंतर है | इंद्र, विष्णु आदि भी आर्य नहीं थे, इंद्र देवराज थे..सुर-असुर काल में तो आर्यों का अस्तित्व ही नहीं था, न ब्राह्मणी धर्म आदि |  वास्तव में तो यह है कि दोनों धर्म-संस्कृतियों का समन्वय हुआ और वे एक होगयीं ----अब व्यर्थ विदेशी शत्रुओं की चाल में फंसकर वितंडावाद खडा किया जा रहा है | 
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  ---------------- वास्तव में भारत के अफ्रीका से पृथक होकर द्वीप व प्रायद्वीप बनने तक शंभूसेक अपनी प्रजा जिसे आदिकालीन मानव गोंडी कह सकते हैं जो मानव वहीं दक्षिण भारत में ही बने रहे

-------जबकि अन्य मानव प्रगति करते हुए( हिमालय उत्थान से पहले ) भारतीय द्वीप व यूरेशिया खंड के मध्य स्थित दिति सागर ( टेथिस सागर ) को पार करता हुआ सरस्वती-मानसरोवर क्षेत्र –मेरु क्षेत्र में पूर्ण मानव में विक्सित होकर सर्वत्र फैलने लगा | 

--------वही ब्रह्मा, इंद्र , विष्णु के नेतृत्व वाला मानव सुमेरु के क्षेत्र एवं हिमालय की नीची श्रेणियों को पार करता हुआ पुनः उत्तर भारत होता हुआ मध्य क्षेत्र में पहुंचा 

--------जहां वहीं रहगए मानव अपने नेता शम्भूसेक के नेतृत्व में उन्नति करते हुए उत्तर की ओर बढ़ते हुए हरप्पा तक पूर्व हरप्पा सभ्यता बसाते हुए पहुंचे

-------- जहां दोनों सभ्यताओं का एक दूसरे को पहचान कर पुनः संगम हुआ | ( सन्दर्भ---पोस्ट ६ में विस्तार से )
आदि महादेव ( शंभू सेक ) व नंदी - आदि देवी( महिषी ) को प्रणाम साथ में सप्त-देवियाँ ---सिन्धु घाटी सभ्यता सील


गोंडवाना लेंड और भारत

गोंडवाना लेंड ,टेथिस सागर व लारेशिया लेंड
सिन्धु घाटी----मुख्य महिषी ( रानी) एवं पुरोहित-ब्राह्मण  ( या राजा-क्षत्रिय )
भारतीय भूखंड का गोंडवाना लेंडअफ्रीका से टूटकर उत्तर की और प्रवाह



सिन्धु घाटी सील----आदि योगी शिव का पूर्व रूप --पशुपति -महादेव या त्रिदेव का पूर्व रूप ...

प्रथम---आदिमानव का गमनागमन

द्वितीय मानव गमनागमन

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-------आदि-मानव कालीन नेता शम्भू सेक जो मानव जाति के महान समन्वयक के रूप में सामने आये ने इंद्र, विष्णु, ब्रह्मा आदि के साथ दोनों सभ्यताओं के समन्वय से एक महान सभ्यता को जन्म दिया जो सरस्वती सभ्यता, सिन्धु घाटी सभ्यता व वैदिक सभ्यता कहलाई और शिव के कैलाश पर बसने के साथ वैदिक त्रिदेवों का उदय हुआ | ( सन्दर्भ -मेरा आलेख----जलप्रलय,गोंडवाना लेंड व भारत खंड , कहीं से हम आये थे नहीं व आर्य भारत के मूल निवासी ---ब्लॉग https://vijaanaati-vijaanaati-science.blogspot.com .....and....google.| )
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यह मानव इतिहास का प्रथम मानव समन्वय था अतः शंभू महादेव, देवाधिदेव कहलाये | अतः उपरोक्त त्रिशूल आदि सभी नाम समन्वित सभ्यता में प्रचलित रहे|

          क्रमश --पोस्ट नवम.......