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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त
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शुक्रवार, 24 अगस्त 2012

एक एतिहासिक भूल...... ड़ा श्याम गुप्त ...

                                      ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


                      आज से ७५ वर्ष पहले जो भूल की गयी थी उसके दुष्परिणाम आज भी देखने को मिल रहे हैं  | मतभेद भुलाने हेतु  खान अब्दुल गफ्फार खान  को वास्तव  में अपने भाषण में   'राम सेना'  व  'खुदाई खिदमतगार' बनने की सलाह की बजाय  सभी को  " राष्ट्र सेवक"   बनकर आजादी की लड़ाई में हिस्सा लेने का आव्हान करना चाहिए था |  जहां राष्ट्र की बात  होती है  वहाँ राम व खुदा के नाम का प्रयोग  क्यों |  धर्म का नाम ही  नहीं आना  चाहिए |

रविवार, 7 नवंबर 2010

डा श्याम गुप्त का नव गीत.....

कवि गुनगुनाओ आज
ऐसा गीत कोई ॥

बहने लगे रवि रश्मि से भी
प्रीति की शीतल हवाएं |
प्रेम के संगीत स्वर को
लगें कंटक गुनगुनाने।
द्वेष द्वंद्वों के ह्रदय को,
रागिनी के स्वर सुहाएँ।

वैर और विद्वेष को
भाने लगे प्रिय मीत कोई॥

अहं में जो स्वयं को
जकडे हुए,
काष्ठवत औ लोष्ठ्वत
अकड़े खड़े।
पिघल कर,
नवनीत बन जाएँ सभी।

देश के दुश्मन औ आतंकी यथा-
देश द्रोही और द्रोही -
राष्ट्र और समाज के।
जोश में भर लगें -
वे भी गुनगुनाने,
राष्ट्र भक्ति के वे -
शुचि सुन्दर तराने।

आज अंतस में बसालें,
सुहृद सी ऋजु-रीति कोई ॥

वे अकर्मी औ कुकर्मी जन सभी,
लिप्त हैं जो ,
अनय और अनीति में।
अनाचारों का तमस -
चहुँ और फैला ,
छागाये घन क्षितिज पर अभिचार के।
धुंध फ़ैली स्वार्थ, कुंठा,भ्रम-
तथा अज्ञान की ,
ज्ञान का इक दीप -
जल जाए सभी में।

सब अनय के भाव ,बन जाएँ-
विनय की रीति कोई ॥

मंगलवार, 26 जनवरी 2010

गणतंत्र दिवस पर --कार्य, कारण व प्रभाव गीत --कितने दीपक जल उठते हैं

कितने दीपक जल उठते हैं
(कारण ,कार्य व प्रभाव गीत --इस नवल धारा गीत में - एक कारण या कार्य दिया जाता है व उसके प्रभाव वर्णन किये जाते हैं )

जब गणतंत्र दिवस का पावन,
परम पुनीत पर्व आता है।

हर्षित जन जन गण के मन में,
नवल तिरंगा लहरा उठता।
नव उन्नति नव कर्म भाव युत,
कितने दीपक जल उठते हैं।। १.

लहर लहर लहराए तिरंगा ,
मुक्त गगन में इठलाता है।

मिटे अशिक्षा और गरीबी ,
आस पल्लवित होती मन में।
राष्ट्र प्रेम के विविध भाव युत,
कितने दीपक जल उठते हैं ॥ २.

अहं भाव से ग्रस्त शत्रु जब,
देश पै आँख गड़ाने लगता।

वीरों के नयनों में दीपित,
रक्त खौलने लग जाता है।
जन गण मन में शौर्य भाव के,
कितने दीपक जल उठते हैं॥ ३.

अन्धकार पर प्रकाश की जय,
का दीपावल पर्व सुहाता।

धन समृद्धि सौभाग्य वर्धन को,
गणेश लक्ष्मी पूजन होता।
जग जीवन से तमस मिटाने,
कितने दीपक जल उठते हैं॥ ४.

मन में प्रियतम का मधुरिम स्वर,
नव जीवन मुखरित कर देता।

आस और आकांक्षाओं के ,
नित नव भाव पल्लवित होते।
नेह का घृत, इच्छा-बाती युत,
कितने दीपक जल उठते हैं॥ ५.

दीपशिखा सम छवि प्रेयसि की,
जब नयनों में रच-बस जाती।

मधुर मिलन के स्वप्निल पल की ,
रेखा सी मन में खिंच जाती ।
नयनों में सुन्दर सपनों के,
कितने दीपक जल उठते हैं॥ ६.

जब अज्ञान तिमिर छंट जाता,
ज्ञान की ज्योति निखर उठती है।

नए नए विज्ञान-ज्ञान की,
नित नव राहें दीपित होतीं ।
मन में नव संकल्प भाव के ,
कितने दीपक जल उठते हैं ॥ ७.