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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...
- shyam gupta
- Lucknow, UP, India
- एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त
मंगलवार, 6 सितंबर 2011
सोमवार, 5 सितंबर 2011
शिक्षक दिवस पर गुरु दोहा सप्तक...ड़ा श्याम गुप्त....
....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
त्रिभुवन गुरु और जगत गुरु, जो प्रत्यक्ष प्रमाण |
जन्म मरण से मुक्ति दे , ईश्वर करूँ प्रणाम ||
यद्किंचित भी ज्ञान जो हम को देय बताय |
ज्ञानी उसको मान कर फिर गुरु लेय बनाय ||
दावानल संसार में, दारुण दुःख अनंत,|
श्याम करे गुरु वन्दना, सब दुखों का अंत ||
गु अक्षर का अर्थ है, अंधकार अज्ञान |
रु से उसको रोकता, सो है गुरू महान |
आलोकित हो श्याम का, मन रूपी आकाश |
सूरज बन् कर ज्ञान का, जब गुरु करे प्रकाश ||
इस संसार अपार को, किसी विधि कीजै पार |
श्याम गुरु कृपा पाइए, सब विधि हो उद्धार ||
जब तक मन स्थिर नहीं,मन नहीं शास्त्र विचार |
गुरु की कृपा न प्राप्त हो, मिले न तत्व विचार ||
त्रिभुवन गुरु और जगत गुरु, जो प्रत्यक्ष प्रमाण |जन्म मरण से मुक्ति दे , ईश्वर करूँ प्रणाम ||
यद्किंचित भी ज्ञान जो हम को देय बताय |
ज्ञानी उसको मान कर फिर गुरु लेय बनाय ||
दावानल संसार में, दारुण दुःख अनंत,|
श्याम करे गुरु वन्दना, सब दुखों का अंत ||
गु अक्षर का अर्थ है, अंधकार अज्ञान |
रु से उसको रोकता, सो है गुरू महान |
आलोकित हो श्याम का, मन रूपी आकाश |
सूरज बन् कर ज्ञान का, जब गुरु करे प्रकाश ||
इस संसार अपार को, किसी विधि कीजै पार |
श्याम गुरु कृपा पाइए, सब विधि हो उद्धार ||
जब तक मन स्थिर नहीं,मन नहीं शास्त्र विचार |गुरु की कृपा न प्राप्त हो, मिले न तत्व विचार ||
लेबल:
अंधकार,
ज्ञान,
त्रिभुवन गुरु....,
शास्त्र,
संसार
शुक्रवार, 2 सितंबर 2011
स्त्री विमर्श गाथा ....भाग -६ आत्म विस्मृति का युग....ड़ा श्याम गुप्त
....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


-----इस प्रकार पुरुष अधिकारत्व समाज में ही यद्यपि स्त्रियों के अधिकारों.की स्वायत्तता का परिसीमन प्रारम्भ होचुका था परन्तु भारत में फिर भी स्त्रियों के आदरभाव में कमी उत्पन्न नहीं हुई थी जो वस्तुतः वैदिक संस्कृति का ही प्रभाव था | यद्यपि विश्व की अन्यसंस्कृतियों व देशों में स्त्रियों पर अत्याचारों की अंतहीन कथाओं के उल्लेख हैं व उनके अधिकार भी काफी कम होचुके थे |
यहाँ तक कि स्त्री शासकों , रानियों के राज्यों में भी स्त्रियों अत्याचारों का सिलसिला रहा |
इलाम के उद्भव पर इस्लामी आक्रान्ताओं के स्त्री को वस्तु की भाँति उपयोग की वस्तु समझने, भारतीय संस्कृति, भारतीय संस्कृति के विरुद्ध युद्ध में शत्रु सेना की स्त्रियों के लूट , क्रय, वलात्कार, नग्न-देह प्रदर्शन आदि अत्याचारी -भोगी संस्कृति के कारण उन सब वीभत्स स्थितियों से बचने के लिए स्त्री बंधनों में रहने लगी और सती प्रथा, पर्दा-प्रथा, स्त्री-शिक्षा की कमी आदि बुराइयां भारतीय समाज में घर करने लगीं
तत्पश्चात मुग़ल आक्रान्ताओं व अंग्रेजों की भोगी संस्कृति व मैकाले की शिक्षा व सांस्कृतिक विनाश की नीति व अंतहीन बाह्य व आतंरिक युद्धों व द्वंद्वों के कारण सामंती काल तक आते आते, भ्रमित भारतीयों द्वारा विदेशियों की संस्कृति की नक़ल, अनुकरण व व्यक्तिगत स्वार्थवश ... नारी के बंधन कठोर होते गए, नारी को क्रीति-दासी
समझा जाने लगा | घूंघट प्रथा, पर्दा-प्रथा, सती-प्रथा (यद्यपि ..सती--- मूल नाम शिव पत्नी 'सती ' द्वारा पिता के यज्ञ में पति के अपमान के कारण किया गया आत्म दाह से लिया गया है ..जो एक दुर्घटना थी..परन्तु अज्ञान वश एक गलत प्रथा को यह नाम दे दिया गया) जो अशिक्षा, बाल-विवाह, दहेज़-प्रथा, वैश्या वृत्ति पति व ससुराल वालों द्वारा स्त्री-प्रतारणा, अत्याचार --जो अनाचार व द्वंद्व के युग में आर्थिक, संपत्ति लालच, पारिवारिक द्वंद्व के कारण व नारी को घर की इज्ज़त के रूप में मानने पर ..ऋणात्मक भाव में ...नारी पर अत्याचार का सिलसिला भी चलने लगा |
-----सभी चित्र ...साभार
--चित्र में-१-विधवाएं 2- बाल-विवाह ,3-सती प्रथा,..४-दहेज़ ह्त्या ..५-महिला श्रम..6 -मुस्लिम विजेताओं द्वारा विक्रय हेतु नग्न-देह प्रदर्शन ....7 -घरेलू हिंसा एवं 8-दहेज़ लेन-देन ....


-----इस प्रकार पुरुष अधिकारत्व समाज में ही यद्यपि स्त्रियों के अधिकारों.की स्वायत्तता का परिसीमन प्रारम्भ होचुका था परन्तु भारत में फिर भी स्त्रियों के आदरभाव में कमी उत्पन्न नहीं हुई थी जो वस्तुतः वैदिक संस्कृति का ही प्रभाव था | यद्यपि विश्व की अन्यसंस्कृतियों व देशों में स्त्रियों पर अत्याचारों की अंतहीन कथाओं के उल्लेख हैं व उनके अधिकार भी काफी कम होचुके थे |
यहाँ तक कि स्त्री शासकों , रानियों के राज्यों में भी स्त्रियों अत्याचारों का सिलसिला रहा |भारत में वस्तुत यह सामंती, आत्मविस्मृति के, अन्धकार-अज्ञान के
काल में होने लगा जो मूलतः पश्च महाभारत युद्ध का काल है | वास्तव में महाभारत युद्ध सिर्फ भारतीय महाद्वीप का युद्ध न होकर एक विश्व युद्ध था , जो काफी प्रामाणिक तौर पर आणविक युद्ध था जिसमें भौतिक व सांस्कृतिक तौर पर महाविनाश हुआ | भारत के स्वर्णिम काल के विनाश के गाथाएं विश्व में फैलीं, जो विदेशी लोग स्वदेश में ही युद्ध रत रहते थे ... बाहर भी जाने लगे....आक्रान्ताओं का युग प्रारम्भ हुआ ...भारत के स्वर्ण युग की प्रसिद्धि के कारण भारत विदेशी आक्रान्ताओं का प्रिय स्थल बना ...| अर्जुन पुत्र परीक्षत के सर्पदंश से मृत्यु के उपरांत उसके पुत्र जन्मेजय द्वारा तक्षशिला के नाग- सम्राट तक्षक जो परीक्षत की मृत्यु का कारण व षडयंत्रकारी था, के राज्य का विनाश कर दिया गया 'यद्यपि तक्षक स्वयं आस्तीक मुनि के कारण जिनकी माता नाग कुल से थी बचगया परन्तु उसे जंगलों में भटक कर दस्यु-वृत्ति अपनानी पडी|--इस प्रकार उस द्वंद्व के काल में भी स्त्रियों का आदर-भाव था | जन्मेजय वंश(कुरु वंश ) के अंतिम शासक अधिसिम कृष्ण को हरा कर शिशुनाग वंश के शासक महापद्मनंद( जिसने इश्वाकु वंश के अंतिम शासक क्षेमक का वध करके राज्य प्राप्त किया था ) ने उत्तर भारत पर अपना नन्द वंश स्थापित किया | नन्द वंश का अंतिम सम्राट धननन्द जो प्रजा में अप्रिय था, व महानंद की दासी या नाइन रानी का पुत्र था, के वध उपरांत सम्राट चन्द्रगुप्त द्वारा मौर्य वंश की स्थापना ....सिकंदर का आक्रमण ....से.. अशोक ...लिक्षवी गणराज्य......गुप्त वंश....गज़नी ...खिलजी...शेरशाह आदि के आक्रमणों से उत्पन्न ..... आतंरिक स्थिति भी गृह-कलह द्वंद्वकी थी... चक्रवर्ती सम्राट ...राष्ट्रीय एकता...भारतीय सांस्कृतिक एकता, एक रूपता की कमी...के कारण राजनैतिक अस्थिरता -द्वंद्व-द्वेष -अनैतिकता की स्थिति उत्पन्न होने लगी | अज्ञानता व वैदिक दर्शन के विस्मृति के युग में विभिन्न नास्तिक व वेदेतर-दर्शनों---चार्वाक, बौद्ध, जैन आदि की उत्पत्ति , पौँगा-पंथी, तंत्र-मन्त्र, झाड-फूंक, अत्यधिक कर्मकांड आधारित ब्राह्मण वर्ग की अकर्मण्यता व ऋषि-आश्रम
, व्यवस्था का लुप्त होने के साथ समाज में अज्ञानता व पतन का प्रारम्भ हुआ और यह स्थिति मुगलों के काल से होते हुए अंग्रेजों व सामंती काल तक चलती रही | परन्तु नारी की स्थिति भारत में इस्लामिक आक्रमण से पूर्व के काल तक भी आदरणीय थी जैसा कि महापद्म्नंद की नाइन पत्नी के पुत्र को राज्य मिलना....चन्द्रगुप्त की विदेशी पत्नी हेलेना आदि की गाथा से पता चलता है ...परन्तु निश्चय ही महाद्वन्द्वों,संघर्षों , युद्धों व अशांति की स्थिति में ... यथास्थिति नारी जगत में भी अज्ञानता,दैन्यता,आत्मविस्मृति,पराधीनता के अन्धकार के कारण नारी की चेतनता भी लुप्त होने लगी | ....
काल में होने लगा जो मूलतः पश्च महाभारत युद्ध का काल है | वास्तव में महाभारत युद्ध सिर्फ भारतीय महाद्वीप का युद्ध न होकर एक विश्व युद्ध था , जो काफी प्रामाणिक तौर पर आणविक युद्ध था जिसमें भौतिक व सांस्कृतिक तौर पर महाविनाश हुआ | भारत के स्वर्णिम काल के विनाश के गाथाएं विश्व में फैलीं, जो विदेशी लोग स्वदेश में ही युद्ध रत रहते थे ... बाहर भी जाने लगे....आक्रान्ताओं का युग प्रारम्भ हुआ ...भारत के स्वर्ण युग की प्रसिद्धि के कारण भारत विदेशी आक्रान्ताओं का प्रिय स्थल बना ...| अर्जुन पुत्र परीक्षत के सर्पदंश से मृत्यु के उपरांत उसके पुत्र जन्मेजय द्वारा तक्षशिला के नाग- सम्राट तक्षक जो परीक्षत की मृत्यु का कारण व षडयंत्रकारी था, के राज्य का विनाश कर दिया गया 'यद्यपि तक्षक स्वयं आस्तीक मुनि के कारण जिनकी माता नाग कुल से थी बचगया परन्तु उसे जंगलों में भटक कर दस्यु-वृत्ति अपनानी पडी|--इस प्रकार उस द्वंद्व के काल में भी स्त्रियों का आदर-भाव था | जन्मेजय वंश(कुरु वंश ) के अंतिम शासक अधिसिम कृष्ण को हरा कर शिशुनाग वंश के शासक महापद्मनंद( जिसने इश्वाकु वंश के अंतिम शासक क्षेमक का वध करके राज्य प्राप्त किया था ) ने उत्तर भारत पर अपना नन्द वंश स्थापित किया | नन्द वंश का अंतिम सम्राट धननन्द जो प्रजा में अप्रिय था, व महानंद की दासी या नाइन रानी का पुत्र था, के वध उपरांत सम्राट चन्द्रगुप्त द्वारा मौर्य वंश की स्थापना ....सिकंदर का आक्रमण ....से.. अशोक ...लिक्षवी गणराज्य......गुप्त वंश....गज़नी ...खिलजी...शेरशाह आदि के आक्रमणों से उत्पन्न ..... आतंरिक स्थिति भी गृह-कलह द्वंद्वकी थी... चक्रवर्ती सम्राट ...राष्ट्रीय एकता...भारतीय सांस्कृतिक एकता, एक रूपता की कमी...के कारण राजनैतिक अस्थिरता -द्वंद्व-द्वेष -अनैतिकता की स्थिति उत्पन्न होने लगी | अज्ञानता व वैदिक दर्शन के विस्मृति के युग में विभिन्न नास्तिक व वेदेतर-दर्शनों---चार्वाक, बौद्ध, जैन आदि की उत्पत्ति , पौँगा-पंथी, तंत्र-मन्त्र, झाड-फूंक, अत्यधिक कर्मकांड आधारित ब्राह्मण वर्ग की अकर्मण्यता व ऋषि-आश्रम
, व्यवस्था का लुप्त होने के साथ समाज में अज्ञानता व पतन का प्रारम्भ हुआ और यह स्थिति मुगलों के काल से होते हुए अंग्रेजों व सामंती काल तक चलती रही | परन्तु नारी की स्थिति भारत में इस्लामिक आक्रमण से पूर्व के काल तक भी आदरणीय थी जैसा कि महापद्म्नंद की नाइन पत्नी के पुत्र को राज्य मिलना....चन्द्रगुप्त की विदेशी पत्नी हेलेना आदि की गाथा से पता चलता है ...परन्तु निश्चय ही महाद्वन्द्वों,संघर्षों , युद्धों व अशांति की स्थिति में ... यथास्थिति नारी जगत में भी अज्ञानता,दैन्यता,आत्मविस्मृति,पराधीनता के अन्धकार के कारण नारी की चेतनता भी लुप्त होने लगी | ....तत्पश्चात मुग़ल आक्रान्ताओं व अंग्रेजों की भोगी संस्कृति व मैकाले की शिक्षा व सांस्कृतिक विनाश की नीति व अंतहीन बाह्य व आतंरिक युद्धों व द्वंद्वों के कारण सामंती काल तक आते आते, भ्रमित भारतीयों द्वारा विदेशियों की संस्कृति की नक़ल, अनुकरण व व्यक्तिगत स्वार्थवश ... नारी के बंधन कठोर होते गए, नारी को क्रीति-दासी
समझा जाने लगा | घूंघट प्रथा, पर्दा-प्रथा, सती-प्रथा (यद्यपि ..सती--- मूल नाम शिव पत्नी 'सती ' द्वारा पिता के यज्ञ में पति के अपमान के कारण किया गया आत्म दाह से लिया गया है ..जो एक दुर्घटना थी..परन्तु अज्ञान वश एक गलत प्रथा को यह नाम दे दिया गया) जो अशिक्षा, बाल-विवाह, दहेज़-प्रथा, वैश्या वृत्ति पति व ससुराल वालों द्वारा स्त्री-प्रतारणा, अत्याचार --जो अनाचार व द्वंद्व के युग में आर्थिक, संपत्ति लालच, पारिवारिक द्वंद्व के कारण व नारी को घर की इज्ज़त के रूप में मानने पर ..ऋणात्मक भाव में ...नारी पर अत्याचार का सिलसिला भी चलने लगा |-----सभी चित्र ...साभार
गुरुवार, 1 सितंबर 2011
गणेश चतुर्थी पर ....बाल गीत-- गणेश....डा श्याम गुप्त....
....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
गणपति गणेश....
तुच्छ जीव है मूषक लेकिन, पहुँच हर जगह है उसकी |
सबका हो कल्याण, ॐ से सजे हस्त से वर देते |
गणपति गणेश....
लम्बी सूंड कान पन्खे से, छोटी छोटी आँखें हैं |
हाथी जैसा सर है जिनका,एकदंत कहलाते हैं ||
मोटा पेट हाथ में मोदक, चूहे की है बनी सवारी |
ओउम् कमल औ शंख हाथ में,माथे पर त्रिशूल धारी ||
ये गणेश हैं गणनायक हैं,सर्वप्रथम पूजे जाते |
तुच्छ जीव है मूषक लेकिन, पहुँच हर जगह है उसकी |
पास रखें ऐसे लोगों को,एसी कुशल नीति जिसकी ||
सूक्ष्म निरीक्षण वाली आँखें, सबकी सुनने वाले कान |
सच को तुरत सूंघ ले एसी, रखते नाक गणेश सुजान ||
बड़े भेद औ राज की बातें, बड़े पेट में भरी रहें |
सबका हो कल्याण, ॐ से सजे हस्त से वर देते |
मोदक का है अर्थ,सभी को प्रिय कहते,प्रिय कर देते ||
अमित भाव-गुण युत ये बच्चो!,रूप अनेकों सजते |
कभी नृत्य-रत,कभी खेल रत,कभी ग्रन्थ भी लिखते ॥
ऐसे सारे गुण हों बच्चो! वे ही नायक कहलाते |
ऐसे सारे गुण हों बच्चो! वे ही नायक कहलाते |
हैं गणेश देवों के नायक,सर्वप्रथम पूजे जाते ||
--सभी चित्र ..साभार..
--सभी चित्र ..साभार..
मंगलवार, 30 अगस्त 2011
स्त्री-विमर्श गाथा-भाग-५...पुरुष अधिकारत्व समाज....ड़ा श्याम गुप्त....
....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
------- यूं तो पुरुष सत्तात्मक समाज में मानव सर्वाधिक उन्नति की और अग्रसर हुआ| परन्तु फिर भी प्रारम्भ से ही ईश्वर सत्ता को चुनौती के साथ साथ, आसुरी-भाव व दैवीय-भावों के द्वंद्व प्रारम्भ होने से अनाचार , अत्याचार , द्वंद्व आदि प्रारम्भ होगये थे | परन्तु नारी मूलतः स्वतंत्र व आदरणीय थी | हाँ स्त्रियों द्वारा प्रेम भक्ति के कारण स्वयं की ओढी हुई --त्याग, श्रृद्धा, भक्ति, पति पारायणता की सतीत्व भावना ( यह सामंती- युग की सती प्रथा नहीं थी ) की नींव पड़ने लगी थी | साथ ही साथ आसुरी-भाव समाज में स्त्री स्वच्छंदता भी चलती रही | राम की शबरी, अहल्या प्रसंग व कृष्ण-राधा का प्रेम प्रसंग और कुब्जा प्रसंग व द्रौपदी का सखा भाव इसी प्रेम भक्ति स्वतन्त्रता व आदर भाव के उदारहरण माने जा सकते हैं | स्वयंवर आदि प्रथाएं भी इसी का प्रतीक हैं | यद्यपि.राजनैतिक कारणों से या प्रेम -प्रसंगों के कारण स्वयंबर प्रथा व आठ प्रकार के विवाह अस्तित्व में आये परन्तु स्त्रियों के अधिकार सीमित होने प्रारम्भ होगये थे....स्त्रियों के सदैव पिता, पति व पुत्र की सुरक्षा में रहने के उपक्रम भी उपस्थित हुए | शर्तों पर स्वयंवर----सीताके लिए धनुष-यज्ञ , द्रौपदी के लिए मछली की आँख भेदन आदि शर्तें मूलतः स्त्री की स्वायत्तता पर अंकुश का ही प्रतीक हैं |
वहीं दूसरी ओर स्त्री -पुरुष स्वच्छंदता के अनुचित परिणाम आने लगे...तो नैतिकता के प्रश्न उठे एवं स्त्री-पुरुष दोनों के लिए ही नैतिकता , शुचिता के नियम बने | धर्म, अध्यात्म , योग, ब्रह्मचर्य आदि भाव पुरुषों के लिए बने, ताकि स्त्रियों की अमर्यादा भाव व यौवन-काम की उद्दाम भावनाओं को पुरुष- निर्लिप्तता द्वारा भी मर्यादित किया जा सके..... गंगा अवतरण व शिव का उसे अपनी जटाओं में बाँध लेना सिर्फ नदी कथा नहीं अपितु नारी के उद्दाम वेग को योग द्वारा नियंत्रण की कथा भी है.... क्योंकि अनुभव में स्त्रियाँ अधिक हानि उठाने वाली स्थिति में होती थीं अतः मर्यादा, आचरण, शुचिता के बंधन अधिक कठोर होने लगे कुलीन, शिक्षित व सदाचारी स्त्रियों ने स्वयं ही त्याग, भक्ति, सतीत्व आदि के उदात्त भाव स्वीकार किये व राजनैतिक और परिस्थितियों वश वे पुरुष की परमुखापेक्षी व बंधन में होती गयीं, और समाज पूर्ण रूप से पुरुष अधिकारत्व समाज में परिवर्तित होता गया. |

फिर भी भारत में स्त्रियों की अवस्था दासी की भांति नहीं थी, यह सीता व राधा के चरित्र से समझा जा सकता है कि उनमें विरोध के स्वर तो हैं पर असामाजिकता के तत्व नहीं अपितु स्वयं ओढी हुई प्रेम-दास्य भावना है, जबकि विश्व के अन्य सभी समाजों में स्त्रियों को मानवी मानने में भी शक था, उन्हें शैतान की कृति, पापी समझा जाता था एवं हर प्रकार से तिरस्कार व अत्याचार के योग्य | मिश्र, बेबीलोन आदि की संस्कृतियाँ व नेफ्रेतीती आदि की कथाओं के प्रसंगों, से यह समझा जा सकता है |
---चित्र साभार....
-----क्रमश ...भाग --६
पुरुष सत्तात्मक समाज में भी नारी की स्थिति कोई दासी की नहीं रही, अपितु सलाहकार की आदरणीय स्थिति थी | देखा जाय तो प्रारंभ से ही मूलतः समाज व्यवस्था की तीन धाराएं दिखाई पडती हैं----आदम को फल देने वाली व भटकाकर स्वर्ग से च्युत कराने वाली घटना पाश्चात्य देशों व अरब देशों में है जबकि भारत में यह घटना मनु , इडा व श्रृद्धा की आदरणीय भाव की कथा है | अतः मूलतः पाश्चात्य समाज में नारी को अपराधी, शैतान की कृति आदि माना जाता रहा वहीं भारत में वह सदा आदरणीय रही | इस प्रकार ....
----प्रथम धारा --जिसमें योरोप, अमेरिका, द अमेरिका, चीन, अफ्रीका, मध्य एशिया आदि भाग थे ...जिनमें मूलतः स्त्री सतात्त्मक समाज होने पर भी, अडम्स व ईव की कथा के कारण स्त्री को गर्हित समझा जाता रहा व युद्धों में उन्हें लूट, उपयोग व उपभोग की सामग्री व वलात्कार व अत्याचार के योग्य समझा जाता रहा|
----द्वितीय धारा----जिसमें मूलतः भूमध्य सागर के समीपवर्ती देश, अरब भूमिखंड , उत्तरी अफ्रीकी देश आदि थे , जिनमें मूलतः पुरुष सत्तात्मक समाज होने पर भी आदम व हव्वा --कथा के कारण ..स्त्री को उपभोग, लूट व वलात्कार की सामग्री समझा जाता रहा और अत्याचारों का सिलसिला रहा |
---तृतीय धारा.....जो सिर्फ भारतीय उप महादीपीय भूखंड में रही....जहां आदि कथा आदम -हब्बा की न होकर मनु-इडा-श्रृद्धा की है ...जो अनुशासन, विद्वता व श्रृद्धा भावना की प्रतीक हैं.....अतः भारत में पुरुष प्रधान समाज होने पर भी सदैव से ही नारी विद्वता, कला की प्रतीक व आदर का पात्र रही | भारत में भी -द.भारत में स्त्री- सत्तात्मक व्यवस्था -स्त्री व्यवस्थात्मक परिवार में परिवर्तित होकर आज भी चल रही है वहीं अधिक उन्नत होने पर उत्तर भारत में पुरुष परिवार नियामक व्यवस्था बनी ---परन्तु दोनों व्यवस्थाओं में ही स्त्री आदर का पात्र रही | उसे कभी भी पाश्चात्य देशों की भाँति शैतान की कृति नहीं समझा गया......यह इस बात का द्योतक है की मनुष्य अपनी प्राचीन व्यवस्थाओं के साथ उत्तर भारत से पहले समस्त उत्तर- पश्चिम व पूर्व की दुनिया में फैला एवं आगे प्रगति से दूर रहने के कारण पुरा-युग में रहा (इसी प्रकार दक्षिण भारत में ) परन्तु अपने मूल स्थान उत्तर भारतीय भूखंड में नए नए उन्नत व्यवस्थाओं की स्थापना करता रहा.... | इसीलिये आज भी भौतिकता व उससे सम्बंधित भोग पूर्ण उन्नति पाश्चात्य व्यवस्था का भाव रहा जबकि धर्म, अध्यात्म, मानवता के भाव के साथ साथ उन्नति भारतीय भूभाग का मूल चरित्र रहा |
------- यूं तो पुरुष सत्तात्मक समाज में मानव सर्वाधिक उन्नति की और अग्रसर हुआ| परन्तु फिर भी प्रारम्भ से ही ईश्वर सत्ता को चुनौती के साथ साथ, आसुरी-भाव व दैवीय-भावों के द्वंद्व प्रारम्भ होने से अनाचार , अत्याचार , द्वंद्व आदि प्रारम्भ होगये थे | परन्तु नारी मूलतः स्वतंत्र व आदरणीय थी | हाँ स्त्रियों द्वारा प्रेम भक्ति के कारण स्वयं की ओढी हुई --त्याग, श्रृद्धा, भक्ति, पति पारायणता की सतीत्व भावना ( यह सामंती- युग की सती प्रथा नहीं थी ) की नींव पड़ने लगी थी | साथ ही साथ आसुरी-भाव समाज में स्त्री स्वच्छंदता भी चलती रही | राम की शबरी, अहल्या प्रसंग व कृष्ण-राधा का प्रेम प्रसंग और कुब्जा प्रसंग व द्रौपदी का सखा भाव इसी प्रेम भक्ति स्वतन्त्रता व आदर भाव के उदारहरण माने जा सकते हैं | स्वयंवर आदि प्रथाएं भी इसी का प्रतीक हैं | यद्यपि.राजनैतिक कारणों से या प्रेम -प्रसंगों के कारण स्वयंबर प्रथा व आठ प्रकार के विवाह अस्तित्व में आये परन्तु स्त्रियों के अधिकार सीमित होने प्रारम्भ होगये थे....स्त्रियों के सदैव पिता, पति व पुत्र की सुरक्षा में रहने के उपक्रम भी उपस्थित हुए | शर्तों पर स्वयंवर----सीताके लिए धनुष-यज्ञ , द्रौपदी के लिए मछली की आँख भेदन आदि शर्तें मूलतः स्त्री की स्वायत्तता पर अंकुश का ही प्रतीक हैं |वहीं दूसरी ओर स्त्री -पुरुष स्वच्छंदता के अनुचित परिणाम आने लगे...तो नैतिकता के प्रश्न उठे एवं स्त्री-पुरुष दोनों के लिए ही नैतिकता , शुचिता के नियम बने | धर्म, अध्यात्म , योग, ब्रह्मचर्य आदि भाव पुरुषों के लिए बने, ताकि स्त्रियों की अमर्यादा भाव व यौवन-काम की उद्दाम भावनाओं को पुरुष- निर्लिप्तता द्वारा भी मर्यादित किया जा सके..... गंगा अवतरण व शिव का उसे अपनी जटाओं में बाँध लेना सिर्फ नदी कथा नहीं अपितु नारी के उद्दाम वेग को योग द्वारा नियंत्रण की कथा भी है.... क्योंकि अनुभव में स्त्रियाँ अधिक हानि उठाने वाली स्थिति में होती थीं अतः मर्यादा, आचरण, शुचिता के बंधन अधिक कठोर होने लगे कुलीन, शिक्षित व सदाचारी स्त्रियों ने स्वयं ही त्याग, भक्ति, सतीत्व आदि के उदात्त भाव स्वीकार किये व राजनैतिक और परिस्थितियों वश वे पुरुष की परमुखापेक्षी व बंधन में होती गयीं, और समाज पूर्ण रूप से पुरुष अधिकारत्व समाज में परिवर्तित होता गया. |

---चित्र साभार....
-----क्रमश ...भाग --६
शुक्रवार, 26 अगस्त 2011
स्त्री-विमर्श गाथा -भाग ४--पुरुष-सत्तात्मक समाज....
....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
चित्र-1 - मातृसत्ता-(हरप्पा ) - पुरुष (शिव-पशुपति) स्त्री सत्ता ( देवी या पार्वती )की अर्चना करते हुए..व सहायिका के रूप में सप्त मातृकाएं........-------इस प्रकार स्त्री ने संतति हित व अपनी अन्य मूल प्रकृतिगत विशेषताओं के कारण घर पर रहना स्वीकार किया और सारी व्यवस्था-प्रबंधन व अन्तः सुरक्षा भार नारी पर व आर्थिक भरण-पोषण, वाह्य प्रबंधन , शत्रु से सुरक्षा व युद्ध आदि का मूल दायित्व पुरुष पर रहा , और स्त्री -प्रबंधन समाज की स्थापना हुई | यद्यपि आवश्यकता पड़ने पर व आवश्यक मसलों पर शत्रु से युद्ध, युद्ध प्रवंधन, सुरक्षा व परामर्श व भरण-पोषण के लिए
आवश्यक कार्यों में स्त्री , पुरुषों का साथ देती थी | वस्तुतः यह समन्वयात्मक -प्रवंधन समाज व्यवस्था थी व सह जीवन ही था | यही व्यवस्था आगे चलकर बनी मातृसत्तात्मक परिवार व पितृ सत्तात्मक परिवार का प्रतीक थी |चित्र-२........महाकाली रूप
-------ज्ञान - विज्ञान की उन्नति हुई, स्त्री-पुरुष द्वंद्व बढे, जनसंख्या के दबाव , बल व
मस्तिष्क के उपयोग , युद्धों ,आर्थिक व सामाजिक दबाव व द्वंद्व व युगों की संतति-मोह, प्रेम व गर्भावस्था में अक्रियता के कारण पुरुष नारी का सुरक्षा-भाव बनने लगा | मानव स्थिर होने लगा, कबीले, वर्ग, कुटुंब, बनने लगे | युगों के जीवन प्रभाव वश नारी में मूलतः ..सौम्यता,प्रेम, त्याग, लज्जा, कला, संस्कृति के उपयोग व रक्षण के भाव मूल भाव उत्पन्न होने लगे व पु
रुष में...कठोरता , बल, शौर्य,वीरता, विद्वता, ज्ञान, नेतृत्त्व क्षमता आदि
के भाव...जो युगानुकूल आवश्यकता भी थी | इस प्रकार बल को पौरुष व सौम्यता , संकोच , लज्जा को नारीत्व का पर्याय माना जाने लगा |
--- चित्र-३- लिंग -योनि पूजा ( हरप्पा)--- व आदि शिव ...पशुपति समाधिस्थ......
इस कारण जहां परिवाद बाद की स्थापना व बाद में काल-क्रमानुसार -विवाह संस्था के साथ देव-देवी युग्म व उनकी पूजा -अर्चना का आविर्भाव हुआ वहीं नेतृत्त्व - क्षमता के कारण -पुरुष में प्रधान ,मुखिया ..राजा , देवता व किसी सर्व-शक्तिमान सत्ता की कल्पना का आविर्भाव हुआ और आदि-मातृका के स्थान पर पुरुष- ईश्वर, ब्रह्म की
कल्पना अस्तित्व में आई, साथ ही साथ माया, प्रकृति आदि- नारी भाव ईश्वर-रूपों की कल्पना भी हुई, जो मूल रूप में समन्वयात्मक समाज के ही चिन्ह हैं | | क
बीला-मुखिया ,राजा में -देवता व ईश्वर के भाव की स्थापना हुई | शायद इसी समय सर्व-प्रथम अर्धनारीश्वर भाव व ..लिंग-योनि पूजा , अस्तित्व में आई, जो बाद में पार्वती-शिव एवं पशुपति , देवाधिदेव महादेव शिव अदि-देव व ईश्वर बने, व अन्य विष्णु, ब्रह्मा आदि विभिन्न देवों की -देवियों की कल्पना हुई , पहले प्रकृति के विभिन्न उपादानों के रूप में तत्पश्चात उनके मानवीकरण के रूप में | इस प्रकार पूर्ण-रूपेण पुरुष-सत्तात्मक समाज की स्थापना हुई | परन्तु यह केवल एक प्रकार का श्रम-विभाजन ही था , व्यवहार में यह भी एक समन्वयात्मक- समाज ही था, जिसका प्रमाण प्रत्येक देव के साथ एक देवी की कल्पना व ईश्वर के साथ माया , प्रकृति आदि की कल्पना से मिलता है |
रुष में...कठोरता , बल, शौर्य,वीरता, विद्वता, ज्ञान, नेतृत्त्व क्षमता आदि
के भाव...जो युगानुकूल आवश्यकता भी थी | इस प्रकार बल को पौरुष व सौम्यता , संकोच , लज्जा को नारीत्व का पर्याय माना जाने लगा |--- चित्र-३- लिंग -योनि पूजा ( हरप्पा)--- व आदि शिव ...पशुपति समाधिस्थ......
इस कारण जहां परिवाद बाद की स्थापना व बाद में काल-क्रमानुसार -विवाह संस्था के साथ देव-देवी युग्म व उनकी पूजा -अर्चना का आविर्भाव हुआ वहीं नेतृत्त्व - क्षमता के कारण -पुरुष में प्रधान ,मुखिया ..राजा , देवता व किसी सर्व-शक्तिमान सत्ता की कल्पना का आविर्भाव हुआ और आदि-मातृका के स्थान पर पुरुष- ईश्वर, ब्रह्म की
कल्पना अस्तित्व में आई, साथ ही साथ माया, प्रकृति आदि- नारी भाव ईश्वर-रूपों की कल्पना भी हुई, जो मूल रूप में समन्वयात्मक समाज के ही चिन्ह हैं | | क
बीला-मुखिया ,राजा में -देवता व ईश्वर के भाव की स्थापना हुई | शायद इसी समय सर्व-प्रथम अर्धनारीश्वर भाव व ..लिंग-योनि पूजा , अस्तित्व में आई, जो बाद में पार्वती-शिव एवं पशुपति , देवाधिदेव महादेव शिव अदि-देव व ईश्वर बने, व अन्य विष्णु, ब्रह्मा आदि विभिन्न देवों की -देवियों की कल्पना हुई , पहले प्रकृति के विभिन्न उपादानों के रूप में तत्पश्चात उनके मानवीकरण के रूप में | इस प्रकार पूर्ण-रूपेण पुरुष-सत्तात्मक समाज की स्थापना हुई | परन्तु यह केवल एक प्रकार का श्रम-विभाजन ही था , व्यवहार में यह भी एक समन्वयात्मक- समाज ही था, जिसका प्रमाण प्रत्येक देव के साथ एक देवी की कल्पना व ईश्वर के साथ माया , प्रकृति आदि की कल्पना से मिलता है |-------नारी इस व्यवस्था में भी आधीन नहीं थी, आदरणीय व सलाहकार के रूप में पूज्य थी , स्त्री के बिना यज्ञ पूर्ण नहीं हो सकती थी | कोई भी अनुष्ठान...धार्मिक, राजनैतिक, सामाजिक ---स्त्री परामर्श व उपस्थिति के बिना नहीं हो सकता था.... शायद मानव इतिहास के इसी काल-क्रम में विभिन्न ज्ञान, विज्ञान, धर्म, दर्शन, व कला , अभियांत्रिकी, मानवता,व्यवहार, स्त्री-शिक्षा आदि की सर्वाधिक उन्नति हुई व मानव उन्नति के नए नए द्वार खुले " यस्तु नार्यस्तु पूज्यते रमन्ते तत्र देवता " के मूल मन्त्रों की स्थापना इसी समय होने लगी थी | ऋग्वेद १०/१५/१०४२०/२ में ऋषिका शची पोलोमी का कथन है ..."अहं केतुरहं मूर्धामुग्रा विवाचानी | ममेदनु क्रत पति: सेहनाया उपाचरेत ||.......अर्थात मैं ध्वज स्वरुप ( परिवार की गृह स्वामिनी ) तीब्र बुद्धिवाली व प्रत्येक विवेचना में समर्थ हूँ | मेरे पतिदेव सदैव मेरे कार्यों का अनुमोदन करते हैं | तथा "अहं बदामि नेत त्वं, सभामानह त्वं वद:| मेयेदस्तम्ब केवलो नान्यासि कीर्तियाश्चन ||" अर्थात ..हे स्वामी ! सभा में भले ही आप बोलें परन्तु घर पर मैं ही बोलूंगी | उसे सुनकर आप अनुमोदन करें |..... विवाह संस्था कोई कठोर व बंधन नहीं थी, स्त्रियाँ अपने क्रिया-कलापों में स्वतंत्र थी एवं इच्छा से किसी भी पुरुष अथवा जीवन साथी चुनने को स्वतंत्र थीं |
-----------वास्तव में ये दोनों ही व्यवस्थाएं स्थान, काल, देश के अनुसार युगों युगों तक साथ साथ ही चलती रहीं | आदि- मानव के उन्नत होकर मानव बनने , घुमंतू से स्थिर होने, कबीले, वर्ग, ग्राम व्यवस्था व श्रम विभाजन की विभिन्न कोटियों के उत्पन्न होने तक, जिनके मूल प्रभाव का पता अभी तक उपस्थित मातृसत्तात्मक -परिवार (यथा द.भारत ) व पितृसत्तात्मक परिवारों (यथा उत्तर भारत ) की उपस्थिति से चलता है | मूलतः पृथ्वी के भूखंडों के बनते -बिगड़ते रहने से, नए-नए देशों व आश्रय -स्थलों के परिवर्तन होते रहने से, जन संख्या के निरंतर दवाब के कारण मानव कुल, समूह, वर्ग लगातार अन्य स्थलों को पलायन करते रहे | उत्तर भारतीय भूखंड, जीवन के लिए सर्वाधिक उपयुक्त होने से यहाँ मानव की उत्पत्ति हुई एवं यहाँ से विश्व के अन्य उत्तरी, पश्चिमी, पूर्वी भागों की ओर पलायन के साथ अपने समयानुकूल समाज-व्यवस्था को भी साथ लेजाते रहे | मूल स्थान उत्तर भारत में जन संख्या व ज्ञान के प्रसार के साथ नयी व्यवस्थाएं आती रहीं | इसी प्रकार दक्षिण भारतीय भूखंडों के सम्मिलित होने पर हिमालय आदि श्रृंखलाएं बनी व मानव ने विन्ध्य श्रृंखला पार करके दक्षिण की ओर पलायन किया अपने तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था के साथ | इसीलिये हम देखते हैं कि उत्तर-भारत, अरब देशों, अफ्रीकी देशों आदि में पुरुष प्रधान व्यवस्था उत्पन्न होती गयी जबकि दक्षिण भारत, पूर्वी भारत, योरोप, चीन, अमेरिका , लेटिन अमेरिका आदि देशों में स्त्री सत्ता अधिक प्रभावी रही व आज भी परिलक्षित है | यद्यपि धीरे धीरे यह पुरुष प्रवंधित समाज में बदलती गयी |
----सभी चित्र ..साभार ...
----सभी चित्र ..साभार ...
अभी तो शेष है......अन्ना गीत...ड़ा श्याम गुप्त....
..कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
(कारण, कार्य व प्रभाव गीत....)
अभी तो शेष है मुझमें ,
अथक संघर्ष की क्षमता |
तिमिर होने लगी है किन्तु -
धुंधली सी किरण भी है |
मुझे लगता है यह संदेह,
बस यूंही अकारण है ||
अँधेरे भेद कब पाए ,
भला उजियार की क्षमता |
साथ मेरे चले जो भी ,
वही झिलमिल किरण होगा |
राग दीपक की लहरी से,
तिमिर का तम हरण होगा ||
समझ तूफ़ान कब पाए,
कहाँ साए की ठंडक में,
धूप की तपन सी क्षमता |
पला सायों में उसने कब ,
जहां का दर्द जाना है |
तप दिनभर वही समझा ,
दर्दे-गम का तराना है ||
अँधेरे भ्रम के कब समझे ,
मौन विश्वास की क्षमता |
नहीं होती कोइ सीमा ,
किसी भ्रम के निवारण की |
नहीं होती मगर श्रृद्धा,
कभी यूंही अकारण ही ||
अहं का गीत क्या जाने ,
समर्पण भाव की क्षमता |
अहं में अनसुनी चाहे,
करो तुम वन्दना मेरी |
समर्पण भाव में मैं तो,
तुम्हारे छंद गाता हूँ ||
(कारण, कार्य व प्रभाव गीत....)
अभी तो शेष है मुझमें ,
अथक संघर्ष की क्षमता |
तिमिर होने लगी है किन्तु -
धुंधली सी किरण भी है |
मुझे लगता है यह संदेह,
बस यूंही अकारण है ||
अँधेरे भेद कब पाए ,
भला उजियार की क्षमता |
साथ मेरे चले जो भी ,
वही झिलमिल किरण होगा |
राग दीपक की लहरी से,
तिमिर का तम हरण होगा ||
समझ तूफ़ान कब पाए,
तरणि-संघर्ष की क्षमता |
बहुत चाहा, नहीं जलयान,
तट की शरण जा पाये |
धैर्य संकल्प के आगे ,
कहाँ तूफ़ान टिक पाए ||कहाँ साए की ठंडक में,
धूप की तपन सी क्षमता |
पला सायों में उसने कब ,
जहां का दर्द जाना है |
तप दिनभर वही समझा ,
दर्दे-गम का तराना है ||
अँधेरे भ्रम के कब समझे ,
मौन विश्वास की क्षमता |
नहीं होती कोइ सीमा ,
किसी भ्रम के निवारण की |
नहीं होती मगर श्रृद्धा,
कभी यूंही अकारण ही ||
अहं का गीत क्या जाने ,
समर्पण भाव की क्षमता |
अहं में अनसुनी चाहे,
करो तुम वन्दना मेरी |
समर्पण भाव में मैं तो,
तुम्हारे छंद गाता हूँ ||
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