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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

शनिवार, 6 फ़रवरी 2010

जीवन लक्ष्य ----

इसे कहते हैं -जीवन ,जीवन लक्ष्य,परमात्मा , आनंद व मुक्ति....


जीवन क्या है, इसे कैसे जीना चाहिए, -प्रायः विद्वान् अपने अपने ढंग से कहते रहते हैं जो-
प्रायः एकांगी दृष्टि होतीहै; पूर्ण दृष्टि के लिए देखिये यह समाचार, इसमें आई आई टी के इंजीनियर, भाभा रिसर्च सेंटर के वैज्ञानिक, जी -विद्युत ऊर्जा पर शोधकर्ता श्री सुद्धानंद गिरी जी अब आत्मीय ऊर्जा की खोज में हैं | यह ठीक उसी तरह है जिसेपूर्ण जीवन की खोज प्राप्ति के विषय में --यजुर्वेद के अंतिम अध्याय --ईशोपनिषद के ११ वें श्लोक --सूत्र में कहागया है---
""विध्यांन्चाविध्या यस्तद वेदोभय सह |अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्यया s मृतंश्नुते || ""
अर्थात --अविद्या ( सांसारिक ज्ञान, विज्ञान, ) प्राप्त करके , विद्या ( आत्म ज्ञान, आत्मीय ऊर्जा, परमात्तत्व ) दोनोंको ही प्राप्त करना चाहिए | अविद्या से मृत्यु , अर्थात संसार सागर को पार करके , विद्या से अमृत अर्थात आत्मतत्व, ईश्वरीय ज्ञान की प्राप्ति करनी चाहिए यही सम्पूर्ण जीवन है |

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2010

नव वर्ष चेतना समिति --सांस्कृतिक जागरण आह्वान



नव वर्ष चेतना समिति , उ प्र , भारत -द्वारा -हिन्दू जीवन दर्शन अपनाने का आह्वान , ताकि धरती व सभ्यता व मानवता का संरक्षण हो सके , विश्व संवाद केंद्र, जियामू, लखनऊ में , 'भारतीय काल गणना की वैज्ञानिकता एवं हिन्दू जीवन दृष्टि ' पर एक संगोष्ठी , १४ फरवरी २०१०, सायं ४ बजे.---देखें यह पोस्टर---

सोमवार, 1 फ़रवरी 2010

जिन खोजा सो पाइया गहरे पानी पैठ ....



जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ ...वैदिक विज्ञान ..वैदिक गणित

सब कुछ भारतीय किताबों से सीखा ---कहना है आई आई एम् के क्षात्रों का , फ़टाफ़ट गणना करने वाले तरीकों के बारे में , पढ़िए ये समाचार ---ऊपर । बड़ा करने के लिए चित्र पर कहीं भी क्लिक करें ।
----सब कुछ मौजूद है , वैदिक साहित्य में , आवश्यकता है स्वयं को पहचानने की , जानने की , मानने की , श्रृद्धा की -उस पर खोज-विचार करने की ,विज्ञान -दर्शन- धर्म के समन्वित रूप को बिना पूर्वाग्रह के ग्रहण करने की ।
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रविवार, 31 जनवरी 2010

सड़क दुर्घटनाओं के विरुद्ध जन जागरण का एक अभियान ...


लखनऊ के एक कवि हैं कृष्णा नन्द राय , आपने घर के चिराग शीर्षक से एक पोस्टर अभियान चलाया है तथा एक कविता भी लिखी है। देखिये उनका कविता की प्रथम पंक्ति सहित पोस्टर यहाँ । वे घर घर व हर स्थान पर ये पोस्टर स्वयं चिपकाते व बाँटते हैं ----आप भी अभियान में एसा ही कुछ कर सकते हैं ।

शनिवार, 30 जनवरी 2010

जीवेम शरद शतं -गीता व आयुर्वेद में वर्णित जीवन शैली श्रेष्ठ ---डा सरोज चूडामणि गोपाल


लखनऊ वि वि के दीक्षांत समारोह में जीवन शैली से जुड़े रोगों के बारे में व्याख्यान देते हुए चिकित्सा कुलपति डा सरोज चूडामणि गोपाल ने कहा कि ७७% मौतों का कारण अनुचित , बेढंगी जीवन शैली है। कुलपति ने यह भी बताया कि आयुर्वेद व गीता में वर्णित खान-पान विधियों का अनुसरण करके आज कल की भाग-दौड़ वाली जीवन की व्याधियों से बच सकते हैं । पढ़ें इस महत्त्व पूर्ण विषय पर एक रिपोर्ट ----ऊपर के चित्र में ।
----आगरा के सरोजिनी नायडू चिकित्सा महाविद्यालय से सर्जरी में स्नातकोत्तर, उत्तर प्रदेश चिकित्सा वि वि की कुलपति डा सरोज चूडामणि गोपाल , भारत की प्रथम महिला सर्जन हैं एवं विश्व प्रसिद्ध बाल रोग विशेषग्य सर्जन हैं ।

मंगलवार, 26 जनवरी 2010

गणतंत्र दिवस पर --कार्य, कारण व प्रभाव गीत --कितने दीपक जल उठते हैं

कितने दीपक जल उठते हैं
(कारण ,कार्य व प्रभाव गीत --इस नवल धारा गीत में - एक कारण या कार्य दिया जाता है व उसके प्रभाव वर्णन किये जाते हैं )

जब गणतंत्र दिवस का पावन,
परम पुनीत पर्व आता है

हर्षित जन जन गण के मन में,
नवल तिरंगा लहरा उठता
नव उन्नति नव कर्म भाव युत,
कितने दीपक जल उठते हैं।। .

लहर लहर लहराए तिरंगा ,
मुक्त गगन में इठलाता है

मिटे अशिक्षा और गरीबी ,
आस पल्लवित होती मन में
राष्ट्र प्रेम के विविध भाव युत,
कितने दीपक जल उठते हैं.

अहं भाव से ग्रस्त शत्रु जब,
देश पै आँख गड़ाने लगता

वीरों के नयनों में दीपित,
रक्त खौलने लग जाता है
जन गण मन में शौर्य भाव के,
कितने दीपक जल उठते हैं.

अन्धकार पर प्रकाश की जय,
का दीपावल पर्व सुहाता

धन समृद्धि सौभाग्य वर्धन को,
गणेश लक्ष्मी पूजन होता
जग जीवन से तमस मिटाने,
कितने दीपक जल उठते हैं.

मन में प्रियतम का मधुरिम स्वर,
नव जीवन मुखरित कर देता

आस और आकांक्षाओं के ,
नित नव भाव पल्लवित होते
नेह का घृत, इच्छा-बाती युत,
कितने दीपक जल उठते हैं.

दीपशिखा सम छवि प्रेयसि की,
जब नयनों में रच-बस जाती

मधुर मिलन के स्वप्निल पल की ,
रेखा सी मन में खिंच जाती
नयनों में सुन्दर सपनों के,
कितने दीपक जल उठते हैं.

जब अज्ञान तिमिर छंट जाता,
ज्ञान की ज्योति निखर उठती है

नए नए विज्ञान-ज्ञान की,
नित नव राहें दीपित होतीं
मन में नव संकल्प भाव के ,
कितने दीपक जल उठते हैं.

रविवार, 24 जनवरी 2010

देखिये हकीकत विज्ञान क्षेत्र से असंबंधित ,विज्ञान-विज्ञानं चिल्लाने वाले रिपोर्टरों -ब्लागों की --


---विज्ञान क्षेत्र से अन्यथा जिन्हें विज्ञान की जानकारी नहीं होती उन पत्रकारों , ब्लागों ,लेखकों , रिपोर्टरों की वास्तविकता क्या है , उन जानकारियों की वास्तविकता क्या है, यह आप इस समाचार से जानिये | एसे लोग कुछ का कुछ अर्थ बना देते हैं और भ्रम, आशंका व भय के स्थितिउत्पन्न होती है। जैसी अप अभी हाल में ही कुछ टी वी रिपोर्टों में भेई देख -सुन चुके हैं |वस्तुतः विशेषग्य विषयों पर पूर्ण खोज के पश्चात , सोदाहरण व उसी क्षेत्र के व्यक्तियों को लिखना बताना चाहिए | इसे शास्त्रों की भाषा में -अनाधिकार चेष्टा एवं अनाधिकारी को शास्त्र न पढने लिखने की बात कहा जाता है।