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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

सोमवार, 30 मई 2011

नारद पुराण ..पत्रकारिता दिवस पर ..कविता ...डा श्याम गुप्त

                                                       ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...   
आदि संवाद दाता नारद जी ने ,
पृथ्वी भ्रमण का मन बनाया |
देखें कहाँ तक उन्नत हुई है-
मेरी संवाद-प्रसार की विद्या-माया |
मेरे शिष्य कार्य को कैसे आगे बढ़ा रहे हैं ;
और कैसे मेरे नाम का-
पृथ्वी पर भी डंका बजा रहे हैं ||

कवि भेष  में वे ,
एक अखवार के दफ्तर में पधारे, बोले-
नारद-पुराण लिखा है,
समीक्षा छपवानी है |
सम्पादकजी बोले-
ये तो बड़ी पुरानी कहानी है ,
आज की हिट हीरोइन तो रानी है |
लोग कहेंगे, हम पुराण पंथी हैं ,
धर्म के नाम पर लोगों को भटकाते हैं ;
कवि जी हम तो-
धर्म निरपेक्ष कहलाते हैं |
कोई  धाँसू-- मारधाड़, लूट-बलात्कार -
ह्त्या चोरी पर्दाफास या साक्षात्कार -
की खबर हो तो लाओ ;
अरे, किसी हीरो से हीरोइन का रोमांस लड़वाओ,
अभिताभ पुराण या माधुरी उवाच,
लिखा हो तो लाओ ||

नारद जी सकपकाए,
तभी मुख्य सम्पादकजी -
गुस्से से भुनभुनाते हुए आये ;
सम्पादक पर झल्लाए, चिल्लाए -
मूर्ख ! मेरा अखबार बंद कराना चाहता है ?
जिस पार्टी के चंदे से चलता है,
उसी की आलोचना छापता है ||

विचित्रपुरी में एक -
काव्य-लोकार्पण समारोह होरहा था,
एक रिपोर्टर सीट पर बैठा सोरहा था |
नारद जी ने पूछा -
पत्रकार जी ये क्या कर रहे हैं ?
वे बोले- रिपोर्टर जी तो, हजारा श्री के -
मच्छर-मार अगरबत्ती के लांचिंग पर आयोजित-
पंचतारा होटल में ,
काकटेल डिनर पर गए हैं |
मैं तो दैनिक वेतन-भोगी फोटोग्राफर हूँ ,
मुझसे कहगये हैं कि-
एक -दो फोटो खींच लाना,
समाचार तो बन ही गए हैं ||

रामायण पाठ में -
टी वी रिपोर्टर जी पधारे,
 बोले- जल्दी से लिखकर देदें,
क्या पढ़ना-गाना है ;
हमें तो मुख्यमंत्री का-
चुनाव-भाषण कवर करने जाना है ||

नारद जी मायूस होकर-
नारायण- नारायण बड़  बडाये  ;
जिज्ञासा-पूर्ति हेतु , शीघ्र ही-
विष्णु धाम सिधाए ||


रविवार, 29 मई 2011

पोलीगेमी या बहुविवाह प्रथा---- डा श्याम गुप्त.....

....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
 

        (कल ब्लोगर आशुतोष नाथ तिवारी जी का ई-मेल मिला, जिसमें एक लिंक दिया था एवं उस पर वे मेरे विचार जानना चाहते थे| लिंक ( यूं-ट्यूब ) में इस्लाम के कोई विद्वान डा जाकिर नाइक पोलीगेमी -अर्थात बहुविवाह-प्रथा पर किसी महिला द्वारा कुरआन में चार शादियों की स्वीकृति पर उत्तर देरहे थे| डा नाइक सीधे-सीधे कृष्ण की १६१०८ रानियों , दशरथ की तीन रानियों के उदाहरण से कुरआन में चार शादियों की वैधता को समर्थित कर रहे थे | चूंकि उत्तर काफी लंबा व गहन विषय से जुड़ा हुआ है अतः मैंने एक पोस्ट द्वारा लिखना उचित समझा |)
                                      
            बहुपत्नी-प्रथा विश्व की लगभग सभी प्राचीन व्यवस्थाओं में थी..चाहे वह योरोप हो या एशिया, अफ़्रीका ...... वास्तव में यह समाज व महिलाओं में असुरक्षा की भावना का प्रतिकार थी और तब प्रारम्भ हुई जब सभ्यता स्त्री-सत्तात्मक से पुरुष सत्तात्मकता में परिवर्तित हुई ।
          वस्तुत: प्रागैतिहासिक काल में कहीं भी ईश्वर नहीं था अपितु स्त्री-शक्ति--मातृका, सप्त-मातृकाओं का वर्चस्व था उन्ही की पूजा होती थी, जैसा कि उस काल की प्राप्त मृण्मूर्तियों से पता चलता है। जब कालक्रमानुसार विकास-क्रम में मानव घुमन्तू से स्थिर हुआ और स्त्री ने स्वत: परिस्थिति व आवश्यकतानुसार घर पर रहना व घरेलू व्यवस्था को स्वीकार किया—पत्नी भाव स्वीकार किया तो धीरे-धीरे पुरुष का वर्चस्व स्थापित होने पर... ...मुखिया व राजा के रूप में एक सुरक्षा व पालन-पोषण तन्त्र का प्रतीक बना, फ़िर किसी सर्वशक्तिमान सत्ता...ईश्वर की सत्ता पुरुष रूप में स्थापित हुई जो मुखिया व राजा में भी आरोपित हुई.....और स्त्रियों द्वारा अपने व सन्तति के सुरक्षा व लालन-पालन हेतु शक्ति के केन्द्र की ओर आकर्षित होने से ..बहु-पत्नी प्रथा का आविर्भाव हुआ। तत्पश्चात राजनैतिक व अन्य कारणों से यह प्रथा सामान्य-व्यवहार भाव से समाज में अभिहित होती गयी।
      परन्तु यह प्रथा समाज का एक व्यवहारिक रूप रहा , आदर्श रूप नहीं  मूल भारतीय त्रिदेव एक-पत्नी वाले हैं- (ब्रह्मा की गायत्री व सावित्री दो पत्नियां-भाव रूप ही हैं), मनु भी एक पत्नी शतरूपा है,( यद्यपि कामायनी में प्रसाद जी ने श्रृद्धा व इडा कहा है पर वह भी भाव रूप ही है ) जबकि प्रज़ा-उत्पत्ति के प्रतीक... दक्ष—की आकूति व प्रसूति दो पत्नियां थीं।...गणेश की दो पत्नियां-रिद्धि व सिद्धि हैं। चन्द्रमा की २७...यद्यपि ये सभी प्रतीकात्मक हैं..पर हैं तो...भाव रूप में ही सही.....।
       राजा दशरथ की तीन रानियां थीं परन्तु राम ( जो आदर्श के प्रतीक हैं) तो दृढ़ता से एक पत्नी- व्रता हैं। श्री कृष्ण की कथित १६१०८ पत्नियां वस्तुत: वे निरीह, परित्यकता स्त्रियां थीं जो आतंक के प्रतीक जरासन्ध-समूह के यहां कैद, शोषिता-पीडिता नारियां थीं जिनको श्रीकृष्ण ने जरासंध को मारकर बन्धन से मुक्त किया पर उनके परिवार ने स्वीकारा नहीं तो उनके पालन-पोषण का दायित्व स्वयं लिया। उनकी ८ रानियां विभिन्न राजपरिवारों से सन्धि हेतु राजनैतिक कारणों से थीं.....हां थीं ।
       राजा मानसिन्ह की ९ रानियां थीं । सामान्य जनता पर भी कोई एसा बन्धन नहीं था..” देवी के लिये गाये जाने वाले लान्गुरिया गीतों में एक गीत है---“दो दो जोगिनी के बीच अकैलो लान्गुरिया “यह जहां सामान्य जन में भी यह प्रथा की सामाजिक स्वीकृति को दर्शाती है वहीं सामान्यजन को सामाजिक रूप से चेताने के उपक्रम भी हैं, की भले ही कानूनन या सामाजिक बन्धन न हों परन्तु यह आदर्श एक स्थिति नहीं है।
       कहने का तात्पर्य है कि .डा नाइक.......एक ज़हीन इन्सान हैं, ग्यानी हैं...अपने धर्म-प्रसार हेतु नेताओं की भांति तर्कयुक्त वक्तृता में भी माहिर हैं। यद्यपि हिन्दू धर्म के बारे में उनका ज्ञान तात्विक नहीं है परन्तु फिर भी वे अपने कथन में सही हैं कि यदि ईस्लाम में चार शादियां कबूल हैं तो चिल्लाहट क्यों...सच ही है....पर सिर्फ़ चार ही क्यों? यदि बहुविवाह स्वीकार है तो फ़िर चाहे जितनी हों, क्या फ़र्क पडता है...यहीं पर अन्तर है हिन्दुत्व के तार्किक व सर्वसुलभ व शास्त्रों के व्यवहारिक रूप से प्रयोग के सिद्धान्त में व इस्लाम के ..जो हम कहें वही करो, जो किताब में लिखा है वही पत्थर की लकीर है  के कट्टरता के सिद्धान्त में । बहुत नया है इस्लाम धर्म हिन्दू धर्म की तुलना में अत: कुछ नवीन नियम--चार शादियाँ तक-- हो ही सकते हैं। हिन्दू धर्म जो सनातन है, इसमें यदि बहुपत्नी प्रथा है तो सन्यांस अर्थात बिना विवाह जीवन की भी प्रथा है| बहुत खुला हुआ, संतुलित व व्यवहारिक एवं समतामूलक समाज, धर्म व सभ्यता है यह।
     जहां तक पश्चिम के एक पत्नी कानून की बात है वह सच ही कहा. डा नाइक....ने कि आचरण में तो वहां सभी स्त्रियां सभी की पत्नियां हैं...सब कुछ जायज़ है, उपलब्ध है व मान्य भी है। उस संस्कृति  की तो कोई बात ही नही, वह तो कोई संस्कृति ही नहीं है । वह  अभी जुम्मा-जुम्मा चार रोज़ की संस्कृति है....जन्गलों से सीधे महानगरों व बहुमन्जिला नगरों में पहुंचे हुए लोग....धन-सम्पत्ति की चकाचौन्ध से .आश्चर्यचकित...दिशाहीन....बौराये लोग। जहां तक स्त्री-पुरुष अनाचरण-दुराचरण-शोषण-अत्याचार  की बात है वह कोई संस्कृति-धर्म की बात नही मानवीय आचरण-स्वभाव की बात है । जो अन्य संस्कृतियों ...हिन्दू—मुस्लिम भी...में चोरी-छुपे होता है वह पाश्चात्य में खुले आम, जो अधिक घातक है क्योंकि बुराई आकर्षक होती है व तेजी से फैलती है।
         मुझे तो यह लगता है कि भारत सरकार को जिसने अन्ग्रेज़ों व अमेरिकी प्रभाववश एक पत्नी कानून पास किया.....उसे समाप्त कर देना चाहिये। जो जितनी पत्नियों का पालन कर सके उसकी इच्छा।

शुक्रवार, 27 मई 2011

अन्त्याक्षरी --लघु कथा ...डा श्याम गुप्त ..

                                                                                      ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
                                   "  ईशान कोण से चली हवा,
                                     निकला सूरज का गोला |
                                      छिपा चाँद और गयी रात्रि,
                                      वन में इक पांखी बोला  ||   "     ---- 
                             "यह तो कोई कविता नहीं है ! "   अन्त्याक्षरी के दौर में मैंने जब यह कवितांश सुनाया तो मकान मालिक का पुत्र सतीश बोला |  
             क्यों ? यह द्विवेदी जी द्वारा किया गया प्रात: वर्णन है | तुम्हें याद नहीं तो हम क्या करें , मैंने ने कहा |
             'ल'  पर हुआ , 'ल' पर बोलो , जल्दी; चालाकी से अधिक समय मत लो | मेरी तरफ  के  सदस्य चिल्लाए |
                           स्मृतियों का खाता खुलने लगता है |  बचपन में छत पर समय मिलते ही बच्चों  की मंडली जुड़ने पर , अन्त्याक्षरी का खेल तो एक आवश्यक पास्ट-टाइम था किशोरों का |  मोहल्ले के आसपास के बच्चों की छत पर एकत्रित होकर दो टोलियाँ बनाकर, कविता, छंद, दोहा, गीत आदि के गायन की प्रतियोगिता होती थी यह |  कड़ी शर्त यह होती थी की कविता, दोहा या कोई भी छंद-गीत आदि का कम से कम एक पूरा बंद होना चाहिए, आधा-अधूरा नहीं; जो मूलतः  रामायण या प्रसिद्द कवियों की कृतियों से होते थे |  यह वास्तव में काव्य, साहित्य द्वारा सदाचरण-संस्कृति के पुरा मौखिक ज्ञान के सहज रूप को जीवित रखने का ही एक उपक्रम था जो खेल-खेल में ही तमाम आचार-व्यवहार-सत्संग, सदाचरण  सम्प्रेषण के पाठ भी हुआ करते थे | आज की तरह फ़िल्मी गानों के टुकड़ों का भोंडा प्रदर्शन नहीं |
                         अगला पन्ना खुलता है ....सामने की छत से अचानक मीरा की आवाज आई  ," मुझे पता है , किस कवि की कविता  है | सुन्दर है |"...फिर मेरी तरफ देखकर अपनी तर्जनी उंगली चक्र-सुदर्शन की मुद्रा में उठाकर सर हिलाते हुए चुपचाप बोली , " चालाकी, इतनी सफाई से ! "... मैंने उसे आँख तरेर कर उंगली मुंह पर रखकर चुप रहने का इशारा किया |
                मीरा मेरी बहन की क्लास-फेलो थी |   मेरी कवितायें मेरे छोटे भाई-बहनों की स्कूल-पत्रिकाओं में उनके नाम से छपा करती थीं | एक बार उसके कहने पर उसके ऊपर भी तत्काल कविता बनाई थी--
                            " दरवाज़े के पार पहुंचकर , 
                                  पीछे मुड़कर मुस्काती हो |
                                       सचमुच की मीरा लगती हो, 
                                            वीणा पर जब तुम गाती हो |"    
               अतः उसे मेरे इस  काव्य व आशु-कविता हुनर का ज्ञान था |  वह सामने वाले गली के पार वाले मकान में रहती थी |  गली  इस स्थान पर अत्यंत संकरी होजाने के कारण दोनों घरों की छतों की मुंडेरें काफी समीप थीं |  घने बसे शहरों में प्रायः घरों की छतें , बालकनियाँ आदि आमने-सामने व काफी नज़दीक होती हैं  और सुबह, शाम, दोपहर महिलाओं, बच्चों, किशोर-किशोरियों, सहेलियों, दोस्तों की आर-पार बातें व चर्चाएँ खूब चलतीं हैं | साथ ही में किशोरों-युवाओं की कनखियों से नयन-वार्ताएं, संकेत व कभी कभी प्रेम पत्रों का आदान-प्रदान की  भी सुविधा मिल जाती है |
             स्मृति-पत्र आगे खुलता है......अच्छा चलो ठीक है .....सामने की टोली हथियार डाल देती है | सतीश की टोली की तेज-तर्रार सदस्या सरोज 'ल' पर सुनाने लगती है---
                         " लाल देह,  लाली लसे और धर  लाल लंगूर |
                           बज्र देह दानव दलन, जय जय जय कपि शूर |"       
शूर ...'र' पर ख़त्म हुआ...'र ' से....|   
                                   "यह तो होचुका है |  मेरी तरफ की टोली के जगदीश ने तुरंत फरमान जारी किया |".........जगदीश की स्मृति बहुत  तीव्र थी और याददास्त के मामले में वह कालोनी में अब्वल था |  सरोज के झेंप जाने पर हम सब हँसने लगे | ..... नया बोलो...नया बोलो ...या हारो.... के शोर के बीच  रमेश ने नया कवितांश सुनाया |
                               मैं सोचता हूँ आजकल भी अंग्रेज़ी का ज्ञान बढाने के लिए ..शब्द-काव्य  रूपी अन्त्याक्षरी  होती है, जिसका अभिप्राय: सिर्फ अंग्रेज़ी का तकनीकी ज्ञान बढ़ाना, शब्द-सामर्थ्य बढाने की एक्सरसाइज ही हो पाता है ; आचरण, शुचिता, आचार-व्यवहार , संस्कृति, ज्ञान का सहज सम्प्रेषण नहीं | वस्तुतः  स्व-साहित्य, स्व-भाषा-साहित्य, स्व-संस्कृति-साहित्य- इतिहास,  अपने सामाजिक व पारिवारिक उठने-बैठने के, खेलने के तौर-तरीके निश्चय ही भावी- पीढी के मन में,  सोच में, एक सांस्कृतिक व वैचारिक तारतम्यता, एक निश्चित दिशाबोध प्रदत्त मानसिक दृढ़ता एवं ज्ञान, अनुभव  व पुरा पीढी के प्रति श्रृद्धा, सम्मान, आदर का दृष्टिकोण विकसित करती है |  आजकल पाश्चात्य दिखावे की प्रतियोगी  संस्कृति के अन्धानुकरण व सुविधापूर्ण जीवन दृष्टिकोण  में यह स्व-भाव व स्वीकृति ही लुप्त होती जारही है |






       
            
              

यूं ही नहीं होजाता कोई कबीर....

                                                      ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

           यूं ही नहीं बन जाता कोई कबीरकबीर सिर्फ़ कबीर नहीं, एक पूरा दर्शन है, एक संसार है, एक व्यवहारिक भाव है, एक गुण है जो गुणातीत  है | कबीर का अर्थ है संत, आत्मानंद , नित्यानंद में मगन -विदेह , निर्गुणी |  यूं तो कबीर बनने के लिए एक गुरु बनाना पड़ता है--- जायसी ने कहा है......'गुरु बिन जगत को निरगुन पावा' |  पर कबीर का तो कोइ गुरु नहीं था ?  पर  रामानंद को उन्होंने अपना गुरु माना , एकलव्य की भांति --यदि गुरु नहीं हो तो स्वयम को गुरु बनाना पड़ता है , "तवै तुमि एकला चलो रे " ..."अप्प दीपो भव"--स्वयं दीपक बन कर ..शास्त्र, संसार, अनुभव, इतिहास  के प्रकाश का विकिरण करना होता है | यही किया कबीर ने , और तभी वे होपाये ...कबीर....गुरु बिनु जगत को निरगुन पावा  |
            कबीर बनने के लिए ..लाठी लेकर घर फूंकना पड़ता है ......लोभ, मोह, लिप्सा का संसार छोड़ना पड़ता है , ........
"कबीरा खडा बाज़ार में लिए लुकाठी हाथ,
जो घर फूंके आपणा, चलै हमारे साथ |"  ......

भोग,माया-संसार-स्त्री-पुत्रादि को भी  त्यागना पड़ता है | यह ही पहला कदम  है  जैसा कबीर ने कहा---जब जागो तभी सवेरा .....
" नारी तो हम भी करी कीन्हा नांहि विचार ,
जब जाना तब परिहरी नारी बड़ा विकार ||"
              कबीर बनने के लिए राम का कुत्ता बनना पड़ता है .....  अर्थात अहं का त्याग..मैं को गलाना पड़ता है , स्वयं को ईश-प्रवाह में छोड़ देना , ज्ञान, शास्त्र, भक्ति, विश्वास, श्रृद्धा  के प्रवाह में डुबो देना पड़ता है | ईश्वर प्रणिधान .........
"कबीर  कूता राम का,   मुतिया  मेरा नांउ ,
गले राम की जेवड़ी, जित खैंचे तित  जांऊ |"  .....और..............
.. ..........."जब मैं था तब हरि नहीं , अब हरि हैं मैं नाहिं  | "   --परमात्मा व परमात्म गुण से एकाकार......     
                  कबीर बनने के लिए समदर्शी बनना पड़ता है .....समता भाव में जीना पड़ता है .....सूक्ष्मदर्शी होना पड़ता है |
" कंकड़ पत्थर जोड़  के मस्जिद लई चिनाय ,
ता चढ़ मुल्ला बांग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय |"...... या ..
......." लौकी अड़सठ तीरथ नहाई,  कडुआ प न  तौऊ नहीं जाई "...
..एकत्व भाव अपनाना होता है .............
    "एक मूल ते सब जग उपजा कौन बड़े को मंदे |"
                   कबीर बनने के लिए...तत्वदर्शी बनना पड़ता है...  भक्त होना पड़ता है ........
"हरि मेरे पीऊ मैं हरि की बहुरिया " .............और.......तत्वदर्शन..........

"झीनी झीनी बीनी रे चदरिया ...एक तत्व गुण तीनी रे चदरिया "      .....    
सो चादर सुर नर मुनि ओढी, ओढ़ की मैली कीन्ही चदरिया  ,
दास कबीर जतन से ओढी, ज्यों की त्यों धर दीनी रे चदरिया |"          .
...और.....
"साधू एसा चाहिए जैसा सूप सुभाय ,
         सार सार को गहि रहे थोथा देय उडाय |"  .......तथा......

" ज्यों तिल माहीं तेल है ज्यों चकमक में आग,
तेरा साईं तुज्झ में  जाग सके तो जाग |"  .......
          कबीर बनने के लिए....निर्गुणी होना पड़ता है ...... ..... " अवगुण मेरे रामजी बकस गरीब निवाज "....अपने मूल को पहचानना पड़ता  है....आत्म साक्षात्कार ...........
 "जल में कुम्भ , कुम्भ में जल है,  बाहर भीतर पानी ,
.फूटा कुम्भ जल जलहि समाना यह तथ कथ्यो गियानी " ......स्वयं के मूल में स्थित होना होता है....

." काहे री नलिनी तू कुम्हिलानी , तेरे ही नाल सरोवर पानी "......  और यहीं... आत्म .."एकोहम बहुस्याम"... का भाव अनुभव करता है , ..."अणो अणीयान, महतो महीयान "...हो जाता है ....तथा मूल ब्रह्मसूत्र ---"अहं ब्रह्मास्मि "..."सोहं"... "तत्वमसि "...एवं .."खं ब्रह्म"...को जान पाता है.....और  होजाता है कबीर.... जान पाता है उस ब्रह्म को जिसके बारे में ........
   ..." एको सद विप्रा: बहुधा वदंति ".....


    


गुरुवार, 26 मई 2011

श्याम लीला--५--चीर हरण......ड श्याम गुप्त...

                                                                                  ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

 चीर मांगतीं गोपियाँ  करें विविधि मनुहार ,
क्यों जल में उतरीं सभी ,सारे वस्त्र उतार  |
सारे वस्त्र उतार , लाज अब कैसी मन में ,
वही आत्मा तुझमें मुझमें सकल भुवन में  |
कण कण में ,मैं ही बसा, मेरा ही तन  नीर ,
मुझसे कैसी लाज लें ,तट पर आकर चीर  ||


उचित नहीं व्यवहार यह, नहीं शास्त्र अनुकूल ,
नंगे    हो   जल में  घुसें,   मर्यादा प्रतिकूल  |
मर्यादा प्रतिकूल,   श्याम ने दिया ज्ञान यह,
दोनों बांह उठाय , वचन  दें सभी आज यह  |
करें समर्पण पूर्ण, लगाएं  मुझ में ही  चित ,
कभी न हो यह भूल, भाव समझें सब समुचित ||


कोई रहा न देख अब , सब है सूना शांत,
चाहे जो मन की करो, चहुँ दिशि है एकांत  |
चहुँ दिशि है एकांत, करो सब पाप-पुण्य अब ,
पर नर की यह भूल, देखता है ईश्वर सब  |
कण कण बसता ईश , हर जगह देखे सोई ,
सोच समझ ,कर कर्म, न छिपता उससे कोई  ||

बुधवार, 25 मई 2011

तेरे कितने रूप गोपाल...पद...डा श्याम गुप्त...

                                                                   ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
तेरे कितने रूप गोपाल ।
सुमिरन करके कान्हा मैं तो होगया आज निहाल ।
नाग -नथैया, नाच -नचैया, नटवर, नंदगोपाल  ।
मोहन, मधुसूदन, मुरलीधर, मोर-मुकुट, यदुपाल ।
चीर -हरैया,    रास -रचैया,     रसानंद,  रस पाल ।
कृष्ण-कन्हैया, कृष्ण-मुरारी, केशव, नृत्यगोपाल |
वासुदेव, हृषीकेश, जनार्दन, हरि, गिरिधरगोपाल |
जगन्नाथ, श्रीनाथ, द्वारिकानाथ, जगत-प्रतिपाल |
देवकीसुत,रणछोड़ जी,गोविन्द,अच्युत,यशुमतिलाल |
वर्णन-क्षमता  कहाँ 'श्याम, की  राधानंद, नंदलाल |
माखनचोर, श्याम, योगेश्वर, अब काटो भव जाल ||

सोमवार, 23 मई 2011

डा श्याम गुप्त के पद....

                                                    ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
चलो रे मन ऐसे जग से दूर |
छीन झपट, आपा धापी और छल बल में जो चूर |
महल दुमहले राज भवन  सब हलचल से परिपूर |
मन की शान्ति न मिले यहाँ पर जग दुखिया मज़बूर |
ऊंचे -ऊंचे मंदिर-मठ हैं, मिले  न  प्रभु का  नूर |
भक्त-पुजारी, पण्डे-मूरत, ईश्वर से अति-दूर |
मन से प्रभु को 'श्याम, भजे तो आनंद सुख भरपूर ||