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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

गुरुवार, 28 जुलाई 2011

कहाँ हैं हम .............ड़ा श्याम गुप्ता....








 हमारे दो रूप .......
---यह ...




---------------------और-------------




                                                         
यह------

------------------------आखिर कहाँ हैं हम.......

बुधवार, 27 जुलाई 2011

दो पल--गीत ..ड़ा श्याम गुप्त ...

                                        ..      ..कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

राह में दो पल साथ तुम्हारे बीते उनको ढूढ रहा हूँ |
पल में सारा जीवन जीकर फिर वो जीवन ढूंढ रहा हूँ |

उन दो पल के साथ ने मेरा सारा जीवन बदल दिया था |
नाम पता कुछ पास नहीं पर हर पल तुमको ढूंढ रहा हूँ |

तेरी चपल सुहानी बातें मेरे मन की रीति बन गयीं |
तेरे सुमधुर स्वर की सरगम, जीवन का संगीत बन गयीं |

तुम दो पल जो साथ चल लिए,जीवन की इस कठिन डगर में 
मूक  साक्षी   बनीं  जो   राहें , उन राहों  को   ढूंढ  रहा हूँ |

पल दो पल में जाने कितनी जीवन-जग की बात होगई  |
हम तो,  चुप चुप ही बैठे थे,   बात बात में  बात होगई |

कैसे पहचानूंगा तुमको मुलाक़ात यदि कभी होगई  |
तिरछी चितवन और तेरा मुस्काता  आनन् ढूंढ रहा हूँ |

मेरे गीतों को सुनकर , तेरा वो वंदन ढूंढ रहा हूँ |
चलते चलते तेरा वो प्यारा अभिनन्दन ढूंढ रहा हूँ |








गुरुवार, 21 जुलाई 2011

....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

श्याम नीति दोहावली........ड़ा श्याम गुप्त


....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

त्रिभुवन गुरु और सर्व गुरु, जो प्रत्यक्ष प्रमाण,

जन्म मरण से मुक्ति, दे ईश्वर करूँ प्रणाम



पूर्ण चन्द्र सदृश्य है, गुरु की कृपा महान ,

मन वांछित फल पाइए,परमानन्द महान



सदाचार स्थापना, शास्त्र अर्थ समझाय,

आप करे सद आचरण, सो आचार्य कहे



जब तक मन स्थिर नहीं, मन नहीं शास्त्र विचार,

गुरु की कृपा न प्राप्त हो, मिले न तत्व विचार



सभी तपस्या पूर्ण हों, यदि संतुष्ट प्रमाण,

मात पिता गुरु का करें, श्याम सदा सम्मान



मनसा वाचा कर्मणा, कार्य करें जो कोय,

मातु पिता गुरु की सदा सुसहमति से होय



शत आचार्य समान है, श्याम' पिता का मान,

नित प्रति वंदन कीजिये,मिले धर्म संज्ञान



माता एक महान है, सहस पिता का मान,

पद बंदन नित कीजिये, माता गुरू महान



शत शत वर्षों में नहीं, संभव निष्कृति मान ,

करते जो संतान हित, मात पिता वलिदान



दिखा गए सन्मार्ग जो, माता पिता महान ,

उचित मार्ग पर हम चलें, सदा मिले सम्मान



विद्या दे और जन्म दे,और संस्कार कराय,

अन्न देय निर्भर करे, पांच पिता कहलायं



राजा, गुरु और मित्र की पत्नी रखिये मान,

पत्नी माता, स्वमाता, पांचो माता मान







सोमवार, 18 जुलाई 2011

मेकाले का स्वप्न अब भी ढल रहा है....हम कब समझेंगे ....ड़ा श्याम गुप्त ...

                                                                               ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

              पिज्जा हट,  केप्यूचिनो -काफी, विदेशी  डिशों से सजे --  हाइपर सिटी , फेन-माल... माल संस्कृति का प्रचार.....  जस्ट डांस,  डांस इंडिया डांस,  डांस-डांस , कौन बनेगा करोडपति.......आदि से नग्नता व धन लोलुपता का बाज़ार......  नंगे पन  के टी वी सीरियल,....बदन- दिखाती हुईं तारिकाएं...... व नंगे होते हुए हीरो,....... नग्नता से भरपूर फ़िल्में .....  हेरी-पोटर के मूर्खतापूर्ण ..उपन्यास व चल-चित्र .......  महिला-उत्थान का नकली चेहरा....महिलाओं के सभी क्षेत्रों में दिन व रात रात भर कार्य-संस्कृति व ..उसकी आड  में  वैश्यावृत्ति  का फैलता हुआ  ख़ूबसूरत धंधा ....  ब्रांडेड कमीज़-पेंट व  दैनिक उपयोग के  सामान की भोगी  संस्कृति  ..... तरह तरह के कारों के माडलों की  भारत में उपलब्धिता......  विदेशी कंपनियों द्वारा स्व-हित में  खूब-मोटी मोटी पगार...... फिर  महंगे होटलों में खाना रहना, व  विदेशी वस्तुओं के उपयोग का प्रलोभन.....  आसानी से मिलने वाले  क़र्ज़.......सस्ती विदेश यात्रा के आफर.......... चमचमाते हुए  हाई-टेक आवासों के विज्ञापन..... महंगी  व विदेशी होती शिक्षा .... भारतीय संस्कृति व रीति-रिवाजों को गाली देता भारतीय युवक......भारतीय  व -पुरातन सब पिछडा है , पुराण पंथी है, आउट डेटेड  है..कहता हुआ विदेशी कल्चर में ढला नव-युवा ....मारधाड वाले  अंग्रेज़ी पिक्चरों , वीडियो- गेम्स  के पीछे बिगडते हुए बच्चे .... अर्ध नग्नता के  कपडे पहने ..तेजी से माल, शापिंग सेंटरों, सड़कों, बाजारों, आफिसों  में मोबाइल पर लगातार बात करती लडकियां .......

             ये सब उसी निम्नांकित  पुराने  उद्देश्य -------

     की पूर्ति हित- के नवीन हथकंडे हैं......      हम कब समझेंगे...?????????

रविवार, 10 जुलाई 2011

बदरिया घिर घिर आये......वर्षा गीत....ड़ा श्याम गुप्त.....

                                                                  ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

आई  सावन की बहार,'
बदरिया घिर घिर आये |
गूजें कजरी और मल्हार,
बदरिया घिर घिर आये |

रिमझिम रिमझिम पड़त फुहारें  ,
मुरिला पपीहा पीउ पुकारें |
चतुर टिटहरी निशि रस घोले,
चकवा-चकवी चाँद निहारें |

आये सजना नाहिं हमार,
बदरिया घिर घिर आये |
आई सावन की फुहार ,
बदरिया घिर घिर आये ||

घनन घनन घन जिय डरपाए,
झनन झनन झन जल बरसाए |
प्यासी  विरहन  बिरहा गाये,
पावस  तन मन को तरसाए |

दहके पावक बनी बयार ,
बदरिया घिर घिर आये |
गूंजें कजरी और मल्हार,
बदरिया घिर घिर आये ||

पिया गए परदेश न आये,,
बेरी  चातक टेर लगाए |
कागा बैठ मुंडेर न बोले,
श्यामा शुभ संदेश न लाये |

री सखि  ! कैसे पायल झनके .
घुँघरू छनके, कंगना खनके |
सखि  ! कैसे करूँ श्रृंगार ...
बदरिया घिर घिर आये |

आये  सजना नाहिं हमार ,
बदरिया घिर घिर आये ||

शुक्रवार, 8 जुलाई 2011

कृष्ण लीला --१०--पूतना .......

                                                                  ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ....                                                
 कुटिल आसुरी दुष्ट-भाव मय नारी प्रतिकृति  ।
बनी पूतना रूप,   घूमती  ग्राम  नगर  नित ।
लीलाधर  की लीला,  जो  पहुंची कान्हा  घर ।
लिये  रूपसी भाव,  वेष  वह ममता का  धर ।
आंचल रूपी द्वेष-द्वन्द्व का भाव वह जटिल ।
चूस लिया  कान्हा ने,  सारा भाव  वह कुटिल  ॥