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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त
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बुधवार, 6 सितंबर 2017

शिक्षक दिवस पर विशेष – गुरु और भारत ---- डा श्याम गुप्त

                         ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



डा रंगनाथ मिश्र सत्य



                   शिक्षक दिवस पर विशेष – गुरु और भारत ----

      भारतवर्ष में गुरु की सदैव ही विशिष्ट महत्ता रही है | गुरु अर्थात जो कोइ विशिष्ट दिशा दे समाज, राष्ट्र को, विश्व को, मानवता को, विशिष्ट दिशा का प्रवर्तक हो |
     विश्व व मानवता के आदिगुरु भगवान शिव हैं जिन्होंने वेदों की रचना एवं समन्वय किया और मानवता को सौंपा| अक्षर, शब्द, बोली व भाषा, गीत-संगीत, साहित्य सहित प्रत्येक ज्ञान व विद्या के प्रवर्तक - शिव ही आदिगुरु हैं
     तत्पश्चात देवगुरु ब्रहस्पतिदैत्यगुरु उशना काव्य या शुक्राचार्य हैं मानव समाज की दो विशिष्ट दिशाओं के प्रवर्तक | त्रिदेवों के स्वरुप महागुरु दत्तात्रेय हैं| वशिष्टविश्वामित्र एकतंत्र व लोकतंत्र के आदि प्रवर्तक बने | इसके साथ ही अपने अपने राज्यकुलों के गुरुओं के भी नाम हैं, गुरु परशुराम, द्रौणाचार्य आदि |
      गीता के प्रवर्तक विश्वगुरु भगवान श्रीकृष्ण की महिमा को कौन नहीं जानता मानता |
     आधुनिक युग में गुरु आदि शंकराचार्य ने पुनः भारत में वैदिक धर्म की पताका फहराई | परन्तु इसके पश्चात भारत का अज्ञान अन्धकार काल रहा जिसमें आचार्य, काव्याचार्य, भगवदाचार्य हुए, स्थानीय गुरु हुए परन्तु राष्ट्र समाज साहित्य की कोई स्पष्ट दिशा निर्धारक, प्रवर्तक नहीं हुए, क्योंकि परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़ा हुआ यह देश-समाज स्वयं दिशा विहीन व किंकर्तव्यविमूढ़ था | 
          गुरु गोरखनाथ के काल से नवचेतना का युग प्रारम्भ हुआ | सदैव की भांति साहित्य द्वारा समाज में जन मानस की चेतना को परतंत्रता की बेड़ियों से स्वातंत्र्य हेतु एक लहर उठी जो जिसने राजनीति सहित प्रत्येक क्षेत्र में उद्बोधन किया | साहित्य के क्षेत्र ने में अधिकाँश कवि साहित्यकार आदि साहित्य-काव्य की बनी बनाई लीक पर ही चलते रहे अतः साहित्य में युगप्रवर्तक की भूमिका किसी की नहीं रही |
     गुरुदेव सूर्यकांत त्रिपाठी निराला  इस क्षेत्र में अपने नवीन साहित्य अतुकांत कविता को लेकर आये और काव्य की दिशा में एक नवीन युग का प्रवर्तन हुआ | आज साठोत्तरी कविता-साहित्य में नवीन कविता विधा अगीत कविता के प्रवर्तक, अगीतायन संस्था के संस्थापक अध्यक्ष, युवा कवियों के गुरूजी साहित्याचार्य श्री डा रंगनाथ मिश्र सत्य साहित्यभूषण, जो गुरुदेव, गुरूजी, अगीत गुरु, कवि कुल गुरु, युवा कवियों के गुरु व गुरुओं के गुरु के रूप में प्रतिष्ठित हैं | जाने कितनी साहित्यिक संस्थाएं उनके संरक्षण में एवं उनकी संस्था के तत्वावधान में साहित्य के क्षेत्र में कार्यरत हैं |
              सभी गुरुओं को श्रद्धा नमन .....|



 

मंगलवार, 25 अक्टूबर 2016

गागर में सागर पुस्तक मेले का शुभ समापन – डा रंगनाथ मिश्र को मेला संयोजक श्री देवराज अरोरा ने अपना गुरु घोषित किया- डा श्याम गुप्त

                        ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

*****गागर में सागर पुस्तक मेले का शुभ समापन – डा रंगनाथ मिश्र को मेला संयोजक श्री देवराज अरोरा ने अपना गुरु घोषित किया ----

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------- दि.२३-१०-16 रविवार को मोती महल मैदान में चलने वाले पुस्तक मेले- ‘गागर में सागर’ के समापन समारोह के उल्लासमय क्षणों में, लखनऊ व देशभर के साहित्यकार समाज के गौरवान्वित होने का एक सुखानुभूत पल तब उपस्थित हुआ जब श्रीमती विद्याबिन्दू सिंह, श्री महेंन्द्र भीष्म, श्रीमती अरोरा आदि गण्यमान्य साहित्यकार एवं विद्वानों व समाज सेवकों से सजे मंच तथा उपस्थित तमाम विद्वानों, साहित्यकारों की उपस्थिति में साहित्य जगत के कवि कुलगुरु, अगीत कविता विधा के संस्थापक, संघात्मक समीक्षा-पद्धति व संतुलित कहानी के जनक, अखिल भारतीय अगीत परिषद् के अध्यक्ष साहित्यमूर्ति डा रंगनाथ मिश्र सत्य साहित्यभूषण, जिनको गुरुजी के नाम से साहित्यजगत में जाना जाता है और जिनके अगणित शिष्य देश के कोने कोने में विद्यमान हैं, मेला संयोजक श्री देवराज अरोरा ने मंच से अभिनन्दन करते हुए अपना ‘गुरु’ मानने की उद्घोषणा की |
Drshyam Gupta's photo.
---------समारोह की प्रतिष्ठा में उस समय और श्रीवृद्धि हुई जब इस पावन क्षण में ‘गागर में सागर’ सारतत्व वाक्य को चरितार्थ करते हुए श्री देवराज अरोरा ने सभी की उपस्थिति में सामाजिक सरोकारों को प्रश्रय देते हुए आज एवं अभी से स्वयं पान मसाला, गुटखा आदि के सेवन न करने का संकल्प किया एवं अन्य सभी से इस बुराई को प्रश्रय न देने का आह्वान किया |
-------समस्त कवि व साहित्यकार समाज की ओर से हम श्री देवराज अरोरा को इस भावना एवं शुभ कृतित्व के लिए बधाई देते हुए आभार प्रकट करते हैं|


----मेले के कुछ बिंदु --
चित्र१.-नव सृजन की काव्यगोष्ठी --मंच पर श्री देवराज अरोरा, डा रंगनाथ मिश्र व डा श्याम गुप्त ....चित्र-२. टेकचंद प्रेमी के संतुलित कहानियों का संग्रह'कालदंड ' का लोकार्पण ---श्री टेक चंद प्रेमी, डा श्याम गुप्त, डा रंगनाथ मिश्र सत्य , श्री देवराज अरोरा व कुमार तरल ...

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Drshyam Gupta's photo.

शुक्रवार, 31 जुलाई 2015

गुरु पूर्णिमा पर---- सूरज बन कर ज्ञान का, जब गुरु करे प्रकाश...ड़ा श्याम गुप्त ...

                                    ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


गुरु पूर्णिमा पर----

गुरु

दावानल संसार में, दारुण दुःख अनंत,|
श्याम करे गुरु वन्दना, सब दुखों का अंत ||

सदाचार स्थापना, शास्त्र अर्थ समझाय।
आप करे सदआचरण, सो आचार्य कहाय॥

यदकिन्चित भी ग्यान जो, हम को देय बताय।
ज्ञानी उसको मानकर, फ़िर गुरु लेंय बनाय॥

इस संसार अपार को किस विधि कीजै पार।
श्याम गुरु कृपा पाइये, सब विधि हो उद्धार।।

अध्यापक को दीजिये, अति गौरव सम्मान।
श्याम करें आचार्य का, सदा दश गुना मान ॥

गु अक्षर का अर्थ है, अन्धकार अज्ञान।
रु से उसको रोकता, सो है गुरु महान ॥

जब तक मन स्थिर नहीं, मन नहिं शास्त्र विचार।
गुरु की कृपा न प्राप्त हो, मिले न तत्व विचार॥

आलोकित हो श्याम का,मन रूपी आकाश ।
सूरज बन कर ज्ञान का, जब गुरु करे प्रकाश॥

गुरुवार, 4 सितंबर 2014

डा श्याम गुप्त के दोहे----शिक्षक दिवस पर....

                                            ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

                         
शिक्षक- दिवस पर प्रत्येक शिक्षक को अपना आत्मविश्लेषण करना चाहिये,और हमें भी. शिक्षक कोई भी, कहीं भी, किसी भी क्षेत्र का व्यक्ति होसकता है, सि्र्फ़ वेतन-भोगी स्कूल मास्टर/ प्रोफ़ नहीं ----- प्रस्तुत हैं कुछ दोहे....
गुरु

दावानल  संसार मेंदारुण दुःख अनंत,|
श्याम करे गुरु वन्दना, सब दुखों का अंत ||

 
सदाचार स्थापना, शास्त्र अर्थ समझाय।
आप करे सदाआचरण , सो आचार्य कहाय॥

यदकिन्चित भी ग्यान जो, हम को देय बताय।
ग्यानी उसको मानकर, फ़िर गुरु लेंय बनाय॥

इस संसार अपार को किस विधि कीजै पार।
श्याम गुरु क्रपा पाइये,सब विधि हो उद्धार।।

अध्यापक को दीजिये,अति गौरव सम्मान।
श्याम करें आचार्य का, सदा दश गुना मान ॥

गु अक्षर का अर्थ है, अन्धकार अग्यान।
रु से उसको रोकता,सो है गुरु महान ॥

जब तक मन स्थिर नहीं, मन नहिं शास्त्र विचार।
गुरु की क्रपा न प्राप्त हो,मिले न तत्व विचार॥

आलोकित हो श्याम का,मन रूपी आकाश ।
सूरज बन कर ग्यान का, जब गुरु करे प्रकाश॥
त्रि-गुरु-----गुरु, माता, पिता

शत आचार्य समान है श्याम पिता का मान।
नित प्रति वंदन कीजिये,मिले धर्म संग्यान॥

माता एक महान है, सहस पिता का मान।
पद वंदन नित कीजिये, माता गुरू महान ॥

सभी तपस्या पूर्ण हों, यदि संतुष्ठ प्रमाण।
मात-पिता-गुरु का करें, श्याम नित्य सम्मान॥

मनसा वाचा कर्मणा, कार्य करें जो कोय।
मातु पिता गुरु की सदा, सुसहमति से होय॥

और




       अन्योनास्ति----जगत गुरु-----ईश्वर........

त्रिभुवन गुरु और जगत गुरु,जो प्रत्यक्ष प्रमाण।
जन्म मरण से मुक्ति दे, "ईश्वर" करूं प्रणाम॥
 
 




















गुरुवार, 21 जुलाई 2011

श्याम नीति दोहावली........ड़ा श्याम गुप्त


....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

त्रिभुवन गुरु और सर्व गुरु, जो प्रत्यक्ष प्रमाण,

जन्म मरण से मुक्ति, दे ईश्वर करूँ प्रणाम



पूर्ण चन्द्र सदृश्य है, गुरु की कृपा महान ,

मन वांछित फल पाइए,परमानन्द महान



सदाचार स्थापना, शास्त्र अर्थ समझाय,

आप करे सद आचरण, सो आचार्य कहे



जब तक मन स्थिर नहीं, मन नहीं शास्त्र विचार,

गुरु की कृपा न प्राप्त हो, मिले न तत्व विचार



सभी तपस्या पूर्ण हों, यदि संतुष्ट प्रमाण,

मात पिता गुरु का करें, श्याम सदा सम्मान



मनसा वाचा कर्मणा, कार्य करें जो कोय,

मातु पिता गुरु की सदा सुसहमति से होय



शत आचार्य समान है, श्याम' पिता का मान,

नित प्रति वंदन कीजिये,मिले धर्म संज्ञान



माता एक महान है, सहस पिता का मान,

पद बंदन नित कीजिये, माता गुरू महान



शत शत वर्षों में नहीं, संभव निष्कृति मान ,

करते जो संतान हित, मात पिता वलिदान



दिखा गए सन्मार्ग जो, माता पिता महान ,

उचित मार्ग पर हम चलें, सदा मिले सम्मान



विद्या दे और जन्म दे,और संस्कार कराय,

अन्न देय निर्भर करे, पांच पिता कहलायं



राजा, गुरु और मित्र की पत्नी रखिये मान,

पत्नी माता, स्वमाता, पांचो माता मान







गुरुवार, 18 फ़रवरी 2010

देखिये -शास्त्रों का अर्थ-अनर्थ, गुड-गोवर कैसे होता है---


<----देखिये अर्थ का अनर्थ , जो सारे किये कराये पर पानी फेर सकता है एवं बच्चों को गलत उदाहरण पेश कर सकता है । आरुणी गुरु धौम्य की सुप्रसिद्ध गुरु- भक्ति कथा | इसके अंत में दिया गया निष्कर्ष , लेखक का स्वयं का निष्कर्ष है, जो अच्छी खासी गुरु भक्ति की सीख को ---गुरु को ही मिली सीख में बदल देता है।
घटना आरुणी की, शिष्य की, गुरु भक्ति के लिए है, परन्तु लेखक का कथन है -"पर इस शिष्यने गुरु को ही बहुत कुछ सिखा दिया " यह वाक्य इस कथा में नहीं है परन्तु अंग्रेज़ी ज्ञान , पाश्चात्य ज्ञान से तरंगितलोग ( या अनजाने में या अज्ञान वश ) हमारे बच्चों से अभिभावक व शिष्यों से गुरु , बहुत कुछ सीख सकते हैं , की निरर्थक भावना पर - अर्थात गुरुओं को ही शिष्य से सीखना चाहिए , पर चलते ही दिखते हैं|---इसे कहते हैं गुड-गोबर करना | जो अँगरेज़ , अमेरिकन व यूरोपीय विद्वान् बहुत पहले से योज़ना बद्ध तरीके से करते आरहे हैं|--पूरी कथा यह है---
महर्षि आयोदधौम्यके तीन शिष्य बहुत प्रसिद्ध हैं—आरुणि, उपमन्यु और वेद। इनमेंसे आरुणि अपने गुरुदेव के सबसे प्रिय शिष्य थे और सबसे पहले सब विद्या पाकर यही गुरुके आश्रमके समान दूसरा आश्रम बनाने में सफल हुए थे। आरुणि को गुरुकी कृपा से सब वेद, शास्त्र, पुराण आदि बिना पढ़े ही आ गये थे। सच्ची बात यही है कि जो विद्या गुरुदेव की सेवा और कृपा से आती है; वही विद्या सफल होती है। उसी विद्या से जीवन का सुधार और दूसरों का भी भला होता है। जो विद्या गुरुदेवकी सेवाकी बिना पुस्तकों को पढ़कर आ जाती है, वह अहंकार को बढ़ा देती है। उस विद्याका ठीक-ठीक उपयोग नहीं हो पाता।

महर्षि आयोदधौम्य के आश्रम में बहुत-से शिष्य थे। वे सब अपने गुरुदेव की बड़े प्रेम से सेवा किया करते थे। एक दिन शामके समय वर्षा होने लगी। वर्षाकी ऋतु बीत गयी थी। आगे भी वर्षा होगी या नहीं, इसका कुछ ठीक-ठिकाना नहीं था। वर्षा बहुत जोरसे हो रही थी। महर्षिने सोचा कि कहीं अपने धान के खेत की मेड़ अधिक पानी भरने से टूट जायगी तो खेतमें से सब पानी बह जायगा। पीछे फिर वर्षा न हो तो धान बिना पानी के सूख ही जायँगे। उन्होंने आरुणि से कहा—‘बेटा आरुणि ! तुम खेतपर जाओ और देखो, कही मेड़ टूटनेसे खेत का पानी निकल न जाय।’
अपने गुरुदेव की आज्ञासे आरुणि उस समय वर्षा में भीगते हुए खेतपर चले गये। वहाँ जाकर उन्हेंने देखा कि धानके खेतकी मेड़ पर एक स्थान पर टूट गयी है और वहाँ से बड़े जोरसे पानी बाहर जा रहा है। आरुणिने वहाँ मिट्टी रखकर मेड़ बाँधना चाहा। पानी वेगसे निकल रहा था और वर्षा से मिट्टी गीली हो गयी थी, इसलिये आरुणि जितनी मिट्टी मेड़ बाँधनेको रखते थे, उसे पानी बहा ले जाता था। बहुत देर परिश्रम करके भी जब आरुणि मेड़ न बाँध सका तो वे उस टूटी मेड़के पास स्वयं लेट गये। उनके शरीरसे पानीका बहाव रुक गया।

रातभर आरुणि पानीभरे खेतमें मेड़से सटे पड़े रहे। सर्दी से उनका सारा शरीर अकड़ गया, लेकिन गुरुदेव के खेतका पानी बहने न पावे, इस विचार से वे न तो तनिक भी हिले और न उन्होंने करवट बदली। शरीरमें भयंकर पीड़ा होते रहने पर भी वे चुपचाप पड़े रहे।

सबेरा होने पर संध्या और हवन करके सब विद्यार्थी गुरुदेव को प्रणाम करते थे। महर्षि आयोदधौम्यने देखा कि आज सबेरे आरुणि प्रणाम करने नहीं आया। महर्षिने दूसरे विद्यार्थियोंसे पूछा—‘आरुणि कहाँ है ?’
विद्यार्थियों ने कहा—‘कल शामको आपने आरुणि को खेतकी मेड़ बाँधनेको भेजा था, तबसे वह लौटकर नहीं आया।’
महर्षि उसी समय दूसरे विद्यर्थियों को साथ लेकर आरुणि को ढूँढ़ने निकल पड़े। उन्होंने खेत पर जाकर आरुणि को पुकारा। आरुणि से ठण्ड के मारे बोला तक नहीं जाता था। उन्होंने किसी प्रकार अपने गुरुदेवकी पुकार का उत्तर दिया। महर्षि ने वहाँ पहुँचकर उस आज्ञाकारी शिष्यको उठाकर हृदय से लगा लिया, आशीर्वाद दिया—‘पुत्र आरुणि ! तुम्हें सब विद्याएँ अपने-आप ही आ जायँ।’ गुरुदेव के आशीर्वाद से आरुणि बड़े भारी विद्वान हो गए।