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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

गुरुवार, 24 मई 2012

पृथ्वी का संरचनात्मक इतिहास--- क्रमिक श्रृंखला .... डा श्याम गुप्त..

                 


 

          यह आदि-सृष्टि  कैसे हुई, ब्रह्मांड कैसे बना एवं हमारी अपनी पृथ्वी  कैसे बनी व यहां तक का सफ़र कैसे हुआ, ये आदि-प्रश्न सदैव से मानव मन व बुद्धि को निरन्तर मन्थित करते रहे हैं । इस मन्थन के फ़लस्वरूप ही मानव  धर्म, अध्यात्म व विग्यान रूप से सामाजिक उन्नति में सतत प्रगति के मार्ग पर कदम बढाता रहा आधुनिक विग्यान के अनुसार हमारे पृथ्वी ग्रह की विकास-यात्रा क्या रही इस आलेख का मूल विषय है । इस आलेख के द्वारा हम आपको  पृथ्वी की उत्पत्ति, बचपन  से आज तक की क्रमिक एतिहासिक यात्रा पर ले चलते हैं।
      ( सृष्टि व ब्रह्मान्ड रचना पर वैदिक, भारतीय दर्शन, अन्य दर्शनों व आधुनिक विज्ञान  के समन्वित मतों के प्रकाश में इस यात्रा हेतु -- मेरा आलेख ..मेरे ब्लोग …श्याम-स्मृति  the world of my thoughts..., विजानाति-विजानाति-विज्ञान ,  All India bloggers association के ब्लोग ….  एवं  e- magazine…kalkion Hindi  तथा  पुस्तकीय रूप में मेरे महाकाव्य " सृष्टि -ईशत इच्छा या बिगबैंग -एक अनुत्तरित उत्तर " पर पढा जा सकता है  | )
                         हमारी पृथ्वी 
                          पृथ्वी  सूर्य से तीसरा ग्रह  हैपृथ्वी  सौर मंडल  में व्यास, द्रव्यमान और घनत्व  में सबसे बड़ा स्थलीय ग्रह है ।  पृथ्वी के अलावा इसका पृथ्वी ग्रहसंसार ,धरती  और  टेरा के रूप में भी उल्लेख होता है।
                                  पृथ्वी मानव सहित लाखों प्रजातियों  का घर है, पृथ्वी ही ब्रह्मांड में एकमात्र वह स्थान है जो  जीवन  अस्तित्व के लिए जाना जाता हैवैज्ञानिक खोजें संकेत देती  हैं कि इस ग्रह का गठन ४.५४ अरब वर्ष (४.५ बिलियन ईयर्स) पहले और उसकी सतह पर जीवन लगभग एक अरब वर्ष पहले प्रकट हुआतब से, पृथ्वी के  जीवमंडल  (मानव सहित ) ने   ग्रह पर पर्यावरण और अन्य अजैवकीय ( जड़ ,प्राकृतिक  ) परिस्थितियों को बदल दिया है ताकि वायुजीवी जीवों  (एरोबिक लाइफ ) के प्रसारण, साथ ही साथ ओजोन परत ( ओजोन लेयर)  के छरण  को रोका जा सके जो पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र   ( मेग्नेटिक -फील्ड )   के साथ हानिकारक विकिरण को रोक कर जमीन पर जीवन की अनुमति देता है।
                
                    लगभग  4.6 बिलियन वर्ष पूर्व पृथ्वी ग्रह का निर्माण हुआ पृथ्वी की आयु ब्रह्माण्ड की आयु की लगभग एक-तिहाई है आज की स्थिति तक पहंचने के दौरान पृथ्वी में व्यापक भूगर्भीय  तथा जैविक  परिवर्तन हुए | संक्षिप्त में इस ऐतिहासिक का खंड को पांच  भागों  में  वर्णित किया जा  सकता है -----
   भाग १-- सौर मंडल की उत्पत्ति -४.५४ बिलियन वर्ष पूर्व ---, सूर्य ,पृथ्वी व अन्य ग्रहों की उत्पत्ति
पृथ्वी का केन्द्र व प्रथम वातावरण  की उत्पत्ति, पानी व चन्द्रमा की उत्पत्ति  | महासागरों  व पृथ्वी पर द्वितीय वातावरण की उत्पत्ति| महाद्वीपों  का बनना |
भाग २ - जीवन की उत्पत्तिअणु का प्रथम प्रतिलिपिकार व प्राकृतिक चयन का प्रारम्भ, जैविक सूप , प्रारंभिक कोशिकाएं, बहुकोशीय जीवन का विकास, ऑक्सीजन क्रान्ति व ओक्सीजन या  प्रकाश-संश्लेषण– पृथ्वी का तृतीय वातावरण ....ओजोन परत का निर्माण ....
भाग ३ - जीवन का विकास--- कोशिकीय सहजीविता , माइटोकोंड्रिया का विकास, क्लोरोप्लास्ट , पेरोक्सीजोम्स , कोशिका का नाभिक ...प्रथम कोशिकीय श्रम-विभाजन –वनस्पति व जंतु कोशिका ...विभिन्न जैव कालोनियों का निर्माण व सामूहिक विलोपन व म्यूटेशन......
भाग ४ -केम्ब्रियन-विस्फोट ....जीवन की तीब्र गति से वृद्धि ...प्रथम कशेरुकी जीव ...मछली का सागर में उद्भव ..संधिपाद प्राणी....चतुष्पाद प्राणी का अवतरण.....जल-स्थल( उभय) चर......पक्षियों व सरीसृपों की उत्पत्ति ....पृथ्वी पर जीवन....हिम-युग...विलोपन....डायनासोर्स.....स्तनधारियों का उद्भव....आवृत्त-बीजी-पुष्पों का विकास...
भाग ५- मानव का उद्भव व विकासभाषा, सभ्यता, संस्कृति, धर्म, अध्यात्म व विज्ञान .....

 
   सन्दर्भ--- Refrences….
1-The age of earth….Donlrymps G S, Newman williyam.et el..US geological society 1997.
2.-evidence for Ancient bombardment on earth…by Robert rock
3-Evolution of fossils & plants…taylor et el.
4-oigin of earth & moon..NASA .by taylor
5-Did life come from another world?...wanflesh david etc..scientific American press.
6-cosmic evolution…tufts university..by cherssan eric…
7-Trends in ecology & evolution…Xiao S, lafflame S…
8-A natural history of first 4 billions of life on earth., newyork, nature & earth..by forggy and richmand…
9- First step on land….mac newtan, Robert B and jeniffar M..
10-The mass Extinction  …science Aug 05…
11- पृथ्वी का इतिहास एवं चन्द्रमा की उत्पत्ति व विशाल संघात अवधारणा…..विकीपीडिया 
                ---क्रमश: भाग १-- सौर मंडल की उत्पत्ति...अगली पोस्ट में ...
                          

मंगलवार, 15 मई 2012

कविवर डी तन्गवेलन की हिन्दी कविता --मातृत्व की महक ... डा श्याम गुप्त

                               ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
          
                                      चित्तूर, आंध्रप्रदेश में जन्मे, तमिल भाषी ' बेंगलूर में कर्नाटक हिन्दी प्रचार समिति, में कार्यरत, प्रबंध व परिक्षा मंत्री (मानद)- कविवर श्री डी तन्गवेलन ' सहृदय'  ने बनारस हिन्दू वि वि , वाराणसी से एम ए (हिन्दी ) किया| वे तमिल, तेलगू .कन्नड़, हिन्दी व अंग्रेज़ी में नाटक, निबंध  लिखते थे| आपने ८१ वर्ष की उम्र में कविता लिखना प्रारम्भ किया और अपने ८१ वें जन्म दिन पर ८१ कविताओं का संग्रह 'जीवन-शोध' प्रकाशित किया |यह काव्य-संग्रह मुझे सौभाग्य से अपने उपन्यास 'इन्द्रधनुष' के लोकार्पण समारोह पर मेरे सम्मानार्थ प्रदत्त साहित्य के साथ  प्राप्त हुआ।  जीवन के सत्य से अनुप्राणित आपकी कवितायें सामान्य भाषा व उक्तियों में सशक्त अन्योक्तियों के माध्यम से व्यंजना गुण युक्त महत्वपूर्ण  सामाजिक सन्देश प्रसारित करती हैं ।  एक कविता 'मातृत्व की महक' प्रस्तुत है| ।

गमले के खिले गुलाब ने चलते
कविवर डी तंगवेलन 'सहृदय'
चंचल पवन से भरते अठखेलियाँ ,
अपने गमले की बंदी मिटते से,
सहज कुतूहलवश प्रश्न किया|

'क्या तुझे पास की मिट्टी से
 मिलजुल कर  सदा मोद  से,
मन  बहलाने की मह्दिच्छा मधुर 
कभी न मचली अंतराल से ।'

गमले की मिट्टी ने हंसकर कहा,
'क्यों नहीं होती ! रहती हर दम 
मैं अपने इर्द-गिर्द की सखियों से 
हिले-मिले मन फूले रहती ।

अब भी है मन होता, गले मिलूँ 
मगर मैं ने अपना घर अलग
बसालिया, जो मेरा बहु प्यारा
मानों, मन इससे चिपक गया ।

मेरी थी एक अदम्य कामना
मेरा स्तन्य पीता बालक
घुटनों के बल चलें इस आँगन में ,
दिन रात की मांग, भगवान से ।

मेरे इस सपने को चरितार्थ
करने तू आया आँगन में ।
जन्म देकर तुझे, मैं धन्य हुई,
सार्थक मेरा यह जन्म हुआ ।

कहता जिसे तू बंधन, वह है
वास्तव में मेरा सौभाग्य ,
जो करता स्वर्ग का अवहेलन
है मुक्ति को दूर से सलाम ।'

सुन मातृहृदय का उमडा उद्गार
स्नेह स्निग्ध कामना मंगल ,
फूल खिला, मिला जगत को सुगंध
अनन्य अन्वय अलंकार ।।

सोमवार, 14 मई 2012

कहानी --- माँ........ डा श्याम गुप्त ....

                              ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

 
                      
         ईश्वर ने जब माँ को बनाया तो समीप खड़े हुए देवदूत ने अभिभूत होकर कहा, ’प्रभु ! यह तो जगत की सर्वोत्कृष्ट, सर्वश्रेष्ठ, सर्वसौन्दर्यमय, सर्वगुणसम्पन्न एवं स्वयं विशिष्टता व गुणों का अवतार है | अब तो आप निश्चिन्त होंगे कि यह कायनात निश्चय ही सदा दैवीय गुणों से परिपूर्ण रहेगी |
       ईश्वर ने कहा, ‘ हाँ आशा तो यही है|’ ईश्वर के ललाट पर कुछ चिंता की सलवटें भी थीं |

       वार्तालाप शैतान व उसका दूत भी सुन रहा था | शैतान चिंतित होते हुए दूत से बोला ,’ स्थिति पर ठीक से दृष्टि रखो|’

        वर्षों बीत गए | स्त्री-पुरुष सदाचरण-युक्त जीवन व्यतीत कर रहे थे| बच्चे माँ के पयामृत-पान से धीर, वीर, गंभीर, ज्ञानवान, आचारवान, आस्थावान व बड़ों के आज्ञाकारी, कोमलमना होते थे| सर्वत्र धर्म, न्याय, सत्य का चलन था एवं सुख-शान्ति थी | स्त्री-पुरुष लिंगानुपात-बिंदु अर्थात स्त्री/पुरुष = १ ही रहता था|


       शैतान यह सब देखकर बहुत अप्रसन्न हुआ| उसने दूत को बुलाकर  डांटा,’ यह क्या होरहा है? इस प्रकार तो हमारा अस्तित्व ही समाप्त होजायगा | जाओ, शीघ्र ही स्थिति को सुधारों वर्ना किसी और को पृथ्वी का प्रधानमंत्री  बनाने का मन बनालूँगा और तुम्हें रौरव-नर्क का राज्यपाल बना दिया जायगा|

      कुछ वर्षों बाद दूत राजधानी आया और प्रसन्नता पूर्वक शैतान को निरीक्षण का आमंत्रण दिया|

      शैतान ने देखा कि सर्वत्र पृथ्वी पर ऊंची-ऊंची इमारतें खड़ी हुई हैं| बड़े-बड़े मॉल हैं| सर्वत्र मशीनों से काम होरहा है| इंसान आसमान में उडकर एक स्थान से दूसरे स्थान जाता है| मानव-कृत झीलों में नहाता है| स्वयं अपने हाथ से कोई  काम नहीं करता बस खूब धन कमाता है व ऐश करता है| मौज-मस्ती में लिप्त है| परन्तु चारों और अशांति है, द्वंद्व-द्वेष में जकडा हुआ है| धन के लिए चोरी, लूट, झगड़ा, ह्त्या, डकैती की गलाकाट प्रतियोगिता है| भ्रष्टाचार, अनाचार, स्त्रियों से दुर्व्यवहार, मारपीट, बलात्कार की बाढ़ आई हुई है|

      वाह! बहुत खूब | परन्तु यह सब क्यों होने लगा ? शैतान ने खुश होकर पूछा | दूत मुस्कुराते हुए शैतान को विशेष-निरीक्षण ...साईट-इन्सपेक्शन पर ले गया | शैतान देखने लगा....

      एक घर में बेटे ने बूढ़े माँ-बाप को घर से निकाल दिया था | वे किसी भी तरह दर-दर की ठोकरें खाते हुए अपना गुजारा कर रहे थे |

          एक बेटे ने अपने माँ-बाप को ओल्ड-एज होम में भरती कर दिया था व मेनेजर प्रतिवर्ष जन्म-दिवस आदि पर बेटे की ओर से उन्हें भेंट भिजवा दिया करता था |

         एक देश में माँ व बेटा साथ-साथ अपने-अपने गर्ल-फ्रेंड व बॉय-फ्रेंड के साथ सार्वजनिक स्थान पर बिकनी में स्नान कर रहे थे |

         जगह-जगह युवाओं को धर्म, विज्ञान, शास्त्र , साहित्य की बजाय – मैनेजमेंट कैसे करें व खूब धन कैसे कमाएँ के प्रवचन दिए जारहे थे |

        एक स्थान पर बेटा, बेटी व माँ-बाप बैठकर टीवी पर 'शीला की जवानी' गाना सुन रहे थे।

         यह आम रिवाज़ हो चला था कि पति-पत्नी कन्या-भ्रूण को जन्म से पहले ही गर्भपात करवा देते थे, जिसे एवोर्शन कहा जाता था | स्त्री-पुरुष, युवक-युवती साथ-साथ तो रहते थे बिना विवाह के परन्तु संतान कौन पालेगा व केरियर के नाम पर गर्भपात करा रहे थे | स्त्री-पुरुष का लिंगानुपात -बिंदु भी एक से काफी नीचे चला गया था |

             शैतान ने कुछ समाचार-पत्रों में समाचारों का भी अवलोकन किया......

--- एक देश के राष्ट्रपति ने पुरुष-पुरुष विवाह, स्त्री-स्त्री विवाह को जायज़ बताया  |
---बेटे ने पत्नी के कहने पर माँ की ह्त्या की |
---पांच बच्चों की माँ द्वारा  प्रेमी के साथ मिलकर तीन बच्चों व पति की ह्त्या |
---पति द्वारा उत्प्रीणन से तंग आकार माँ ने बच्चों की ह्त्या के बाद आत्महत्या करली |

           शैतान ने दूत की पीठ ठोकी और पूछ ,’ यह सब तुमने कैसे किया ?’

          दूत ने बताया –---मैंने सिर्फ स्त्रियों को पुरुषों की बराबरी हेतु, धन कमाने, फैशन व फिगर की चिंता-चर्चा में लगा दिया, साथ ही डिब्बे के दूध का आविष्कार कराया तथा  युवाओं -पुरुषों को पत्नियों से नौकरी कराने के लाभ बताए | ताकि माँ बच्चों को कम से कम दूध पिलाए व संतान को माँ का कम से कम समय मिले | संतान में संस्कार न जाने पायें |

       बाकी सारा कार्य तो इंसान ने स्वयं ही- मशीनों, ब्लू-फिल्म व नित्य नए मनोरंजन के साधनों का आविष्कार करके व  धर्म को अफीम व आडम्बर, शास्त्रों को अर्थहीन, प्रगति में रोड़ा व धीमी सोच के लिए मज़बूर करने वाला मानकर त्याज्य कहकर, कर दिया |

रविवार, 13 मई 2012

"उपन्यास इन्द्रधनुष" का लोकार्पण-

                                 ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...








                                


इन्द्रधनुष का लोकार्पण--श्री देवगिरी, रामचंद्रराव, श्री अजय श्रीवास्तव , लेखक  डा श्याम गुप्त, सुषमा जी व  प्रोफ ललिताम्बा जी
                                                   कर्नाटक हिन्दी प्रचार समिति के तत्वावधान में डा श्याम गुप्त के हिन्दी     "उपन्यास  इन्द्रधनुष" का लोकार्पण-1212 मई,2012 ई. शनिवार को समिति के सभा भवन में समारोह के मुख्य-अतिथि श्री अजय कुमार  श्रीवास्तवउपनिदेशक  (कार्यान्वन ) गृह मंत्रालय, राजभाषा विभाग बेंगलूर के कर कमलों द्वारा संपन्न हुआ | समारोह की अध्यक्षता श्री एच वी रामचंद्र राव पूर्व निदेशक दूरदर्शन एवं आकाशवाणी  ने कीविशिष्ट अतिथि  प्रोफ. बी.वे . ललिताम्बा सेवा निवृत्त आचार्य अहल्या वि.वि. इंदौर थीं संचालन समिति के सचिव डा वि रा देवगिरी  ने किया |
श्रोता गण

वेद-पाठ करते हुए डा गणेश किनी 
डा श्याम गुप्त उपन्यास के बारे में बोलते हुए
           समारोह का प्रारम्भ ईश प्रार्थना से हुआ | तत्पश्चात समिति की विशेष नीति-क्रम के अनुसार डा गणेश किनी द्वारा सस्वर वेद-पाठ किया गया|  डा देवगिरी जी ने डा श्याम गुप्त के व्यक्तित्व व कृतित्व का  परिचय देते हुए उपन्यास की विशेषताओं का उल्लेख किया | लोकार्पण पूर्व प्रोफ़. ललिताम्बा ने उपन्यास  बारे में विस्तृत व्याख्या प्रस्तुत की | श्रीमती सुषमा गुप्ता ने डा श्याम गुप्त व उपन्यास के कुछ विशिष्ट पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इन्द्रधनुष में उपन्यास के साथ-साथ शेरो-शायरी व कविता भी चलती है जो इसकी अपनी विशिष्टता है | मुख्य-अतिथि श्री अजय श्रीवास्तव व उपन्यास के लेखक डा श्याम गुप्त का शाल व प्रशस्ति-पत्र देकर सम्मान किया गया।
        

        डा श्याम गुप्त ने  उपन्यास के विषय पर विवेचना करते हुए कहा कि नारी के विषय पर साहित्य को प्राय: साहित्यकार व हम सब “नारी-विमर्श” का नाम देते हैं जो उनके विचार से अपूर्ण शब्द है वास्तव में स्त्री व पुरुष कभी पृथक-पृथक देखे, सोचे, समझे, कहे व लिखे नहीं जा सकते , अतः यह वे इसे   “स्त्री-पुरुष विमर्श “  का नाम देते हैं |
उपन्यास के बारे में बोलते हुए श्रीमती सुषमा गुप्ता
           श्री अजय कुमार श्रीवास्तव जी ने इंगित किया कि अंग्रेज़ी व  अंग्रेजियत-रहन-सहन का प्रभाव सिर्फ हिन्दीभाषा को ही नहीं अपितु कन्नड़ एवं देश की सभी क्षेत्रीय भाषाओं के प्रभाव को भी नष्ट कर रहा है| हमारी आगे की युवा पीढ़ी हमारी पीढ़ी की तरह अपनी स्थानीय-मातृभाषा को भी ठीक प्रकार से नहीं जानती | 

मंगलवार, 8 मई 2012

डा श्याम गुप्त की गज़ल.....

                                 ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...     

सर  हमारा, आपके कांधों  पै  था।
ख्याल सारा, आपकी बातों पे था ।

क्या नज़ारा था,  कि  हम थे आपके ,
क्या गुमां उन प्यार की रातों  पै  था।

क्या बतायें, क्या कहैं, कैसे कहैं,
क्या नशा उन दिल के ज़ज़्वातों पै था ।

हम तो उस पल, होगये थे आपके,
इक यकीं बस, आपके वादों पै था ।

आप जो भूले, नहीं था गम कोई,
हमको अरमां आपकी यादों पै था  ।

कैसे टूटा  श्याम’ टुकडे होगया ,
दिल हमारा, आपके हाथों पै था ॥


रविवार, 6 मई 2012

खिलते फ़ूल और विज्ञान से ईश्वर तक की राह ...डा श्याम गुप्त ...

                                 ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



                                                             
                 मनमोहक, हृदयोल्लासकारी, प्रेम के प्रतीक पुष्पों को निरख  कर  मन प्रसन्न होता है तो प्रायः  मेरे मन में यह विचार भी अंगडाई लेने लगता है की आखिर क्यों खिलते हैं ये फूल ? क्या सिर्फ सौन्दर्य हेतु । परन्तु पुष्प तो वीराने में भी खिल जाते हैं जहां न कोइ  देखने को होता है ,न सौन्दर्य पान को, न सराहने को ।   चाहे उचित मात्रा पानी-पोषण न हो पर एक सूखे पौधे की एकमात्र सूखे डंठल पर भी एक पुष्प खिल आता है । 
 क्यों ?                                प्रश्न व जिज्ञासा सदैव विज्ञान की और मुड़ने को बाध्य करती है ।यह वास्तव में जीवन की जद्दोज़हद है और
  चार्ल्स डार्विन याद आने लगते हैं ।  डार्विन के अनुसार यह 'स्ट्रगल फॉर एग्ज़िस्टेंस' है .......जीव का ज़िंदा रहने का प्रयास।... संतति वर्धन का प्रयास.... जिस हेतु प्रत्येक जीव अपने आकार, संरचना, आतंरिक-संरचना, जीन, जीन कोड में परिवर्तन भी कर लेते हैं, अपना प्रतिलिपिकरण भी समय, क्रमिक हिट एन्ड ट्रायल,  पुन:-पुन:.रिपीटेशन से, पारिस्थिकी के अनुसार .......और डार्विन का उत्परिवर्तन अर्थात ....-म्यूटेशन सिद्धांत लागू होने लगता है और  तब 'जो जीते वही सिकंदर ' अर्थात 'सर्वाइवल ऑफ़ फिटेस्ट' का नियम । डार्विन के विरोधी कुछ सिद्धान्त यह भी बताते है कि यह सब स्वतः नहीं होता अपितु जीन ...क्रोमोसोम सरचना देखने से यह सिद्ध होता है कि यह किसी की एक सुनियोजित योजनाबद्ध कार्य  है ।
                 परन्तु डार्विन  या अन्य या विज्ञान के सिद्धान्त  यह नहीं बता  पाता  कि जीव, कोशिका या जीन में इस  स्ट्रगल फ़ोर एग्ज़िस्टेन्स, म्यूटेशन, प्रतिलिपीकरण या सर्वाइवल ओफ़ फ़िटेस्ट  की भूमिका निभाने हेतु  या सुनियोजित योजना  की भूमिका हेतु उस जीव या जीन या क्रोमोसोम में ...भाव. संकल्प, इच्छा, क्षमता व बल , ऊर्ज़ा कौन प्रदान करता है?  विज्ञान  का यह अन्तिम छोर हमें दर्शन..धर्म व ईश्वर की ओर लेजाता है और आस्था व विश्वास के गवाक्ष खुलने लगते है।जो ईश्वर पर आस्था को और अधिक दृढ करता है । यह विज्ञानं  से ईश्वर की राह का मार्ग  है। भौतिकता से ..आस्था, विश्वास, श्रद्धा का मार्ग है। यही व्यवहारिक, प्रेक्टीकल व  रिजु- मार्ग है। मानवता की राह है जो जीवन को स्ट्रगल फ़ोर एक्ज़िस्टेन्स के लिये भाव, सन्कल्प, इच्छा, बल व क्षमता प्रदान करती है। यही शायद ईश्वर भी है और उसी की सुनियोजित योजना ।

                                  --------- चित्र गूगल साभार ...

शुक्रवार, 4 मई 2012

विश्व-विद्यालयीय शिक्षा कैसी हो......डा श्याम गुप्त..

                               ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

 
आज के युग-द्वन्द्व के कारण का निवारण---कुछ समाधानात्मक 


विचार ..

         विश्व-विद्यालयीय शिक्षा..कैसी हो………..एक कुलपति की व्याख्यात्मक प्रस्तुति व एक नौकरशाह के……. तत्सम्बंधी….विचार….. ऊपर चित्र पर क्लिक करें.....

कुछ विचारणीय विचार बिन्दु……

१—बिना दार्शनिक सोच विकसित किये क्या कोई व्यक्ति अच्छा सामाजिक जीवन व्यतीत कर सकता है ।

२- दर्शन, इतिहास एवम साहित्य का कम से कम एक वर्ष का अध्ययन किसी भी प्रोफ़ेशनल डिग्री प्राप्त करने के लिये आवश्यक होना चाहिये। 
                        ----------चित्र में दिये इसी आलेख से……                                                                            
 ३- आज चारों ओर सभी वर्गों में अन्तर्द्वन्द्व व असन्तुष्टि का यही तो कारण है कि उत्तम साहित्य के पठन-पाठन का मार्ग अवरुद्ध होगया है।साहित्य ही धर्म, इतिहास, सन्स्क्रिति आ प्रतिपादन करता है। इसी ग्यान के न होने से आज का युवा व प्रौढ वर्ग् सामाजिक-मानवीय ग्यान से अछूता रहता है, केवल प्रोफ़ेशनल-कार्यात्मक ग्यान व दैनिक व्यवहारिक ग्यान को ही ग्यन मानकर सब्कुछ जानने का भ्रम पाले रहता है व जीवन का मूल उद्देश्य व दिशा न पाकर विभिन्न अन्तर्द्वन्द्वों में घिरा रहता है य पलायन वादी..अति-भौतिकतावादी बन जाता है।
                     -----------डा श्याम गुप्त के इन्द्रधनुष उपन्यास से…

४- भूल हमारी ही है शायद केजी !….उन्नतिे, विकास, भौतिकता की चकाचौंध व शीघ्रातिशीघ्र फ़ल प्राप्ति की  दौड में एवं अन्धाधुन्ध पाश्चात्य नकल करके बराबरी की होड में सदियों की दासता से अपना गौरव, सन्स्क्रिति, इतिहास  भूले हुए हम लोग अपनी स्वयं की अस्मिता,भाव, भाषा, सन्स्कार, साहित्य को संभाल कर नहीं रखपाये और आने वाली पीढी के लिये अनुकरण-अनुसरन के लिये आदर्श व उदाहरण प्रस्तुत करने में असफ़ल रहे। ….….बिना इतिहास, शास्त्र…सत्साहित्य के कोई भी समाज –राष्ट्र कब उन्नत हुआ है…..। 
                         -------- इन्द्रधनुष उपन्यास में डा श्याम गुप्त…