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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

शुक्रवार, 18 जनवरी 2013

श्री लंका यात्रा-वृत्त ---भाग तीन --- अनुराधापुर ....



                              ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


                           कोलम्बो का स्थानीय दर्शन  के उपरांत  २२-१२-१२ को कोलम्बो के होटल सैफायर  में रात्रि-विश्राम  के पश्चात २३-१२-१२ को सुबह सुबह ही हमारा कारवाँ अनुराधापुर की ओर चल दिया , जिसे रावण की राजधानी कहा जाता है | यह श्री लंका का सबसे प्राचीन स्थल है जो भारत से हिन्दू -सिन्हलीज  राजा विजय के आने पर सबारागामुवा से अनुराधापुर नाम से राजधानी बनायी गयी| तदुपरांत बौद्ध धर्म का मुख्य गढ़ बना |इसे  'इटरनल सेक्रेड सिटी' कहा जाता है  |  अनुराधापुर  श्रीलंका द्वीप के मध्यवर्ती घने वनांचल में बसा हुआ है | धन्कोत्ला, मार्वेवा गाँव एवं होनागाला रेलवे स्टेशन होते हुए ..रास्ते में विभिन्न घने जंगल, झीलें व वाटर-बोड़ीज़ पार करते हुए हम अनुराधापुर पहुंचे | सभी सड़कें अच्छी तरह  बनी हुई  व पक्की थीं | गाँव के क्षेत्र में  भी नगर संपन्न व आवासीय स्थल पक्के व सुन्दर बने हुए हैं | गहन जंगलों के मध्य बसे नगरों -कस्बों  में भी संचार  के संसाधन व ओटो आदि की सुविधाएं पर्याप्त हैं |
                अनुराधापुर गहन वन में बसा हुआ है | यहाँ बौद्ध धर्म के बहुत से चैत्य व स्तूप हैं | प्राचीन संस्कृति के भग्नावशेष भी वन-प्रांतर में फैले हुए हैं| पूरे क्षेत्र के दर्शनीय स्थलों की एक स्थान पर ही टिकट है जो २५ डालर की है , भारतीय व सार्क देशों के यात्रियों के लिए १२.५ डालर की कन्सेशन टिकट है|

टिस्सा लेक में हंस का विहार व अन्य  जलपक्षी
१.इसरूमुनिया राज महाविहार ----जोएक सुन्दर व विशाल  टिस्सा लेक के समीप स्थित है| झील में कमल व हंसों की उपस्थिति से प्राचीनता व पौराणिकता का अहसास हो रहा था |   मंदिर व यहाँ का तूपारामैया दगोबा ( बौद्ध स्तूप ) राजा देवानाम प्रिय टिस्सा द्वारा २५० ईपू में  अपने ५००० प्रजा सहित बौद्ध धर्म ग्रहण करने पर बनवाया गया कहा जाता है | जो श्रीलंका का सबसे पहला बौद्ध विहार है |
थूपारामैया बौद्ध विहार
                     वस्तुतः देखने पर मंदिर अधिक प्राचीन प्रतीत होता है | मंदिर में बनी हुई अश्व व पुरुष ( योरोपीय इतिहासकारों द्वारा दिया गया नाम हॉर्स एंड मेन) को राजा  टिस्सा की मूर्ति  कहाजाता है | परन्तु जनश्रुति के अनुसार वास्तव में यह मूर्ति एवं मंदिर रावण  के पिता प्रसिद्द ऋषि --विश्रवा मुनि ( वासामुनिया  ) की है जो इस क्षेत्र के महान शासक, वैज्ञानिक, इंजीनियर विद्वान् व लौह पुरुष व अश्व-संचालक  भी थे | बौद्ध स्तूप बाद में स्थापित किया हुआ लगता  है |
बौद्ध मूर्ति
ईशुर्मुनिया टेम्पल  एवं अश्व  सहित विश्रवा मुनि की मूर्ति  शेड के नीचे दायें ऊपर
अभायागिरिया स्तूप

बौद्ध मंदिर के अन्दर हिन्दू देवों की मूर्तियाँ

लेटे  हुए विशाल बुद्ध

मुरुगन कार्तिकेय या गरुड़ पर विष्णु



२.प्राचीन संग्रहालय ---- इसुरूमुनिया मंदिर के नज़दीक ही वन-क्षेत्र का प्रवेश द्वार है जो घने जंगल का क्षेत्र है और  विभिन्न स्थानों पर प्राचीन-सभ्यता के अवशेष व बौद्ध स्तूप एवं बौद्ध टेम्पल आदि इसी वन में बने हुए हैं| संग्रहालय इस प्रवेश द्वार के अन्दर ही है| संग्रहालय में प्राचीन हिन्दू व बौद्ध धर्म के अवशेष प्राप्त होते हैं| गणेश, कुबेर , यक्ष-यक्षी , शिव-लिंग , यज्ञ-स्थान , शेषशीर्ष सहित मूर्ति नागराज या  विष्णु की --आदि की मूर्तियाँ प्राचीन हिन्दू  सभ्यता की कथा कहती हैं |
 
संग्रहालय -अनुराधापुर



           अन्दर गहन जंगल में तमाम जल-भराव के बड़े-बड़े स्थल, तालाव, झीलें  थी, झीलों में कमल के पुष्प शोभायमान थे| कुछ दिनों से अधिक वर्षा होने से अधिकाँश मार्ग पानी से भरे हुए व घिरे हुए थे|  सभी  बौद्ध स्थलों तक प्रायः  पक्की सड़कें बनी हुई है |  कहीं कहीं अन्दर गहन वन में कच्ची रोड पर भी जाना पड़ता है  जो अधिक प्राचीन सभ्यता के ध्वंसावशेष हैं|  परन्तु सभी स्थानों पर मोटर वाहन से जाया जा सकता है|
गहन वन में कोलोनी के अवशेष
वनांचल में आधुनिक सिंहली परिवार के साथ श्री लंका की काली चाय व मसाला-आम
३.बौद्ध स्तूप -- अभय गिरिया(८९बीसी ) व जेतवन(३००एडी ) ,रूवंवेली,लंकारामैया( १ सेंचुरी बीसी) आदि  आठ बौद्ध स्तूप व अन्य  बौद्ध मन्दिर जो राजा टिस्सा, २४६बीसी, दुत्तगामनी १३७ बीसी, या राजा वलागाम्बा ८९बीसी व किंग महेसंन ३०० एडी द्वारा बनबाये गए हैं | जिनमें लेटे  हुए  बुद्ध व बैठे हुए बुद्ध की तमाम प्रतिमाओं के साथ -विष्णु, कार्तिकेय, शिवलिंग, गरुड़,आदि के चित्र व प्रतिमाएं भी मिलती हैं | जो प्राच्य हिन्दू धर्म व मध्यकालीन बौद्ध धर्म के अवशेष हैं| किंग देवानां प्रिय टिस्सा द्वारा स्थापित बोधि-बृक्ष भी है जो भारतीय सम्राट अशोक के पुत्र-पुत्री संघमित्रा व महेंद्र यहाँ लेकर आये थे ( लगभग ३०० बीसी )एवं बोद्ध धर्म स्थापित किया था |
४.कुट्टम -पोकुना --- बहुत बड़े बड़े १७ फीट गहरे दो जल संग्रह के पक्के तालाब हैं --जिन्हें प्राचीन लंका का ( ९ सेंचुरी एडी  -किंग कसापा द्वारा ) हाइड्रोलिक इंजीनियरिंग का नायाब नमूना कहा जाता है | लगे हुए साइनबोर्ड के अनुसार यह अभयगिरिया के बौध भिक्षुओं के लिए  बनाया गया है ,परन्तु नाग-मूर्ति एवं कलश बने होने से यह हिन्दू, नाग राजा द्वारा बनबायी हुए लगती हैं |यह बौद्ध भिक्षुओं के स्नान आदि हेतु  प्रयोग होते थे|  परन्तु इतने गहरे तालाब मानव की बजाय हाथियों ( राजा के )के स्नान  एवं नगर की जल-व्यवस्था हेतु ही हो सकते हैं |
कुटटम-पोकुना
५. अनुराधापुर -अभय गिरिया  फारेस्ट-----  रतन प्रासाद -- सात मंजिला भवन के अवशेष हैं जो नागराजा किंग करेन टिस्सा १६४ एडी द्वारा निर्मित  राज महल हैं, गहन वन में समीप ही तमाम भवनों के सिर्फ खम्भे ही खड़े हुए मिलते हैं जो किसी प्राचीन  नगर का आभास कराते हैं जहां समीप ही पत्थर के एक विशाल  कटोरेनुमा वर्तन जिसे भिक्षुओं के खाने के  राईस-बाउल कहा जाता है जो ५०००  भिक्षु  एक साथ खा सकते थे समीप ही बनी हुई कथित  रसोई आदि का भाग है जो किसी बड़े शिक्षा-स्थल या नगर  का भाग है | कथित   रूप में ये बौद्ध -भिक्षुओं के निवास थे  परन्तु समीपवर्ती गार्ड-स्टोन नामक  मूर्ति  हाथ में कलश, शेषनाग शीर्ष , धनुष आदि की उपस्थिति से हिन्दू मंदिर के द्वारपालों की मूर्तियाँ   या शेषफण विष्णु  या अमृत-कुम्भ  लिए इंद्र  प्रतीत होती है जो हिन्दू-नाग या यक्ष राजाओं द्वारा निर्मित की गयीं तत्पश्चात बौद्ध पंथ द्वारा प्रयोगार्थ अधिग्रहीत | अर्ध-चंद्राकार  मून-स्टोन .. जो प्रायः पैरदान की भांति मंदिरों के प्रवेश द्वार पर प्राप्त होते हैं ..संसार को पार करके चौपाये = संसार, नाग-पुष्प-पत्ती  आदि = द्वंद्व , हंस-पक्षी = ध्यान भाव , अन्तिम  कमल = बुद्धत्व व मोक्ष --बुद्धत्व या ध्यान-दर्शन-मोक्ष  की और चलना को प्रदर्शित करते हैं|
गार्ड-स्टोन या विष्णु की मूर्ति
रतन प्रासादके अवशेष

महा राईस बाउल
मून-स्टोन

गुरुवार, 17 जनवरी 2013

श्री लंका यात्रा-वृत्त ---भाग दो--- ---कोलम्बो ..

                          ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


                                      हम  पांच लोग.... मैं ( डा श्याम गुप्त ) पत्नी सुषमा जी, पुत्र निर्विकार, पुत्रवधू रीना एवं पौत्र आराध्य २२-१२-१२ को श्री लंका के भण्डारनायके एयरपोर्ट पर दोपहर पहुंचे | अगले एक सप्ताह तक ..ड्राइवर एवं गाइड का किरदार निभाने हेतु  श्री हरेंदु मेंडिस अपनी १० सीट के वाहन सहित वहां उपस्थित थे |हम लोग सीधे कोलम्बो के  स्थानीय दर्शन हेतु निकल पड़े |
                        कोलम्बो श्री लंका का सबसे बड़ा नगर है, सबसे उन्नत एवं संमृद्ध | बड़ी बड़ी बिल्डिंगें , चौड़ी-चौड़ी सड़कें , शानदार माल्स , कठोर ट्रेफिक नियम , स्पष्ट ट्रेफिक-चिन्ह आदि से योरोप के किसी आधुनिक नगर जैसा | सभी  ऑटो  एवं अन्य  वाहन नए-नए ही थे | श्री हरेंदु ने बताया कि यहाँ १५ वर्ष  बाद सभी वाहन कठोरता से कंडम कर दिए जाते हैं | यह श्री लंका की पूर्व राजधानी है ..ब्रिटिश काल की, देश का आर्थिक गढ़ भी |
आराध्य एक बड़े माल में -कोलम्बो

वहां  चिन्ह-पटों पर ...अंग्रेज़ी, तमिल व सिंहली ...त्रिभाषा प्रयोग होती है | करेंसी डालर या श्रीलंकन रु. में प्रयोग होती है | भारतीय १ रु. लगभग २( से अधिक ) लंकन  रु के समकक्ष है |
१.फादर ऑफ़ नेशन --राष्ट्रपिता --श्री स्टीफन सेनानायके  की मूर्ति ..जिनके समय श्री लंका को आज़ादी प्राप्त हुई ४ फरवरी १९४८ में  ...पुराने सिन्हलीज राजभवन  में जहां गणतंत्र -दिवस पर झंडा रोहण व परेड आदि होती है  मनाया जाता है |
राष्ट्र-पिता स्मारक पर निर्विकार व रीना
 
सिहली सभा-भवन पर -साथ में  सुषमा जी व श्री हरेंदु मेंडिस 
२.किंग पराक्रम बाहू द्ववारा निर्मित गंगा रमैया बुद्ध -थाई  मंदिर ...
कोलम्बो बौद्ध मंदिर


आठ लेन  की शानदार रोड -कोलम्बो

माल मेंबच्चों का  प्ले-स्टेशन पर आराध्य

माल में खरीदारी करते हुए निर्विकार
श्री लंका के वर्तमान पार्लियामेंट भवन -कोट्टे
३.कोलम्बो सी-बीच एवं कोलम्बो आर्थिक-काम्प्लेक्स ...बीच काफी सुन्दर व साफ़-सुथरी थी | मरीना-बीच व जुहू की भाँति शाम को लोग समुद्र का आनंद उठाते हैं .....हाँ बीच एक दम स्वच्छ  व साफ़ है भीड़ भी बोम्बे की अपेक्षा बहुत कम | समीप ही स्थित ट्विन टावर सहित इतना सुन्दर व बड़ा आर्थिक -काम्प्लेक्स देखकर क्रीडेंस इन्वेस्टमेंट एंड मेनेजमेंट  कंपनी, बेंगलोर  की फायनेंस कंसल्टेंट   व सिटी बैंक बेंगलोर  की पूर्व  वेल्थ  मेनेजर रीना जी  बड़ी खुश हुईं और जोश में  फिलिप्स में सीनियर मेनेजर इंजीनियर निर्विकार जी को एवं फाइनेंस में कभी अधिक सर न  खपाने वाले  मुझे (डा. श्याम गुप्त )   फायनेंस मनेजेमेंट पर एक  छोटा सा वक्तव्य दे डाला |  वरिष्ठ होम-फायनेंस मेनेजर सुषमा जी  चुपचाप मुस्कुराती रहीं |
कोलम्बो समुद्र-तट पर निर्विकार, रीना, सुषमाजी एवं आराध्य

कोलम्बो कोमर्शियल काम्प्लेक्स  व ट्विन टावर
 कोलम्बो सी-बीच पर खेलते हुए रीनाजी व आराध्य






---------- क्रमशः- भाग तीन ..रावण की राजधानी अनुराधापुर ..






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बुधवार, 16 जनवरी 2013

श्री लंका यात्रा वृत्त...... भाग एक --भूगोल व इतिहास ..... डा श्याम गुप्त ...

                                      
                             ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

                                               श्री लंका यात्रा-वृत्त  
                     ( मेरी श्री लंका यात्रा  २२-१२-१२ से ३०-१२-१२ तक...)
         
किसी भी  स्थान या देश की यात्रा का पूर्ण आनंद लेने के लिए उसके यात्रा संबंधी ज्ञान, होटल आदि रहने के स्थान, दर्शनीय स्थल आदि की प्रारम्भिक जानकारी एवं कार्यक्रम का पूर्व निर्धारण के साथ साथ ही  उसके भूगोल एवं इतिहास का  मूल –सामान्य ज्ञान भी लेलिया जाय तो यात्रा और आनंदमय-ज्ञानमय होजाती है जो यात्रा,टूरिज्म का मुख्य उद्देश्य है |
                           श्री लंका का भारत से सदा ही गहन रूप से जुड़ा रहा  रहा है|  गोंडवाना लेंड के दक्षिणी ध्रुव  अंटार्कटिका से  आस्ट्रेलिया व भारतीय भूमि-भाग पृथक होने  पर लंका भारतीय भूमि से ही जुड़ा हुआ था |  

     श्री लंका का भूगोल – श्री  लंका हिन्द महासागर में भारत के दक्षिण में ६ से १० डिग्री उत्तरी अक्षांश पर स्थित एक द्वीप है | केन्द्रीय पहाडी एवं तटीय मैदानी भागों वाला यह द्वीप जंगली हाथियों व भैसों के बहुतायत से पूर्ण है| ( इसीलिये पौराणिक राम-कथानुसार कुम्भकर्ण को जगाने हेतु भैंसों के  परिक्रमा व बलि दी जाती थी ) मानसून वाले इस द्वीप में वार्षिक वर्षा २५० -५०० सेमी तक होती है | वार्षिक औसत ताप २७ डिग्री से व पहाड़ों पर १५ से तक एवं नमी ७०-९० % तक रहती है|  भूगर्भ से रत्न, व लौह अयस्क के भण्डार व समुद्र से मोती यहाँ प्राप्त होते हैं|
 

श्री लंका का इतिहास ---
A.पौराणिक इतिहास ----

------- विश्वकर्मा द्वारा शिव के लिए बनाई गयी लंका, कैलाश से पहले शिव के उपासकों नागों, देवों, मानवों जातियों व शिव-गणों का निवास स्थान था | भारतीय सप्तर्षियों में से एक पुलस्त्य के पुत्र विश्रवा जो महान जैव विज्ञानी ( जेनेटिक विज्ञानी ) थे और विविध –विचित्र शरीर वाले मानव, बौने, जानवर-मानव मिश्रित मानव, भूत-प्रेत, आदि का (शिव के गण) निर्माण किया करते थे | लंका का प्रारंभिक नाम हेला द्वीप था |
--- ब्रह्मा के वरदान से शक्तिशाली हुए दैत्य—माली, सुमाली आदि ने लंका पर अधिकार कर लिया एवं स्वर्ग पर चढ़ाई के उपरांत विष्णु की सहायता से देवों ने उन्हें हराकर शिव की इच्छानुसार विश्रवा के पुत्र यक्षराज कुबेर को सौंप दी और यक्ष - संस्कृति की स्थापना हुई || रत्नों की भरमार होने से उसका नाम “रत्नद्वीप” हुआ |
----- विश्रवा के दैत्य पत्नी से पुत्र आर्य व दैत्य वर्णसंकर रावण ने कुबेर से लंका छीन कर वहां रक्ष –संस्कृति स्थापित की तथा लंकापुरी के नाम से प्रसिद्द हुई | विद्वान् व महान वैज्ञानिक पिता विश्रवा के ज्ञान की छाया में अत्यधिक भौतिक उन्नति के कारण रावण के राज्य में गरीबी  से गरीब भी  सोने के वर्तनों का प्रयोग करता था अतः वह सोने की लंका के नाम से प्रसिद्ध हुई |  नाग, देव, यक्ष, राक्षस, मानव  सभी यहाँ के निवासी थे |         राम-रावण  युद्ध में राम की सहायता हेतु दक्षिण भारत से शिवपुत्र कार्तिकेय  को भेजा गया था इस प्रकार श्री लंका में भारतीय तमिल मूल के हिन्दू-निवासियों का भी आगमन हुआ|
--- रावण के पतन के उपरांत छोटे भाई राम-भक्त विभीषण, नरेश बना और वैष्णवों-देवों की आर्य-हिन्दू संस्कृति  पुनः स्थापित हुई | नाग, देव, यक्ष, राक्षस ,मानव सभी पूर्ण शान्ति व समन्वय के साथ रहने लगे | आगे द्वापर-युग में युधिष्ठिर के अश्वमेध यज्ञ के अवसर पर सहदेव व अश्व का भारत के दक्षिणी तट पर लंका से आकर विभीषण ने रत्नाभूषणों सहित स्वागत किया था व युधिष्ठिर की अधीनता स्वीकार की थी |
 

रामसेतु -एडम्स ब्रिज या रावण सेतु
B. आधुनिक इतिहास ---पाषाण -औज़ार व अन्न -जौ आदि की खेती के प्रमाणों के अनुसार श्री लंका में पाषाण-युग में -१८००० ईशापूर्व..बालगोंड़ा मानव की उपस्थिति थी| योरोप से काफी पहले श्री लंका में जौ आदि अन्न की खेती से मानव परिचित था.... लौह-युग | आधुनिक खोजों के अनुसार राम-रावण युद्ध ७-८हज़ार वर्ष पूर्व एवं रावण का राज्य भी ४६०० ईपू निर्धारित होता है | एडम्स ब्रिज  या रामसेतु ( या  लंका के अनुसार रावण सेतु ) लगभग १७५०००० वर्ष पुराना है ( नासा _) यही  समय पृथ्वी पर प्रथम मानव के अवतरण का स्थापित होता है |
     
--- आधुनिक ज्ञात  इतिहास ६०० ईशा पूर्व ..उत्तर भारतीय प्रदेश कलिंग के सिंहली राजकुमार विजय के श्रीलंका पर आधिपत्य से प्रारम्भ होता है | उस समय आदिवासी यक्का लोग ( धनुष-वाण  वाले शिकारी कबीले  ---यक्का = यक्ष या राक्षस ? ) व वेददा लोग ( ?  देव नाग आदि वैदिक संस्कृति के ) वहा थे | यक्का राजकुमारी ‘कुवैनी’ से विवाहोपरांत वेददा कबीला की महत्ता बढ़ी एवं  भारतीय पांडु-राजकुमारी से ‘सिंहली’ वंश व हिन्दू राज्य की स्थापना हुई | प्राचीन मुख्य ग्राम  सबारागामुवा ( ? सबर गाँव –भारतीय शबर कबीले का गाँव ) को अनुराधापुरा नाम से राजधानी बनाया गया | पत्ते की शक्ल के द्वीप के कारण लंका का नाम ताम्रपर्णी हुआ|

--- भारतीय तमिल राजा चोल- गुटटका द्वारा सिंहल राज्य को हराकर अनुराधापुरा में तमिल –द्रविड़ राज्य  की स्थापना  की गयी ..| ..इस प्रकार नाग, यक्ष ( यक्का )तमिल, सिंहल आदि सभी आर्य-हिन्दू वंशों का राज्य विभिन्न प्रदेशों में चलता रहा, जो आपस में युद्दरत रहते थे|
 ---- लगभग २०० ईपू में  मौर्य सम्राट अशोक के पुत्र महेंद्र व पुत्री संघमित्रा द्वारा बौद्ध धर्म के श्रीलंका में प्रसार एवं तत्कालीन नाग राजा टिस्सा द्वारा बौद्ध धर्म ग्रहण करने पर लंका का राजकीय धर्म बुद्ध धर्म  हो गया अतः लंका एक बौद्ध-धर्म प्रधान देश बना |
---- १०० ईपू में सिंहल राजा दुत्तगामनी ने  लंका में  तमिल राजा को हरा कर पुनः सिंहल राज्य की स्थापना की एवं लंका का नाम सिंहल हुआ...  सदियों तक तमिल, नाग, सिंहल राज्य विभिन्न भागों में राज्य करते रहे एवं आपस में युद्धरत रहते रहे |
---- १८०० ई में अंग्रेजों के अधिकार होने पर सिंहल को अंग्रेज़ी में सीलोन बना दिया गया | जो ०४-फरवरी १९४८ ई में श्रीलंका के नाम से स्वतंत्र  जनतंत्र  राज्य  बना | श्री लंका का मूल धर्म बौद्ध-धर्म है  परन्तु ईसाई , हिन्दू एवं मुस्लिम धर्म के लोग भी यहाँ रहते हैं | देश में  अंग्रेज़ी, सिंहली एवं तमिल तीनों भाषाएं आधिकारिक भाषा हैं|
              ----- क्रमश ---भाग दो... कोलम्बो ...

मंगलवार, 15 जनवरी 2013

हम, तब और अब... दृष्टिकोण व चरित्र ...डा श्याम गुप्त

                                        ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



                 जब आशा आकांक्षा इच्छा लोभ एवं भय मानव मन में पदार्पण कर जाते हैं तो उसका दृष्टिकोण स्व-केंद्रित होजाता है और निष्ठा सत्य व ईश्वर के अपेक्षा आत्म-निष्ठ होजाती है | तब .मन की यह स्थिति होती  है कि –
                         “सच बोलने की चाहत तो बहुत थी लेकिन,
                           क्या  करें हिम्मत ही न  हम जुटा पाए  |”


             इस दृष्टिकोण में हम इतने किन्कर्तव्यविमूढ होजाते हैं कि चाहते हुए भी उचित समय पर तदनुरूप अनीति, अनैतिकता, अकर्म, दुष्कर्म अनाचार आदि का विरोध नहीं कर पाते | यह एक प्रकार का असुरक्षा भाव जनित  आत्मरक्षार्थ भाव की उत्पत्ति के कारण होता है|
             हम तब ( आज से युगों-सदियों पहले ) भी ऐसे ही थे ..आज भी |  
             महाभारत में द्रौपदी चीर-हरण ...के समय महापराक्रमी भीष्म आदि अनेकों लोगों के लिए भी यही सच है कि ..विभिन्न आशा आकांक्षा इच्छा लोभ एवं भय के कारण ही कहना चाहकर भी कोई  विरोध नहीं कर पाया | महापराक्रमी भीष्म की भी महान कहलाने की इच्छा ही तो विरोध न कर पाने का कारण थी | यद्यपि बाद में लोगों ने, पराक्रमियों ने बड़ी-बड़ी प्रतिज्ञाएँ कीं, निभाईं गयीं, युद्ध हुआ |
            आज दिल्ली वलात्कार केस में भी ...दो घंटे तक दो घायल प्राणी सड़क पर पड़े रहे परन्तु मोटर, कार, बसें, पैदल-यात्री  निकलते रहे परन्तु किसी ने तुरंत अपने आप  सहायता का फैसला नही  लिया | इसी भय एवं आत्म-निष्ठता भाव के कारण सत्य व ईश्वर भाव को भुला दिया जाने के कारण| बाद में वही हम सब लोग एकत्रित होकर नारे लगाते रहे , मोमबत्ती जलाते रहे, कड़ी ठण्ड में भी नहीं डगमगाए टीवी के सामने, रेलियाँ भी करते रहे....| दूरदर्शन पर बहसें, वार्ताएं भी हुईं | विभिन्न वक्तव्य भी आये इसी आशा आकांक्षा इच्छा लोभ एवं भय के कारण उत्पन्न आत्मरक्षार्थ भाव हित कि कहीं हम पीछे न रह जायं | |
               अन्य व्यवहारों, कलापों के बारे में भी यही सच है कि हम बदले नहीं, वहीं के वहीं हैं | भौतिक उन्नति से, अट्टालिकाओं में निवास, वस्त्राभूषणों  से, महानगरों से भी मानव–आचरण बदला नहीं है | तब हम तलवारों से लड़ते थे, विरोधी को युद्ध में तलवारों से मौत के घाट उतारा करते थे, आज  भी विरोधी का मुंह बंद करने, अपने स्वार्थ साधन हेतु कलम की तलवार से , झूठ ,चरित्र हनन आदि द्वारा मरणासन्न किया जाता है ...अपितु आज भी हत्या द्वारा भी | तब तलवार से युद्ध होता था आज वाकयुद्ध होता है, वार्ताएं, बहसें , आलेखबाज़ी |
         अर्थात मानव वस्तुतः पहले भी वही था आज भी वही है | यह क्यों होता है ? क्यों मानव में यह दृष्टिकोण एवं आत्मरक्षार्थ भाव की उत्पत्ति होती है| वही आशा आकांक्षा इच्छा लोभ एवं भय के कारण वह सत्य व ईश्वर से दूर होजाता है |

          परन्तु आगे प्रश्न  यह है कि उसमें ये आशा आकांक्षा इच्छा लोभ एवं भय क्यों उत्पन्न होते है | क्योंकि वास्तव में वह अपने आचरण व व्यवहार में सत्य व ईश्वर को भुला कर  उनसे से दूर होजाता है.... हम सब कुछ हैं, हम सब कुछ कर सकते हैं, मानव ही अपना भाग्यविधाता है इस  अतिशय  सोच के कारण  ...  भी उसमें आशा आकांक्षा इच्छा लोभ एवं भय आदि भाव उत्पन्न होते हैं| यहीं व्यवहारिक दृष्टिकोण की अपेक्षा चरित्र की महत्ता व्यक्त होती है जो सत्य, निष्ठा, अनुशासन, आचरण-शुचिता,एवं ईश्वर पर विश्वास से उत्पन्न होती है | यह एक क्रमिक –चक्रीय व्यवस्था  है .......| शायद इसे ही कर्म-फल या भाग्य  कहते हैं एवं शुचि-कर्मों, सत्य, धर्म व आचरण ,आत्म-विवास के साथ-साथ ,.... ईश्वर में आस्था का  यही महत्ता है|

सोमवार, 14 जनवरी 2013

बिज़नेस वूमेन ऑफ़ इंडिया ......डा श्याम गुप्त ..

                          ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


नैना लाल हेड ,एच एस बी सी  इंडिया







नीलिमा धवन  एम् डी, एच पी , इंडिया
























                  जैसा कि हम ऊपर निम्न चित्रों .( -इकोनोमिक -टाइम्स --साभार ). में देख रहे हैं कि कारपोरेट जगत की लगभग सभी महिला हस्तियाँ  साड़ी..या सलवार-सूट के सुरुचिपूर्ण, गरिमापूर्ण  पहनावे में हैं .....यहाँ  फिल्म व राजनीति जगत की महिलायें नहीं रखी  गयी हैं क्योंकि उन पर  पहनावे के  नाटक का आरोपण  भी हो  सकता है .......



 -----तो क्या कारण  है कि ..हमारे समाचार पत्र बिज़नेस वूमेन इन भारत ..में मीटिंग ..के समय सभी पुरुषों को सूटेड--बूटेड  परन्तु महिला बौस को विचित्र ...इनडीसेंट सी वेश-भूषा में दिखलाते हैं.....क्यों??????
 -------  यह विरोधाभास किसलिए  !!!!

------ प्रायः महिला आफिस कर्मी, सेक्रेटरी आदि महिला कर्मी , अन्य  निम्न स्तरों पर   महिलाकर्मी व विज़िनेस - वूमेन ...इसी प्रकार के  विचित्र परिधानों में दिखाई पड़ती हैं.....क्यों ????...
-----क्या यह इस प्रकार का  प्रचार या दुष्प्रचार या जान बूझ कर किया हुआ प्रचार इसका का कारण है या अन्य  ..??????????
और क्यों ????????????




















रविवार, 13 जनवरी 2013

पुरा व नव का समन्वय एवं स्व -संस्कृति का ज्ञान व मान ही प्रगति है.... डा श्याम गुप्त ..

                            ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

                                विवेकानन्द जयन्ती पर  ... स्वामी जी के विचारों द्वारा आज के परिप्रेक्ष्य  में ..समाज, स्त्री-पुरुष द्वारा ....आवश्यकताओं , सीमाओं व आचरण को  व्याख्यायित...उद्घाटित करता नरेंद्र कोहली का आलेख .........

शनिवार, 12 जनवरी 2013

कैसा आदर्श..कैसी आदर्श पत्रकारिता....डा श्याम गुप्त

                                           ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...







                           एक बहु प्रचारित  व प्रतिष्ठित समाचार पत्र...राजस्थान पत्रिका का यह हाल है कि उसके मुख्य सम्पादक दार्शनिक श्री गुलाब कोठारी जी एक तरफ तो ..आदर्श पत्रकारिता की बातें कहते नहीं अघाते ...उनकी कवितायें..आलेख..कृतित्व भी सदाचरण की बातें कहते नहीं थकते .....






 ----वहीं दूसरी ओर उसी राजथान पत्रिका में ---जेनुइन डेटिंग ....जेनुइन मीटिंग .... महिला-पुरुष मिलन के समाचार ( विज्ञापन ) प्रकाशित होते हैं ....














----- क्या ये अखबार वाले डेटिंग को, आपस में अनजाने स्त्री-पुरुष की मीटिंग को जेनुइन अर्थात उचित मानते हैं
...... यह कैसी भारतीय संस्कृति वाला समाचार पत्र है....
----- यह कैसी आदर्श पत्रकारिता है..... क्या पर उपदेश कुशल बहुतेरे ...को चरितार्थ नहीं कर रही ....
----- क्या यह कथनी व् करनी का अंतर नहीं है ...
------ क्या यह धन व व्यापार के हेतु .....अपना आचरण -विक्रय नहीं है.....
---- यदि एक आदर्श सम्पादक की आदर्श पत्रिका का यह हाल है तो हम मीडिया से क्या अपेक्षाएं रख  सकते हैं .........