----मेरे विचारों की दुनियां -मेरे अपने विचार एवं उन पर मेरा स्वयं का व्याख्या-तत्व तथा उनका समयानुसार महत्व ....
--My myriad thoughts, their personal interpretations and their relevance...http://shyamthot.blogspot.com
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं...
काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद ..
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विशद रूप में दाम्पत्य भाव का अर्थ है,दो विभिन्न भाव के तत्वों द्वाराअपनी अपनी अपूर्णता सहित आपस में मिलकर पूर्णता व एकात्मकता प्राप्त करके विकास की ओर कदम बढाना। यह सृष्टि का विकास भाव है ।प्रथम सृष्टिका आविर्भाव ही प्रथम दाम्पत्य भाव होने पर हुआ । शक्ति-उपनिषद क श्लोक है—“ स वै नैव रेमे तस्मादेकाकी न रमते स द्वितीयमैच्छत। सहैता वाना स। यथा स्त्रीन्पुन्मासो संपरिस्वक्तौ स। इयमेवात्मानं द्वेधा पातपत्तनः पतिश्च पत्नी चा भवताम।“
अकेला ब्रह्म रमण न कर सका, उसने अपने संयुक्त भाव-रूप को विभाज़ित किया और दोनों पति-पत्नी भाव को प्राप्त हुए। यही प्रथम दम्पत्ति स्वयम्भू आदि शिव व अनादि माया या शक्ति रूप है जिनसे समस्त सृष्टिका आविर्भाव हुआ। मानवी भव में प्रथम दम्पत्ति मनु व शतरूपा हुए जो ब्रह्मा द्वारा स्वयम को स्त्री-पुरुष रूप में विभाज़ित करके उत्पन्न किये गये,जिनसे समस्त सृष्टिकी उत्पत्ति हुई।सृष्टि का प्रत्येक कण धनात्मक या ऋणात्मकऊर्ज़ावाला है, दोनों मिलकर पूर्ण होने पर ही, तत्व एवम यौगिक एवम पदार्थ की उत्पत्ति वविकास होता है।
विवाह संस्था की उत्पत्ति से पूर्व दाम्पत्य-भाव तो थे परन्तु दाम्पत्य-बंधन नहीं थे;स्त्रियां अनावृत्त वस्वतन्त्र आचरण वाली थीं, स्त्री-पुरुष स्वेच्छाचारी थे। मर्यादा न होने से आचरणों के बुरे व विपरीत परिणामहुए। अतः श्वेतकेतु ने सर्वप्रथम विवाह संस्थारूपी मर्यादा स्थापित की। वैदिक साहित्य में दाम्पत्य बंधन की मर्यादा,सुखी दाम्पत्य व उसके उपलब्धियों का विशद वर्णन है। यद्यपि आदि युग में विवाह आवश्यक नही था, स्त्रियां चुनाव के लिये स्वतन्त्र थीं। विवाह करके गृहस्थ- संचालन करने वाले स्त्रियां-सद्योवधू- व अध्ययन-परमार्थ में संलग्न स्त्रियां –ब्रह्मवादिनी- कहलाती थी। यथा—शक्ति उपनिषद में कथन है—
“द्विविधा स्त्रिया ब्रह्मवादिनी सद्योवध्वाश्च। अग्नीन्धन स्वग्रहे भिक्षाकार्य च ब्रह्मवादिनी।“
पुरुष भी स्वयं अकेला पुरुष नहीं बनता अपितु पत्नी व संतान मिलकर ही पूर्ण पुरुष बनता है। अतः दाम्पत्य भाव ही पुरुष को भी संपूर्ण करता है। यजु.१०/४५ में कथन है—
दाम्पत्य जीवन में प्रवेश से पहले स्त्री पुरुष पूर्ण रूप से परिपक्व, मानसिक, शारीरिक व ग्यान रूप से , होने चाहिये। उन्हे एक दूसरे के गुणों को अच्छी प्रकार से जान लेना चाहिये। सफ़ल दाम्पत्य स्त्री-पुरुष दोनों पर निर्भर करता है, भाव विचार समन्वय व अनुकूलता सफ़लता का मार्ग है।ऋग्वेद८/३१/६६७५ में कथन है—“या दमती समनस सुनूत अ च धावतः । देवासो नित्य यशिरा ॥“- जो दम्पत समान विचारों से युक्त होकर सोम अभुसुत ( जीवन व्यतीत) करते हैं, और प्रतिदिन देवों को दुग्ध मिश्रित सोम ( नियमानुकूल नित्यकर्म) अर्पित करते है, वे सुदम्पति हैं।
पति चयन का आधार भी गुण ही होना चाहिये। ऋग्वेद१०/२७/९०६ में कहा है—कियती योषां मर्यतोबधूनांपरिप्रीत मन्यका। भद्रा बधूर्भवति यत्सुपेशाः स्वयं सामित्रं वनुते जने चित ॥---कुछ स्त्रियां पुरुष के प्रसंशक बचनों व धनसंपदा को पति चयन का आधार मान लेती हैं, परन्तु सुशील, श्रेष्ठ, स्वस्थ भावनायुक्त स्त्रियांअपनी इच्छानुकूल मित्र पुरुष को पति रूप में चयन करती हैं। पुरुष भी पूर्ण रूप से सफ़ल व समर्थ होने पर ही दाम्पत्य जीवन में प्रवेश करें—अथर्व वेद-१०१/६१/१६०० मन्त्र देखिये-
“ आ वृषायस्च सिहि बर्धस्व प्रथमस्व च । यथांग वर्धतां शेपस्तेन योहितां मिज्जहि ॥“
हे पुरुष! तुम सेचन में समर्थ वृषभके समान प्राणवान हो, शरीर के अन्ग सुद्रढ व वर्धित हों। तभी स्त्री को प्राप्त करो।
पति-पत्नी में समानता ,एकरूपता, एकदूसरे को समझना व गुणो का सम्मान करना ही सफ़ल दाम्पत्य का लक्षण है। ऋग्वेद-१/१२६/१४३० में पति का कथन है—
“ अगाधिता परिगधिता या कशीकेव जन्घहे। ददामि मह्यंयादुरे वाशूनां भोजनं शताः॥“मेरी सहधर्मिणी मेरे लिये अनेक एश्वर्य व भोग्य पधार्थ उपलब्ध कराती है, यह सदा साथ रहने वाली गुणों की धारक मेरी स्वामिनी है। तथा पत्नी का कथन है—
“ उपोप मे परा म्रश मे दभ्राणि मन्यथाः। सर्वाहस्मि रोमशाः गान्धारीणा मिवाविका ॥“-१/१२६/१६२५.
मेरे पतिदेव मेरा बार बार स्पर्श करें, परीक्षा लें, देखें; मेरे कार्यों को अन्यथा न लें । मैं गान्धार की भेडो के रोमों की तरह गुणों स युक्त हूं ।
नारी पुरुष समानता , अधिकारों के प्रति जागरूकता, कर्तव्यों के प्रति उचित भाव भी दाम्पत्य सफ़लता का मन्त्र है। पत्नी की तेजश्विता व पति द्वारा गुणों का मान देखिये—.ऋग्वेद१०/१५६/१०४२० का मन्त्र-
“अहं केतुरहं मूर्धामुग्रा विवाचनी। ममेदनु क्रतु पति: सेहनाया आचरेत॥“ ----मैं गृहस्वामिनी तीब्र बुद्धि वाली हूं, प्रत्येक विषय पर विवेचना( परामर्श)देने में समर्थ हूं; मेरे पति मेरे कार्यों का सदैव अनुमोदन करते हैं। तथा—“अहं बदामि नेत तवं, सभामानह त्वं बद:। मेयेदस्तंब केवलो नान्यांसि कीर्तियाशचन॥“---हे स्वामी!
सभा में भले ही आप बोलें परन्तु घर पर मैं ही बोलूंगी; उसे सुनकर आप अनुमोदन करें। आप सदा मेरे रहें अन्य का नाम भी न लें। पुरुषॊ द्वारा नारी का सम्मान व अनुगमन भी सफ़ल दाम्प्त्य का एक अनन्य भाव है, तेजस्वी नारी की प्रशन्सा व अनुगमन सूर्य जैसे तेजस्वी व्यक्ति भी करते हैं—रिग.१/११५ में देखें-“
प्रथम दीप्तिमानेवम तेजश्विता युक्त उषा देवी के पीछे सूर्य उसी प्रकार अनुगमन करते हैं जैसे युगों से मनुष्य व देव नारी का अनुगमन करते हैं । समाज़ व परिवार में पत्नी को सम्मान व पत्नी द्वारा पति के कुटुम्बियों व रिश्तों क सम्मान दाम्पत्य सफ़लता की एक और कुन्जी है-रिग.१०/८५/९७१२ का मन्त्र देखें---
“ सम्राग्यी श्वसुरो भव सम्राग्यी श्रुश्रुवां भवं ।ननन्दारि सम्राग्यी भव, सम्राग्यी अधि देब्रषु ॥“ –हे वधू! आप सास, ससुर, ननद, देवर आदि सबके मन की स्वामिनी बनो।
ऋग्वेद के अन्तिम मन्त्र में, समानता का अप्रतिम मन्त्र देखिये जो विश्व की किसी भी क्रिति में नहीं है— ऋग्वेद-१०/१९१/१०५५२/४---
“ समानी व आकूति: समाना ह्रदयानि वा। समामस्तु वो मनो यथा वः सुसहामति॥----हे पति-पत्नी! तुम्हारे ह्रदय मन संकल्प( भाव विचार कार्य) एक जैसे हों ताकि तुम एक होकर सभी कार्य-गृहस्थ जीवन- पूर्ण कर सको।
इस प्रकार सफ़ल दाम्पत्य का प्रभाव व उपलब्धियां अपार हैं जो मानव को जीवन के लक्ष्य तक ले जाती है। ऋषिकहता है—पुत्रिणा तद कुमारिणाविश्वमाव्यर्श्नुतः। उभा हिरण्यपेशक्षा ॥.ऋग्वेद८/३१/६६७९ –इस प्रकार वे दोनों( सफ़ल दम्पति ) स्वर्णाभूषणों व गुणों ( धन पुत्रादि बैभव) से युक्तहोकर र्संतानों के साथ पूर्ण एश्वर्य व आयुष्य को प्राप्त करते हैं। एवम—८/३१/६६७९—वीतिहोत्रा क्रत्द्वया यशस्यान्ताम्रतण्यकम”—देवों की उपासना करके अन्त में अमृतत्व प्राप्त करते हैं।
बड़ेखुशहैंआप, हम, सब --ये क्या देख- दिखारहे हैं हम सब,क्या दिखा-सिखा रहे हैं बच्चों को , सामान्य जन को , क्या यही है आने वाले देश की तस्वीर, नंगी तस्वीर? क्या ये सब भड़काऊ, कामनाएं उभारू, अच्छे खासे को बिगाडू तस्वीरें नहीं हैं ? फिर देश, समाज, दुनिया में झगड़े, हिंसा, बलात्कार , नारी-हिंसा , नारी के निंदनीय कर्म में लिप्तता को बढ़ावा दें तो किसका दोष ; तिस पर तुर्रा यह कि हम प्रगतिशील हैं, महिला स्वतन्त्रता के अलमबरदार |---क्या सोच रहे हैं आप........आखिर महिला-नारी स्वतन्त्रता का नाम-काम -नंगी तस्वीरों से ही क्यों शुरू होता है -ख़त्म होता है; क्या अन्य बड़े-बड़े कार्य जो महिलाएं करतीं हैं वे कम हैं समाचारों , चित्रों में दिखाने के लिए , जो एसे चित्रों की आवश्यकता पड़ जाती है।
आस का टिमटिमाता दिया आज बुझ गया; जब आँख का आंसू उसपे टपक गया |
आँखोंकेदिये
सुनसान रात में दर्द के अहसास में प्यार की प्यास में जब तुम नहीं पास में ; टिमटिमाते हैं , मेरीआँखकेदिये बनाकर गेम-इश्क; उस अहसास को मिटाने की आस में। शाश्वत
रात के सन्नाटे में नाचते हैं, जलती बुझती बिजलियों की तरह; कभी चमकते कभी बुझते ये जुगनूं ; गोया कि इशारा करते हैं- उठना गिरना, बनना-मिटना , जीना-मरना तो शाश्वत है।
प्यार
हमें तो प्यार से प्यार है प्यार के अहसास से प्यार है प्यार के नाम से प्यार है प्यार को सीने में लिए, मर सकें तो , हमें - उसप्यारीमौतसेप्यारहै।
---प्रस्तुत विचार प्रसिद्ध कवि, साहित्यकार श्री हेमंत शेष के हैं । एसे विचार प्राय: हम सभी भावना वश, करूणावश कहाजाते हैं परन्तु उनकी वास्तविकता नहीं सोचपाते। --क्या विद्वान् कवि या हम यह नहीं समझते कि मनुष्य पक्षी नहीं है जो झुण्ड या समुदाय या भीड़ तंत्र से चलते हैं , उनमें विवेक , प्रगति की इच्छा, सामाजिकता, उच्च कोटि के विचारों भावों के उचित चयन शक्ति एवं मौके नहीं होते । सिर्फ आत्म-सुविधा जीविता होती है। कोइ भी और जीवधारी चारों पुरुषार्थ के लायक नहीं है -धर्म, अर्थ, काम , मोक्ष के-; आपसबने युवा तोते( या पक्षी) को अपने बच्चे को दाना खिलाते देखा होगा , पर क्याकभीकिसीयुवातोतेकोबूढ़ेतोतेकेमुखमेंदानादेतेदेखाहै ? मनुष्यकीतरह । नहीं , मनुष्य के अलावा कहीं भावनाएं नहीं होतीं । वृद्ध होने का अर्थ -भूखा -प्यासा मरना। यदि हमें चिड़ियों से सीखना है तो प्रगति के पीछे जाकर चिड़िया ही बनना होगा । फिर हम प्रगति क्यों करें , जानवर ही न बने रहें । ये सारे कथन एकपक्षीय , सीमित दृष्टि वालों के हैं | उदाहरण देने का उचित तरीका यह है कि---"कुत्ता भी पूंछ हिला कर बैठता है " हम कुत्ते को महिमा मंडित नहीं वरन मनुष्य को कुत्ते से ऊंचा होने का स्मरण दिलारहे हैं। न कुत्ते से सीख लेने की बात हैअपितु स्वयं अपने प्रज्ञा-विवेक को जानने की बात है । --बच्चों से बड़ों को सीख लेना चाहिए या बच्चे भी बहुत कुछ बड़ों को सिखा सकते हैं --वाक्य भी इसी तरह का वाक्य है।