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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

मंगलवार, 25 सितंबर 2012

.जंगल में मोर नाचा....विश्व हिन्दी सम्मेलन..... जोहान्सबर्ग -अफ्रीका में .. डा श्याम गुप्त

                                             ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



विश्व  हिन्दी सम्मेलन..... जोहान्सबर्ग -अफ्रीका में ...जंगल में मोर नाचा किसी ने न देखा.


                            क्या विश्व हिन्दी सम्मलेन...भारत से बाहर विदेशों में होना अनिवार्य है......जंगल में मोर नाचा किसी ने न देखा.....अरे सारे विश्व हिन्दी सम्मलेन भारत में ही हों तो भारतीय भी हिन्दी की महत्ता समझें ....विदेशी क्या करेंगे हिंदी की महत्ता समझ कर ...क्यों समझें ...हम तो पहले अपनी भाषा की महत्ता समझ कर उसे प्रयोग में लाएं ......यहाँ तो सारा युवा समाज...तथाकथित पढ़ा लिखा, प्रवुद्ध युवा  समाज ..अंग्रेज़ी में खाता--पीता--उठता-बैठता, सांस लेता है ...और आप चले हैं हिन्दी सम्मलेन विदेशों में करने ......
                           यह सब कुछ तथाकथित वर्गों, गुटों के साहित्यकारों ( वे साहित्यकार भी कहाँ हैं ..पत्रकार, संपादक, यानी अखबार नवीस,  नेता , गुटबाज़ हैं ) विदेश घूमने का आयोजन बनाया हुआ है | अब देखिये ...वहाँ बहुत से विदेशी, स्थानीय भारतवंशी  व भारतीय विद्वान भी गए होंगे ( पता नहीं गए भी हैं ..बुलाये गए  भी हैं या नहीं ) परन्तु समाचार, विचार  व भाषण सिर्फ अखवार बालों  ---  आलोचक, संपादक, पत्रिकाओं वालों के छपे हैं ....किसी बड़े साहित्यकार के नहीं | इन सब के विचार तो हम भारत में ही सुनते रहते है, सुनते आये हैं वर्षों से  बिना किसी प्रभाव के... जब हम घिसे-पिटे विचारों ---आधा भरे गिलास से ही संतुष्टि की भावना करेंगे तो ऐसे सम्मलेन से हम क्या आशा करें ?
                               और   हिन्दी का सुखद भविष्य सुनिश्चित हो .....तो कौन करेगा सुनिश्चित, विदेशों में आयोजन से कैसे होगा सुनिश्चित ..... क्या हम विदेशियों  या योरोप-अमेरिका से आशा कर रहे हैं कि प्रत्येक बात की भांति ही.......पहले वे हिन्दी का प्रयोग प्रारम्भ करें तब हम भी नक़ल कर लेंगे  ......

सोमवार, 24 सितंबर 2012

श्याम स्मृति .... गुण और दोष .......डा श्याम गुप्त ...

                                       ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

श्याम  स्मृति .... गुण और दोष .......

            प्रायः यह कहा जाता है कि वस्तु, व्यक्ति व तथ्य के गुणों को देखना चाहिए, अवगुणों पर ध्यान नहीं देना चाहिए  |  इसे पोजिटिव थिंकिंग( सकारात्मक सोच ) भी कहा जाता है |
             परन्तु मेरे विचार में गुणों को देखकर, सुनकर, जानकर ..उन पर मुग्ध होने से पहले  उसके दोषों पर पूर्ण रूप से दृष्टि डालना अत्यावश्यक है कि वह कहीं 'सुवर्ण से भरा हुआ कलश' तो नहीं है | यही तथ्य सकारात्मक सोच --नकारात्मक सोच के लिए सत्य है | सोच सकारात्मक नहीं गुणात्मक होनी चाहिए, अर्थात नकारात्मकता से अभिरंजित सकारात्मक | क्योंकि .......".सुबरन कलश सुरा भरा साधू निंदा सोय |"

शनिवार, 22 सितंबर 2012

श्याम स्मृति.....मानव मन, धर्म व समाज ...डा श्याम गुप्त...

                             ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

श्याम  स्मृति.....मानव मन, धर्म व समाज ...

                    जिस प्रकार मानव मन विभिन्न मानसिक ग्रंथियों का पुंज है, समाज भी व्यक्तियों का संगठन है| मन बड़ा ही अस्थिर है, चलायमान है, वायवीय तत्व है | इस पर नियमन आवश्यक है |
                   कानून मनुष्य ने बनाए हैं , उनमें छिद्र अवश्यम्भावी  हैं , धर्म शाश्वत है, वही मन को स्थिरता दे सकता है |  धर्महीन मानव, धर्महीन समाज, धर्महीन देश ...स्थिरता तो क्या एक क्षण खडा भी नहीं रह सकता .... अपने पैरों पर |  आज विश्व की अस्थिरता का कारण है धर्महीन समाज |
                     धर्म का अर्थ सम्प्रदाय नहीं है |आज के चर्चित "रिलीज़न" वास्तव में सम्प्रदाय ही हैं | धर्म और रिलीज़न दो भिन्न संस्थाएं हैं|  आज चर्चित भिन्न-भिन्न  मत-मतान्तर , धार्मिक नियम ..धर्म नहीं हैं | धर्म तो एक ही है और वह शाश्वत है | धर्म का अर्थ है ...कर्तव्य का पालन,,,,,| और धर्म का केवल एक ही सिद्धांत है..."कभी दूसरों को दुःख मत दो |".......

" सर्वें सुखिना सन्तु 
सर्वे सन्तु निरामया |
सर्वे पश्यन्तु भद्राणि,
मा कश्चिद दुखभाग्भवेत ||"
   

शुक्रवार, 21 सितंबर 2012

अगीत साहित्य दर्पण ..क्रमश:--अध्याय दो..अगीत क्यों व क्या है एवं उसकी उपादेयता .....डा श्याम गुप्त..

                                   ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



               अगीत साहित्य दर्पण -अध्याय दो..अगीत क्यों व क्या है एवं उसकी उपादेयता .....

                          स्वतन्त्रता के पश्चात भारतीय समाज की भांति साहित्य भी अपनी पूर्व रूढियों व परम्पराओं से हटकर अधिक चैतन्य व स्वाभाविक होने लगा | कविगण समाज का मुर्दा स्वरुप, द्वंद्व, कुंठा, हताशा, निराशा, महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, रंग बदलते हुए व्यक्ति, शासन व समाज, टूटती सामाजिक व्यवस्था व पुरातन मूल्यों से मुठभेड, युद्धों की विभीषिका आदि सामयिक भावों पर लिखने लगे |  निराला जी ने अतुकांत छंद प्रचलित किया, साथ ही नई कविता, खबरदार कविता, अकविता, चेतन कविता, अचेतन कविता,यथार्थवादी कविता आदि वुभिन्न विधाओं का प्रादुर्भाव हुआ |  इन सब में  सम सामयिक स्थितियों व परिस्थितियों से जूखाने के विचार तो थे परन्तु युग की आवश्यकता --संक्षिप्तता, तीब्र-भाव सम्प्रेषण, समाधान की दिशा व प्रदर्शन का अभाव था जिसकी पूर्ति हित 'अगीत ' का जन्म हुआ|  अगीत रचनाकार समस्या का समाधान भी प्रस्तुत करता है, इसीलिये अन्य सारे आंदोलन आज लुप्तप्रायः हैं परन्तु 'अगीत' जीवित है | अतः निराला व समकालीन कवियों की रचनाओं व कविता आंदोलनों से अगीत एक भिन्न व अगले सोपान का अग्रगामी आंदोलन है, जिसका उद्देश्य हिन्दी साहित्य धारा को एक स्पष्ट दिशा व एक अर्थ देना है |
                 स्वतन्त्रता पश्चात पिछले चार दशकों में हम यह नहीं जान  पाए कि नई कविता को कौन सी सही  दिशा प्रदान की  जाय |  जिन-जिन विधाओं में कविता की गयी उसमें अस्वस्थता, सर्वसाधारण के लिए दुर्वोधता, दुरूहता झलकती रही | एक निरर्थकता, विचार विश्रन्खलता  झलकती रही |अतः सरल व सर्वग्राही कविता के लिए 'अगीत' की उत्पत्ति  हुई  | तत्कालीन कविता की निरर्थकता का उदाहरण देखिये.....

" मूत्र सिंचित मृत्तिका 
के वृत्त में ,
तीन टांगों पर खडा 
नतग्रीव ,
धैर्य धन गदहा | "                     ...तथा..

"  वो नीम के पेड़ के पीछे ,
भेंस  की पीठ पर कोहनी टिकाये,
एक लड़का और एक लडकी ;
देखते ही देखते चिकोटी काटी..
और......|"

              १९९५-९५ ई. में जो अगीत का मूल विचार ,  मूल तात्विक अर्थ -विवरण का घोषणा-पत्र (मेनीफेस्टो ) प्रकाशित हुआ तो उसमें यह स्पष्ट था कि  " अगीत खोज के लिए अग्रसर रहेगा और इस विधा में निरंतर नए -नए रचनाकार जुडकर विधा को एक वाद के  रूप में स्थापित करने में योगदान दे सकेंगे , क्योंकि खोज कभी रूढिगत नहीं होती |"
               छंद शास्त्रीय पक्ष के अनुसार -'अगीत पांच से दस तक पंक्तियों वाली कविता है जिसमें मात्रा व तुकांत बंधन नहीं है | यह एक वैज्ञानिक पद्धति है वर्तमान में सामाजिक सरोकारों व उनके समाधान के लिए विद्रोह है, एक नवीन खोज है | अगीत में वह सब कुछ है जिसके लिए प्रत्येक रचनाकार लालायित रहता है | अतः वह आगे आने के लिए प्रयासरत है |
                अगीत को अ -गीत या  गीत नहीं के अर्थ में नहीं लिया जाना चाहिए | इसका अर्थ है --अन्तर्निहित गीत, अंतर्द्वंद्व के गीत , अतुकांत गीत, अपरिमित भाव के गीत, अर्थवत्तात्मक  विचार व अनुशीलन के गीत , असीम ---अर्थात छंद बंधन की सीमा -अनिवार्यता से मुक्त गीत | इसमें लय से युक्त शब्द-योजना , शब्द-सौंदर्य सब कुछ है | अगीत व गीत में इतना ही भेद है कि गीत के नियमों का अगीत में लागू होना अनिवार्य नहीं है | कवि यदि चार से दस पंक्तियों में अपने सम्पूर्ण विचार  व  भावों को व्यक्त करने में समर्थ है तो वह अगीत आंदोलन से जुड सकता है | साहित्यकार श्री सोहन लाल 'सुबुद्ध' ने .." डा सत्य के श्रेष्ठ अगीत " नामक पुस्तक में कहा है कि..."  'अ'  का अर्थ सिर्फ विपरीतार्थक लगाना अल्पज्ञता होगी |"   तथा एक अन्य स्थान पर ( प्रतियोगिता दर्पण--२००३ ) वे कहते हैं..." अगीत का अर्थ है जमीन से जुडी वह छोटी कविता जिसमें लय हो, गति हो एवं समाजोपयोगी एक स्वस्थ विचार व सम्यक दृष्टि बोध हो |"
                 एक साक्षात्कार में अगीत विधा के संस्थापक डा रंगनाथ मिश्र 'सत्य' का कथन है कि.." गीत में 'अ' प्रत्यय लगा कर    मैंने अगीत को संज्ञा के रूप में स्वीकार किया | अगीत, गीत नहीं के रूप में न लिया जाय | यह एक वैज्ञानिक पद्धति है जिसने संक्षिप्तता को ग्रहण किया है, सतसैया के दोहरे की भांति |"  महाकवि पं. जगत नारायण पाण्डेय ' अगीतिका' के  आत्मकथ्य में कहते हैं कि .." अगीत पांच से दस पंक्तियों के बीच अपने आकार को ग्रहण करके भावगत तथ्य को सम्पूर्णता से प्रेषित करता है |"..यथा ...

" एक लघु वाक्य 
करता है हमारे भाव का
स्पष्ट सम्प्रेषण |
अगीत की लघु काया में 
लेता है आकार
हमारे विचार का
स्पष्ट विस्तृत वाच्य |"              ----श्री जगत नारायण पाण्डेय( अगीतिका से )

               डा सत्य के अनुसार --अगीत व्यक्ति एवं समाज व साहित्य के तनावों से उत्पन्न हुआ है | इसकी स्थापना के लिए दो माध्यम आवश्यक हैं--- (१) द्रव्य ( Matter)  तथा ..(२) आवेष्ठन (environment ) |
अगीत में वह सब कुछ है जो वर्तमान समाज के लिए आवश्यक है | वह ' वसुधैव कुटुम्बकम ' का हामी है | अगीतिका के आत्मकथ्य में पं. जगत नारायण पांडे कहते हैं..."अगीत वह जुगनू है जो बंद मुट्ठी  में भी अपने प्रकाश को उद्भाषित करता रहता है, अर्थात अगीत मौन रहते हुए भी मुखर रहता है जो मन व  बुद्धि के सम्यक अनुशीलन से उत्पन्न एक विधा है, एक धारा है |"
     
                                             कविता में लय व गति को सदैव स्वीकारा गया है | लय व गति के बिना कोई भी रचना जीवंत व कालजयी नहीं होती | अगीत में भी लय व गति को स्वीकारा गया है | अगीत का अभिप्रायः है---राष्ट्र व समाज के प्रति जमीन से जुडी छंदयुक्त, गद्यात्मक शैली की वह अतुकांत कविता जिसमें लय व गति हो, सरल व बोधगम्य भाषा, नए-नए शब्दों का प्रयोग व समष्टि कल्याण भाव हो | गेयता, अगेयता , तुकांत व मात्रा बंधन आवश्यक न हो | कवि ने कहा भी है..

" अन्तर्निहित  गीत है,  गति है,

लय यति गति व्यति वह अगीत है |

अ, असीम है,परिधि अपरिमित ,

अ  का अर्थ वह नहीं , नहीं है |

त्रिपदा, सप्तपदी  या षटपद ,

है अगीत वह नव-अगीत भी ||"                  ----डा श्याम गुप्त ..

 

                               श्री  हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कहा था ...." काव्य अलंकरण का भोजन है , उससे मिलने वाला तोष इस पर निर्भर नहीं करता कि इसे किसने बनाया है व किन-किन वस्तुओं से बना है, व क्या क्या प्रक्रियाएं अपनाई गईं हैं | उसका महत्त्व व मूल्य स्वाद पर निर्भर करता है |"

                          गीत से भिन्न 'अगीत' नकार पर आधृत है जिसकी संक्षिप्तता में अनकहे का उन्माद है, शिल्प का अपना ही वैशिष्ट्य है | युग की नवीनतम  सम्भावनाओं का समावेश, कथ्य की नवोक्तियों व तथ्य की नवीन प्रस्तुति ..अगीत की अपनी अभिज्ञानता  का प्रतीक है | अगीत में लय युक्त शब्द-सौंदर्य योजना व अर्थ सौंदर्य सब कुछ है | यथा ...

" दिवस के अवसान में

उद्भासित अरुणाभा ,

देती है सन्देश 

क्षितिज पर मिलन का,

उषा की बेला में |"                        --- अगीतिका से ( पं. जगत नारायण पाण्डेय )

                            भाषा की नई संवेदना, कथ्य का अनूठा प्रयोग, संक्षिप्तता व परिमाण की पोषकता , बिम्बधर्मी प्रयोग के साथ सरलता से सरलता से भाव-सम्प्रेषण अगीत का एक और गुण है | देखें ....

" बूँद -बूँद बीज ये कपास के,

खिल खिल कर पड रही दरार ;

सडी-गली मछली के संग ,

उंच-नीच अंतर में

ढूँढ  रहा विस्मय, विस्तार ;

डूब गए कपटी विश्वास के |"             -------डा रंगनाथ मिश्र 'सत्य' 

           अगीत रचनाकार सिर्फ कल्पनाजीवी नहीं ..वह स्वजीवी, यथार्थजीवी व समाज जीवी है |  वह निराशावादिता के विपरीत सौंदर्यबोध व आशावाद को स्वीकारता है |  वर्ग-संघर्ष अभारतीय चिंतन है , उसके स्थान पर 'मंथन' का भारतीय भाव-शब्द का प्रयोग होना चाहिए | यह विचार मंथन -भाव अगीत-विधा का विशिष्ट गुण है जो समाजोपयोगी सोद्देश्य कविता व कालजयी साहित्य रचना के लिए महत्वपूर्ण व आवश्यक गुण है | अगीत का सामाजिक व साहित्यिक महत्ब उसके इस विशिष्ट गुण में निहित है | उदाहरणार्थ ...

"   कवि चिथड़े पहने 

चखता संकेतों का रस,

रचता -रस, छंद, अलंकार ,

ऐसे कवि के क्या कहने |"            ------डा रंगनाथ मिश्र 'सत्य' .           

एवं  ....

"   क्यों मानव ने भुला दिया है ,

वह ईश्वर का स्वयं अंश है |

मुझमें तुझमें , शत्रु-मित्र में ,

ब्रह्म समाया कण कण में वह;

और  स्वयं भी वही ब्रह्म है,

फिर क्या अपना और पराया ||"                     --- डा श्याम गुप्त ( सृष्टि महाकाव्य से )...

                    अगीत में पश्चिम के अंधानुकरण की अपेक्षा कविता को अपनी जमीन अपने चारों ओर के वातावरण पर रचने का प्रयास खूब  है | चेतना में उद्बोधन भी है ...

"   स्तम्भन एक और ....

संबंधी  भीड़-भाड 

ध्वंस  की कतारों में ;

मक्षिका नहा रही-

दूध के पिटारों में |

ढला ढला लगता सब ओर...

अपने में स्नेह-सिक्त,

तिरछा  भूगोल |"                   ---- डा सत्य ...

                                 हर नई विधा में कुछ चमत्कार होता है, परन्तु यदि उसमें समाज में अपेक्षित संस्कार , साहित्य के उचित गुण, भाव, कला व देश कालानुसार आस्था भी होती है तो वह कालजयी होती है, उसका समादर होता है| अगीत की लोकप्रियता का कारण निश्चय ही ज्ञान व अनुभव की आस्थामूलक भावना है | साहित्यकार श्री सोहन लाल सुबुद्ध का कहना है --" काव्य को परखने की दृष्टि बहुत एकाकी नहीं होनी चाहिए | काव्य मा महत्त्व उसकी समग्रता में निहित रहता है | इसमें गीत का भी महत्त्व है, अगीत का भी | काव्य में भेद-भाव नहीं चल सकता कि गीतकार, अगीतकार को तच्छ कह कर नकार दे |"   (---डा सत्य व उनके श्रेष्ठ अगीत के कथ्य में |) 

                सरलता  रुचिकरता, संक्षिप्तता , जन जन भाव संप्रेषणीयता , सन्देश की स्पष्टता व आकर्षण अगीत के प्रिय भाव हैं ---

"  मौसम श्रृंगार नख-शिखों की ,

बातें  पुरानी   होगईं   हैं;

कवि गीत गाओ राष्ट्र के अब |"                 -- --त्रिपदा अगीत ( डा श्याम गुप्त )

"   मन का कठोर होना ,

कितना मुश्किल होता है |

मन ही तो जीवन में 

कोमलतम होता है |

हम कितने भी पाषाण ह्रदय बन जाएँ,

अंतस में कहीं न कहीं ,

नेह प्रान्कुर बसता है |"                          -----स्नेह प्रभा |

 

                   एक साक्षात्कार में डा सत्य का कथन है कि..." भारतीय दर्शन के विचारों से ओत-प्रोत अगीत का सूत्रपात मैंने इसलिए किया कि अनाटक, अकविता, अकहानी जैसे  आंदोलन पाश्चात्य नक़ल पर चल रहे थे | अगीत का सम्बन्ध मनुष्य की आस्था  से है, भारतीयता से है, उसकी संस्कृति से है | अतः अगीत- हिन्दी व हिन्दी साहित्य के लिए विकास व उसे गति देने में सहायक व सक्षम है और इसीलिये यह विश्व भर में फ़ैल रहा है, तथा मैं भविष्य के प्रति आशान्वित हूँ |"

                   चेतन कविता, अचेतन कविता, खबरदार कविता, अमेरिका की बीटनिक पीढ़ी, बंगाल की भूखी पीढ़ी आदि कबकी काल-कवलित हो चुकीं | अगीत इन सब से अलग है, स्थायी रहा है और रहेगा | अगीत आंदोलन के एक और महत्वपूर्ण समाजोपयोगी व युगानुकूल मांग है कि हिन्दी पूर्ण राष्ट्र भाषा बने -----

"देव नागरी को अपनाएं

हिन्दी है जन जन की भाषा ,

भारत माता की अभिलाषा |

बने राष्ट्रभाषा अब हिन्दी,

सब बहनों की बड़ी बहन है 

हिन्दी सबका मान  बढाती ,

 हिन्दी का अभियान चलायें|"                  --- डा रंगनाथ मिश्र 'सत्य'

             मानवता, पतन, समाजोत्थान पर विचारशीलता, मंथन व समाधान के भाव दृष्टगत करें ....

"   विकसित व विकासशील देशों में,

सबसे बड़ा अंतर ;

एक में मानवता अवशेष 

दूसरे में छूमंतर |"                        ---- धनसिंह मेहता 'अनजान'( प्रवासी भारतीय -अमेरिका )

"   बेडियाँ तोडो 

ज्ञान दीप जलाओ,

नारी अब-

तुम्ही राह दिखाओ,

समाज को जोड़ो |"                       ----सुषमा गुप्ता ..

                 सम-सामयिक भाव, दृष्टिबोध ...अगीत का एक अन्य विशिष्ट गुण है | प्रदूषण व सत्य-सामाजिक व्यंग्य के भाव भी हैं | एक उदाहरण देखें ....

"   आज के समाज का 

सबसे बड़ा व्यंग्य ;

सच को भी -

व्यंग्य कहकर,

कहना पड  रहा है |"                      ----- गिरीश पाण्डेय ( धरती जानती है )

"   वाह रे प्रदूषण !

धरा हो या गगन, सलिल या पवन ,

यहाँ तक कि मानव मन -

भी प्रदूषित है |

असुराचारी मानव बना खरदूषण ,

कैसे सुधरे पर्यावरण |"                  ------सुरेन्द्र कुमार शर्मा ( मेरे अगीत छंद )

             कवि का अगीत प्रेम उसके प्रति ललक व भावना की उच्चता कुछ इस प्रकार मुखर हुई---

"   जब भी उठी कल्पना मन में,

लिखने  बैठा गीत;

गीत  नहीं बन पाया साथी, 

वह बन गया अगीत |"                     -----राम गुलाम रावत 

                इस प्रकार राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक व साहित्यिक क्षेत्रों में बाधाओं व उपस्थित अंधकार के बावजूद भी अगीत कविता युग-परिवर्तन व नए युग का श्री गणेश करेगी यह अगीतकारों व अगीत के सद्भावी साहित्यकारों की प्रबल उत्कंठा, आकांक्षा व आशा है | ...

" टूट रहा मन का विश्वास,

संकोची हैं सारी मन की रेखाएं,

रोक रहीं मुझको-

गहरी बाधाएं ,

अंधकार और बढ़ रहा ,

उलट रहा सारा इतिहास |"                       -----डा रंगनाथ मिश्र 'सत्य'

" खोल दो घूंघट के पट ,

हटादो  ह्रदय पट से,

आवरण,

मिटे  तमिस्रा,

हो नव-विहान |"                                     ----श्रीमती  सुषमा गुप्ता 

"  ओ दिव्य कवि !

तेरी मधुर रागमयी बांसुरी की धुन

सागर की उत्ताल तरंगों से संगत करती,

आकाश के अंतहीन उसार में ,

कोमलता से गुंजन करती |"                    -----श्री धुरेन्द्र स्वरुप बिसरिया ( दिव्य-अगीत से )

                                                    --इति--अध्याय दो ....

  -----अगीत साहित्य दर्पण  पुस्तक के आगे के अध्याय .....मेरे ब्लॉग ..अगीतायन ( http://ageetayan.blogspot.com )  पर देखें |

                अध्याय दो समाप्त ...अगीत साहित्य दर्पण (क्रमश:).. अध्याय तीन ..अगली पोस्ट में ...

 

        







श्याम स्मृति......मेरा भारत देश व वही जीता है ...डा श्याम गुप्त ...

                                   ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


श्याम  स्मृति -१ ...... वही जीता है |

       "जो अतीत की सुहानी गलियों की स्मृतियों के परमानंद , भविष्य की आशापूर्ण कल्पना की सुगंधि के आनंद एवं वर्तमान के सुख-दुःख-द्वंद्वों से जूझने के सुखानंद की साथ जीता है........वही जीता है |"


श्याम  स्मृति -२.......यह भारत देश है मेरा .......


                 यह भारतीय धरती व वातावरण का ही प्रभाव है कि मुग़ल जो एक अनगढ़, अर्ध-सभ्य,  बर्बर घुडसवार आक्रमणकारियों की भांति यहाँ आये थे वे सभ्य, शालीन, विलासप्रिय, खिलंदड़े, सुसंस्कृत लखनवी -नजाकत वाले लखनऊआ नवाब बन गए | अक्खड-असभ्य जहाजी ,सदा खड़े -खड़े , भागने को तैयार, तम्बुओं में खाने -रहने वाले अँगरेज़ ...महलों, सोफों, कुर्सियों को पहचानने लगे |
               यह वह देश है जहां प्रेम, सौंदर्य, नजाकत, शालीनता... इसकी  संस्कृति, में रचा-बसा है,   इसके जल  में घुला है, वायु में मिला है और खेतों में दानों के साथ बोया हुआ रहता है |  प्रेम-प्रीति यहाँ की श्वांस  है और यहाँ की  हर श्वांस प्रेम है |
               यह पुरुरवा का, कृष्ण का, रांझे का, शाहजहां का और  ताजमहल का देश है.....|

गुरुवार, 20 सितंबर 2012

अगीत साहित्य दर्पण,( क्रमश:) अध्याय प्रथम (समाप्त )... डा श्याम गुप्त ..

                                 ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


   ....पिछले  अंक के शेष से आगे....

                 अगीत कविता के छंदों की संक्षिप्तता के बावजूद कथ्य की सम्पूर्णता के साथ भाव-संप्रेषणीयता मुझे 'सतसैया के दोहरे ज्यों नाविक के तीर " एवं उर्दू के शे'र की भांति 'गागर में सागर' के भाव में सुस्पष्टता से संप्रेषणीय, सुग्राह्य व मनमोहक लगी |  मैंने अनुभव किया कि अगीत में जन-जन की कविता बनने तथा सामान्य जन के लिए भी भाव-सम्प्रेषण की अपार क्षमता के साथ-साथ अग्रगामी युगानुकूल संभावनाएं भी हैं|  अतः मैंने स्वयं ( डा श्याम गुप्त ) सन २००६ ई. में शाश्वत आध्यात्मिक रहस्यमय विषय - 'सृष्टि, ईश्वर व जीवन-जगत के प्रादुर्भाव ' पर , विज्ञान व अध्यात्म पर समन्वित महाकाव्य " सृष्टि ( ईषत इच्छा या बिगबैंग-एक अनुत्तरित उत्तर )". अगीत विधा में  लिखा जिसमें अगीत व साहित्य के इतिहास में प्रथम बार किसी मूर्त व्यक्तित्व के स्थान पर अमूर्त ने नायकत्व का निर्वाह किया है|   इस कृति की सफलता व पत्रकारों, विद्वानों, समीक्षकों द्वारा आलेखों से यह सिद्ध हुआ कि अगीत में आध्यात्मिक, वैज्ञानिक व गूढ़ विषयों पर भी रचनाएँ की जा सकती हैं | सन-..२००८ में अगीत विधा पर मेरी द्वितीय कृति "शूर्पणखा" खंड काव्य प्रकाशित हुई जिसे मैंने "  काव्य-उपन्यास"   का नाम दिया  है |

              सृष्टि महाकाव्य के प्रणयन के लिए मैंने अतुकांत, सममात्रिक, लयबद्ध गेय 'अगीत षटपदियों' का निर्माण किया जो अगीत में एक और नवीन छंद की सृष्टि थी | सृष्टि महाकाव्य के लोकार्पण के समय इन अगीत  षटपदियों को भातखंडे संगीत महाविद्यालय ,लखनऊ की प्राचार्या श्रीमती कमला श्रीवास्तव द्वारा संगीतमयता से गाकर बड़े सुन्दर एवं मनमोहक ढंग से प्रस्तुत किया गया | एक उदाहरण देखें....


" नए तत्व नित मनुज बनाता ,
जीवन कठिन प्रकृति दोहन से |
अंतरिक्ष आकाश प्रकृति में,
तत्व, भावना, अहं व ऊर्जा ;
के नवीन नित असत कर्म से,
भार धरा पर बढता जाता ||"              ---सृष्टि महाकाव्य से ....

   इसी वर्ष कवयित्री श्रीमती सुषमागुप्ता के एक छोटे से अगीत से प्रेरित होकर मैंने अगीत के एक अन्य छंद
 " नव-अगीत" का सूत्रपात किया जो पारंपरिक अगीत से भी  लघु है....यथा...
" बेडियाँ तोडो , 
ज्ञान दीप जलाओ;
नारी  अब,
तुम्ही राह दिखाओ ,
समाज को जोड़ो |"                      ---- नव अगीत ( श्रीमती सुषमा गुप्ता )

अगीत छंद को और आगे बढाते हुए , क्रांतिकारी, स्वतन्त्रता सेनानी ,पत्रकार, साहित्यकार पद्मश्री पं. बचनेश त्रिपाठी  के निधन पर श्रृद्धांजलि स्वरुप मेरे द्वारा एक नवीन अगीत-छंद- "त्रिपदा अगीत छंद"  का प्रयोग किया गया | वह प्रथम छंद श्री बचनेश जी की स्मृत-श्रृद्धांजल स्वरुप था....

" सादा जीवन औ विचार से,
उच्च भावना से पूरित मन;
सच्चे निष्प्रह युग-ऋषि थे वे |"

            इस प्रकार अगीत की यह अल्हड निर्झरिणी , आज पूर्ण-रूप से  युवा होकर अगीत काव्य की विभिन्न धाराओं से समाहित कालिंदी का रूप धरकर कल-कल प्रवहमान है तथा उत्तरोत्तर नवीन धाराओं -उपधाराओं से आप्लावित होरही है| सिर्फ भारत में ही नहीं सारे विश्व में अगीत की गूँज है | एक वार्तालाप में डा सत्य का कथन था कि --" यद्यपि अगीत कवि किसी 'वाद ' का सहारा नहीं लेता; परन्तु इतने लंबे समय तक चलने वाला व स्थायी होने वाला आंदोलन स्वयं एक वाद का रूप ले लेता है , अतः काव्य की इस धारा को 'अगीतवाद" की संज्ञा दी जा सकती है |
          साहित्य की यह अगीत धारा, प्रत्येक माह के प्रथम रविवार को 'अखिल भारतीय अगीत परिषद, राजाजी पुरम, लखनऊ के तत्वावधान में गोष्ठियों, कवि सम्मेलनों , कवि-मेला, कवि-कुम्भ व एक मार्च को 'साहित्यकार दिवस' मनाकर तथा 'अगीतायन' नामक समाचार पत्र के प्रकाशन द्वारा नए-नए व युवा कवियों को प्रोत्साहन देकर, हिन्दी भाषा, व साहित्य की अतुलनीय सेवा में लगी हुई है| अगीत के कवि-पुष्प, काव्य-वाटिका में अपना अपना सौरभ विखेर रहे हैं जो अन्य कवियों, साहित्यकारों व जनमानस को विविध रूपों से हर्षित व आंदोलित करते जारहे हैं | इस प्रकार उपन्यासकार प्रोफ. यशपाल के वाक्य "... अगीत का भविष्य उज्जवल है "...श्री अमृत लाल  नागर के कथन "...यदि अगीत फैशन के लिए नहीं है तो उसका भविष्य उज्जवल है"..एवं श्री सूर्यप्रसाद दीक्षित के शब्द ..." अगीत वस्तुत: गीति काव्य का ही अभिकल्प है "...वस्तुतः सत्य सिद्ध होरहे हैं और कहा जा सकता है कि ---

"रंगनाथ की कविता का रंग,
ज्यों  ज्यों समय बीतेगा ,
धुलेगा नहीं वरन निखरेगा |
क्योंकि समय के शूलों को,
झेलना, फूलना, भूलना -
यह सत्य का स्वभाव है |"       ---- कवि पाण्डेय रामेन्द्र ( सफर नामा से )

तथा---
" पौधा जो अगीत का सत्य ने लगाया था,
तन मन का रंग रूप जन जन को भाया था |
बना सुमन-वल्लरी, काव्य शिखर चूमता ,
श्रम, श्रृद्धा , सत्य-भाव सींचा औ सजाया था ||"       ---- डा श्याम गुप्त ..


                                           --- इति प्रथम अध्याय----
              ----क्रमश, अगीत साहित्य दर्पण,  द्वितीय अध्याय...अगली पोस्ट में... 
                                          -----अगीत साहित्य दर्पण  पुस्तक के आगे के अध्याय .....मेरे ब्लॉग ..अगीतायन ( http://ageetayan.blogspot.com )  पर देखें |


बुधवार, 19 सितंबर 2012

गणेश चतुर्थी पर ....बाल गीत-- गणेश....डा श्याम गुप्त....

                               ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


                   यूँ तो गणेश के जाने कितने नाम हैं रूप हैं  ...अनंत |    एक पञ्चमुखी  व बाल रूप रूप प्रस्तुत है  | गणेश  सिर्फ गौरी पुत्र गणेश  नहीं है अपितु वस्तुतः गणेश  -- आदि- मूल प्राण-शक्ति है...यह विज्ञान का प्राण नहीं,  ब्रह्माण्ड की मूल प्राण-शक्ति  जो प्रत्येक तत्व ( भौतिक या अभौतिक, चेतन या अचेतन ) को आपस में बांधती है ....जिससे आगे कार्य संपादक  शक्ति का प्रादुर्भाव होता है |  वेदों में कहागया है....
पंचमुखी गणेश
.                          "निषु सीद गणपति  गणेषु त्वमाहुर्विप्रतमंकवीनां, न ऋते त्वत क्रियते किन्चनारे  महामर्क मघवच्चित्रमर्च |"   अर्थात हे गणपति आप अपने समूह  (गणों- अर्थात प्रत्येक कार्य-समूह के  संधि स्थल पर ) में विराजें, कवि ( विद्वान जन ) आपको अग्रगण्य कहते हैं, विश्व की   कोई भी क्रिया कहीं भी आपके बिना नहीं होती | तथा....अतः..." गणानां त्वा गणपति हवामहे" .... हे गणों के पति  आपका आवाहन करते हैं|   इसीलये वे प्रथम-पूज्य हैं, सर्व-पूज्य हैं, सर्वत्र पूज्य हैं.........       



                                  

बाल गणेश

              गणपति गणेश....
लम्बी सूंड कान पन्खे से, छोटी छोटी आँखें  हैं |
हाथी जैसा सर है जिनका,एकदंत कहलाते हैं ||

मोटा पेट हाथ में मोदक, चूहे की है बनी सवारी |
ओउम् कमल औ शंख हाथ में,माथे पर त्रिशूल धारी ||

ये गणेश हैं गणनायक हैं,सर्वप्रथम पूजे जाते |
क्यों हैं एसा वेष बनाए,आओ बच्चो बतलाते ||

तुच्छ जीव है मूषक लेकिन, पहुँच हर जगह है उसकी |
पास रखें ऐसे लोगों को,एसी कुशल नीति जिसकी ||

सूक्ष्म निरीक्षण वाली आँखें, सबकी सुनने वाले कान |
सच को तुरत सूंघ ले एसी, रखते नाक गणेश सुजान ||

बड़े भेद  औ  राज की बातें, बड़े पेट में  भरी रहें |
शंख घोष है,कमल सी मृदुता,कोमल मन में सजी रहें ||

सबका हो कल्याण,  ॐ से सजे  हस्त से वर देते |
मोदक का है अर्थ,सभी को प्रिय कहते,प्रिय कर देते ||

अमित भाव-गुण युत ये बच्चो!,रूप अनेकों सजते |
कभी नृत्य-रत,कभी खेल रत,कभी ग्रन्थ भी लिखते ॥

ऐसे सारे गुण हों  बच्चो! वे ही नायक कहलाते |
हैं गणेश देवों के नायक,सर्वप्रथम पूजे जाते ||

                                      - चित्र ..गूगल  एवं ..निर्विकार श्याम ....साभार..