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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2014

गुरुवासरीय काव्य-गोष्ठी का आयोजन ...डा श्याम गुप्त ....


                             ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



               गुरुवासरीय काव्य-गोष्ठी का आयोजन

               माह के प्रत्येक गुरूवार को होने वाली ‘गुरुवासरीय काव्य-गोष्ठी’ का आयोजन गुरूवार,दि.०९-१०-२०१४ को डा श्याम गुप्त के निवास सुश्यानिदी , के-३४८, आशियाना, लखनऊ पर संपन्न हुआ | श्रीमती सुषमा गुप्ता द्वारा कवियों का स्वागत किया गया |
          वाणी वन्दना करते हुए डा श्याम गुप्त ने माँ सरस्वती से भारत की एवं सभी को  प्रसन्नता प्रदान करने की कृपा की आकांक्षा करते हुए माँ से विनय करते हुए कहा..
जय जय जयति सरस्वती माता,
हम सबको ऐसा वर दीजै ||
बढ़े हिन्द में नित प्रति विद्या,
विद्या बुद्धि कबहुं नहीं छीजै |

            संचालन सुप्रसिद्ध कवि व वरिष्ठ साहित्यकार डा रंगनाथ मिश्र ‘सत्य' द्वारा किया गया | डा श्याम गुप्त ने अपनी कविता ..’अपन-तुपन’ से गोष्ठी का प्रारम्भ करते हुए विभिन्न दार्शनिक, धार्मिक, वैदिक एवं सामयिक विषयों पर काव्य रचना सुनाते हुए बचपन का एक सुन्दर शब्द-चित्र प्रस्तुत किया ...
सारा क्रोध, गिले शिकवे,
काफूर होजाते थे ; और-
बाँहों में बाँह डाले,
फिर चल देते थे, खेलने-
अपन-तुपन |
 
 श्री उमेश दुबे जी ने माटी ...माँ धरती की महत्ता बताते हुए कहा .....
कोइ कहता माटी कंचन, कोई कहे अबीर,
मेरी माटी तो ममता है हरती सबकी पीर |.......
 
    डा अखिलेश ने ....‘वृद्ध भंवरे की बाँहों नवेली कली ‘ गीत गुनुगुनाया ...तो  बसन्त राम दीक्षित ने श्रृंगार गीत से गोष्ठी में रंग भरते हुए कहा ..‘सुरभित रस गंध की अनुभूति हूँ मैं’ गीत प्रस्तुत किया |
 
 कविवर रवीन्द्र अनुरागी ने सामयिक सत्य को प्रस्तुत करते हुए कहां ...
’मेरी कविता रस विहीन निष्ठुर भावों की...
जिसके छंद छंद में करूणा है,
असहनीय, भूखे प्यासे इंसानों की “

      कविवर रामदेव लाल ’विभोर ने संसाधन बचत पर लक्ष्य करते हुए परामर्श दिया -
फैशन रख दें ताक पर तजें व्यर्थ का खेल ,
समझ बूझ कर व्यय करें ,बिजली पानी तेल |...वहीं भक्त कवि कौशल किशोर जी ने --
......‘बड़े दयालू भोले शंकर उनका सुमिरन कर’ से भोलेनाथ की वन्दना की |

      आचार्य डा कृष्ण मोहन जी महाराज ने  हुंकार भरते हुए  उद्बोधन गीत --
‘हो रक्त वर्ण हुंकारों में, गीली होजाय दुलारों में, ...से गोष्ठी में जोश उत्पन्न किया | प्रथम बार आये हुए अतिथि श्रोता एडवोकेट श्री शिवभूषण तिवारी जी ने गोष्ठी अपना वक्तव्य देते हुए कि कविता के इन कथ्यों पर इन्सान चलें तो घर व समाज को स्वर्ग बनाया जा सकता है दो पंक्तियाँ प्रस्तुत कीं—
जीवन से जो कुछ पाया,
संतोष किया जीवन में |

       स्वागताध्यक्ष  श्रीमती सुषमा गुप्ता जी ने  दो सुन्दर गीत प्रस्तुत करते हुए .कहा..
‘चल रहे थे हम अकेले ,
एक सूनी राह पर |
तुम मिले साथी बने,
हर राह आसां होगई |

        डा रंगनाथ मिश्र सत्य ने राधा-कृष्ण, तुलसी–रत्ना व राम-गिलहरी के प्रेम को सुनाते हुए कहा....
श्रेष्ठ प्रेम राधाजी का राधे-श्याम कहिये ,
 इसलिए राधाजी की साधना को गहिये |
सब कष्ट दूर हों चक्रधारी की कृपा से ,
राधे-राधे, श्याम-श्याम, राधे-श्याम कहिये |

            
डा रंगनाथ मिश्र सत्य श्री उमेश दुबे का उनके जन्म-दिवस के उपलक्ष पर माल्यार्पण व साहित्य भेंट करते हुए

रवीन्द्र अनुरागी, बसंत राम दीक्षित एवं डा श्रीकृष्ण अखिलेश

डा श्याम गुप्त का काव्य पाठ

डा सत्य काव्य-पाठ करते हुए

डा कृष्णमोहन महाराजका काव्यपाठ

सुषमा जी का गीत



                                  सुषमा जी का गीत ...

              जलपान के उपरांत डा श्याम गुप्त द्वारा धन्यवाद ज्ञापन के उपरांत गोष्ठी का समापन हुआ |   

                                             डा श्याम गुप्त का काव्य पाठ --ज्ञान गंगा की ओर


 

बुधवार, 1 अक्टूबर 2014

चला जारहा कौन …. डा श्याम गुप्त ..

                                 ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


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कमर झुकाए लाठी टेके,

तन पर धोती एक लपेटे |

नंगे पैरों कठिन मार्ग पर

चला जारहा कौन |

                                चला जारहा मौन |


‘रघुपति राघव राजाराम,

पतित पावन सीताराम |’

मधुरिम स्वर लहरी में गाता,

चला जारहा कौन |

                                  चला जारहा मौन |


‘ईश्वर अल्लाह तेरे नाम

सबको सम्मति दे भगवान |’

हम सबको है एक्य बताता,

चला जारहा कौन |

                                   चला जारहा मौन…


ये तो अपने राष्ट्र पिता हैं,

ये तो अरे महात्मा गांधी |

ये तो विश्ववंद्य बापू हैं,

ये तो रे इस युग की आंधी |


ये तो कलियुग के मोहन हैं,

ये बच्चों के गांधी बावा |

ये भारत के लौह पुरुष हैं,

ये भारत के भाग्य विधाता |


पत्थर पर पदचिन्ह बनाता,

आज़ादी की राह दिखाता |

सारा जग है जिसके पीछे,

चला जारहा मौन |

                              चला जारहा कौन ||

गुरुवार, 25 सितंबर 2014

डा श्याम गुप्त के पद........हे माँ ! तेरे दर हम आये.....

                             ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...






हे माँ ! तेरे दर हम आये |

जनम जनम के पाप पुरातन, माँ के दर्श नसाए |

लाल चुनरिया ओढ़ के माता, तेरा रूप सुहाए |

जब जब बढी असुरता जग में माँ तू उसे मिटाए |

अनति अनीति अधर्म असुरता खप्पर रखे जलाए |

अधम अधर्मी अत्याचारी, असि की धार समाये |

आदि-शक्ति लीला पद बंदे, श्याम्’ सहज सुख पाए || 
 

बुधवार, 24 सितंबर 2014

श्याम स्मृति- दुर्गा देवी रहस्य ...डा श्याम गुप्त....

                     ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



श्याम स्मृति- दुर्गा देवी रहस्य ...
महादेवी की वन्दना करते हुए त्रिदेव----ब्रह्मा, विष्णु, महेश एवं ऋषि गण...
  
                           महादेवी दुर्गा  को तीन महा-शक्तियों --महाकाली, शक्ति की देवी...महालक्ष्मी ,धन-संमृद्धि की देवी तथा महासरस्वती, विद्या ज्ञान की देवी ....का  सम्मिलित अवतार कहा जाता है  |

          महादेवी दुर्गा समस्त दानवों, असुरों दुष्टों दुष्टता के विनाश का कारण बनती हैं...|  
      इस तथ्य का तात्विक अर्थ है कि जब जब समाज में फैले अनाचार, असुरता आदि के विनाश की आवश्यकता होती है तो वे सभी व्यक्ति विद्वान् जिनके पास धन बल है...शक्ति है एवं वुद्धि ज्ञान का बल है सभी को  समाज से बुराई को दूर करने हेतु संगठित होकर कार्य करना चाहिए |
          भगवान राम ने रावण पर विजय से पूर्व इसी महाशक्ति की आराधना की थी | इसका तत्वार्थ है कि सर्व-शक्तिमान भी जब तक प्रकृति -शक्ति से नहीं जुड़ते ..विजयश्री उन्हें प्राप्त नहीं होती |