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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

गुरुवार, 12 मई 2016

ईश्वर का जन्म कैसे व क्यों एवं उसका भविष्य ?—डा श्याम गुप्त....

                        ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


       ईश्वर का जन्म कैसे व क्यों एवं उसका भविष्य ?
         जितना ज्ञान प्राप्त करता हूँ उतनी ही जिज्ञासा और बढ़ती जाती है | मुझे स्वयं पर विश्वास है | इंसान पर और इंसानियत पर श्रद्धा भी है और विश्वास भी, ज्ञान पर भी और शास्त्रों पर भी, ईश्वर पर भी | परन्तु यह जिज्ञासा कि ' ईश्वर का जन्म की व क्यों ? मुझे अपने अज्ञान से प्रत्यक्ष करा देती है| अभी तक का मेरा अध्ययन, अनुभव और निष्कर्ष मुझे हमेशा और हर बार एक ही उत्तर देते हैं वह यह कि ' ईश्वर मानव मस्तिष्क की परिकल्पना है।'  यद्यपि इस विषय पर सभी के अपने-अपने, भिन्न-भिन्न उत्तर हो सकते हैं, अपने ज्ञान व अनुभव, श्रृद्धा व विश्वास के अनुसार, और यही बात हमें निरंतर अपने को अद्यतन, संशोधित और बेहतर करने को प्रेरित करती रहती हैं तथा निश्चित ही हमें एक-दूसरे से सीखने और समझने की राह प्रशस्त करती हैं | यद्यपि तर्कहीन विश्वास व अंध श्रृद्धा एवं केवल प्रत्यक्ष ज्ञान, भौतिक ज्ञान-विज्ञान, को ही सर्वोपरि मानना जैसी अवधारणाएं, इस प्रक्रिया को अवरोधित भी करती हैं |

        ईश्वर का जनक कौन है, इस विचार या उक्ति के सार्वजनिक प्रतिरूपण से प्रतिध्वनित होता है कि हमारी मान्यता है कि ईश्वर का कोई अस्तित्व नहीं है, लेकिन हम सर्वत्र ‘ईश्वर नाम की अवधारणा’ की एक वृहद् रूप में सर्वव्यापी उपस्थिति पाते हैं, इसलिए प्रश्न उठाते हैं कि ‘तो फिर इसका जन्म कैसे हुआ?’ इसके दो अभिप्रायः निकलते हैं---
(१). यह कि हम ईश्वर से संबंधित अपनी स्वयं की मान्यताओं और निष्कर्षों पर पूरी तरह सुनिश्चित व स्पष्ट नहीं हैं, कुछ उलझाव हैं, प्रश्न हैं, विभ्रम हैं जिनके कारण ईश्वर की अवधारणा पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाती।
(२). यह कि स्पष्ट मान्यताएं बना लेने के बावज़ूद हम इन मान्यताओं के लिए मजबूत आधार की तलाश में हैं और इन सबके बारे में विविध चर्चा-परिचर्चा एवं विभिन्न ज्ञानार्जन द्वारा इस अवधारणा पर अपने को अधिक सुनिश्चित करना चाहते हैं। अपने निष्कर्षों और मान्यताओं को पुष्ट करना चाहते हैं।

        इस सामान्य जिज्ञासा का एक सामान्य भौतिकवादी उत्तर हो सकता है, ईश्वर के अस्तित्व के नकार के साथ कि "ईश्वर की अवधारणा, मनुष्य के ऐतिहासिक विकास की परिस्थितियों की स्वाभाविक उपज है, जिस तरह की मनुष्य का मस्तिष्क भी इन्हीं की उपज है।"
         उपरोक्त कथन, `ईश्वर मानव मस्तिष्क की परिकल्पना है' से थोड़ा भिन्न अर्थ वाला है |  वाक्यांश `ईश्वर मानव मस्तिष्क की परिकल्पना है', जहां एक ओर ईश्वर के अस्तित्व के खिलाफ़ जाना चाह रहा है, वहीं यह उसकी मस्तिष्क की परिकल्पनाके सामान्यीकृत स्पष्टीकरण के लिए उस भाववादी प्रत्ययवादी ( idealistic ) विचारधारा या दर्शन को ही अपना आधार बना रहा है जिसकी  स्वाभाविक परिणति ईश्वर के अस्तित्व को ही प्रमाणित करती है, जो कि चेतना ( मानव मस्तिष्क ) को ही प्राथमिक और मूल मानती है। हम मानव मस्तिष्कयानि चेतना को अधिक महत्त्व दे रहे होते हैं, उसे मूल या प्राथमिक मान रहे होते हैं अर्थात-जिस तरह मानव परिवेश की वस्तुगतता मानव चेतना की पैदाइश है, उसी तरह इस ब्रह्मांड़ की वस्तुगतता के पीछे भी किसी चेतना, परम चेतना, ईश्वर जैसी किसी चेतना का हाथ अवश्य ही होगा।

         वहीं भौतिकवादी दर्शन की स्थापनाओं में - चेतना को द्वितीय तथा पदार्थ को प्राथमिक और मूल साबित करता है। यह स्पष्टता के साथ जाना जाता है कि मूल में, मनुष्य के ऐतिहासिक विकास की वे परिस्थितियां ही है जिनसे मनुष्य का मस्तिष्क और उसकी सभी अवधारणाएं जिनमें ईश्वर की अवधारणा भी शामिल है, विकसित हुई हैं। यह भौतिकवादी (materialistic) विचारों के आधार तक पहुँचने का मार्ग है |

ईश्वर की अवधारणा की व्यापक स्वीकार्यता —
         हम अपने चारों ओर की दुनिया में ईश्वर नाम की इस अवधारणा की सर्वव्यापी व सबको प्रभावित करती हुई उपस्थिति पाते हैं| अपने चारों ओर एक विशिष्ट पृष्ठभूमि, शिक्षा, सामाजिक परिवेश व अनुभव रखने वाले अधिकाँश को हम आस्तिक पाते हैं और वे ईश्वर के अस्तित्व के संबंध में कोई प्रश्न या द्वंद भी नहीं रखते, उनके लिये ईश्वर ठीक उसी तरह साफ-साफ मौजूद है जैसे सूर्य, तारे, समुद्र और आसमान | तो क्या इस प्रश्न को उठाने वालों में विचार प्रक्रिया सामान्य से हट कर है, क्यों ? जो एक व्यक्ति देख-समझ पाता है वह अन्य नहीं देख-समझ पाते और क्यों जिस तरह के अनुभवों की बात वे करते हैं, अन्य को नहीं मिलते, विचार प्रक्रियाओं में इतनी बड़ी भिन्नता क्यों है ?
आस्तिकता के आधार का आधार --
        मनुष्य सामान्यतः अपने जीवन एवं जीवन-यापन के लिए पूर्व-उपस्थित परिवेशीय सहज-रूपता, सहजवृत्ति के व्यवहार पर अवलंबित होता है और सभी चीज़ें जैसे चलना, बोलना, व्यवहार के तरीके आदि, अपने परिवेशगत लोगों से सीखता है। इन्हीं से वह आस्थाओं, परंपराओं, विचारों आदि को भी ग्रहण करता हैउसके पास अपना स्वयं का जन्मजात कुछ नहीं होता, इसी पृष्ठभूमि से प्राप्त यही व्यवहार-स्वरुप उसके अपने बन जाते हैं। सामान्यतः सभी अपने परिवेश के अनुकूलन में होते हैं, इसीलिए सामान्यतः सभी आस्तिक आधारों के साथ होते हैं।
       इसी अनुकूलन की प्रक्रिया के साथ-साथ एक और मानवीय प्रक्रिया चल रही होती है। व्यक्ति  अपने आसपास की चीज़ों के प्रति असीम जिज्ञासाओं से पूर्ण, हर वस्तु को जांचने-परखने, जानने-समझने की प्रक्रिया में होता है। बोलना प्रारंभ करते ही उसके सवाल परिवेश के माथे चढ़कर बोलने लगते हैं। सामान्यतः हर परंपरा पर, आस्था के हर आधारों पर सवाल उठाए जाते हैं, जो नवविचारों की संभावनाओं  के बीजरूप होती हैं | समान्यतः मनुष्य के इस जिज्ञासु स्वभाव को परिवेश की अपरिवर्तनीय निश्चित-धर्मिता की कठोरता से दबा दिया जाता है, या विविध समाधानों की श्रृंखलाओं से समाधित कर दिया जाता है और उसे अनुकूलित होने दिया जाता है। अर्थात परिवेश द्वारा आस्तिक नियमबद्ध प्रकार से तैयार किए जाते हैं।
         सामान्यतः तो पारिस्थितिक अनुकूलन ही किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व की पहचान बन जाता है। वह इसी अनुकूलन के साथ रहने और जीने का आदी हो जाता है, उसकी यह अनुकूलित विचार-प्रक्रिया इसी अनुकूलन के साथ सहजता अनुभव करती है। समान वैचारिक-व्यवहारिक लोगों के बीच एक सांमजस्यता पैदा करती है, आर्थिक और सामाजिक सम्बद्धता पैदा करती है| अतः वह अपने उठते हुए संशयों को दबाए रखने को बद्ध होजाता है, रूढ़ होता जाता है, और सामान्य सामूहिक चेतना के अनुरूप अपनी व्यवहार-सक्रियता को ढ़ाल लेता है और यह उसके वैयक्तिक अहम् का हिस्सा बन जाता है| तब वह इस अनुकूलनता के खिलाफ़ व्यक्त विचारों के प्रति अपनी तार्किकता व विशिष्ट अनुभवों द्वारा विविध एक पक्षीय अभिव्यक्तियों का संसार रचता है।

अधुनातन ज्ञान का प्रभाव व नव-विचारों की संभावनाएं--- आस्था व अनास्था के बीज, विभिन्न व्यक्तित्वों की उत्पत्ति  .....
        आज के आधुनिक हालात में मानव जाति के अधुनातन ज्ञान के साथ कदमताल बैठाने के लिए एक औपचारिक आधुनिक शिक्षा प्रणाली अस्तित्व में है। ( यद्यपि वस्तुतः यह हर युग में, युग संधि में होता है) | शिक्षा व धनार्जन हेतु वह बाहर निकलता है, परिवेश व्यापक बनता है, समाज की अन्य परिधियों में पहुंचता है। ये सब मिलकर उस पर अपना प्रभाव डालते हैं।
        ये सब बाहरी प्रभाव प्रायः मानव के आस्तिक-अनुकूलन में मदद ही करते हैं। प्रायः बाहरी समाज, शिक्षक सब इसी आस्तिक अनुकूलनता के साथ होते हैं। हाँ यह अवश्य होता है कि व्यक्ति के दिमाग़ में दो विभाग बन जाते है-- एक शिक्षा-विज्ञान को ऊपरी तरह रट-रटाकर अपने लिए रोजगार पाने के जरिए का और --दूसरा उसी पारंपरिक आस्तिक संस्कारों से समृद्ध जहां सभी के जैसा ही होना अधिक सहज और आसान व स्वाभाविक सा होता है।
       इस तरह की स्थिति में वैयक्तिक नव-विचारों की वे संभावनाएं उत्पन्न होती हैं जो व्यक्ति को अधिक अद्यतन और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से युक्त करने की राह पर ले जाएं। अतः  इन परिस्थितियों में ही आस्था या अनास्था के बीज मौजूद होते हैं, क्योंकि समाज में, परिवेश में, सभी तरह की धाराएं प्रवाहित हो रही होती हैं। कौन किससे अछूता रह जाए, और कौन कब किसके चपेट में आ जाए, यह उसकी विशिष्ट पारिस्थितिकी और संयोगों पर निर्भर करता है। सामान्यतः एक जैसी लगती परिस्थितियों के बीच भी कई विशिष्ट सक्रियताएं और प्रभाव पैदा होती हैं, वे सभी को एक जैसा नहीं रख पाती और भिन्न-भिन्न व्यक्तित्वों की उत्पत्ति होती हैं, आस्थावादी व अनास्थावादी आदि |

 ईश्वर की अवधारणा और इसके विकास का स्वरूप -

       हम जब कहते हैं, कि, "ईश्वर की अवधारणा, मनुष्य के ऐतिहासिक विकास की परिस्थितियों की स्वाभाविक उपज है, जिस तरह की मनुष्य का मस्तिष्क भी इन्हीं की उपज है। तो स्पष्ट होता है कि जैव विकास के सर्वोच्च स्तर पर खड़ा, प्रकृति से व जैविक शत्रुओं से अपनी रक्षा करने में अक्षम मानव का, यह मस्तिष्क ही था जो वह पूरी दुनिया पर छा गया और उसकी इन कोशिशों के फलस्वरूप उसका मस्तिष्क सतत विकसित होता गया | आज मानव, जैविक विकास-क्रम की उस शाखा के शिखर पर है जो अपने अस्तित्व के लिये अपने मस्तिष्क पर निर्भर है |
          मस्तिष्क निश्चित रूप से मनुष्य के ऐतिहासिक विकास की परिस्थितियों की स्वाभाविक उपज है और मानव का विकास मस्तिष्क के विकास का स्वाभाविक परिणाम | यही बात ईश्वर की अवधारणा के लिये भी कही जा सकती है जो मानव विकास क्रम में एक विशिष्ट काल में आयी |
      आदिकाल में मनुष्य प्राकृतिक नियमों से अनभिज्ञ था तथा अनेक प्रकार की प्राकृतिक विपत्तियों के फलस्वरूप सदैव असुरक्षित तथा भय के कारण मानव-समाज में ईश्वर का जन्म हुआ।
      ज्यां पॉल सार्त्र के अनुसार --ईश्वर का भाव मनुष्य के द्वारा आत्म-चेतना के विकास के क्रम में निर्मित भाव है। अपने अस्तित्व की चेतना में व्यक्ति अपने से इतर की उपस्थिति के मूल में जाने की चेष्टा करता है। इसी क्रम में वह ईश्वर भाव की सृष्टि कर लेता है।
      मनुष्य को वे पुराने दिन उसकी अंतःचेतना (सबकोन्श्यस माइंड) में याद थे जब वह पेड़ों पर रहता था, जब जिंदगी अधिक सरल थी, और जब तानाशाह सरदार उसके लिए हर निर्णय ले लेता था और उसकी रक्षा करता था। उसे केवल उसका आज्ञापालन करना होता था। इसी पुरानी परिस्थिति को मनोवैज्ञानिक धरातल पर बहाल करने के लिए मनुष्य ने ईश्वर की कल्पना कर ली और उसे सर्वशक्तिमान, सर्वाधिकार-संपन्न तानाशाह सरदार की भूमिका में उतार दिया |
        हबेर्ट स्पेंसर का मत है--सपनों, परछाइयों और प्रतिबिम्बों की व्याख्या के लिये आदिम मानव मे अपने शरीर से प्रथक आत्मा में मिथ्या विश्वास रचा और धारणा बनाई कि मनुष्य के दो भाग हैं। एक दृश्य शरीर है जो सदा परिवर्तित होता रहता है और दूसरी अदृश्य आत्मा है जो बदलती नहीं। इसके बाद यह विचार पनपा कि आत्मा का नित्य अस्तित्व है और उसे देवी-देवता और ईश्वर का नाम दिया है। उन देवी देवताओं और ईश्वर के ऊपर मानव का स्वभाव आरोप कर दिया।
         वर्तमान रूप में अस्तित्वमान ईश्वर की अवधारणा निश्चित ही विकास-क्रम में बहुत बाद की चीज़ है। भाषा व समाज के विकसित हो जाने के बाद सामाजिक संगठनों, संस्थाओं, व्यवस्थाओं, आदि का भी क्रमिक विकास हुआ है, ये भी सरल रूप से कठिनतर रूपों की ओर विकसित हुए | ईश्वर की भावना भी अलग अलग मानव समूहों में अलग अलग तरीके से आयी | यह समूहों के नेतृत्व का अपनी नाकामियों के लिये ठीकरा फोड़ने व अपने नेतृत्व को एक उचित कारण देने के लिये गढा मिथक था| अर्थात भगवान का अविष्कार हमने इसीलिए किया कि एक ऐसी शक्ति हो जिसके सिर पर हम सारी ज़िम्मेदारी डाल दें और उसके सामने बैठकर अपने सुख-दुख सुना सकें और उसकी कृपा के भागी बनें।
         जैसे-जैसे मानव समाज अधिक जटिल होता गया, ईश्वर की कल्पना भी विकसित होती गई और सारे ब्रह्मांड के निर्माता के रूप में ईश्वर को देखा जाने लगा। ईश्वर के लिए कुछ भी असंभव नहीं था, उसमें सभी शक्तियां थीं, वह सब जगह था। दरअसल बढ़ी थी स्वयं मनुष्य की शक्ति। मनुष्य प्रकृति पर अधिकाधिक विजय पाता जा रहा था, और प्रकृति की शक्ति को नाथने की कला सीखता जा रहा था। और जैसे-जैसे वह अधिक शक्तिमान बनता गया, और सब जगह फैलता गया, वह ईश्वर को भी अपने से कहीं अधिक शक्ति प्रदान करता गया, ताकि ईश्वर हमेशा उससे अधिक शक्तिशाली और अधिकार-संपन्न बना रहे, सब जगह व्याप्त रहे और इस तरह आजकल के सर्वज्ञ, सर्वव्यापी, असीम शक्तिवाले ईश्वर का आविर्भाव हुआ।
         एक अलौकिक शक्ति, परम चेतना, परम आत्मा, जिसने इस ब्रह्मांड़, दुनिया को रचा इसकी सारी विशेषताओं के साथ, सृष्टिकर्ता, पालनकर्ता, जिसके कि पास दुनिया के सारी चीज़ों का, उनके व्यवहारों और भाग्यों का परम नियंत्रण है। जिसे आराधना से खुश किया जाना चाहिए, उसकी कृपा के लिए प्रार्थना में रहना चाहिए। अब यह ईश्वर का सामान्यीकृत रूप हर समूह और इसके सांस्थानिक रूपों यानि धर्मों में वृहद् रूप में पृथक पृथक होते हुए भी लगभग सभी में समान रूप ही पाया जाता है|

       अतः निष्कर्षतः मानव-मस्तिष्क और उसके समस्त क्रियाकलाप अंततः इसी प्रक्रिया से गुजरे हैं, और इसीलिए मूलभूत रूप से जिस तरह मानव-मस्तिष्क, उसके विकास की ऐतिहासिक परिस्थितियों की उपज है | अतः अन्य विचारों या अवधारणाओं की तरह ही, ईश्वर की अवधारणा भी, एतिहासिक रूप में सतत विकसित हुए मानव मस्तिष्क और चेतना की पैदाइश ही है, जो कि अंततः उसके विकास की ऐतिहासिक परिस्थितियों की स्वाभाविक परिणति है।
          ईश्वर से संबंधित इन अवधारणाओं का एक समुचित क्रमिक-विकास संपन्न हुआ जो  विशिष्ट परिणति में मानव जाति को एक विशिष्ट जनक, आदम-ईव या मनु-शतरूपा के मिथकों और साथ ही सृष्टि की रचयिता किसी परम-चेतना की काल्पनिकता तक ले गई ।

ईश्वर के वर्तमान संस्थानिक रूप का विकास –
         बुद्धि उत्पादित स्वार्थ भावना के साथ, अपने अहम् भाव के सृजित होने के कारण, विनाश के संभावना की चिंता तथा कर्मों की असफलता की संभावना से उदिग्न होने के कारण नैतिकता की संभावना बनती है। उसके उपाय स्वरूप विविध कल्पनाओं द्वारा ईश्वर का उदय होता है।
         ईश्वर का रूप पहली कपोल कल्पना से अलौकिक तथा देवीय अस्तित्व कायम कर, मानव की स्वार्थपरता पर दण्ड की संभावना से नियंत्रण करता है। समाज विरोधी कर्मों पर अंकुश लगाने से समाज व्यवस्थित होता है। दूसरी कपोल कल्पना से आत्मा की अमरता के कारण, मृत्यु की आशंका से मुक्त होता है। तीसरी कपोल कल्पना से, सर्वशक्तिमान दयालु ईश्वर एवं उसकी आराधना के विधान से कठिनाई के समय सहायता द्वारा असफलता की आशंका से मुक्ति होती है।
        जीवन के लिए प्रकृति के साथ के सघर्षों, उसकी हारों, विवशताओं, अभिशप्तताओं ने प्रकृति में किसी अलंघ्यनीय चमत्कारी शक्तियों के वास की कल्पना, साथ ही उसकी बढ़ रही, प्रकृति की नियंत्रक क्षमताओं से उत्पन्न चेतना से, इनके भी नियंत्रण के लिए किये गये मानव के कर्मकांड़ी प्रयासों से, जादू-टोने-टोटकों की क्रियाविधियां विकसित हुईं। जातीय निरंतरता की चेतना ने पूर्वजों और उनके प्रति कृतज्ञता, पूजा-आदि की परंपराओं को विकसित किया, पूर्वजों की अवधारणाओं को अंतर्गुथित किया। मृतकों के साथ जीवित व्यक्तियों के साम्य और विरोधी तुलना ने, मानव में उपस्थित किसी चेतना या आत्मा के विचार तक पहुंचाया। और इन सबका अंतर्गुंथन अपने विकास-क्रम में अंततः परमचेतना, परमात्मा, ईश्वर की अवधारणाओं और धर्मों के वर्तमान संस्थानिक रूप तक विकसित हुआ।
      अंततः ईश्वर व धर्म दोनों की पृथक विशिष्टताओं और समाज को इनकी आवश्यकताओं ने इन्हें साथ साथ युक्त कर दिया। और राज्य और सत्ता के सुखों के एक निश्चित बंटवारे की जोड़-तोड में ये आपसी सहयोग की राह पर आए  | पुजारियों-ब्राह्मणों और क्षत्रियों की जुगलबंदी के नये रूप विकसित हुए। ईश्वर, धर्म और राज्य या शक्ति समूह सांस्थागत रूप में आपस में सम्बद्ध हो गये।
         अर्थात क्रमिक-विकास की प्रक्रिया में, सामान्यतः समान और व्यापक, ऐतिहासिक परिस्थितियों में उत्पन्न इन धर्म और ईश्वर संबंधी अवधारणाओं के क्रम विकास में, ऐसी परिस्थितियां भी उत्पन्न हुई कि कुछ व्यक्ति या समूह विशेष इसके कारण शनैः शनैः सामाजिक सोपानक्रम में ऊपर की स्थिति प्राप्त करते गए, और फिर इन्हीं व्यक्ति-समूह विशेषों ने अपनी इस स्थिति को बनाए रखने और निरंतर समाज में प्रभुत्व प्राप्त करने व उसे स्थायी बनाए रखने हेतु एक सचेतन उचित रूप ठहराने के लिए  षाडयंत्रिक रूप देने, मिथक गढ़ने, काल्पनिक-कथाएं, पुराणों की रचनाएं करने, अलौकिक और रहस्यमयी प्राकृतिक शक्तियों संबंधी सामान्य अवधारणाओं को ईश्वर संबंधी विशिष्ट रूप देने, ईश्वर और धर्म को सांस्थानिक रूप देने में अपनी एक विशिष्ट भूमिका निभाई। अर्थात कुछ विशिष्ट मस्तिष्कों ने इसे सचेतन रूप से गढ़ा, इसे विशिष्ट रूप दिया और फिर इसे योजनाबद्ध रूप से व्यापक बनाया।
           ऐसा होना भी सिर्फ़ इसलिए संभव नहीं हो गया कि यह केवल किसी विशिष्ट मस्तिष्क या चेतना की, या विशिष्ट समूहों के सचेतन प्रयासों से संपन्न हुआ हो, अपितु ऐसा होने के निश्चित भौतिक पूर्वाधार मौजूद थे। भौतिक-जीवनीय परिस्थितियां, चेतना और परिवेश के ज्ञान का स्तर, जीवनयापन हेतु उत्पादन प्रक्रिया और प्रणालियों का स्तर, प्रकृति के सामने असहायता और विवशता, जीवन के सामने प्रस्तुत ख़तरों से उत्पन्न भय, प्राकृतिक शक्तियों के बारे में उसका अज्ञान, उनसे बचने-निपटने, उन्हें अपने वश में नियंत्रित करने की महती आवश्यकता, आदि-आदि, ये सब आपस में अंतर्गुथित हैं जो इन अवधारणाओं के विकास के आधारों का पूर्व-निर्धारण करती हैं।
         चेतना को, जो मानव-मस्तिष्क की प्रक्रियाओं का विशिष्ट उत्पाद है, प्राथमिक समझना, उसे मूल कर्ता-कारण के रूप में स्थापित करना; अंततः अपनी तार्किक परिणति में उसी भाववादी विचारधारा तक पहुंचाता है, कि जिस तरह मनुष्य द्वारा सृजित परिवेश के पीछे उसकी चेतना मूलभूत है, उसी प्रकार पदार्थ और इस विश्व के सृजन के पीछे भी, किसी चेतना, परमचेतना का मूलभूत होना स्वाभाविक और आवश्यक हैयही तो ईश्वर की अवधारणाओं और उसके सांस्थागत रूपों का मूलाधार है।

ईश्वर की अवधारणा का भविष्य ---

            पृथ्वी पर उपस्थित प्राणियों में एकमात्र मानव ही तो है जिसने कुछ रचा-बनाया... और तभी से वह 'हर चीज को किसने बनाया-रचा ? 'यह सवाल भी पूछने लगा... अगर मानव कुछ रचना नहीं कर पाता तो शायद यह सवाल भी उसके पास नहीं होता... तो यह 'रचनाकार कौन, ईश्वर कौन?' सवाल मानव मस्तिष्क का केवल एक विशिष्ट सामयिक फितूर माना जा सकता है, परन्तु यह प्रश्न आदिकाल से ही प्रश्नांकित किया जा रहा है अत: इसे यूंही नहीं टाला जा सकता | हमें यह सोचना चाहिए कि अपनी रचना और उसके कर्ता के रूप में मनुष्य की स्वयं की उपस्थिति की, अर्थात  यह प्रश्न उसके विकास की ऐतिहासिक परिस्थितियों की एक स्वाभाविक परिणति सा लगता है |
             
        दार्शनिक रूप में ऐसा भी कहा जाता है कि पदार्थ मूलभूत है, उसके विकास की उच्चतर और जटिल अवस्थाओं में चेतना उत्पन्न और विकसित होती है। चेतना का विकास होने के बाद, यह अपने आगे के विकास क्रम में, स्वयं पदार्थ को नियंत्रित करने का प्रयास करती है।
        अर्थात अब एक द्वंद का रिश्ता बन जाता है। परिस्थितियों के प्रतिबिंबन से उनकी चेतना प्राप्त होती है, और यह चेतना अपने क्रम में अपने हितार्थ परिस्थितियों का नियमन तथा नियंत्रण करने की कोशिश करती है, परिस्थितियों को बदलने की कोशिश करती है। फिर परिस्थितियों में परिवर्तनों के प्राप्त परिणामों से पुनः चेतना समृद्ध होती है, परिस्थितियों में और अनुकूल परिवर्तनों को प्रेरित होती है, कोशिश करती है। यह प्रक्रिया अपने विकास-क्रम पर चल निकलती है और निरंतर विकसित और परिष्कृत होती रहती है।
     अधुनातन ज्ञान के प्रभाव से मानव की चेतना में नव-विचारों की संभावनाओं का उदय हुआ है जो सदैव हर युग में, युग संधि में होता है|  नव सम्भावनाओं में विचार व वस्तुएं हमेशा द्वंद में होती हैं, और उनके अंतर्विरोधों, संघर्षों और एकता में ही उनका नवीन व वस्तुगत ज्ञान प्राप्त होता है। इन सभी नवीन परिवर्तनों से निश्चित रूप से ईश्वर की अवधारणा में परिवर्तन हुऐ हैं और इसका क्रमिक विकास भी हो रहा है | यह भी हो सकता है कि क्रमिक विकास होते होते एक दिन मानव जाति इस ईश्वरीय अवधारणा को नकार भी दे |
         मानवजाति का अद्यनूतन दर्शन भी इसी निष्कर्ष तक पहुंचता है। वह इसे इस शब्दावली में कहता है कि, जिस तरह ईश्वर की अवधारणा एक निश्चित और विशिष्ट परिस्थितियों की उपज है, उसी तरह से विकास-क्रम में इन निश्चित और विशिष्ट परिस्थितियों का लोप होने पर, ईश्वर की अवधारणा स्वतः ही लुप्त हो जाएगी, इतिहास की चीज़ हो जाएगी। यह कई अन्य अवधारणाओं की तरह सिर्फ़ अध्ययन और आश्चर्य मिश्रित हास्यबोध का विषय रह जाएगी कि विकास-क्रम में मनुष्य का ज्ञान, एक समय में इन अवस्थाओं में था कि वह इस तरह के काल्पनिक समाधानों की दुनिया में विचरण किया करता था, और धर्म तथा ईश्वर की इन अवधारणाओं को अपने हितार्थ नाना-रूपों में पल्लवित कर कुछ व्यक्ति या समूह एक लंबे समय तक समाज में अपने-आप को प्रभुत्व प्राप्त स्थिति में बनाए रखने में सफल रहे थे।
----------जैसा कि कुछ आधुनिक विद्वानों का मत से प्रकट होता है ---
------आस्तिकता मानव एवं उसके जीवन को ईश्वर की असीम शक्ति के समक्ष तुच्छ एवं सारहीन सिद्ध करती रहती है, जबकि नास्तिकता मानव एवं उसकी चिंतनशक्ति की स्वतंत्रता एवं महत्ता को स्थापित करती है। .....ईश्वर एवं उसके अवतारों तथा दूतों की अन्धभक्ति से मुक्ति एवं तार्किक मानवीयता के जन्म का उत्सव मनायें।  महेश चन्द्र द्विवेदी- आलेख ईश्वर से मुक्ति का उत्सव से...
------रॉबर्ट ग्रीन इंगरसॉल का मत है, 'मेरा विश्वास है कि तब तक इस पृथ्वी पर स्वतंत्रता नहीं हो सकती, जब तक मनुष्य स्वर्ग में बैठे अत्याचारी शासक को पूजते रहेंगे।'
-------बीसवीं सदी के महानतम दार्शनिक बर्ट्रेंड रसेल का कथन है, 'एक उत्तम संसार के लिए ज्ञान, दयालुता एवं साहस की आवश्यकता होती है, इसके लिए अतीत के लिए अनावश्यक प्रलाप, अथवा बहुत पहले अल्पज्ञानी व्यक्तियों द्वारा कहे गए शब्दों में अपने सोच की स्वतंत्रता को बाँधे रखने की आवश्यकता नहीं है।' 
------दक्षिण भारत के समाज सुधारक गोरा --चूँकि आस्तिकता का आधार ही असत्य है, अत: वह असत्यनिष्ठ व्यक्तित्व को जन्म देती है। ऐसे व्यक्ति स्वर्ग की बात करेंगे और जनसाधारण को गंदगी एवं निर्धनता में संतुष्ट रहकर जीने देंगे | वे वैश्विक भाईचारे की बात करेंगे परंतु ईश्वर के नाम पर नरसंहार करेंगे, तथा वे संसार को भ्रम बताएँगे परंतु उसके प्रति गहरी आसक्ति रखेंगे।'
-------रामधारी सिंह दिनकरने --'भारतवर्ष में मुक्त चिंतन का मार्ग कई सौ वर्ष पहले ही अवरुद्ध हो चुका था। धर्म और समाज, दोनों में ही भारतवासी अपने शास्त्र को देखकर चलते थे। यूरोप की श्रेष्ठता का कारण केवल यही नहीं था कि उसके पास उन्नत शस्त्र थे, वरन यह भी था कि जीवन के प्रति उसका दृष्टिकोण प्रवृत्तिमार्गी था। वह जीवन से भागकर अपना सुख नहीं खोजता प्रत्युत उसके भीतर पैठकर उसका रस पाता था।

         परन्तु क्या ऐसा संभव है, शायद नहीं

        क्योंकि ईश्वर के होने का एक मूल कारण उसे  मनुष्य का अब तक न जान पाना है। जिस दिन मनुष्य ने ईश्वर को जान लिया, निःसंदेह उसी दिन या तो ईश्वर संसार से विलुप्त हो जायगा अथवा नास्तिकता।
      यदि ध्यान पूर्वक देखा जाय तो उपरोक्त सभी विद्वानों के ईश्वर विरुद्ध कथन संस्थागत ईश्वर या धार्मिक कांडों के विद्रूपता युक्त रूपों प्रति असंतोष से व्यक्त भाव हैं, ईश्वर की उपस्थिति के प्रति नहीं|  यदि हम ईश्वर की बुराई या उसके प्रति अविश्वास या नास्तिकता अथवा ईश्वर से मुक्ति का उत्सव मनाने की बात कहते हैं तो इसका अर्थ यह होता है कि हम ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास कर रहे होते हैं, क्योंकि उसे जान नहीं पाते अतः उसे मान नहीं पा रहे हैं |

       साथ ही साथ आस्तिकता के मूल स्थान भारत, भारतीय संस्कृति व वैदिक ईश्वरीय ज्ञान तो स्वयं ही इन सभी उपरोक्त कथनों का समर्थन करते हैं | अंधभक्ति, जीवन का पलायनवादी दृष्टिकोण, ऊपर स्वर्ग में बैठा अत्याचारी शासक विश्व के सर्वश्रेष्ठ व प्राचीनतम साहित्य वैदिक साहित्य में कहीं नहीं है | सोच की स्वतंत्रता, जीवन का कर्मवादी दृष्टिकोण इस आस्तिकवादी वैदिक साहित्य की रीढ़ हैं | अतः इन आधुनिक विद्वानों के ये सभी ईश्वर विरुद्ध कथन भारतीय वैदिक  संस्था पर सही नहीं ठहरते | जैसा कि ईशोपनिषद का कथन है –
विध्यान्चाविद्यां च यस्तद वेदोभय सह |
अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्यामृतमश्नुते ||.
------ विद्या ( ईश्वर का ज्ञान ) एवं अविद्या ( संसार का भौतिक ज्ञान ) दोनों को सामान रूप से ग्रहण करना चाहिए | भौतिक ज्ञान से मृत्यु/ कष्टों रूपी संसार सागर पार करते हैं, ईश्वरीय भाव से अमृत /मुक्ति रूपी सुख-शान्ति, आनंद |

       इसमें कोई संदेह नहीं कि ईश्वर एवं नरक के भय से मुक्त नास्तिक व्यक्ति घोर मानववादी हो सकता है तो घोर स्वार्थी भी। क्योंकि - 'ईश्वर पर अनास्था के उपरांत नास्तिकों के पास शारीरिक सुख, आत्महीनता अथवा परार्थ के मार्गों में कोई भी मार्ग अपनाने की स्वतंत्रता हो जाती है।'और आत्म-प्रवंचना व सुखाभिलाषा के रोक टोक का कोइ मार्ग नहीं होता | स्वयं ही सबका कर्ता मानने के कारण असफलताओं व विपरीत परिस्थितियों में स्वयं को ही दोषी मानने से असंतुष्टि, आत्म-ग्लानि युत आत्म-प्रवंचना हेतु असत्याचरण का मार्ग प्रशस्त होजाता है| नास्तिकता के संभावित दुष्परिणाम यही हैं |

        अस्तित्व मानव की प्राथमिकताओं में सर्वप्रथम है| आस्तिकता, सहयोग, सामूहिकता, सामाजिकता, ईश्वर-भय, धर्म व समाज भय के रूप में उसे अपनी चेतना में अपने अस्तित्व की सुरक्षा, अपनी कमजोरियों की ढाल के रूप में प्रयुक्त करने में सुविधा देती है | अपनी असफलताओं, निराशाओं, परिस्थियों को, जो उसके वश में नहीं होतीं, को मनोवैज्ञानिक ढंग से सुलझाने, ईश्वर पर छोड़कर आश्वस्त होजाने, स्वयं के आत्म-ग्लानि से बचने एवं पुनः अपने सामान्य रूप से कार्य में लग जाने को तैयार करती हैं| वह अपनी हार को परम आत्मा के परम नियंत्रणाधीन एक वृहद योजना का हिस्सा सा मान स्वयं को सांत्वना दे लेता है |

             यही ईश्वर के जन्म का कारण है, यही ईश्वर की महत्ता भी है, आवश्यकता भी एवं ईश्वर की अवधारणा की अनिवार्य स्वीकारिता भी और यही उसका भविष्य भी है |















 

सोमवार, 9 मई 2016

विवाह व सहजीवन-- डा श्याम गुप्त ...

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                                     विवाह व सहजीवन-- डा श्याम गुप्त
                           जीव मात्र की मूल प्रवृत्ति है स्व-जाति के जैविक सातत्य-क्रमिकता को बनाये रखना, ताकि उस प्रजाति का मूलोच्छेद न हो | मानव श्रेष्ठतम जीव होने के कारण जैविक के साथ साथ सांस्कृतिक–सामाजिक क्रमिकता को भी बनाए रखता है और उसका मूल है समाज-राष्ट्र-संस्कृति की सबसे छोटी इकाई परिवार | विवाह उसी इकाई की मूल संस्था या प्रथा है|
                        जहां तक सहजीवन, अर्थात बिना विवाह के साथ-साथ रहने की बात है, क्या इन तथाकथित अति-आधुनिक अल्ट्रा-माडर्न लोगों को अपनी पुत्रियों और बहनों और पुत्रों के अविवाहित कामाचार स्वीकार हैं ? क्या वे अपनी पत्नियों और अन्य पुरुष का सहजीवन स्वागत योग्य मानेंगे?
                      भारत में विवाह संस्था का अनुशासनात्मक विकास हुआ। यहां विवाह-संस्था स्थाई है। लेकिन अमरीका में विवाह संस्था समाप्त प्रायः है, वहां स्वाद की भाँति पत्नियां व पति बदले जाते हैं। अमरीका-यूरोप, भारत में आया, उस संस्कृति-प्रभावित कन्याएं अपना शरीर दिखाती हैं, देह सुंदर है, इसे दिखाने में गलत क्या है? इसी से अविवाहित सहजीवन का चलन बढ़ा। कई देशों में हाल ही में यौन सम्बंधों को वैध ठहराने वाला वक्तव्य दिया गया है। वह उनकी जीडीपी का महत्वपूर्ण भाग है | परन्तु ऐसा भोगवादी सहजीवन अंतत: विषादका कारण है।
                          ऐसे लोगों की दृष्टि में काम-सुख की सामाजिक मर्यादा रूढ़िवाद है और मुक्त यौन-सुख, आधुनिकता। स्वयं "कामसूत्र" के रचयिता आचार्य वात्स्यायन ने भी परस्त्री सहजीवन को गलत ठहराया है, उनका कथन है कि, "राजाओं, मंत्रियों, वरिष्ठों को उचित है कि वे परस्त्री गमन जैसे निन्दनीय कार्य में प्रवृत्त न हों।" तथा "पराई स्त्रियों से संबंध दोनों लोकों को नष्ट करता है।
                         सारी दुनिया के आदिम समाज स्वच्छंद थे। विवाह संस्था का विकास बाद में हुआ, तथापि भारत में ऋग्वैदिक काल में ही स्त्री-पुरुषों के लिए नियम थे | ऋग्वेद का यम-यमी प्रकरण सूक्त (10.10.1 से 14) इस सम्बन्ध में निश्चित नियम प्रस्तुत करता है---यम और यमी भाई-बहन थे। किसी विशिष्ट परिस्थिति में यमी ने यम से प्रेम सम्बंध की याचना की। यम ने ऐसी मित्रता से साफ इनकार किया –“न ते सखा सख्यम् वष्टि एतत् सऽलक्ष्मा यत् विषऽरूपा भवति।“ यम ने ऐसे सम्पर्क को अधम बताया। यही यम अनुशासक व आचरण मर्यादा के नीति-नियम निधारक हुए और ऐसे नियम-अनुशासन को यमानुशासन कहा गया|
भारत में श्वेतकेतु ने सर्वप्रथम विवाह की मर्यादा स्थापित की। पश्चिम में कोई ऋग्वेद नहीं उदित हुआ। कोई श्वेतकेतु नहीं हुआ। ऋग्वेदिक समाज स्त्री-पुरुष, संबंधों को लेकर सतर्क था | पत्नी रूपवती है पर अपना सौन्दर्य सिर्फ पति को दिखाती है। दूसरे लोग केवल वस्त्र देखते हैं या केवल वाणी सुनते हैं | ऋग्वेद 10.71.4 के सरस्वती सूक्त का मन्त्र है --
. उत त्वः पश्यन् न ददर्श वाचं, उत त्वः श्रृण्वन् न श्रृणोत्येनम् ।
उतो त्वस्मै तन्वं विसस्रे जायेव पत्य उषति सुवासाः ||

--- अर्थात-कोइ व्यक्ति सरस्वती ( विद्या या ज्ञान) को केवल शब्द से जानता है परन्तु देख (समझ) नहीं पाता, कोइ सुनता है परन्तु श्रोतस्थ( आत्मस्थ ) नहीं कर पाता| वह किसी विशिष्ट को ही अपने सौन्दर्य का वास्तविक ज्ञान-दर्शन कराती है जैसे रूपवती पत्नी अपना सौन्दर्य केवल अपने पति को दिखाती है| 

                       ऋग्वेदिक समाज पति-पत्नी के बीच प्रेम को लेकर भी सतर्क था। ऋग्वेद के सर्वप्रथम पूज्य देवता अग्नि, विवाह में पति-पत्नी का मन मिलाते हैं- दंपति समनसा कृणोपि अग्नि: (ऋग्वेद 5.3.2) विवाह संस्कार में अग्नि के सात फेरे की परम्परा इसी वजह से आयी।
 
                         संसार में दांपत्य जीवन में प्राय: एकपत्नीत्व ही सबसे अधिक प्रचलित है तथा अधिकांश समाजों में पुरुष की प्रधानता पाई जाती है। यूं परिवार के विभिन्न रूप, पुरुषप्रधान-पितृवंशीय, स्त्रीप्रधान-मातृ-वंशीय, बहुपत्नीत्वसमाज, बहुपतित्व समाज आदि भी पाए जाते हैं|
                     विवाह शब्द का प्रयोग मुख्य रूप से दो अर्थों में होता है। पहला अर्थ वह क्रिया, संस्कार, विधि या पद्धति है जिससे पति-पत्नी के स्थायी संबंध का निर्माण होता है। समाज द्वारा स्वीकार की गई- 'परिवार की स्थापना करने वाली कोई भी पद्धति' |
                      विवाह का दूसरा अर्थ समाज में प्रचलित एवं स्वीकृत विधियों द्वारा स्थापित किया जाने वाला दांपत्य संबंध और पारिवारिक जीवन, जहाँ एक ओर समाज स्त्री-पुरुष (पति-पत्नी) को कामसुख के उपभोग का अधिकार देता है, वहीं दूसरी ओर पति को पत्नी तथा संतान के पालन एवं भरणपोषण के लिए बाध्य करता है। 'पति' का अर्थ है पालन करने वाला-भरतार तथा 'भार्या' का अर्थ है भरणपोषण की जाने योग्य नारी। विवाह समाज में नवजात प्राणियों--संतान की स्थिति का निर्धारण करता है|
                      विवाह का उद्गम- मानव समाज की आदिम अवस्था में विवाह का कोई बंधन नहीं था, सब नर-नारियों को यथेच्छ कामसुख का अधिकार था। विवाह की कोई प्रथा न थी, स्त्री पुरुषों को यौन संबंध की पूरी स्वतंत्रता थी। चीन, मिस्र और यूनान के प्राचीन साहित्य में कुछ ऐसे उल्लेख मिलते हैं जिनके आधार पर पश्चिमी विद्वान विवाह की आदिम दशा कामचार की अवस्था मानते हैं जो बाद में बहुपत्नी प्रथा में विकसित हुई और अंत में एक ही नारी के साथ पाणिग्रहण करने का नियम प्रचलित हुआ। परन्तु भारत में बहुभार्यता सदैव नारी की स्वयं की इच्छा, नारी के भरणपोषण की सदिच्छा, राजनीतिक आवश्यकता एवं विशिष्ट स्थितियों से जुड़ा रहा है |
                  विवाह की संस्था मानव समाज में जैवशास्त्रीय आवश्यकताओं से उत्पन्न हुई है। इसका मूल कारण अपनी जाति को सुरक्षित बनाए रखने की चिंता है। यदि पुरुष यौन संबंध के बाद पृथक हो जाए, गर्भावस्था में पत्नी की देखभाल न की जाए, संतान उत्पन्न होने पर उसके समर्थ एवं बड़ा होने तक उसका पोषण न किया जाए तो मानव जाति का अवश्यमेव उन्मूलन हो जाएगा। अत: आत्मसंरक्षण की दृष्टि से विवाह की संस्था की उत्पत्ति हुई है। यह संस्था मनुष्य के पूर्वज समझे जाने वाले गोरिल्ला, चिंपाजी आदि में भी पाई जाती हैं वे प्रायः एक ही नर/मादा के साथ सारा जीवन व्यतीत करते हैं।
                        मानव समाज के विकास के एक स्थल पर, जब संतान की आवश्यकता के साथ उसकी सुरक्षा की आवश्यकता हुई एवं यौन मर्यादा न होने से आचरणों के बुरे व विपरीत व्यक्तिगत व सामाजिक परिणाम हुए तो श्वेतकेतु ने सर्वप्रथम विवाह संस्था रूपी मर्यादा स्थापित की ताकि प्राकृतिक काम संवेग की व्यक्तिगत संतुष्टि के साथ साथ स्त्री-पुरुष के आपसी सौहार्दिक सम्बन्ध एवं सामाजिक समन्वयता भी बने रहे | यजु.१०/४५ में कथन है—
एतावानेन पुरुषो यजात्मा प्रतीति।
विप्राः प्राहुस्तथा चैतद्यो भर्ता सांस्म्रतांगना ॥“

--------अर्थात पुरुष भी स्वयं अकेला पुरुष नहीं बनता अपितु पत्नी व संतान मिलकर ही पूर्ण पुरुष बनता है। स्त्री के लिए भी यही सत्य है | अतः दाम्पत्य-भाव ही पुरुष को भी संपूर्ण करता है, स्त्री को भी |


                  विवाह संस्था का सतत् विकास हुआ है। श्वेतकेतु ऋग्वैदिककाल की विवाह संस्था को मजबूत करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता थे। श्वेतकेतु के पिता उद्दालक प्रख्यात दर्शनशास्त्री ऋषि थे। श्वेतकेतु ने नियम बनाया कि जो स्त्री पति को छोड़ दूसरे से मिलेगी उसे भ्रूणहत्या का पाप लगेगा और जो पुरुष अपनी स्त्री को छोड़ दूसरी से सम्पर्क करेगा उस पर भी वैसा ही कठोर पाप होगा। भारत में यही परम्परा है।
विवाह सामाजिक अनुष्ठान है। सिर्फ कन्या के पिता ही कन्या का हाथ वर को नहीं सौंपते, बल्कि संपूर्ण समाज भी कन्यादान में हिस्सा लेता है। वर कहता है, "हे वधु, सौभाग्यवृद्धि के लिए मैं तेरा हाथ ग्रहण करता हूं। भग, अर्यमा, सविता और पूषन देवों ने गृहस्थ धर्म के लिए तुझे प्रदान किया। तुम वृद्धावस्था तक मेरे साथ रहो।" फिर अग्नि से प्रार्थना है- "हे अग्नि आप सुसन्तति प्रदान करें।" फिर इन्द्र से प्रार्थना है- "हे इन्द्र, इसे सौभाग्यशाली बनायें।
              ऋग्वेद के एक मंत्र का आशीष बड़ा प्यारा है- हे वधु ! तुम सास, ससुर, ननद, देवर समस्त परिवार की साम्राज्ञी बनो ----
"सम्राज्ञी श्वसुरे भव, सम्राज्ञी श्वसुरामं भव।
सम्राज्ञी ननन्दारिं ,सम्राज्ञी अधिदेव्रषु ॥ "


                       हमारे शास्त्रों ने चयन का अंतिम अधिकार कन्या को ही दिया है। वैदिक रीति के अनुसार आदर्श विवाह में परिजनों के सामने अग्नि को अपना साक्षी मानते हुए सात फेरे लिए जाते हैं। इसे सप्तपदी कहते हैं| प्रारंभ में कन्या आगे और वर पीछे चलता है| विवाह की पूर्णता सप्तपदी के पश्चात तभी मानी जाती है जब वर के साथ सात कदम चलकर कन्या अपनी स्वीकृति दे देती है| वामा बनने से पूर्व कन्या द्वारा वर से यज्ञ, दान में उसकी सहमति, आजीवन भरण-पोषण, धन की सुरक्षा, संपत्ति ख़रीदने में सम्मति, समयानुकूल व्यवस्था तथा सखी-सहेलियों में अपमानित न करने के सात वचन भराए जाते हैं। इसी प्रकार कन्या भी पत्नी के रूप में अपने दायित्वों को पूरा करने के लिए सात वचन भरती है।
                      सप्तपदी में पहला पग भोजन व्यवस्था के लिए, दूसरा शक्ति संचय, आहार तथा संयम के लिए, तीसरा धन की प्रबंध व्यवस्था हेतु, चौथा आत्मिक सुख के लिए, पाँचवाँ पशुधन संपदा हेतु, छटा सभी ऋतुओं में उचित रहन-सहन के लिए तथा अंतिम सातवें पग में कन्या अपने पति का अनुगमन करते हुए सदैव साथ चलने का वचन लेती है तथा सहर्ष जीवन पर्यंत पति के प्रत्येक कार्य में सहयोग देने की प्रतिज्ञा करती है।
सात वचनों के महत्व को यदि समझ लिया जाये तो दाम्पत्य सम्बन्धों में उत्पन अनेक समस्यायों का समाधान स्वत: ही हो जाएगा...
तीर्थव्रतोद्यापन यज्ञकर्म मया सहैव प्रियवयं कुर्या:
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति वाक्यं प्रथमं कुमारी!...१...

----कन्या वर से कहती है कि यदि आप कभी तीर्थयात्रा को जाओ तो मुझे भी अपने संग लेकर जाना| कोई व्रत-उपवास अथवा अन्य धर्म कार्य आप करें तो आज की भांति ही मुझे अपने वाम
भाग में अवश्य स्थान दें| यदि आप स्वीकार करते हैं तो मुझे वामांग में आना स्वीकार है |
---- धार्मिक कृ्त्यों की पूर्णता हेतु पति के साथ पत्नि का होना अनिवार्य है| जिस धर्मानुष्ठान को पति-पत्नि मिल कर करते हैं, वही सुखद फलदायक होता है| पत्नि द्वारा इस वचन के माध्यम से धार्मिक कार्यों में पत्नि की सहभागिता, उसके महत्व को स्पष्ट किया गया है|
पुज्यौ यथा स्वौ पितरौ ममापि तथेशभक्तो निजकर्म कुर्या:
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं द्वितीयम !!...२...

----कन्या वर से दूसरा वचन मांगती है कि जिस प्रकार आप अपने माता-पिता का सम्मान करते हैं, उसी प्रकार मेरे माता-पिता का भी सम्मान करें तथा कुटुम्ब की मर्यादा के अनुसार धर्मानुष्ठान करते हुए ईश्वर भक्त बने रहें तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ |
------इस वचन के द्वारा समाज व कन्या की दूरदृ्ष्टि का आभास होता है| आजकल गृ्हस्थी में किसी भी प्रकार के आपसी वाद-विवाद होने पर पति/पत्नी अपने पत्नि/पति के परिवार से या तो सम्बंध कम कर देता है अथवा समाप्त कर देते हैं|
जीवनम अवस्थात्रये मम पालनां कुर्यात
वामांगंयामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं तृ्तीयं !!...३..

तीसरे बचन में कन्या कहती है कि यदि आप जीवन की तीनों अवस्थाओं (युवावस्था, प्रौढावस्था, वृ्द्धावस्था) में मेरा पालन करते रहेंगें, तो ही मैं आपके वामांग में आने को तैयार हूँ |
कुटुम्बसंपालनसर्वकार्य कर्तु प्रतिज्ञां यदि कातं कुर्या:
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं चतुर्थं !!...४...

कन्या चौथा वचन ये माँगती है कि अब तक आप घर-परिवार की चिन्ता से पूर्णत: मुक्त थे| अब जबकि आप विवाह बंधन में बँधने जा रहे हैं तो भविष्य में परिवार की समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति का दायित्व आपका है| यदि आप इस भार को वहन करने की प्रतिज्ञा करें तो ही मैं आपके वामांग में आ सकती हूँ |
--------इस वचन में कन्या वर को भविष्य में उसके उतरदायित्वों के प्रति ध्यान आकृ्ष्ट करती हैं| विवाह पश्चात कुटुम्ब पोषण हेतु पर्याप्त धन की आवश्यकता होती है| अब यदि पति पूरी तरह से धन के विषय में पिता पर ही आश्रित रहे तो ऎसी स्थिति में गृ्हस्थी कैसे चल पाएगी| इसलिए कन्या चाहती है कि पति पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर होकर आर्थिक रूप से परिवारिक आवश्यकताओं की पूर्ती में सक्षम हो सके| यहाँ यह भी स्पष्ट किया गया है कि पुत्र का विवाह तभी करना चाहिए जब वो अपने पैरों पर खडा हो पर्याप्त मात्रा में धनार्जन करने लगे |
स्वसद्यकार्ये व्यवहारकर्मण्ये व्यये मामापि मन्त्रयेथा
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वच: पंचमत्र कन्या !!....५...

इस वचन में कन्या जो कहती है वह आज के परिपेक्ष में अत्यंत महत्व रखता है, कि अपने घर के कार्यों में, विवाहादि, लेन-देन अथवा अन्य किसी हेतु खर्च करते समय यदि आप मेरी भी मन्त्रणा लिया करें तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ|
--------यह वचन पूरी तरह से पत्नि के अधिकारों को रेखांकित करता है| बहुत से व्यक्ति किसी भी प्रकार के कार्य में पत्नि से सलाह करना आवश्यक नहीं समझते| यदि किसी भी कार्य को करने से पूर्व पत्नि से मंत्रणा कर ली जाए तो इससे पत्नि का सम्मान तो बढता ही है, साथ साथ अपने अधिकारों के प्रति संतुष्टि का भी आभास होता है|
न मेपमानमं सविधे सखीनां द्यूतं न वा दुर्व्यसनं भंजश्चेत
वामाम्गमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं च षष्ठम!!...६...

कन्या कहती है कि यदि मैं अपनी सखियों अथवा अन्य स्त्रियों के बीच बैठी हूँ तब आप वहाँ सबके सम्मुख किसी भी कारण से मेरा अपमान नहीं करेंगें| यदि आप जुआ अथवा अन्य किसी भी प्रकार के दुर्व्यसन से अपने आप को दूर रखें तो ही मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ|
--------वर्तमान परिपेक्ष्य में इस वचन में गम्भीर अर्थ समाहित हैं| विवाह पश्चात कुछ पुरूषों का व्यवहार बदलने लगता है. वे जरा जरा सी बात पर सबके सामने पत्नि को डाँट-डपट देते हैं| ऎसे
व्यवहार से बेचारी पत्नि का मन कितना आहत होता होगा| यहाँ पत्नि चाहती है कि बेशक एकांत में पति उसे जैसा चाहे डांटे किन्तु सबके सामने उसके सम्मान की रक्षा की जाए, साथ ही वो किन्ही दुर्वसनों में फँसकर अपने गृ्हस्थ जीवन को नष्ट न कर ले|
परस्त्रियं मातृ्समां समीक्ष्य स्नेहं सदा चेन्मयि कान्त कुर्या
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वच: सप्तममत्र कन्या !!...७..

अन्तिम वचन के रूप में कन्या ये वर मांगती है कि आप पराई स्त्रियों को माता के समान समझेंगें और पति-पत्नि के आपसी प्रेम के मध्य अन्य किसी को भागीदार न बनाएंगें | यदि आप यह वचन मुझे दें तो ही मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ |
--------विवाह पश्चात यदि व्यक्ति किसी बाह्य स्त्री के आकर्षण में बँध पगभ्रष्ट हो जाए तो उसकी परिणिति क्या होती है, ये सभी भली भान्ति जानते हैं, इसलिए इस वचन के माध्यम से कन्या अपने भविष्य को सुरक्षित रखने का प्रयास करती है|
                         इस प्रकार विवाह के इस सर्वश्रेष्ठ रूप में, ईश्वर को साक्षी मानकर किए गए सप्त संकल्प रूपी स्तम्भों पर सुखी गृ्हस्थ जीवन का भार टिका हुआ है, वशर्ते कि आज के निष्ठाहीनता के युग में स्त्री-पुरुष दोनों ही इनका निर्वाह करें तो |
विवाह के विभिन्न पक्ष --- वैयक्तिक दृष्टि से विवाह पति-पत्नी की मैत्री और साझेदारी है। दोनों के सुख, विकास और पूर्णता के लिए आवश्यक सेवा, सहयोग, प्रेम और स्वार्थत्याग के अनेक गुणों की शिक्षा वैवाहिक जीवन से मिलती है। नर-नारी की अनेक आकांक्षाएँ विवाह एवं संतान प्राप्ति द्वारा पूर्ण होती हैं। उन्हें यह संतोष होता है कि उनके न रहने पर भी संतान उनका नाम और कुल की परंपरा अक्षुण्ण रखेगी, उनकी संपत्ति की उत्तराधिकारिणी बनेगी तथा वृद्धावस्था में उन्हें अवलंब देगी। हिंदू समाज में वैदिक युग से यह विश्वास प्रचलित है कि पत्नी मनुष्य का आधा अंश है, मनुष्य तब तक अधूरा रहता है, जब तक वह पत्नी प्राप्त करके संतान नहीं उत्पन्न कर लेता । पुरुष, प्रकृति के बिना और शिव, शक्ति के बिना अधूरा है।
                 धार्मिक दृष्टि से विवाह एक धार्मिक संबंध है। प्राचीन यूनान, रोम, भारत आदि सभी सभ्य देशों में विवाह को धार्मिक बंधन एवं कर्तव्य समझा जाता था। यज्ञ या कोइ भी धार्मिक अनुष्ठान पत्नी के बिना पूर्ण नहीं हो सकता | पितरों की आत्माओं का उद्धार पुत्रों के पिंडदान और तर्पण से ही होता है, इस धार्मिक विश्वास के कारण भी विवाह हिंदू समाज में धार्मिक कर्तव्य है। रोमनों का विश्वास था कि परलोक के मृत पूर्वजों का सुखी रहने हेतु उनका मृतक संस्कार यथाविधि होना तथा अपने वंशजों की प्रार्थनाएँ, भोज और भेंटें यथासमय मिलती रहने चाहिए| यहूदियों के अनुसार विवाह से बचने वाला व्यक्ति हत्यारे जैसा अपराधी माना जाता था। अधिकांश समाजों में विवाह की विधि एक धार्मिक संस्कार मानी जाती रही है। औद्योगिक क्रांति से उत्पन्न होने वाले परिवर्तनों से तथा धार्मिक विश्वासों में आस्था शिथिल होने से विवाह के धार्मिक पक्ष का महत्व कम होने लगा है।
               आर्थिक पक्ष के अनुसार प्रसूति के समय में तथा उसके बाद कुछ काल तक कार्यसक्षम न होने के कारण पत्नी को पति के अवलंब की आवश्यकता होती है, इस कारण दोनों में श्रम-विभाजन होता है, पत्नी बच्चों के लालन पालन और घर के काम को सँभालती है और पति पत्नी तथा संतान के भरणपोषण का दायित्व लेता है। नव-युग, औद्योगिक युग के कारण स्त्रियाँ आर्थिक दृष्टि से स्वावलंबी हो गईं, इससे पति-पत्नी, परिवार की स्थिति में कुछ अंतर आने लगा है। फिर भी, पत्नी और बच्चों के पालनपोषण के आर्थिक व्यय को वहन करने का उत्तरदायित्व अभी तक प्रधान रूप से पति का माना जाता है। पति द्वारा उपार्जित धन पर उसकी पत्नी और वैध पुत्रों का ही अधिकार स्वीकार किया जाता है।
                 विधिक दृष्टि से विवाह का एक क़ानूनी पक्ष भी है। परिणय सहवास मात्र नहीं है। किसी भी मानव समाज में नर-नारी को उस समय तक दांपत्य जीवन बिताने और संतान उत्पन्न करने का अधिकार व स्वीकृति धार्मिक कर्मकांड अथवा क़ानून द्वारा निश्चित विधियों को पूरा करने से तथा विवाह से उत्पन्न होने वाले दायित्वों को स्वीकार करने से प्राप्त होती है। अनेक आधुनिक समाजों में विवाह को वर-वधू की सहमति से होने वाला विशुद्ध क़ानूनी अनुबंध समझा जाता है। किंतु यह अनुबंध अन्य अनुबंधों या संविदाओं से भिन्न है, जिनमें अनुबंध करने वाले व्यक्ति इसकी शर्तें तय करते हैं, किंतु विवाह के कर्तव्य और दायित्व वर-वधू की इच्छा पर अवलंबित नहीं हैं; वे समाज की रूढ़ि, परंपरा और क़ानून द्वारा निश्चित होते हैं।
                सामाजिक दृष्टि के अनुसार विवाह का सामाजिक व नैतिक पक्ष भी महत्त्वपूर्ण है। विवाह से उत्पन्न होने वाली संतति परिवार में रहते हुए ही समुचित विकास और प्रशिक्षण प्राप्त करके समाज का उपयोगी अंग बनती है, बालक को किसी समाज के आदर्शों के अनुरूप ढालने का तथा उसके चरित्र निर्माण का प्रधान साधन परिवार है। यद्यपि आजकल शिशु-शालाएँ, बालोद्यान, स्कूल और राज्य बच्चों के पालन, शिक्षण और सामाजीकरण के कुछ कार्य अपने ऊपर ले रहे हैं, तथापि निश्चय ही बालक का समुचित विकास परिवार में ही संभव है। प्रत्येक समाज विवाह द्वारा मनुष्य की उद्दाम एवं उच्छंखल यौन भावनाओं पर अंकुश लगाकर उसे नियंत्रित करता है और समाज में नैतिकता की रक्षा करता है।
                       विवाह विच्छेद के सम्बन्ध में मानव समाज के विभिन्न भागों में बड़ा वैविध्य है। जिन समाजों में विवाह को धार्मिक संस्कार माना जाता है, उनमें प्राय: विवाह अविच्छेद्य संबंध माना जाता है यथा हिंदू एवं रोमन कैथोलिक ईसाई समाज | किंतु विवाह विच्छेद या तलाक के नियमों के संबंध में अत्यधिक भिन्नता होने पर भी कुछ मौलिक सिद्धांतों में समानता है। विवाह मुख्य रूप से संतानप्राप्ति एवं दांपत्य संबंध के लिए किया जाता है, किंतु यदि किसी विवाह में ये प्राप्त न हों तो दांपत्य जीवन को नारकीय या विफल बनाने की अपेक्षा विवाह विच्छेद की अनुमति दी जानी चाहिए। इस व्यवस्था का दुरुपयोग न हो, इस दृष्टि से तलाक का अधिकार अनेक प्रतिबंधों के साथ विशेष अवस्था में ही दिया जाता है।
                       हिंदू विवाह अधिनियम 1955 में भी इसको इसी रूप में बनाए रखने की चेष्टा की गई है। परन्तु विशेष परिस्थितियों के उत्पन्न होने पर, इस अधिनियम के अंतर्गत वैवाहिक संबंध विघटित किया जा सकता है।
                  विवाह-प्रथा के भविष्य व उस की समाप्ति की तथा राज्य द्वारा बच्चों के पालन की कल्पना समय समय पर होती रही है | वर्तमान में औद्योगिक एवं वैज्ञानिक परिवर्तनों से तथा पश्चिमी देशों में तलाकों की बढ़ती हुई भयावह संख्या के आधार पर विवाह की संस्था के लोप की भविष्यवाणी होरही है | विवाह के परंपरागत स्वरूपों में बड़े परिवर्तन आ रहे हैं। स्त्रियाँ आर्थिक दृष्टि से स्वावलंबी बन रही हैं। पहले उनके सुखमय जीवनयापन का एकमात्र साधन विवाह था, अब ऐसी स्थिति नहीं रही। धर्म के प्रति आस्था में शिथिलता और गर्भनिरोध के साधनों के आविष्कार ने विवाह विषयक पुरानी मान्यताओं को, प्राग्वैवाहिक सतीत्व और पवित्रता को गहरा धक्का पहुंचाया है।
                      किंतु ये सब परिवर्तन होते हुए भी भविष्य में विवाह प्रथा के बने रहने का प्रबल कारण है कि इससे कुछ ऐसे प्रयोजन पूरे होते हैं, जो किसी अन्य साधन या संस्था से नहीं हो सकते अर्थात वंश वृद्धि, संतान का पालन, सच्चे दांपत्य प्रेम और सुख प्राप्ति । यद्यपि विज्ञान ने कृत्रिम गर्भाधान का आविष्कार किया है किंतु कृत्रिम रूप से शिशुओं का प्रयोगशालाओं में उत्पादन और विकास संभव प्रतीत नहीं होता। राज्य और समाज शिशुशालाओं और बालोद्यानों का कितना ही विकास कर ले, उनमें इनके सर्वांगीण समुचित विकास की वैसी व्यवस्था संभव नहीं, जैसी परिवार में होती है। सहजीवन से भी दाम्पत्य प्रेम व सच्चा सुख संभव नहीं है अतः भविष्य में विवाह एक महत्त्वपूर्ण संस्था बनी रहेगी, भले ही उसमें कुछ न कुछ परिवर्तन होते रहें।

म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

रविवार, 8 मई 2016

मातृ दिवस पर -----माँ महात्म्य ....डा श्याम गुप्त....

                             ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

                                           

                            
मातृ दिवस पर -----माँ महात्म्य ....



माँ वंदना


माँ लिखती तो सब कुछ तुम हो,
नाम मुझे ही दे देती हो |
आप लिखाती लेकिन जग को,
लिखा श्याम ने कह देती हो |


अंतस में जो भाव उठे हैं,
सब कुछ माँ तेरी संरचना |
किन्तु जगत को तुमने बताया,
यह कवि के भावों की रचना |

तेरे नर्तन से रचना में,
अलंकर रस छंद बरसते |
कहला देती जग से, कवि के-
अंतस में रस छंद सरसते |

हाथ पकड़कर माँ लिखवाया,
अक्षर अक्षर शब्द शब्द को |
शब्दों का भण्डार बताया,
माँ तुमने मुझसे निशब्द को |

मातु शारदे! वीणा पाणी !
सरस्वती, भारति, कल्याणी!
मतिदा माँ कलहंस विराजनि,
ह्रदय बसें वाणी ब्रह्माणी |

हो मयूर सा विविध रंग के,
छंद, भाव रस युत यह तन मन |
गतिमय नीर औ क्षीर विवेकी,
हंस बने माता मेरा मन |

लिखदो माँ वर रूपी मसि से,
अपनी कृपा-भक्ति इस मन में |
जब जब सुमिरूँ माँ बस जाओ,
कागज़ कलम रूप धर मन में |

ज्ञान तुम्हीं भरती रचना में,
पर अज्ञानी श्याम हे माता !
तेरी कृपा-भक्ति के कारण,
बस कवि की संज्ञा पा जाता ||




माँ -महात्म्य....


जितने भी पदनाम सात्विक, उनके पीछे मा होता है |
चाहे धर्मात्मा, महात्मा, आत्मा हो अथवा परमात्मा |

जो महान सत्कार्य जगत के, उनके पीछे माँ होती है |
चाहे हो वह माँ कौशल्या, जीजाबाई या जसुमति माँ |

पूर्ण शब्द माँ ,पूर्ण ग्रन्थ माँ, शिशु वाणी का प्रथम शब्द माँ |
जीवन की हर एक सफलता, की पहली सीढी होती माँ |

माँ अनुपम है वह असीम है, क्षमा दया श्रृद्धा का सागर |
कभी नहीं रीती होपाती, माँ की ममता रूपी गागर |

माँ मानव की प्रथम गुरू है,सभी सृजन का मूलतंत्र माँ |
विस्मृत ब्रह्मा की स्फुरणा, वाणी रूपी मूलमन्त्र माँ |

सीमित तुच्छ बुद्धि यह कैसे, कर पाए माँ का गुणगान |
श्याम करें पद वंदन, माँ ही करती वाणी बुद्धि प्रदान ||



शनिवार, 7 मई 2016

वर्ण और जाति---डा श्याम गुप्त

                              ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
 


                      वर्ण और जाति---
       प्राचीन हिंदू वर्ण व्यवस्था में लोगों को उनके द्वारा किये जाने वाले कार्य के अनुसार अलग-अलग वर्गों में रखा गया था। पूजा-पाठ व अध्ययन-अध्यापन आदि कार्यो को करने वाले ब्राह्मण | शासन-व्यवस्था तथा युद्ध कार्यों में संलग्न वर्ग क्षत्रिय | व्यापार आदि कार्यों को करने वाले वैश्य एवं श्रमकार्य व अन्य वर्गों के लिए सेवा करने वाले 'शूद्र कहे जाते थे।
       भारतीय ज्ञान व सामाजिक सिद्धांतों के प्राचीनतम ग्रन्थ वेदों तथा गीता में वर्ण शब्द का उल्लेख मिलता है लेकिन जाति का नहीं। वर्ण शब्द का अर्थ, वर्ण के प्रचलित अर्थों में रंग का प्रतीक है। वर्ण  शब्द का प्राचीनतम उल्लेख यजुर्वेद के ३१वें अध्याय में मिलता है |
     इन ग्रंथों में वर्णित समाज के ये चार वर्ण मनुष्यों की प्रकृति (स्वभाव या विवेक) के तीन गुणों के मिश्रण से बना था - सत, रज और तम आज वर्ण  और जाति  को एक ही व्यवस्था स्वभाव समझ लिया जाता है, लेकिन जाति  अपेक्षाकृत नया विचार है। आधुनिक काल में इसी वर्ण व्यवस्था को जाति, वंश,कुल  या जादि, कुलम आदि  कहते हैं। सिर्फ जन्म के आधार पर निर्धारित हो जाने के कारण इसे कालान्तर में जाति कहा जाने लगा|
     जाति (या तमिल जादि, तेलगु के कुलम) शब्द से जन्म का अर्थ ग्रहण होता है। इसी मूल से जात, नवजात (नया जन्मा हुआ), जनन (जन्म लेना या देना) जननी (जन्म देने वाली, माता), जाई, जाया इत्यादि शब्द बने हैं। इससे स्पष्ट होता है कि ये जन्म आधारित प्रथा नहीं रही होगी। जाति  शब्द का प्रयोग अपेक्षाकृत नया है।
         भारतीय दर्शन के अनुसार सत यथा-संभव उचित जानने और करने वाला गुण है, रज उचित जानना लेकिन तात्कालिक लाभ के लिए समय समय पर कर्तव्य से डिगने वाला गुण है और अज्ञान के अंधकार में रहने के गुण को तम कहते हैं। ये चार वर्ण मनुष्य जाति का मूलभूत स्वभाव है, ज्योतिष, मनोविज्ञान, अध्यात्म में भी मनुष्य-मात्र के ये लक्षण बताये गए हैं  गीता  में भी। वे इस प्रकार है-
ब्राम्हण - ब्रम्हज्ञानी - ज्ञान प्रसार करने वाले, उचित (धर्म शब्द का वास्तविक अर्थ) और अनुचित को समझने वाला और दूसरों का बताने वाला।
क्षत्रिय - रज गुण प्रधान वाला - वीर एवं योद्धा - युद्ध में कभी पीछे न हटने वाला। लेकिन रज गुण के कारण राज्य, धन और अन्य कारणों से इनका धर्म (यानि स्थिति के अनुसार उचित कर्तव्य) में विश्वास अटल नहीं रहता और इनके मोह में गलतियाँ कर बैठते हैं।
वैश्य - व्यवसाय में निपुण, रज और तम गुणों के मिश्रण वाले लोग - बनिया या वैश्य। विश धातु का अर्थ है सभी स्थानों पर जाने वाले यानि (कर्मानुसार) धन अर्जित करने वाले। विश धातु से ही प्रवेश और विष्णु जैसे शब्द बने हैं।
शूद्र - तमोगुणी, दुःख-सुख के कारणों के न जानना और न जानने की इच्छा रखना। दुनिया को समझने की बजायउससे  से बेपरवाह,  मस्तमौला जीव- कल की फिक्र नहीं,  मेहनत करो और खाओ-पियो मौज करो।
       गीता में सत (सात्विक), रज (राजसी) और तम (तामसी) गुणों को एकाधिक परिप्रेक्ष्य में बताया गया है। प्रत्येक मनुष्य एक समय में इन्हीं तीनों गुणों से मिलकर बना होता है।
        ये स्वभाव (गुण या प्रकृति) सभी मनुष्यों में है और उनके शारीरिक रंग से परे है। एक अफ़्रीका का वासी भी इन्ही गुणों से मिलकर बना है और यूरोप वासी भी। वर्ण शब्द एक सिद्धांत व दर्शन को बताता है, न कि रूप-रंग को।
       पौराणिक कथा के अनुसार सृष्टि के बनने के समय मानवों को उत्पन्न करते समय ब्रह्मा जी के विभिन्न अंगों से उत्पन्न होने के कारण कई वर्ण बन गये।---मुख से ब्राह्मण ....भुजाओं से क्षत्रिय ...जंघा से वैश्य  व पैर से शूद्र उत्पन्न हुए। है। वर्ण व्यवस्था के सम्बन्ध में ऋग्वेद के पुरुषसूक्तमें निम्नलिखित श्लोक मिलता है -
ब्राह्मणों अस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यः कृतः।
ऊरु  तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत।।1

        वास्तव में ये विभाग पुरुष अर्थात वृहद् स्वरुप में विश्वात्मा, वैश्वानर, विश्वरूप प्राणी समाज( शरीर) के अंगों के रूप में वर्णित हैं| सत भाव युक्त मानव या मानव समूह, समाज का विचार, विचारक अर्थात सिर, शीर्ष, शिखर या मुख है.... रज भाव युक्त शक्ति पूर्ण मानव या समुदाय समाज का रक्षक, बाहु है.... सत व रज मिश्रित भाव वाला मनुष्य या समुदाय, समाज का क्रियात्मक गतियुक्त, धनार्जन करने वाला, अन्न उपजाने वाला, व्यवहार कुशल जंघा, व उरु भाग है ...  तम भाव युक्त मानव या समुदाय- न जानने की इच्छा रखने वाला,  दुनिया से बेपरवाह,  मस्तमौला जीव-कल की फिक्र नहीं, श्रमकार्य व अन्य वर्गों के लिए सेवा करने वाले, मानव या समुदाय समाज का मूलाधार पद है |

मनुस्मृति के अनुसार ----वर्ण व्यवस्था का आधार कर्म है’ - मनुष्य का वर्ण निर्धारण कर्म और गुणों के आधार पर ही होता है --
शूद्रो बा्रह्मणतामेति ब्राह्मणश्चेति शूद्रताम्।
क्षत्रियाज्जात्मेवन्तु  विद्याद्  वैश्यात्तथैव च।।3
आपस्तम्ब सूत्रोंमें भी यही बात कही गई है कि वर्ण जन्मनान होकर वास्तव में कर्मणा है -
धर्मचर्ययाजधन्योवर्णः पूर्वपूर्ववर्णमापद्यतेजातिपरिवृत्तौ।
अधर्मचर्यया पूर्वो वर्णो जधन्यं जधन्यं वर्णमापद्यते जाति परिवृत्तौ।।4
       अर्थात् धर्माचरण से निकृष्ट वर्ण अपने से उत्तम वर्ण को प्राप्त होता है और वह उसी वर्ण में गिना जाता है - जिस-जिस के वह योग्य होता है , वैसे ही अधर्म आचरण से पूर्व अर्थात् उत्तम वर्ण वाला मनुष्य अपने से नीचे-नीचे वाले वर्ण को प्राप्त होता है और उसी वर्ण में गिना जा ता है।
      शूद्र कुल में उत्पन्न होकर ब्राह्मण, क्षत्रिय के समान गुण, कर्म स्वभाव वाला हो, तो वह शूद्र, ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य हो जाता है। वैसे ही जो ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य कुल में उत्पन्न हुआ हो, उसके गुण व कर्म शूद्र के समान हो, तो वह शूद्र हो जाता है, वैसे ही क्षत्रिय या वैश्य कुल में उत्पन्न होकर ब्राह्मण व शूद्र के समान होने पर, ब्राह्मण व शूद्र हो जाता है।

बृहदारण्यकोपनिषदमें मानव जाति के चारों वर्णों की उत्पत्ति का आधार ब्रह्मा द्वारा रचित देवताओं के चार वर्ण बताए गए हैं---१.इन्द्र, वरुण, सोम, यम आदि क्षत्रिय देवताओं, ...२.रुद्र, वसु, आदित्य, मरुत आदि वैश्य देवताओं, ...३.पुशान आदि शूद्र वर्ण के देवताओं की सृष्टि ईश्वर द्वारा की गई |..... इन सबसे पूर्व ब्राह्मणों की सृष्टि हो ही चुकी थी। इस वर्ण व्यवस्था के आधार पर ही मानव जाति में भी क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्णों की सृष्टि की गई।

भृगु संहितामें भी चारों वर्णों की उत्पत्ति का उल्लेख इस प्रकार है --- सर्वप्रथम ब्राह्मण वर्ण था, उसके बाद कर्मों और गुणों के अनुसार ब्राह्मण ही क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्ण वाले बने तथा इन वर्णों के रंग भी क्रमशः श्वेत, रक्तिम, पीत और कृष्ण थे। बाद कें तीनों वर्ण ब्राह्मण वर्ण से ही विकसित हुए।
       यह मानव के सामाजिक विकास की भारतीय गाथा है जो ब्राह्मण कठोर, शक्तिशाली, क्रोधी स्वभाव के थे, वे रजोगुण की प्रधानता के कारण क्षत्रिय बन गए। जिनमें तमोगुण की प्रधानता हुई, वे शूद्र बने। जिनमें पीत गुण अर्थात् तमो मिश्रित रजो गुण की प्रधानता रही, वे वैश्य कहलाये तथा जो अपने धर्म पर दृढ़ रहे तथा सतोगुण की जिनमें प्रधानता रही वे ब्राह्मण ही रहे। इस प्रकार ब्राह्मणों से ही चार वर्णो का गुण और कर्म के आधार पर विकास हुआ।

 गीता में श्रीकृष्ण ने भी कहा है---“चातुर्वर्ण मया सृष्टा, गुण कर्म विभागस:” ---चारों वर्णो का विभाजन गुण और कर्मो के आधार पर ही है।

भगवान बुद्ध के अनुसार --(दिघ निकाय के आगण सुत्त के अनुसार)  पृथ्वी की उत्पत्ति के बाद जब जीवो का क्रमिक विकास हुआ और उनमे तृष्णा लोभ अभिमान जेसे भावो का जन्म हुआ तो उन प्रारंभिक सत्वों में विभिन्न प्रकार की विकृतियाँ हुईं और आयु में क्रमश: कमी होने लगी | लोग चोरी जेसे कर्मो में प्रवृत्त होने लगे | लगातार चोर कर्म करने के कारण सभी जन समुदाय परेशान होकर एक सम्म्ननीय व्यक्ति के पास गए और बोले तुम यहाँ अनुशासन की स्थापना करो, उचित और अनुचित का निर्णय करो हम तुम्हे अपने अन्न में से हिस्सा देंगे उस व्यक्ति ने यह मान लिया | चूँकि वह सर्व जन द्वारा सम्मत था इसलिए महासम्मत नाम से प्रसिंद्ध हुआ, लोगो के क्षेत्रो (खेतों) का रक्षक था इसलिए क्षत्रिय हुआ और जनता का रंजन करने के कारण राजा कहलाया | उन सर्व प्रथम व्यक्ति को आज मनु कहा जाता हे जिसके आचार विचार पर चलने वाले मनुष्य कहलाये |
        इस प्रकार क्षत्रिय वर्ण की उत्पत्ति प्रजातांत्रिक तरीके से जनता द्वारा राजा चुनने के कारण हुई | यह वर्ण का निर्णय धर्म (निति) के आधार पर हुआ न की किसी देवीय सत्ताके कारण | इसी प्रकार ब्राहमण, वैश्य और शुद्र वर्ग की उत्पत्ति भी अपने उस समय के कर्मो के अनुसार हुई

 वर्णाश्रम व्यवस्था के विषय में गाँधी जी के विचार -मेरी सम्मति में वर्णाश्रम मानवीय स्वभाव में अन्तर्ग्रथित है। हिन्दू धर्म ने केवल इसे एक वैज्ञानिक रूप दे दिया है। ये चार वर्ण तो मनुष्य के पेशों की परिभाषा करते हैं। वे सामाजिक  पारस्परिक  सम्बन्धों को निर्बाधित या नियमित नहीं करते।” 
    
         वस्तुतः वैदिक काल की प्राचीन व्यवस्था में जाति वंशानुगत नहीं थी परन्तु  गुप्तकाल के आते-आते जन्म व आनुवंशिक आधार पर लोगों के वर्ण तय होने लगे। परस्पर श्रेष्ठता के भाव के चलते नई-नई जातियों की रचना होने लगी। यहाँ तक कि श्रेष्ठ समझे जाने वाले ब्राह्मणों ने भी अपने अंदर दर्जनों वर्गीकरण कर डाला। अन्य वर्ण के लोगों ने इसका अनुसरण किया और जातियों की संख्या हजारों में पहुँच गयी।








गुरुवार, 5 मई 2016

कहाँ जाती हैं गंगा में विसर्जित अस्थियाँ ?----डा श्याम गुप्त

             ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ... 

 

                     कहाँ जाती हैं गंगा में विसर्जित अस्थियाँ ?


              एक दिन देवी गंगा श्री हरि से मिलने बैकुण्ठ धाम गई और उन्हें जाकर बोली," प्रभु ! मेरे जल में स्नान करने से सभी के पाप नष्ट हो जाते हैं लेकिन मैं इतने पापों का बोझ कैसे उठाऊंगी? मेरे में जो पाप समाएंगे उन्हें कैसे समाप्त करूंगी?"
             इस पर श्री हरि बोले, "गंगा! जब साधु, संत, वैष्णव आकर आप में स्नान करेंगे तो आप के सभी पाप घुल जाएंगे।"

                        सदानीरा व परमपावन गंगा नदी को प्राणियों के समस्त पापों को दूर करने वाली कहा जाता है | परन्तु वह स्वयं अपवित्र नहीं होती| प्रत्येक हिंदू व उसके परिवार की इच्छा होती है उसकी अस्थियों का विसर्जन गंगा में ही किया जाए | युगों से ये प्रथा चली आ रही है | अस्थियाँ गंगा में विसर्जित होती आरही हैं फिर भी गंगाजल पवित्र एवं पावन है। अब प्रश्न यह उठता है कि यह अस्थियां जाती कहां हैं?

                  गौमुख से गंगासागर तक खोज करने के बाद भी वैज्ञानिक भी आज तक इस प्रश्न का उत्तर इसका उत्तर नहीं खोज पाए | क्योंकि असंख्य मात्रा में अस्थियों का विसर्जन करने के बाद भी गंगाजल पवित्र एवं पावन है।

  सनातन धर्म की मान्यता के अनुसार-------
 
-----मृत्यु के बाद आत्मा की शांति के लिए मृत व्यक्ति की अस्थि को गंगा में विसर्जन करना उत्तम माना गया है। ”पारद“ शब्द में -पा = विष्णु...र = रूद्र शिव और ‘द’ = ब्रह्मा के प्रतीक है। यह अस्थियां सीधे श्रीहरि के चरणों में बैकुण्ठ चली जाती हैं। जिस व्यक्ति का अंत समय गंगा के समीप आता है उसे मरणोपरांत मुक्ति मिलती है।
धार्मिक दृष्टि से----- 

-----पारद शिव का प्रतीक है और गंधक शक्ति का प्रतीक है। सभी जीव अंततः शिव और शक्ति में ही विलीन हो जाते है। पारद को भगवान् शिव का स्वरूप माना गया है और ब्रह्माण्ड को जन्म देने वाले उनके वीर्य का प्रतीक भी इसे माना जाता है। धातुओं में अगर पारद को शिव का स्वरूप माना गया है तो ताम्र को माँ पार्वती का स्वरूप। इसलिए गंगा में ताम्र के सिक्के फैकने की प्रथा है | इन दोनों के समन्वय से शिव और शक्ति का सशक्त रूप उभर कर सामने आ जाता है। ठोस पारद के साथ ताम्र को जब उच्च तापमान पर गर्म करते हैं तो ताम्र का रंग स्वर्णमय हो जाता है।

  वैज्ञानिकों के अनुसार-----

--- गंगाजल में पारा (मर्करी) विद्यमान होता है जिससे हड्डियों में उपस्थित कैल्शियम और फोस्फोरस पानी में घुल जाता है। जो जलजन्तुओं के लिए एक पौष्टिक तत्व है। हड्डियों में गंधक (सल्फर) होता है जो पारे के साथ मिलकर पारद का निर्माण करता है जो जल में उपस्थित विभिन्न रासायनिक तत्वों, मूलतः क्लोराइड व ब्रोमाइड, आयोडाइड,कार्बन, मेग्नीशियम, पोटेशियम द्वारा औषधीय गुण उत्पन्न करते हैं। मूलतः यह मरकरी सल्फाइड साल्ट (HgS) का निर्माण करते हैं। जल में उपस्थित वायु द्वारा ऑक्सीकृत होने पर पारद पुनः मुक्त हो जाता है। और अस्थियों के रासायनिक विसर्जन यह क्रम चलता रहता है | हड्डियों में बचा शेष कैल्शियम पानी को स्वच्छ रखने का काम करता है।

---- पारा एक तरल पदार्थ होता है और इसे ठोस रूप में लाने के लिए विभिन्न अन्य धातुओं जैसे कि स्वर्ण, रजत, ताम्र सहित विभिन्न जड़ी-बूटियों का प्रयोग किया जाता है। इसे बहुत उच्च तापमान पर पिघला कर स्वर्ण, रज़त और ताम्र के साथ मिला कर, फिर उन्हें पिघला कर आकार दिया जाता है। जो पारद-शिव लिंग बनाने के काम लाया जाता है | ठोस पारद के साथ ताम्र को जब उच्च तापमान पर गर्म करते हैं तो ताम्र का रंग स्वर्णमय हो जाता है। इससे शिवलिंग को "सुवर्ण रसलिंग" भी कहते हैं|

---- पारा अपनी चमत्कारिक और हीलिंग प्रॉपर्टीज के लिए वैज्ञानिक तौर पर भी मशहूर है। मर्क्यूरोक्रोम हीलिंग के लिए प्रयुक्त एक मुख्य रसायन है |

------ पारद को पाश्चात्य पद्धति में उसके गुणों की वजह से फिलोस्फर्स स्टोन भी कहा जाता है। आयुर्वेद में भी इसके कई उपयोग हैं| उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, अस्थमा, डायबिटीज में पारद से बना मणिबंध (ब्रेसलेट ) पहनाया जाता है |



मंगलवार, 3 मई 2016

मैं तुम हम---कुण्डली छंद ....डा श्याम गुप्त ...

                    ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


मैं तुम हम---कुण्डली छंद ..


मैं’ औ ‘तुम’ हैं एक ही, उसके ही दो भाव ,
जो मिलकर बन जाँय ’हम’, हो मन सहज सुभाव |
हो मन सहज सुभाव, सत्य शिव सुन्दर हो जग,
सरल सुखद, शुचि, शांत सौम्य हो यह जीवन मग |
रहें ‘श्याम’ नहिं द्वंद्व, द्वेष, छल-छंद जगत में,
भूल स्वार्थ ‘हम’ बनें एक होकर ‘तुम’ औ ‘में’ ||




तुम मैं प्रभु! हैं एक ही, लोकनाथ हम आप |
बहुब्रीहि हूँ नाथ मैं, आप तत्पुरुष भाव |
आप तत्पुरुष भाव, लोक के नाथ सुहाए ,
लोक हमारा नाथ, नाथ मेरे मन भाये |
खोकर निज अस्तित्व, मुक्ति पाजाऊँ जग में,
मेरा ‘मैं’ हो नष्ट, लीन होजाए तुम में ||



हम तुम मैं वह आप सब उस ईश्वर के अंश,
फिर कैसा क्यों द्वंद्व दें, इक दूजे को दंश |
इक दूजे को दंश, स्वार्थ अपने-अपने रत ,
परमार्थ को त्याग, स्वयं को ही छलते सब |
अपने को पहचान दूर होजायं सभी भ्रम,
उसी ईश के अंश, श्याम’ सब मैं वह तुम हम ||