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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

रविवार, 12 जुलाई 2009

गीत-- वे दो पल.....

राह में दो पल साथ तुम्हारे,बीते उनको ढूंढ रहा हूं।
पल में सारा जीवन जीकर,फ़िर वो जीवन ढूंढ रहा हूं।

उन दो पल के साथ ने मेरा,सारा जीवन बदल दिया था।
नाम पता कुछ पास नहींपर,हर पल तुमको ढूंढ रहा हूं।

तेरी चपल सुहानी बातें, मेरे मन की रीति बन गईं ।
तेरे सुमधुर स्वर की सरगम,जीवन का सन्गीत बन गई।

तुम दो पल जो साथ चल लिये,जीवन की इस कठिन डगर में।
मूक साक्षी बनीं जो राहें, उन राहों को ढूंढ रहा हूं।

पल दो पल में जाने कितनीं जीवन जग की बात होगईं
हम तो चुप चुप ही बैठे थे, बात बात में बात होगईं।

कैसे पहचानूंगा तुमको,मुलाकात यदि कभी होगई ।
तिरछी चितवन और तेरा मुस्काता आनन ढूंढ रहा हूं।

मेरे गीतों को सुनकर, तेरा वो वंदन ढूंढ रहा हूं ।
चलते चलते तेरा वो प्यारा अभिनन्दन ढूंढ रहा हूं।



बुधवार, 8 जुलाई 2009

श्रिष्टि व जीवन् ---भाग्-५--जीवन्,जीव् व मानव्

अभी तक् आप् सबने श्रिष्टि .....इतने विशद् रूप् में पढा, शायद् हैरान्-परेशान् भी होंगे? वास्तव् में तो यह् वर्णन् भी सन्क्षिप्त् था। वेदिक् विग्यान् में यह् मूल् विषय् अत्यन्त् व्याख्या से दिया है और् आधुनिक् विग्यान् अभी वहां तक् नहीं पहुंचा । इस् अन्क् में हम् इस् विषय् के सबसे महत्व् पूर्ण् तत्व् पर् आधुनिक् विग्यान् सम्मत् वर्णन् प्रस्तुत् करेंगे,जो अब् तक् की व्याख्या का परिणामी -फ़ल् है, यथा---
१.जीवन् कैसे आरम्भ् हुआ?
२.जीव् में गति, आकार्-वर्धन् व सन्तति वर्धन्(रीप्रोडक्सन्)कैसे प्रारम्भ् हुआ।
३.लिन्ग्-भिन्नताभाव् ( सेक्सुअल्-सिलेक्सन्)कैसे हुआ?
४.सन्तति वर्धन् की लिन्गीय् स्वतः स्वचालित् प्रक्रिया कैसेप्रारम्भ् हुई? (से़क्सुअल् ओटोमेशन् फ़र् रीप्रोडक्सन्)
५ प्राणी व मानव् का विकास्-क्रम्
---आधुनिक् विग्यान् ,मूलतः--डार्विन् की थेओरी ( चार्ल्स् डार्विन्१२-२-१८०९---१९-४-१८८२ई)--ओरीजिन् ओफ़् स्पेसीज्(१८५९) पर् केन्द्रित् है। यध्यपि आज् केवल् ३९% अमेरिकी ही इस् सिद्धान्त् पर् विश्वास् करते हैं। वस्तुतः डार्विन् की थेयोरी कोई अपनी नई खोज् नहीं थी अपितु,प्राचीन् ग्रीक्र धारणा, अरस्तू, लेओनार्दो-दा विन्सी,अल्फ़्रेड् रसेल् आदि के दार्शनिक् विचारों की पुष्टि ही थी। वस्तुतः विग्यान् ,दर्शन् से ही प्रारम्भ् होता है।
गीक् दार्शनिक् --एनाक्सीमेन्डर् ने (ई.पू.६१० से ५४६ ई.पू.) बताया था कि जीवन् जल् की नमी से, सर्व् प्रथम् जल् में हुआ,फ़िर् सिम्प्ल(सरल्) से कम्पलेक्स्(जटिल्)प्राणी, मछली व इस् प्रकार् मानव् बना।, ब्रह्मान्ड्( यह् शब्द् वेदिक् देन् है )एक् प्रारम्भिक् अन्ड्(प्राइमोर्डिअल् ऊज़्- कोस्मोस्) से बना।अरस्तू के अनुसार् प्राणी रोक्,अर्थात् कण् (एटम्) से बना ।इसी दर्शन् को डार्विन् ने प्रयोगों, अनुभवों द्वारा अपनी थेओरी का आधार् बनाया।वस्तुतः ये प्राचीन् दर्शन् वैग्यानिक्,मानवतावादी व अनीश्वर्वादी थे।(वैदिक् दर्शन्-वैग्यानिक्, मानववादी के साथ्-साथ् ईश्वर् वादी व समाज्वादी दर्शन् है)
। वह् तोबाद् में कठोर् ईश्वर्वादी धर्मों-- क्रिष्चिअन् व इस्लाम् में सब् कुछ् गोड् व खुदा द्वारा ६या ७ दिन् में बनाया गया बताया है। जो इवोल्यूसन् में विश्वास् नहीं रख्ते थे।
१. जीवन् का प्रारम्भ्---आधुनिक् विग्यान् केये मत् हैं--
-------अ.-उल्काओं की वर्षा या धूम्रकेतु के साथ् वहं से जीवन् प्रथ्वी पर् जल्, महासागरों में आया \
--------ब्.-उल्का या धूम्रकेतु आदि के जल् में गिरने पर् तीब्र् ताप् आदि की प्रतिक्रियाओं से उपस्थित् कणॊं में जीवन् की उत्पत्ति हुई।
--------स्. -१९५० ई में-अमेरिकन् केमिस्ट् एवम् बायोलोजिस्ट् ,स्टेनले लायड् मिलर्( मार्च्७,१९३०--मई२०,२००७) तथा यूरे ने प्रयोगों द्वारा सिद्ध किया कि अकार्बनिक् पदार्थ् से सामान्य् भौतिक् प्रक्रियाओं से कार्वनिक्( जैविक्) यौगिक् बनये जा सकते हैं। जैसे इस् समय् ज्युपिटर् (ब्रहस्पति) पर् अमोनिया ,हाइड्रोजन व मीथेन् है ,वैसे ही प्रथ्वी पर् प्रारम्भ् में थीं। उन्होंने तीनों गेसों के मिश्रण् में जल् वष्प की उपस्थिति में विध्युत् ऊर्जा पास् की ओर् एक् भूरे रन्ग् का अमीनो एसिड् सा पदार्थ् बना, जो न्यूक्लिअक् एसिड्बनाने में अहम् भूमिका निभाता है।ओर् प्रत्येक् जीव् कोशिका का मुख्य् भाग् है। मिल्लर् के अनुसार् प्रथ्वी पर् प्रथम् जीवन् उत्पत्ति का यह् कारण् हो सकता है। अर्थात् सब् कुछ् आकस्मिक् व संयोग् से हुआ।
इस् प्रकार् प्रथम् जीवन् जो एक् जीवाण्(बेक्टीरिया) के रूप् में आया जो आज् भी वनस्पति जगत व प्राणि जगत् दोनों में माना जाता है, जिससे एक् कोशीय् प्राणी( अमीवा) व एक् कोशीय् पौधे(स्पाइरोगाइरा,यूलोथ्रिक्स् आदि) फ़िर् क्रमश्ः वनस्पति व प्राणी व मानव् वने
२, ३, ४,गति, वर्धन् व व सन्तति वर्धन्, लिन्ग् भिन्नत्ः सेक्सुअल्-स्वचालित् प्राणी सन्तति प्रक्रियाके अस्तित्व् में आने को आधुनिक् विग्यान् प्रायः संयोग् ही मानता है । कोई निश्चित् मान्यता नहीं है। डार्विनिस्म् के अनुसार् एक् कोशीय् प्राणी से क्रमिक् विकास् द्वाराबहु कोशीय् प्राणी, जल्र चर्, जल् स्थलचर्,कीट्,सरीस्रप्,पक्षी,स्तनधारी,वानर् व मानव् बना।कैसे? इस् सन्दर्भ में,डार्विन् के अनुसार् चार् प्रमुख् बिन्दुहें-
क.-जीवन् के लिये सन्ग्राम्-(स्ट्रगल् फ़ोर् एग्सिस्टेन्स)- प्रत्येक् जीव धारी अपने ज़िन्दा रहने के लिये सन्घर्ष करता है, और् अपने आप् को परिस्थितियों के योग्य् बनाने का प्रयत्न् करता है।ओर्--
ख.-सन्ग्राम् कें उपयुक्त् ही जीवित् रहता है(सर्वाइवल् ओफ़् फ़िटेस्ट्) तथा सम्वर्धन् ,वर्धन् व प्रगति करता है।तथा-
.-प्राक्रतिक् चुनाव्(नेचुरल् सिलेक्सन्)- प्रक्रति स्वयम् चुनाव् करती है ,कौन् रहेगा,कैसे व कितना वर्धन् ओर् कब् प्रगति करेगा-तथा
घ.-उत्परिवर्तन् (म्यूटेशन्)- अर्थात् किसी भी जीवधारी में अचानक् किसी भी प्रकार् का स्वतः बदलाव् आ सकता है,जो परिस्थिति,वातावरण्, आवश्यकता के अनुसार् या बिना कारण् के भी हो सकता है
५-मानव् का विकास् क्रम्--जैसा ऊपर् बताया गयाहै, डार्विन् के अनुसार् आधुनिक् मानव् उप्रोक्त् बिन्दुओं के अनुसार् मत्स्य् सेसरीस्रप्, फ़िर् वानर्,चिम्पेन्जी,गोरिल्ला सेक्रमिक् विकास् से मानव् बना ।
-------अगले अन्क् में उप्रोक्त् १ से ५ तक विषय् विन्दुओं पर् वेदिक् विग्यान् सम्मत् धारणाओं पर् प्रकाश् डाला जायगा।
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शनिवार, 4 जुलाई 2009

काले मतवाले घन -घनाक्षरी छंद

लीजिये चौमासे लग गए ,आइये वर्षा की फुहारों में चार कवित्त छंदों से भीगने का आनंद लीजिये ----
काले-काले मतवाले घिरे घनघोर घन ,
बरखा सुहानी आई ऋतुओं की रानी है।
रिमझिम-रिमझिम रस की फुहार झरें ,
बह रही मंद-मंद पुरवा सुहानी है।
दम-दम दामिनि,दमकि रही ,जैसे प्रिय ,
विहंसि-विहंसि ,सखियों से बतरानी है।
बरसें झनन -झन, घनन -घन गरजें ,
श्याम ' डरे जिया,उठै कसक पुरानी है॥

टप-टप बूँद गिरें , खेत गली बाग़ वन ,
छत,छान छप्पर चुए,बरसा का पानी ।
ढ र ढ र जल चलै,नदी नार पोखर ताल ,
माया वश जीव चले राह मनमानी।
सूखी, सूखी नदिया,बहन लगी भरि जल,
पाइ सुसुयोग ज्यों हो उमंगी जवानी ।
श्याम ' गली मग राह,ताल ओ तलैया बने ,
जलके जंतु क्रीडा करें, बोलें बहु बानी॥

वन-वन मुरिला बोलें,बागन मोरलिया,
टर-टर रट यूँ लगाए रे दादुरवा ।
चतुर टिटहरी चाह ,पग टिके आकाश ,
चक्रवाक अब न लगाए रे चकरवा ।
सारस बतख बक ,जल में विहार करें,
पिऊ ,पिऊ टेर,यूँ लगाए रे पपिहवा ।
मन बाढ़े प्रीति,औ तन में अगन श्याम,
छत पै सजन भीजे ,सजनी अंगनवा ॥

खनन खनन मेहा,पडे टीन छत छान ,
छनन -छनन छनकावे द्वार अंगना ।
पिया की दिवानी,झनकाये ज्यों पायलिया,
नवल -नवेली खनकाय रही कंगना ।
कैसे बंधे धीर सखि,जियरा को चैन आबै,
बरसें नयन , उठे मन में तरंग ना ।
बरखा दिवानी हरषावे, धड़कावे जिया ,
ऋतु है सुहानी ,श्याम' पिया मोरे संग ना॥


शुक्रवार, 3 जुलाई 2009

वेदों की पठशाला--एक आइ.ए.एस. का अभिनव प्रयोग

एक रिटायर्ड आइ.ए.एस. हैं,विधु त्रिवेदी- जिन्होंने अ्पने जीवन के निचोड से जाना कि बच्चों को वेद की शिक्षा आवश्यक है ओर जुट गये पढाने में,आधुनिक विग्यान व व्यवहार से अपने इतिहास, सन्स्कार,शास्त्रों की मर्यादा व ग्यान का क्यों व कैसे सामन्जस्य करना चाहिये ,सीखें।वे औरों को भी समेटने में लगे हैं। पढिये यह आलेख जो उन लोगों के मुंह पर तमाचा है जो वेदिक ग्यान को खन्डहर, कचरा आदि बताने में लगे हैं और अन्य देशों के पिछलग्गू होकर सिर्फ़ उनके गीत
गाने एवम उनकी पीठपर अपनी रोटी सेंकने व भोग-भोगने में लगे हें।
स्वयम ही पढें व समझें,सोचें

स्वाइन फ़्लू--तथ्य व भूमिका?, भारत व अमेरिका व विश्व के आचरण

यद्यपि लेखिका सुनीता नारायण का पहले ही वाक्यों में कहना है कि यह सूअर खाने से नहीं फ़ैलता,पर उनके लेख से पता चलता है कि यह वाइरस,मेक्सिको की पोर्क खाद्य बनाने वाली फ़ेक्टरी से फ़ैला जो अपना कचरा जल,नदी,आदि में फ़ैंक कर प्रदूषण फ़ैला ते हैं। लोकल जनता के प्रदर्शनों का भी आर्थिक लाबी के कार कोई असर नहीं हुआ। इन कम्पनियों ने विश्व स्वास्थ्य सन्गठन पर दवाब डाला कि पोर्क खाना बन्द न किया जाय।यही हाल,बर्ड-फ़्लूव अन्य मांस -भोजन के साथ है. पता चलता है कि अमेरिका में सारा कचरा नदियों ,समुद्र में बहाया जाता है जो प्रदूषण का कारण बनरहा है।
अब आप ही समझिये -जन्नत की हकीकत--,व क्यों मांस खाना ही निसिद्ध है,और भ्रष्टाचार, प्रदूषण,राज्नीति की गन्दगी,साफ़-सफ़ाई, नदियों का प्रदूषण आदि--भारत व अमरीका में कहां, कितना अन्तर है। अभी जुम्मा-जुम्मा ४०० साल की उम्र है,ये हाल!, ४०००० हज़ार साल उम्र होगी तो क्या होगा???

मंगलवार, 30 जून 2009

भ्रष्टाचार से मुक्ति के उपाय----

कोई पनंदीकर ,जो अर्थ विद भी हैं और किसी संस्था के अध्यक्ष भी ,कहरहे हैं किचुस्त उपाय ही भ्रष्टाचार से मुक्ति का रास्ता है । तो अब तक आप क्या कर रहे थे ? उस संस्था के लोग,सरकार क्या कर रही थी ? आप इसका उपाय अमेरिकी प्रणाली से कराने की सलाह दे रहे हैं। ये अमेरिकी भाव में पढ़े लिखे लोग हर बात का उपाय अमेरिका में ढूढते है। तो क्यों न भारत का राष्ट्राध्यक्ष ओबामा को ही बना दिया जाय , भारत को अमेरिका का उपनिवेश बनादिया जाय,सब झंझट से मुक्ति !!
ये लोग नहीं समझ पाते कि उपायों के बदलते रहने से कुछ नहीं होता ,भ्रष्टाचार करने -कराने वाले स्वयं आदमी ,मनुष्य, हम होते है। जब तक मनुष्य को मनुष्यता भाव ,ईश्वर का डर ,सामाजिकता भाव नहीं सिखाया जायगा ,कोई प्रणाली कार्य नहीं कर पायेगी ।

सोमवार, 29 जून 2009

महानात्माओं व महात्माओं ,संतों,विचारकों की भूलें व त्रुटियाँ .

पंथ ,सेक्ट व अपने -अपने धर्म बनाने से मानव ,ईश्वर (-मानवता,विशाल हृदयता,उदारता ,जोवास्तव में ईश्वर व ईश्वर के गुण हैं )-को भूल कर एकांगी सोच वाला होजाता है। वह उन पंथों आदि के कर्म कांडों में ही उलझ कर रह जाता है,महानात्माओं को चाहिए की वे केवल ईश्वर के गुण ,उनको जीवन में उतारने की आवश्यकता व उपायों पर ही गुण-गान करें । वैसे अधिकतर संत ,महात्मा कभी कोई पंथ बनाने को नहीं कहते ,अपितु आगे आने वाले अनुयायी ये ग़लत कार्य करते हैं ।
-- महात्मा बुद्ध ने बौद्ध धर्म चलाया ,लोग उसके कर्म कांडों में फंसकर रहगये ,ईश्वर ( बौद्ध वैसे भी अनीश्वर वादी धर्म है ), व मानवता पीछे छूट गए। जैन धर्म ने भी क्या-क्या झगडे आदि नहीं किए । ईसा ने कब कहा चर्च बनाने को ,बस खुदा की राह चलो , आगे लोगों ने चर्च,ईसाई धर्म बनाकर खुदा भुलादिया ,मोमबत्ती जलाना याद रहा ; मूसा,मोहम्मद ने अल्लाह की राह पर ही चलने को कहा ,लोगों ने कुरान ,इस्लाम बनाकर मनुष्य को मनुष्य से दूर किया ';नानक ने सिख पंथkओं बनाकर लोगों को गुरुद्वारे में मत्था टेकना सीमित कर ईश्वर से दूर करदिया ;राम कृष्ण ने काली पूजा , भक्ति वेदांत स्वामी ने इस्कोन आदि से लोगों को प्रपंचों में व्यस्त करके वस्तुतः इश्वर से दूर ही कर दिया।शिरडी,साईं बावा , गायत्री व आजकल के संतों ,महंतों के आश्रम सभी उसी कोटि ke हैं। इन सब में उलझकर मनुष्य भ्रमित,गर्वित,व्यक्तिनिष्ठ , ईश्वर के किसी एक गुण में निष्ठ रह जाता है। अर्थात ईश्वर जीवन से गायब । तथा आश्रमों ,धन का प्रभाव,धार्मिक अहम् का टकराव ,मठाधीश आदि माया प्रभाव प्रारंभ होजाते हैं।
कबीर ने केवल राम नाम भजने को कहा ,अपना जुलाहा कर्म न छोडा ; रैदास ने कोई आश्रम बनाने की बजाय राम का नाम व अपना काम -चमार का -करते रहना न छोडा।
स्वयं राम ने कब कोई धर्म या पंथ बनाया ,जीवन भर आदर्शों पर चलने ,वेदों,शास्त्रों ,मर्यादा पर चलने की राह दिखाई ;;कृष्ण ने कब कहा कि मेरे मन्दिर बनाओ ,कब नया धर्म चलाया , स्वयं को वेद,शास्त्र,मानवता,नीति,व्यवहार ही बताते व उन पर चलते रहे।