श्याम दोहा-दशक..
परम्पराओं में निहित ,सदा तार्किक अर्थ।
गहराई से परखिये, तज़कर व्यर्थ कुतर्क।
समसामयिक अर्थ में, परखें विधि प्राचीन।
दोष जानिये बदलिए,रखिये सदा नवीन ।
वैज्ञानिक आधार पर, जन हितकारी कर्म।
रीति-रिवाज़ बनें यथा,कालान्तर में धर्म।
यम औ नियम शरीर हित, आचार-व्यवहार ।
रहे चिकित्सा ज्ञान ही,इन सबका आधार।
जन समाज, जनश्रुति बसी,लोक नीति की बात।
जन दर्शन, जन धर्म हैं , समय तपाये , तात !
लोक गीत में रम रहे, रीति-नीति व्यवहार ।
लोक कथाएँ कर रहीं, घर घर ज्ञान प्रसार ।
दानवता से लड़ रहे, सज्जन,सुजन अनाम।
श्याम आज भी चलरहा , देवासुर संग्राम ।
धन जो प्राप्त अधर्म से,इक पीढी फल पाय।
बाढ़ खाय फिर खेत को,उपवन जाय सुखाय।
निज़हित,धनहित चतुरजन, सबसे मिलें सप्रेम।
रहा जगत में श्याम अब, कहाँ परस्पर प्रेम।
देव, सदा देते रहें , मानव ले औ देय ।
श्याम वही तो असुर है,जो बस सबसे लेय॥
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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...
- shyam gupta
- Lucknow, UP, India
- एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त
गुरुवार, 18 नवंबर 2010
बुधवार, 17 नवंबर 2010
रतन टाटा और १५ करोड़ की रिश्वत ......
-----रतन टाटा का कहना है कि उनसे भी १५ करोड़ की रिश्वत माँगी गयी थी , तो भैया जी आप अब तक क्यों चुप रहे ? अब इतने जमाने बाद आप कह रहे हैं जब इसका न कोई सबूत मिलेगा न कोई अर्थ होगा , न कोई ठोस कार्यवाही । इसका भी क्या सबूत होगा कि आपने रिश्वत देना स्वीकार किया या नहीं, रिश्वत माँगी गयी या अपनी सुविधानुसार प्रस्तावित की गयी, आप तो बिज़नेसमेन हैं आपके मन माफिक लाभ का जुगाड़ न होते देख आपने प्रस्ताव टाल दिया। अब कहने का अर्थ --आप पर स्वयं पर आंच न आये और--- ' हर्र लगे न फिटकरी रंग चोखा आजाय'....आखिर समर्थ लोग ही भ्रष्टाचारियों , रिश्वतखोरों आदि के विरुद्ध उचित समय पर कार्यवाही नहीं करेंगे तो आम आदमी की क्या मजाल । परन्तु वही बात है न कि ' बिल्ली के गले घंटी कौन बांधे?' हम तो उसके साथ मलाई खाते रहें और घंटी दूसरे लोग बांधें। एवं " मैं तो चाहता हूँ पर वो ही नहीं मानता"...." वो भ्रष्ट है'...आदि आदि.... 'जागो ग्राहक जागो '......सामान्य जन तो जागता रहे और समर्थ बड़े लोग ...रिश्वत, भ्रष्टाचार, सुख-सुविधाओं की मदिरा के नशे में सोते रहें।
----ईमानदारी उसमें होती है कि उसी समय बात को खोला जाता, प्रचार किया जाता ; पत्र है, पत्रकार हैं, मीडिया है , शिकायत ब्यूरो हैं , सामाजिक संस्थाएं हैं ?? परन्तु आप मौन रहे---मौनं स्वीकृति लक्षणम" अपितु रिश्वत के सन्दर्भ में तो यह अपराधपूर्ण कृत्य है । राजस्थान पत्रिका ने क्या खूब 'पोलमपोल' लिखा है---
' मन-मूनी बावा बन्या, दिख्यो न भ्रष्टाचार।
भली कही छै मौन को,मतलब छै स्वीकार॥ "
----ईमानदारी उसमें होती है कि उसी समय बात को खोला जाता, प्रचार किया जाता ; पत्र है, पत्रकार हैं, मीडिया है , शिकायत ब्यूरो हैं , सामाजिक संस्थाएं हैं ?? परन्तु आप मौन रहे---मौनं स्वीकृति लक्षणम" अपितु रिश्वत के सन्दर्भ में तो यह अपराधपूर्ण कृत्य है । राजस्थान पत्रिका ने क्या खूब 'पोलमपोल' लिखा है---
' मन-मूनी बावा बन्या, दिख्यो न भ्रष्टाचार।
भली कही छै मौन को,मतलब छै स्वीकार॥ "
गुरुवार, 11 नवंबर 2010
डा श्याम गुप्त की नज़्म.....
प्रीति रस वो पिलादे ए साकी,
रह न जाये कोई प्यास बाकी।
कल रहें ना रहें क्या पता,
कब नजाने हो कल क्या पता।
जाने क्या लेके आये सहर,
है अभी तो बहुत रात बाकी। ...प्रीति रस....॥
कल कहां होंगे जीवन के मेले,
जाने क्या क्या न होंगे झमेले।
एसी तनहा नहीं रात होगी,
प्रीति की ये घडी फ़िर न होगी।
यूं ही जाने न दे रात बाकी,
है अभी कुछ मुलाकात बाकी। ....प्रीति रस...॥
हाले दिल कुछ सुनें कुछ सुनायें,
रंग जीवन के भी गुनगुनाएं।
रागिनी -राग के स्वर सजें,
राज तन-मन के पूछें बताएं।
रह न जाये कोई साध बाकी,
एसी हाला पिलादे ए साकी। .....प्रीति रस ॥
एसी हाला भरा एक प्याला,
प्रीति रस जिसमें छक कर हो डाला।
भक्ति के भाव रस का समर्पण,
संग मनुहार-चितवन के ढाला।
हस्ती मिट जाय मेरी औ तेरी ,
नाम प्रभु काही रह जाय बाकी।
प्रेम रस वो पिलादे ए साकी,
रह नजाये कोई प्यास बाकी॥
रह न जाये कोई प्यास बाकी।
कल रहें ना रहें क्या पता,
कब नजाने हो कल क्या पता।
जाने क्या लेके आये सहर,
है अभी तो बहुत रात बाकी। ...प्रीति रस....॥
कल कहां होंगे जीवन के मेले,
जाने क्या क्या न होंगे झमेले।
एसी तनहा नहीं रात होगी,
प्रीति की ये घडी फ़िर न होगी।
यूं ही जाने न दे रात बाकी,
है अभी कुछ मुलाकात बाकी। ....प्रीति रस...॥
हाले दिल कुछ सुनें कुछ सुनायें,
रंग जीवन के भी गुनगुनाएं।
रागिनी -राग के स्वर सजें,
राज तन-मन के पूछें बताएं।
रह न जाये कोई साध बाकी,
एसी हाला पिलादे ए साकी। .....प्रीति रस ॥
एसी हाला भरा एक प्याला,
प्रीति रस जिसमें छक कर हो डाला।
भक्ति के भाव रस का समर्पण,
संग मनुहार-चितवन के ढाला।
हस्ती मिट जाय मेरी औ तेरी ,
नाम प्रभु काही रह जाय बाकी।
प्रेम रस वो पिलादे ए साकी,
रह नजाये कोई प्यास बाकी॥
रविवार, 7 नवंबर 2010
डा श्याम गुप्त का नव गीत.....
कवि गुनगुनाओ आज
ऐसा गीत कोई ॥
बहने लगे रवि रश्मि से भी
प्रीति की शीतल हवाएं |
प्रेम के संगीत स्वर को
लगें कंटक गुनगुनाने।
द्वेष द्वंद्वों के ह्रदय को,
रागिनी के स्वर सुहाएँ।
वैर और विद्वेष को
भाने लगे प्रिय मीत कोई॥
अहं में जो स्वयं को
जकडे हुए,
काष्ठवत औ लोष्ठ्वत
अकड़े खड़े।
पिघल कर,
नवनीत बन जाएँ सभी।
देश के दुश्मन औ आतंकी यथा-
देश द्रोही और द्रोही -
राष्ट्र और समाज के।
जोश में भर लगें -
वे भी गुनगुनाने,
राष्ट्र भक्ति के वे -
शुचि सुन्दर तराने।
आज अंतस में बसालें,
सुहृद सी ऋजु-रीति कोई ॥
वे अकर्मी औ कुकर्मी जन सभी,
लिप्त हैं जो ,
अनय और अनीति में।
अनाचारों का तमस -
चहुँ और फैला ,
छागाये घन क्षितिज पर अभिचार के।
धुंध फ़ैली स्वार्थ, कुंठा,भ्रम-
तथा अज्ञान की ,
ज्ञान का इक दीप -
जल जाए सभी में।
सब अनय के भाव ,बन जाएँ-
विनय की रीति कोई ॥
ऐसा गीत कोई ॥
बहने लगे रवि रश्मि से भी
प्रीति की शीतल हवाएं |
प्रेम के संगीत स्वर को
लगें कंटक गुनगुनाने।
द्वेष द्वंद्वों के ह्रदय को,
रागिनी के स्वर सुहाएँ।
वैर और विद्वेष को
भाने लगे प्रिय मीत कोई॥
अहं में जो स्वयं को
जकडे हुए,
काष्ठवत औ लोष्ठ्वत
अकड़े खड़े।
पिघल कर,
नवनीत बन जाएँ सभी।
देश के दुश्मन औ आतंकी यथा-
देश द्रोही और द्रोही -
राष्ट्र और समाज के।
जोश में भर लगें -
वे भी गुनगुनाने,
राष्ट्र भक्ति के वे -
शुचि सुन्दर तराने।
आज अंतस में बसालें,
सुहृद सी ऋजु-रीति कोई ॥
वे अकर्मी औ कुकर्मी जन सभी,
लिप्त हैं जो ,
अनय और अनीति में।
अनाचारों का तमस -
चहुँ और फैला ,
छागाये घन क्षितिज पर अभिचार के।
धुंध फ़ैली स्वार्थ, कुंठा,भ्रम-
तथा अज्ञान की ,
ज्ञान का इक दीप -
जल जाए सभी में।
सब अनय के भाव ,बन जाएँ-
विनय की रीति कोई ॥
शुक्रवार, 5 नवंबर 2010
कारण, कार्य व प्रभाव गीत --कितने दीपक ---डा श्याम गुप्त....
कारण, कार्य व प्रभाव गीत ---कितने दीपक....
( यथा--कारण--पर्व, कार्य--पूजन, प्रभाव--प्रकाश दीप जलना....इसी प्रकार प्रत्येक पद में)
अन्धकार पर प्रकाश की जय,
दीपावली का पर्व सुहाए।
धन, संमृद्धि, सौभाग्य बृद्धि हित ,
घर घर लक्ष्मी पूजन होता।
जग जीवन से तमस हटाने,
कितने दीपक जल उठते हैं।। १.
मन में प्रियतम का मधुरिम स्वर,
नवजीवन मुखरित कर देता।
आशा औ आकांक्षाओं के ,
नित नव भाव पल्लवित होते।
नेह का घृत, इच्छा-बाती युत,
कितने दीपक जल उठते हैं॥ २.
दीपशिखा सम छबि प्रेयसि की,
जब नयनों में रच बस जाती।
मधुर मिलन के स्वप्निल की,
रेखा सी मन में खिंच जाती।
नयनों में सुंदर सपनों के,
कितने दीपक जल उते हैं॥ ३.
अहं भाव से ग्रस्त शत्रु जब,
देश पै आंख गढाने लगता।
वीरों के नयनों में दीपित ,
रक्त खौलने लग जाता है।
जन मन गण में शौर्य भाव के,
कितने दीपक जल उठते हैं॥ ४.
जब अज्ञान तिमिर छंट जाता,
ज्ञान की ज्योति निखर उठती है।
नये-नये ,विज्ञान ज्ञान की,
नित नव राहें दीपित होतीं ।
मन में नव संकल्प भाव के,
कितने दीपक जल उठते हैं॥ ५.
( यथा--कारण--पर्व, कार्य--पूजन, प्रभाव--प्रकाश दीप जलना....इसी प्रकार प्रत्येक पद में)
अन्धकार पर प्रकाश की जय,
दीपावली का पर्व सुहाए।
धन, संमृद्धि, सौभाग्य बृद्धि हित ,
घर घर लक्ष्मी पूजन होता।
जग जीवन से तमस हटाने,
कितने दीपक जल उठते हैं।। १.
मन में प्रियतम का मधुरिम स्वर,
नवजीवन मुखरित कर देता।
आशा औ आकांक्षाओं के ,
नित नव भाव पल्लवित होते।
नेह का घृत, इच्छा-बाती युत,
कितने दीपक जल उठते हैं॥ २.
दीपशिखा सम छबि प्रेयसि की,
जब नयनों में रच बस जाती।
मधुर मिलन के स्वप्निल की,
रेखा सी मन में खिंच जाती।
नयनों में सुंदर सपनों के,
कितने दीपक जल उते हैं॥ ३.
अहं भाव से ग्रस्त शत्रु जब,
देश पै आंख गढाने लगता।
वीरों के नयनों में दीपित ,
रक्त खौलने लग जाता है।
जन मन गण में शौर्य भाव के,
कितने दीपक जल उठते हैं॥ ४.
जब अज्ञान तिमिर छंट जाता,
ज्ञान की ज्योति निखर उठती है।
नये-नये ,विज्ञान ज्ञान की,
नित नव राहें दीपित होतीं ।
मन में नव संकल्प भाव के,
कितने दीपक जल उठते हैं॥ ५.
लेबल:
ज्ञान-संकल्प दीप,
दीप-तमस,
प्रिय-इच्छादीप,
शत्रु-शौर्य
भारत की स्थिति में सुधार...??????---डा श्याम गुप्त....
<-----बड़ा शोर मचाया जारहा है भारत की स्थिति में सुधार का । दिए गए समाचार के अनुसार यदि स्वतन्त्रता के छ : दशक बाद भी भारत, बंगलादेश, लंका, पाकिस्तान,नेपाल से भी स्वास्थ्य, शिक्षा व लिंगभेद में पीछे है तो फिर सुधारकिस में व किस बात का , प्रगति किस बात की ?...आमदनी में, खेळ में ,फैशन में , सिनेमा, टी वी, मोबाइल व अन्य आयातित विचार ,संस्कृति , उपभोग के उपकरणों -बस्तुओं, प्रसाधनों के उपभोग-उपयोग- प्रयोग में, जो आभासी है , नक़ल पर आधारित, व विदेशी सहायता पर आधारित है ; खेळ भ्रष्टाचार , सांस्कृतिक भ्रष्टाचार तथा हर क्षेत्र में महा- भ्रष्टाचार में |----शिक्षा, स्वास्थ्य, चरित्र व लिंगभेद ही तो किसी समाज के सामाजिक स्थिति के वास्तविक दर्पण होते हैं , जहां --हम कहाँ हैं ---आज दीपावली के , अग्निशिखा के , अग्ने ( विद्वानों , गुणीजनों के व्यवहार ---अग्ने ने सुपथा राये...) के अंतर्मंथन के पर्व पर हम सब सोचें -विचारें, एवं कुछ उपाय व कर्तव्यों पर पुनर्विचार व मंथन करें ।
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