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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...

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Lucknow, UP, India
एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त

बुधवार, 16 जनवरी 2013

श्री लंका यात्रा वृत्त...... भाग एक --भूगोल व इतिहास ..... डा श्याम गुप्त ...

                                      
                             ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

                                               श्री लंका यात्रा-वृत्त  
                     ( मेरी श्री लंका यात्रा  २२-१२-१२ से ३०-१२-१२ तक...)
         
किसी भी  स्थान या देश की यात्रा का पूर्ण आनंद लेने के लिए उसके यात्रा संबंधी ज्ञान, होटल आदि रहने के स्थान, दर्शनीय स्थल आदि की प्रारम्भिक जानकारी एवं कार्यक्रम का पूर्व निर्धारण के साथ साथ ही  उसके भूगोल एवं इतिहास का  मूल –सामान्य ज्ञान भी लेलिया जाय तो यात्रा और आनंदमय-ज्ञानमय होजाती है जो यात्रा,टूरिज्म का मुख्य उद्देश्य है |
                           श्री लंका का भारत से सदा ही गहन रूप से जुड़ा रहा  रहा है|  गोंडवाना लेंड के दक्षिणी ध्रुव  अंटार्कटिका से  आस्ट्रेलिया व भारतीय भूमि-भाग पृथक होने  पर लंका भारतीय भूमि से ही जुड़ा हुआ था |  

     श्री लंका का भूगोल श्री  लंका हिन्द महासागर में भारत के दक्षिण में ६ से १० डिग्री उत्तरी अक्षांश पर स्थित एक द्वीप है | केन्द्रीय पहाडी एवं तटीय मैदानी भागों वाला यह द्वीप जंगली हाथियों व भैसों के बहुतायत से पूर्ण है| ( इसीलिये पौराणिक राम-कथानुसार कुम्भकर्ण को जगाने हेतु भैंसों के  परिक्रमा व बलि दी जाती थी ) मानसून वाले इस द्वीप में वार्षिक वर्षा २५० -५०० सेमी तक होती है | वार्षिक औसत ताप २७ डिग्री से व पहाड़ों पर १५ से तक एवं नमी ७०-९० % तक रहती है|  भूगर्भ से रत्न, व लौह अयस्क के भण्डार व समुद्र से मोती यहाँ प्राप्त होते हैं|
 

श्री लंका का इतिहास ---
A.पौराणिक इतिहास ----

------- विश्वकर्मा द्वारा शिव के लिए बनाई गयी लंका, कैलाश से पहले शिव के उपासकों नागों, देवों, मानवों जातियों व शिव-गणों का निवास स्थान था | भारतीय सप्तर्षियों में से एक पुलस्त्य के पुत्र विश्रवा जो महान जैव विज्ञानी ( जेनेटिक विज्ञानी ) थे और विविध –विचित्र शरीर वाले मानव, बौने, जानवर-मानव मिश्रित मानव, भूत-प्रेत, आदि का (शिव के गण) निर्माण किया करते थे | लंका का प्रारंभिक नाम हेला द्वीप था |
--- ब्रह्मा के वरदान से शक्तिशाली हुए दैत्य—माली, सुमाली आदि ने लंका पर अधिकार कर लिया एवं स्वर्ग पर चढ़ाई के उपरांत विष्णु की सहायता से देवों ने उन्हें हराकर शिव की इच्छानुसार विश्रवा के पुत्र यक्षराज कुबेर को सौंप दी और यक्ष - संस्कृति की स्थापना हुई || रत्नों की भरमार होने से उसका नाम “रत्नद्वीप” हुआ |
----- विश्रवा के दैत्य पत्नी से पुत्र आर्य व दैत्य वर्णसंकर रावण ने कुबेर से लंका छीन कर वहां रक्ष –संस्कृति स्थापित की तथा लंकापुरी के नाम से प्रसिद्द हुई | विद्वान् व महान वैज्ञानिक पिता विश्रवा के ज्ञान की छाया में अत्यधिक भौतिक उन्नति के कारण रावण के राज्य में गरीबी  से गरीब भी  सोने के वर्तनों का प्रयोग करता था अतः वह सोने की लंका के नाम से प्रसिद्ध हुई |  नाग, देव, यक्ष, राक्षस, मानव  सभी यहाँ के निवासी थे |         राम-रावण  युद्ध में राम की सहायता हेतु दक्षिण भारत से शिवपुत्र कार्तिकेय  को भेजा गया था इस प्रकार श्री लंका में भारतीय तमिल मूल के हिन्दू-निवासियों का भी आगमन हुआ|
--- रावण के पतन के उपरांत छोटे भाई राम-भक्त विभीषण, नरेश बना और वैष्णवों-देवों की आर्य-हिन्दू संस्कृति  पुनः स्थापित हुई | नाग, देव, यक्ष, राक्षस ,मानव सभी पूर्ण शान्ति व समन्वय के साथ रहने लगे | आगे द्वापर-युग में युधिष्ठिर के अश्वमेध यज्ञ के अवसर पर सहदेव व अश्व का भारत के दक्षिणी तट पर लंका से आकर विभीषण ने रत्नाभूषणों सहित स्वागत किया था व युधिष्ठिर की अधीनता स्वीकार की थी |
 

रामसेतु -एडम्स ब्रिज या रावण सेतु
B. आधुनिक इतिहास ---पाषाण -औज़ार व अन्न -जौ आदि की खेती के प्रमाणों के अनुसार श्री लंका में पाषाण-युग में -१८००० ईशापूर्व..बालगोंड़ा मानव की उपस्थिति थी| योरोप से काफी पहले श्री लंका में जौ आदि अन्न की खेती से मानव परिचित था.... लौह-युग | आधुनिक खोजों के अनुसार राम-रावण युद्ध ७-८हज़ार वर्ष पूर्व एवं रावण का राज्य भी ४६०० ईपू निर्धारित होता है | एडम्स ब्रिज  या रामसेतु ( या  लंका के अनुसार रावण सेतु ) लगभग १७५०००० वर्ष पुराना है ( नासा _) यही  समय पृथ्वी पर प्रथम मानव के अवतरण का स्थापित होता है |
     
--- आधुनिक ज्ञात  इतिहास ६०० ईशा पूर्व ..उत्तर भारतीय प्रदेश कलिंग के सिंहली राजकुमार विजय के श्रीलंका पर आधिपत्य से प्रारम्भ होता है | उस समय आदिवासी यक्का लोग ( धनुष-वाण  वाले शिकारी कबीले  ---यक्का = यक्ष या राक्षस ? ) व वेददा लोग ( ?  देव नाग आदि वैदिक संस्कृति के ) वहा थे | यक्का राजकुमारी ‘कुवैनी’ से विवाहोपरांत वेददा कबीला की महत्ता बढ़ी एवं  भारतीय पांडु-राजकुमारी से ‘सिंहली’ वंश व हिन्दू राज्य की स्थापना हुई | प्राचीन मुख्य ग्राम  सबारागामुवा ( ? सबर गाँव –भारतीय शबर कबीले का गाँव ) को अनुराधापुरा नाम से राजधानी बनाया गया | पत्ते की शक्ल के द्वीप के कारण लंका का नाम ताम्रपर्णी हुआ|

--- भारतीय तमिल राजा चोल- गुटटका द्वारा सिंहल राज्य को हराकर अनुराधापुरा में तमिल –द्रविड़ राज्य  की स्थापना  की गयी ..| ..इस प्रकार नाग, यक्ष ( यक्का )तमिल, सिंहल आदि सभी आर्य-हिन्दू वंशों का राज्य विभिन्न प्रदेशों में चलता रहा, जो आपस में युद्दरत रहते थे|
 ---- लगभग २०० ईपू में  मौर्य सम्राट अशोक के पुत्र महेंद्र व पुत्री संघमित्रा द्वारा बौद्ध धर्म के श्रीलंका में प्रसार एवं तत्कालीन नाग राजा टिस्सा द्वारा बौद्ध धर्म ग्रहण करने पर लंका का राजकीय धर्म बुद्ध धर्म  हो गया अतः लंका एक बौद्ध-धर्म प्रधान देश बना |
---- १०० ईपू में सिंहल राजा दुत्तगामनी ने  लंका में  तमिल राजा को हरा कर पुनः सिंहल राज्य की स्थापना की एवं लंका का नाम सिंहल हुआ...  सदियों तक तमिल, नाग, सिंहल राज्य विभिन्न भागों में राज्य करते रहे एवं आपस में युद्धरत रहते रहे |
---- १८०० ई में अंग्रेजों के अधिकार होने पर सिंहल को अंग्रेज़ी में सीलोन बना दिया गया | जो ०४-फरवरी १९४८ ई में श्रीलंका के नाम से स्वतंत्र  जनतंत्र  राज्य  बना | श्री लंका का मूल धर्म बौद्ध-धर्म है  परन्तु ईसाई , हिन्दू एवं मुस्लिम धर्म के लोग भी यहाँ रहते हैं | देश में  अंग्रेज़ी, सिंहली एवं तमिल तीनों भाषाएं आधिकारिक भाषा हैं|
              ----- क्रमश ---भाग दो... कोलम्बो ...

मंगलवार, 15 जनवरी 2013

हम, तब और अब... दृष्टिकोण व चरित्र ...डा श्याम गुप्त

                                        ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



                 जब आशा आकांक्षा इच्छा लोभ एवं भय मानव मन में पदार्पण कर जाते हैं तो उसका दृष्टिकोण स्व-केंद्रित होजाता है और निष्ठा सत्य व ईश्वर के अपेक्षा आत्म-निष्ठ होजाती है | तब .मन की यह स्थिति होती  है कि –
                         “सच बोलने की चाहत तो बहुत थी लेकिन,
                           क्या  करें हिम्मत ही न  हम जुटा पाए  |”


             इस दृष्टिकोण में हम इतने किन्कर्तव्यविमूढ होजाते हैं कि चाहते हुए भी उचित समय पर तदनुरूप अनीति, अनैतिकता, अकर्म, दुष्कर्म अनाचार आदि का विरोध नहीं कर पाते | यह एक प्रकार का असुरक्षा भाव जनित  आत्मरक्षार्थ भाव की उत्पत्ति के कारण होता है|
             हम तब ( आज से युगों-सदियों पहले ) भी ऐसे ही थे ..आज भी 
             महाभारत में द्रौपदी चीर-हरण ...के समय महापराक्रमी भीष्म आदि अनेकों लोगों के लिए भी यही सच है कि ..विभिन्न आशा आकांक्षा इच्छा लोभ एवं भय के कारण ही कहना चाहकर भी कोई  विरोध नहीं कर पाया | महापराक्रमी भीष्म की भी महान कहलाने की इच्छा ही तो विरोध न कर पाने का कारण थी | यद्यपि बाद में लोगों ने, पराक्रमियों ने बड़ी-बड़ी प्रतिज्ञाएँ कीं, निभाईं गयीं, युद्ध हुआ |
            आज दिल्ली वलात्कार केस में भी ...दो घंटे तक दो घायल प्राणी सड़क पर पड़े रहे परन्तु मोटर, कार, बसें, पैदल-यात्री  निकलते रहे परन्तु किसी ने तुरंत अपने आप  सहायता का फैसला नही  लिया | इसी भय एवं आत्म-निष्ठता भाव के कारण सत्य व ईश्वर भाव को भुला दिया जाने के कारण| बाद में वही हम सब लोग एकत्रित होकर नारे लगाते रहे , मोमबत्ती जलाते रहे, कड़ी ठण्ड में भी नहीं डगमगाए टीवी के सामने, रेलियाँ भी करते रहे....| दूरदर्शन पर बहसें, वार्ताएं भी हुईं | विभिन्न वक्तव्य भी आये इसी आशा आकांक्षा इच्छा लोभ एवं भय के कारण उत्पन्न आत्मरक्षार्थ भाव हित कि कहीं हम पीछे न रह जायं | |
               अन्य व्यवहारों, कलापों के बारे में भी यही सच है कि हम बदले नहीं, वहीं के वहीं हैं | भौतिक उन्नति से, अट्टालिकाओं में निवास, वस्त्राभूषणों  से, महानगरों से भी मानव–आचरण बदला नहीं है | तब हम तलवारों से लड़ते थे, विरोधी को युद्ध में तलवारों से मौत के घाट उतारा करते थे, आज  भी विरोधी का मुंह बंद करने, अपने स्वार्थ साधन हेतु कलम की तलवार से , झूठ ,चरित्र हनन आदि द्वारा मरणासन्न किया जाता है ...अपितु आज भी हत्या द्वारा भी | तब तलवार से युद्ध होता था आज वाकयुद्ध होता है, वार्ताएं, बहसें , आलेखबाज़ी |
         अर्थात मानव वस्तुतः पहले भी वही था आज भी वही है | यह क्यों होता है ? क्यों मानव में यह दृष्टिकोण एवं आत्मरक्षार्थ भाव की उत्पत्ति होती है| वही आशा आकांक्षा इच्छा लोभ एवं भय के कारण वह सत्य व ईश्वर से दूर होजाता है |

          परन्तु आगे प्रश्न  यह है कि उसमें ये आशा आकांक्षा इच्छा लोभ एवं भय क्यों उत्पन्न होते है | क्योंकि वास्तव में वह अपने आचरण व व्यवहार में सत्य व ईश्वर को भुला कर  उनसे से दूर होजाता है.... हम सब कुछ हैं, हम सब कुछ कर सकते हैं, मानव ही अपना भाग्यविधाता है इस  अतिशय  सोच के कारण  ...  भी उसमें आशा आकांक्षा इच्छा लोभ एवं भय आदि भाव उत्पन्न होते हैं| यहीं व्यवहारिक दृष्टिकोण की अपेक्षा चरित्र की महत्ता व्यक्त होती है जो सत्य, निष्ठा, अनुशासन, आचरण-शुचिता,एवं ईश्वर पर विश्वास से उत्पन्न होती है | यह एक क्रमिक –चक्रीय व्यवस्था  है .......| शायद इसे ही कर्म-फल या भाग्य  कहते हैं एवं शुचि-कर्मों, सत्य, धर्म व आचरण ,आत्म-विवास के साथ-साथ ,.... ईश्वर में आस्था का  यही महत्ता है|

सोमवार, 14 जनवरी 2013

बिज़नेस वूमेन ऑफ़ इंडिया ......डा श्याम गुप्त ..

                          ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...


नैना लाल हेड ,एच एस बी सी  इंडिया







नीलिमा धवन  एम् डी, एच पी , इंडिया
























                  जैसा कि हम ऊपर निम्न चित्रों .( -इकोनोमिक -टाइम्स --साभार ). में देख रहे हैं कि कारपोरेट जगत की लगभग सभी महिला हस्तियाँ  साड़ी..या सलवार-सूट के सुरुचिपूर्ण, गरिमापूर्ण  पहनावे में हैं .....यहाँ  फिल्म व राजनीति जगत की महिलायें नहीं रखी  गयी हैं क्योंकि उन पर  पहनावे के  नाटक का आरोपण  भी हो  सकता है .......



 -----तो क्या कारण  है कि ..हमारे समाचार पत्र बिज़नेस वूमेन इन भारत ..में मीटिंग ..के समय सभी पुरुषों को सूटेड--बूटेड  परन्तु महिला बौस को विचित्र ...इनडीसेंट सी वेश-भूषा में दिखलाते हैं.....क्यों??????
 -------  यह विरोधाभास किसलिए  !!!!

------ प्रायः महिला आफिस कर्मी, सेक्रेटरी आदि महिला कर्मी , अन्य  निम्न स्तरों पर   महिलाकर्मी व विज़िनेस - वूमेन ...इसी प्रकार के  विचित्र परिधानों में दिखाई पड़ती हैं.....क्यों ????...
-----क्या यह इस प्रकार का  प्रचार या दुष्प्रचार या जान बूझ कर किया हुआ प्रचार इसका का कारण है या अन्य  ..??????????
और क्यों ????????????




















रविवार, 13 जनवरी 2013

पुरा व नव का समन्वय एवं स्व -संस्कृति का ज्ञान व मान ही प्रगति है.... डा श्याम गुप्त ..

                            ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

                                विवेकानन्द जयन्ती पर  ... स्वामी जी के विचारों द्वारा आज के परिप्रेक्ष्य  में ..समाज, स्त्री-पुरुष द्वारा ....आवश्यकताओं , सीमाओं व आचरण को  व्याख्यायित...उद्घाटित करता नरेंद्र कोहली का आलेख .........

शनिवार, 12 जनवरी 2013

कैसा आदर्श..कैसी आदर्श पत्रकारिता....डा श्याम गुप्त

                                           ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...







                           एक बहु प्रचारित  व प्रतिष्ठित समाचार पत्र...राजस्थान पत्रिका का यह हाल है कि उसके मुख्य सम्पादक दार्शनिक श्री गुलाब कोठारी जी एक तरफ तो ..आदर्श पत्रकारिता की बातें कहते नहीं अघाते ...उनकी कवितायें..आलेख..कृतित्व भी सदाचरण की बातें कहते नहीं थकते .....






 ----वहीं दूसरी ओर उसी राजथान पत्रिका में ---जेनुइन डेटिंग ....जेनुइन मीटिंग .... महिला-पुरुष मिलन के समाचार ( विज्ञापन ) प्रकाशित होते हैं ....














----- क्या ये अखबार वाले डेटिंग को, आपस में अनजाने स्त्री-पुरुष की मीटिंग को जेनुइन अर्थात उचित मानते हैं
...... यह कैसी भारतीय संस्कृति वाला समाचार पत्र है....
----- यह कैसी आदर्श पत्रकारिता है..... क्या पर उपदेश कुशल बहुतेरे ...को चरितार्थ नहीं कर रही ....
----- क्या यह कथनी व् करनी का अंतर नहीं है ...
------ क्या यह धन व व्यापार के हेतु .....अपना आचरण -विक्रय नहीं है.....
---- यदि एक आदर्श सम्पादक की आदर्श पत्रिका का यह हाल है तो हम मीडिया से क्या अपेक्षाएं रख  सकते हैं .........

गुरुवार, 10 जनवरी 2013

दोष मेरा है...कविता ...... डा श्याम गुप्त


                                ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...



                                

आज जब मैं हर जगह ,
छल द्वंद्व द्वेष पाखण्ड झूठ ,
 अत्याचार व अन्याय -अनाचार
को देखता हूँ ;
उनके कारण और निवारण पर ,
विचार करता हूँ ,
तो मुझे लगता है कि -
दोषी मैं ही हूँ ,
सिर्फ़ मैं ही हूँ ।

क्यों मैं आज़ादी के पचास वर्ष बाद भी
अंग्रेज़ी में बोलता हूँ ,
राशन की दुकान पर बैठ कर ,
झूठ बोलता हूँ , कम तोलता हूँ |

क्यों मैंबैंक के लाइन में लगना
अपनी हेठी समझता हूँ ,
यन केन  प्रकारेण  ,
पीछे से काम कराने को तरसताहूँ |

क्यों मैं 'ग्रेपवाइन' व 'ब्लोइंग मिस्ट'
 के ही पेंटिंग्स बनाता हूँ ,
'प्रसाद' और 'कालिदास' को भूलकर
शेक्सपीयर के ही नाटक दिखाता हूँ

क्यों मैं सरकारी गाडी में ,
भतीजे की शादी में जाता हूँ,
प्राइवेट यात्रा का भी ,
टीऐ पास कराता हूँ |

क्यों मैं किसी को जन सम्पत्ति -
नष्ट करते देखकर नहीं टोकता हूँ ,
स्वयं भला रहने हेतु
जन-धन की हानि नहीं रोकता हूँ |

क्यों मैं रास्ते रोक कर
शामियाने लगवाता हूँ ,
झूठी शान के लिए
अच्छे खासे सड़क को बर्वाद कराता हूँ |

क्यों मैं किसी सत्यनिष्ठ व्यक्ति को देखकर,
नाक-मुंह सिकोड़ लेता हूँ ,
सामने ही अपराध, भ्रष्टाचार ,लूट-खसोट , बलात्कार
होते देख कर भी मुंह मोड़ लेता हूँ

क्यों मैं कलेवा की जगह ब्रेकफास्ट व
खाने की जगह लंच उडाता हूँ ,
राम नवमी की वजाय , धूम धाम से
वेलेंटाइन डे मनाता हूँ |

क्यों मैं रिश्वत के पहिये को
और आगे बढाता हूँ,
एक जगह लेता हूँ
छत्तीस जगह देता हूँ |

क्यों मैं भ्रष्ट लोगों को वोट देकर
भ्रष्ट सरकार बनाता हूँ ,
अपने कष्टों की गठरी
अपने हाथों उठाता हूँ |

क्यों मैंने अपना संविधान
अन्ग्रेजी में बनाया ,
जो अधिकांश जन समूह की
समझ में ही न  आया |

आप लड़िये या झगडिये ,
दोष चाहे एक दूसरे पर मढिये ,
दोष इसका है न उसका है न तेरा है ,
मुझे शूली पर चढादो ,
दोष मेरा है।

बुधवार, 9 जनवरी 2013

शिशिर .;;; डा श्याम गुप्त ...

                                   ....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...







                    प्रेम -- किसी एक तुला द्वारा नहीं तौला जा सकता , किसी एक नियम द्वारा नियमित नहीं किया जासकता ; वह एक विहंगम भाव है | 
         --शिशिर में मन का एक विहंगम भाव-----
                      
                     
 
                  शिशिर
 मैंने ही  भूलें की होंगी , स्वीकृति पाती भेज रहा हूँ |
तेरी याद पुरानी हे प्रिय! मन में अभी सहेज रहा हूँ ||

शुष्क पात जब एक टूटकर, गिरा सामने, यह सच पाया |
देखी अपनी जीवन छाया, मैं समझा तब पतझड़ आया ||

तेरे बासंती तन मन से, मैं क्यों इतना दूर होगया |
समझ न पाया क्यों तेरा मन, अहंकार में चूर होगया ||

तेरी नेक वफाओं को मैं, अब तक कहाँ भुला पाया हूँ |
तेरे पावन मन की बातें, मन से कहाँ मिटा पाया हूँ ||

तेरी बातें  सच का सपना,  मैं  भूलों की भंवर पड़ा था |
अपनेपन में मस्त रहा मैं,पुरुष अहं में जकड खडा था ||

सूखे हुए गुलाब रखे जो , पन्नों बीच, सहेज रहा हूँ |
मैंने ही भूलें की होंगी , स्वीकृति पाती भेज रहा हूँ ||

तुमने भी यदि रखे सहेजे,  कुछ सूखे गुलाव पुस्तक में |
तुमको जो कुछ सत्य सा लगे,मेरी इस स्वीकृति दस्तक में|

खत  रूपी इक शुष्क पात ही, आशा, क्षमा रूप मिल जाए |
अपने जीवन के पतझड़ में , शायद फिर बसंत मुस्काए ||

पाती पढ़ बेचैन होगये,झर झर झर निर्झर नैन होगये |
मैंने क्यों न पुकारा तुमको,क्यों मेरे सुख चैन खोगये ||

अहं भाव तो मुझ में ही था,शायद समय चक्र यह ही  था |
सोचा ही क्यों ऐसा हमने , कौन गलत था कौन सही था !

सही गलत अनुबंध शर्त सब, भला प्यार में कब होती  हैं |
मेरे गीत नहीं अब बनते,  आँखें झर झर झर रोती  हैं ||

क्षमा मुझे अब तुम ही करदो, स्वीकृति पाती भेज रही हूँ |
आशा रूपी नूतन किसलय, पत्र सजाकर भेज रही हूँ ||