ब्लॉग आर्काइव
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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...
- shyam gupta
- Lucknow, UP, India
- एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त
बुधवार, 28 मार्च 2018
रविवार, 25 मार्च 2018
रामनवमी पर विशेष --- -----राम की राजनीति--- डा श्याम गुप्त...
....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...

रामनवमी पर विशेष ---
-------------------------
राम की राजनीति---
===============
---- आज राम राजनीति के केंद्र तो हैं परन्तु राम की राजनीति राजनैतिक केंद्र से दूर है | राम का चरित्र, उनकी कार्यशैली व कृतित्व, चाहे वे राजमहल में हों या वनवास में, ही उनकी राजनीति है |
------दृढ़ निश्चय, गुरुजनों से मंत्रणा, समाज के जन जन ..बड़े से लेकर छोटे से छोटे तक का दुःख हरण, उचित क्रियाशैली व नीति निर्धारण , सभी का उचित सहयोग ,कठोर परिश्रम जन जन का उत्थान व शिक्षा ही रामराज्य की नींव है---
--------मेरे काव्य उपन्यास, शूर्पणखा खंडकाव्य से राम की राजनीति के कुछ दृश्य प्रस्तुत हैं ----
सर्ग-४.मंत्रणा
===========
९-
ऋषि-मुनि गण एवं वनचारी,
सबको प्रभु ने आश्वस्त किया|
अत्याचार न होगा कोई,
जो अब तक होता आया है |
कोई मख विध्वंस न होगा,
कुटिया का भी ध्वंस न होगा३ ||
१०-
धनुष वाण है हाथ राम के,
परम वीर सौमित्र यहाँ हैं |
आ न सकेंगे इधर ,निशाचर,
करें सभी निर्भय होकर के;
यज्ञादिक शुभ कर्म सभी फिर,
उठे सुवासित धूम गगन में४ ||
११-
ऋषि-प्रणीत जीवन धारा की५ ,
सुरसरि फिर से बहे, धरा पर |
निशाचरी माया नगरी की,
हवा नहीं इस ओर बढ़ेगी |
मर्यादा की मलयज शीतल ,
बहे समीर पुनः हर ओर ||
सर्ग ५...पंचवटी
===============
३-
मुनि अगस्त्य से बोले रघुवर,
तात ! आपका ज्ञान व अनुभव;
एवं कठिन कर्म और ब्रत का,
सारे जग में यश फैला है |
यह भूभाग आपके कारण,
ज्ञान-वान, समृद्ध हुआ है ||
४-
उचित मन्त्र दें, वही करूँ में ,
जिससे प्रिय हो आप सभी का |
हो उद्देश्य पूर्ण, मेरा भी,
नाश करूँ सब दैत्य वंश का |
लक्ष्मण समझ रहे थे अब कुछ,
नमन किया प्रभु की लीला को ||
५-
ऋषिवर, इस दक्षिण अंचल के,
कण कण का है ज्ञान आपको;
रहना उचित कहाँ पर होगा ?
पाप घड़ा भर चुका दैत्य का,
अब विलम्ब का काम नहीं है;
यह संधान कहाँ से होगा ||
६-
१२-
पंचवटी अति सुन्दर पावन,
धाम है, 'दंडक-वन'३ में रघुवर |
रहें वहां पर पर्णकुटी४ कर,
मिट जाएँ कलुष-दोष वन के |
दंडक वन होजाए पावन ,
ऋषि-मुनि विचरें निर्भय होकर ||
१३-
अधिग्रहण किया जो दैत्यों ने,
वह जनस्थान५ भी निकट रहे |
आते-जाते निशिचर, दुष्टों,
की बातों का भी पता चले |
उस रावण के अधिकृत प्रदेश-
से, दुष्ट-दैत्य, आते रहते ||
१४-
सूचना व अवसर पाने का,
है उचित क्षेत्र यह दंडक वन |
थर्राया है जो, असुरों के -
अति अत्याचारी कृत्यों से |
रह पंचवटी६ में राम, करो-
तुम दुष्टों का अब शीघ्र दलन ||
१५-
दिव्यास्त्र अनेक दिए ऋषि ने,
फिर बोले-तुम तो राम स्वयं ,
हो संचालन संधान कुशल |
जाने कितने ही दिव्य अस्त्र,
प्रभु तरकश में शोभायमान ;
है शस्त्रों की शोभा तुमसे ||
१६-
अस्त्रों से सिर्फ नहीं कोइ,
मानव शोभा पाजाता है |
शस्त्रों को रख निज साथ नहीं,
वह परमवीर बन जाता है |
मिल जाएँ यदि अपात्र को तो,
इन की महिमा घट जाती है ||
१७-
दृढ -इच्छा, साहस, कर्मठता,
नैतिक बल, अस्त्र है बीरों का|
तुम ग्रहण करो हे राम! बढे,
इन शस्त्रों की शोभा तुमसे |
सह न सकेगा रिपु कोई,
वर्षा अब राम के तीरों की || ----
१९-
दंडक वन में पहुंचे रघुवर,
मिले जटायू गृद्धराज वर |
मित्र, पिता दशरथ के थे,प्रिय,
सादर वंदन किया सभी ने |
कुशलक्षेम कौशलपति की वे,
लगे पूछने,भाव-विह्वल हो ||
२१-
फिर विस्तार सहित घटनाक्रम,
कारण अपने विपिन-वास का;
रघुवर ने उनको बतलाया |
किया निवेदन, तात ! आप भी,
बनें सहायक धर्म कार्य हित;
उचित मंत्रणा दें हम सबको ||
२२-
आशीर्वाद सदा है मेरा,
राम,बनो तुम खलु-दल भंजक|
मेरा मेरे दल-बल१ का भी,
सदा पूर्ण सहयोग रहेगा |
पूरा हो उद्देश्य राम का,
पापमुक्त हो अब यह अंचल ||
२३-
वनचर, बनवासी अरण्य के ,
हैं अति त्रस्त अनाचारों से |
ज्ञान-धर्म,जन-नीति सभी कुछ,
कलुषित हैं; दूषित भावों के -
अति प्रचार एवं प्रसार से २ ,
है प्रमाद ने किया बसेरा ||
२४-
अकर्मण्यता, प्रमाद व लिप्सा,
भोग-भाव औ असत कर्म से ;
ध्वस्त हो गईं रीति-नीति सब,
ध्वस्त हुई है अर्थव्यवस्था |
दीन-हीन हो पिछड़े सबसे,
भोग रहे निज कर्मों का फल ||
२५-
यदि हो साथ राम का पौरुष,
भक्ति-शक्ति सौमित्र के जैसी;
सीता सी प्रभु प्रीति-रीति हो,
सोने में होजाय सुहागा |
बिना भक्ति और ईश कृपा के,
किसको भला विवेक हुआ है ||
२६-
युग-शिक्षा नव ज्ञान-रश्मि से,
नव-प्रकाश फैलाना होगा |
कला शिल्प साहित्य आदि का,
जन मन भाव जगाना होगा |
स्वतंत्रता स्व -भाव आदि भी,
जगें, सभी के अंतर्मन में ||
२७-
हर, प्रमाद अज्ञान अयोग्यता ,
सब विधि योग्य बनाएं सबको |
नहीं योग्यता की कोई भी,
कमी किसी में भी रह जाए |
ज्ञान कुशलता और योग्यता,
से न करें कोई समझौता ३ ||
२८-
स्त्री-शिक्षा पर सब विधि से,
कुछ ध्यान अधिक देना होगा |
शिक्षित नारी ही है राघव!
उन्नायक अगली पीढी की |
सक्षम है वही रोकने में,
जाने से असत मार्ग नर को ||
२९-
विदुषी, शिक्षित और साक्षर,
नारी ही आधार है सदा ;
हर समाज की, नर जीवन की |
वही समय पड़ने पर , नर से-
कदम मिलाकर चल सकती है४ |
जीवन करती सुन्दर -समतल ||
३०-
चाहे जितनी भीड़ साथ हो,
यदि अयोग्य हो, काम न आये |
पूर्ण योग्यता ज्ञान के बिना ,
कोई कार्य पूर्ण कब होता |
तप संयम कठोर अनुशासन,
से ही पूर्ण योग्यता मिलती ||
३१-
पिछड़े दीन-हीन या ज्ञानी,
सबको साथ लिए चलना है |
अस्त्र-शस्त्र निर्माण कर्म और -
लड़ने योग्य बनाएं सबको |
आतातायी के विरोध का,
स्वर, जन जन में उठे ज्वार बन ||
३२-
नए नए अस्त्रों शस्त्रों का,
संचालन भी सिखलाना है |
जन-जन, मन से महायज्ञ में,
दे सहयोग, बताना है यह |
हर घर में हे राम! ज्ञान का,
एक-एक दीपक जल जाए ||
३३-
अक्रियता अज्ञान और भय,
हट जाए जन जन में मन से |
अपनी स्वयं की अर्थव्यवस्था,
से यह वन समृद्ध बन सके |
कर्म-चेतना से यह अंचल,
सक्रिय सबल, संबल बन जाए ||
३४-
जन जन का बल, युद्ध काल में,
सबसे बड़ा शस्त्र५ होता है |
राघव ! सब से बड़ी सुरक्षा-
शक्ति, योग्य जन-बल होता है |
उचित समय पर दंडक वन क्या-
जन स्थान भी साथ खडा हो ||-----सर्ग ५...पंचवटी
१८-
देश की रक्षा, संस्कृति रक्षण ,
तथा प्रजा के व्यापक हित में ;
अधर्मियों से विधर्मियों से,
अन्यायी लोलुप जन जो हों ;
कभी नहीं समझौता करता ,
वही नृपति अच्छा शासक है ||
१९-
पर जो शासक निज सुख के हित,
अत्याचार प्रजा पर करता |
अधर्म-मय, अन्याय कर्म से ;
अपराधों को प्रश्रय देता |
अप विचार, अपकर्म भाव में,
जन जन पाप-लिप्त हो जाता ||
२०-
हिंसा चोरी अनृत भावना,
नर-नारी को भाने लगती|
अश्लील कृत्यों से नारी,
अपने को कृत-कृत्य समझती |
लूट अपहरण बलात्कार के,
विविध रूप अपनाए जाते ||
२१-
अति भौतिक सुख लिप्त हुए नर,
मद्यपान आदिक विषयों रत;
कपट झूठ छल और दुष्टता,
के भावों को प्रश्रय देते |
भ्रष्टाचार, आतंकवाद में,
राष्ट्र, समाज लिप्त हो जाता ||
२२-
पाप, अधर्म-नीति कृत्यों से,
प्रकृति माता विचलित होती |
अनावृष्टि अतिवृष्टि आदि से,
धरती की उर्वरता घटती |
कमी धान्य-धन की होने से,
बनती है अकाल की स्थिति ||
२४-
लक्ष्मण,तुम अब जान चुके हो,
मूल उद्देश्य, वनागमन का |
नाश राक्षसों का करना है ,
स्थिर करना है फिर हमको;
शास्त्र धर्म शुचि मर्यादाएं ,
ऋषि प्रणीत जीवन शैली की ||
२५-
इस अंचल के पिछड़े पन को,
हमको दूर हटाना होगा |
शिक्षा देकर के जन जन का,
जीवन सुलभ बनाना होगा |
विविध शिल्प औ शस्त्र कला का,
उन्हें कराना होगा ज्ञान ||
२६-
दुखी असंगठित एवं पिछड़ी,
प्रजा रहे, वह राजा ही क्या |
एसे किसी राज्य का लक्ष्मण,
राजा बन कर भी क्या करना |
शिक्षित सुखी संतुष्ट प्रजा ही,
उन्नत सिर हैं राजाओं के ||
२७-
शिक्षित सज्जन सुकृत संगठित,
बनें क्रान्ति में स्वयं सहायक ;
लक्ष्मण सदा सफल होती वह |
पर असंयमित हो जाती है,
भीड़ अशिक्षित हो, असंगठित;
भय विघटन,प्रति-क्रान्ति का रहता ||
२८-
आताताई के विरोध में,
जन संकुल को लाना होगा |
जन जन ज्वार समर्थन से ही ,
मिल पायेगी विजय युद्ध में |
बड़ी बड़ी सेनाओं से भी,
नहीं कार्य यह सध पाता है ||
२९-
यदि मैं सेना लेकर आता,
प्रतिपग मग पर विरोध होता |
राज्य प्रसार लालसा का भी,
कौशल पर आक्षेप ठहरता |
सतर्क होजाते राक्षस -कुल,
पूरी तैयारी से पहले ||
३०-
लक्ष्मण हमको इसी भूमि की ,
मिट्टी से हैं वीर उगाने |
आतंक और अन्याय भाव से,
लड़ने के हैं भाव जगाने |
ताकि लौटने पर हम सबके,
वे हों स्वयं कुशल निजहित में ||
३१-
शीश नवा कर लक्ष्मण बोले-
राम नाम की महिमा से प्रभु,
मिट्टी भी सोना होजाती |
इच्छा है जब स्वयं राम की,
सोती धरती जाग उठेगी ;
आज्ञा दें अब क्या करना है ||
३२-
सभा, प्रबंधन और निरीक्षण ,
ऋषि-मुनियों संग विविधि गोष्ठियों ;
के आयोजन, कार्यान्वन का,
सारा भार लिया रघुवर ने |
नारी-वालक शिक्षा का और-
जन जागरण१ भार सीता ने ||
३३-
गृह निर्माण व युद्ध कला में-
विशेषग्य ,सौमित्र को मिला ;
भार प्रोद्योगिकी -शिक्षा एवं-
आयुध की निर्माण कला का |
एवं संचालन -कौशल को ,
जन जन में प्रसार करने का ||
३४-
लिखना पढ़ना व सद-आचरण,
महिलाओं बच्चों को, सबको;
अपनी कुटिया के कुंजों की,
छाया में वे जनक-नंदिनी;
आदर प्रेम से सिखलाती थीं,
दीप, दीप से जलता जाता२ ||
३५-
लक्ष्मण लगे सिखाने सब को,
धनुष बनाना, वाण चलाना |
शस्त्रों के निर्माण-ज्ञान सब,
शर-संधान व उचित निशाना |
धनुष-वाण, तरकश सब आयुध,
बनने लगे, हर कुटी वन में ||
३६-
सुन्दर सुद्रिड और सुरक्षित,
कुटिया-गृह निर्माण शिल्प का;
ज्ञान कराते थे रामानुज |
विविध शिल्प व श्रम की महत्ता -
उपयोगिता, दिखाते रहते;
हो स्वतंत्र निज अर्थ-व्यवस्था३ ||
३७-
ईश्वर महिमा, भजन-साधना,
लोक-कला, साहित्य-भावना;
चित्रकला, संगीत ज्ञान, सब-
बाल, वृद्ध, स्त्री-पुरुषों को ,
सिय-रामानुज लगे सिखाने ;
यह अंचल अब जाग रहा था ||
३८-
वन संपदा का रक्षण-वितरण,
विविधि भाँति फल-फूल उगाना |
नव-पद्दतियां, कृषि कर्मों४ की ,
सिखलाई जातीं कुटियों में |
वन व ग्राम की कला-कथाएं ,
सीखते व सुनते सिय-लक्ष्मण ||
३९-
योग भक्ति अध्यात्म ज्ञान का,
विविधि भांति की नीति-कथाओं ;
के ,कहने सुनने समझाने,
का क्रम स्वयं राम करते थे |
प्रातः सायं , प्रार्थना सभा में,
ऋषि-मुनियों का प्रवचन होता ||
४०-
रक्षा में, सौमित्र -गुणाकर,
किये नियोजित थे रघुवर ने |
पंचवटी का आसमान था,
यज्ञ -धूम से हुआ सुवासित |
कर्मठता से रामानुज की,
वन-उपांत५ थे अभय होगये ||
सप्तम सर्ग -संदेश
==============
२८-
नारी, केंद्र-बिंदु है भ्राता !
व्यष्टि,समष्टि,राष्ट्र की,जग की |
इसीलिये तो वह अवध्य है ,
और सदा सम्माननीय भी |
लेकिन वह भी तो मानव है,
नियम-निषेध मानने होंगे ||
२९-
नारी के निषेध-नियमन ही,
पावनता के संचारण की;
उचित निरंतरता समाज में,
सदा बनाए रखते, लक्ष्मण !
अवमानना, रेख-उल्लंघन,
कारण बनते, दुराचरण का ||
३०-
राजा जनता या प्रबुद्ध जन,
जब अपने दायित्व भूलकर;
उचित दंड यदि नहीं देते |
अनाचार को प्रश्रय देकर,
पाप-कर्म में भागी बनते;
नियम से नहीं ऊपर कोई ||
३३-
विविध कारणों से यदि नारी,
मर्यादा उल्लंघन करती |
दुष्ट भाव, स्वच्छंद आचरण,
से समाज दूषित होजाता |
कई पीढ़ियों तक फिर लक्ष्मण,
यह दुष्चक्र चलता रहता है ||
३४-
जब उद्दंड, रूप-ज्वाला युत,
और दुर्दम्य काम-पिपासा-
युक्त ताड़का१ से कौशिक का ;
तेज, तपस्या-बल गलता था ,
अत्याचार, अनीति मिटाने;
उसका भी बध किया गया था ||
३५-
शूर्पणखा का दंड हे अनुज !
सिर्फ व्यक्ति को दंड नहीं है |
चारित्रिक धर्मोपदेश है,
नारी व सम्पूर्ण राष्ट्र को |
चेतावनि है दुष्ट जनों को ,
कुकर्म-रत नारी-पुरुषों को ||
४२-
परम प्रिया राजा दशरथ की,
राज्यकर्म और राजनीति पर;
उचित मंत्रणा देने वाली |
देव कार्य, इस महायज्ञ में,
वही आहुती दे सकती थी ;
अपने प्रेम,त्याग, महिमा की ||
४३-
विश्वामित्र-वशिष्ठ योजना४ ,
निशिचर-हीन मही करने की ;
कैकयि माँ ही केंद्र बिंदु है |
शिव की भाँति, गरल पी डाला,
सहमत कब थे राजा दशरथ ||
४४-
सेना से यह कार्य न होता५ ,
कोइ अन्य उपाय कहाँ था |
राक्षस-अपसंस्कृति विनाश का ,
ध्वजा धर्म की फहराने का |
जन जन हित में,विज्ञ जनों को,
सदा गरल यह पीना होगा || ----सप्तम सर्ग -संदेश
-------------------------
राम की राजनीति---
===============
---- आज राम राजनीति के केंद्र तो हैं परन्तु राम की राजनीति राजनैतिक केंद्र से दूर है | राम का चरित्र, उनकी कार्यशैली व कृतित्व, चाहे वे राजमहल में हों या वनवास में, ही उनकी राजनीति है |
------दृढ़ निश्चय, गुरुजनों से मंत्रणा, समाज के जन जन ..बड़े से लेकर छोटे से छोटे तक का दुःख हरण, उचित क्रियाशैली व नीति निर्धारण , सभी का उचित सहयोग ,कठोर परिश्रम जन जन का उत्थान व शिक्षा ही रामराज्य की नींव है---
--------मेरे काव्य उपन्यास, शूर्पणखा खंडकाव्य से राम की राजनीति के कुछ दृश्य प्रस्तुत हैं ----
सर्ग-४.मंत्रणा
===========
९-
ऋषि-मुनि गण एवं वनचारी,
सबको प्रभु ने आश्वस्त किया|
अत्याचार न होगा कोई,
जो अब तक होता आया है |
कोई मख विध्वंस न होगा,
कुटिया का भी ध्वंस न होगा३ ||
१०-
धनुष वाण है हाथ राम के,
परम वीर सौमित्र यहाँ हैं |
आ न सकेंगे इधर ,निशाचर,
करें सभी निर्भय होकर के;
यज्ञादिक शुभ कर्म सभी फिर,
उठे सुवासित धूम गगन में४ ||
११-
ऋषि-प्रणीत जीवन धारा की५ ,
सुरसरि फिर से बहे, धरा पर |
निशाचरी माया नगरी की,
हवा नहीं इस ओर बढ़ेगी |
मर्यादा की मलयज शीतल ,
बहे समीर पुनः हर ओर ||
सर्ग ५...पंचवटी
===============
३-
मुनि अगस्त्य से बोले रघुवर,
तात ! आपका ज्ञान व अनुभव;
एवं कठिन कर्म और ब्रत का,
सारे जग में यश फैला है |
यह भूभाग आपके कारण,
ज्ञान-वान, समृद्ध हुआ है ||
४-
उचित मन्त्र दें, वही करूँ में ,
जिससे प्रिय हो आप सभी का |
हो उद्देश्य पूर्ण, मेरा भी,
नाश करूँ सब दैत्य वंश का |
लक्ष्मण समझ रहे थे अब कुछ,
नमन किया प्रभु की लीला को ||
५-
ऋषिवर, इस दक्षिण अंचल के,
कण कण का है ज्ञान आपको;
रहना उचित कहाँ पर होगा ?
पाप घड़ा भर चुका दैत्य का,
अब विलम्ब का काम नहीं है;
यह संधान कहाँ से होगा ||
६-
१२-
पंचवटी अति सुन्दर पावन,
धाम है, 'दंडक-वन'३ में रघुवर |
रहें वहां पर पर्णकुटी४ कर,
मिट जाएँ कलुष-दोष वन के |
दंडक वन होजाए पावन ,
ऋषि-मुनि विचरें निर्भय होकर ||
१३-
अधिग्रहण किया जो दैत्यों ने,
वह जनस्थान५ भी निकट रहे |
आते-जाते निशिचर, दुष्टों,
की बातों का भी पता चले |
उस रावण के अधिकृत प्रदेश-
से, दुष्ट-दैत्य, आते रहते ||
१४-
सूचना व अवसर पाने का,
है उचित क्षेत्र यह दंडक वन |
थर्राया है जो, असुरों के -
अति अत्याचारी कृत्यों से |
रह पंचवटी६ में राम, करो-
तुम दुष्टों का अब शीघ्र दलन ||
१५-
दिव्यास्त्र अनेक दिए ऋषि ने,
फिर बोले-तुम तो राम स्वयं ,
हो संचालन संधान कुशल |
जाने कितने ही दिव्य अस्त्र,
प्रभु तरकश में शोभायमान ;
है शस्त्रों की शोभा तुमसे ||
१६-
अस्त्रों से सिर्फ नहीं कोइ,
मानव शोभा पाजाता है |
शस्त्रों को रख निज साथ नहीं,
वह परमवीर बन जाता है |
मिल जाएँ यदि अपात्र को तो,
इन की महिमा घट जाती है ||
१७-
दृढ -इच्छा, साहस, कर्मठता,
नैतिक बल, अस्त्र है बीरों का|
तुम ग्रहण करो हे राम! बढे,
इन शस्त्रों की शोभा तुमसे |
सह न सकेगा रिपु कोई,
वर्षा अब राम के तीरों की || ----
१९-
दंडक वन में पहुंचे रघुवर,
मिले जटायू गृद्धराज वर |
मित्र, पिता दशरथ के थे,प्रिय,
सादर वंदन किया सभी ने |
कुशलक्षेम कौशलपति की वे,
लगे पूछने,भाव-विह्वल हो ||
२१-
फिर विस्तार सहित घटनाक्रम,
कारण अपने विपिन-वास का;
रघुवर ने उनको बतलाया |
किया निवेदन, तात ! आप भी,
बनें सहायक धर्म कार्य हित;
उचित मंत्रणा दें हम सबको ||
२२-
आशीर्वाद सदा है मेरा,
राम,बनो तुम खलु-दल भंजक|
मेरा मेरे दल-बल१ का भी,
सदा पूर्ण सहयोग रहेगा |
पूरा हो उद्देश्य राम का,
पापमुक्त हो अब यह अंचल ||
२३-
वनचर, बनवासी अरण्य के ,
हैं अति त्रस्त अनाचारों से |
ज्ञान-धर्म,जन-नीति सभी कुछ,
कलुषित हैं; दूषित भावों के -
अति प्रचार एवं प्रसार से २ ,
है प्रमाद ने किया बसेरा ||
२४-
अकर्मण्यता, प्रमाद व लिप्सा,
भोग-भाव औ असत कर्म से ;
ध्वस्त हो गईं रीति-नीति सब,
ध्वस्त हुई है अर्थव्यवस्था |
दीन-हीन हो पिछड़े सबसे,
भोग रहे निज कर्मों का फल ||
२५-
यदि हो साथ राम का पौरुष,
भक्ति-शक्ति सौमित्र के जैसी;
सीता सी प्रभु प्रीति-रीति हो,
सोने में होजाय सुहागा |
बिना भक्ति और ईश कृपा के,
किसको भला विवेक हुआ है ||
२६-
युग-शिक्षा नव ज्ञान-रश्मि से,
नव-प्रकाश फैलाना होगा |
कला शिल्प साहित्य आदि का,
जन मन भाव जगाना होगा |
स्वतंत्रता स्व -भाव आदि भी,
जगें, सभी के अंतर्मन में ||
२७-
हर, प्रमाद अज्ञान अयोग्यता ,
सब विधि योग्य बनाएं सबको |
नहीं योग्यता की कोई भी,
कमी किसी में भी रह जाए |
ज्ञान कुशलता और योग्यता,
से न करें कोई समझौता ३ ||
२८-
स्त्री-शिक्षा पर सब विधि से,
कुछ ध्यान अधिक देना होगा |
शिक्षित नारी ही है राघव!
उन्नायक अगली पीढी की |
सक्षम है वही रोकने में,
जाने से असत मार्ग नर को ||
२९-
विदुषी, शिक्षित और साक्षर,
नारी ही आधार है सदा ;
हर समाज की, नर जीवन की |
वही समय पड़ने पर , नर से-
कदम मिलाकर चल सकती है४ |
जीवन करती सुन्दर -समतल ||
३०-
चाहे जितनी भीड़ साथ हो,
यदि अयोग्य हो, काम न आये |
पूर्ण योग्यता ज्ञान के बिना ,
कोई कार्य पूर्ण कब होता |
तप संयम कठोर अनुशासन,
से ही पूर्ण योग्यता मिलती ||
३१-
पिछड़े दीन-हीन या ज्ञानी,
सबको साथ लिए चलना है |
अस्त्र-शस्त्र निर्माण कर्म और -
लड़ने योग्य बनाएं सबको |
आतातायी के विरोध का,
स्वर, जन जन में उठे ज्वार बन ||
३२-
नए नए अस्त्रों शस्त्रों का,
संचालन भी सिखलाना है |
जन-जन, मन से महायज्ञ में,
दे सहयोग, बताना है यह |
हर घर में हे राम! ज्ञान का,
एक-एक दीपक जल जाए ||
३३-
अक्रियता अज्ञान और भय,
हट जाए जन जन में मन से |
अपनी स्वयं की अर्थव्यवस्था,
से यह वन समृद्ध बन सके |
कर्म-चेतना से यह अंचल,
सक्रिय सबल, संबल बन जाए ||
३४-
जन जन का बल, युद्ध काल में,
सबसे बड़ा शस्त्र५ होता है |
राघव ! सब से बड़ी सुरक्षा-
शक्ति, योग्य जन-बल होता है |
उचित समय पर दंडक वन क्या-
जन स्थान भी साथ खडा हो ||-----सर्ग ५...पंचवटी
१८-
देश की रक्षा, संस्कृति रक्षण ,
तथा प्रजा के व्यापक हित में ;
अधर्मियों से विधर्मियों से,
अन्यायी लोलुप जन जो हों ;
कभी नहीं समझौता करता ,
वही नृपति अच्छा शासक है ||
१९-
पर जो शासक निज सुख के हित,
अत्याचार प्रजा पर करता |
अधर्म-मय, अन्याय कर्म से ;
अपराधों को प्रश्रय देता |
अप विचार, अपकर्म भाव में,
जन जन पाप-लिप्त हो जाता ||
२०-
हिंसा चोरी अनृत भावना,
नर-नारी को भाने लगती|
अश्लील कृत्यों से नारी,
अपने को कृत-कृत्य समझती |
लूट अपहरण बलात्कार के,
विविध रूप अपनाए जाते ||
२१-
अति भौतिक सुख लिप्त हुए नर,
मद्यपान आदिक विषयों रत;
कपट झूठ छल और दुष्टता,
के भावों को प्रश्रय देते |
भ्रष्टाचार, आतंकवाद में,
राष्ट्र, समाज लिप्त हो जाता ||
२२-
पाप, अधर्म-नीति कृत्यों से,
प्रकृति माता विचलित होती |
अनावृष्टि अतिवृष्टि आदि से,
धरती की उर्वरता घटती |
कमी धान्य-धन की होने से,
बनती है अकाल की स्थिति ||
२४-
लक्ष्मण,तुम अब जान चुके हो,
मूल उद्देश्य, वनागमन का |
नाश राक्षसों का करना है ,
स्थिर करना है फिर हमको;
शास्त्र धर्म शुचि मर्यादाएं ,
ऋषि प्रणीत जीवन शैली की ||
२५-
इस अंचल के पिछड़े पन को,
हमको दूर हटाना होगा |
शिक्षा देकर के जन जन का,
जीवन सुलभ बनाना होगा |
विविध शिल्प औ शस्त्र कला का,
उन्हें कराना होगा ज्ञान ||
२६-
दुखी असंगठित एवं पिछड़ी,
प्रजा रहे, वह राजा ही क्या |
एसे किसी राज्य का लक्ष्मण,
राजा बन कर भी क्या करना |
शिक्षित सुखी संतुष्ट प्रजा ही,
उन्नत सिर हैं राजाओं के ||
२७-
शिक्षित सज्जन सुकृत संगठित,
बनें क्रान्ति में स्वयं सहायक ;
लक्ष्मण सदा सफल होती वह |
पर असंयमित हो जाती है,
भीड़ अशिक्षित हो, असंगठित;
भय विघटन,प्रति-क्रान्ति का रहता ||
२८-
आताताई के विरोध में,
जन संकुल को लाना होगा |
जन जन ज्वार समर्थन से ही ,
मिल पायेगी विजय युद्ध में |
बड़ी बड़ी सेनाओं से भी,
नहीं कार्य यह सध पाता है ||
२९-
यदि मैं सेना लेकर आता,
प्रतिपग मग पर विरोध होता |
राज्य प्रसार लालसा का भी,
कौशल पर आक्षेप ठहरता |
सतर्क होजाते राक्षस -कुल,
पूरी तैयारी से पहले ||
३०-
लक्ष्मण हमको इसी भूमि की ,
मिट्टी से हैं वीर उगाने |
आतंक और अन्याय भाव से,
लड़ने के हैं भाव जगाने |
ताकि लौटने पर हम सबके,
वे हों स्वयं कुशल निजहित में ||
३१-
शीश नवा कर लक्ष्मण बोले-
राम नाम की महिमा से प्रभु,
मिट्टी भी सोना होजाती |
इच्छा है जब स्वयं राम की,
सोती धरती जाग उठेगी ;
आज्ञा दें अब क्या करना है ||
३२-
सभा, प्रबंधन और निरीक्षण ,
ऋषि-मुनियों संग विविधि गोष्ठियों ;
के आयोजन, कार्यान्वन का,
सारा भार लिया रघुवर ने |
नारी-वालक शिक्षा का और-
जन जागरण१ भार सीता ने ||
३३-
गृह निर्माण व युद्ध कला में-
विशेषग्य ,सौमित्र को मिला ;
भार प्रोद्योगिकी -शिक्षा एवं-
आयुध की निर्माण कला का |
एवं संचालन -कौशल को ,
जन जन में प्रसार करने का ||
३४-
लिखना पढ़ना व सद-आचरण,
महिलाओं बच्चों को, सबको;
अपनी कुटिया के कुंजों की,
छाया में वे जनक-नंदिनी;
आदर प्रेम से सिखलाती थीं,
दीप, दीप से जलता जाता२ ||
३५-
लक्ष्मण लगे सिखाने सब को,
धनुष बनाना, वाण चलाना |
शस्त्रों के निर्माण-ज्ञान सब,
शर-संधान व उचित निशाना |
धनुष-वाण, तरकश सब आयुध,
बनने लगे, हर कुटी वन में ||
३६-
सुन्दर सुद्रिड और सुरक्षित,
कुटिया-गृह निर्माण शिल्प का;
ज्ञान कराते थे रामानुज |
विविध शिल्प व श्रम की महत्ता -
उपयोगिता, दिखाते रहते;
हो स्वतंत्र निज अर्थ-व्यवस्था३ ||
३७-
ईश्वर महिमा, भजन-साधना,
लोक-कला, साहित्य-भावना;
चित्रकला, संगीत ज्ञान, सब-
बाल, वृद्ध, स्त्री-पुरुषों को ,
सिय-रामानुज लगे सिखाने ;
यह अंचल अब जाग रहा था ||
३८-
वन संपदा का रक्षण-वितरण,
विविधि भाँति फल-फूल उगाना |
नव-पद्दतियां, कृषि कर्मों४ की ,
सिखलाई जातीं कुटियों में |
वन व ग्राम की कला-कथाएं ,
सीखते व सुनते सिय-लक्ष्मण ||
३९-
योग भक्ति अध्यात्म ज्ञान का,
विविधि भांति की नीति-कथाओं ;
के ,कहने सुनने समझाने,
का क्रम स्वयं राम करते थे |
प्रातः सायं , प्रार्थना सभा में,
ऋषि-मुनियों का प्रवचन होता ||
४०-
रक्षा में, सौमित्र -गुणाकर,
किये नियोजित थे रघुवर ने |
पंचवटी का आसमान था,
यज्ञ -धूम से हुआ सुवासित |
कर्मठता से रामानुज की,
वन-उपांत५ थे अभय होगये ||
सप्तम सर्ग -संदेश
==============
२८-
नारी, केंद्र-बिंदु है भ्राता !
व्यष्टि,समष्टि,राष्ट्र की,जग की |
इसीलिये तो वह अवध्य है ,
और सदा सम्माननीय भी |
लेकिन वह भी तो मानव है,
नियम-निषेध मानने होंगे ||
२९-
नारी के निषेध-नियमन ही,
पावनता के संचारण की;
उचित निरंतरता समाज में,
सदा बनाए रखते, लक्ष्मण !
अवमानना, रेख-उल्लंघन,
कारण बनते, दुराचरण का ||
३०-
राजा जनता या प्रबुद्ध जन,
जब अपने दायित्व भूलकर;
उचित दंड यदि नहीं देते |
अनाचार को प्रश्रय देकर,
पाप-कर्म में भागी बनते;
नियम से नहीं ऊपर कोई ||
३३-
विविध कारणों से यदि नारी,
मर्यादा उल्लंघन करती |
दुष्ट भाव, स्वच्छंद आचरण,
से समाज दूषित होजाता |
कई पीढ़ियों तक फिर लक्ष्मण,
यह दुष्चक्र चलता रहता है ||
३४-
जब उद्दंड, रूप-ज्वाला युत,
और दुर्दम्य काम-पिपासा-
युक्त ताड़का१ से कौशिक का ;
तेज, तपस्या-बल गलता था ,
अत्याचार, अनीति मिटाने;
उसका भी बध किया गया था ||
३५-
शूर्पणखा का दंड हे अनुज !
सिर्फ व्यक्ति को दंड नहीं है |
चारित्रिक धर्मोपदेश है,
नारी व सम्पूर्ण राष्ट्र को |
चेतावनि है दुष्ट जनों को ,
कुकर्म-रत नारी-पुरुषों को ||
४२-
परम प्रिया राजा दशरथ की,
राज्यकर्म और राजनीति पर;
उचित मंत्रणा देने वाली |
देव कार्य, इस महायज्ञ में,
वही आहुती दे सकती थी ;
अपने प्रेम,त्याग, महिमा की ||
४३-
विश्वामित्र-वशिष्ठ योजना४ ,
निशिचर-हीन मही करने की ;
कैकयि माँ ही केंद्र बिंदु है |
शिव की भाँति, गरल पी डाला,
सहमत कब थे राजा दशरथ ||
४४-
सेना से यह कार्य न होता५ ,
कोइ अन्य उपाय कहाँ था |
राक्षस-अपसंस्कृति विनाश का ,
ध्वजा धर्म की फहराने का |
जन जन हित में,विज्ञ जनों को,
सदा गरल यह पीना होगा || ----सप्तम सर्ग -संदेश

शुक्रवार, 23 मार्च 2018
भारतीय धर्म, दर्शन राष्ट्र -संस्कृति के विरुद्ध उठती नवीन आवाजें व उनका यथातथ्य निराकरण ---पोस्ट--सप्तम --डा श्याम गुप्त
....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...
भारतीय धर्म, दर्शन राष्ट्र -संस्कृति के विरुद्ध उठती नवीन आवाजें व उनका यथातथ्य निराकरण ---पोस्ट--सप्तम --डा श्याम गुप्त
------------------------------------------------
----पूर्वा पर ----
आजकल हमारे देश में गोंड आदिवासी दर्शन और बहुजन संस्कृति व महिषासुर के नाम पर एक नवीन विरोधी विचारधारा प्रश्रय पा रही है जिसे महिषासुर विमर्श का नाम दिया जारहा है | जिसमें जहां सारे भारत में समन्वित समाज की स्थापना के साथ धर्मों व प्राचीन जातियों आदि का अस्तित्व नहीं के बरावर रह गया था, अब असुर, नाग, गोंड आदि विभिन्न जातियों वर्णों को उठाया जा रहा है |
भ्रामक विदेशी ग्रंथों आलेखों में आर्यों को भारत से बाहर से आने वाला विदेशी बताये जाने के भारत में फूट डालने वाले षडयन्त्र से भावित-प्रभावित वर्ग द्वारा इंद्र, आदि देवों को आर्य एवं शिव व अन्य तथाकथित असुर व नाग, गोंड आदि जातियों भारत की मूल आदिवासी बताया जा रहा है | वे स्वयं को हिन्दू धर्म में मानने से भी इनकार करने लगे हैं |
-----------------विभन्न आलेखों, कथनों, प्रकाशित पुस्तकों में उठाये गए भ्रामक प्रश्नों व विचारों, कथनों का हम एक एक करके उचित समाधान प्रस्तुत करेंगे जो ४० कथनों-समाधानों एवं उपसंहार के रूप में प्रस्तुत किया जाएगा, विभिन्न क्रमिक ११ आलेख-पोस्टों द्वारा |
-------पोस्ट सप्तम---- कथन २७ से ३० तक---
कथन २७--
------------
अगर हम यह कहें कि बुद्ध पारी कुपार लिंगो की ही तरह
भौतिकवादी दर्शन पर अपने दर्शन की नीव रख रहे हैं तो यह बात तर्कपूर्ण लगती है।
जिस तरह से पारलौकिक और अतिभौतिक को पारी कुपार लिंगो ने अधिक महत्व नही दिया है
उसी तरह बुद्ध भी इहलोकवादी दर्शन का प्रस्ताव कर रहे हैं, इसी कारण गौतम बुद्ध
पंचमहाभूतों पर अपने विचार के परिणाम में इस निष्कर्ष तक आते हैं कि आकाश तत्व
आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म जैसे पाखंडों का आधार बन जाता है इसीलिये वे पञ्च
महाभूतों की बजाय चार महाभूतों की प्रस्तावना करते हैं। यह सही है कि हमारे
पास लिंगो के दर्शन का विस्तारित रूप और उपलब्ध नहीं है लेकिन उनके द्वारा दिए गए
मौलिक सूत्रों और मान्यताओं का बुद्ध की मान्यताओं से साम्य नजर आता है और यह भी
प्रतीत होता है कि बुद्ध स्वयं भी कुपार लिंगो के दर्शन के तार्किक प्रवाह में
हैं। इसीलिये बुद्ध ने बहुत विचारपूर्वक अपने चार महाभूतों में आकाश तत्व को शामिल
ही नहीं किया है।
दर्शन के विद्यार्थी जानते हैं कि आकाश तत्व के आधार पर ही
आत्मा और परमात्मा सहित पुनर्जन्म और इन सबसे जुड़े कर्मकांड पैदा होते हैं।
इसलिए श्रमण परम्परा के बौद्ध धर्म सहित आरंभिक लोकायत और चार्वाक भी आकाश तत्व को
अपने विचार में सम्मिलित नही करते हैं। प्राचीन लोकायतिक विचार जिस प्रकार से
इह-लोकवादी चिंतन पर खड़ा है उसी तरह गोंडी पूनम विचार भी प्रकृति की शक्तियों को
सर्वाधिक महत्वा देते हुए पुनर्जन्म और आत्मा परमात्मा के नकार पर खड़ा है।
समाधान २७.--
===============
परन्तु जैसा
स्वयं कथन २६ में स्वीकार किया गया है कि शिक्षित गोंड तो पञ्च महाभूत को मानते हैं, गगन या आकाश तत्व पांचवा महाभूत है, तभी तो भगवान शब्द पूर्ण होता है |
वस्तुतः पाश्चात्य दर्शन में भी चार ही तत्व
होते हैं वे भी गगन को तत्व नहीं मानते अतः यह स्थिति अपूर्ण ज्ञान व दर्शन की और
इशारा करती है, इसीलिये इन किसी भी दर्शनों का आगे उन्नयन नहीं हुआ अपितु समाप्त
होगये | ये चार तत्व की अवधारणा अवैज्ञानिक भी है |
आज वैज्ञानिक युग में आकाश तत्व में ही सारे अति-उन्नत क्रियाकलाप
होते हैं|
कथन २८---
------------
पुरुष व प्रकृति के मिलन से विश्व की उत्पत्ति को तन्त्र में
नर व मादा तत्व के मिलन के रूप में दिखाया गया है। पारी कुपार लिंगों के गोंडी पुनेम
दर्शन में भी प्रकृति (एक अर्थ में संसार चक्र) सल्लां और गांगरा नाम के दो तत्वों
के मिलने से बनता है।
यहा सल्लां पूना (धन तत्व) है और गांगरा ऊना (ऋण तत्व) है, इन्ही के संयोग से
प्रकृति की उत्पत्ति होती है (Kangali,
2011) पुरुष प्रकृति के मिलन का यही संकेत
नर्मदा नदी को दिए गये भिन्न नाम से भी जाहिर होता है। मध्य प्रदेश के बालाघाट
जिले में गोंडों की लोककथाओं के अनुसार नर्मदा नदी असल में “नर-मादा” नदी
है। वे आज भी इसी तर्क और इसी प्रतीकवाद का
इस्तेमाल करते हैं।
समाधान २८-----
=============
यह पुरुष व
प्रकृति के मिलन तत्व दर्शन प्राणी उत्पत्ति के बहुत बाद का है | इससे पहले पुरुष स्वयं ही अपनी प्रतिकृतियाँ
तैयार करता है जिसे वैदिक दृष्टि में अमैथुनी
--मानसिक व स्पर्श से प्राणी उत्पत्ति कहते हैं –यथा ब्रह्मा, चार कुमार, सप्तर्षि, नारद आदि की उत्पत्ति और -----विज्ञान में भी
पहले एक अमैथुनी उत्पत्ति कहा जाता है, बिना नर-नारी तत्व के मिलन के--यथा अमीवा, जीवाणु आदि निम्न वर्ग के प्राणी व वनस्पति आदि, आगे बाद में एकलिंगी प्राणी व मैथुनी सृष्टि
उत्पत्ति होती है | अतः सल्लां और गांगरा दर्शन बहुत बाद का अल्पज्ञान वाला दर्शन है |
हाँ यह सत्य ही है सर्वप्रथम मानव इसी नर्मदा
नदी के किनारे उद्भूत हुआ था | जब भारतीय प्रायद्वीप अफ्रीका के गोंडवाना लेंड
से जुड़ा हुआ था और नर्मदा नदी आज की विक्टोरिया झील में गिरती थी भारतीय भूखंड के
टूटकर द्वीप रूप में उत्तर की ओर प्रवाह में आने पर नर्मदा सागर में गिरने लगी |
और आदि प्राणी भी इसी नदी के किनारे भारतीय भूमि पर उद्भूत हुआ |
कथन २९--
-----------------
गोंडी पुनेम दर्शन और
गोंडों की अन्य मान्यतायें उनके जुन्नार देव के मंदिर आदि सुदूर अतीत में खोई किसी असुर या लोकायतिक
परम्परा के चिन्ह हैं। यही परम्परा आगे चलकर श्रमण परम्परा के रूप में
बुद्ध के साथ अपने शिखर पर पहुँचती है तो आत्मा और परमात्मा दोनों को नकारकर
चार महाभूतों पर आधारित दर्शन का निर्माण करती है। यह उल्लेखनीय है कि बौद्ध
दर्शन भी अंत में परमात्मा और आत्मा के निषेध का वेद विरोधी या अनात्मवादी दर्शन
है। इसे निरीश्वरवादी और नास्तिक दर्शन माना गया है। इसी तरह सांख्य दर्शन भी आरंभ से ही इश्वर की सत्ता
को स्वीकार नहीं करता और पुरुष व प्रकृति के सिद्धांत पर अपने पूरे दर्शनशास्त्र
सहित विश्वोत्पत्ति विज्ञान का भी निर्माण करता है।
आगे चलकर भगवत गीता में हम देखते
हैं कि कृष्ण स्वयं योग को सांख्य के निकट लाते हैं और यह निरूपित करते हैं कि योग
और सांख्य एक ही परिणाम (ज्ञान या मुक्ति) उत्पन्न करते हैं। इसीलिये स्वयं कृष्ण
के जमाने से सांख्य और योग में एक युति निर्मित कर दी गयी थी जिसे “सांख्य योग” कहा गया है।
यहाँ
उल्लेखनीय यह भी है कि डॉ. आंबेडकर की खोज बतलाती है कि भगवत गीता असल में
बौद्ध धर्म के खिलाफ प्रतिक्रान्ति को संगठित करने के उद्देश्य से लिखी गयी है। ---इस
उदाहरण से भी यह देखा जा सकता है कि ब्राह्मणवादी परम्परा मूल सांख्य की मान्यताओं
को अपने अनुकूल बनाने के प्रयास में कृष्ण और गीता को इस्तेमाल कर रही है।
समाधान-२९-- ---
==================
परन्तु यह
खोज एक मूर्खतापूर्ण तथ्य है क्योंकि संसार जानता है कि गीता तो बौद्ध धर्म से
बहुत पहले की है | वस्तुतः बुद्ध, लोकायत व अन्य सभी अनीश्वरवादी गीता के सांख्य व
योग का अर्थ समझने में असफल रहे हैं |
गीता में भगवान श्रीकृष्ण जब कहते हैं--सांख्ययोगौ
प्रथग्बाला प्रवदन्ति न पंडिता.... |---गीता ५ /४ ..तो गीता का सांख्य व योग,
भारतीय षडदर्शन का सांख्यदर्शन व योगदर्शन नहीं है, अपितु वह कर्मसंन्यास व
कर्मयोग है अर्थात ज्ञानयोग व कर्मयोग, जिसका फल एक ही बताया गया है परन्तु
कर्मयोग की महिमा अधिक कही गयी है |
कथन-३०--
-------------
गोंडी पुनेम दर्शन और गोंडों की अन्य मान्यताओं पर गहन शोध
से निर्मित ग्रन्थ “पारी
कुपार लिंगो गोंडी पूनेम
दर्शन” ,को थोड़ा विस्तार में
जानना जरुरी है। यह दर्शन गोंडी धर्म के प्रथम दार्शनिक और आदिगुरू पारी कुपार
लिंगो द्वारा रचा गया है और जिसे डॉ. कंगाली ने पहली बार व्यवस्थित दर्शन के
रूप में संकलित किया है।
यह आर्य असुर या आर्य मूलनिवासी संघर्ष का एक
अन्य और सबसे प्राचीन नेरेटिव प्रस्तुत करता है, ये
नेरेटिव असुर आर्य संघर्ष से भी पुराना है। संभवतः यह पहले से ज्ञात अन्य नेरेटिव्स से अधिक विस्तृत है
और अन्यों की अपेक्षा अधिक विश्वसनीय प्रमाणों पर आधारित है। यह नेरेटिव कोयवंशी
गोंड जनजातीय समाज में फैले मिथकों और लोककथाओं सहित उनकी धार्मिक मान्यताओं
में आज भी ज़िंदा हैं। उनकी वाचिक परम्परा में इसे आज भी देखा जा सकता है
समाधान ३०---
===================
एक तरफ तो आप
पौराणिक मिथकों वाचिक परम्पराओं पर उंगली उठाते हैं दूसरी तरफ अपने मिथकों धार्मिक
मान्यताओं की बात करते हैं --- अतः वस्तुतः ये सभी पूरी तरह से भ्रमित एवं विरोधी
भावों से ग्रसित हैं |
ये सभी तथाकथित स्वयंभू दार्शनिक आदि इतिहास
के ज्ञान के एक दम कोरे हैं, आर्य व असुर संघर्ष या आर्य-मूल निवासी संघर्ष का तो
कहीं इतिहास में नाम ही नहीं है | ये सुर-असुर युद्ध थे, उस समय तो आर्य नाम की
कोई परिकल्पना ही नहीं थी |
-----चित्र में विभिन्न गोंड-मिथक---
-----चित्र में विभिन्न गोंड-मिथक---
![]() |
| लकड़ी के मूल जुन्नार देव = शिव लिंग |
![]() | ||||
|
क्रमश आगे पोस्ट आठ-----

मंगलवार, 20 मार्च 2018
भारतीय धर्म, दर्शन राष्ट्र -संस्कृति के विरुद्ध उठती नवीन आवाजें व उनका यथातथ्य निराकरण ---पोस्ट--षष्ठ --डा श्याम गुप्त
....कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ..
भारतीय धर्म, दर्शन राष्ट्र -संस्कृति के विरुद्ध उठती नवीन आवाजें व उनका यथातथ्य निराकरण ---पोस्ट--षष्ठ --डा श्याम गुप्त
----पूर्वा पर ----
आजकल हमारे देश में गोंड आदिवासी दर्शन और बहुजन संस्कृति व महिषासुर के नाम पर एक नवीन विरोधी विचारधारा प्रश्रय पा रही है जिसे महिषासुर विमर्श का नाम दिया जारहा है | जिसमें जहां सारे भारत में समन्वित समाज की स्थापना के साथ धर्मों व प्राचीन जातियों आदि का अस्तित्व नहीं के बरावर रह गया था, अब असुर, नाग, गोंड आदि विभिन्न जातियों वर्णों को उठाया जा रहा है |
भ्रामक विदेशी ग्रंथों आलेखों में आर्यों को भारत से बाहर से आने वाला विदेशी बताये जाने के भारत में फूट डालने वाले षडयन्त्र से भावित-प्रभावित वर्ग द्वारा इंद्र, आदि देवों को आर्य एवं शिव व अन्य तथाकथित असुर व नाग, गोंड आदि जातियों भारत की मूल आदिवासी बताया जा रहा है | वे स्वयं को हिन्दू धर्म में मानने से भी इनकार करने लगे हैं |
विभन्न आलेखों, कथनों, प्रकाशित पुस्तकों में उठाये गए भ्रामक प्रश्नों व विचारों, कथनों का हम एक एक करके उचित समाधान प्रस्तुत करेंगे जो ४० कथनों-समाधानों एवं उपसंहार के रूप में प्रस्तुत किया जाएगा, विभिन्न क्रमिक ११ आलेख-पोस्टों द्वारा |
-------पोस्ट छह---- कथन २२ से २६ तक---
\
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भारतीय धर्म, दर्शन राष्ट्र -संस्कृति के विरुद्ध उठती नवीन आवाजें व उनका यथातथ्य निराकरण ---पोस्ट--षष्ठ --डा श्याम गुप्त
----पूर्वा पर ----
आजकल हमारे देश में गोंड आदिवासी दर्शन और बहुजन संस्कृति व महिषासुर के नाम पर एक नवीन विरोधी विचारधारा प्रश्रय पा रही है जिसे महिषासुर विमर्श का नाम दिया जारहा है | जिसमें जहां सारे भारत में समन्वित समाज की स्थापना के साथ धर्मों व प्राचीन जातियों आदि का अस्तित्व नहीं के बरावर रह गया था, अब असुर, नाग, गोंड आदि विभिन्न जातियों वर्णों को उठाया जा रहा है |
भ्रामक विदेशी ग्रंथों आलेखों में आर्यों को भारत से बाहर से आने वाला विदेशी बताये जाने के भारत में फूट डालने वाले षडयन्त्र से भावित-प्रभावित वर्ग द्वारा इंद्र, आदि देवों को आर्य एवं शिव व अन्य तथाकथित असुर व नाग, गोंड आदि जातियों भारत की मूल आदिवासी बताया जा रहा है | वे स्वयं को हिन्दू धर्म में मानने से भी इनकार करने लगे हैं |
विभन्न आलेखों, कथनों, प्रकाशित पुस्तकों में उठाये गए भ्रामक प्रश्नों व विचारों, कथनों का हम एक एक करके उचित समाधान प्रस्तुत करेंगे जो ४० कथनों-समाधानों एवं उपसंहार के रूप में प्रस्तुत किया जाएगा, विभिन्न क्रमिक ११ आलेख-पोस्टों द्वारा |
-------पोस्ट छह---- कथन २२ से २६ तक---
\
कथन
२२--- यहाँ यह देखना बहुत ही महत्वपूर्ण है कि ब्राह्मण
परम्परा जो कि आर्यों की परम्परा है वह अपने आरंभिक संघर्ष में सर्वप्रथम
कोयवंशी गोंडों के खिलाफ और बाद में फिर असुरों के खिलाफ कुछ ख़ास तरह के
कुटिलतापूर्ण षड्यंत्र और समाज मनोवैज्ञानिक हथकंडे इस्तेमाल कर रही है। ठीक यही
हथकंडे और षड्यंत्र ब्राह्मणवादी धर्म को उंचा दिखाने के लिए और उसे प्रतिष्ठित
करने के लिए बाद में बुद्ध, बौद्ध धर्म और कबीर व रविदास के खिलाफ भी इस्तेमाल कर रही है। और
चूँकि इतिहास और मिथक को ब्राह्मण परम्परा ने सहेजा और आकार दिया है इसलिए
उन्होंने शत्रुओं को उनके उद्विकास (क्रमविकास या एवोल्यूशन) की अवस्था के अनुसार
कई श्रेणियों में बाँट दिया है जिन्हें असुर और बौद्ध या अछूत कहा जा सकता
है। लेकिन स्वयं को अलग अलग श्रेणियों में न रखकर आर्य ब्राह्मण ही घोषित किया
है।लेकिन असल में डॉ. आम्बेडकर के विश्लेषण में ये असुर अछूत और बौद्ध अंत में
क्षत्रिय ही साबित होते हैं। और देबीप्रसाद चट्टोपाध्याय और स्वामी अछूतानन्द
सहित भदंत बोधानन्द महास्थविर के अध्ययन में ये सब मूलनिवासी साबित होते हैं|
समाधान २२ --गोंडों, असुरों और बौद्धों को एक ही दर्शन कैसे हो सकता जबकि सभी में युगों
का कालान्तर है | पहले ही कहा जाचुका है ब्राहमण परम्परा आर्यों की नहीं है आर्य
सभी वर्गों के लोग थे क्षत्री, ब्राह्मण, शूद्र व वैश्य, वस्तुतः ब्राह्मण कोइ
परम्परा ही नहीं है अपितु वे सब आर्य ही हैं, सनातन धर्मी |
----गलत व अज्ञानी है ये सभी
तथाकथित स्वयंभू दार्शनिक एवं विदेशी षडयंत्र के प्रभाव में भ्रमित हैं | बौद्ध,
जैन, आदि लोग स्वयं ब्राह्मण व वैदिक परम्परा के विरोध में उठे व मुखर हुए थे न कि
वैदिक परम्पराओं ने उनका विरोध किया | कबीर, रविदास तो स्वयं वैदिक परम्पराओं का
अनुसरण करते थे वे केवल समाज में आयी हुई कुरीतियों का निराकरण करने हेतु तत्पर थे
न की ब्राह्मण-शूद्र, असुर ,बौद्ध आदि के साथ थे | प्रखर आर्य व वैदिक रचयिता वेद व्यास ब्राह्मण नहीं शूद्र थे, श्रीकृष्ण जीवन भर निम्न जाति ग्वाला ही कहे
जाते रहे | मूर्ख
है ये लेखक एवं तथाकथित शोध करने वाले जिन्हें यह भी ज्ञान नहीं कि ..रावण असुर, राक्षस था परन्तु ब्राह्मण था, राम क्षत्रिय थे, उनके मन्त्रकार गुरु ब्राह्मण ...बौद्ध धर्म के प्रवर्तक छत्रिय थे न असुर या
अछूत एवं उसमें सभी वर्णों के लोग हैं |
कथन-२३--हालाँकि डॉ. अंबेडकर आर्य आक्रमण थ्योरी में भरोसा नहीं रखते लेकिन फिर भी स्थानीय स्तर पर भारत में उंच नीच के निर्माण का
जो षड्यंत्र चलाया गया है उसके सम्बन्ध में उनका विश्लेषण हमारे लिए बहुत उपयोगी
है। डॉ. अम्बेडकर के बतलाये अनुसार अगर आर्य अन्य देश से न भी आये हों तो भी
उनका अपना विश्लेषण ब्राह्मण श्रमण या ब्राह्मण क्षत्रिय संघर्ष को अपनी पूरी
नग्नता में उजागर करता है। इसी को अगर प्राचीन भारतीय भौतिकवाद के विश्लेषण के
साथ रखा जाए तो ये संघर्ष देव-असुर संग्राम को भी ब्राह्मण-क्षत्रिय संग्राम की
तरह निरुपित कर सकता है। यह तर्क और यह तरीका बहुत ही महत्वपूर्ण है। इसका ठीक
इस्तेमाल करते हुए हम देख पाते हैं कि एक आततायी संस्कृति के प्रतिनिधियों ने
मूलनिवासी संस्कृति को एक जैसे तरीकों और षड्यंत्रों से कमजोर कर परास्त किया है।
यह तरीका क्या था? वह समाज मनोवैज्ञानिक,
धार्मिक-दार्शनिक उपाय क्या था? इसका उत्तर असुरों, बौद्धों कबीर और
रविदास के खिलाफ रची गयी मिथकीय कथाओं में मिलता है।
समाधान २३---
अर्थात आंबेडकर के अनुसार आर्य बाहरी नहीं थे कोइ आताताये अन्कृति थी ही नहीं तो
फिर यह सारा का सारा विरोध कहीं ठहरता ही नहीं | केवल विदेशी षडयंत्रों के प्रभाव
में अपनी राजनीति चमकाने हेतु यह सारा ताम
झाम उठाया जा रहा है | हमें सावधान रहना चाहए | हमारी एकता को तोड़ने का षडयंत्र है
| और भितरघात में हम भारतीय सदा से ही माहिर हैं |
कथन
२४----गोंडी पुनेम दर्शन और ब्राह्मणी धर्म----- असुर जो कि लोकायतिक हैं, और
जो चार महाभूत वाले इस लोकवादी दर्शन को मानते थे उन्हें उनके दर्शन सहित निन्दित
ठहराया गया है। ये दर्शन और ये समाज आत्मा या
परमात्मा को नहीं बल्कि प्रकृति को मानता था।
आज भी आदिवासी/मूलनिवासी समाज में आत्मा और परमात्मा की परलोकवादी धारणा की
बजाय प्रकृति की शक्तियों को अधिक महत्त्व दिया जाता है। असुरों की भाँति एक
अन्य बहुत ही महत्वपूर्ण जनजातीय समुदाय है जिन्हें गोंड कहा जाता है। गोंड एक
समय में बहुत शक्तिशाली राज्य व्यवस्था के संस्थापक रहे हैं और दलपतशाह जैसे
महान गोंडी राजाओं ने बहुत विस्तृत भूभाग पर शासन किया है। आज भी उनके नाम पर
मध्यप्रदेश के बालाघाट सहित अन्य अनेक जिलों में उनके व अन्य गोंड राजाओं के
किलों, मंदिरों और अन्य भवनों के खंडहर मौजूद हैं। पुरातात्विक खोजें अब यह सिद्ध कर रही हैं कि भारत के
प्रत्येक राज्य में प्राचीन मंदिरों और किलों के खंडहरों में गोंडी राज चिन्ह
(हाथी पर बैठा शेर) पाया जाता रहा है। इससे आभास होता है कि गोंडी संस्कृति
संभवतः पूरे भारत में फली-फूली होगी और बाद में आर्य या ब्राह्मणी षड्यंत्रों से
उसी तरह नष्ट की गयी जिस तरह कि बाद में महिषासुर, रावण, बुद्ध, कबीर
और उनके संप्रदायों को नष्ट किया गया।
समाधान -२४..क्या दलपत शाह, गोंडों के मौजूद किले व मंदिर व राज चिन्ह, या सुप्रसिद्ध गोंड रानी दुर्गावती आदि महिषासुर, रावण, बुद्ध कबीर सभी से प्राचीन हैं |
वस्तुतः ये लोग इतिहास व पुराणों से बिलकुल अनभिज्ञ है |
सभी जानते हैं कि इन सभी गोंड राजाओं
रानियों को भारत के वीरों में गिना जाता है, वे भारतीय थे न की केवल गोंड | गोंड जाति, जन जाति भारत की एक प्रसिद्द प्राचीन वंश है | शायद प्राचीनतम जिसके नाम पर आदि-कालिक पृथ्वी
के दक्षिणी भूभाग का नाम गोंडवाना लेंड रखा गया जहां मानव का उद्भव हुआ |
यह प्राचीन गोंड संस्कृति आदि मानव से लेकर
...वनांचल की संस्कृति थी जिसने पूर्व हरप्पा सभ्यता का निर्माण किया एवं सुमेरु
लोक ( ब्रह्म लोक ), सरस्वती क्षेत्र , कैलाश-मानसरोवर क्षेत्र की सरस्वती सभ्यता के
मानवों से( जो आदि-मानव काल में ही भारतीय भूखंड व सुमेरु पर्वतीय भूखंड के मध्य
फैले टेथिस सागर(दिति सागर ) को पार करके सरस्वती –मानसरोवर क्षेत्र में पहुंचकर
उन्नत मानव होचुके थे ) तादाम्य करके एक
उच्च संस्कृति वैदिक संस्कृति को जन्म दिया | यह शंभू शिव
एवं ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र द्वारा मानव समन्वय का प्रथम प्रयास था जिसके मूल विचारक व कर्ता शंभू सेक या शिव
थे | इसीलिये वे महादेव कहलाये एवं विश्व की प्रत्येक संस्कृति में
पूज्य हुए | क्योंकि यही मानव एवं संस्कृति समस्त विश्व में फ़ैली | आज भी यही मानव सारे विश्व में रहते हैं |
कथन २५--डॉ. कंगाली के अध्ययन से इस मान्यता को न केवल बल मिलता है
बल्कि एक अर्थ में उनकी महान खोज इस बात को स्थापित ही कर देती है कि गोंडी
पुनेम दर्शन या संस्कृति पहली अखिल भारतीय संस्कृति रही है। उनका अध्ययन
स्पष्ट करता है कि किस तरह ब्राह्मणी धर्म ने गोंडी धर्म और संस्कृति को बुद्ध के
उदय के बहुत पहले ही आत्मसात करके मूल गोंडी समुदायों को षड्यंत्रपूर्वक समाज व
राज्य व्यवस्था में निचले पायदानों पर धकेलकर जंगलों में ही सीमित कर दिया था। यह
देखना उपयोगी है कि लोकयातिकों और मूल सांख्य सहित तंत्र के समान ही गोंडी
दर्शन भी इश्वर को नही मानता,
बल्कि प्रकृति की शक्तियों को मानता है
सृष्टि सृजन या सृष्टिकर्ता में वे विश्वास नहीं करते उनके लिए यह प्रकृति ही सब
कुछ है जो न कभी पैदा हुई न कभी समाप्त होगी।
समाधान २५---निश्चय ही
गोंडी संस्कृति सर्वप्रथम अखिल भारतीय संस्कृति रही होगी जो बनांचल संस्कृति थी |
जैसा बिंदु २४ में स्पष्ट किया जा चुका है | सांख्य आदि दर्शन वैज्ञानिक, अध्यात्म, व मानव–मनोविज्ञान, समाज विज्ञान के क्रमिक विकास की एक निम्न सौपान
है जो भारतीय षड्दर्शन ( जिसमें आस्तिक व नास्तिक दर्शनों का क्रमिक विकास है ) का
अंग है बौद्ध, जैन,
लोकायत आदि भारतीय नास्तिक दर्शन के अंग हैं जो मानव व वैश्विक समाज-धर्म के
क्रमिक बौद्धिक विकास के द्योतक हैं... |
कथन
२६--मध्यप्रदेश के मंडला और बालाघाट जिलों
के शिक्षित गोंड आज भी गर्व से कहते हैं कि भगवान् शब्द उनका दिया हुआ है जिसमे भ – भूमि, ग – गगन, व – वायु अ –अग्नि और न – नीर है।
यह अर्थ असल में इस लोक के समर्थन
में है, इसमें कोई अतिभौतिक या पारलौकिक तत्व शामिल नहीं
है और यह अर्थ सृष्टिकर्ता या परमात्मा की सत्ता की बजाय प्रकृति की शक्तियों को
महत्व देता है। सृष्टिकर्ता या सर्जक इश्वर को नकारने वाला यही सूत्र श्रमणों
अर्थात बौद्धों और जैनों में भी है। असल में गहराई से देखें तो किसी पारलौकिक
या अतिभौतिक तत्व के आधार पर ही ब्राह्मणों या आर्यों ने परलोक आत्मा और परमात्मा
को आकार दिया है, इसीलिये हम देखते हैं कि बहुत बाद में आगे चलकर प्रथम गोंडी
दार्शनिक कुपार लिंगों की ही तरह बुद्ध ने पारलौकिक तत्व की संभावना को ही मिटा
डाला।–
समाधान २६ ---यही तो भारतीय वैदिक दर्शन के पंचतत्व हैं---क्षिति
जल पावक गगन समीरा हैं | यही तो सांस्कृतिक समन्वय है | भगवान् शब्द, मनुष्यों के लिए भी प्रयोग होता है,
बहुत बाद का है, यह प्रकृति या परमतत्व का समानार्थी नहीं है | गोंड शब्द को भी वे अपनी विशिष्ट शैली में
भगवान् शब्द का ही अन्य रूप मानते हैं। अंग्रेज़ी का गॉड शब्द गौंड से ही
आया है ?
पर पारलौकिक संभावना मिती कहाँ, स्वयं
बौद्ध दुनिया से मिट गए, आज बौद्ध धर्म दो एक देशों में सिमट कर रह गया
है | जैन भी लघु रूप में है | वस्तुतः भौतिक, अधिभौतिक तत्व अर्ध विक्सित सभ्यता का है, बुद्धि-ज्ञान
के आगे विकास में पारलौकिक व अधि-आत्मिक तत्व का विकास हुआ, केवल दिखने वाले प्रत्यक्ष भौतिक सुन्दरम के आगे
शिव एवं सत्य का प्रादुर्भाव हुआ | और इन तीनों के समन्वित तत्व का नाम ईश्वर
हुआ, ब्रह्म, परमात्मा | भगवान्, मनुष्यों
के लिए भी प्रयोग होता है बहुत बाद का है, ईश्वर का समानार्थी नहीं |
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चित्र गूगल===
१,२अ ब--ब्रह्म-ईश्वर ...३, त्रिदेव,,,,४,५,६,७,८,...भगवान गणेश, परशुराम, कृष्ण,वरुणदेव , हनुमान ....
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