आजकल नारी -विमर्श पर तमाम सीरिअल्स देख कर ,उसमें महिलाओं को बड़ी-बूड़ी औरतों द्वारा ' सुहाग अचल रहे ',अखंड सौभाग्य वती भवः ' सदा सुहागिन रहो ' के आर्शीवाद देख कर मेरे मन में एक विचित्र सा विचार आया की आख़िर इसका अर्थ क्या है ? ध्यान से विवेचना करने पर तो मुझे यह ,स्त्रियों के विरुद्ध ही लगा। इस का अर्थ निकलता है की-पति से पहले तुम्हारी मृत्यु हो । तभी तो सदा सुहागिन रहोगी । हालांकि भारतीय नारी सदा पति से पहले ही मृत्यु की कामना करतीं आईं हैं ,पर भला क्यों सदा नारी ही पहले म्रत्यु को वरणकरे ,ये कहाँ का न्याय है । पुरूष को भी तो आर्शीवाद दिया जा सकता है -'सदा सपत्नी जियो' ।
परन्तु इस पुरूष आर्शीवाद का यह भी अर्थ लगाया जासकता है कि- पुरूष एक पत्नी के मरते ही दूसरी ले आए ! अतः इसे संशोधित किया जाय 'सदा उसी पत्नी के साथ जियो ' । एक पत्नी-व्रत होना भी पुरूष के लिए एक सत्कर्म कहा है जिसे बहुत से लोग जल्दी-जल्दी पत्नियां बदल कर सदा एक के ही साथ रहना चरितार्थ कर सकते हैं।
पुनः सदा सुहागिन पर आयें तो और आगे विचार करनेपर मुझे एक अन्य गहराई ज्ञात हुई ; स्त्री हो या पुरूष ,अकेले रहजाने के बाद बड़ी दुर्गति होती है , पहले म्रत्यु को प्राप्त होने वाला तो सुख से जाता है,खुशी-खुशी,पर बाद में जाने वाला -कोई अपना ख़ास रोने वाला भी नहीं,जीवनको चैन-सुख से बीतने की गारंटी भी नहीं । यद्यपि आजकल एसा नहीं है परन्तु पहले क्योंकि पुरूष ही धन कमाने का स्रोत होते थे अतः उनकी मृत्यु के बाद स्त्रियों को कठिन दौर से गुजरना पङता था।
एक अन्य विचार भी है कि स्त्री की मृत्यु पश्चात पुरूष तो पुनः विवाह को राजी होजाते हैं,परन्तु स्त्रियाँ अधिक भावुक होने के कारण तैयार नहीं होतीं ।
अतः अर्थार्थ के बाद मुझे लगा कि -वस्तुत आर्शीवाद उचित ही है । आपका क्या ख्याल है।
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डा श्याम गुप्त का ब्लोग...
- shyam gupta
- Lucknow, UP, India
- एक चिकित्सक, शल्य-चिकित्सक जो हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व उसकी संस्कृति-सभ्यता के पुनुरुत्थान व समुत्थान को समर्पित है व हिन्दी एवम हिन्दी साहित्य की शुद्धता, सरलता, जन-सम्प्रेषणीयता के साथ कविता को जन-जन के निकट व जन को कविता के निकट लाने को ध्येयबद्ध है क्योंकि साहित्य ही व्यक्ति, समाज, देश राष्ट्र को तथा मानवता को सही राह दिखाने में समर्थ है, आज विश्व के समस्त द्वन्द्वों का मूल कारण मनुष्य का साहित्य से दूर होजाना ही है.... मेरी तेरह पुस्तकें प्रकाशित हैं... काव्य-दूत,काव्य-मुक्तामृत,;काव्य-निर्झरिणी, सृष्टि ( on creation of earth, life and god),प्रेम-महाकाव्य ,on various forms of love as whole. शूर्पणखा काव्य उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास एवं अगीत साहित्य दर्पण (-अगीत विधा का छंद-विधान ), ब्रज बांसुरी ( ब्रज भाषा काव्य संग्रह), कुछ शायरी की बात होजाए ( ग़ज़ल, नज़्म, कतए , रुबाई, शेर का संग्रह), अगीत त्रयी ( अगीत विधा के तीन महारथी ), तुम तुम और तुम ( श्रृगार व प्रेम गीत संग्रह ), ईशोपनिषद का काव्यभावानुवाद .. my blogs-- 1.the world of my thoughts श्याम स्मृति... 2.drsbg.wordpres.com, 3.साहित्य श्याम 4.विजानाति-विजानाति-विज्ञान ५ हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान ६ अगीतायन ७ छिद्रान्वेषी ---फेसबुक -डाश्याम गुप्त
मंगलवार, 11 अगस्त 2009
सोमवार, 10 अगस्त 2009
डा. श्याम गुप्त की गज़ल-
आये सुरभि बयार से छूकर के चल दिये।
नयनों में सावन मास थे भादों सजा दिये।
मस्ती भरी उस रात का क्या वाकया कहें,
दामन में अम्नो-चेन सब जग के समा लिये।
पहलू में कायनात थी तन-दीप थे जले,
सुरभित गुलाव रूह में कितने खिला दिये।
हमने वफ़ा की राह में जो रख दिये कदम,
तुम राह चल सके नहीं पर हम चला किये।
शिकवा-गिला नहीं,ये है यादों का सिल सिला,
राहें जुदा हैं जब भला तो क्या गिला किये।
अब तो किसी भी बात का कोई गिला नहीं,
दिल ने तुम्हारी याद के दीपक जला लिये।
बस आरजू है ’श्याम की, इतना जो कर सको,
राहों में जब मिला करो,बस मुस्कुरा दिये ॥
सोमवार, 27 जुलाई 2009
गीत--दर्द ,गीत बन गये।
दर्द बहुत थे,
भुला दिये सब;
भूल न पाये,
वे बह निकले,
कविता बनकर।
दर्द जो गहरे,
नहीं बह सके;
उठे भाव बन
गहराई से
वे दिल की
अनुभूति बन गये।
दर्द मेरे ,
मनमीत बन गये;
यूं मेरे नव-गीत बन गये।
भावुक मन की
विविधाओं की-
बन सुगन्ध वे,
छंद बने, फ़िर-
सुर लय बनकर,
गीत बन गये।
भूली-बिसरी,
यादों के, उन-
मन्द समीरण की
थपकी से,
ताल बने,
सन्गीत बन गये।
दर्द मेरे ,
मन मीत बन गये;
यूं मेरे नव गीत बन गये॥---क्रमशः
गुरुवार, 23 जुलाई 2009
सूर्य ग्रहण --यह मेला -वह मेला,,धार्मिक अंधविश्वास -वैज्ञानिक अंधविश्वास ,कितना अन्तर ,क्या अन्तर ?
सूर्य ग्रहण पर एक तरफ़ तो नदियों ,तालावों ,मंदिरों ,पूजाघरों में मेले लगे ;दूसरी तरफ़ चश्मे लेलेकर जगह जगह ग्रहण देखने की उत्सुकता में वैज्ञानिक केन्द्रों व तमाम शहरों ,वायुयानों आदि में मेले लगे |कहा है-"उत्सव प्रियः मानवाः "- दोनों तरह के मेलों में क्या अन्तर है?इस तरह से भी विचार कीजिये---
१- भीड़ दोनों ही जगह एकत्र हुई ,स्नान वालों की भीड़ -सोद्देश्य ,पर दुःख में दुखी ( परमार्थी भाव ), परार्थ भाव से,उत्तम भाव से एकत्र हुई । क्यूंकि ज्योतिष के अनुसार राहू सूर्य को ग्रषित करके कष्ट देता है ,अतः दान पुन्य करना चाहिए । बस समाज के लिए एक बहाना है गरीवों ,निचले तबकों पर दया व सद्भाव ,सामाजिक स्वीकृति दिखाने का ,उनके अर्थ लाभ का । यह मानवता वादी प्रवृत्ति है|
सिर्फ़ विज्ञान भाव से ग्रहणदेखने वालों की भीड़ -आर्श्चय,कौतूहल,मनोरंजन,हम भी की प्रतियोगिता, धन (टिकट)का दिखावा ,सिर्फ़ अपना स्वयं के ज्ञान ,जानकारी ,अर्थात सिर्फ़ अपने लिए एकत्र हुए थे ,क्योंकि वह सिर्फ़ एक घटना मात्र थी ,चन्द्रमा की छाया ,कहीं कोई सुख-दुःख या परार्थ भाव नहीं सिर्फ़ "में " और अहम् को जन्म देता भाव ।
२-- स्नान वाले लोगों के मेले से स्थानीय लोगों को ही आर्थिक लाभ हुआ एवं जनता का अपना अपना धन सोद्देश्य खर्च हुआ ,जबकि सिर्फ़ कौतुहलवश एकत्र मेले में सरकारी धन खर्च हुआ व कुछ स्थानीय जन के लाभ के साथ विमान कंपनिया ,चश्मे की कंपनियाँ आदि धन्ना सेठों का , टी वी ,विज्ञापन आदि का धंधा हुआ एवं तमाम जनता का हफ्तों से समय व धन बरबाद हुआ |
३- जिन्होंने देखा उन्हें क्या मूल लाभ हुआ,क्या तीर मार लिया , जिन्होंने न देखा उन्हें क्या हानि हुई ?क्या ये वैज्ञानिक अंधविश्वास नहीं है ?
४-धार्मिक विश्वास (तथाकथित अंध विश्वास) ग्रहण देखने को मना करता है, विज्ञान भी नंगी आँखों से देखने को मना करता है , क्या अन्तर है ,तब चश्मे नहीं होते थे।
५- ज्योतिष , धार्मिक मान्यता के अनुसार ,सूर्य को राहू ग्रषित करता है,राहू व केतु छाया ग्रह माने जाते हैं ,अतः होसकता है छाया को ही राहू व केतु कहा गया हो ,भाव रूप में जैसा कि भारतीय तरीका है कथन का,रहू व केतु के पौराणिक प्रकरण में चन्द्रमा की ही प्रमुख भूमिका थी । विज्ञान के अनुसार भी तो चन्द्रमा की छाया सूर्य को ग्रषित करती है। दोनों ग्रहणों में चन्द्रमा की प्रमुख भूमिका होती है। ---क्या अन्तर है।
६-वैज्ञानिकों के अनुसार सूर्य के ढँक जाने पर रेडिएशन कम होजाते हैं , यह भी सोचें ,चन्द्रमा से रेडिएशन रूक जाते हैं व एकत्र होजाते हैं तथा हटने पर सभी एक साथ अधिक मात्रा में प्रथ्वी पर आते हैं , इसीलिए जल से शरीर व स्थानों को प्रक्षालन किया जाता है, खाना नहीं बनाया जाता आदि।
७।ग्रहण में पशु पक्षियों का व्यवहार सदियों से जन-जन को पता है ,विज्ञान अभी नया-नया है अतः प्रयोग कर रहा है।
क्या अन्तर है इस मेले में उस मेले में | पुराना व भारतीय ज्ञान अन्धाविवास ,नया अंधविश्वास विज्ञान !!!
१- भीड़ दोनों ही जगह एकत्र हुई ,स्नान वालों की भीड़ -सोद्देश्य ,पर दुःख में दुखी ( परमार्थी भाव ), परार्थ भाव से,उत्तम भाव से एकत्र हुई । क्यूंकि ज्योतिष के अनुसार राहू सूर्य को ग्रषित करके कष्ट देता है ,अतः दान पुन्य करना चाहिए । बस समाज के लिए एक बहाना है गरीवों ,निचले तबकों पर दया व सद्भाव ,सामाजिक स्वीकृति दिखाने का ,उनके अर्थ लाभ का । यह मानवता वादी प्रवृत्ति है|
सिर्फ़ विज्ञान भाव से ग्रहणदेखने वालों की भीड़ -आर्श्चय,कौतूहल,मनोरंजन,हम भी की प्रतियोगिता, धन (टिकट)का दिखावा ,सिर्फ़ अपना स्वयं के ज्ञान ,जानकारी ,अर्थात सिर्फ़ अपने लिए एकत्र हुए थे ,क्योंकि वह सिर्फ़ एक घटना मात्र थी ,चन्द्रमा की छाया ,कहीं कोई सुख-दुःख या परार्थ भाव नहीं सिर्फ़ "में " और अहम् को जन्म देता भाव ।
२-- स्नान वाले लोगों के मेले से स्थानीय लोगों को ही आर्थिक लाभ हुआ एवं जनता का अपना अपना धन सोद्देश्य खर्च हुआ ,जबकि सिर्फ़ कौतुहलवश एकत्र मेले में सरकारी धन खर्च हुआ व कुछ स्थानीय जन के लाभ के साथ विमान कंपनिया ,चश्मे की कंपनियाँ आदि धन्ना सेठों का , टी वी ,विज्ञापन आदि का धंधा हुआ एवं तमाम जनता का हफ्तों से समय व धन बरबाद हुआ |
३- जिन्होंने देखा उन्हें क्या मूल लाभ हुआ,क्या तीर मार लिया , जिन्होंने न देखा उन्हें क्या हानि हुई ?क्या ये वैज्ञानिक अंधविश्वास नहीं है ?
४-धार्मिक विश्वास (तथाकथित अंध विश्वास) ग्रहण देखने को मना करता है, विज्ञान भी नंगी आँखों से देखने को मना करता है , क्या अन्तर है ,तब चश्मे नहीं होते थे।
५- ज्योतिष , धार्मिक मान्यता के अनुसार ,सूर्य को राहू ग्रषित करता है,राहू व केतु छाया ग्रह माने जाते हैं ,अतः होसकता है छाया को ही राहू व केतु कहा गया हो ,भाव रूप में जैसा कि भारतीय तरीका है कथन का,रहू व केतु के पौराणिक प्रकरण में चन्द्रमा की ही प्रमुख भूमिका थी । विज्ञान के अनुसार भी तो चन्द्रमा की छाया सूर्य को ग्रषित करती है। दोनों ग्रहणों में चन्द्रमा की प्रमुख भूमिका होती है। ---क्या अन्तर है।
६-वैज्ञानिकों के अनुसार सूर्य के ढँक जाने पर रेडिएशन कम होजाते हैं , यह भी सोचें ,चन्द्रमा से रेडिएशन रूक जाते हैं व एकत्र होजाते हैं तथा हटने पर सभी एक साथ अधिक मात्रा में प्रथ्वी पर आते हैं , इसीलिए जल से शरीर व स्थानों को प्रक्षालन किया जाता है, खाना नहीं बनाया जाता आदि।
७।ग्रहण में पशु पक्षियों का व्यवहार सदियों से जन-जन को पता है ,विज्ञान अभी नया-नया है अतः प्रयोग कर रहा है।
क्या अन्तर है इस मेले में उस मेले में | पुराना व भारतीय ज्ञान अन्धाविवास ,नया अंधविश्वास विज्ञान !!!
लेबल:
-कौतूहल,
छाया-छाया ग्रह.,
धंधा,
नया-पुराना,
पूजा,
लाभ-हानि
मंगलवार, 21 जुलाई 2009
श्रृष्टि व जीवन -भाग ६ --मानव -वैदिक विज्ञान का मत
पिछली पोस्ट भाग - ५ में जीव,जीवन,बृद्धि, लिंग चयन व स्वचालित मैथुन प्रक्रिया कैसे प्रारम्भ हुई इस पर आधुनिक विज्ञान का मत व्याख्यायित किया था। इस अंक में वैदिक विज्ञान का मत प्रस्तुत किया जारहा है|
ब्रह्मा ने समस्त प्राणियों ,देव,असुर,वनस्पति के साथ ही मानव का निर्माण किया ,यह सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ कृति थी जिसे सभी पुरुषार्थ ,धर्म,अर्थ,काम व मोक्ष ) के योग्य पाया गया |यह क्रम इस प्रकार था-
----अ.मानस सृष्टि
----बी.संकल्प सृष्टि
----स.काम संकल्प सृष्टि
----द .मैथुनी (माहेश्वरी )प्रजा
१. सर्वप्रथम ब्रह्मा ने -सनक,सनंदन ,सनातन व सनत्कुमार --चार मानस पुत्र बनाए ,जो योग साधना हेतु रम गए।
२- पुनःसंकल्प से नारद,भृगु,कर्म,प्रचेतस,पुलह,अन्गिरिसि,क्रतु,पुलस्त्य,अत्री,मरीचि --१० प्रजापति बनाए
३.-पुनः संकल्प द्वारा ९ पुत्र- भृगु ,मरीचि,पुलस्त्य,angira ,क्रतु,अत्रि,vashishth ,daksh ,पुलह एवं ९पुत्रियाँ --ख्याति,भूति ,सम्भूति,प्रीति,क्षमा प्रसूति आदि उत्पन्न कीं |
यद्यपि ये सब संकल्प द्वारा संतति प्रवृत्त थे परन्तु कोई निश्चित ,सतत ,स्वचालित प्रक्रिया व क्रम नहीं था ( सब एकान्गी थे--प्राणियों व वनस्पतियों में भी ), अतः ब्रह्मा का सृष्टि क्रम व कार्य समाप्त नही हो paa rahaa था | ३-ब्रह्मा ने पुनः prabhu का स्मरण किया, तब अर्ध नारीश्वर( द्विलिन्गी) रूप ,में रुद्र देव जो शम्भु महेश्वर व माया का सम्मिलित रूप था,प्रकट हुए। जिसने स्वयम को --क्रूर-सौम्या; शान्त-अशान्त;श्यामा-गौरी;शीला-अशीला आदि ११ नारी भाव एवम ११ पुरुष भावों में विभक्त किया।रुद्रदेव के ये सभी ११-११ स्त्री-पुरुश भाव सभी जीवों में समाहित हुए,इस प्रकार काम श्रिष्टि का प्रादुर्भाव हुआ।
४- ब्रह्मा ने स्वयम के दायें-बायें भाग से मनु व शतरूपा को प्रकट किया,जिनमे रुद्रदेव के ११-११ नर नारी भाव समाहित होने से वे प्रथम मानव युगल हुए। वे मानस,सन्कल्प व काम सन्कल्प विधियों से सन्तति उत्पत्ति में प्रव्रत्त थे ,परन्तु अभी भी पूर्ण स्वचालित प्रक्रिया नहीं थी।
५- पुनः ब्रह्मा ने मनु की काम सन्कल्प पुत्रियांआकूति व प्रसूति-को दक्ष को दिया।दक्ष को मानस श्रिष्टि फ़लित नहीं थी अतः उसने काम-सम्भोग प्रक्रिया से ५००० व १०००० पुत्र उत्पन्न किये ,परन्तु सब नारद के उपदेश से तपश्या को चले गये ।दक्ष ने नारद को सदा घूमते रहने का श्राप देदिया।
६।-पुनः दक्ष नेप्रसूति के गर्भ से -सम्भोग ,मैथुन जन्य प्रक्रिया से ६० पुत्रिओं को जन्म दिया,जिन्हें सोम,अन्गिरा,धर्म,कश्यप व अरिष्ट्नमि आदि रिशियों को दिया गया ,जिनसे मैथुनी क्रिया द्वारा,सन्तति से आगे स्वतः क्रमिक श्रष्टि क्रम चला,व चलरहा है। अतः दक्ष से वास्तविक श्रष्टि क्रम माना जाता है।
-- प्रथम मैथुनी क्रम प्रसूति से चला अतः गर्भाधान को प्रसूति एवन जन्म को प्रसव कहा जाता है।
- - शम्भु महेश्वर, इस लिन्गीय चयन व निर्धारण व काम-सम्भोग स्वतः उत्पत्ति प्रणाली के मूल हैं अतः इस श्रष्टि को "माहेश्वरी प्रज़ा या श्रष्टि " कहाजाता है। भला जबतक नारी भाव की उत्पत्ति न होती स्वतः श्रष्टि क्रम कैसे पूरा हो सकता था??
इस प्रकार ब्रह्मा का स्रष्टि क्रम सम्पूर्ण हुआ।
ब्रह्मा ने समस्त प्राणियों ,देव,असुर,वनस्पति के साथ ही मानव का निर्माण किया ,यह सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ कृति थी जिसे सभी पुरुषार्थ ,धर्म,अर्थ,काम व मोक्ष ) के योग्य पाया गया |यह क्रम इस प्रकार था-
----अ.मानस सृष्टि
----बी.संकल्प सृष्टि
----स.काम संकल्प सृष्टि
----द .मैथुनी (माहेश्वरी )प्रजा
१. सर्वप्रथम ब्रह्मा ने -सनक,सनंदन ,सनातन व सनत्कुमार --चार मानस पुत्र बनाए ,जो योग साधना हेतु रम गए।
२- पुनःसंकल्प से नारद,भृगु,कर्म,प्रचेतस,पुलह,अन्गिरिसि,क्रतु,पुलस्त्य,अत्री,मरीचि --१० प्रजापति बनाए
३.-पुनः संकल्प द्वारा ९ पुत्र- भृगु ,मरीचि,पुलस्त्य,angira ,क्रतु,अत्रि,vashishth ,daksh ,पुलह एवं ९पुत्रियाँ --ख्याति,भूति ,सम्भूति,प्रीति,क्षमा प्रसूति आदि उत्पन्न कीं |
यद्यपि ये सब संकल्प द्वारा संतति प्रवृत्त थे परन्तु कोई निश्चित ,सतत ,स्वचालित प्रक्रिया व क्रम नहीं था ( सब एकान्गी थे--प्राणियों व वनस्पतियों में भी ), अतः ब्रह्मा का सृष्टि क्रम व कार्य समाप्त नही हो paa rahaa था | ३-ब्रह्मा ने पुनः prabhu का स्मरण किया, तब अर्ध नारीश्वर( द्विलिन्गी) रूप ,में रुद्र देव जो शम्भु महेश्वर व माया का सम्मिलित रूप था,प्रकट हुए। जिसने स्वयम को --क्रूर-सौम्या; शान्त-अशान्त;श्यामा-गौरी;शीला-अशीला आदि ११ नारी भाव एवम ११ पुरुष भावों में विभक्त किया।रुद्रदेव के ये सभी ११-११ स्त्री-पुरुश भाव सभी जीवों में समाहित हुए,इस प्रकार काम श्रिष्टि का प्रादुर्भाव हुआ।
४- ब्रह्मा ने स्वयम के दायें-बायें भाग से मनु व शतरूपा को प्रकट किया,जिनमे रुद्रदेव के ११-११ नर नारी भाव समाहित होने से वे प्रथम मानव युगल हुए। वे मानस,सन्कल्प व काम सन्कल्प विधियों से सन्तति उत्पत्ति में प्रव्रत्त थे ,परन्तु अभी भी पूर्ण स्वचालित प्रक्रिया नहीं थी।
५- पुनः ब्रह्मा ने मनु की काम सन्कल्प पुत्रियांआकूति व प्रसूति-को दक्ष को दिया।दक्ष को मानस श्रिष्टि फ़लित नहीं थी अतः उसने काम-सम्भोग प्रक्रिया से ५००० व १०००० पुत्र उत्पन्न किये ,परन्तु सब नारद के उपदेश से तपश्या को चले गये ।दक्ष ने नारद को सदा घूमते रहने का श्राप देदिया।
६।-पुनः दक्ष नेप्रसूति के गर्भ से -सम्भोग ,मैथुन जन्य प्रक्रिया से ६० पुत्रिओं को जन्म दिया,जिन्हें सोम,अन्गिरा,धर्म,कश्यप व अरिष्ट्नमि आदि रिशियों को दिया गया ,जिनसे मैथुनी क्रिया द्वारा,सन्तति से आगे स्वतः क्रमिक श्रष्टि क्रम चला,व चलरहा है। अतः दक्ष से वास्तविक श्रष्टि क्रम माना जाता है।
-- प्रथम मैथुनी क्रम प्रसूति से चला अतः गर्भाधान को प्रसूति एवन जन्म को प्रसव कहा जाता है।
- - शम्भु महेश्वर, इस लिन्गीय चयन व निर्धारण व काम-सम्भोग स्वतः उत्पत्ति प्रणाली के मूल हैं अतः इस श्रष्टि को "माहेश्वरी प्रज़ा या श्रष्टि " कहाजाता है। भला जबतक नारी भाव की उत्पत्ति न होती स्वतः श्रष्टि क्रम कैसे पूरा हो सकता था??
इस प्रकार ब्रह्मा का स्रष्टि क्रम सम्पूर्ण हुआ।
शनिवार, 18 जुलाई 2009
ग्यान, विग्यान व ज्योतिष- विग्यान है या नहीं?
पिछले दिनों ’साइन्स ब्लोगेर असोसिएसन’ पर ज्योतिष विग्यान है या नहीं- पर बहुत लम्बी चौडी बहस हुई ,बिना परिणाम के।----
----बस्तुतः एक परिभाषा के अनुसार,--जो विभु( द्रश्य पदार्थ,प्रक्रति) का विश्लेषण करते करते लघु( अणु) तक पहुंचेतथा रास्ते में प्राप्त जान्कारियों व परिणामी जानकारियों को मानव के भौतिक सुख साधन हेतु उपयोग करे वह विग्यान है, एवम जो लघु( अणु- आत्मा, ब्रह्म,जीव ,माया) की व्याख्या करते करते विभु( महान- ईश्वर,प्रक्रति,जीव) तक पहुंचे तथा इस जानकारी को मानव के आचरण की उन्नति हेतु उपयग करे वह ग्यान( दर्शन,ब्रह्म ग्यान आदि) है।
उपनिषद के अनुसार ईश्वर, जीव,स्रष्टि,माया के बारे में जानना ग्यान,बाकी सन्सार के बारे में जानना-अग्यान है। विग्यान का अर्थ है विशिष्ट ग्यान,विशेष वस्तु के बारे में विशेष ग्यान। क्योंकि ज्योतिष ,ज्योति पिन्डों(नक्षत्रों आदि द्रश्य पिन्ड) के बारे में विशेष ग्यान है अतः सभी अग्यान श्रेणियों के अन्तर्गत वह भी विग्यान ही है। बहस यह होनीचाहिये कि वह कितना उपयोगी है,जीवन के लिये।
-----ग्यान,अग्यान,विग्यान ,धर्म,दर्शन के तात्विक विश्लेषण हम अपने अन्य ब्लोग--http://vijaanaati-vijaanaati-science.blogspot.com पर करेंगे।
शुक्रवार, 17 जुलाई 2009
अकाल व सूखा की स्थिति ---
आज सूखा व अकाल की स्थिति है , इस विषय पर उसकेव्यवहारिक कारण व निवारण पर एक सामाजिक व शास्त्रीय पक्ष प्रस्तुत है , जो आज के परिप्रेक्ष्य में भी समीचीन है ---विवेचनार्थ --लक्ष्मण जब भगवान राम से अयोध्या के प्रबंधन की चिंता के साथ ,शासकों के गुणावगुण जानने की इक्षा करते हैं तो ,वे सीताजी द्वारा उनकी चिंता दूर कराते है----
एक समय विनती कर लक्ष्मण ,
बोले रघुबर से ,हे भ्राता !
शंका एक निवारण करदें ;
पिता हमारे राजा दशरथ ,
थे सम्राट चक्रवर्ती वे,
वेद विधान नीति पारंगत ॥
वह सब भार भरत पर है अब,
कैसे वे कर रहे व्यवस्था ?
क्या व्यवहार सुधी नृप के हों ,
दुष्ट नृपों के विचार कैसे ;
राघव भेद सहित समझाएं ,
हर्षे रघुपति वाणी सुनकर ॥
राज्यश्री धरती माँ सम है ,
बोले राम सभी के उत्तर ;
कहें जानकी यही उचित है ।
सिय बोलीं ,योग्य भूप पाकर ,
माता धरती हर्षित होतीं ;
उर्वरा शक्ति करतीं ,प्रकटित |
धन -धान्य श्री पुष्पित होकर ,
प्रकृति भी मुस्काने लगती ;
बर्षा बसंत सब ऋतुएँ भी ,
हैं उचित समय आतीं जातीं ।
सब प्रजा सुखी सम्पन्न हुई ,
राजा की जय गाती रहती ॥
भूप, जो प्रजा के पालन में ,
पिता समान भाव दिखलाता ;
सबमें निज सुख दुःख भाव किए ,
विविध विधान धर्म अपनाता ;
लघुतम से लघुतम प्राणी का ,
न्याय धर्म युत रखता ध्यान॥
प्रजा स्वयं भी प्रेम भाव की ,
सुर-सरिता में बहती रहती ,
सब परमार्थ भाव रत रहते।
नारी का अपमान न होता,
चोरी ठगी अधर्म भाव का,
सपने में भी ध्यान न आता॥
अश्लील साहित्य कर्म का ,
लेश मात्र भी जिक्र न होता ;
नारि- पुरूष सब उचित आचरण ,
सात्विक कर्म धर्म अपनाते ;
जन, निर्भय आनंदित रहता॥
देश की रक्षा ,संस्कृति रक्षण ,
तथा प्रजा के व्यापक हित में ,
अधर्मियों से,विधर्मियों से,
अन्यायी लोलुप जन जो हों ;
कभी नहीं समझौता करता
वही नृपति अच्छा शासक है ॥
पर जो शासक ,निज सुख के हित,
अत्याचार प्रजा पर करता ;
अधर्म मय, अन्याय कर्म से ;
अपराधों को प्रश्रय देता ।
अप विचार अप कर्म भाव में ,
जन-जन पाप लिप्त होजाता॥
हिंसा चोरी अनृत भावना ,
नर-नारी को भाने लगती;
अश्लील कृत्यों से नारी ,
अपने को कृत कृत्य समझती ।
लूट ,अपहरण बलात्कार के,
विविध रूप अपनाए जाते॥
अति भौतिक सुख लिप्त हुए नर,
मद्य - पान आदिक विषयों रत ;
कपट झूठ छल और दुष्टता ,
के भावों को प्रश्रय देते ;
भ्रष्टाचार , आतंकबाद में ,
राष्ट्र, समाज लिप्त होजाता ॥
पाप अधर्म -नीति कृत्यों से ,
प्रकृति माता विचलित होती;
अनावृष्टि ,अतिवृष्टि आदि से ,
धरती की उर्वरता घटती,
कमी धान्य-धन की होने से ,
बनती है अकाल की स्थिति ॥
नीतिवान धर्मग्य भरत हैं ,
साथ सभी को लेकर चलते ;
रक्षा-हित तत्पर हैं ,शत्रुहन ,
प्रजा सुखी ,संतृप्त रहेगी ;
सुखद समर्थ प्रवंधन होगा,
चिंता की कुछ बात नहीं है ॥-----शूर्पनखा ,काव्य-उपन्यास से ।
एक समय विनती कर लक्ष्मण ,
बोले रघुबर से ,हे भ्राता !
शंका एक निवारण करदें ;
पिता हमारे राजा दशरथ ,
थे सम्राट चक्रवर्ती वे,
वेद विधान नीति पारंगत ॥
वह सब भार भरत पर है अब,
कैसे वे कर रहे व्यवस्था ?
क्या व्यवहार सुधी नृप के हों ,
दुष्ट नृपों के विचार कैसे ;
राघव भेद सहित समझाएं ,
हर्षे रघुपति वाणी सुनकर ॥
राज्यश्री धरती माँ सम है ,
बोले राम सभी के उत्तर ;
कहें जानकी यही उचित है ।
सिय बोलीं ,योग्य भूप पाकर ,
माता धरती हर्षित होतीं ;
उर्वरा शक्ति करतीं ,प्रकटित |
धन -धान्य श्री पुष्पित होकर ,
प्रकृति भी मुस्काने लगती ;
बर्षा बसंत सब ऋतुएँ भी ,
हैं उचित समय आतीं जातीं ।
सब प्रजा सुखी सम्पन्न हुई ,
राजा की जय गाती रहती ॥
भूप, जो प्रजा के पालन में ,
पिता समान भाव दिखलाता ;
सबमें निज सुख दुःख भाव किए ,
विविध विधान धर्म अपनाता ;
लघुतम से लघुतम प्राणी का ,
न्याय धर्म युत रखता ध्यान॥
प्रजा स्वयं भी प्रेम भाव की ,
सुर-सरिता में बहती रहती ,
सब परमार्थ भाव रत रहते।
नारी का अपमान न होता,
चोरी ठगी अधर्म भाव का,
सपने में भी ध्यान न आता॥
अश्लील साहित्य कर्म का ,
लेश मात्र भी जिक्र न होता ;
नारि- पुरूष सब उचित आचरण ,
सात्विक कर्म धर्म अपनाते ;
जन, निर्भय आनंदित रहता॥
देश की रक्षा ,संस्कृति रक्षण ,
तथा प्रजा के व्यापक हित में ,
अधर्मियों से,विधर्मियों से,
अन्यायी लोलुप जन जो हों ;
कभी नहीं समझौता करता
वही नृपति अच्छा शासक है ॥
पर जो शासक ,निज सुख के हित,
अत्याचार प्रजा पर करता ;
अधर्म मय, अन्याय कर्म से ;
अपराधों को प्रश्रय देता ।
अप विचार अप कर्म भाव में ,
जन-जन पाप लिप्त होजाता॥
हिंसा चोरी अनृत भावना ,
नर-नारी को भाने लगती;
अश्लील कृत्यों से नारी ,
अपने को कृत कृत्य समझती ।
लूट ,अपहरण बलात्कार के,
विविध रूप अपनाए जाते॥
अति भौतिक सुख लिप्त हुए नर,
मद्य - पान आदिक विषयों रत ;
कपट झूठ छल और दुष्टता ,
के भावों को प्रश्रय देते ;
भ्रष्टाचार , आतंकबाद में ,
राष्ट्र, समाज लिप्त होजाता ॥
पाप अधर्म -नीति कृत्यों से ,
प्रकृति माता विचलित होती;
अनावृष्टि ,अतिवृष्टि आदि से ,
धरती की उर्वरता घटती,
कमी धान्य-धन की होने से ,
बनती है अकाल की स्थिति ॥
नीतिवान धर्मग्य भरत हैं ,
साथ सभी को लेकर चलते ;
रक्षा-हित तत्पर हैं ,शत्रुहन ,
प्रजा सुखी ,संतृप्त रहेगी ;
सुखद समर्थ प्रवंधन होगा,
चिंता की कुछ बात नहीं है ॥-----शूर्पनखा ,काव्य-उपन्यास से ।
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